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रुद्र संहिता · अध्याय 146

रथ-निर्माण-वर्णन

अध्याय 145अध्याय-सूचीअध्याय 147

श्लोक 1 (shiva.rudra.146.1)

व्यास उवाच । सनत्कुमार सर्वज्ञ शैवप्रवर सन्मते । अद्भुतेयं कथा तात श्राविता परमेशितुः

vyāsa uvāca sanatkumāra sarvajña śaivapravara sanmate adbhuteyaṁ kathā tāta śrāvitā parameśituḥ

व्यास ने कहा — हे सर्वज्ञ सनत्कुमार! हे शैवों में श्रेष्ठ, सन्मति! हे तात! परमेश्वर की यह अद्भुत कथा आपने सुनाई।

श्लोक 2 (shiva.rudra.146.2)

इदानीं रथनिर्माणं ब्रूहि देवमयं परम् । शिवार्थं यत्कृतं दिव्यं धीमता विश्वकर्मणा

idānīṁ rathanirmāṇaṁ brūhi devamayaṁ param śivārthaṁ yatkṛtaṁ divyaṁ dhīmatā viśvakarmaṇā

अब उस परम दिव्य, समस्त देवमय रथ के निर्माण के विषय में बताइए, जो बुद्धिमान् विश्वकर्मा ने शिव के लिए बनाया था।

श्लोक 3 (shiva.rudra.146.3)

सूत उवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य व्यासस्य स मुनीश्वरः । सनत्कुमारः प्रोवाच स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम्

sūta uvāca ityākarṇya vacastasya vyāsasya sa munīśvaraḥ sanatkumāraḥ provāca smṛtvā śivapadāmbujam

सूत ने कहा — व्यास के इस वचन को सुनकर मुनीश्वर सनत्कुमार, शिव के चरणकमल का स्मरण कर बोले।

श्लोक 4 (shiva.rudra.146.4)

सनत्कुमार उवाच । शृणु व्यास महाप्राज्ञ रथादेर्निर्मितिं मुने । यथामति प्रवक्ष्येऽहं स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम्

sanatkumāra uvāca śṛṇu vyāsa mahāprājña rathādernirmitiṁ mune yathāmati pravakṣye'haṁ smṛtvā śivapadāmbujam

सनत्कुमार ने कहा — हे महाप्राज्ञ व्यास! हे मुने! रथ आदि के निर्माण को सुनो; शिव के चरणकमल का स्मरण कर मैं यथाबुद्धि उसे कहूँगा।

श्लोक 5 (shiva.rudra.146.5)

अथ देवस्य रुद्रस्य निर्मितो विश्वकर्मणा । सर्वलोकमयो दिव्यो रथो यत्नेन सादरम्

atha devasya rudrasya nirmito viśvakarmaṇā sarvalokamayo divyo ratho yatnena sādaram

तब देव रुद्र के लिए विश्वकर्मा ने प्रयत्नपूर्वक और आदरसहित समस्त लोकों से युक्त एक दिव्य रथ का निर्माण किया।

श्लोक 6 (shiva.rudra.146.6)

सर्वभूतमयश्चैव सौवर्णः सर्वसम्मतः । रथाङ्गं दक्षिणं सूर्यस्तद्वामं सोम एव च

sarvabhūtamayaścaiva sauvarṇaḥ sarvasammataḥ rathāṅgaṁ dakṣiṇaṁ sūryastadvāmaṁ soma eva ca

वह समस्त प्राणियों से युक्त, स्वर्णमय और सर्वसम्मत था; उसके दायें पहिए में सूर्य और बायें में चन्द्रमा थे।

श्लोक 7 (shiva.rudra.146.7)

दक्षिणं द्वादशारं हि षोडशारं तथोत्तरम् । अरेषु तेषु विप्रेन्द्र आदित्या द्वादशैव तु

dakṣiṇaṁ dvādaśāraṁ hi ṣoḍaśāraṁ tathottaram areṣu teṣu viprendra ādityā dvādaśaiva tu

दायाँ पहिया बारह अरों वाला था, और दूसरा सोलह अरों वाला; हे विप्रेन्द्र! उन अरों में बारहों आदित्य ही स्थित थे।

श्लोक 8 (shiva.rudra.146.8)

शशिनः षोडशारास्तु कला वामस्य सुव्रत । ऋक्षाणि तु तथा तस्य वामस्यैव विभूषणम्

śaśinaḥ ṣoḍaśārāstu kalā vāmasya suvrata ṛkṣāṇi tu tathā tasya vāmasyaiva vibhūṣaṇam

हे सुव्रत! चन्द्रमा की सोलह कलाएँ ही उस बायें पहिए के सोलह अरे थे, और नक्षत्र उसी बायें पहिए के आभूषण थे।

श्लोक 9 (shiva.rudra.146.9)

ऋतवो नेमयः षट् च तयोर्वै विप्रपुङ्गव । पुष्करं चान्तरिक्षं वै रथनीडश्च मन्दरः

ṛtavo nemayaḥ ṣaṭ ca tayorvai viprapuṅgava puṣkaraṁ cāntarikṣaṁ vai rathanīḍaśca mandaraḥ

हे विप्रपुंगव! छहों ऋतुएँ उन दोनों पहियों की नेमियाँ (घेरे) थीं; अन्तरिक्ष उसका पुष्करकुण्ड था, और मन्दराचल उसका रथनीड़ (धुरी-आसन) था।

श्लोक 10 (shiva.rudra.146.10)

अस्ताद्रिरुदयाद्रिस्तु तावुभौ कूबरौ स्मृतौ । अधिष्ठानं महामेरुराश्रयाः केशराचलाः

astādrirudayādristu tāvubhau kūbarau smṛtau adhiṣṭhānaṁ mahāmerurāśrayāḥ keśarācalāḥ

अस्ताचल और उदयाचल — ये दोनों उसके दो कूबर (बगल के डण्डे) कहे गए हैं; महामेरु उसका आधार था, और चारों ओर के पर्वत उसके आश्रयस्तम्भ थे।

श्लोक 11 (shiva.rudra.146.11)

वेगः संवत्सरास्तस्य अयने चक्रसङ्गमौ । मुहूर्ता बन्धुरास्तस्य शम्याश्चैव कलाः स्मृताः

vegaḥ saṁvatsarāstasya ayane cakrasaṅgamau muhūrtā bandhurāstasya śamyāścaiva kalāḥ smṛtāḥ

उसकी गति संवत्सर (वर्ष) थी, दोनों अयन उसके पहियों के मिलन-बिन्दु थे; मुहूर्त उसके आड़े डण्डे थे और कलाएँ उसकी कीलें कही गई हैं।

श्लोक 12 (shiva.rudra.146.12)

तस्य काष्ठाः स्मृता घोणाश्चाक्षदण्डाः क्षणाश्च वै । निमेषाश्चानुकर्षाश्च ईषाश्चानुलवाः स्मृताः

tasya kāṣṭhāḥ smṛtā ghoṇāścākṣadaṇḍāḥ kṣaṇāśca vai nimeṣāścānukarṣāśca īṣāścānulavāḥ smṛtāḥ

दिशाएँ उसके अगले सिरे कही गई हैं, क्षण उसके धुरी-दण्ड थे, निमेष उसका निचला ढाँचा था, और लव उसका डण्डा (ईषा) कहे गए हैं।

श्लोक 13 (shiva.rudra.146.13)

द्यौर्वरूथं रथस्यास्य स्वर्गमोक्षावुभौ ध्वजौ । युगान्तकोटितौ तस्य भ्रमकामदुघौ स्मृतौ

dyaurvarūthaṁ rathasyāsya svargamokṣāvubhau dhvajau yugāntakoṭitau tasya bhramakāmadughau smṛtau

स्वर्ग उस रथ का आवरण था, स्वर्ग और मोक्ष उसकी दो पताकाएँ थीं; युगों के अन्त उसके दो घूमते हुए कामधेनु-समान (इच्छापूर्ति करने वाले) आभूषण कहे गए हैं।

श्लोक 14 (shiva.rudra.146.14)

ईषादण्डस्तथा व्यक्तं वृद्धिस्तस्यैव नड्वलः । कोणास्तस्याप्यहङ्कारो भूतानि च बलं स्मृतम्

īṣādaṇḍastathā vyaktaṁ vṛddhistasyaiva naḍvalaḥ koṇāstasyāpyahaṅkāro bhūtāni ca balaṁ smṛtam

व्यक्त तत्त्व उसका ईषादण्ड (डण्डा) था, वृद्धि (विकास) ही उसका बन्धन-रज्जु था; अहंकार उसके कोने थे और पंचभूत उसका बल कहे गए हैं।

श्लोक 15 (shiva.rudra.146.15)

इन्द्रियाणि च तस्यैव भूषणानि समन्ततः । श्रद्धा च गतिरस्यैव रथस्य मुनिसत्तम

indriyāṇi ca tasyaiva bhūṣaṇāni samantataḥ śraddhā ca gatirasyaiva rathasya munisattama

इन्द्रियाँ ही उसके चारों ओर के आभूषण थीं, और हे मुनिसत्तम! श्रद्धा ही इस रथ की गति थी।

श्लोक 16 (shiva.rudra.146.16)

तदानीं भूषणान्येव षडङ्गान्युपभूषणम् । पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राणि सुव्रताः

tadānīṁ bhūṣaṇānyeva ṣaḍaṅgānyupabhūṣaṇam purāṇanyāyamīmāṁsādharmaśāstrāṇi suvratāḥ

उस समय छहों वेदांग ही उसके आभूषण थे, तथा हे सुव्रतो! पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र उसके उप-आभूषण थे।

श्लोक 17 (shiva.rudra.146.17)

बलाशया वराश्चैव सर्वलक्षणसंयुताः । मन्त्रा घण्टाः स्मृतास्तेषां वर्णपादास्तदाश्रमाः

balāśayā varāścaiva sarvalakṣaṇasaṁyutāḥ mantrā ghaṇṭāḥ smṛtāsteṣāṁ varṇapādāstadāśramāḥ

उसका बल दृढ़ संकल्प था, और वह सभी शुभ लक्षणों से युक्त, उत्तम था; मन्त्र उसकी घंटियाँ कही गई हैं, वर्ण उसके पैर और आश्रम उनका आधार थे।

श्लोक 18 (shiva.rudra.146.18)

अथो बन्धो ह्यनन्तस्तु सहस्रफणभूषितः । दिशः पादा रथस्यास्य तथा चोपदिशश्च ह

atho bandho hyanantastu sahasraphaṇabhūṣitaḥ diśaḥ pādā rathasyāsya tathā copadiśaśca ha

हजार फणों से सुशोभित शेषनाग ही उसका बन्धन था; दिशाएँ इस रथ के पैर थीं, और वैसे ही उपदिशाएँ भी।

श्लोक 19 (shiva.rudra.146.19)

पुष्कराद्याः पताकाश्च सौवर्णा रत्नभूषिताः । समुद्रास्तस्य चत्वारो रथकम्बलिनःस्मृताः

puṣkarādyāḥ patākāśca sauvarṇā ratnabhūṣitāḥ samudrāstasya catvāro rathakambalinaḥsmṛtāḥ

पुष्कर आदि मेघ ही रत्नभूषित स्वर्णमय पताकाएँ थीं; चारों समुद्र उस रथ के आवरण-वस्त्र (कम्बल) कहे गए हैं।

श्लोक 20 (shiva.rudra.146.20)

गङ्गाद्याः सरितश्रेष्ठाः सर्वाभरणभूषिताः । चामरासक्तहस्ताग्राः सर्वाः स्त्रीरूपशोभिताः

gaṅgādyāḥ saritaśreṣṭhāḥ sarvābharaṇabhūṣitāḥ cāmarāsaktahastāgrāḥ sarvāḥ strīrūpaśobhitāḥ

गंगा आदि श्रेष्ठ नदियाँ, समस्त आभूषणों से सुशोभित, हाथों में चँवर लिए, स्त्री-रूप में सुशोभित थीं —

श्लोक 21 (shiva.rudra.146.21)

तत्र तत्र कृतस्थानाः शोभयाञ्चक्रिरे रथम् । आवहाद्यास्तथा सप्त सोपानं हैममुत्तमम्

tatra tatra kṛtasthānāḥ śobhayāñcakrire ratham āvahādyāstathā sapta sopānaṁ haimamuttamam

— वे यहाँ-वहाँ अपने स्थान पर स्थित होकर रथ को सुशोभित करती थीं; तथा आवह आदि सातों वायु उसकी उत्तम स्वर्णिम सीढ़ी थे।

श्लोक 22 (shiva.rudra.146.22)

लोकालोकाचलस्तस्योपसोपानाः समन्ततः । विषयश्च तथा बाह्यो मानसादिस्तु शोभनः

lokālokācalastasyopasopānāḥ samantataḥ viṣayaśca tathā bāhyo mānasādistu śobhanaḥ

लोकालोक पर्वत चारों ओर उसकी उप-सीढ़ियाँ थीं; बाह्य विषय उसका बाहरी क्षेत्र था, और मानसरोवर आदि उसकी शोभा थे।

श्लोक 23 (shiva.rudra.146.23)

पाशाः समन्ततस्तस्य सर्वे वर्षाचलाः स्मृताः । तलास्तस्य रथस्याऽथ सर्वे तलनिवासिनः

pāśāḥ samantatastasya sarve varṣācalāḥ smṛtāḥ talāstasya rathasyā'tha sarve talanivāsinaḥ

सातों वर्षों (द्वीपों) की सीमा के सभी पर्वत उसके चारों ओर के पाश (रस्सी) कहे गए हैं; उस रथ का तल पाताल-निवासी समस्त प्राणियों से बना था।

श्लोक 24 (shiva.rudra.146.24)

सारथिर्भगवान्ब्रह्मा देवा रश्मिधराः स्मृताः । प्रतोदो ब्रह्मणस्तस्य प्रणवो ब्रह्मदैवतम्

sārathirbhagavānbrahmā devā raśmidharāḥ smṛtāḥ pratodo brahmaṇastasya praṇavo brahmadaivatam

सारथि स्वयं भगवान् ब्रह्मा थे, देवता लगाम पकड़ने वाले कहे गए हैं; ब्रह्मा का चाबुक प्रणव (ॐ) था, जिसका अधिष्ठाता देवता ब्रह्म ही था।

श्लोक 25 (shiva.rudra.146.25)

अकारश्च महच्छत्रं मन्दरः पार्श्वदण्डभाक् । शैलेन्द्रः कार्मुकं तस्य ज्या भुजङ्गाधिपः स्वयम्

akāraśca mahacchatraṁ mandaraḥ pārśvadaṇḍabhāk śailendraḥ kārmukaṁ tasya jyā bhujaṅgādhipaḥ svayam

अकार महान् छत्र था, मन्दराचल उसका पार्श्वदण्ड था; पर्वतराज (हिमालय) उसका धनुष था, और स्वयं सर्पराज उसकी प्रत्यंचा (डोरी) था।

श्लोक 26 (shiva.rudra.146.26)

घण्टा सरस्वती देवी धनुषः श्रुतिरूपिणी । इषुर्विष्णुर्महातेजास्त्वग्निः शल्यं प्रकीर्तितम्

ghaṇṭā sarasvatī devī dhanuṣaḥ śrutirūpiṇī iṣurviṣṇurmahātejāstvagniḥ śalyaṁ prakīrtitam

देवी सरस्वती, श्रुति-स्वरूपिणी, उस धनुष की घंटी थीं; महातेजस्वी विष्णु उसका बाण थे, और अग्नि उसका बाणाग्र (शल्य) कहा गया है।

श्लोक 27 (shiva.rudra.146.27)

हयास्तस्य तथा प्रोक्ताश्चत्वारो निगमा मुने । ज्योतींषि भूषणं तेषामवशिष्टान्यतः परम्

hayāstasya tathā proktāścatvāro nigamā mune jyotīṁṣi bhūṣaṇaṁ teṣāmavaśiṣṭānyataḥ param

हे मुने! उसके घोड़े चारों वेद कहे गए हैं; ज्योतिर्गण उनके आभूषण थे, और उससे परे शेष सब कुछ भी।

श्लोक 28 (shiva.rudra.146.28)

अनीकं विषसम्भूतं वायवो वादकाः स्मृताः । ऋषयो व्यासमुख्याश्च वाहवाहास्तथाभवन्

anīkaṁ viṣasambhūtaṁ vāyavo vādakāḥ smṛtāḥ ṛṣayo vyāsamukhyāśca vāhavāhāstathābhavan

उसकी सेना विषैले प्राणियों से बनी थी, वायुगण उसके वादक कहे गए हैं; व्यास आदि ऋषि उसके वाहनों के संचालक बने।

श्लोक 29 (shiva.rudra.146.29)

स्वल्पाक्षरैः सम्ब्रवीमि किं बहूक्त्या मुनीश्वर । ब्रह्माण्डे चैव यत्किञ्चिद्वस्तुतद्वै रथे स्मृतम्

svalpākṣaraiḥ sambravīmi kiṁ bahūktyā munīśvara brahmāṇḍe caiva yatkiñcidvastutadvai rathe smṛtam

हे मुनीश्वर! मैं थोड़े शब्दों में कहता हूँ, अधिक कहने से क्या लाभ — ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी वस्तु है, वह सब उस रथ में प्रतिबिम्बित थी।

श्लोक 30 (shiva.rudra.146.30)

एवं सम्यक्कृतस्तेन धीमता विश्वकर्मणा । सरथादिप्रकारो हि ब्रह्मविष्ण्वाज्ञया शुभः

evaṁ samyakkṛtastena dhīmatā viśvakarmaṇā sarathādiprakāro hi brahmaviṣṇvājñayā śubhaḥ

इस प्रकार बुद्धिमान् विश्वकर्मा द्वारा ब्रह्मा और विष्णु की आज्ञा से, रथ आदि की यह शुभ व्यवस्था भली-भाँति सम्पन्न की गई।

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