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रुद्र संहिता · अध्याय 143

त्रिपुर-मोहन

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144

श्लोक 1 (shiva.rudra.143.1)

व्यास उवाच । दैत्यराजे दीक्षिते च मायिना तेन मोहिते । किमुवाच तदा मायी किं चकार स दैत्यपः

vyāsa uvāca daityarāje dīkṣite ca māyinā tena mohite kimuvāca tadā māyī kiṁ cakāra sa daityapaḥ

व्यास ने कहा — उस मायावी द्वारा दैत्यराज के दीक्षित और मोहित हो जाने पर, तब उस मायावी ने क्या कहा, और उस दैत्यपति ने क्या किया?

श्लोक 2 (shiva.rudra.143.2)

सनत्कुमार उवाच । दीक्षां दत्त्वा यतिस्तस्मा अरिहन्नारदादिभिः । शिष्यैः सेवितपादाब्जो दैत्यराजानमब्रवीत्

sanatkumāra uvāca dīkṣāṁ dattvā yatistasmā arihannāradādibhiḥ śiṣyaiḥ sevitapādābjo daityarājānamabravīt

सनत्कुमार ने कहा — दीक्षा देकर, नारद आदि शिष्यों द्वारा जिनके चरणकमल सेवित थे, वह यति अरिहन् दैत्यराज से बोला।

श्लोक 3 (shiva.rudra.143.3)

अरिहन्नुवाच । शृणु दैत्यपते वाक्यं मम संज्ञानगर्भितम् । वेदान्तसारसर्वस्वं रहस्यं परमोत्तमम्

arihannuvāca śṛṇu daityapate vākyaṁ mama saṁjñānagarbhitam vedāntasārasarvasvaṁ rahasyaṁ paramottamam

अरिहन् ने कहा — हे दैत्यपते! मेरी यह सत्य-ज्ञान से भरी वाणी सुनो — वेदान्त के सार का सर्वस्व, परम उत्तम रहस्य।

श्लोक 4 (shiva.rudra.143.4)

अनादिसिद्धः संसारः कर्तृकर्मविवर्जितः । स्वयं प्रादुर्भवत्येव स्वयमेव विलीयते

anādisiddhaḥ saṁsāraḥ kartṛkarmavivarjitaḥ svayaṁ prādurbhavatyeva svayameva vilīyate

संसार अनादि और स्वयंसिद्ध है, कर्ता और कर्म से रहित है; वह स्वयं ही प्रकट होता है और स्वयं ही विलीन हो जाता है।

श्लोक 5 (shiva.rudra.143.5)

ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं यावद्देहनिबन्धनम् । आत्मैवैकेश्वरस्तत्र न द्वितीयस्तदीशिता

brahmādistambaparyantaṁ yāvaddehanibandhanam ātmaivaikeśvarastatra na dvitīyastadīśitā

ब्रह्मा से लेकर तृण तक जहाँ भी देह का बन्धन है, वहाँ आत्मा ही एकमात्र ईश्वर है; उसका कोई दूसरा शासक नहीं।

श्लोक 6 (shiva.rudra.143.6)

यद् ब्रह्मविष्णुरुद्राख्यास्तदाख्या देहिनामिमाः । आख्या यथास्मदादीनामरिहन्नादिरुच्यते

yad brahmaviṣṇurudrākhyāstadākhyā dehināmimāḥ ākhyā yathāsmadādīnāmarihannādirucyate

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र — ये नाम भी देहधारियों के ही नाम हैं, जैसे हम-जैसों के 'अरिहन्' आदि नाम कहे जाते हैं।

श्लोक 7 (shiva.rudra.143.7)

देहो यथास्मदादीनां स्वकालेन विलीयते । ब्रह्मादिमशकान्तानां स्वकालाल्लीयते तथा

deho yathāsmadādīnāṁ svakālena vilīyate brahmādimaśakāntānāṁ svakālāllīyate tathā

जैसे हम-जैसों की देह अपने-अपने समय पर नष्ट हो जाती है, वैसे ही ब्रह्मा से लेकर मच्छर तक की देह भी अपने-अपने काल में लीन हो जाती है।

श्लोक 8 (shiva.rudra.143.8)

विचार्यमाणे देहेऽस्मिन्न किञ्चिदधिकं क्वचित् । आहारो मैथुनं निद्रा भयं सर्वत्र यत्समम्

vicāryamāṇe dehe'sminna kiñcidadhikaṁ kvacit āhāro maithunaṁ nidrā bhayaṁ sarvatra yatsamam

इस देह का विचार करने पर कहीं भी कुछ अधिक नहीं है; आहार, मैथुन, निद्रा और भय — ये सर्वत्र समान ही हैं।

श्लोक 9 (shiva.rudra.143.9)

निराहारपरीमाणं प्राप्य सर्वो हि देहभृत् । सदृशीमेव सन्तृप्तिं प्राप्नुयान्नाधिकेतराम्

nirāhāraparīmāṇaṁ prāpya sarvo hi dehabhṛt sadṛśīmeva santṛptiṁ prāpnuyānnādhiketarām

भूख की सीमा तक पहुँचकर प्रत्येक देहधारी समान तृप्ति ही प्राप्त करता है, न कम न अधिक।

श्लोक 10 (shiva.rudra.143.10)

यथा वितृषिताः स्याम पीत्वा पेयं मुदा वयम् । तृषितास्तु तथान्येऽपि न विशेषोऽल्पकोऽधिकः

yathā vitṛṣitāḥ syāma pītvā peyaṁ mudā vayam tṛṣitāstu tathānye'pi na viśeṣo'lpako'dhikaḥ

जैसे प्यास बुझाने वाला पेय पीकर हम प्रसन्नतापूर्वक तृप्त होते हैं, वैसे ही अन्य प्यासे भी होते हैं — इसमें छोटा-बड़ा कोई भेद नहीं।

श्लोक 11 (shiva.rudra.143.11)

सन्तु नार्यः सहस्राणि रूपलावण्यभूमयः । परं निधुवने काले ह्यैकेवेहोपयुज्यते

santu nāryaḥ sahasrāṇi rūpalāvaṇyabhūmayaḥ paraṁ nidhuvane kāle hyaikevehopayujyate

भले ही रूप-लावण्य की खान हजारों स्त्रियाँ हों, किन्तु मिलन के समय केवल एक ही यहाँ काम आती है।

श्लोक 12 (shiva.rudra.143.12)

अश्वाः पराः शताःसन्तु सन्त्वनेकेऽप्यनेकधा । अधिरोहे तथाप्येको न द्वितीयस्तथात्मनः

aśvāḥ parāḥ śatāḥsantu santvaneke'pyanekadhā adhirohe tathāpyeko na dvitīyastathātmanaḥ

भले ही सैकड़ों श्रेष्ठ घोड़े हों, अनेक प्रकार के अनेक हों, फिर भी सवारी के समय एक ही काम आता है, अपने लिए दूसरा नहीं।

श्लोक 13 (shiva.rudra.143.13)

पर्यङ्कशायिनां स्वापे सुखं यदुपजायते । तदेव सौख्यं निद्राभिर्भूतभूशायिनामपि

paryaṅkaśāyināṁ svāpe sukhaṁ yadupajāyate tadeva saukhyaṁ nidrābhirbhūtabhūśāyināmapi

पलंग पर सोने वालों की नींद में जो सुख मिलता है, वही सुख धरती पर सोने वाले प्राणियों की नींद में भी होता है।

श्लोक 14 (shiva.rudra.143.14)

यथैव मरणाद्भीतिरस्मदादिवपुष्मताम् । ब्रह्मादिकीटकान्तानां तथा मरणतो भयम्

yathaiva maraṇādbhītirasmadādivapuṣmatām brahmādikīṭakāntānāṁ tathā maraṇato bhayam

जैसे हम-जैसे देहधारियों को मृत्यु का भय होता है, वैसे ही ब्रह्मा से लेकर कीट-पतंगों तक सबको मृत्यु का भय होता है।

श्लोक 15 (shiva.rudra.143.15)

सर्वे तनुभृतस्तुल्या यदि बुद्ध्या विचार्य्यते । इदं निश्चित्य केनापि नो हिंस्यः कोऽपि कुत्रचित्

sarve tanubhṛtastulyā yadi buddhyā vicāryyate idaṁ niścitya kenāpi no hiṁsyaḥ ko'pi kutracit

यदि बुद्धि से विचार किया जाए तो सभी देहधारी समान हैं; यह निश्चित कर किसी के द्वारा कहीं भी किसी की हिंसा नहीं होनी चाहिए।

श्लोक 16 (shiva.rudra.143.16)

धर्मो जीवदयातुल्यो न क्वापि जगतीतले । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कार्या जीवदया नृभिः

dharmo jīvadayātulyo na kvāpi jagatītale tasmātsarvaprayatnena kāryā jīvadayā nṛbhiḥ

इस पृथ्वी पर जीव-दया के समान कोई धर्म नहीं है; अतः मनुष्यों को सर्वप्रयत्न से जीव-दया का पालन करना चाहिए।

श्लोक 17 (shiva.rudra.143.17)

एकस्मिन् रक्षिते जीवे त्रैलोक्यं रक्षितं भवेत् । घातिते घातितं तद्वत्तस्माद्रक्षेन्न घातयेत्

ekasmin rakṣite jīve trailokyaṁ rakṣitaṁ bhavet ghātite ghātitaṁ tadvattasmādrakṣenna ghātayet

एक जीव की रक्षा करने से मानो तीनों लोकों की रक्षा होती है; एक के मारे जाने से मानो वह सब मारा जाता है — अतः रक्षा करे, वध न करे।

श्लोक 18 (shiva.rudra.143.18)

अहिंसा परमो धर्मः पापमात्मप्रपीडनम् । अपराधीनता मुक्तिः स्वर्गोऽभिलषिताशनम्

ahiṁsā paramo dharmaḥ pāpamātmaprapīḍanam aparādhīnatā muktiḥ svargo'bhilaṣitāśanam

अहिंसा ही परम धर्म है, आत्म-पीड़न ही पाप है; किसी के अधीन न होना ही मुक्ति है, इच्छित भोजन प्राप्त होना ही स्वर्ग है।

श्लोक 19 (shiva.rudra.143.19)

पूर्वसूरिभिरित्युक्तं सत्प्रमाणतया ध्रुवम् । तस्मान्न हिंसा कर्त्तव्या नरैर्नरकभीरुभिः

pūrvasūribhirityuktaṁ satpramāṇatayā dhruvam tasmānna hiṁsā karttavyā narairnarakabhīrubhiḥ

प्राचीन आचार्यों ने यही सत्य प्रमाण के रूप में निश्चित रूप से कहा है; अतः नरक से डरने वाले मनुष्यों को हिंसा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 20 (shiva.rudra.143.20)

न हिंसासदृशं पापं त्रैलोक्ये सचराचरे । हिंसको नरकं गच्छेत्स्वर्गं गच्छेदहिंसकः

na hiṁsāsadṛśaṁ pāpaṁ trailokye sacarācare hiṁsako narakaṁ gacchetsvargaṁ gacchedahiṁsakaḥ

चराचर सहित तीनों लोकों में हिंसा के समान कोई पाप नहीं है; हिंसक नरक जाता है, अहिंसक स्वर्ग जाता है।

श्लोक 21 (shiva.rudra.143.21)

सन्ति दानान्यनेकानि किं तैस्तुच्छफलप्रदैः । अभीतिसदृशं दानं परमेकमपीह न

santi dānānyanekāni kiṁ taistucchaphalapradaiḥ abhītisadṛśaṁ dānaṁ paramekamapīha na

अनेक प्रकार के दान हैं, पर तुच्छ फल देने वाले उन दानों से क्या लाभ? यहाँ अभयदान के समान एक भी परम दान नहीं है।

श्लोक 22 (shiva.rudra.143.22)

इह चत्वारि दानानि प्रोक्तानि परमर्षिभिः । विचार्य नानाशास्त्राणि शर्मणेऽत्र परत्र च

iha catvāri dānāni proktāni paramarṣibhiḥ vicārya nānāśāstrāṇi śarmaṇe'tra paratra ca

नाना शास्त्रों का विचार कर, इहलोक और परलोक के कल्याण के लिए परम ऋषियों ने यहाँ चार दान बताए हैं।

श्लोक 23 (shiva.rudra.143.23)

भीतेभ्यश्चाभयं देयं व्याधितेभ्यस्तथौषधम् । देया विद्यार्थिनां विद्या देयमन्नं क्षुधातुरे

bhītebhyaścābhayaṁ deyaṁ vyādhitebhyastathauṣadham deyā vidyārthināṁ vidyā deyamannaṁ kṣudhāture

भयभीतों को अभय, रोगियों को औषधि, विद्यार्थियों को विद्या और भूखों को अन्न — यह दान दिया जाना चाहिए।

श्लोक 24 (shiva.rudra.143.24)

यानि यानीह दानानि बहु मुन्युदितानि च । जीवाभयप्रदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्

yāni yānīha dānāni bahu munyuditāni ca jīvābhayapradānasya kalāṁ nārhanti ṣoḍaśīm

मुनियों द्वारा कहे गए जितने भी अनेक दान हैं, वे जीव को अभय देने के दान की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं।

श्लोक 25 (shiva.rudra.143.25)

अविचिन्त्यप्रभावं हि मणिमन्त्रौषधं बलम् । तदभ्यस्यं प्रयत्नेन नामार्थोपार्जनाय वै

avicintyaprabhāvaṁ hi maṇimantrauṣadhaṁ balam tadabhyasyaṁ prayatnena nāmārthopārjanāya vai

मणि, मन्त्र और औषधि का बल अचिन्त्य प्रभाव वाला है; नाम और अर्थ के उपार्जन के लिए उसका प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 26 (shiva.rudra.143.26)

अर्थानुपार्ज्य बहुशो द्वादशायतनानि वै । परितः परिपूज्यानि किमन्यैरिह पूजितैः

arthānupārjya bahuśo dvādaśāyatanāni vai paritaḥ paripūjyāni kimanyairiha pūjitaiḥ

अनेक प्रकार से धन कमाकर बारह आयतनों (इन्द्रियों-अंगों) की ही चारों ओर पूजा करनी चाहिए — यहाँ अन्य पूजितों से क्या प्रयोजन?

श्लोक 27 (shiva.rudra.143.27)

पञ्चकर्मेन्द्रियग्रामाः पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि च । मनो बुद्धिरिह प्रोक्तं द्वादशायतनं शुभम्

pañcakarmendriyagrāmāḥ pañca buddhīndriyāṇi ca mano buddhiriha proktaṁ dvādaśāyatanaṁ śubham

पाँच कर्मेन्द्रियों का समूह, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, तथा मन और बुद्धि — यही यहाँ बारह शुभ आयतन कहे गए हैं।

श्लोक 28 (shiva.rudra.143.28)

इहैव स्वर्गनरकौ प्राणिनां नान्यतः क्वचित् । सुखं स्वर्गः समाख्यातो दुःखं नरकमेव हि

ihaiva svarganarakau prāṇināṁ nānyataḥ kvacit sukhaṁ svargaḥ samākhyāto duḥkhaṁ narakameva hi

प्राणियों के लिए स्वर्ग और नरक यहीं हैं, कहीं और नहीं; सुख को ही स्वर्ग और दुःख को ही नरक कहा गया है।

श्लोक 29 (shiva.rudra.143.29)

सुखेषु भुज्यमानेषु यत्स्याद्देहविसर्ज्जनम् । अयमेव परो मोक्षो विज्ञेयस्तत्त्वचिन्तकैः

sukheṣu bhujyamāneṣu yatsyāddehavisarjjanam ayameva paro mokṣo vijñeyastattvacintakaiḥ

सुखों का भोग करते हुए जो देह का त्याग हो, तत्त्वचिन्तकों को यही परम मोक्ष जानना चाहिए।

श्लोक 30 (shiva.rudra.143.30)

वासनासहिते क्लेशसमुच्छेदे सति ध्रुवम् । अज्ञानोपरमो मोक्षो विज्ञेयस्तत्त्वचिन्तकैः

vāsanāsahite kleśasamucchede sati dhruvam ajñānoparamo mokṣo vijñeyastattvacintakaiḥ

वासना सहित क्लेश का सम्पूर्ण उच्छेद हो जाने पर, अज्ञान की निवृत्ति को ही तत्त्वचिन्तकों को मोक्ष जानना चाहिए।

श्लोक 31 (shiva.rudra.143.31)

प्रामाणिकी श्रुतिरियं प्रोच्यते वेदवादिभिः । न हिंस्यात्सर्वभूतानि नान्या हिंसाप्रवर्तिका

prāmāṇikī śrutiriyaṁ procyate vedavādibhiḥ na hiṁsyātsarvabhūtāni nānyā hiṁsāpravartikā

वेदवादियों द्वारा यही श्रुति प्रामाणिक कही जाती है — 'किसी भी प्राणी की हिंसा न करे' — इसके अतिरिक्त कोई हिंसा-प्रवर्तक वचन प्रमाण नहीं है।

श्लोक 32 (shiva.rudra.143.32)

अग्निष्टोमीयमिति या भ्रामिका साऽसतामिह । न सा प्रमाणं ज्ञातॄणां पश्वालम्भनकारिका

agniṣṭomīyamiti yā bhrāmikā sā'satāmiha na sā pramāṇaṁ jñātṝṇāṁ paśvālambhanakārikā

'अग्निष्टोम' आदि जो भ्रामक वचन हैं, वे यहाँ दुष्टों के लिए हैं; पशुबलि कराने वाले वे वचन ज्ञानियों के लिए प्रमाण नहीं हैं।

श्लोक 33 (shiva.rudra.143.33)

वृक्षांश्छित्वा पशून् हत्वा कृत्वा रुधिरकर्द्दमम् । दग्ध्वा वह्नौ तिलाज्यादि चित्रं स्वर्गोऽभिलष्यते

vṛkṣāṁśchitvā paśūn hatvā kṛtvā rudhirakarddamam dagdhvā vahnau tilājyādi citraṁ svargo'bhilaṣyate

वृक्षों को काटकर, पशुओं को मारकर, रक्त का कीचड़ बनाकर, अग्नि में तिल-घी आदि जलाकर — यह कैसा आश्चर्य है कि इससे स्वर्ग की कामना की जाती है!

श्लोक 34 (shiva.rudra.143.34)

इत्येवं स्वमतं प्रोच्य यतिस्त्रिपुरनायकम् । श्रावयित्वाखिलान् पौरानुवाच पुनरादरात्

ityevaṁ svamataṁ procya yatistripuranāyakam śrāvayitvākhilān paurānuvāca punarādarāt

इस प्रकार अपना मत कहकर उस यति ने त्रिपुरनायक को और समस्त नगरवासियों को सुनाकर पुनः आदरपूर्वक कहा।

श्लोक 35 (shiva.rudra.143.35)

दृष्टार्थप्रत्ययकरान्देहसौख्यैकसाधकान् । बौद्धागमविनिर्दिष्टान्धर्मान्वेदपरांस्ततः

dṛṣṭārthapratyayakarāndehasaukhyaikasādhakān bauddhāgamavinirdiṣṭāndharmānvedaparāṁstataḥ

उसने बौद्ध आगमों में बताए गए, प्रत्यक्ष फल में विश्वास कराने वाले, केवल देह-सुख को सिद्ध करने वाले धर्मों को वेद से भी ऊपर रखा।

श्लोक 36 (shiva.rudra.143.36)

आनन्दं ब्रह्मणो रूपं श्रुत्यैवं यन्निगद्यते । तत्तथैवेह मन्तव्यं मिथ्या नानात्वकल्पना

ānandaṁ brahmaṇo rūpaṁ śrutyaivaṁ yannigadyate tattathaiveha mantavyaṁ mithyā nānātvakalpanā

श्रुति में जो कहा गया है कि 'आनन्द ही ब्रह्म का स्वरूप है', वह यहाँ इसी अर्थ में मानना चाहिए; भेद की कल्पना मिथ्या है।

श्लोक 37 (shiva.rudra.143.37)

यावत्स्वस्थमिदं वर्ष्म यावन्नेन्द्रियविक्लवः । यावज्जरा च दूरेऽस्ति तावत्सौख्यं प्रसाधयेत्

yāvatsvasthamidaṁ varṣma yāvannendriyaviklavaḥ yāvajjarā ca dūre'sti tāvatsaukhyaṁ prasādhayet

जब तक यह शरीर स्वस्थ है, जब तक इन्द्रियाँ विकल नहीं हुई हैं, और जब तक वृद्धावस्था दूर है, तब तक सुख का साधन करना चाहिए।

श्लोक 38 (shiva.rudra.143.38)

अस्वास्थ्येन्द्रियवैकल्ये वार्द्धके तु कुतः सुखम् । शरीरमपि दातव्यमर्थिभ्योऽतः सुखेप्सुभिः

asvāsthyendriyavaikalye vārddhake tu kutaḥ sukham śarīramapi dātavyamarthibhyo'taḥ sukhepsubhiḥ

अस्वस्थता, इन्द्रियों की विकलता और वृद्धावस्था में सुख कहाँ? अतः सुख चाहने वालों को शरीर को भी उसके लिए लगा देना चाहिए।

श्लोक 39 (shiva.rudra.143.39)

याचमानमनोवृत्तिप्रीणने यस्य नो जनिः । तेन भूर्भारवत्येषा समुद्रागद्रुमैर्न हि

yācamānamanovṛttiprīṇane yasya no janiḥ tena bhūrbhāravatyeṣā samudrāgadrumairna hi

जिसका जन्म किसी याचक की मनोवृत्ति को तृप्त करने में भी काम न आए, उससे तो यह पृथ्वी बोझिल हो जाती है — समुद्र, पर्वत और वृक्षों से नहीं।

श्लोक 40 (shiva.rudra.143.40)

सत्वरं गत्वरो देहः सञ्चयाः सपरिक्षयाः । इति विज्ञाय विज्ञाता देहसौख्यं प्रसाधयेत्

satvaraṁ gatvaro dehaḥ sañcayāḥ saparikṣayāḥ iti vijñāya vijñātā dehasaukhyaṁ prasādhayet

यह शरीर शीघ्र नष्ट होने वाला है, सारे संचय भी क्षय को प्राप्त होते हैं — यह जानकर विवेकी को शरीर के सुख का ही साधन करना चाहिए।

श्लोक 41 (shiva.rudra.143.41)

श्ववायसकृमीणां च प्रातर्भोज्यमिदं वपुः । भस्मान्तं तच्छरीरं च वेदे सत्यं प्रपठ्यते

śvavāyasakṛmīṇāṁ ca prātarbhojyamidaṁ vapuḥ bhasmāntaṁ taccharīraṁ ca vede satyaṁ prapaṭhyate

यह देह प्रातःकाल कुत्तों, कौओं और कीड़ों का भोजन बन जाती है; यह शरीर अन्ततः राख में मिल जाता है — यह वेद में ही सत्य कहा गया है।

श्लोक 42 (shiva.rudra.143.42)

मुधा जातिविकल्पोऽयं लोकेषु परिकल्प्यते । मानुष्ये सति सामान्ये कोऽधमः कोऽथ चोत्तमः

mudhā jātivikalpo'yaṁ lokeṣu parikalpyate mānuṣye sati sāmānye ko'dhamaḥ ko'tha cottamaḥ

जाति का यह भेद लोगों में व्यर्थ ही कल्पित किया गया है; मनुष्यता सबमें समान होते हुए कौन नीच और कौन उत्तम?

श्लोक 43 (shiva.rudra.143.43)

ब्रह्मादिसृष्टिरेषेति प्रोच्यते वृद्धपूरुषैः । तस्य जातौ सुतौ दक्षमरीची चेति विश्रुतौ

brahmādisṛṣṭireṣeti procyate vṛddhapūruṣaiḥ tasya jātau sutau dakṣamarīcī ceti viśrutau

वृद्ध पुरुषों द्वारा कहा जाता है कि यह ब्रह्मा आदि की सृष्टि है; उनके जन्म से प्रसिद्ध दो पुत्र दक्ष और मरीचि हुए।

श्लोक 44 (shiva.rudra.143.44)

मारीचेन कश्यपेन दक्षकन्याः सुलोचनाः । धर्मेण किल मार्गेण परिणीतास्त्रयोदश

mārīcena kaśyapena dakṣakanyāḥ sulocanāḥ dharmeṇa kila mārgeṇa pariṇītāstrayodaśa

मरीचि के पुत्र कश्यप द्वारा दक्ष की तेरह सुलोचना कन्याओं को धर्ममार्ग से ही विवाहित किया गया था।

श्लोक 45 (shiva.rudra.143.45)

अपीदानीन्तनैर्मर्त्यैरल्पबुद्धिपराक्रमैः । अपि गम्यस्त्वगम्योऽयं विचारः क्रियते मुधा

apīdānīntanairmartyairalpabuddhiparākramaiḥ api gamyastvagamyo'yaṁ vicāraḥ kriyate mudhā

फिर भी आज के अल्पबुद्धि और अल्पपराक्रमी मनुष्यों द्वारा यह विचार व्यर्थ ही किया जाता है कि कौन विवाह-योग्य है और कौन नहीं।

श्लोक 46 (shiva.rudra.143.46)

मुखबाहूरुसञ्जातं चातुर्वर्ण्यं सहोदितम् । कल्पनेयं कृता पूर्वैर्न घटेत विचारतः

mukhabāhūrusañjātaṁ cāturvarṇyaṁ sahoditam kalpaneyaṁ kṛtā pūrvairna ghaṭeta vicārataḥ

मुख, भुजा और जंघा से एक साथ उत्पन्न चारों वर्णों की यह कल्पना प्राचीनों द्वारा की गई है, किन्तु विचार करने पर यह सिद्ध नहीं होती।

श्लोक 47 (shiva.rudra.143.47)

एकस्यां च तनौ जाता एकस्माद्यदि वा क्वचित् । चत्वारस्तनयास्तत्किं भिन्नवर्णत्वमाप्नुयुः

ekasyāṁ ca tanau jātā ekasmādyadi vā kvacit catvārastanayāstatkiṁ bhinnavarṇatvamāpnuyuḥ

यदि एक ही शरीर से, एक ही पिता से चार पुत्र उत्पन्न हों, तो क्या वे भिन्न-भिन्न वर्ण को प्राप्त होंगे?

श्लोक 48 (shiva.rudra.143.48)

वर्णावर्णविभागोऽयं तस्मान्न प्रतिभासते । अतो भेदो न मन्तव्यो मानुष्ये केनचित्क्वचित्

varṇāvarṇavibhāgo'yaṁ tasmānna pratibhāsate ato bhedo na mantavyo mānuṣye kenacitkvacit

अतः वर्ण और अवर्ण का यह विभाजन सत्य सिद्ध नहीं होता; इसलिए मनुष्यता में किसी को भी कहीं भी भेद नहीं मानना चाहिए।

श्लोक 49 (shiva.rudra.143.49)

सनत्कुमार उवाच । इत्थमाभाष्य दैत्येशं पौरांश्च स यतिर्मुने । सशिष्यो वेदधर्मांश्च नाशयामास चादरात्

sanatkumāra uvāca itthamābhāṣya daityeśaṁ paurāṁśca sa yatirmune saśiṣyo vedadharmāṁśca nāśayāmāsa cādarāt

सनत्कुमार ने कहा — हे मुने! इस प्रकार दैत्येश्वर और नगरवासियों से कहकर, वह यति अपने शिष्यों सहित प्रयत्नपूर्वक वैदिक धर्मों का नाश करने लगा।

श्लोक 50 (shiva.rudra.143.50)

स्त्रीधर्मं खण्डयामास पातिव्रत्यपरं महत् । जितेन्द्रियत्वं सर्वेषां पुरुषाणां तथैव सः

strīdharmaṁ khaṇḍayāmāsa pātivratyaparaṁ mahat jitendriyatvaṁ sarveṣāṁ puruṣāṇāṁ tathaiva saḥ

उसने पातिव्रत्य पर आधारित स्त्रियों के महान् धर्म को खण्डित कर दिया, और उसी प्रकार सभी पुरुषों की जितेन्द्रियता को भी।

श्लोक 51 (shiva.rudra.143.51)

देवधर्मान्विशेषेण श्राद्धधर्मांस्तथैव च । मखधर्मान् व्रतादींश्च तीर्थश्राद्धं विशेषतः

devadharmānviśeṣeṇa śrāddhadharmāṁstathaiva ca makhadharmān vratādīṁśca tīrthaśrāddhaṁ viśeṣataḥ

उसने विशेष रूप से देवधर्मों, श्राद्धधर्मों, यज्ञधर्मों, व्रतों और विशेषतः तीर्थ-श्राद्ध को नष्ट किया।

श्लोक 52 (shiva.rudra.143.52)

शिवपूजां विशेषेण लिङ्गाराधनपूर्विकाम् । विष्णुसूर्यगणेशादिपूजनं विधिपूर्वकम्

śivapūjāṁ viśeṣeṇa liṅgārādhanapūrvikām viṣṇusūryagaṇeśādipūjanaṁ vidhipūrvakam

उसने विशेष रूप से लिंग-आराधना से आरम्भ होने वाली शिव-पूजा, तथा विधिपूर्वक की जाने वाली विष्णु, सूर्य, गणेश आदि की पूजा को भी नष्ट किया।

श्लोक 53 (shiva.rudra.143.53)

स्नानदानादिकं सर्वं पर्वकाले विशेषतः । खण्डयामास स यतिर्मायी मायाविनां वरः

snānadānādikaṁ sarvaṁ parvakāle viśeṣataḥ khaṇḍayāmāsa sa yatirmāyī māyāvināṁ varaḥ

मायावियों में श्रेष्ठ उस मायावी यति ने पर्वकाल में विशेष रूप से किए जाने वाले स्नान-दान आदि सभी कर्मों को भी नष्ट कर दिया।

श्लोक 54 (shiva.rudra.143.54)

किं बहूक्तेन विप्रेन्द्र त्रिपुरे तेन मायिना । वेदधर्माश्च ये केचित्ते सर्वे दूरतः कृताः

kiṁ bahūktena viprendra tripure tena māyinā vedadharmāśca ye kecitte sarve dūrataḥ kṛtāḥ

हे विप्रेन्द्र! अधिक कहने से क्या — उस मायावी ने त्रिपुर में जो भी वैदिक धर्म थे, वे सब दूर कर दिए।

श्लोक 55 (shiva.rudra.143.55)

यतिधर्माश्रयाः सर्वा मोहितास्त्रिपुराङ्गनाः । भर्तृशुश्रूषणवतीं विजहुर्मतिमुत्तमाम्

yatidharmāśrayāḥ sarvā mohitāstripurāṅganāḥ bhartṛśuśrūṣaṇavatīṁ vijahurmatimuttamām

त्रिपुर की स्त्रियाँ, यति के धर्म का आश्रय लेकर मोहित हो गईं और पति-सेवा के अपने उत्तम संकल्प को छोड़ बैठीं।

श्लोक 56 (shiva.rudra.143.56)

अभ्यस्याकर्षणीं विद्यां वशीकृत्यमयीमपि । पुरुषाः सफलीचक्रुः परदारेषु मोहिताः

abhyasyākarṣaṇīṁ vidyāṁ vaśīkṛtyamayīmapi puruṣāḥ saphalīcakruḥ paradāreṣu mohitāḥ

आकर्षण और वशीकरण की विद्याओं का अभ्यास कर मोहित हुए पुरुषों ने पराई स्त्रियों पर उन्हें सफल किया।

श्लोक 57 (shiva.rudra.143.57)

अन्तः पुरचरा नार्यस्तथा राजकुमारकाः । पौराः पुराङ्गनाश्चापि सर्वे तैश्च विमोहिताः

antaḥ puracarā nāryastathā rājakumārakāḥ paurāḥ purāṅganāścāpi sarve taiśca vimohitāḥ

अन्तःपुर की स्त्रियाँ, राजकुमार, नगरवासी और नगर की स्त्रियाँ — ये सब उनके द्वारा पूर्णतः मोहित हो गए।

श्लोक 58 (shiva.rudra.143.58)

एवं पौरेषु सर्वेषु निजधर्मेषु सर्वथा । पराङ्मुखेषु जातेषु प्रोल्ललास वृषेतरः

evaṁ paureṣu sarveṣu nijadharmeṣu sarvathā parāṅmukheṣu jāteṣu prollalāsa vṛṣetaraḥ

इस प्रकार सभी नगरवासियों के अपने-अपने धर्म से सर्वथा विमुख हो जाने पर, अधर्म हर्ष से उछल पड़ा।

श्लोक 59 (shiva.rudra.143.59)

माया च देवदेवस्य विष्णोस्तस्याज्ञया प्रभो । अलक्ष्मीश्च स्वयं तस्य नियोगात्त्रिपुरं गता

māyā ca devadevasya viṣṇostasyājñayā prabho alakṣmīśca svayaṁ tasya niyogāttripuraṁ gatā

हे प्रभो! देवाधिदेव विष्णु की माया तथा उन्हीं की आज्ञा से स्वयं अलक्ष्मी भी त्रिपुर में प्रविष्ट हो गईं।

श्लोक 60 (shiva.rudra.143.60)

या लक्ष्मीस्तपसा तेषां लब्धा देवेश्वराद्वरात् । बहिर्गता परित्यज्य नियोगाद्ब्रह्मणः प्रभोः

yā lakṣmīstapasā teṣāṁ labdhā deveśvarādvarāt bahirgatā parityajya niyogādbrahmaṇaḥ prabhoḥ

जो लक्ष्मी उन्होंने तप से, देवेश्वर के वरदान से प्राप्त की थी, वह ब्रह्मा प्रभु की आज्ञा से उन्हें छोड़कर बाहर चली गई।

श्लोक 61 (shiva.rudra.143.61)

बुद्धिमोहं तथाभूतं विष्णोर्मायाविनिर्मितम् । तेषां दत्त्वा क्षणादेव कृतार्थोऽभूत्स नारदः

buddhimohaṁ tathābhūtaṁ viṣṇormāyāvinirmitam teṣāṁ dattvā kṣaṇādeva kṛtārtho'bhūtsa nāradaḥ

विष्णु की माया से रचित ऐसा बुद्धिमोह उन्हें क्षणभर में ही देकर नारद अपने प्रयोजन में सफल हो गए।

श्लोक 62 (shiva.rudra.143.62)

नारदोऽपि तथारूपो यथा मायी तथैव सः । तथापि विकृतो नाभूत्पारमेशादनुग्रहात्

nārado'pi tathārūpo yathā māyī tathaiva saḥ tathāpi vikṛto nābhūtpārameśādanugrahāt

नारद भी उस मायावी के समान ही मायावी बन गए थे, फिर भी परमेश्वर की कृपा से वे स्वयं विकृत नहीं हुए।

श्लोक 63 (shiva.rudra.143.63)

आसीत्कुण्ठितसामर्थ्यो दैत्यराजोऽपि भो मुने । भ्रातृभ्यां सहितस्तत्र मयेन च शिवेच्छया

āsītkuṇṭhitasāmarthyo daityarājo'pi bho mune bhrātṛbhyāṁ sahitastatra mayena ca śivecchayā

हे मुने! शिव की इच्छा से वहाँ दैत्यराज भी अपने दोनों भाइयों और मय सहित सामर्थ्यहीन हो गया।

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