रुद्र संहिता · अध्याय 149
देव-स्तुति वर्णन
श्लोक 1 (shiva.rudra.149.1)
व्यास उवाच । ब्रह्मपुत्र महाप्राज्ञ धन्यस्त्वं शैवसत्तम । किमकार्षुस्ततो देवा दग्धे च त्रिपुरेऽखिलाः
vyāsa uvāca brahmaputra mahāprājña dhanyastvaṁ śaivasattama kimakārṣustato devā dagdhe ca tripure'khilāḥ
व्यास ने कहा — हे ब्रह्मपुत्र! हे महाप्राज्ञ! हे शैवश्रेष्ठ! आप धन्य हैं। त्रिपुर के सम्पूर्ण दग्ध हो जाने पर तब देवताओं ने क्या किया?
श्लोक 2 (shiva.rudra.149.2)
मयः कुत्र गतोऽदग्धो यतयः कुत्र ते गताः । तत्सर्वं मे समाचक्ष्व यदि शम्भुकथाश्रयम्
mayaḥ kutra gato'dagdho yatayaḥ kutra te gatāḥ tatsarvaṁ me samācakṣva yadi śambhukathāśrayam
मय अदग्ध होकर कहाँ गये? वे यति (तपस्वी) कहाँ गये? यदि यह शम्भु की कथा का अंश हो तो यह सब मुझे बताइये।
श्लोक 3 (shiva.rudra.149.3)
सूत उवाच । व्यासवाक्यं समाकर्ण्य भगवान्भवकृत्सुतः । सनत्कुमारः प्रोवाच शिवपादयुगं स्मरन्
sūta uvāca vyāsavākyaṁ samākarṇya bhagavānbhavakṛtsutaḥ sanatkumāraḥ provāca śivapādayugaṁ smaran
सूत ने कहा — व्यास के वचन सुनकर भगवान् ब्रह्मा-पुत्र सनत्कुमार ने शिव के चरण-युगल का स्मरण करते हुए कहा।
श्लोक 4 (shiva.rudra.149.4)
सनत्कुमार उवाच । शृणु व्यास महाबुद्धे पाराशर्य्य महेशितुः । चरितं सर्वपापघ्नं लोकलीलानुसारिणः
sanatkumāra uvāca śṛṇu vyāsa mahābuddhe pārāśaryya maheśituḥ caritaṁ sarvapāpaghnaṁ lokalīlānusāriṇaḥ
सनत्कुमार ने कहा — हे महाबुद्धे पाराशर्य व्यास! सुनो, समस्त पापों का नाश करने वाले, लोकलीला के अनुसार आचरण करने वाले महेश्वर का चरित्र।
श्लोक 5 (shiva.rudra.149.5)
महेश्वरेण सर्वस्मिंस्त्रिपुरे दैत्यसङ्कुले । दग्धे विशेषतस्तत्र विस्मितास्तेऽभवन्सुराः
maheśvareṇa sarvasmiṁstripure daityasaṅkule dagdhe viśeṣatastatra vismitāste'bhavansurāḥ
जब महेश्वर ने दैत्यों से भरे उस सम्पूर्ण त्रिपुर को जला दिया, तब वहाँ देवगण अत्यन्त विस्मित हो गये।
श्लोक 6 (shiva.rudra.149.6)
न किञ्चिदब्रुवन्देवाः सेन्द्रोपेन्द्रादयस्तदा । महातेजस्विनं रुद्रं सर्वे वीक्ष्य ससम्भ्रमाः
na kiñcidabruvandevāḥ sendropendrādayastadā mahātejasvinaṁ rudraṁ sarve vīkṣya sasambhramāḥ
इन्द्र और उपेन्द्र आदि देवगण तब कुछ भी न बोले, सभी उस महातेजस्वी रुद्र को घबराहट भरी दृष्टि से देखते रहे।
श्लोक 7 (shiva.rudra.149.7)
महाभयङ्करं रौद्रं प्रज्वलन्तं दिशो दश । कोटिसूर्यप्रतीकाशं प्रलयानलसन्निभम्
mahābhayaṅkaraṁ raudraṁ prajvalantaṁ diśo daśa koṭisūryapratīkāśaṁ pralayānalasannibham
वे अत्यन्त भयंकर, रौद्र, दसों दिशाओं में प्रज्वलित, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी, प्रलयाग्नि के समान थे।
श्लोक 8 (shiva.rudra.149.8)
भयाद्देवं निरीक्ष्यैव देवीं च हिमवत्सुताम् । बिभ्यिरे निखिला देवप्रमुखास्तस्थुरानताः
bhayāddevaṁ nirīkṣyaiva devīṁ ca himavatsutām bibhyire nikhilā devapramukhāstasthurānatāḥ
उस देव तथा हिमवत्पुत्री देवी को देखकर ही भय से सभी प्रमुख देवगण काँप उठे और नतमस्तक खड़े हो गये।
श्लोक 9 (shiva.rudra.149.9)
दृष्ट्वानीकं तदा भीतं देवानामृषिपुङ्गवाः । न किञ्चिदूचुः सन्तस्थुः प्रणेमुस्ते समन्ततः
dṛṣṭvānīkaṁ tadā bhītaṁ devānāmṛṣipuṅgavāḥ na kiñcidūcuḥ santasthuḥ praṇemuste samantataḥ
देवताओं की उस भयभीत सेना को देखकर श्रेष्ठ ऋषिगण भी कुछ न बोले, वे चुपचाप खड़े रहे और चारों ओर से प्रणाम करने लगे।
श्लोक 10 (shiva.rudra.149.10)
अथ ब्रह्मापि सम्भीतो दृष्ट्वा रूपं च शाङ्करम् । तुष्टाव तुष्टहृदयो देवैः सह समाहितः
atha brahmāpi sambhīto dṛṣṭvā rūpaṁ ca śāṅkaram tuṣṭāva tuṣṭahṛdayo devaiḥ saha samāhitaḥ
तब ब्रह्मा जी भी शंकर के उस रूप को देखकर भयभीत हुए, परन्तु प्रसन्न हृदय से देवताओं के साथ एकाग्रचित्त होकर उनकी स्तुति करने लगे।
श्लोक 11 (shiva.rudra.149.11)
विष्णुना च सभीतेन देवदेवं भवं हरम् । त्रिपुरारिं सगिरिजं भक्ताधीनं महेश्वरम्
viṣṇunā ca sabhītena devadevaṁ bhavaṁ haram tripurāriṁ sagirijaṁ bhaktādhīnaṁ maheśvaram
तथा भयभीत विष्णु ने भी उन देवदेव भव हर को, त्रिपुरारि को, गिरिजा-सहित महेश्वर को, जो भक्तों के अधीन रहते हैं —
श्लोक 12 (shiva.rudra.149.12)
ब्रह्मोवाच । देवदेव महादेव भक्तानुग्रहकारक । प्रसीद परमेशान सर्वदेवहितप्रद
brahmovāca devadeva mahādeva bhaktānugrahakāraka prasīda parameśāna sarvadevahitaprada
ब्रह्मा ने कहा — हे देवदेव महादेव! हे भक्तों पर अनुग्रह करने वाले! हे परमेशान! हे सर्वदेवहितप्रद! प्रसन्न होइये।
श्लोक 13 (shiva.rudra.149.13)
प्रसीद जगतां नाथ प्रसीदानन्ददायक । प्रसीद शङ्कर स्वामिन् प्रसीद परमेश्वर
prasīda jagatāṁ nātha prasīdānandadāyaka prasīda śaṅkara svāmin prasīda parameśvara
हे जगन्नाथ! प्रसन्न होइये। हे आनन्ददायक! प्रसन्न होइये। हे स्वामी शंकर! प्रसन्न होइये। हे परमेश्वर! प्रसन्न होइये।
श्लोक 14 (shiva.rudra.149.14)
ओङ्काराय नमस्तुभ्यमाकारपरतारक । प्रसीद सर्वदेवेश त्रिपुरघ्न महेश्वर
oṅkārāya namastubhyamākāraparatāraka prasīda sarvadeveśa tripuraghna maheśvara
हे ओंकारस्वरूप! हे आकार से परे तारक! आपको नमस्कार है। हे सर्वदेवेश! हे त्रिपुरघ्न! हे महेश्वर! प्रसन्न होइये।
श्लोक 15 (shiva.rudra.149.15)
नानावाच्याय देवाय प्रणतप्रिय शङ्कर । अगुणाय नमस्तुभ्यं प्रकृतेः पुरुषात्पर
nānāvācyāya devāya praṇatapriya śaṅkara aguṇāya namastubhyaṁ prakṛteḥ puruṣātpara
हे नाना नामों से कहे जाने वाले देव! हे प्रणतप्रिय शंकर! हे प्रकृति और पुरुष से परे, गुणरहित! आपको नमस्कार है।
श्लोक 16 (shiva.rudra.149.16)
निर्विकाराय नित्याय नित्यतृप्ताय भास्वते । निरञ्जनाय दिव्याय त्रिगुणाय नमोऽस्तु ते
nirvikārāya nityāya nityatṛptāya bhāsvate nirañjanāya divyāya triguṇāya namo'stu te
हे निर्विकार! हे नित्य! हे नित्यतृप्त! हे भास्वान्! हे निरञ्जन! हे दिव्य! हे त्रिगुणस्वरूप! आपको नमस्कार है।
श्लोक 17 (shiva.rudra.149.17)
सगुणाय नमस्तुभ्यं स्वर्गेशाय नमोस्तु ते । सदाशिवाय शान्ताय महेशाय पिनाकिने
saguṇāya namastubhyaṁ svargeśāya namostu te sadāśivāya śāntāya maheśāya pinākine
हे सगुण! आपको नमस्कार है। हे स्वर्गेश! आपको नमस्कार है। हे सदाशिव! हे शान्त! हे महेश! हे पिनाकिन्! नमस्कार।
श्लोक 18 (shiva.rudra.149.18)
सर्वज्ञाय शरण्याय सद्योजाताय ते नमः । वामदेवाय रुद्राय तदाप्यपुरुषाय च
sarvajñāya śaraṇyāya sadyojātāya te namaḥ vāmadevāya rudrāya tadāpyapuruṣāya ca
हे सर्वज्ञ! हे शरण्य! हे सद्योजात! आपको नमस्कार है। हे वामदेव! हे रुद्र! हे तत्पुरुष! आपको नमस्कार है।
श्लोक 19 (shiva.rudra.149.19)
अघोराय सुसेव्याय भक्ताधीनाय ते नमः । ईशानाय वरेण्याय भक्तानन्दप्रदायिने
aghorāya susevyāya bhaktādhīnāya te namaḥ īśānāya vareṇyāya bhaktānandapradāyine
हे अघोर! हे सुसेव्य! हे भक्ताधीन! आपको नमस्कार है। हे ईशान! हे वरेण्य! हे भक्तानन्दप्रदायी! नमस्कार।
श्लोक 20 (shiva.rudra.149.20)
रक्ष रक्ष महादेव भीतान्नः सकलामरान् । दग्ध्वा च त्रिपुरं सर्वे कृतार्था अमराः कृताः
rakṣa rakṣa mahādeva bhītānnaḥ sakalāmarān dagdhvā ca tripuraṁ sarve kṛtārthā amarāḥ kṛtāḥ
हे महादेव! भयभीत हम सभी अमरों की रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। त्रिपुर को जलाकर आपने सभी अमरों को कृतार्थ कर दिया है।
श्लोक 21 (shiva.rudra.149.21)
स्तुत्वैवं देवताःसर्वे नमस्कारं पृथक्पृथक् । चक्रुस्ते परमप्रीता ब्रह्माद्यास्तु सदाशिवम्
stutvaivaṁ devatāḥsarve namaskāraṁ pṛthakpṛthak cakruste paramaprītā brahmādyāstu sadāśivam
इस प्रकार स्तुति करके, ब्रह्मा आदि सभी देवगण अत्यन्त प्रसन्न होकर सदाशिव को अलग-अलग प्रणाम करने लगे।
श्लोक 22 (shiva.rudra.149.22)
अथ ब्रह्मा स्वयं देवं त्रिपुरारिं महेश्वरम् । तुष्टाव प्रणतो भूत्वा नतस्कन्धः कृताञ्जलिः
atha brahmā svayaṁ devaṁ tripurāriṁ maheśvaram tuṣṭāva praṇato bhūtvā nataskandhaḥ kṛtāñjaliḥ
तब ब्रह्मा जी स्वयं झुककर, कंधे नवाकर, हाथ जोड़कर, त्रिपुरारि महेश्वर देव की स्तुति करने लगे।
श्लोक 23 (shiva.rudra.149.23)
ब्रह्मोवाच । भगवन्देवदेवेश त्रिपुरान्तक शङ्कर । त्वयि भक्तिः परा मेऽस्तु महादेवानपायिनी
brahmovāca bhagavandevadeveśa tripurāntaka śaṅkara tvayi bhaktiḥ parā me'stu mahādevānapāyinī
ब्रह्मा ने कहा — हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्रिपुरान्तक शंकर! हे महादेव! आपमें मेरी परम भक्ति अविनाशी बनी रहे।
श्लोक 24 (shiva.rudra.149.24)
सर्वदा मेऽस्तु सारथ्यं तव देवेश शङ्कर । अनुकूलो भव विभो सदा त्वं परमेश्वर
sarvadā me'stu sārathyaṁ tava deveśa śaṅkara anukūlo bhava vibho sadā tvaṁ parameśvara
हे देवेश शंकर! सदा आपका सारथ्य मुझे प्राप्त हो। हे विभो! हे परमेश्वर! आप सदैव अनुकूल रहें।
श्लोक 25 (shiva.rudra.149.25)
सनत्कुमार उवाच । इति स्तुत्वा विधिः शम्भुं भक्तवत्सलमानतः । विरराम नतस्कन्धः कृताञ्जलिरुदारधीः
sanatkumāra uvāca iti stutvā vidhiḥ śambhuṁ bhaktavatsalamānataḥ virarāma nataskandhaḥ kṛtāñjalirudāradhīḥ
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार भक्तवत्सल शम्भु की स्तुति करके, उदार बुद्धि वाले ब्रह्मा जी नतमस्तक और हाथ जोड़े हुए मौन हो गये।
श्लोक 26 (shiva.rudra.149.26)
जनार्दनोऽपि भगवान् नमस्कृत्य महेश्वरम् । कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तुष्टाव च महेश्वरम्
janārdano'pi bhagavān namaskṛtya maheśvaram kṛtāñjalipuṭo bhūtvā tuṣṭāva ca maheśvaram
भगवान् जनार्दन (विष्णु) ने भी महेश्वर को नमस्कार करके, हाथ जोड़कर महेश्वर की स्तुति की।
श्लोक 27 (shiva.rudra.149.27)
विष्णुरुवाच । देवाधीश महेशान दीनबन्धो कृपाकर । प्रसीद परमेशान कृपां कुरु नतप्रिय
viṣṇuruvāca devādhīśa maheśāna dīnabandho kṛpākara prasīda parameśāna kṛpāṁ kuru natapriya
विष्णु ने कहा — हे देवाधीश! हे महेश! हे दीनबन्धु! हे कृपाकर! हे परमेशान! प्रसन्न होइये। हे नतप्रिय! कृपा कीजिये।
श्लोक 28 (shiva.rudra.149.28)
निर्गुणाय नमस्तुभ्यं पुनश्च सगुणाय च । पुनः प्रकृतिरूपाय पुनश्च पुरुषाय च
nirguṇāya namastubhyaṁ punaśca saguṇāya ca punaḥ prakṛtirūpāya punaśca puruṣāya ca
हे निर्गुण! आपको नमस्कार है, और पुनः हे सगुण! हे प्रकृतिरूप! पुनः हे पुरुष! आपको नमस्कार है।
श्लोक 29 (shiva.rudra.149.29)
पश्चाद् गुणस्वरूपाय नतो विश्वात्मने नमः । भक्तिप्रियाय शान्ताय शिवाय परमात्मने
paścād guṇasvarūpāya nato viśvātmane namaḥ bhaktipriyāya śāntāya śivāya paramātmane
तथा तदुपरान्त गुणस्वरूप, विश्वात्मा को नमस्कार है; भक्तिप्रिय, शान्त, शिव, परमात्मा को नमस्कार है।
श्लोक 30 (shiva.rudra.149.30)
सदाशिवाय रुद्राय जगतां पतये नमः । त्वयि भक्तिर्दृढा मेऽद्य वर्द्धमाना भवत्विति
sadāśivāya rudrāya jagatāṁ pataye namaḥ tvayi bhaktirdṛḍhā me'dya varddhamānā bhavatviti
हे सदाशिव! हे रुद्र! हे जगत्पते! आपको नमस्कार है। आज से मेरी आपमें दृढ़ भक्ति उत्तरोत्तर बढ़ती रहे।
श्लोक 31 (shiva.rudra.149.31)
सनत्कुमार उवाच । इत्युक्त्वा विररामासौ शैवप्रवरसत्तमः । सर्वे देवाः प्रणम्योचुस्ततस्तं परमेश्वरम्
sanatkumāra uvāca ityuktvā virarāmāsau śaivapravarasattamaḥ sarve devāḥ praṇamyocustatastaṁ parameśvaram
सनत्कुमार ने कहा — यह कहकर वह शैवश्रेष्ठ (विष्णु) मौन हो गये। तब सभी देवगण उन परमेश्वर को प्रणाम करके बोले।
श्लोक 32 (shiva.rudra.149.32)
देवा ऊचुः । देवनाथ महादेव करुणाकर शङ्कर । प्रसीद जगतां नाथ प्रसीद परमेश्वर
devā ūcuḥ devanātha mahādeva karuṇākara śaṅkara prasīda jagatāṁ nātha prasīda parameśvara
देवताओं ने कहा — हे देवनाथ! हे महादेव! हे करुणाकर! हे शंकर! प्रसन्न होइये। हे जगन्नाथ! हे परमेश्वर! प्रसन्न होइये।
श्लोक 33 (shiva.rudra.149.33)
प्रसीद सर्वकर्ता त्वं नमामस्त्वां वयं मुदा । त्वयि भक्तिर्दृढास्माकं नित्यं स्यादनपायिनी
prasīda sarvakartā tvaṁ namāmastvāṁ vayaṁ mudā tvayi bhaktirdṛḍhāsmākaṁ nityaṁ syādanapāyinī
प्रसन्न होइये, आप ही सबके कर्ता हैं। हम हर्षपूर्वक आपको नमन करते हैं। आपमें हमारी दृढ़ भक्ति सदा अविनाशी बनी रहे।
श्लोक 34 (shiva.rudra.149.34)
सनत्कुमार उवाच । इति स्तुतश्च देवेशो ब्रह्मणा हरिणामरैः । प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा शङ्करो लोकशङ्करः
sanatkumāra uvāca iti stutaśca deveśo brahmaṇā hariṇāmaraiḥ pratyuvāca prasannātmā śaṅkaro lokaśaṅkaraḥ
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु तथा अन्य देवताओं द्वारा स्तुति किये गये लोकशंकर देवेश शंकर ने प्रसन्नचित्त होकर उत्तर दिया।
श्लोक 35 (shiva.rudra.149.35)
शङ्कर उवाच । हे विधे हे हरे देवाः प्रसन्नोऽस्मि विशेषतः । मनोऽभिलषितं ब्रूत वरं सर्वे विचारतः
śaṅkara uvāca he vidhe he hare devāḥ prasanno'smi viśeṣataḥ mano'bhilaṣitaṁ brūta varaṁ sarve vicārataḥ
शंकर ने कहा — हे विधे! हे हरे! हे देवगण! मैं विशेष रूप से प्रसन्न हूँ। तुम सब भलीभाँति विचार करके अपने मनोवांछित वर को बताओ।
श्लोक 36 (shiva.rudra.149.36)
सनत्कुमारः उवाच । इत्युक्तं वचनं श्रुत्वा हरेण मुनिसत्तम । प्रत्यूचुः सर्वदेवाश्च प्रसन्नेनान्तरात्मना
sanatkumāraḥ uvāca ityuktaṁ vacanaṁ śrutvā hareṇa munisattama pratyūcuḥ sarvadevāśca prasannenāntarātmanā
सनत्कुमार ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! हर के इस वचन को सुनकर सभी देवगण प्रसन्न अन्तरात्मा से उत्तर देने लगे।
श्लोक 37 (shiva.rudra.149.37)
सर्वे देवा ऊचुः । यदि प्रसन्नो भगवन्यदि देयो वरस्त्वया । देवदेवेश चास्मभ्यं ज्ञात्वा दासान्हि नः सुरान्
sarve devā ūcuḥ yadi prasanno bhagavanyadi deyo varastvayā devadeveśa cāsmabhyaṁ jñātvā dāsānhi naḥ surān
सभी देवताओं ने कहा — हे भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि आप वर देने वाले हैं, तो हे देवदेवेश! हमें अपना दास जानकर —
श्लोक 38 (shiva.rudra.149.38)
यदा दुःखं तु देवानां सम्भवेद्देवसत्तम । तदा त्वं प्रकटो भूत्वा दुःखं नाशय सर्वदा
yadā duḥkhaṁ tu devānāṁ sambhaveddevasattama tadā tvaṁ prakaṭo bhūtvā duḥkhaṁ nāśaya sarvadā
हे देवश्रेष्ठ! जब भी देवताओं पर दुःख आये, तब आप प्रकट होकर सदा उस दुःख का नाश करें।
श्लोक 39 (shiva.rudra.149.39)
सनत्कुमार उवाच । इत्युक्तो भगवान् रुद्रो ब्रह्मणा हरिणामरैः । युगपत्प्राह तुष्टात्मा तथेत्यस्तु निरन्तरम्
sanatkumāra uvāca ityukto bhagavān rudro brahmaṇā hariṇāmaraiḥ yugapatprāha tuṣṭātmā tathetyastu nirantaram
सनत्कुमार ने कहा — ब्रह्मा, विष्णु तथा देवताओं द्वारा एक साथ यह कहे जाने पर, प्रसन्नचित्त भगवान् रुद्र ने कहा — 'ऐसा ही सदा हो।'
श्लोक 40 (shiva.rudra.149.40)
स्तवैरेतैश्च तुष्टोऽस्मि दास्यामि सर्वदा ध्रुवम् । यदभीष्टतमं लोके पठतां शृण्वतां सुराः
stavairetaiśca tuṣṭo'smi dāsyāmi sarvadā dhruvam yadabhīṣṭatamaṁ loke paṭhatāṁ śṛṇvatāṁ surāḥ
इन स्तवों से मैं प्रसन्न हूँ। हे सुरगण! जो कोई इस कथा को लोक में पढ़ेगा या सुनेगा, उसे मैं सदा उसका अभीष्टतम फल निश्चय ही दूँगा।
श्लोक 41 (shiva.rudra.149.41)
इत्युक्त्वा शङ्करः प्रीतो देवदुःखहरः सदा । सर्वदेवप्रियं यद्वै तत्सर्वं च प्रदत्तवान्
ityuktvā śaṅkaraḥ prīto devaduḥkhaharaḥ sadā sarvadevapriyaṁ yadvai tatsarvaṁ ca pradattavān
यह कहकर सदा देवताओं के दुःख को हरने वाले प्रसन्नचित्त शंकर ने सभी देवताओं को जो कुछ भी प्रिय था, वह सब प्रदान कर दिया।