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रुद्र संहिता · अध्याय 144

शिव-स्तुति

अध्याय 143अध्याय-सूचीअध्याय 145

श्लोक 1 (shiva.rudra.144.1)

व्यास उवाच । तस्मिन् दैत्याधिपे पौरे सभ्रातरि विमोहिते । सनत्कुमार किं चासीत्तदाचक्ष्वाखिलं विभो

vyāsa uvāca tasmin daityādhipe paure sabhrātari vimohite sanatkumāra kiṁ cāsīttadācakṣvākhilaṁ vibho

व्यास ने कहा — हे विभो सनत्कुमार! जब वह दैत्याधिप अपने नगरवासियों और भाइयों सहित इस प्रकार मोहित हो गया, तब क्या हुआ? सब कुछ बताइए।

श्लोक 2 (shiva.rudra.144.2)

सनत्कुमार उवाच । त्रिपुरे च तथाभूते दैत्ये त्यक्तशिवार्चने । स्त्रीधर्मे निखिले नष्टे दुराचारे व्यवस्थिते

sanatkumāra uvāca tripure ca tathābhūte daitye tyaktaśivārcane strīdharme nikhile naṣṭe durācāre vyavasthite

सनत्कुमार ने कहा — जब त्रिपुर में दैत्यों ने शिव-पूजा त्याग दी, स्त्रियों का सम्पूर्ण धर्म नष्ट हो गया और दुराचार स्थापित हो गया,

श्लोक 3 (shiva.rudra.144.3)

कृतार्थ इव लक्ष्मीशो देवैः सार्द्धमुमापतिम् । निवेदितुं तच्चरित्रं कैलासमगमद्धरिः

kṛtārtha iva lakṣmīśo devaiḥ sārddhamumāpatim nivedituṁ taccaritraṁ kailāsamagamaddhariḥ

तब लक्ष्मीपति हरि, मानो अपने कार्य में सफल होकर, देवताओं सहित उमापति को वह सारा वृत्तान्त निवेदित करने के लिए कैलास गए।

श्लोक 4 (shiva.rudra.144.4)

तस्योपकण्ठं स्थित्वाऽसौ देवैःसह रमापतिः । ततो भूरि स च ब्रह्मा परमेण समाधिना

tasyopakaṇṭhaṁ sthitvā'sau devaiḥsaha ramāpatiḥ tato bhūri sa ca brahmā parameṇa samādhinā

उनके समीप खड़े होकर वे रमापति देवताओं सहित, और ब्रह्मा भी परम समाधि में स्थित होकर —

श्लोक 5 (shiva.rudra.144.5)

मनसा प्राप्य सर्वज्ञं ब्रह्मणा स हरिस्तदा । तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः शङ्करं पुरुषोत्तमः

manasā prāpya sarvajñaṁ brahmaṇā sa haristadā tuṣṭāva vāgbhiriṣṭābhiḥ śaṅkaraṁ puruṣottamaḥ

मन से सर्वज्ञ शिव को पाकर, ब्रह्मा के साथ वे पुरुषोत्तम हरि तब प्रिय वाणी से शंकर की स्तुति करने लगे।

श्लोक 6 (shiva.rudra.144.6)

विष्णुरुवाच । महेश्वराय देवाय नमस्ते परमात्मने । नारायणाय रुद्राय ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे

viṣṇuruvāca maheśvarāya devāya namaste paramātmane nārāyaṇāya rudrāya brahmaṇe brahmarūpiṇe

विष्णु ने कहा — परमात्मा, देव महेश्वर को नमस्कार; नारायण, रुद्र, ब्रह्मरूपी ब्रह्मा को नमस्कार।

श्लोक 7 (shiva.rudra.144.7)

एवं कृत्वा महादेवं दण्डवत्प्रणिपत्य ह । जजाप रुद्रमन्त्रं च दक्षिणामूर्तिसम्भवम्

evaṁ kṛtvā mahādevaṁ daṇḍavatpraṇipatya ha jajāpa rudramantraṁ ca dakṣiṇāmūrtisambhavam

इस प्रकार स्तुति कर महादेव को दण्डवत् प्रणाम करते हुए उन्होंने दक्षिणामूर्ति से उत्पन्न रुद्रमन्त्र का जप किया।

श्लोक 8 (shiva.rudra.144.8)

जले स्थित्वा सार्द्धकोटिप्रमितं तन्मनाः प्रभुः । संस्मरन् मनसा शम्भुं स्वप्रभुं परमेश्वरम्

jale sthitvā sārddhakoṭipramitaṁ tanmanāḥ prabhuḥ saṁsmaran manasā śambhuṁ svaprabhuṁ parameśvaram

जल में खड़े होकर, एकाग्रचित्त प्रभु विष्णु ने अपने स्वामी परमेश्वर शम्भु का मन-ही-मन स्मरण करते हुए सवा करोड़ बार उस मन्त्र का जप किया।

श्लोक 9 (shiva.rudra.144.9)

तावद्देवास्तदा सर्वे तन्मनस्का महेश्वरम्

tāvaddevāstadā sarve tanmanaskā maheśvaram

उसी समय सभी देवता भी अपना मन महेश्वर में लगाकर [इस प्रकार बोले] —

श्लोक 10 (shiva.rudra.144.10)

देवा ऊचुः । नमःसर्वात्मने तुभ्यं शङ्करायार्तिहारिणे । रुद्राय नीलकण्ठाय चिद्रूपाय प्रचेतसे

devā ūcuḥ namaḥsarvātmane tubhyaṁ śaṅkarāyārtihāriṇe rudrāya nīlakaṇṭhāya cidrūpāya pracetase

देवताओं ने कहा — सर्वात्मा, पीड़ाहारी शंकर को नमस्कार; नीलकण्ठ, चिद्रूप, महाज्ञानी रुद्र को नमस्कार।

श्लोक 11 (shiva.rudra.144.11)

गतिर्नः सर्वदा त्वं हि सर्वापद्विनिवारकः । त्वमेव सर्वदात्माभिर्वन्द्यो देवारिसूदन

gatirnaḥ sarvadā tvaṁ hi sarvāpadvinivārakaḥ tvameva sarvadātmābhirvandyo devārisūdana

आप ही सदा हमारी गति हैं, समस्त विपत्तियों को दूर करने वाले हैं; हे देवशत्रुनाशक! आप ही सब आत्माओं द्वारा सदा वन्दनीय हैं।

श्लोक 12 (shiva.rudra.144.12)

त्वमादिस्त्वमनादिश्च स्वानन्दश्चाक्षयः प्रभुः । प्रकृतेः पुरुषस्यापि साक्षात्स्रष्टा जगत्प्रभुः

tvamādistvamanādiśca svānandaścākṣayaḥ prabhuḥ prakṛteḥ puruṣasyāpi sākṣātsraṣṭā jagatprabhuḥ

आप ही आदि हैं, आप ही अनादि हैं, स्वयं आनन्दमय अक्षय प्रभु हैं; प्रकृति और पुरुष दोनों के भी साक्षात् स्रष्टा, जगत्प्रभु हैं।

श्लोक 13 (shiva.rudra.144.13)

त्वमेव जगतां कर्ता भर्ता हर्ता त्वमेव हि । ब्रह्मा विष्णुर्हरो भूत्वा रजःसत्त्वतमोगुणैः

tvameva jagatāṁ kartā bhartā hartā tvameva hi brahmā viṣṇurharo bhūtvā rajaḥsattvatamoguṇaiḥ

आप ही जगत् के कर्ता हैं, आप ही उसके पालक और संहारक हैं — रजस्, सत्त्व और तमस् गुणों से ब्रह्मा, विष्णु और हर बनकर।

श्लोक 14 (shiva.rudra.144.14)

तारकोऽसि जगत्यस्मिन् सर्वेषामधिपोऽव्ययः । वरदो वाङ्मयो वाच्यो वाच्यवाचकवर्जितः

tārako'si jagatyasmin sarveṣāmadhipo'vyayaḥ varado vāṅmayo vācyo vācyavācakavarjitaḥ

इस जगत् में आप ही तारने वाले हैं, सबके अव्यय अधिपति हैं; वरदाता, वाणीमय, वाच्य, फिर भी वाच्य-वाचक दोनों से परे हैं।

श्लोक 15 (shiva.rudra.144.15)

याच्यो मुक्त्यर्थमीशानो योगिभिर्योगवित्तमैः । हृत्पुण्डरीकविवरे योगिनां त्वं हि संस्थितः

yācyo muktyarthamīśāno yogibhiryogavittamaiḥ hṛtpuṇḍarīkavivare yogināṁ tvaṁ hi saṁsthitaḥ

हे ईशान! योगियों में श्रेष्ठ योगीजन मुक्ति के लिए आपकी ही याचना करते हैं; आप ही योगियों के हृदय-कमल की गुहा में स्थित रहते हैं।

श्लोक 16 (shiva.rudra.144.16)

वदन्ति वेदास्त्वां सन्तः परब्रह्मस्वरूपिणम् । भवन्तं तत्त्वमित्यद्य तेजोराशिं परात्परम्

vadanti vedāstvāṁ santaḥ parabrahmasvarūpiṇam bhavantaṁ tattvamityadya tejorāśiṁ parātparam

वेद और सन्त आपको ही परब्रह्म-स्वरूप, 'तत्त्वमसि' कहते हैं — आप ही परात्पर तेज की राशि हैं।

श्लोक 17 (shiva.rudra.144.17)

परमात्मानमित्याहुरस्मिन् जगति यद्विभो । त्वमेव शर्व सर्वात्मन् त्रिलोकाधिपते भव

paramātmānamityāhurasmin jagati yadvibho tvameva śarva sarvātman trilokādhipate bhava

हे विभो! वे इस जगत् में आपको ही परमात्मा कहते हैं; हे शर्व! हे सर्वात्मा! आप ही त्रिलोक के अधिपति हैं।

श्लोक 18 (shiva.rudra.144.18)

दृष्टं श्रुतं स्तुतं सर्वं ज्ञायमानं जगद्गुरो । अणोरल्पतरं प्राहुर्महतोऽपि महत्तरम्

dṛṣṭaṁ śrutaṁ stutaṁ sarvaṁ jñāyamānaṁ jagadguro aṇoralpataraṁ prāhurmahato'pi mahattaram

हे जगद्गुरो! जो कुछ देखा, सुना, स्तुत और ज्ञात है, वह सब आप ही हैं; आपको अणु से भी सूक्ष्मतर और महान् से भी महत्तर कहा गया है।

श्लोक 19 (shiva.rudra.144.19)

सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रवणघ्राणं त्वां नमामि च सर्वतः

sarvataḥ pāṇipādaṁ tat sarvato'kṣiśiromukham sarvataḥ śravaṇaghrāṇaṁ tvāṁ namāmi ca sarvataḥ

आप सब ओर से हाथ-पैर वाले, सब ओर से नेत्र-सिर-मुख वाले, सब ओर से कान-नाक वाले हैं — मैं आपको सब ओर से प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 20 (shiva.rudra.144.20)

सर्वज्ञं सर्वतो व्यापिन् सर्वेश्वरमनावृतम् । विश्वरूपं विरूपाक्षं त्वां नमामि च सर्वतः

sarvajñaṁ sarvato vyāpin sarveśvaramanāvṛtam viśvarūpaṁ virūpākṣaṁ tvāṁ namāmi ca sarvataḥ

सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सर्वेश्वर, अनावृत, विश्वरूप, विरूपाक्ष — मैं आपको सब ओर से प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 21 (shiva.rudra.144.21)

सर्वेश्वरं भवाध्यक्षं सत्यं शिवमनुत्तमम् । कोटि भास्करसङ्काशं त्वां नमामि च सर्वतः

sarveśvaraṁ bhavādhyakṣaṁ satyaṁ śivamanuttamam koṭi bhāskarasaṅkāśaṁ tvāṁ namāmi ca sarvataḥ

सर्वेश्वर, संसार के अधिष्ठाता, सत्य, शिव, अनुत्तम, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी — मैं आपको सब ओर से प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 22 (shiva.rudra.144.22)

विश्वदेवमनाद्यन्तं षट्त्रिंशत्कमनीश्वरम् । प्रवर्तकं च सर्वेषां त्वां नमामि च सर्वतः

viśvadevamanādyantaṁ ṣaṭtriṁśatkamanīśvaram pravartakaṁ ca sarveṣāṁ tvāṁ namāmi ca sarvataḥ

विश्वदेव, आदि-अन्त से रहित, छत्तीस तत्त्वों से युक्त, स्वयं किसी के अधीन नहीं, सबके प्रवर्तक — मैं आपको सब ओर से प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 23 (shiva.rudra.144.23)

प्रवर्तकं च प्रकृतेः सर्वस्य प्रपितामहम् । सर्वविग्रहमीशं हि त्वां नमामि च सर्वतः

pravartakaṁ ca prakṛteḥ sarvasya prapitāmaham sarvavigrahamīśaṁ hi tvāṁ namāmi ca sarvataḥ

प्रकृति के प्रवर्तक, सबके प्रपितामह, सर्वस्वरूप ईश — मैं आपको सब ओर से प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 24 (shiva.rudra.144.24)

एवं वदन्ति वरदं सर्वावासं स्वयम्भुवम् । श्रुतयः श्रुतिसारज्ञं श्रुतिसारविदश्च ये

evaṁ vadanti varadaṁ sarvāvāsaṁ svayambhuvam śrutayaḥ śrutisārajñaṁ śrutisāravidaśca ye

इस प्रकार श्रुतियाँ और श्रुति के सार को जानने वाले ज्ञानीजन आपको वरदाता, सबका आश्रय, स्वयंभू और श्रुति-सार के ज्ञाता कहते हैं।

श्लोक 25 (shiva.rudra.144.25)

अदृश्यमस्माभिरनेकभूतं त्वया कृतं यद्भवताथ लोके । त्वामेव देवासुरभूसुराश्च अन्ये च वै स्थावरजङ्गमाश्च

adṛśyamasmābhiranekabhūtaṁ tvayā kṛtaṁ yadbhavatātha loke tvāmeva devāsurabhūsurāśca anye ca vai sthāvarajaṅgamāśca

हे प्रभो! जो कुछ अनेक रूपों में हमें अदृश्य होकर भी आपके द्वारा इस लोक में रचा गया है, वे सब — देव, असुर, भूसुर (ब्राह्मण), तथा अन्य सभी स्थावर-जंगम — आप ही में स्थित हैं।

श्लोक 26 (shiva.rudra.144.26)

पाह्यनन्यगतीन् शम्भो सुरान्नो देववल्लभ । नष्टप्रायांस्त्रिपुरतो विनिहत्यासुरान्क्षणात्

pāhyananyagatīn śambho surānno devavallabha naṣṭaprāyāṁstripurato vinihatyāsurānkṣaṇāt

हे शम्भो! हे देववल्लभ! जिनकी कोई और गति नहीं, ऐसे हम देवताओं की रक्षा कीजिए; क्षणभर में उन असुरों का वध कर, हमें त्रिपुर से लगभग नष्ट होने से बचाइए।

श्लोक 27 (shiva.rudra.144.27)

मायया मोहितास्तेऽद्य भवतः परमेश्वर । विष्णुना प्रोक्तयुक्त्या त उज्झिता धर्मतः प्रभो

māyayā mohitāste'dya bhavataḥ parameśvara viṣṇunā proktayuktyā ta ujjhitā dharmataḥ prabho

हे परमेश्वर! वे आज आपकी ही माया से मोहित हुए हैं; हे प्रभो! विष्णु द्वारा बताई गई युक्ति से वे धर्म से भ्रष्ट किए गए हैं।

श्लोक 28 (shiva.rudra.144.28)

सन्त्यक्तसर्वधर्माश्च बौद्धागमसमाश्रिताः । अस्मद्भाग्यवशाज्जाता दैत्यास्ते भक्तवत्सल

santyaktasarvadharmāśca bauddhāgamasamāśritāḥ asmadbhāgyavaśājjātā daityāste bhaktavatsala

हे भक्तवत्सल! सम्पूर्ण धर्म त्यागकर बौद्ध आगम का आश्रय ले चुके वे दैत्य अब हमारे सौभाग्य से ही निर्बल हुए हैं।

श्लोक 29 (shiva.rudra.144.29)

सदा त्वं कार्यकर्त्ता हि देवानां शरणप्रद । वयं ते शरणापन्ना यथेच्छसि तथा कुरु

sadā tvaṁ kāryakarttā hi devānāṁ śaraṇaprada vayaṁ te śaraṇāpannā yathecchasi tathā kuru

आप सदा ही देवताओं का कार्य सिद्ध करने वाले और शरण देने वाले हैं; हम आपकी शरण में आए हैं, जैसी आपकी इच्छा हो वैसा कीजिए।

श्लोक 30 (shiva.rudra.144.30)

सनत्कुमार उवाच । इति स्तुत्वा महेशानं देवास्तु पुरतः स्थिताः । कृताञ्जलिपुटा दीना आसन् सन्नतमूर्तयः

sanatkumāra uvāca iti stutvā maheśānaṁ devāstu purataḥ sthitāḥ kṛtāñjalipuṭā dīnā āsan sannatamūrtayaḥ

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार महेश की स्तुति कर, देवता उनके सम्मुख हाथ जोड़े, दीन और झुकी हुई मुद्रा में खड़े रहे।

श्लोक 31 (shiva.rudra.144.31)

स्तुतश्चैवं सुरेन्द्राद्यैर्विष्णोर्जाप्येन चेश्वरः । अगच्छत्तत्र सर्वेशो वृषमारुह्य हर्षितः

stutaścaivaṁ surendrādyairviṣṇorjāpyena ceśvaraḥ agacchattatra sarveśo vṛṣamāruhya harṣitaḥ

इस प्रकार इन्द्र आदि द्वारा स्तुत तथा विष्णु के जप से प्रसन्न होकर सर्वेश्वर हर्षित होकर बैल पर आरूढ़ हो वहाँ पधारे।

श्लोक 32 (shiva.rudra.144.32)

विष्णुमालिङ्ग्य नन्दिशादवरुह्य प्रसन्नधीः । ददर्श सुदृशा तत्र नन्दीदत्तकरोऽखिलान्

viṣṇumāliṅgya nandiśādavaruhya prasannadhīḥ dadarśa sudṛśā tatra nandīdattakaro'khilān

विष्णु का आलिंगन कर, प्रसन्नचित्त होकर नन्दी से उतरकर, नन्दी को अपना हाथ देते हुए, उन्होंने वहाँ अपनी कृपादृष्टि से सबको देखा।

श्लोक 33 (shiva.rudra.144.33)

अथ देवान् समालोक्य कृपादृष्ट्या हरिं हरः । प्राह गम्भीरया वाचा प्रसन्नः पार्वतीपतिः

atha devān samālokya kṛpādṛṣṭyā hariṁ haraḥ prāha gambhīrayā vācā prasannaḥ pārvatīpatiḥ

फिर देवताओं और हरि को कृपादृष्टि से देखकर, प्रसन्नचित्त पार्वतीपति हर ने गम्भीर वाणी से कहा।

श्लोक 34 (shiva.rudra.144.34)

शिव उवाच । ज्ञातं मयेदमधुना देवकार्यं सुरेश्वर । विष्णोर्मायाबलं चैव नारदस्य च धीमतः

śiva uvāca jñātaṁ mayedamadhunā devakāryaṁ sureśvara viṣṇormāyābalaṁ caiva nāradasya ca dhīmataḥ

शिव ने कहा — हे सुरेश्वर! अब मुझे यह सारा देवकार्य ज्ञात हो गया है — विष्णु की माया-शक्ति और बुद्धिमान् नारद का प्रयास भी।

श्लोक 35 (shiva.rudra.144.35)

तेषामधर्मनिष्ठानां दैत्यानां देवसत्तम । पुरत्रयविनाशं च करिष्येऽहं न संशयः

teṣāmadharmaniṣṭhānāṁ daityānāṁ devasattama puratrayavināśaṁ ca kariṣye'haṁ na saṁśayaḥ

हे देवश्रेष्ठ! अधर्म में स्थित उन दैत्यों के तीनों नगरों का विनाश मैं निश्चय ही करूँगा, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 36 (shiva.rudra.144.36)

परन्तु ते महादैत्या मद्भक्ता दृढमानसाः । अथ वध्या मयैव स्युर्व्याजत्यक्तवृषोत्तमाः

parantu te mahādaityā madbhaktā dṛḍhamānasāḥ atha vadhyā mayaiva syurvyājatyaktavṛṣottamāḥ

किन्तु वे महादैत्य दृढ़चित्त होकर मेरे भक्त थे; क्या अब उन्हें केवल छल से धर्म त्यगवाकर मेरे ही हाथों मरवाना उचित होगा?

श्लोक 37 (shiva.rudra.144.37)

विष्णुर्हन्यात्परो वाथ यत्त्याजितवृषाः कृताः । दैत्या मद्भक्तिरहिताः सर्वे त्रिपुरवासिनः

viṣṇurhanyātparo vātha yattyājitavṛṣāḥ kṛtāḥ daityā madbhaktirahitāḥ sarve tripuravāsinaḥ

उन्हें विष्णु या कोई और ही मार डाले, जिसने उनसे धर्म त्यगवाया है; वे सभी त्रिपुरवासी दैत्य अब मेरी भक्ति से रहित हो चुके हैं।

श्लोक 38 (shiva.rudra.144.38)

इति शम्भोस्तु वचनं श्रुत्वा सर्वे दिवौकसः । विमनस्का बभूवुस्ते हरिश्चापि मुनीश्वर

iti śambhostu vacanaṁ śrutvā sarve divaukasaḥ vimanaskā babhūvuste hariścāpi munīśvara

हे मुनीश्वर! शम्भु के इस वचन को सुनकर सभी देवता और हरि भी उदास हो गए।

श्लोक 39 (shiva.rudra.144.39)

देवान् विष्णुमुदासीनान् दृष्ट्वा च भवकृद्विधिः । कृताञ्जलिपुरः शम्भुं ब्रह्मा वचनमब्रवीत्

devān viṣṇumudāsīnān dṛṣṭvā ca bhavakṛdvidhiḥ kṛtāñjalipuraḥ śambhuṁ brahmā vacanamabravīt

देवताओं और विष्णु को उदास देखकर, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने हाथ जोड़कर शम्भु से यह वचन कहा।

श्लोक 40 (shiva.rudra.144.40)

ब्रह्मोवाच । न किञ्चिद्विद्यते पापं यस्मात्त्वं योगवित्तमः । परमेशः परब्रह्म सदा देवर्षिरक्षकः

brahmovāca na kiñcidvidyate pāpaṁ yasmāttvaṁ yogavittamaḥ parameśaḥ parabrahma sadā devarṣirakṣakaḥ

ब्रह्मा ने कहा — इसमें कुछ भी पाप नहीं है, क्योंकि आप योगियों में सर्वश्रेष्ठ, परमेश्वर, परब्रह्म, सदा देवताओं और ऋषियों के रक्षक हैं।

श्लोक 41 (shiva.rudra.144.41)

तवैव शासनात्ते वै मोहिताः प्रेरको भवान् । त्यक्तस्वधर्मत्वत्पूजाः परवध्यास्तथापि न

tavaiva śāsanātte vai mohitāḥ prerako bhavān tyaktasvadharmatvatpūjāḥ paravadhyāstathāpi na

आपकी ही आज्ञा से वे मोहित किए गए हैं, आप ही उसके वास्तविक प्रेरक हैं; अपना धर्म और आपकी पूजा त्यागने पर भी वे किसी दूसरे के द्वारा वध्य नहीं होने चाहिए।

श्लोक 42 (shiva.rudra.144.42)

अतस्त्वया महादेव सुरर्षिप्राणरक्षक । साधूनां रक्षणार्थाय हन्तव्या म्लेच्छजातयः

atastvayā mahādeva surarṣiprāṇarakṣaka sādhūnāṁ rakṣaṇārthāya hantavyā mlecchajātayaḥ

अतः हे महादेव! हे देवताओं और ऋषियों के प्राणरक्षक! साधुओं की रक्षा के लिए इन म्लेच्छ जातियों का वध आपको ही करना चाहिए।

श्लोक 43 (shiva.rudra.144.43)

राज्ञस्तस्य न तत्पापं विद्यते धर्मतस्तव । तस्माद्रक्षेद्द्विजान् साधून् कण्टकान् वै विशोधयेत्

rājñastasya na tatpāpaṁ vidyate dharmatastava tasmādrakṣeddvijān sādhūn kaṇṭakān vai viśodhayet

अपने धर्म के अनुसार कार्य करने वाले राजा को इसमें कोई पाप नहीं लगता; अतः उसे ब्राह्मणों और साधुओं की रक्षा करनी चाहिए और काँटों (दुष्टों) को दूर करना चाहिए।

श्लोक 44 (shiva.rudra.144.44)

एवमिच्छेदिहान्यत्र राजा चेद्राज्यमात्मनः । प्रभुत्वं सर्वलोकानां तस्माद्रक्षस्व माचिरम्

evamicchedihānyatra rājā cedrājyamātmanaḥ prabhutvaṁ sarvalokānāṁ tasmādrakṣasva māciram

यहाँ या अन्यत्र कोई भी राजा अपने राज्य के लिए ऐसी ही इच्छा रखता है; आपका प्रभुत्व सम्पूर्ण लोकों पर है, अतः बिना विलम्ब रक्षा कीजिए।

श्लोक 45 (shiva.rudra.144.45)

मुनीन्द्रेशास्तथा यज्ञा वेदाः शास्त्रादयोऽखिलाः । प्रजास्ते देवदेवेश ह्यहं विष्णुरपि ध्रुवम्

munīndreśāstathā yajñā vedāḥ śāstrādayo'khilāḥ prajāste devadeveśa hyahaṁ viṣṇurapi dhruvam

हे देवाधिदेव! मुनीन्द्र, यज्ञ, वेद और समस्त शास्त्र आपकी ही प्रजा हैं; मैं स्वयं और विष्णु भी निश्चय ही आपकी प्रजा हैं।

श्लोक 46 (shiva.rudra.144.46)

देवतासार्वभौमस्त्वं सम्राट् सर्वेश्वरः प्रभो । परिवारस्तवैवैष हर्यादि सकलं जगत्

devatāsārvabhaumastvaṁ samrāṭ sarveśvaraḥ prabho parivārastavaivaiṣa haryādi sakalaṁ jagat

हे प्रभो! आप देवताओं के सार्वभौम सम्राट्, सर्वेश्वर हैं; हरि आदि सहित यह सम्पूर्ण जगत् आपका ही परिवार है।

श्लोक 47 (shiva.rudra.144.47)

युवराजो हरिस्तेऽज ब्रह्माहं ते पुरोहितः । राजकार्यकरः शक्रस्त्वदाज्ञापरिपालकः

yuvarājo hariste'ja brahmāhaṁ te purohitaḥ rājakāryakaraḥ śakrastvadājñāparipālakaḥ

हे अज! हरि आपके युवराज हैं, मैं ब्रह्मा आपका पुरोहित हूँ; इन्द्र राजकार्य करने वाले, आपकी आज्ञा का पालक है।

श्लोक 48 (shiva.rudra.144.48)

देवा अन्येऽपि सर्वेश तव शासनयन्त्रिताः । स्वस्वकार्यकरा नित्यं सत्यं सत्यं न संशयः

devā anye'pi sarveśa tava śāsanayantritāḥ svasvakāryakarā nityaṁ satyaṁ satyaṁ na saṁśayaḥ

हे सर्वेश! अन्य देवता भी आपके शासन से बँधे हुए, सदा अपने-अपने कार्य करने वाले हैं — यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 49 (shiva.rudra.144.49)

सनत्कुमार उवाच । एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य ब्रह्मणः परमेश्वरः । प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा शङ्करः सुरपो विधिम्

sanatkumāra uvāca etacchrutvā vacastasya brahmaṇaḥ parameśvaraḥ pratyuvāca prasannātmā śaṅkaraḥ surapo vidhim

सनत्कुमार ने कहा — ब्रह्मा के इस वचन को सुनकर, प्रसन्नचित्त सुरपति परमेश्वर शंकर ने विधाता को उत्तर दिया।

श्लोक 50 (shiva.rudra.144.50)

शिव उवाच । हे ब्रह्मन् यद्यहं देवराजः सम्राट् प्रकीर्त्तितः । तत्प्रकारो न मे कश्चिद् गृह्णीयां यमिह प्रभुः

śiva uvāca he brahman yadyahaṁ devarājaḥ samrāṭ prakīrttitaḥ tatprakāro na me kaścid gṛhṇīyāṁ yamiha prabhuḥ

शिव ने कहा — हे ब्रह्मन्! यदि मैं देवराज और सम्राट् कहा गया हूँ, तो मेरे पास वैसा कोई साधन नहीं है, जिसे मैं यहाँ स्वामी के रूप में ग्रहण कर सकूँ।

श्लोक 51 (shiva.rudra.144.51)

रथो नास्ति महादिव्यस्तादृक् सारथिना सह । धनुर्बाणादिकं चापि सङ्ग्रामे जयकारकम्

ratho nāsti mahādivyastādṛk sārathinā saha dhanurbāṇādikaṁ cāpi saṅgrāme jayakārakam

मेरे पास न तो सारथि सहित वैसा कोई महादिव्य रथ है, न ही युद्ध में विजय दिलाने वाले धनुष-बाण आदि हैं।

श्लोक 52 (shiva.rudra.144.52)

यमास्थाय धनुर्बाणान् गृहीत्वा योज्य वै मनः । निहनिष्याम्यहं दैत्यान् प्रबलानपि सङ्गरे

yamāsthāya dhanurbāṇān gṛhītvā yojya vai manaḥ nihaniṣyāmyahaṁ daityān prabalānapi saṅgare

जिस पर आरूढ़ होकर, धनुष-बाण लेकर, मन को एकाग्र कर, मैं युद्ध में उन बलशाली दैत्यों का भी वध कर सकूँ।

श्लोक 53 (shiva.rudra.144.53)

सनत्कुमार उवाच । अद्य सब्रह्मका देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः प्रहर्षिताः । श्रुत्वा प्रभोस्तदा वाक्यं नत्वा प्रोचुर्महेश्वरम्

sanatkumāra uvāca adya sabrahmakā devāḥ sendropendrāḥ praharṣitāḥ śrutvā prabhostadā vākyaṁ natvā procurmaheśvaram

सनत्कुमार ने कहा — ब्रह्मा सहित इन्द्र-उपेन्द्र (विष्णु) आदि देवता, प्रभु का यह वचन सुनकर अत्यन्त हर्षित हुए और महेश्वर को प्रणाम कर बोले।

श्लोक 54 (shiva.rudra.144.54)

देवा ऊचुः । वयं भवाम देवेश तत्प्रकारा महेश्वर । रथादिकाः तव स्वामिन्सन्नद्धाः सङ्गराय हि

devā ūcuḥ vayaṁ bhavāma deveśa tatprakārā maheśvara rathādikāḥ tava svāminsannaddhāḥ saṅgarāya hi

देवताओं ने कहा — हे देवेश! हे महेश्वर! हम स्वयं ही उस प्रकार के — रथ आदि — बनकर, हे स्वामी, आपके युद्ध के लिए सुसज्जित होंगे।

श्लोक 55 (shiva.rudra.144.55)

इत्युक्त्वा संहताः सर्वे शिवेच्छामधिगम्य ह । पृथगूचुः प्रसन्नास्ते कृताञ्जलिपुटास्सुराः

ityuktvā saṁhatāḥ sarve śivecchāmadhigamya ha pṛthagūcuḥ prasannāste kṛtāñjalipuṭāssurāḥ

यह कहकर, सब मिलकर और शिव की इच्छा जानकर, वे प्रसन्न देवता हाथ जोड़कर अलग-अलग बोलने लगे।

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