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रुद्र संहिता · अध्याय 136

गणेश की गणाधिपति-पद-प्राप्ति

अध्याय 135अध्याय-सूचीअध्याय 137

श्लोक 1 (shiva.rudra.136.1)

नारद उवाच जीविते गिरिजापुत्रे देव्या दृष्टे प्रजेश्वर । ततः किमभवत्तत्र कृपया तद्वदाधुना

nārada uvāca jīvite girijāputre devyā dṛṣṭe prajeśvara tataḥ kimabhavattatra kṛpayā tadvadādhunā

नारद ने कहा — हे प्रजेश्वर! गिरिजा-पुत्र को जीवित देखकर देवी को जब हर्ष हुआ, तब वहाँ क्या हुआ — कृपा करके अब वह बताइए।

श्लोक 2 (shiva.rudra.136.2)

ब्रह्मोवाच जीविते गिरिजापुत्रे देव्या दृष्टे मुनीश्वर । यज्जातं तच्छृणुष्वाद्य वच्मि तं महदुत्सवम्

brahmovāca jīvite girijāputre devyā dṛṣṭe munīśvara yajjātaṁ tacchṛṇuṣvādya vacmi taṁ mahadutsavam

ब्रह्मा जी ने कहा — हे मुनीश्वर! गिरिजा-पुत्र को जीवित देखकर देवी को जो हुआ, वह अब सुनिए; मैं वह महान् उत्सव कहता हूँ।

श्लोक 3 (shiva.rudra.136.3)

जीवितःस शिवापुत्रो निर्व्यग्रो विकृतो मुने । अभिषिक्तस्तदा देवैर्गणाध्यक्षैर्गजाननः

jīvitaḥsa śivāputro nirvyagro vikṛto mune abhiṣiktastadā devairgaṇādhyakṣairgajānanaḥ

हे मुनि! वह शिवा-पुत्र, जीवित, व्यग्रताहीन, परिवर्तित रूप वाला, गजानन, तब देवों तथा गणाध्यक्षों द्वारा अभिषिक्त किया गया।

श्लोक 4 (shiva.rudra.136.4)

दृष्ट्वा स्वतनयं देवी शिवा हर्षसमन्विता । गृहीत्वा बालकं दोर्भ्यां प्रमुदा परिषस्वजे

dṛṣṭvā svatanayaṁ devī śivā harṣasamanvitā gṛhītvā bālakaṁ dorbhyāṁ pramudā pariṣasvaje

अपने पुत्र को देखकर हर्षयुक्त देवी शिवा ने बालक को दोनों भुजाओं से पकड़कर अत्यंत आनन्दपूर्वक आलिंगन किया।

श्लोक 5 (shiva.rudra.136.5)

वस्त्राणि विविधानीह नानालङ्करणानि च । ददौ प्रीत्या गणेशाय स्वपुत्राय मुदाम्बिका

vastrāṇi vividhānīha nānālaṅkaraṇāni ca dadau prītyā gaṇeśāya svaputrāya mudāmbikā

अम्बिका ने प्रसन्नतापूर्वक अपने पुत्र गणेश को नाना प्रकार के वस्त्र तथा विविध आभूषण प्रेमपूर्वक प्रदान किए।

श्लोक 6 (shiva.rudra.136.6)

पूजयित्वा तया देव्या सिद्धिभिश्चाप्यनेकशः । करेण स्पर्शितः सोऽथ सर्वदुःखहरेण वै

pūjayitvā tayā devyā siddhibhiścāpyanekaśaḥ kareṇa sparśitaḥ so'tha sarvaduḥkhahareṇa vai

उस देवी तथा अनेक सिद्धियों द्वारा पूजित होकर, वे तब उनके सर्वदुःखहारी हाथ से स्पर्श किए गए।

श्लोक 7 (shiva.rudra.136.7)

पूजयित्वा सुतं देवी मुखमाचुम्ब्य शाङ्करी । वरान्ददौ तदा प्रीत्या जातस्त्वं दुःखितोऽधुना

pūjayitvā sutaṁ devī mukhamācumbya śāṅkarī varāndadau tadā prītyā jātastvaṁ duḥkhito'dhunā

पुत्र की पूजा कर शांकरी देवी ने उसका मुख चूमा, और तब प्रेमपूर्वक वर देते हुए कहा — 'तुम जो अभी तक दुःखी थे, अब जन्म ले चुके हो—'

श्लोक 8 (shiva.rudra.136.8)

धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि पूर्वपूज्यो भवाधुना । सर्वेषाममराणां वै सर्वदा दुःखवर्जितः

dhanyo'si kṛtakṛtyo'si pūrvapūjyo bhavādhunā sarveṣāmamarāṇāṁ vai sarvadā duḥkhavarjitaḥ

'—तुम धन्य हो, कृतकृत्य हो; अब सबसे पहले पूज्य बनो, और सदा समस्त देवताओं में दुःखरहित रहो।'

श्लोक 9 (shiva.rudra.136.9)

आनने तव सिन्दूरं दृश्यते साम्प्रतं यदि । तस्मात्त्वं पूजनीयोऽसि सिन्दूरेण सदा नरैः

ānane tava sindūraṁ dṛśyate sāmprataṁ yadi tasmāttvaṁ pūjanīyo'si sindūreṇa sadā naraiḥ

'चूँकि इस समय तुम्हारे मुख पर सिन्दूर दिखाई देता है, अतः मनुष्यों द्वारा तुम सदा सिन्दूर से पूजे जाओगे।'

श्लोक 10 (shiva.rudra.136.10)

पुष्पैर्वा चन्दनैर्वापि गन्धेनैव शुभेन च । नैवेद्येन सुरम्येण नीराजेन विधानतः

puṣpairvā candanairvāpi gandhenaiva śubhena ca naivedyena suramyeṇa nīrājena vidhānataḥ

'पुष्पों से, चन्दन से अथवा शुभ गन्ध से, मनोहर नैवेद्य से तथा विधिपूर्वक आरती से—'

श्लोक 11 (shiva.rudra.136.11)

ताम्बूलैरथ दानैश्च तथा प्रक्रमणैरपि । नमस्कारविधानेन पूजां यस्ते विधास्यति

tāmbūlairatha dānaiśca tathā prakramaṇairapi namaskāravidhānena pūjāṁ yaste vidhāsyati

'—ताम्बूल से, दान से तथा प्रदक्षिणा से, और नमस्कार-विधि से जो भी तुम्हारी पूजा करेगा—'

श्लोक 12 (shiva.rudra.136.12)

तस्य वै सकला सिद्धिर्भविष्यति न संशयः । विघ्नान्यनेकरूपाणि क्षयं यास्यन्त्यसंशयम्

tasya vai sakalā siddhirbhaviṣyati na saṁśayaḥ vighnānyanekarūpāṇi kṣayaṁ yāsyantyasaṁśayam

'—उसे निश्चय ही सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त होगी, और नाना प्रकार के विघ्न निःसंदेह नष्ट हो जाएँगे।'

श्लोक 13 (shiva.rudra.136.13)

ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा च तदा देवी स्वपुत्रं तं महेश्वरी । नानावस्तुभिरुत्कृष्टैः पुनरप्यर्चयत्तथा

brahmovāca ityuktvā ca tadā devī svaputraṁ taṁ maheśvarī nānāvastubhirutkṛṣṭaiḥ punarapyarcayattathā

ब्रह्मा जी ने कहा — ऐसा कहकर महेश्वरी देवी ने पुनः नाना उत्कृष्ट वस्तुओं से अपने पुत्र की पूजा की।

श्लोक 14 (shiva.rudra.136.14)

ततःस्वास्थ्यं च देवानां गणानां च विशेषतः । गिरिजाकृपया विप्र जातं तत्क्षणमात्रतः

tataḥsvāsthyaṁ ca devānāṁ gaṇānāṁ ca viśeṣataḥ girijākṛpayā vipra jātaṁ tatkṣaṇamātrataḥ

हे विप्र! तत्पश्चात् गिरिजा की कृपा से उसी क्षण देवों का और विशेषतः गणों का स्वास्थ्य (कल्याण) हो गया।

श्लोक 15 (shiva.rudra.136.15)

एतस्मिंश्च क्षणे देवा वासवाद्याः शिवं मुदा । स्तुत्वा प्रसाद्य तं देवं भक्ता निन्युः शिवान्तिकम्

etasmiṁśca kṣaṇe devā vāsavādyāḥ śivaṁ mudā stutvā prasādya taṁ devaṁ bhaktā ninyuḥ śivāntikam

और उसी क्षण वासव आदि देवगण हर्षपूर्वक शिव की स्तुति और प्रसन्नता करके, भक्तिपूर्वक उस देव को शिवा के समीप ले गए।

श्लोक 16 (shiva.rudra.136.16)

संसाद्य गिरिशं पश्चादुत्सङ्गे सन्न्यवेशयन् । बालकं तं महेशान्यास्त्रिजगत्सुखहेतवे

saṁsādya giriśaṁ paścādutsaṅge sannyaveśayan bālakaṁ taṁ maheśānyāstrijagatsukhahetave

गिरीश को समर्पित कर, फिर उन्होंने त्रिलोक-सुख के हेतु उस बालक को महेशानी की गोद में बिठा दिया।

श्लोक 17 (shiva.rudra.136.17)

शिवोऽपि तस्य शिरसि दत्त्वा स्वकरपङ्कजम् । उवाच वचनं देवान् पुत्रोऽयमिति मेऽपरः

śivo'pi tasya śirasi dattvā svakarapaṅkajam uvāca vacanaṁ devān putro'yamiti me'paraḥ

शिव ने भी उसके सिर पर अपना करकमल रखकर देवताओं से यह वचन कहा — 'यह अब मेरा एक और पुत्र है।'

श्लोक 18 (shiva.rudra.136.18)

गणेशोऽपि तदोत्थाय नमस्कृत्य शिवाय वै । पार्वत्यै च नमस्कृत्य मह्यं वै विष्णवे तथा

gaṇeśo'pi tadotthāya namaskṛtya śivāya vai pārvatyai ca namaskṛtya mahyaṁ vai viṣṇave tathā

गणेश ने भी तब उठकर शिव को प्रणाम किया, पार्वती को प्रणाम किया, तथा मुझे (ब्रह्मा को) और विष्णु को भी प्रणाम किया।

श्लोक 19 (shiva.rudra.136.19)

नारादाद्यानृषीन्सर्वान्स त्वास्थाय पुरोऽब्रवीत् । क्षन्तव्यश्चापराधो मे मानश्चैवेदृशो नृणाम्

nārādādyānṛṣīnsarvānsa tvāsthāya puro'bravīt kṣantavyaścāparādho me mānaścaivedṛśo nṛṇām

नारद आदि समस्त ऋषियों के समक्ष खड़े होकर उसने कहा — 'मेरा अपराध क्षमा किया जाए, और मनुष्यों का भी ऐसा मान (अभिमान) क्षमा हो।'

श्लोक 20 (shiva.rudra.136.20)

अहं च शङ्करश्चैव विष्णुश्चैते त्रयः सुराः । प्रत्यूचुर्युगपत्प्रीत्या ददतो वरमुत्तमम्

ahaṁ ca śaṅkaraścaiva viṣṇuścaite trayaḥ surāḥ pratyūcuryugapatprītyā dadato varamuttamam

मैंने, शंकर ने और विष्णु ने — इन तीनों देवों ने — प्रेमपूर्वक एक साथ उसे उत्तर दिया, और उसे एक उत्तम वर प्रदान किया।

श्लोक 21 (shiva.rudra.136.21)

त्रयो वयं सुरवरा यथा पूज्या जगत्त्रये । तथायं गणनाथश्च सकलैः प्रतिपूज्यताम्

trayo vayaṁ suravarā yathā pūjyā jagattraye tathāyaṁ gaṇanāthaśca sakalaiḥ pratipūjyatām

'जैसे हम तीनों श्रेष्ठ देव तीनों लोकों में पूज्य हैं, वैसे ही यह गणनाथ भी सबके द्वारा पूजित हो।'

श्लोक 22 (shiva.rudra.136.22)

वयं च प्राकृताश्चायं प्राकृतः पूज्य एव च । गणेशो विघ्नहर्त्ता हि सर्वकामफलप्रदः

vayaṁ ca prākṛtāścāyaṁ prākṛtaḥ pūjya eva ca gaṇeśo vighnaharttā hi sarvakāmaphalapradaḥ

'हम भी प्राकृत हैं और यह भी प्राकृत है, और यह भी पूज्य ही है; क्योंकि गणेश विघ्नहर्ता और सर्वकामनाओं के फल देने वाला है।'

श्लोक 23 (shiva.rudra.136.23)

एतत्पूजां पुरा कृत्वा पश्चात्पूज्या वयं नरैः । वयं च पूजिताः सर्वे नायं चापूजितो यदा

etatpūjāṁ purā kṛtvā paścātpūjyā vayaṁ naraiḥ vayaṁ ca pūjitāḥ sarve nāyaṁ cāpūjito yadā

'इसकी पूजा पहले करके ही हम मनुष्यों द्वारा बाद में पूज्य होंगे; और यदि यह अपूजित रहते हुए हम सब पूजे जाएँ—'

श्लोक 24 (shiva.rudra.136.24)

अस्मिन्नपूजिते देवाः परपूजाकृता यदि । तदा तत्फलहानिः स्यान्नात्र कार्या विचारणा

asminnapūjite devāḥ parapūjākṛtā yadi tadā tatphalahāniḥ syānnātra kāryā vicāraṇā

'—तो इसके अपूजित रहते यदि देवताओं की पूजा पहले की जाए, तो उस फल की हानि होगी — इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।'

श्लोक 25 (shiva.rudra.136.25)

ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा स गणेशानो नानावस्तुभिरादरात् । शिवेन पूजितः पूर्वं विष्णुनाऽनु प्रपूजितः

brahmovāca ityuktvā sa gaṇeśāno nānāvastubhirādarāt śivena pūjitaḥ pūrvaṁ viṣṇunā'nu prapūjitaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — ऐसा कहकर उस गणेशान की सबसे पहले शिव ने नाना वस्तुओं से आदरपूर्वक पूजा की, फिर उनके बाद विष्णु ने पूजा की।

श्लोक 26 (shiva.rudra.136.26)

ब्रह्मणा च मया तत्र पार्वत्या च प्रपूजितः । सर्वैर्देवगणैश्चैव पूजितः परया मुदा

brahmaṇā ca mayā tatra pārvatyā ca prapūjitaḥ sarvairdevagaṇaiścaiva pūjitaḥ parayā mudā

वहाँ ब्रह्मा ने अर्थात् मैंने भी, तथा पार्वती ने भी उसकी पूजा की; और समस्त देवगणों ने भी परम हर्ष से उसकी पूजा की।

श्लोक 27 (shiva.rudra.136.27)

सवैर्मिलित्वा तत्रैव ब्रह्मविष्णुहरादिभिः । सगणेशश्शिवातुष्ट्यै सर्वाध्यक्षो निवेदितः

savairmilitvā tatraiva brahmaviṣṇuharādibhiḥ sagaṇeśaśśivātuṣṭyai sarvādhyakṣo niveditaḥ

वहाँ ब्रह्मा, विष्णु, हर आदि सबने मिलकर, शिवा की प्रसन्नता के लिए, गणेश को गणों सहित सर्वाध्यक्ष घोषित किया।

श्लोक 28 (shiva.rudra.136.28)

पुनश्चैव शिवेनास्मै सुप्रसन्नेन चेतसा । सर्वदा सुखदा लोके वरा दत्ता ह्यनेकशः

punaścaiva śivenāsmai suprasannena cetasā sarvadā sukhadā loke varā dattā hyanekaśaḥ

और पुनः अत्यंत प्रसन्नचित्त शिव ने उसे लोक में सदा सुख देने वाले अनेक वर प्रदान किए।

श्लोक 29 (shiva.rudra.136.29)

शिव उवाच हे गिरीन्द्रसुतापुत्र सन्तुष्टोऽहं न संशयः । मयि तुष्टे जगत्तुष्टं विरुद्धः कोऽपि नो भवेत्

śiva uvāca he girīndrasutāputra santuṣṭo'haṁ na saṁśayaḥ mayi tuṣṭe jagattuṣṭaṁ viruddhaḥ ko'pi no bhavet

शिव ने कहा — 'हे गिरीन्द्र-सुता-पुत्र! मैं निःसंदेह संतुष्ट हूँ; मेरे संतुष्ट होने पर जगत् संतुष्ट होता है, कोई भी तुम्हारा विरोधी नहीं होगा।'

श्लोक 30 (shiva.rudra.136.30)

बालरूपोऽपि यस्मात्त्वं महाविक्रमकारकः । शक्तिपुत्रः सुतेजस्वी तस्माद्भव सदा सुखी

bālarūpo'pi yasmāttvaṁ mahāvikramakārakaḥ śaktiputraḥ sutejasvī tasmādbhava sadā sukhī

'बालरूप होते हुए भी तुम महापराक्रमी हो, शक्ति के पुत्र और महातेजस्वी हो — इसलिए सदा सुखी रहो।'

श्लोक 31 (shiva.rudra.136.31)

त्वन्नाम विघ्नहन्तृत्वे श्रेष्ठं चैव भवत्विति । मम सर्वगणाध्यक्षः सम्पूज्यस्त्वं भवाधुना

tvannāma vighnahantṛtve śreṣṭhaṁ caiva bhavatviti mama sarvagaṇādhyakṣaḥ sampūjyastvaṁ bhavādhunā

'विघ्न-नाश में तुम्हारा नाम श्रेष्ठ हो; और अब मेरे समस्त गणों के अध्यक्ष के रूप में तुम पूजनीय बनो।'

श्लोक 32 (shiva.rudra.136.32)

एवमुक्त्वा शङ्करेण पूजाविधिरनेकशः । आशिषश्चाप्यनेका हि कृतास्तस्मिंस्तु तत्क्षणात्

evamuktvā śaṅkareṇa pūjāvidhiranekaśaḥ āśiṣaścāpyanekā hi kṛtāstasmiṁstu tatkṣaṇāt

इस प्रकार कहकर शंकर ने उसी क्षण उसकी अनेक बार पूजा-विधि की और अनेक आशीर्वाद भी दिए।

श्लोक 33 (shiva.rudra.136.33)

ततो देवगणाश्चैव गीतं वाद्यं च नृत्यकम् । मुदा ते कारयामासुस्तथैवाप्सरसां गणाः

tato devagaṇāścaiva gītaṁ vādyaṁ ca nṛtyakam mudā te kārayāmāsustathaivāpsarasāṁ gaṇāḥ

तब देवगणों ने तथा अप्सराओं के समूहों ने भी हर्षपूर्वक गीत, वाद्य और नृत्य किया।

श्लोक 34 (shiva.rudra.136.34)

पुनश्चैव वरो दत्तः सुप्रसन्नेन शम्भुना । तस्मै च गणनाथाय शिवेनैव महात्मना

punaścaiva varo dattaḥ suprasannena śambhunā tasmai ca gaṇanāthāya śivenaiva mahātmanā

और पुनः उस महात्मा गणनाथ को अत्यंत प्रसन्न शम्भु ने स्वयं एक और वर प्रदान किया।

श्लोक 35 (shiva.rudra.136.35)

चतुर्थ्यां त्वं समुत्पन्नो भाद्रे मासि गणेश्वर । असिते च तथा पक्षे चन्द्रस्योदयने शुभे

caturthyāṁ tvaṁ samutpanno bhādre māsi gaṇeśvara asite ca tathā pakṣe candrasyodayane śubhe

'हे गणेश्वर! तुम भाद्रपद मास की चतुर्थी को, कृष्ण पक्ष में, चन्द्रोदय के शुभ समय पर उत्पन्न हुए।'

श्लोक 36 (shiva.rudra.136.36)

प्रथमे च तथा यामे गिरिजायाः सुचेतसः । आविर्बभूव ते रूपं यस्मात्ते व्रतमुत्तमम्

prathame ca tathā yāme girijāyāḥ sucetasaḥ āvirbabhūva te rūpaṁ yasmātte vratamuttamam

'सुचेता गिरिजा से प्रथम प्रहर में ही तुम्हारा रूप प्रकट हुआ — इसलिए तुम्हारा व्रत सर्वोत्तम होगा।'

श्लोक 37 (shiva.rudra.136.37)

तस्मात्तद्दिनमारभ्य तस्यामेव तिथौ मुदा । व्रतं कार्यं विशेषेण सर्वसिद्ध्यै सुशोभनम्

tasmāttaddinamārabhya tasyāmeva tithau mudā vrataṁ kāryaṁ viśeṣeṇa sarvasiddhyai suśobhanam

'अतः उस दिन से आरम्भ कर, उसी तिथि को, सर्वसिद्धि के लिए विशेष रूप से यह अत्यंत शोभन व्रत हर्षपूर्वक किया जाए।'

श्लोक 38 (shiva.rudra.136.38)

यावत्पुनः समायाति वर्षान्ते च चतुर्थिका । तावद्व्रतं च कर्तव्यं तव चैव ममाज्ञया

yāvatpunaḥ samāyāti varṣānte ca caturthikā tāvadvrataṁ ca kartavyaṁ tava caiva mamājñayā

'जब तक वर्ष के अन्त में वह चतुर्थी पुनः आती रहे, तब तक यह व्रत मेरी आज्ञा से तुम्हारे लिए किया जाता रहे।'

श्लोक 39 (shiva.rudra.136.39)

संसारे सुखमिच्छन्ति येऽतुलं चाप्यनेकशः । त्वां पूजयन्तु ते भक्त्या चतुर्थ्यां विधिपूर्वकम्

saṁsāre sukhamicchanti ye'tulaṁ cāpyanekaśaḥ tvāṁ pūjayantu te bhaktyā caturthyāṁ vidhipūrvakam

'जो लोग संसार में अनुपम सुख की अनेक प्रकार से कामना करते हैं, वे चतुर्थी को विधिपूर्वक भक्तिभाव से तुम्हारी पूजा करें।'

श्लोक 40 (shiva.rudra.136.40)

मार्गशीर्षे तथा मासे रमा या वै चतुर्थिका । प्रातः स्नानं तदा कृत्वा व्रतं विप्रान्निवेदयेत्

mārgaśīrṣe tathā māse ramā yā vai caturthikā prātaḥ snānaṁ tadā kṛtvā vrataṁ viprānnivedayet

'तथा मार्गशीर्ष मास में जो रमा नामक चतुर्थी है, उस दिन प्रातःकाल स्नान कर विप्रों को व्रत का निवेदन करे।'

श्लोक 41 (shiva.rudra.136.41)

दूर्वाभिः पूजनं कार्यमुपवासस्तथाविधः । रात्रेश्च प्रहरे जाते स्नात्वा सम्पूजयेन्नरः

dūrvābhiḥ pūjanaṁ kāryamupavāsastathāvidhaḥ rātreśca prahare jāte snātvā sampūjayennaraḥ

'दूर्वा से पूजन करे तथा उसी प्रकार उपवास रखे; रात्रि का एक प्रहर बीतने पर स्नान कर पूजा करे।'

श्लोक 42 (shiva.rudra.136.42)

मूर्तिं धातुमयीं कृत्वा प्रवालसम्भवां तथा । श्वेतार्कसम्भवां चापि मार्द्दिकां निर्मितां तथा

mūrtiṁ dhātumayīṁ kṛtvā pravālasambhavāṁ tathā śvetārkasambhavāṁ cāpi mārddikāṁ nirmitāṁ tathā

'धातु-निर्मित मूर्ति बनाकर, अथवा मूँगे से बनी, अथवा श्वेत आक से बनी, अथवा मिट्टी से बनी हुई—'

श्लोक 43 (shiva.rudra.136.43)

प्रतिष्ठाप्य तदा तत्र पूजयेत्प्रयतः पुमान् । गन्धैर्नानाविधैर्दिव्यैश्चन्दनैः पुष्पकैरिह

pratiṣṭhāpya tadā tatra pūjayetprayataḥ pumān gandhairnānāvidhairdivyaiścandanaiḥ puṣpakairiha

'—उसे वहाँ प्रतिष्ठित कर, पवित्र मनुष्य नाना प्रकार के दिव्य गन्धों, चन्दन तथा पुष्पों से उसकी पूजा करे।'

श्लोक 44 (shiva.rudra.136.44)

वितस्तिमात्रा दूर्वा च त्र्यङ्गा वै मूलवर्जिता । ईदृशानां शाद्बलानां शतेनैकोत्तरेण ह

vitastimātrā dūrvā ca tryaṅgā vai mūlavarjitā īdṛśānāṁ śādbalānāṁ śatenaikottareṇa ha

'एक बित्ता लम्बी, तीन पर्व वाली, मूल-रहित दूर्वा की — ऐसी एक सौ एक हरी दूर्वाओं से—'

श्लोक 45 (shiva.rudra.136.45)

एकविंशतिकेनैव पूजयेत्प्रतिमां स्थिताम् । धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैर्विविधैर्गणनायकम्

ekaviṁśatikenaiva pūjayetpratimāṁ sthitām dhūpairdīpaiśca naivedyairvividhairgaṇanāyakam

'—अथवा इक्कीस दूर्वाओं से ही स्थापित प्रतिमा की पूजा करे; गणनायक की धूप, दीप तथा विविध नैवेद्यों से पूजा करे।'

श्लोक 46 (shiva.rudra.136.46)

ताम्बूलाद्यर्घसद्द्रव्यैः प्रणिपत्य स्तवैस्तथा । त्वां तत्र पूजयित्वेत्थं बालचन्द्रं च पूजयेत्

tāmbūlādyarghasaddravyaiḥ praṇipatya stavaistathā tvāṁ tatra pūjayitvetthaṁ bālacandraṁ ca pūjayet

'ताम्बूल आदि उत्तम अर्घ्य-द्रव्यों से, प्रणाम तथा स्तवों सहित — इस प्रकार वहाँ तुम्हारी पूजा कर बालचन्द्र की भी पूजा करे।'

श्लोक 47 (shiva.rudra.136.47)

पश्चाद्विप्रांश्च सम्पूज्य भोजयेन्मधुरैर्मुदा । स्वयं चैव ततो भुञ्ज्यान्मधुरं लवणं विना

paścādviprāṁśca sampūjya bhojayenmadhurairmudā svayaṁ caiva tato bhuñjyānmadhuraṁ lavaṇaṁ vinā

'तत्पश्चात् ब्राह्मणों की पूजा कर हर्षपूर्वक उन्हें मधुर भोजन कराए; और फिर स्वयं भी बिना नमक के मधुर भोजन करे।'

श्लोक 48 (shiva.rudra.136.48)

विसर्जयेत्ततः पश्चान्नियमं सर्वमात्मनः । गणेशस्मरणं कुर्यात्सम्पूर्णं स्याद् व्रतं शुभम्

visarjayettataḥ paścānniyamaṁ sarvamātmanaḥ gaṇeśasmaraṇaṁ kuryātsampūrṇaṁ syād vrataṁ śubham

'उसके बाद अपने सारे नियम का विसर्जन करे; गणेश का स्मरण करने से यह शुभ व्रत सम्पूर्ण होगा।'

श्लोक 49 (shiva.rudra.136.49)

एवं व्रतेन सम्पूर्णे वर्षे जाते नरस्तदा । उद्यापनविधिं कुर्याद्व्रतसम्पूर्त्तिहेतवे

evaṁ vratena sampūrṇe varṣe jāte narastadā udyāpanavidhiṁ kuryādvratasampūrttihetave

'इस प्रकार व्रत करते हुए जब पूरा वर्ष बीत जाए, तब मनुष्य व्रत की पूर्ति के लिए उद्यापन-विधि करे।'

श्लोक 50 (shiva.rudra.136.50)

द्वादश ब्राह्मणास्तत्र भोजनीया मदाज्ञया । कुम्भमेकं च संस्थाप्य पूज्या मूर्तिस्त्वदीयिका

dvādaśa brāhmaṇāstatra bhojanīyā madājñayā kumbhamekaṁ ca saṁsthāpya pūjyā mūrtistvadīyikā

'मेरी आज्ञा से वहाँ बारह ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए; एक कलश स्थापित कर तुम्हारी मूर्ति की पूजा की जाए।'

श्लोक 51 (shiva.rudra.136.51)

स्थण्डिलेऽष्टदलं कृत्वा तदा वेदविधानतः । होमश्चैवात्र कर्तव्यो वित्तशाठ्यविवर्जितैः

sthaṇḍile'ṣṭadalaṁ kṛtvā tadā vedavidhānataḥ homaścaivātra kartavyo vittaśāṭhyavivarjitaiḥ

'वेदि पर अष्टदल बनाकर, वेद-विधि के अनुसार, धन में कंजूसी न रखने वालों द्वारा वहाँ हवन किया जाए।'

श्लोक 52 (shiva.rudra.136.52)

स्त्रीद्वयं च तथा चात्र बटुकद्वयमादरात् । भोजयेत्पूजयित्वा वै मूर्त्यग्रे विधिपूर्वकम्

strīdvayaṁ ca tathā cātra baṭukadvayamādarāt bhojayetpūjayitvā vai mūrtyagre vidhipūrvakam

'और दो स्त्रियों तथा दो बटुकों को भी आदरपूर्वक, मूर्ति के समक्ष विधिपूर्वक पूजा कर भोजन कराया जाए।'

श्लोक 53 (shiva.rudra.136.53)

निशि जागरणं कार्यं पुनः प्रातः प्रपूजयेत् । विसर्जनं ततश्चैव पुनरागमनाय च

niśi jāgaraṇaṁ kāryaṁ punaḥ prātaḥ prapūjayet visarjanaṁ tataścaiva punarāgamanāya ca

'रात्रि में जागरण किया जाए; फिर प्रातःकाल पुनः पूजा की जाए, तत्पश्चात् पुनरागमन के लिए विसर्जन किया जाए।'

श्लोक 54 (shiva.rudra.136.54)

बालकाच्चाशिषो ग्राह्याःस्वस्तिवाचनमेव च । पुष्पाञ्जलिं प्रदद्याच्च व्रतसम्पूर्णहेतवे

bālakāccāśiṣo grāhyāḥsvastivācanameva ca puṣpāñjaliṁ pradadyācca vratasampūrṇahetave

'बालक से आशीर्वाद तथा स्वस्तिवाचन ग्रहण करना चाहिए; व्रत की पूर्णता के लिए पुष्पांजलि अर्पित करनी चाहिए।'

श्लोक 55 (shiva.rudra.136.55)

नमस्कारांस्ततः कृत्वा नानाकार्यं प्रकल्पयेत् । एवं व्रतं कृतं येन तस्येप्सितफलं भवेत्

namaskārāṁstataḥ kṛtvā nānākāryaṁ prakalpayet evaṁ vrataṁ kṛtaṁ yena tasyepsitaphalaṁ bhavet

'तत्पश्चात् नमस्कार कर अपने नाना कार्यों में लग जाए; इस प्रकार जिसने व्रत किया, उसे इच्छित फल प्राप्त होगा।'

श्लोक 56 (shiva.rudra.136.56)

यो नित्यं श्रद्धया सार्द्धं पूजां चैव स्वशक्तितः । कुर्य्यात्तव गणेशान सर्वकामफलाप्तये

yo nityaṁ śraddhayā sārddhaṁ pūjāṁ caiva svaśaktitaḥ kuryyāttava gaṇeśāna sarvakāmaphalāptaye

'हे गणेशान! जो प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अपनी शक्ति के अनुसार तुम्हारी पूजा करता है, सर्वकामनाओं की सिद्धि के लिए—'

श्लोक 57 (shiva.rudra.136.57)

सिन्दूरैश्चन्दनैश्चैव तण्डुलैः केतकैस्तथा । उपचारैरनेकैश्च पूजयेत्त्वां गणेश्वरम्

sindūraiścandanaiścaiva taṇḍulaiḥ ketakaistathā upacārairanekaiśca pūjayettvāṁ gaṇeśvaram

'—सिन्दूर, चन्दन, तण्डुल तथा केतकी पुष्पों से, और अनेक उपचारों से, हे गणेश्वर! तुम्हारी पूजा करता है—'

श्लोक 58 (shiva.rudra.136.58)

एवं त्वां पूजयेयुर्ये भक्त्या नानोपचारतः । तेषां सिद्धिर्भवेन्नित्यं विघ्ननाशो भवेदिह

evaṁ tvāṁ pūjayeyurye bhaktyā nānopacārataḥ teṣāṁ siddhirbhavennityaṁ vighnanāśo bhavediha

'—इस प्रकार जो लोग भक्तिपूर्वक नाना उपचारों से तुम्हारी पूजा करते हैं, उन्हें सदा सिद्धि प्राप्त होगी और यहाँ विघ्न-नाश होगा।'

श्लोक 59 (shiva.rudra.136.59)

सर्वैर्वर्णैः प्रकर्त्तव्या स्त्रीभिश्चैव विशेषतः । उदयाभिमुखैश्चैव राजभिश्च विशेषतः

sarvairvarṇaiḥ prakarttavyā strībhiścaiva viśeṣataḥ udayābhimukhaiścaiva rājabhiśca viśeṣataḥ

'यह पूजा सभी वर्णों द्वारा की जानी चाहिए, विशेष रूप से स्त्रियों द्वारा, तथा उन्नति चाहने वाले राजाओं द्वारा विशेष रूप से।'

श्लोक 60 (shiva.rudra.136.60)

यं यं कामयते यो वै तं तमाप्नोति निश्चितम् । अतः कामयमानेन तेन सेव्यः सदा भवान्

yaṁ yaṁ kāmayate yo vai taṁ tamāpnoti niścitam ataḥ kāmayamānena tena sevyaḥ sadā bhavān

'जो जो जिस-जिस वस्तु की कामना करता है, वह निश्चय ही उसे प्राप्त कर लेता है; अतः कामना करने वाले को सदा तुम्हारी सेवा करनी चाहिए।'

श्लोक 61 (shiva.rudra.136.61)

ब्रह्मोवाच शिवेनैवं तदा प्रोक्तं गणेशाय महात्मने । तदानीं दैवतैश्चैव सर्वैश्च ऋषिसत्तमैः

brahmovāca śivenaivaṁ tadā proktaṁ gaṇeśāya mahātmane tadānīṁ daivataiścaiva sarvaiśca ṛṣisattamaiḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — इस प्रकार शिव द्वारा महात्मा गणेश से यह कहे जाने पर, तब समस्त देवताओं तथा श्रेष्ठ ऋषियों द्वारा—

श्लोक 62 (shiva.rudra.136.62)

तथेत्युक्त्वा तु तैःसर्वैर्गणैः शम्भुप्रियैर्मुने । पूजितो हि गणाधीशो विधिना परमेण सः

tathetyuktvā tu taiḥsarvairgaṇaiḥ śambhupriyairmune pūjito hi gaṇādhīśo vidhinā parameṇa saḥ

—हे मुनि! 'तथास्तु' कहकर शम्भु के प्रिय उन समस्त गणों द्वारा वह गणाधीश परम विधि से पूजित हुआ।

श्लोक 63 (shiva.rudra.136.63)

ततश्चैव गणाः सर्वे प्रणेमुस्ते गणेश्वरम् । समानर्चुर्विशेषेण नानावस्तुभिरादरात्

tataścaiva gaṇāḥ sarve praṇemuste gaṇeśvaram samānarcurviśeṣeṇa nānāvastubhirādarāt

तब समस्त गणों ने उस गणेश्वर को प्रणाम किया, और आदरपूर्वक नाना वस्तुओं से विशेष रूप से उनकी पूजा की।

श्लोक 64 (shiva.rudra.136.64)

गिरिजायास्समुत्पन्नो यश्च हर्षो मुनीश्वर । चतुर्भिर्वदनैर्वै तमवर्ण्यं च कथं ब्रुवे

girijāyāssamutpanno yaśca harṣo munīśvara caturbhirvadanairvai tamavarṇyaṁ ca kathaṁ bruve

हे मुनीश्वर! गिरिजा को जो हर्ष हुआ, उसे चार मुखों से भी मैं अवर्णनीय होने पर कैसे कहूँ?

श्लोक 65 (shiva.rudra.136.65)

देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः । जगुर्गन्धर्वमुख्याश्च पुष्पवर्षं पपात ह

devadundubhayo nedurnanṛtuścāpsarogaṇāḥ jagurgandharvamukhyāśca puṣpavarṣaṁ papāta ha

देव-दुन्दुभियाँ बज उठीं, अप्सराओं के समूह नाचने लगे, प्रमुख गन्धर्व गाने लगे, और पुष्पों की वर्षा हुई।

श्लोक 66 (shiva.rudra.136.66)

जगत्स्वास्थ्यं तदा प्राप गणाधीशे प्रतिष्ठिते । महोत्सवो महानासीत्सर्वं दुःखं क्षयं गतम्

jagatsvāsthyaṁ tadā prāpa gaṇādhīśe pratiṣṭhite mahotsavo mahānāsītsarvaṁ duḥkhaṁ kṣayaṁ gatam

गणाधीश के प्रतिष्ठित होने पर जगत् को तब स्वास्थ्य (कल्याण) प्राप्त हुआ; महान् उत्सव हुआ और सारा दुःख नष्ट हो गया।

श्लोक 67 (shiva.rudra.136.67)

शिवाशिवौ च मोदेतां विशेषेणाति नारद । आसीत्सुमङ्गलं भूरि सर्वत्र सुखदायकम्

śivāśivau ca modetāṁ viśeṣeṇāti nārada āsītsumaṅgalaṁ bhūri sarvatra sukhadāyakam

हे नारद! शिवा और शिव विशेष रूप से अत्यंत आनन्दित हुए; सर्वत्र अत्यंत सुमंगल तथा सुखदायक वातावरण हो गया।

श्लोक 68 (shiva.rudra.136.68)

ततो देवगणाः सर्वे ऋषीणां च गणास्तथा । समागताश्च ये तत्र जग्मुस्ते तु शिवाज्ञया

tato devagaṇāḥ sarve ṛṣīṇāṁ ca gaṇāstathā samāgatāśca ye tatra jagmuste tu śivājñayā

तत्पश्चात् वहाँ एकत्रित हुए समस्त देवगण तथा ऋषिगण शिव की आज्ञा से वहाँ से चले गए।

श्लोक 69 (shiva.rudra.136.69)

प्रशंसन्तः शिवां तत्र गणेशं च पुनः पुनः । शिवं चैव तथा स्तुत्वा कीदृशं युद्धमेव च

praśaṁsantaḥ śivāṁ tatra gaṇeśaṁ ca punaḥ punaḥ śivaṁ caiva tathā stutvā kīdṛśaṁ yuddhameva ca

वहाँ शिवा की तथा गणेश की बार-बार प्रशंसा करते हुए, और शिव की भी स्तुति करते हुए, वह युद्ध कैसा हुआ था—

श्लोक 70 (shiva.rudra.136.70)

यदा सा गिरिजा देवी कोपहीना बभूव ह । शिवोऽपि गिरिजां तत्र पूर्ववत्सम्प्रपद्य ताम्

yadā sā girijā devī kopahīnā babhūva ha śivo'pi girijāṁ tatra pūrvavatsamprapadya tām

—और गिरिजा देवी कैसे क्रोधरहित हुईं — यह सब कहते हुए, शिव भी वहाँ पूर्ववत् गिरिजा के पास पहुँचकर—

श्लोक 71 (shiva.rudra.136.71)

चकार विविधं सौख्यं लोकानां हितकाम्यया । स्वात्मारामोऽपि परमो भक्तकार्योद्यतः सदा

cakāra vividhaṁ saukhyaṁ lokānāṁ hitakāmyayā svātmārāmo'pi paramo bhaktakāryodyataḥ sadā

—लोकों के हित की कामना से नाना प्रकार का सुख उत्पन्न करने लगे; वे परम आत्माराम होते हुए भी सदा भक्तों के कार्य में तत्पर रहते हैं।

श्लोक 72 (shiva.rudra.136.72)

विष्णुश्च शिवमापृच्छ्य ब्रह्माहं तं तथैव हि । आगच्छाव स्वधामं च शिवौ संसेव्य भक्तितः

viṣṇuśca śivamāpṛcchya brahmāhaṁ taṁ tathaiva hi āgacchāva svadhāmaṁ ca śivau saṁsevya bhaktitaḥ

विष्णु ने शिव से आज्ञा लेकर, और मैंने ब्रह्मा ने भी उसी प्रकार, शिव-दम्पति की भक्तिपूर्वक सेवा कर अपने-अपने धाम को प्रस्थान किया।

श्लोक 73 (shiva.rudra.136.73)

नारद त्वं च भगवन्सङ्गीय शिवयोर्यशः । आगमो भवनं स्वं च शिवौ पृष्ट्वा मुनीश्वर

nārada tvaṁ ca bhagavansaṅgīya śivayoryaśaḥ āgamo bhavanaṁ svaṁ ca śivau pṛṣṭvā munīśvara

हे भगवन् नारद! हे मुनीश्वर! शिव-शिवा का यश गाकर, तथा उस दम्पति से आज्ञा लेकर, तुम भी अपने भवन को आ गए।

श्लोक 74 (shiva.rudra.136.74)

एतत्ते सर्वमाख्यातं मया वै शिवयोर्यशः । भवत्पृष्टेन विघ्नेशयशः सम्मिश्रमादरात्

etatte sarvamākhyātaṁ mayā vai śivayoryaśaḥ bhavatpṛṣṭena vighneśayaśaḥ sammiśramādarāt

यह सब मैंने तुम्हें बताया — शिव-शिवा का यश — तुम्हारे पूछने पर, आदरपूर्वक विघ्नेश के यश के साथ मिलाकर।

श्लोक 75 (shiva.rudra.136.75)

इदं सुमङ्गलाख्यानं यः शृणोति सुसंयतः । सर्वमङ्गलसंयुक्तः स भवेन्मङ्गलालयः

idaṁ sumaṅgalākhyānaṁ yaḥ śṛṇoti susaṁyataḥ sarvamaṅgalasaṁyuktaḥ sa bhavenmaṅgalālayaḥ

जो संयमित होकर इस अत्यंत मंगलमय आख्यान को सुनता है, वह सर्व-मंगल से युक्त होकर मंगल का आश्रय बन जाता है।

श्लोक 76 (shiva.rudra.136.76)

अपुत्रो लभते पुत्रं निर्धनो लभते धनम् । भार्यार्थी लभते भार्यां प्रजार्थी लभते प्रजाम्

aputro labhate putraṁ nirdhano labhate dhanam bhāryārthī labhate bhāryāṁ prajārthī labhate prajām

पुत्रहीन पुत्र को प्राप्त करता है, निर्धन धन को प्राप्त करता है; भार्या चाहने वाला भार्या को और सन्तान चाहने वाला सन्तान को प्राप्त करता है।

श्लोक 77 (shiva.rudra.136.77)

आरोग्यं लभते रोगी सौभाग्यं दुर्भगो लभेत् । नष्टपुत्रं नष्टधनं प्रोषिता च पतिं लभेत् । शोकाविष्टः शोकहीनः स भवेन्नात्र संशयः

ārogyaṁ labhate rogī saubhāgyaṁ durbhago labhet naṣṭaputraṁ naṣṭadhanaṁ proṣitā ca patiṁ labhet śokāviṣṭaḥ śokahīnaḥ sa bhavennātra saṁśayaḥ

रोगी आरोग्य प्राप्त करता है, दुर्भाग्यशाली सौभाग्य प्राप्त करता है; खोए पुत्र और खोए धन वाला उन्हें प्राप्त करता है, और पति से बिछुड़ी स्त्री पति को पुनः प्राप्त करती है; शोकाकुल शोकरहित हो जाता है — इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 78 (shiva.rudra.136.78)

इदं गाणेशमाख्यानं यस्य गेहे च तिष्ठति सदा मङ्गलसंयुक्तः स भवेन्नात्र संशयः

idaṁ gāṇeśamākhyānaṁ yasya gehe ca tiṣṭhati sadā maṅgalasaṁyuktaḥ sa bhavennātra saṁśayaḥ

जिसके घर में यह गणेश-आख्यान रहता है, वह सदा मंगल से युक्त रहता है — इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 79 (shiva.rudra.136.79)

यात्राकाले च पुण्याहे यः शृणोति समाहितः । सर्वाभीष्टं स लभते श्रीगणेशप्रसादतः

yātrākāle ca puṇyāhe yaḥ śṛṇoti samāhitaḥ sarvābhīṣṭaṁ sa labhate śrīgaṇeśaprasādataḥ

जो यात्रा के समय अथवा पुण्य दिवस पर एकाग्रचित्त होकर इसे सुनता है, वह श्री गणेश की कृपा से सभी अभीष्ट वस्तुओं को प्राप्त करता है।

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