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रुद्र संहिता · अध्याय 139

त्रिपुर-वर्णन

अध्याय 138अध्याय-सूचीअध्याय 140

श्लोक 1 (shiva.rudra.139.1)

नारद उवाच । श्रुतमस्माभिरानन्दप्रदं चरितमुत्तमम् । गृहस्थस्यैव शम्भोश्च गणस्कन्दादिसत्कथम्

nārada uvāca śrutamasmābhirānandapradaṁ caritamuttamam gṛhasthasyaiva śambhośca gaṇaskandādisatkatham

नारद ने कहा — हमने गृहस्थ शम्भु का आनन्दप्रद उत्तम चरित्र तथा गणेश-स्कन्द आदि की सत्य कथाएँ सुनी हैं।

श्लोक 2 (shiva.rudra.139.2)

इदानीं ब्रूहि सुप्रीत्या चरितं वरमुत्तमम् । शङ्करो हि यथा रुद्रो जघान विहरन् खलान्

idānīṁ brūhi suprītyā caritaṁ varamuttamam śaṅkaro hi yathā rudro jaghāna viharan khalān

अब कृपापूर्वक वह श्रेष्ठ चरित्र सुनाइए कि किस प्रकार रुद्र रूप शंकर ने लीला करते हुए दुष्टों का वध किया।

श्लोक 3 (shiva.rudra.139.3)

कथं ददाह भगवान्नगराणि सुरद्विषाम् । त्रीण्येकेन च बाणेन युगपत्केन वीर्यवान्

kathaṁ dadāha bhagavānnagarāṇi suradviṣām trīṇyekena ca bāṇena yugapatkena vīryavān

भगवान् ने देवद्रोहियों के नगरों को कैसे जलाया, तथा एक ही बाण से एक साथ तीनों नगरों को किस पराक्रम से भस्म किया?

श्लोक 4 (shiva.rudra.139.4)

एतत्सर्वं समाचक्ष्व चरितं शशिमौलिनः । देवर्षिसुखदं शश्वन्मायाविहरतः प्रभोः

etatsarvaṁ samācakṣva caritaṁ śaśimaulinaḥ devarṣisukhadaṁ śaśvanmāyāviharataḥ prabhoḥ

चन्द्रमौलि प्रभु का यह सम्पूर्ण चरित्र सुनाइए, जो देवताओं और ऋषियों को सुख देने वाला है तथा जो सदा अपनी माया से लीला करते हैं।

श्लोक 5 (shiva.rudra.139.5)

ब्रह्मोवाच । एवमेतत्पुरा पृष्टो व्यासेन ऋषिसत्तम । सनत्कुमारं प्रोवाच तदेव कथयाम्यहम्

brahmovāca evametatpurā pṛṣṭo vyāsena ṛṣisattama sanatkumāraṁ provāca tadeva kathayāmyaham

ब्रह्मा जी ने कहा — हे ऋषिश्रेष्ठ! पूर्वकाल में व्यास जी ने भी मुझसे यही प्रश्न पूछा था, और सनत्कुमार ने उन्हें यह कथा सुनाई थी। वही कथा अब मैं तुम्हें सुनाता हूँ।

श्लोक 6 (shiva.rudra.139.6)

सनत्कुमार उवाच । शृणु व्यास महाप्राज्ञ चरितं शशिमौलिनः । यथा ददाह त्रिपुरं बाणेनैकेन विश्वहृत्

sanatkumāra uvāca śṛṇu vyāsa mahāprājña caritaṁ śaśimaulinaḥ yathā dadāha tripuraṁ bāṇenaikena viśvahṛt

सनत्कुमार ने कहा — हे महाप्राज्ञ व्यास! सुनो, चन्द्रमौलि का वह चरित्र, कि विश्व के हरने वाले (शिव) ने एक ही बाण से त्रिपुर को कैसे जलाया।

श्लोक 7 (shiva.rudra.139.7)

शिवात्मजेन स्कन्देन निहते तारकासुरे । तत्पुत्रास्तु त्रयो दैत्याः पर्यतप्यन्मुनीश्वर

śivātmajena skandena nihate tārakāsure tatputrāstu trayo daityāḥ paryatapyanmunīśvara

जब शिवपुत्र स्कन्द के हाथों तारकासुर मारा गया, तब हे मुनीश्वर, उसके तीन पुत्र दैत्य अत्यन्त संतप्त हो उठे।

श्लोक 8 (shiva.rudra.139.8)

तारकाक्षस्तु तज्ज्येष्ठो विद्युन्माली च मध्यमः । कमलाक्षः कनीयांश्च सर्वे तुल्यबलाः सदा

tārakākṣastu tajjyeṣṭho vidyunmālī ca madhyamaḥ kamalākṣaḥ kanīyāṁśca sarve tulyabalāḥ sadā

उनमें बड़ा तारकाक्ष था, मध्यम विद्युन्माली और सबसे छोटा कमलाक्ष — तीनों सदा समान बलशाली थे।

श्लोक 9 (shiva.rudra.139.9)

जितेन्द्रियाः सुसन्नद्धाः संयताः सत्यवादिनः । दृढचित्ता महावीरा देवद्रोहिण एव च

jitendriyāḥ susannaddhāḥ saṁyatāḥ satyavādinaḥ dṛḍhacittā mahāvīrā devadrohiṇa eva ca

वे जितेन्द्रिय, सुसज्जित, संयमी, सत्यवादी, दृढ़चित्त, महावीर और सदा देवताओं के द्रोही थे।

श्लोक 10 (shiva.rudra.139.10)

ते तु मेरुगुहां गत्वा तपश्चक्रुर्महाद्भुतम् । त्रयः सर्वान्सुभोगांश्च विहाय सुमनोहरान्

te tu meruguhāṁ gatvā tapaścakrurmahādbhutam trayaḥ sarvānsubhogāṁśca vihāya sumanoharān

वे मेरु की एक गुफा में जाकर अत्यन्त अद्भुत तप करने लगे, तीनों ने सभी मनोहर भोगों को त्याग दिया।

श्लोक 11 (shiva.rudra.139.11)

वसन्ते सर्वकामांश्च गीतवादित्रनिस्स्वनम् । विहाय सोत्सवं तेपुस्त्रयस्ते तारकात्मजाः

vasante sarvakāmāṁśca gītavāditranissvanam vihāya sotsavaṁ tepustrayaste tārakātmajāḥ

वसन्त ऋतु में सभी कामनाओं, गीत-वाद्य के स्वरों और उत्सवों को त्यागकर तारका के वे तीनों पुत्र तप करते रहे।

श्लोक 12 (shiva.rudra.139.12)

ग्रीष्मे सूर्यप्रभां जित्वा दिक्षु प्रज्वाल्य पावकम् । तन्मध्यसंस्थाः सिद्ध्यर्थं जुहुवुर्हव्यमादरात्

grīṣme sūryaprabhāṁ jitvā dikṣu prajvālya pāvakam tanmadhyasaṁsthāḥ siddhyarthaṁ juhuvurhavyamādarāt

ग्रीष्म में सूर्य की प्रभा को भी जीतते हुए उन्होंने चारों दिशाओं में अग्नि प्रज्वलित की और उसके मध्य खड़े होकर सिद्धि के लिए आदरपूर्वक हवन किया।

श्लोक 13 (shiva.rudra.139.13)

महाप्रतापपतिताःसर्वेऽप्यासन् सुमूर्च्छिताः । वर्षासु गतसन्त्रासा वृष्टिं मूर्द्धन्यधारयन्

mahāpratāpapatitāḥsarve'pyāsan sumūrcchitāḥ varṣāsu gatasantrāsā vṛṣṭiṁ mūrddhanyadhārayan

उस महान् ताप से पीड़ित होकर वे सभी मूर्च्छित हो गए; तथा वर्षा ऋतु में भय त्यागकर वे अपने सिर पर वर्षा की बूँदें सहते रहे।

श्लोक 14 (shiva.rudra.139.14)

शरत्काले प्रभूतं तु भोजनं तु बुभुक्षिताः । रम्यं स्निग्धं स्थिरं हृद्यं फलं मूलमनुत्तमम्

śaratkāle prabhūtaṁ tu bhojanaṁ tu bubhukṣitāḥ ramyaṁ snigdhaṁ sthiraṁ hṛdyaṁ phalaṁ mūlamanuttamam

शरद् ऋतु में भूख से पीड़ित होते हुए भी उन्होंने केवल रुचिकर, स्निग्ध, स्थिर और हृदय को भाने वाले उत्तम फल-मूल ही ग्रहण किए।

श्लोक 15 (shiva.rudra.139.15)

संयमात्क्षुत्तृषो जित्वा पानान्युच्चावचान्यपि । बुभुक्षितेभ्यो दत्त्वा तु बभूवुरुपला इव

saṁyamātkṣuttṛṣo jitvā pānānyuccāvacānyapi bubhukṣitebhyo dattvā tu babhūvurupalā iva

संयम से भूख-प्यास को जीतकर, जो भी अन्न-पान उन्हें प्राप्त होता, वे उसे भूखों को दान कर देते और स्वयं पत्थर के समान स्थिर रहते।

श्लोक 16 (shiva.rudra.139.16)

संस्थितास्ते महात्मानो निराधाराश्चतुर्दिशम् । हेमन्ते गिरिमाश्रित्य धैर्येण परमेण तु

saṁsthitāste mahātmāno nirādhārāścaturdiśam hemante girimāśritya dhairyeṇa parameṇa tu

वे महात्मा बिना किसी सहारे के चारों दिशाओं में खड़े रहे; हेमन्त ऋतु में परम धैर्य के साथ पर्वत का आश्रय लेकर तप करते रहे।

श्लोक 17 (shiva.rudra.139.17)

तुषारदेहसञ्छन्ना जलक्लिन्नेन वाससा । आसाद्य देहं क्षौमेण शिशिरे तोयमध्यगाः

tuṣāradehasañchannā jalaklinnena vāsasā āsādya dehaṁ kṣaumeṇa śiśire toyamadhyagāḥ

उनका शरीर हिम से ढका था, वस्त्र जल से भीगे थे; शिशिर ऋतु में केवल क्षौम वस्त्र धारण कर वे जल के मध्य खड़े रहते थे।

श्लोक 18 (shiva.rudra.139.18)

अनिर्विण्णास्ततःसर्वे क्रमशोऽवर्द्धयंस्तपः । तेपुस्त्रयस्ते तत्पुत्रा विधिमुद्दिश्य सत्तमाः

anirviṇṇāstataḥsarve kramaśo'varddhayaṁstapaḥ tepustrayaste tatputrā vidhimuddiśya sattamāḥ

इस प्रकार निराश हुए बिना, वे सभी क्रमशः अपने तप को बढ़ाते गए; वे तीनों पुत्र ब्रह्मा को लक्ष्य कर उत्तम रीति से तप करते रहे।

श्लोक 19 (shiva.rudra.139.19)

तप उग्रं समास्थाय नियमे परमे स्थिताः । तपसा कर्षयामासुर्देहान् स्वान् दानवोत्तमाः

tapa ugraṁ samāsthāya niyame parame sthitāḥ tapasā karṣayāmāsurdehān svān dānavottamāḥ

उग्र तप का आश्रय लेकर, परम नियम में स्थित रहकर, उन दानवश्रेष्ठों ने तप द्वारा अपने शरीरों को क्षीण कर लिया।

श्लोक 20 (shiva.rudra.139.20)

वर्षाणां शतकं चैव पदमेकं निधाय च । भूमौ स्थित्वा परं तत्र तेपुस्ते बलवत्तराः

varṣāṇāṁ śatakaṁ caiva padamekaṁ nidhāya ca bhūmau sthitvā paraṁ tatra tepuste balavattarāḥ

सौ वर्षों तक वे बलशाली दैत्य पृथ्वी पर एक ही पैर रखकर परम तप करते रहे।

श्लोक 21 (shiva.rudra.139.21)

ते सहस्रं तु वर्षाणां वातभक्षाः सुदारुणाः । तपस्तेपुर्दुरात्मानः परं तापमुपागताः

te sahasraṁ tu varṣāṇāṁ vātabhakṣāḥ sudāruṇāḥ tapastepurdurātmānaḥ paraṁ tāpamupāgatāḥ

फिर हजार वर्षों तक वे अत्यन्त भयंकर दुरात्मा केवल वायु का भक्षण करते हुए तप करते रहे और परम ताप को प्राप्त हुए।

श्लोक 22 (shiva.rudra.139.22)

वर्षाणां तु सहस्रं वै मस्तकेनास्थितास्तथा । वर्षाणां तु शतेनैव ऊर्ध्वबाहव आस्थिताः

varṣāṇāṁ tu sahasraṁ vai mastakenāsthitāstathā varṣāṇāṁ tu śatenaiva ūrdhvabāhava āsthitāḥ

हजार वर्षों तक वे सिर के बल खड़े रहे, तथा सौ वर्षों तक भुजाएँ ऊपर उठाए स्थिर खड़े रहे।

श्लोक 23 (shiva.rudra.139.23)

एवं दुःखं परं प्राप्ता दुराग्रहपरा इमे । ईदृक् ते संस्थिता दैत्या दिवारात्रमतन्द्रिता

evaṁ duḥkhaṁ paraṁ prāptā durāgrahaparā ime īdṛk te saṁsthitā daityā divārātramatandritā

इस प्रकार अपने हठ में लीन वे दैत्य परम दुःख को प्राप्त हुए; वे दिन-रात बिना आलस्य के इसी स्थिति में स्थित रहे।

श्लोक 24 (shiva.rudra.139.24)

एवं तेषां गतः कालो महान् सुतपतां मुने । ब्रह्मात्मनां तारकाणां धर्मेणेति मतिर्मम

evaṁ teṣāṁ gataḥ kālo mahān sutapatāṁ mune brahmātmanāṁ tārakāṇāṁ dharmeṇeti matirmama

हे मुने! इस प्रकार उत्तम तप करते हुए, ब्रह्मा में मन लगाए उन तारकपुत्रों का बहुत काल धर्मपूर्वक बीत गया — ऐसा मेरा मत है।

श्लोक 25 (shiva.rudra.139.25)

प्रादुरासीत्ततो ब्रह्मा सुरासुरगुरुर्महान् । सन्तुष्टस्तपसा तेषां वरं दातुं महायशाः

prādurāsīttato brahmā surāsuragururmahān santuṣṭastapasā teṣāṁ varaṁ dātuṁ mahāyaśāḥ

तब देवताओं और असुरों के महान् गुरु, महायशस्वी ब्रह्मा उनके तप से संतुष्ट होकर वर देने के लिए प्रकट हुए।

श्लोक 26 (shiva.rudra.139.26)

मुनिदेवासुरैः सार्द्धं सान्त्वपूर्वमिदं वचः । ततस्तानब्रवीत्सर्वान् सर्वभूतपितामहः

munidevāsuraiḥ sārddhaṁ sāntvapūrvamidaṁ vacaḥ tatastānabravītsarvān sarvabhūtapitāmahaḥ

मुनियों, देवताओं और असुरों के साथ उन सबके पितामह ने उन्हें सान्त्वनापूर्वक यह वचन कहा।

श्लोक 27 (shiva.rudra.139.27)

ब्रह्मोवाच । प्रसन्नोऽस्मि महादैत्या युष्माकं तपसा मुने । सर्वं दास्यामि युष्मभ्यं वरं ब्रूत यदीप्सितम्

brahmovāca prasanno'smi mahādaityā yuṣmākaṁ tapasā mune sarvaṁ dāsyāmi yuṣmabhyaṁ varaṁ brūta yadīpsitam

ब्रह्मा जी ने कहा — हे महादैत्यो! हे मुनियो! मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ; तुम जो चाहो वह वर माँगो, मैं सब कुछ दूँगा।

श्लोक 28 (shiva.rudra.139.28)

किमर्थं सुतपस्तप्तं कथयध्वं सुरद्विषः । सर्वेषां तपसो दाता सर्वकर्तास्मि सर्वदा

kimarthaṁ sutapastaptaṁ kathayadhvaṁ suradviṣaḥ sarveṣāṁ tapaso dātā sarvakartāsmi sarvadā

हे सुरद्वेषियो! बताओ, किस प्रयोजन से यह उत्तम तप किया गया? मैं सदा ही सबके तप का फल देने वाला और सर्वकर्ता हूँ।

श्लोक 29 (shiva.rudra.139.29)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शनैस्ते स्वात्मनो गतम् । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे प्रणिपत्य पितामहम्

sanatkumāra uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā śanaiste svātmano gatam ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve praṇipatya pitāmaham

सनत्कुमार ने कहा — उनका वह वचन सुनकर वे धीरे-धीरे अपने चैतन्य में लौटे और सब हाथ जोड़कर पितामह को प्रणाम कर बोले।

श्लोक 30 (shiva.rudra.139.30)

दैत्या ऊचुः । यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरस्त्वया । अवध्यत्वं च सर्वेषां सर्वभूतेषु देहिनः

daityā ūcuḥ yadi prasanno deveśa yadi deyo varastvayā avadhyatvaṁ ca sarveṣāṁ sarvabhūteṣu dehinaḥ

दैत्यों ने कहा — हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि आप वर देना चाहते हैं, तो हमें सभी प्राणियों के बीच अवध्यता प्रदान कीजिए।

श्लोक 31 (shiva.rudra.139.31)

स्थिरान् कुरु जगन्नाथ पान्तु नः परिपन्थिनः । जरारोगादयः सर्वे नास्मान्मृत्युरगात् क्वचित्

sthirān kuru jagannātha pāntu naḥ paripanthinaḥ jarārogādayaḥ sarve nāsmānmṛtyuragāt kvacit

हे जगन्नाथ! हमें स्थिर कीजिए, हमारे शत्रु भी हमारी रक्षा करें; जरा-रोग आदि हमें कभी न छुएँ और मृत्यु हमारे पास कभी न आए।

श्लोक 32 (shiva.rudra.139.32)

अजराश्चामराः सर्वे भवाम इति नो मतम् । समृत्यवः करिष्यामः सर्वानन्यांस्त्रिलोकके

ajarāścāmarāḥ sarve bhavāma iti no matam samṛtyavaḥ kariṣyāmaḥ sarvānanyāṁstrilokake

हम सब अजर-अमर हो जाएँ — यही हमारी इच्छा है; और त्रिलोक के अन्य सभी को हम मृत्यु के अधीन कर देंगे।

श्लोक 33 (shiva.rudra.139.33)

लक्ष्म्या किं तद्विपुलया किं कार्यं हि पुरोत्तमैः । अन्यैश्च विपुलैर्भोगैः स्थानैश्वर्येण वा पुनः

lakṣmyā kiṁ tadvipulayā kiṁ kāryaṁ hi purottamaiḥ anyaiśca vipulairbhogaiḥ sthānaiśvaryeṇa vā punaḥ

उस विपुल लक्ष्मी से क्या लाभ, उत्तम नगरों से क्या प्रयोजन, अथवा अन्य विपुल भोगों और ऐश्वर्यमय स्थानों से भी क्या लाभ —

श्लोक 34 (shiva.rudra.139.34)

यत्रैव मृत्युना ग्रस्तो नियतं पञ्चभिर्दिनैः । व्यर्थं तस्याखिलं ब्रह्मन् निश्चितं न इतीव हि

yatraiva mṛtyunā grasto niyataṁ pañcabhirdinaiḥ vyarthaṁ tasyākhilaṁ brahman niścitaṁ na itīva hi

जबकि मृत्यु द्वारा ग्रस्त हुआ प्राणी निश्चित ही पाँच दिनों में समाप्त हो जाता है? हे ब्रह्मन्! यह सब निश्चय ही व्यर्थ है — यही हमारा दृढ़ मत है।

श्लोक 35 (shiva.rudra.139.35)

सनत्कुमार उवाच । इति श्रुत्वा वचस्तेषां दैत्यानां च तपस्विनाम् । प्रत्युवाच शिवं स्मृत्वा स्वप्रभुं गिरिशं विधिः

sanatkumāra uvāca iti śrutvā vacasteṣāṁ daityānāṁ ca tapasvinām pratyuvāca śivaṁ smṛtvā svaprabhuṁ giriśaṁ vidhiḥ

सनत्कुमार ने कहा — तपस्वी दैत्यों के इन वचनों को सुनकर, अपने स्वामी गिरीश शिव का स्मरण करते हुए ब्रह्मा ने उत्तर दिया।

श्लोक 36 (shiva.rudra.139.36)

ब्रह्मोवाच । नास्ति सर्वामरत्वं च निवर्तध्वमतोऽसुराः । अन्यं वरं वृणीध्वं वै यादृशो वो हि रोचते

brahmovāca nāsti sarvāmaratvaṁ ca nivartadhvamato'surāḥ anyaṁ varaṁ vṛṇīdhvaṁ vai yādṛśo vo hi rocate

ब्रह्मा जी ने कहा — सम्पूर्ण अमरत्व सम्भव नहीं है; अतः हे असुरो! इससे निवृत्त हो जाओ और जैसा तुम्हें रुचे, वैसा दूसरा वर माँगो।

श्लोक 37 (shiva.rudra.139.37)

जातो हनिष्यते नूनं जन्तुः कोऽप्यसुराः क्वचित् । अजरश्चामरो लोके न भविष्यति भूतले

jāto haniṣyate nūnaṁ jantuḥ ko'pyasurāḥ kvacit ajaraścāmaro loke na bhaviṣyati bhūtale

जो भी जन्म लेता है, वह अवश्य ही किसी न किसी के हाथों मारा जाता है; इस लोक में पृथ्वी पर कोई भी अजर-अमर नहीं हो सकता।

श्लोक 38 (shiva.rudra.139.38)

ऋते तु खण्डपरशोः कालकालाद्धरेस्तथा । तौ धर्माधर्मपरमावव्यक्तौ व्यक्तरूपिणौ

ṛte tu khaṇḍaparaśoḥ kālakālāddharestathā tau dharmādharmaparamāvavyaktau vyaktarūpiṇau

केवल खण्डपरशु शिव और कालों के काल हरि को छोड़कर — वे दोनों ही धर्म और अधर्म से परे, अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त रूप धारण करने वाले हैं।

श्लोक 39 (shiva.rudra.139.39)

सम्पीडनाय जगतो यदि स क्रियते तपः । सफलं तद्गतं वेद्यं तस्मात्सुविहितं तपः

sampīḍanāya jagato yadi sa kriyate tapaḥ saphalaṁ tadgataṁ vedyaṁ tasmātsuvihitaṁ tapaḥ

यदि यह तप संसार को पीड़ित करने के लिए किया जाता है, तो जान लो कि उसका फल भी तदनुसार ही मिलता है; अतः तप सम्यक् रीति से किया जाना चाहिए।

श्लोक 40 (shiva.rudra.139.40)

तद्विचार्य स्वयं बुद्ध्या न शक्यं यत्सुरासुरैः । दुर्लभं वा सुदुस्साध्यं मृत्युं वञ्चयतानघाः

tadvicārya svayaṁ buddhyā na śakyaṁ yatsurāsuraiḥ durlabhaṁ vā sudussādhyaṁ mṛtyuṁ vañcayatānaghāḥ

स्वयं बुद्धि से इसका विचार करो — देवता और असुर दोनों के लिए जो असम्भव, दुर्लभ अथवा अत्यन्त दुःसाध्य हो, हे निष्पाप! उसी के द्वारा मृत्यु को छलो।

श्लोक 41 (shiva.rudra.139.41)

तत्किञ्चिन्मरणे हेतुं वृणीध्वं सत्त्वमाश्रिताः । येन मृत्युर्नैव वृतो रक्षतस्तत्पृथक् पृथक्

tatkiñcinmaraṇe hetuṁ vṛṇīdhvaṁ sattvamāśritāḥ yena mṛtyurnaiva vṛto rakṣatastatpṛthak pṛthak

अतः अपने बल का आश्रय लेकर मृत्यु का कोई विशेष कारण चुनो, जिससे मृत्यु स्वयं वरण न की गई हो — और उस शर्त की पृथक्-पृथक् सावधानी से रक्षा करो।

श्लोक 42 (shiva.rudra.139.42)

सनत्कुमार उवाच । एतद्विधिवचः श्रुत्वा मुहूर्त्तं ध्यानमास्थिताः । प्रोचुस्ते चिन्तयित्वाथ सर्वलोकपितामहम्

sanatkumāra uvāca etadvidhivacaḥ śrutvā muhūrttaṁ dhyānamāsthitāḥ procuste cintayitvātha sarvalokapitāmaham

सनत्कुमार ने कहा — ब्रह्मा जी के इन वचनों को सुनकर वे क्षणभर ध्यानमग्न रहे; फिर विचार कर सर्वलोक-पितामह से बोले।

श्लोक 43 (shiva.rudra.139.43)

दैत्या ऊचुः । भगवन्नास्ति नो वेश्म पराक्रमवतामपि । अधृष्याः शात्रवानां तु यन्न वत्स्यामहे सुखम्

daityā ūcuḥ bhagavannāsti no veśma parākramavatāmapi adhṛṣyāḥ śātravānāṁ tu yanna vatsyāmahe sukham

दैत्यों ने कहा — हे भगवन्! पराक्रमी होते हुए भी हमारे पास ऐसा कोई निवास नहीं है, जहाँ शत्रुओं से अजेय होकर हम सुखपूर्वक रह सकें।

श्लोक 44 (shiva.rudra.139.44)

पुराणि त्रीणि नो देहि निर्मायात्यद्भुतानि हि । सर्वसम्पत्समृद्धान्यप्रधृष्याणि दिवौकसाम्

purāṇi trīṇi no dehi nirmāyātyadbhutāni hi sarvasampatsamṛddhānyapradhṛṣyāṇi divaukasām

हमें तीन नगर दीजिए — निर्माण करवाकर अद्भुत, समस्त सम्पत्ति से समृद्ध, तथा स्वर्गवासियों के लिए भी अजेय।

श्लोक 45 (shiva.rudra.139.45)

वयं पुराणि त्रीण्येवं समास्थाय महीमिमाम् । चरिष्यामो हि लोकेश त्वत्प्रसादाज्जगद्गुरो

vayaṁ purāṇi trīṇyevaṁ samāsthāya mahīmimām cariṣyāmo hi lokeśa tvatprasādājjagadguro

हे लोकेश, हे जगद्गुरु! उन तीन नगरों में स्थित होकर हम आपकी कृपा से इस पृथ्वी पर विचरण करेंगे।

श्लोक 46 (shiva.rudra.139.46)

तारकाक्षस्ततः प्राह यदभेद्यं सुरैरपि । करोति विश्वकर्मा तन्मम हेममयं पुरम्

tārakākṣastataḥ prāha yadabhedyaṁ surairapi karoti viśvakarmā tanmama hemamayaṁ puram

तब तारकाक्ष ने कहा — विश्वकर्मा मेरे लिए ऐसा स्वर्णमय नगर बनाएँ, जो देवताओं द्वारा भी अभेद्य हो।

श्लोक 47 (shiva.rudra.139.47)

ययाचे कमलाक्षस्तु राजतं सुमहत्पुरम् । विद्युन्माली च संहृष्टो वज्रायसमयं महत्

yayāce kamalākṣastu rājataṁ sumahatpuram vidyunmālī ca saṁhṛṣṭo vajrāyasamayaṁ mahat

कमलाक्ष ने रजत का अत्यन्त विशाल नगर माँगा, और अत्यन्त हर्षित विद्युन्माली ने वज्र के समान दृढ़ लौह का महान् नगर माँगा।

श्लोक 48 (shiva.rudra.139.48)

पुरेष्वेतेषु भो ब्रह्मन्नेकस्थानस्थितेषु च । मध्याह्नाभिजिते काले शीतांशौ पुष्य संस्थिते

pureṣveteṣu bho brahmannekasthānasthiteṣu ca madhyāhnābhijite kāle śītāṁśau puṣya saṁsthite

हे ब्रह्मन्! जब ये तीनों नगर एक ही स्थान पर स्थित हों, मध्याह्न के अभिजित् काल में, जब शीतल किरणों वाला चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में हो —

श्लोक 49 (shiva.rudra.139.49)

उपर्युपर्यदृष्टेषु व्योम्नि लीलाभ्रसंस्थिते । वर्षत्सु कालमेघेषु पुष्करावर्तनामसु

uparyuparyadṛṣṭeṣu vyomni līlābhrasaṁsthite varṣatsu kālamegheṣu puṣkarāvartanāmasu

जब वे एक के ऊपर एक, आकाश में लीलामय बादलों पर टिके अदृश्य हों, और प्रलयकालीन पुष्करावर्तक मेघ बरस रहे हों —

श्लोक 50 (shiva.rudra.139.50)

तथा वर्षसहस्रान्ते समेष्यामः परस्परम् । एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि नान्यथा

tathā varṣasahasrānte sameṣyāmaḥ parasparam ekībhāvaṁ gamiṣyanti purāṇyetāni nānyathā

तथा हजार वर्षों के अन्त में जब हम परस्पर मिलें और ये तीनों नगर एक हो जाएँ — तभी, अन्यथा नहीं, हमारा विनाश हो।

श्लोक 51 (shiva.rudra.139.51)

सर्वदेवमयो देवः सर्वेषां मे कुहेलया । असम्भवे रथे तिष्ठन् सर्वोपस्करणान्विते

sarvadevamayo devaḥ sarveṣāṁ me kuhelayā asambhave rathe tiṣṭhan sarvopaskaraṇānvite

सम्पूर्ण देवताओं से युक्त कोई देव, हम पर कृपा करते हुए, किसी असम्भव रथ पर आरूढ़ होकर, जो समस्त उपकरणों से युक्त हो —

श्लोक 52 (shiva.rudra.139.52)

असम्भाव्यैककाण्डेन भिनत्तु नगराणि नः । निर्वैरः कृत्तिवासास्तु योऽस्माकमिति नित्यशः

asambhāvyaikakāṇḍena bhinattu nagarāṇi naḥ nirvairaḥ kṛttivāsāstu yo'smākamiti nityaśaḥ

एक ही असम्भव बाण से हमारे नगरों को भेद दे — वह भी जो निर्वैर हो, कृत्तिवासा (शिव) हो, और सदा हमारा ही अपना माना जाता हो।

श्लोक 53 (shiva.rudra.139.53)

वन्द्यः पूज्योऽभिवाद्यश्च सोऽस्माकं निर्दहेत्कथम् । इति चेतसि सन्धाय तादृशो भुवि दुर्लभः

vandyaḥ pūjyo'bhivādyaśca so'smākaṁ nirdahetkatham iti cetasi sandhāya tādṛśo bhuvi durlabhaḥ

जो वन्दनीय, पूज्य और अभिवादन योग्य है, वह हमें कैसे भस्म करेगा?' — यह विचार मन में रखकर उन्होंने सोचा कि ऐसा कोई पृथ्वी पर दुर्लभ ही है।

श्लोक 54 (shiva.rudra.139.54)

सनत्कुमार उवाच । एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां ब्रह्मा लोकपितामहः । एवमस्त्विति तान् प्राह सृष्टिकर्ता स्मरन् शिवम्

sanatkumāra uvāca etacchrutvā vacasteṣāṁ brahmā lokapitāmahaḥ evamastviti tān prāha sṛṣṭikartā smaran śivam

सनत्कुमार ने कहा — उनके इस वचन को सुनकर, शिव का स्मरण करते हुए, सृष्टिकर्ता लोकपितामह ब्रह्मा ने कहा — 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो)।

श्लोक 55 (shiva.rudra.139.55)

आज्ञां ददौ मयस्यापि कुरु त्वं नगरत्रयम् । काञ्चनं राजतं चैव आयसं चेति भो मय

ājñāṁ dadau mayasyāpi kuru tvaṁ nagaratrayam kāñcanaṁ rājataṁ caiva āyasaṁ ceti bho maya

उन्होंने मय को आज्ञा दी — 'हे मय! तुम स्वर्ण, रजत और लौह के — इस प्रकार तीन नगर बनाओ।'

श्लोक 56 (shiva.rudra.139.56)

इत्यादिश्य मयं ब्रह्मा प्रत्यक्षं प्राविशद्दिवम् । तेषां तारकपुत्राणां पश्यतां निजधाम हि

ityādiśya mayaṁ brahmā pratyakṣaṁ prāviśaddivam teṣāṁ tārakaputrāṇāṁ paśyatāṁ nijadhāma hi

मय को इस प्रकार आदेश देकर ब्रह्मा तारकपुत्रों के सामने ही अपने स्वर्गलोक में प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 57 (shiva.rudra.139.57)

ततो मयश्च तपसा चक्रे धीरः पुराण्यथ । काञ्चनं तारकाक्षस्य कमलाक्षस्य राजतम्

tato mayaśca tapasā cakre dhīraḥ purāṇyatha kāñcanaṁ tārakākṣasya kamalākṣasya rājatam

तब धीर मय ने अपने तप-सामर्थ्य से उन नगरों का निर्माण किया — तारकाक्ष के लिए स्वर्ण का, कमलाक्ष के लिए रजत का,

श्लोक 58 (shiva.rudra.139.58)

विद्युन्माल्यायसं चैव त्रिविधं दुर्गमुत्तमम् । स्वर्गे व्योम्नि च भूमौ च क्रमाज्ज्ञेयानि तानि वै

vidyunmālyāyasaṁ caiva trividhaṁ durgamuttamam svarge vyomni ca bhūmau ca kramājjñeyāni tāni vai

और विद्युन्माली के लिए लौह का — तीन प्रकार के उत्तम दुर्ग, जो क्रमशः स्वर्ग में, आकाश में और पृथ्वी पर स्थित जानने चाहिए।

श्लोक 59 (shiva.rudra.139.59)

दत्त्वा तेभ्योऽसुरेभ्यश्च पुराणि त्रीणि वै मयः । प्रविवेश स्वयं तत्र हितकामपरायणः

dattvā tebhyo'surebhyaśca purāṇi trīṇi vai mayaḥ praviveśa svayaṁ tatra hitakāmaparāyaṇaḥ

उन तीनों असुरों को वे तीन नगर देकर, हितकामना से युक्त मय स्वयं भी वहाँ प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 60 (shiva.rudra.139.60)

एवं पुरत्रयं प्राप्य प्रविष्टास्तारकात्मजाः । बुभुजुः सकलान्भोगान्महाबलपराक्रमाः

evaṁ puratrayaṁ prāpya praviṣṭāstārakātmajāḥ bubhujuḥ sakalānbhogānmahābalaparākramāḥ

इस प्रकार तीनों नगरों को प्राप्त कर तारका के पुत्र वहाँ प्रविष्ट हुए और महाबली पराक्रमी वे सम्पूर्ण भोगों को भोगने लगे।

श्लोक 61 (shiva.rudra.139.61)

कल्पद्रुमैश्च सङ्कीर्णं गजवाजिसमाकुलम् । नानाप्रासादसङ्कीर्णं मणिजालसमावृतम्

kalpadrumaiśca saṅkīrṇaṁ gajavājisamākulam nānāprāsādasaṅkīrṇaṁ maṇijālasamāvṛtam

वे नगर कल्पवृक्षों से भरे थे, हाथी-घोड़ों से व्याप्त, अनेक महलों से युक्त और मणिजाल से आच्छादित थे।

श्लोक 62 (shiva.rudra.139.62)

सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैः सर्वतोमुखैः । पद्मरागमयैश्चैव शोभितं चन्द्रसन्निभैः

sūryamaṇḍalasaṅkāśairvimānaiḥ sarvatomukhaiḥ padmarāgamayaiścaiva śobhitaṁ candrasannibhaiḥ

सूर्यमण्डल के समान सभी दिशाओं में खुलने वाले विमानों से, तथा पद्मराग-मणि से बने चन्द्रमा-सदृश चमकते भवनों से वे शोभित थे।

श्लोक 63 (shiva.rudra.139.63)

प्रासादैर्गोपुरैर्दिव्यैः कैलासशिखरोपमैः । दिव्यस्त्रीजनसङ्कीर्णैर्गन्धर्वस्सिद्धचारणैः

prāsādairgopurairdivyaiḥ kailāsaśikharopamaiḥ divyastrījanasaṅkīrṇairgandharvassiddhacāraṇaiḥ

कैलास शिखर के समान दिव्य महलों और नगरद्वारों से, दिव्य स्त्रियों से भरे-पूरे, तथा गन्धर्वों, सिद्धों और चारणों से युक्त थे।

श्लोक 64 (shiva.rudra.139.64)

रुद्रालयैः प्रतिगृहमग्निहोत्रैः प्रतिष्ठितैः । द्विजोत्तमैः शास्त्रविज्ञैः शिवभक्तिरतैः सदा

rudrālayaiḥ pratigṛhamagnihotraiḥ pratiṣṭhitaiḥ dvijottamaiḥ śāstravijñaiḥ śivabhaktirataiḥ sadā

प्रत्येक घर में रुद्र के मन्दिर और स्थापित अग्निहोत्र थे, तथा शास्त्रज्ञ, सदा शिवभक्ति में रत श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ निवास करते थे।

श्लोक 65 (shiva.rudra.139.65)

वापीकूपतडागैश्च दीर्घिकाभिःसुशोभितम् । उद्यानवनवृक्षैश्च स्वर्गच्युतगुणोत्तमैः

vāpīkūpataḍāgaiśca dīrghikābhiḥsuśobhitam udyānavanavṛkṣaiśca svargacyutaguṇottamaiḥ

वे बावड़ी, कुओं, तालाबों और दीर्घिकाओं से सुशोभित थे, तथा स्वर्ग से उतरे प्रतीत होने वाले उद्यानों, वनों और वृक्षों से युक्त थे।

श्लोक 66 (shiva.rudra.139.66)

नदीनदसरिन्मुख्यपुष्करैः शोभितं सदा । सर्वकामफलाद्यैश्चानेकैर्वृक्षैर्मनोहरम्

nadīnadasarinmukhyapuṣkaraiḥ śobhitaṁ sadā sarvakāmaphalādyaiścānekairvṛkṣairmanoharam

वे नदियों, नदों और उत्तम पुष्करिणियों से सदा शोभित थे, तथा सभी इच्छित फल देने वाले अनेक वृक्षों से मनोहर थे।

श्लोक 67 (shiva.rudra.139.67)

मत्तमातङ्गयूथैश्च तुरङ्गैश्च सुशोभनैः । रथैश्च विविधाकारैः शिबिकाभिरलङ्कृतम्

mattamātaṅgayūthaiśca turaṅgaiśca suśobhanaiḥ rathaiśca vividhākāraiḥ śibikābhiralaṅkṛtam

वे मतवाले हाथियों के झुंडों, सुन्दर घोड़ों, विविध आकार के रथों और पालकियों से अलंकृत थे।

श्लोक 68 (shiva.rudra.139.68)

समयादिशिकैश्चैव क्रीडास्थानैः पृथक्पृथक् । वेदाध्ययनशालाभिर्विविधाभिः पृथक्पृथक्

samayādiśikaiścaiva krīḍāsthānaiḥ pṛthakpṛthak vedādhyayanaśālābhirvividhābhiḥ pṛthakpṛthak

उनमें भिन्न-भिन्न क्रीड़ास्थल और भिन्न-भिन्न वेदाध्ययन-शालाएँ अलग-अलग बनी हुई थीं।

श्लोक 69 (shiva.rudra.139.69)

अदृष्टं मनसा वाचा पापान्वितनरैस्सदा । महात्मभिश्शुभाचारैः पुण्यवद्भिः प्रवीक्ष्यते

adṛṣṭaṁ manasā vācā pāpānvitanaraissadā mahātmabhiśśubhācāraiḥ puṇyavadbhiḥ pravīkṣyate

वे पापी मनुष्यों को मन, वचन से भी कभी दिखाई नहीं देते थे, केवल शुभाचारी, पुण्यवान् महात्माओं द्वारा ही देखे जाते थे।

श्लोक 70 (shiva.rudra.139.70)

पतिव्रताभिः सर्वत्र पावितं स्थलमुत्तमम् । पतिसेवनशीलाभिर्विमुखाभिः कुधर्मतः

pativratābhiḥ sarvatra pāvitaṁ sthalamuttamam patisevanaśīlābhirvimukhābhiḥ kudharmataḥ

पतिसेवा में रत, कुधर्म से विमुख पतिव्रता स्त्रियों द्वारा वह उत्तम भूमि सर्वत्र पवित्र की गई थी।

श्लोक 71 (shiva.rudra.139.71)

दैत्यशूरैर्महाभागैः सदारैः ससुतैर्द्विजैः । श्रौतस्मार्तार्थतत्त्वज्ञैः स्वधर्मनिरतैर्युतम्

daityaśūrairmahābhāgaiḥ sadāraiḥ sasutairdvijaiḥ śrautasmārtārthatattvajñaiḥ svadharmaniratairyutam

वे महाभाग्यशाली दैत्यवीरों, उनकी पत्नियों-पुत्रों तथा श्रुति-स्मृति के तत्त्वज्ञ, स्वधर्मपरायण ब्राह्मणों से भरे-पूरे थे।

श्लोक 72 (shiva.rudra.139.72)

व्यूढोरस्कैर्वृषस्कन्धैः सामयुद्धधरैः सदा । प्रशान्तैः कुपितैश्चैव कुब्जैर्वामनकैस्तथा

vyūḍhoraskairvṛṣaskandhaiḥ sāmayuddhadharaiḥ sadā praśāntaiḥ kupitaiścaiva kubjairvāmanakaistathā

वहाँ चौड़ी छाती और बैल के समान कंधों वाले, सामनीति और युद्धनीति दोनों में निपुण, कभी शान्त कभी क्रुद्ध, तथा कुबड़े-बौने योद्धा भी थे।

श्लोक 73 (shiva.rudra.139.73)

नीलोत्पलदलप्रख्यैर्नीलकुञ्चितमूर्द्धजैः । मयेन रक्षितैः सर्वैः शिक्षितैर्युद्धलालसैः

nīlotpaladalaprakhyairnīlakuñcitamūrddhajaiḥ mayena rakṣitaiḥ sarvaiḥ śikṣitairyuddhalālasaiḥ

नीले कमलदल के समान वर्ण वाले, घुँघराले नीले केशों वाले, युद्धोत्सुक और सुशिक्षित — वे सब मय द्वारा ही संरक्षित थे।

श्लोक 74 (shiva.rudra.139.74)

वरसमररतैर्युतं समन्ता- दजशिवपूजनया विशुद्धवीर्यैः । रविमरुतमहेन्द्रसन्निकाशैः सुरमथनैः सुदृढैः सुसेवितं यत्

varasamararatairyutaṁ samantā- dajaśivapūjanayā viśuddhavīryaiḥ ravimarutamahendrasannikāśaiḥ suramathanaiḥ sudṛḍhaiḥ susevitaṁ yat

वे नगर उत्तम युद्ध में रत, अजन्मे शिव की पूजा से विशुद्ध पराक्रम वाले, सूर्य-मरुत-महेन्द्र के समान तेजस्वी, देवसंहारक, अत्यन्त दृढ़ योद्धाओं से सुसेवित थे।

श्लोक 75 (shiva.rudra.139.75)

शास्त्रवेदपुराणेषु ये ये धर्माः प्रकीर्तिताः । शिवप्रियाःसदा देवास्ते धर्मास्तत्र सर्वतः

śāstravedapurāṇeṣu ye ye dharmāḥ prakīrtitāḥ śivapriyāḥsadā devāste dharmāstatra sarvataḥ

शास्त्र, वेद और पुराणों में जो-जो धर्म प्रतिपादित हैं, जो शिव और देवताओं को सदा प्रिय हैं, वे सभी धर्म वहाँ सर्वत्र पालित होते थे।

श्लोक 76 (shiva.rudra.139.76)

एवं लब्धवरास्ते तु दैतेयास्तारकात्मजाः । शैवं मयमुपाश्रित्य निवसन्ति स्म तत्र ह

evaṁ labdhavarāste tu daiteyāstārakātmajāḥ śaivaṁ mayamupāśritya nivasanti sma tatra ha

इस प्रकार वर पाकर तारका के वे दैत्यपुत्र शिवभक्त मय का आश्रय लेकर वहाँ निवास करने लगे।

श्लोक 77 (shiva.rudra.139.77)

सर्वं त्रैलोक्यमुत्सार्य प्रविश्य नगराणि ते । कुर्वन्ति स्म महद्राज्यं शिवमार्गरताः सदा

sarvaṁ trailokyamutsārya praviśya nagarāṇi te kurvanti sma mahadrājyaṁ śivamārgaratāḥ sadā

समस्त त्रिलोक को अपने अधीन करके उन नगरों में प्रविष्ट होकर वे सदा शिवमार्ग में रत रहते हुए महान् राज्य करने लगे।

श्लोक 78 (shiva.rudra.139.78)

ततो महान् गतः कालो वसतां पुण्यकर्मणाम् । यथासुखं यथाजोषं सद्राज्यं कुर्वतां मुने

tato mahān gataḥ kālo vasatāṁ puṇyakarmaṇām yathāsukhaṁ yathājoṣaṁ sadrājyaṁ kurvatāṁ mune

हे मुने! इस प्रकार पुण्यकर्मा वे यथासुख, यथेच्छ उस उत्तम राज्य का शासन करते हुए वहाँ बहुत काल तक निवास करते रहे।

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