रुद्र संहिता · अध्याय 147
शिव-यात्रा वर्णन
श्लोक 1 (shiva.rudra.147.1)
सनत्कुमार उवाच । ईदृग्विधं महादिव्यं नानाश्चर्यमयं रथम् । सन्नह्य निगमानश्वांस्तं ब्रह्मा प्रार्पयच्छिवम्
sanatkumāra uvāca īdṛgvidhaṁ mahādivyaṁ nānāścaryamayaṁ ratham sannahya nigamānaśvāṁstaṁ brahmā prārpayacchivam
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार महादिव्य एवं नाना आश्चर्यों से युक्त उस रथ को सुसज्जित करके, वेदस्वरूप घोड़ों को उसमें जोतकर, ब्रह्मा जी ने उसे शिव को अर्पित किया।
श्लोक 2 (shiva.rudra.147.2)
शम्भवेऽसौ निवेद्याधिरोपयामास शूलिनम् । बहुशः प्रार्थ्य देवेशं विष्ण्वादिसुरसम्मतम्
śambhave'sau nivedyādhiropayāmāsa śūlinam bahuśaḥ prārthya deveśaṁ viṣṇvādisurasammatam
शम्भु को अर्पित करके उन्होंने शूलधारी देवेश को बारम्बार प्रार्थना करके उस पर आरूढ़ कराया, जो विष्णु आदि देवताओं द्वारा भी अनुमोदित था।
श्लोक 3 (shiva.rudra.147.3)
ततस्तस्मिन् रथे दिव्ये रथप्राकारसंयुते । सर्वदेवमयः शम्भुरारुरोह महाप्रभुः
tatastasmin rathe divye rathaprākārasaṁyute sarvadevamayaḥ śambhurāruroha mahāprabhuḥ
तत्पश्चात् उस दिव्य, प्राकार-युक्त रथ पर सर्वदेवमय महाप्रभु शम्भु आरूढ़ हुए।
श्लोक 4 (shiva.rudra.147.4)
ऋषिभिः स्तूयमानश्च देवगन्धर्वपन्नगैः । विष्णुना ब्रह्मणा चापि लोकपालैर्बभूव ह
ṛṣibhiḥ stūyamānaśca devagandharvapannagaiḥ viṣṇunā brahmaṇā cāpi lokapālairbabhūva ha
वे ऋषियों, देवों, गन्धर्वों और नागों द्वारा तथा विष्णु, ब्रह्मा एवं लोकपालों द्वारा भी स्तुति किये गये।
श्लोक 5 (shiva.rudra.147.5)
उपावृतश्चाप्सरसाङ्गणैर्गीतविशारदैः । शुशुभे वरदः शम्भुः स तं प्रेक्ष्य च सारथिम्
upāvṛtaścāpsarasāṅgaṇairgītaviśāradaiḥ śuśubhe varadaḥ śambhuḥ sa taṁ prekṣya ca sārathim
गान-विशारद अप्सराओं के समूहों से घिरे हुए वरदाता शम्भु उस सारथी को देखकर सुशोभित हुए।
श्लोक 6 (shiva.rudra.147.6)
तस्मिन्नारोहति रथं कल्पितं लोकसम्भृतम् । शिरोभिः पतिता भूमौ तुरगा वेदसम्भवाः
tasminnārohati rathaṁ kalpitaṁ lokasambhṛtam śirobhiḥ patitā bhūmau turagā vedasambhavāḥ
जब वे उस समस्त लोकों द्वारा निर्मित रथ पर आरूढ़ हुए, तब वेद-जनित घोड़े सिर के बल भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 7 (shiva.rudra.147.7)
चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः । चकम्पे सहसा शेषोऽसोढा तद्भारमातुरः
cacāla vasudhā celuḥ sakalāśca mahīdharāḥ cakampe sahasā śeṣo'soḍhā tadbhāramāturaḥ
पृथ्वी काँप उठी, सभी पर्वत हिल गये, तथा शेषनाग अकस्मात् उस भार को न सह पाने के कारण व्याकुल होकर काँप उठे।
श्लोक 8 (shiva.rudra.147.8)
अथाधः स रथस्यास्य भगवान्धरणीधरः । वृषेन्द्ररूपी चोत्थाय स्थापयामास वै क्षणम्
athādhaḥ sa rathasyāsya bhagavāndharaṇīdharaḥ vṛṣendrarūpī cotthāya sthāpayāmāsa vai kṣaṇam
तब उस रथ के नीचे, पृथ्वी को धारण करने वाले वे शेष भगवान् वृषभराज का रूप धारणकर उठे और क्षणभर के लिए उसे स्थिर कर दिया।
श्लोक 9 (shiva.rudra.147.9)
क्षणान्तरे वृषेन्द्रोऽपि जानुभ्यामगमद्धराम् । रथारूढमहेशस्य सुतेजस्सोढुमक्षमः
kṣaṇāntare vṛṣendro'pi jānubhyāmagamaddharām rathārūḍhamaheśasya sutejassoḍhumakṣamaḥ
क्षणभर बाद वह वृषभराज भी रथारूढ़ महेश के महातेज को सहन करने में असमर्थ होकर घुटनों के बल भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 10 (shiva.rudra.147.10)
अभीषुहस्तो भगवानुद्यम्य च हयांस्तदा । स्थापयामास देवस्य वचनाद्वै रथं वरम्
abhīṣuhasto bhagavānudyamya ca hayāṁstadā sthāpayāmāsa devasya vacanādvai rathaṁ varam
तब बागडोर हाथ में लिए हुए भगवान् (ब्रह्मा) ने घोड़ों को उठाकर, देव (शिव) के वचनानुसार उस श्रेष्ठ रथ को स्थिर कर दिया।
श्लोक 11 (shiva.rudra.147.11)
ततोऽसौ नोदयामास मनोमारुतरंहसः । ब्रह्मा हयान्वेदमयान्नद्धान् रथवरे स्थितः
tato'sau nodayāmāsa manomārutaraṁhasaḥ brahmā hayānvedamayānnaddhān rathavare sthitaḥ
तत्पश्चात् उस श्रेष्ठ रथ पर स्थित ब्रह्मा जी ने मन और वायु के समान वेगवान् उन जुते हुए वेदस्वरूप घोड़ों को हाँका।
श्लोक 12 (shiva.rudra.147.12)
पुराण्युद्दिश्य वै त्रीणि तेषां खस्थानि तानि हि । अधिष्ठिते महेशे तु दानवानां तरस्विनाम्
purāṇyuddiśya vai trīṇi teṣāṁ khasthāni tāni hi adhiṣṭhite maheśe tu dānavānāṁ tarasvinām
जब महेश (उस रथ पर) भलीभाँति आरूढ़ हो गये, तब वे उन वेगवान् दानवों के आकाश-स्थित तीनों नगरों की ओर लक्ष्य साधकर बढ़े।
श्लोक 13 (shiva.rudra.147.13)
अथाह भगवान् रुद्रो देवानालोक्य शङ्करः । पशूनामाधिपत्यं मे दध्वं हन्मि ततोऽसुरान्
athāha bhagavān rudro devānālokya śaṅkaraḥ paśūnāmādhipatyaṁ me dadhvaṁ hanmi tato'surān
तब भगवान् रुद्र शंकर ने देवों की ओर देखकर कहा — मुझे पशुओं का आधिपत्य दो, तत्पश्चात् मैं असुरों का वध करूँगा।
श्लोक 14 (shiva.rudra.147.14)
पृथक् पशुत्वं देवानां तथान्येषां सुरोत्तमाः । कल्पयित्वैव वध्यास्ते नान्यथा दैत्यसत्तमाः
pṛthak paśutvaṁ devānāṁ tathānyeṣāṁ surottamāḥ kalpayitvaiva vadhyāste nānyathā daityasattamāḥ
हे श्रेष्ठ देवगण! देवों तथा अन्य सबकी पशुता को पृथक्-पृथक् निश्चित किये बिना वे श्रेष्ठ दैत्य वध्य नहीं हो सकते, अन्यथा नहीं।
श्लोक 15 (shiva.rudra.147.15)
सनत्कुमार उवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्य देवदेवस्य धीमतः । विषादमगमन्सर्वे पशुत्वं प्रतिशङ्किताः
sanatkumāra uvāca iti śrutvā vacastasya devadevasya dhīmataḥ viṣādamagamansarve paśutvaṁ pratiśaṅkitāḥ
सनत्कुमार ने कहा — बुद्धिमान् देवाधिदेव के इस वचन को सुनकर सभी देवगण पशुता की आशंका से खिन्न हो गये।
श्लोक 16 (shiva.rudra.147.16)
तेषां भावमथ ज्ञात्वा देवदेवोऽम्बिकापतिः । विहस्य कृपया देवान् शम्भुस्तानिदमब्रवीत्
teṣāṁ bhāvamatha jñātvā devadevo'mbikāpatiḥ vihasya kṛpayā devān śambhustānidamabravīt
तब उनके मनोभाव को जानकर देवाधिदेव, अम्बिकापति शम्भु ने हँसकर कृपापूर्वक देवों से यह कहा।
श्लोक 17 (shiva.rudra.147.17)
शम्भुरुवाच । मा वोऽस्तु पशुभावेऽपि पातो विबुधसत्तमाः । श्रूयतां पशुभावस्य विमोक्षः क्रियतां च सः
śambhuruvāca mā vo'stu paśubhāve'pi pāto vibudhasattamāḥ śrūyatāṁ paśubhāvasya vimokṣaḥ kriyatāṁ ca saḥ
शम्भु ने कहा — हे श्रेष्ठ देवगण! पशुभाव में भी तुम्हारा पतन न हो। पशुभाव से मुक्ति का उपाय सुनो और उसे अपनाओ।
श्लोक 18 (shiva.rudra.147.18)
यौ वै पाशुपतं दिव्यं चरिष्यति स मोक्ष्यति । पशुत्वादिति सत्यं वः प्रतिज्ञातं समाहिताः
yau vai pāśupataṁ divyaṁ cariṣyati sa mokṣyati paśutvāditi satyaṁ vaḥ pratijñātaṁ samāhitāḥ
जो कोई भी दिव्य पाशुपत व्रत का आचरण करेगा, वह पशुत्व से मुक्त हो जायेगा — यह सत्य मैं तुम्हें वचन देता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो।
श्लोक 19 (shiva.rudra.147.19)
ये चाप्यन्ये करिष्यन्ति व्रतं पाशुपतं मम । मोक्ष्यन्ति ते न सन्देहः पशुत्वात्सुरसत्तमाः
ye cāpyanye kariṣyanti vrataṁ pāśupataṁ mama mokṣyanti te na sandehaḥ paśutvātsurasattamāḥ
हे श्रेष्ठ देवगण! जो अन्य कोई भी मेरे पाशुपत व्रत का पालन करेंगे, वे भी पशुत्व से मुक्त हो जायेंगे — इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 20 (shiva.rudra.147.20)
नैष्ठिकं द्वादशाब्दं वा तदर्द्धं वर्षकत्रयम् । शुश्रूषां कारयेद्यस्तु स पशुत्वाद्विमुच्यते
naiṣṭhikaṁ dvādaśābdaṁ vā tadarddhaṁ varṣakatrayam śuśrūṣāṁ kārayedyastu sa paśutvādvimucyate
जो कोई आजीवन, अथवा बारह वर्ष, अथवा उसके आधे (छह वर्ष), या तीन वर्ष तक सेवा-व्रत का पालन करेगा, वह पशुत्व से मुक्त हो जायेगा।
श्लोक 21 (shiva.rudra.147.21)
तस्मात्परमिदं दिव्यं चरिष्यथ सुरोत्तमाः । पशुत्वान्मोक्ष्यथ तदा यूयमत्र न संशयः
tasmātparamidaṁ divyaṁ cariṣyatha surottamāḥ paśutvānmokṣyatha tadā yūyamatra na saṁśayaḥ
अतः हे श्रेष्ठ देवगण! इस परम दिव्य व्रत का आचरण करो, तब तुम पशुत्व से मुक्त हो जाओगे, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 22 (shiva.rudra.147.22)
सनत्कुमार उवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य महेशस्य परात्मनः । तथेति चाब्रुवन्देवा हरिब्रह्मादयस्तथा
sanatkumāra uvāca ityākarṇya vacastasya maheśasya parātmanaḥ tatheti cābruvandevā haribrahmādayastathā
सनत्कुमार ने कहा — परमात्मा महेश के इस वचन को सुनकर हरि, ब्रह्मा आदि सभी देवों ने कहा — 'तथास्तु'।
श्लोक 23 (shiva.rudra.147.23)
तस्माद्वै पशवः सर्वे देवासुरवराः प्रभोः । रुद्रः पशुपतिश्चैव पशुपाशविमोचकः
tasmādvai paśavaḥ sarve devāsuravarāḥ prabhoḥ rudraḥ paśupatiścaiva paśupāśavimocakaḥ
इसीलिए सभी श्रेष्ठ देव और असुर उन प्रभु के पशु कहलाये, और रुद्र पशुपति तथा पशु-पाश से मुक्त करने वाले कहलाये।
श्लोक 24 (shiva.rudra.147.24)
तदा पशुपतीत्येतत्तस्य नाम महेशितुः । प्रसिद्धमभवद् ह्यद्धा सर्वलोकेषु शर्मदम्
tadā paśupatītyetattasya nāma maheśituḥ prasiddhamabhavad hyaddhā sarvalokeṣu śarmadam
तब महेश्वर का यह 'पशुपति' नाम समस्त लोकों में सत्य रूप से प्रसिद्ध हुआ, जो कल्याणकारी है।
श्लोक 25 (shiva.rudra.147.25)
मुदा जयेति भाषन्तः सर्वे देवर्षयस्तदा । अमुदंश्चाति देवेशो ब्रह्मा विष्णुः परेऽपि च
mudā jayeti bhāṣantaḥ sarve devarṣayastadā amudaṁścāti deveśo brahmā viṣṇuḥ pare'pi ca
तब सभी देव और ऋषिगण हर्षपूर्वक 'जय हो' कहते हुए अत्यन्त प्रसन्न हुए, तथा देवेश, ब्रह्मा, विष्णु और अन्य सभी भी हर्षित हुए।
श्लोक 26 (shiva.rudra.147.26)
तस्मिंश्च समये यच्च रूपं तस्य महात्मनः । जातं तद्वर्णितुं शक्यं न हि वर्षशतैरपि
tasmiṁśca samaye yacca rūpaṁ tasya mahātmanaḥ jātaṁ tadvarṇituṁ śakyaṁ na hi varṣaśatairapi
उस समय उस महात्मा (शिव) का जो रूप प्रकट हुआ, उसका वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी सम्भव नहीं है।
श्लोक 27 (shiva.rudra.147.27)
एवंविधो महेशानो महेशान्यखिलेश्वरः । जगाम त्रिपुरं हन्तुं सर्वेषां सुखदायकः
evaṁvidho maheśāno maheśānyakhileśvaraḥ jagāma tripuraṁ hantuṁ sarveṣāṁ sukhadāyakaḥ
इस प्रकार महेशानी (पार्वती) के स्वामी, समस्त जगत् के ईश्वर, सबको सुख देने वाले महेश त्रिपुर का वध करने चले।
श्लोक 28 (shiva.rudra.147.28)
तं देवदेवं त्रिपुरं निहन्तुं तदानु सर्वे तु रविप्रकाशाः । गजैर्हयैस्सिंहवरै रथैश्च वृषैर्ययुस्तेऽमरराजमुख्याः
taṁ devadevaṁ tripuraṁ nihantuṁ tadānu sarve tu raviprakāśāḥ gajairhayaissiṁhavarai rathaiśca vṛṣairyayuste'mararājamukhyāḥ
उस त्रिपुर-नाशक देवदेव के पीछे, सूर्य के समान तेजस्वी वे सभी अमरराज-प्रमुख देवगण हाथियों, घोड़ों, श्रेष्ठ सिंहों, रथों तथा बैलों पर सवार होकर चले।
श्लोक 29 (shiva.rudra.147.29)
हलैश्च शालैर्मुशलैर्भुशुण्डै- र्गिरीन्द्रकल्पैर्गिरिसन्निभाश्च । नानायुधैः संयुतबाहवस्ते ततो नु हृष्टाः प्रययुः सुरेशाः
halaiśca śālairmuśalairbhuśuṇḍai- rgirīndrakalpairgirisannibhāśca nānāyudhaiḥ saṁyutabāhavaste tato nu hṛṣṭāḥ prayayuḥ sureśāḥ
हल, शाल (भाले), मूसल तथा भुशुण्डी आदि विविध शस्त्रों से युक्त, पर्वतों के समान विशालकाय वे देवेश्वर हर्षित होकर आगे बढ़े।
श्लोक 30 (shiva.rudra.147.30)
नानायुधाढ्याः परमप्रकाशा महोत्सवाः शम्भुजयं वदन्तः । ययुः पुरस्तस्य महेश्वरस्य तदेन्द्रपद्मोद्भवविष्णुमुख्याः
nānāyudhāḍhyāḥ paramaprakāśā mahotsavāḥ śambhujayaṁ vadantaḥ yayuḥ purastasya maheśvarasya tadendrapadmodbhavaviṣṇumukhyāḥ
विविध शस्त्रों से सम्पन्न, परम तेजोमय, महोत्सव में मग्न, शम्भु की जय बोलते हुए इन्द्र, पद्मोद्भव (ब्रह्मा), विष्णु आदि प्रमुख उस महेश्वर के आगे-आगे चले।
श्लोक 31 (shiva.rudra.147.31)
जहृषुर्मुनयः सर्वे दण्डहस्ता जटाधराः । ववृषुः पुष्पवर्षाणि खेचरास्सिद्धचारणाः
jahṛṣurmunayaḥ sarve daṇḍahastā jaṭādharāḥ vavṛṣuḥ puṣpavarṣāṇi khecarāssiddhacāraṇāḥ
दण्डधारी, जटाधारी सभी मुनिगण हर्षित हुए; आकाशचारी सिद्ध एवं चारणों ने पुष्पवर्षा की।
श्लोक 32 (shiva.rudra.147.32)
पुरत्रयं च विप्रेन्द्र व्रजन्सर्वे गणेश्वराः । तेषां सङ्ख्या च कः कर्तुं समर्थो वच्मि कांश्चन
puratrayaṁ ca viprendra vrajansarve gaṇeśvarāḥ teṣāṁ saṅkhyā ca kaḥ kartuṁ samartho vacmi kāṁścana
हे विप्रेन्द्र! सभी गणेश्वर उन तीनों नगरों की ओर चले। उनकी गिनती कौन कर सकता है? मैं कुछ के नाम बताता हूँ।
श्लोक 33 (shiva.rudra.147.33)
गणेश्वरैर्देवगणैश्च भृङ्गी समावृतः सर्वगणेन्द्रवर्यः । जगाम योगांस्त्रिपुरं निहन्तुं विमानमारुह्य यथा महेन्द्रः
gaṇeśvarairdevagaṇaiśca bhṛṅgī samāvṛtaḥ sarvagaṇendravaryaḥ jagāma yogāṁstripuraṁ nihantuṁ vimānamāruhya yathā mahendraḥ
गणेश्वरों तथा देवगणों से घिरे हुए, सभी गणेन्द्रों में श्रेष्ठ भृंगी विमान पर आरूढ़ होकर योगबल से त्रिपुर का वध करने ऐसे चले जैसे महेन्द्र चलते हैं।
श्लोक 34 (shiva.rudra.147.34)
केशो विगतवासश्च महाकेशो महाज्वरः । सोमवल्लीसवर्णश्च सोमपः सनकस्तथा
keśo vigatavāsaśca mahākeśo mahājvaraḥ somavallīsavarṇaśca somapaḥ sanakastathā
केश, विगतवास, महाकेश, महाज्वर, सोमवल्लीसवर्ण, सोमप तथा सनक —
श्लोक 35 (shiva.rudra.147.35)
सोमधृक् सूर्यवर्चाश्च सूर्यप्रेषणकस्तथा । सूर्याक्षः सूरिनामा च सुरः सुन्दर एव च
somadhṛk sūryavarcāśca sūryapreṣaṇakastathā sūryākṣaḥ sūrināmā ca suraḥ sundara eva ca
सोमधृक्, सूर्यवर्चा, सूर्यप्रेषणक, सूर्याक्ष, सूरिनामा, सुर तथा सुन्दर —
श्लोक 36 (shiva.rudra.147.36)
प्रस्कन्दः कुन्दरश्चण्डः कम्पनश्चातिकम्पनः । इन्द्रश्चेन्द्रजवश्चैव यन्ता हिमकरस्तथा
praskandaḥ kundaraścaṇḍaḥ kampanaścātikampanaḥ indraścendrajavaścaiva yantā himakarastathā
प्रस्कन्द, कुन्दर, चण्ड, कम्पन, अतिकम्पन, इन्द्र, इन्द्रजव, यन्ता तथा हिमकर —
श्लोक 37 (shiva.rudra.147.37)
शताक्षश्चैव पञ्चाक्षः सहस्राक्षो महोदरः । सतीजुहः शतास्यश्च रङ्कः कर्पूरपूतनः
śatākṣaścaiva pañcākṣaḥ sahasrākṣo mahodaraḥ satījuhaḥ śatāsyaśca raṅkaḥ karpūrapūtanaḥ
शताक्ष, पंचाक्ष, सहस्राक्ष, महोदर, सतीजुह, शतास्य, रंक तथा कर्पूरपूतन —
श्लोक 38 (shiva.rudra.147.38)
द्विशिखस्त्रिशिखश्चैव तथाहङ्कारकारकः । अजवक्त्रोऽष्टवक्त्रश्च हयवक्त्रोऽर्द्धवक्त्रकः
dviśikhastriśikhaścaiva tathāhaṅkārakārakaḥ ajavaktro'ṣṭavaktraśca hayavaktro'rddhavaktrakaḥ
द्विशिख, त्रिशिख, अहंकारकारक, अजवक्त्र, अष्टवक्त्र, हयवक्त्र तथा अर्धवक्त्रक —
श्लोक 39 (shiva.rudra.147.39)
इत्याद्या गणपा वीरा बहवोऽपरिमेयकाः । प्रययुः परिवार्येशं लक्ष्यलक्षणवर्जिताः
ityādyā gaṇapā vīrā bahavo'parimeyakāḥ prayayuḥ parivāryeśaṁ lakṣyalakṣaṇavarjitāḥ
ये तथा अन्य अनेक अगणित, चिह्न और माप से परे, वीर गणनायक स्वामी को घेरकर आगे बढ़े।
श्लोक 40 (shiva.rudra.147.40)
समावृत्य महादेवं तदापुस्ते पिनाकिनम् । दग्धुं समर्था मनसा क्षणेन सचराचरम्
samāvṛtya mahādevaṁ tadāpuste pinākinam dagdhuṁ samarthā manasā kṣaṇena sacarācaram
पिनाकधारी महादेव को घेरकर वे वहाँ पहुँचे — वे सभी ऐसे समर्थ थे कि क्षणभर में मन मात्र से सम्पूर्ण चराचर जगत् को भस्म कर सकते थे।
श्लोक 41 (shiva.rudra.147.41)
दग्धुं जगत्सर्वमिदं समर्थाः किं त्वत्र दग्धुं त्रिपुरं पिनाकी । रथेन किं चात्र शरेण तस्य गणैश्च किं देवगणैश्च शम्भोः
dagdhuṁ jagatsarvamidaṁ samarthāḥ kiṁ tvatra dagdhuṁ tripuraṁ pinākī rathena kiṁ cātra śareṇa tasya gaṇaiśca kiṁ devagaṇaiśca śambhoḥ
वे सम्पूर्ण जगत् को भस्म करने में समर्थ थे — फिर यहाँ त्रिपुर को जलाना कौन बड़ी बात थी? तो फिर पिनाकधारी शम्भु को यहाँ रथ की, उनके बाण की, गणों की अथवा देवगणों की क्या आवश्यकता थी?
श्लोक 42 (shiva.rudra.147.42)
स एव दग्धुं त्रिपुराणि तानि देवद्विषां व्यास पिनाकपाणिः । स्वयं गतस्तत्र गणैश्च सार्द्धं निजैस्सुराणामपि सोऽद्भुतोतिः
sa eva dagdhuṁ tripurāṇi tāni devadviṣāṁ vyāsa pinākapāṇiḥ svayaṁ gatastatra gaṇaiśca sārddhaṁ nijaissurāṇāmapi so'dbhutotiḥ
हे व्यास! उस पिनाकपाणि ने स्वयं ही अपने गणों तथा देवताओं के साथ जाकर देवद्वेषियों के उन तीनों नगरों को जलाया — उनका यह आचरण भी अद्भुत ही था।
श्लोक 43 (shiva.rudra.147.43)
किं तत्र कारणं चान्यद्वच्मि ते ऋषिसत्तम । लोकेषु ख्यापनार्थं वै यशः परमलापहम्
kiṁ tatra kāraṇaṁ cānyadvacmi te ṛṣisattama lokeṣu khyāpanārthaṁ vai yaśaḥ paramalāpaham
हे ऋषिसत्तम! मैं तुम्हें इसका अन्य कारण भी बताता हूँ — यह लोकों में उनके परम निर्मल यश को प्रकट करने के लिए था।
श्लोक 44 (shiva.rudra.147.44)
अन्यच्च कारणं ह्येतद्दुष्टानां प्रत्ययाय वै । सर्वेष्वपि च देवेषु यस्मान्नान्यो विशिष्यते
anyacca kāraṇaṁ hyetadduṣṭānāṁ pratyayāya vai sarveṣvapi ca deveṣu yasmānnānyo viśiṣyate
और इसका एक अन्य कारण यह भी था कि दुष्टों को यह विश्वास हो कि सभी देवों में उनसे बढ़कर अन्य कोई नहीं है।