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रुद्र संहिता · अध्याय 150

मय-स्तुति एवं देवताओं का प्रस्थान

अध्याय 149अध्याय-सूचीअध्याय 151

श्लोक 1 (shiva.rudra.150.1)

सनत्कुमार उवाच । एतस्मिन्नन्तरे शम्भुं प्रसन्नं वीक्ष्य दानवः । तत्राजगाम सुप्रीतो मयोऽदग्धः कृपाबलात्

sanatkumāra uvāca etasminnantare śambhuṁ prasannaṁ vīkṣya dānavaḥ tatrājagāma suprīto mayo'dagdhaḥ kṛpābalāt

सनत्कुमार ने कहा — इसी बीच शम्भु को प्रसन्न देखकर, कृपा के बल से अदग्ध रहा दानव मय अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ आया।

श्लोक 2 (shiva.rudra.150.2)

प्रणनाम हरं प्रीत्या सुरानन्यानपि ध्रुवम् । कृताञ्जलिर्नतस्कन्धः प्रणनाम पुनस्शिवम्

praṇanāma haraṁ prītyā surānanyānapi dhruvam kṛtāñjalirnataskandhaḥ praṇanāma punasśivam

उसने प्रेमपूर्वक हर को तथा निश्चय ही अन्य देवों को भी प्रणाम किया; फिर हाथ जोड़कर, कंधे झुकाकर पुनः शिव को प्रणाम किया।

श्लोक 3 (shiva.rudra.150.3)

अथोत्थाय शिवं दृष्ट्वा प्रेम्णा गद्गदसुस्वरः । तुष्टाव भक्तिपूर्णात्मा स दानववरो मयः

athotthāya śivaṁ dṛṣṭvā premṇā gadgadasusvaraḥ tuṣṭāva bhaktipūrṇātmā sa dānavavaro mayaḥ

तत्पश्चात् उठकर, शिव को देखकर, प्रेम से गद्गद स्वर में, भक्तिपूर्ण हृदय वाले उस श्रेष्ठ दानव मय ने स्तुति की।

श्लोक 4 (shiva.rudra.150.4)

मय उवाच । देवदेव महादेव भक्तवत्सल शङ्कर । कल्पवृक्षस्वरूपोऽसि सर्वपक्षविवर्जितः

maya uvāca devadeva mahādeva bhaktavatsala śaṅkara kalpavṛkṣasvarūpo'si sarvapakṣavivarjitaḥ

मय ने कहा — हे देवदेव महादेव! हे भक्तवत्सल शंकर! आप कल्पवृक्षस्वरूप हैं, सभी पक्षपातों से रहित हैं।

श्लोक 5 (shiva.rudra.150.5)

ज्योतीरूपो नमस्तेऽस्तु विश्वरूप नमोऽस्तु ते । नमः पूतात्मने तुभ्यं पावनाय नमो नमः

jyotīrūpo namaste'stu viśvarūpa namo'stu te namaḥ pūtātmane tubhyaṁ pāvanāya namo namaḥ

हे ज्योतिरूप! आपको नमस्कार हो। हे विश्वरूप! आपको नमस्कार हो। हे पूतात्मन्! आपको नमस्कार है। हे पावन! बारम्बार नमस्कार है।

श्लोक 6 (shiva.rudra.150.6)

चित्ररूपाय नित्याय रूपातीताय ते नमः । दिव्यरूपाय दिव्याय सुदिव्याकृतये नमः

citrarūpāya nityāya rūpātītāya te namaḥ divyarūpāya divyāya sudivyākṛtaye namaḥ

हे चित्ररूप! हे नित्य! हे रूपातीत! आपको नमस्कार है। हे दिव्यरूप! हे दिव्य! हे सुदिव्याकृति! नमस्कार है।

श्लोक 7 (shiva.rudra.150.7)

नमः प्रणतसर्वार्तिनाशकाय शिवात्मने । कर्त्रे भर्त्रे च संहर्त्रे त्रिलोकानां नमो नमः

namaḥ praṇatasarvārtināśakāya śivātmane kartre bhartre ca saṁhartre trilokānāṁ namo namaḥ

हे प्रणतों की समस्त पीड़ा नष्ट करने वाले शिवात्मन्! नमस्कार है। हे त्रिलोकों के कर्ता, भर्ता और संहर्ता! बारम्बार नमस्कार है।

श्लोक 8 (shiva.rudra.150.8)

भक्तिगम्याय भक्तानां नमस्तुभ्यं कृपालवे । तपःसत्फलदात्रे ते शिवाकान्त शिवेश्वर

bhaktigamyāya bhaktānāṁ namastubhyaṁ kṛpālave tapaḥsatphaladātre te śivākānta śiveśvara

भक्तों की भक्ति से ही प्राप्य, हे कृपालु! आपको नमस्कार है। हे शिवाकान्त! हे शिवेश्वर! तप के सत्फल के दाता आप ही हैं।

श्लोक 9 (shiva.rudra.150.9)

न जानामि स्तुतिं कर्तुं स्तुतिप्रिय परेश्वर । प्रसन्नो भव सर्वेश पाहि मां शरणागतम्

na jānāmi stutiṁ kartuṁ stutipriya pareśvara prasanno bhava sarveśa pāhi māṁ śaraṇāgatam

हे स्तुतिप्रिय परेश्वर! मैं स्तुति करना नहीं जानता। हे सर्वेश! प्रसन्न होइये और शरणागत मेरी रक्षा कीजिये।

श्लोक 10 (shiva.rudra.150.10)

सनत्कुमार उवाच । इत्याकर्ण्य मयोक्तां हि संस्तुतिं परमेश्वरः । प्रसन्नोऽभूद् द्विजश्रेष्ठ मयं प्रोवाच चादरात्

sanatkumāra uvāca ityākarṇya mayoktāṁ hi saṁstutiṁ parameśvaraḥ prasanno'bhūd dvijaśreṣṭha mayaṁ provāca cādarāt

सनत्कुमार ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ! मय की यह स्तुति सुनकर परमेश्वर प्रसन्न हुए और आदरपूर्वक मय से बोले।

श्लोक 11 (shiva.rudra.150.11)

शिव उवाच । वरं ब्रूहि प्रसन्नोऽहं मय दानवसत्तम । मनोऽभिलषितं यत्ते तद्दास्यामि न संशयः

śiva uvāca varaṁ brūhi prasanno'haṁ maya dānavasattama mano'bhilaṣitaṁ yatte taddāsyāmi na saṁśayaḥ

शिव ने कहा — हे दानवश्रेष्ठ मय! वर माँगो, मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मन में जो अभिलाषा है, वह मैं अवश्य दूँगा, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 12 (shiva.rudra.150.12)

सनत्कुमार उवाच । श्रुत्वा शिवं वचः शम्भोः स मयो दानवर्षभः । प्रत्युवाच प्रभुं नत्वा नतस्कन्धः कृताञ्जलिः

sanatkumāra uvāca śrutvā śivaṁ vacaḥ śambhoḥ sa mayo dānavarṣabhaḥ pratyuvāca prabhuṁ natvā nataskandhaḥ kṛtāñjaliḥ

सनत्कुमार ने कहा — शम्भु के इस शुभ वचन को सुनकर दानवश्रेष्ठ मय ने प्रभु को प्रणाम करके, कंधे झुकाकर, हाथ जोड़कर उत्तर दिया।

श्लोक 13 (shiva.rudra.150.13)

मय उवाच । देवदेव महादेव प्रसन्नो यदि मे भवान् । वरयोग्योऽस्म्यहं चेद्धि स्वभक्तिं देहि शाश्वतीम्

maya uvāca devadeva mahādeva prasanno yadi me bhavān varayogyo'smyahaṁ ceddhi svabhaktiṁ dehi śāśvatīm

मय ने कहा — हे देवदेव महादेव! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं और यदि मैं वर पाने योग्य हूँ, तो मुझे अपनी शाश्वत भक्ति प्रदान कीजिये।

श्लोक 14 (shiva.rudra.150.14)

स्वभक्तेषु सदा सख्यं दीनेषु च दयां सदा । उपेक्षामन्यजीवेषु खलेषु परमेश्वर

svabhakteṣu sadā sakhyaṁ dīneṣu ca dayāṁ sadā upekṣāmanyajīveṣu khaleṣu parameśvara

हे परमेश्वर! आपके भक्तों के प्रति सदा मित्रता, दीनों के प्रति सदा दया, तथा अन्य दुष्ट जीवों के प्रति उपेक्षा — यह मुझे प्रदान कीजिये।

श्लोक 15 (shiva.rudra.150.15)

कदापि नासुरो भावो भवेन्मम महेश्वर । निर्भयः स्यां सदा नाथ मग्नस्त्वद्भजने शुभे

kadāpi nāsuro bhāvo bhavenmama maheśvara nirbhayaḥ syāṁ sadā nātha magnastvadbhajane śubhe

हे महेश्वर! मुझमें कभी आसुरी भाव न हो। हे नाथ! मैं सदा निर्भय रहूँ, आपकी शुभ भक्ति में लीन रहूँ।

श्लोक 16 (shiva.rudra.150.16)

सनत्कुमार उवाच । इति सम्प्रार्थ्यमानस्तु शङ्करः परमेश्वरः । प्रत्युवाच मयं नाथः प्रसन्नो भक्तवत्सलः

sanatkumāra uvāca iti samprārthyamānastu śaṅkaraḥ parameśvaraḥ pratyuvāca mayaṁ nāthaḥ prasanno bhaktavatsalaḥ

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार प्रार्थना किये जाने पर परमेश्वर शंकर, भक्तवत्सल स्वामी, प्रसन्न होकर मय से बोले।

श्लोक 17 (shiva.rudra.150.17)

महेश्वर उवाच । दानवर्षभ धन्यस्त्वं मद्भक्तो निर्विकारवान् । प्रदत्तास्ते वराः सर्वेऽभीप्सिता ये तवाधुना

maheśvara uvāca dānavarṣabha dhanyastvaṁ madbhakto nirvikāravān pradattāste varāḥ sarve'bhīpsitā ye tavādhunā

महेश्वर ने कहा — हे दानवश्रेष्ठ! तुम धन्य हो, मेरे निर्विकार भक्त हो। तुमने अभी जो-जो वर चाहे थे, वे सभी तुम्हें प्रदान किये गये।

श्लोक 18 (shiva.rudra.150.18)

गच्छ त्वं वितलं लोकं रमणीयं दिवोऽपि हि । समेतः परिवारेण निजेन मम शासनात्

gaccha tvaṁ vitalaṁ lokaṁ ramaṇīyaṁ divo'pi hi sametaḥ parivāreṇa nijena mama śāsanāt

अब तुम मेरी आज्ञा से अपने परिवार सहित स्वर्ग से भी अधिक रमणीय वितल लोक को जाओ।

श्लोक 19 (shiva.rudra.150.19)

निर्भयस्तत्र सन्तिष्ठ संहृष्टो भक्तिमान्सदा । कदापि नासुरो भावो भविष्यति मदाज्ञया

nirbhayastatra santiṣṭha saṁhṛṣṭo bhaktimānsadā kadāpi nāsuro bhāvo bhaviṣyati madājñayā

वहाँ निर्भय होकर, सदा हर्षित तथा भक्तिमान् होकर रहो। मेरी आज्ञा से तुममें कभी आसुरी भाव उत्पन्न नहीं होगा।

श्लोक 20 (shiva.rudra.150.20)

सनत्कुमार उवाच । इत्याज्ञां शिरसाधाय शङ्करस्य महात्मनः । तं प्रणम्य सुरांश्चापि वितलं प्रजगाम सः

sanatkumāra uvāca ityājñāṁ śirasādhāya śaṅkarasya mahātmanaḥ taṁ praṇamya surāṁścāpi vitalaṁ prajagāma saḥ

सनत्कुमार ने कहा — महात्मा शंकर की इस आज्ञा को शिरोधार्य करके, उन्हें तथा देवताओं को भी प्रणाम करके, वह वितल लोक चला गया।

श्लोक 21 (shiva.rudra.150.21)

एतस्मिन्नन्तरे ते वै मुण्डिनश्च समागताः । प्रणम्योचुश्च तान्सर्वान्विष्णुब्रह्मादिकान् सुरान्

etasminnantare te vai muṇḍinaśca samāgatāḥ praṇamyocuśca tānsarvānviṣṇubrahmādikān surān

इसी बीच वे मुण्डिन् (मुण्डधारी) भी वहाँ एकत्रित हुए, और प्रणाम करके विष्णु, ब्रह्मा आदि सभी देवों से बोले।

श्लोक 22 (shiva.rudra.150.22)

कुत्र याम वयं देवाः कर्म किं करवामहे । आज्ञापयत नः शीघ्रं भवदादेशकारकान्

kutra yāma vayaṁ devāḥ karma kiṁ karavāmahe ājñāpayata naḥ śīghraṁ bhavadādeśakārakān

हे देवगण! हम कहाँ जायें? क्या कर्म करें? हमें शीघ्र आज्ञा दीजिये — हम आपके आदेश का पालन करने वाले हैं।

श्लोक 23 (shiva.rudra.150.23)

कृतं दुष्कर्म चास्माभिर्हे हरे हे विधे सुराः । दैत्यानां शिवभक्तानां शिवभक्तिर्विनाशिता

kṛtaṁ duṣkarma cāsmābhirhe hare he vidhe surāḥ daityānāṁ śivabhaktānāṁ śivabhaktirvināśitā

हे हरि! हे विधे! हे देवगण! हमने एक दुष्कर्म किया है — हमने शिवभक्त दैत्यों की शिवभक्ति का विनाश किया है।

श्लोक 24 (shiva.rudra.150.24)

कोटिकल्पानि नरके नो वासस्तु भविष्यति । नोद्धारो भविता नूनं शिवभक्तविरोधिनाम्

koṭikalpāni narake no vāsastu bhaviṣyati noddhāro bhavitā nūnaṁ śivabhaktavirodhinām

करोड़ों कल्पों तक हमारा निवास नरक में ही होगा। शिवभक्तों के विरोधियों का निश्चय ही कोई उद्धार नहीं होगा।

श्लोक 25 (shiva.rudra.150.25)

परन्तु भवदिच्छात इदं दुष्कर्म नः कृतम् । तच्छान्तिं कृपया ब्रूत वयं वः शरणागताः

parantu bhavadicchāta idaṁ duṣkarma naḥ kṛtam tacchāntiṁ kṛpayā brūta vayaṁ vaḥ śaraṇāgatāḥ

परन्तु यह दुष्कर्म हमने आपकी ही इच्छा से किया था। कृपया इसकी शान्ति का उपाय बताइये; हम आपकी शरण में आये हैं।

श्लोक 26 (shiva.rudra.150.26)

सनत्कुमार उवाच । तेषां तद्वचनं श्रुत्वा विष्णुब्रह्मादयःसुराः । अब्रुवन्मुण्डिनस्तांस्ते स्थितानग्रे कृताञ्जलीन्

sanatkumāra uvāca teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā viṣṇubrahmādayaḥsurāḥ abruvanmuṇḍinastāṁste sthitānagre kṛtāñjalīn

सनत्कुमार ने कहा — उनके इस वचन को सुनकर विष्णु, ब्रह्मा आदि देवगण उन मुण्डिनों से बोले, जो हाथ जोड़े हुए सामने खड़े थे।

श्लोक 27 (shiva.rudra.150.27)

विष्ण्वादय ऊचुः । न भेतव्यं भवद्भिस्तु मुण्डिनो वै कदाचन । शिवाज्ञयेदं सकलं जातं चरितमुत्तमम्

viṣṇvādaya ūcuḥ na bhetavyaṁ bhavadbhistu muṇḍino vai kadācana śivājñayedaṁ sakalaṁ jātaṁ caritamuttamam

विष्णु आदि ने कहा — हे मुण्डिनो! तुम्हें कभी भय नहीं करना चाहिए। यह सम्पूर्ण उत्तम कार्य शिव की ही आज्ञा से हुआ है।

श्लोक 28 (shiva.rudra.150.28)

युष्माकं भविता नैव कुगतिर्दुःखदायिनी । शिवदासा यतो यूयं देवर्षिहितकारकाः

yuṣmākaṁ bhavitā naiva kugatirduḥkhadāyinī śivadāsā yato yūyaṁ devarṣihitakārakāḥ

तुम्हारी कभी भी दुःखदायी दुर्गति नहीं होगी, क्योंकि तुम शिव के दास हो और देव-ऋषियों का हित करने वाले हो।

श्लोक 29 (shiva.rudra.150.29)

सुरर्षिहितकृच्छम्भुः सुरर्षिहितकृत्प्रियः । सुरर्षिहितकृन्नॄणां कदापि कुगतिर्न हि

surarṣihitakṛcchambhuḥ surarṣihitakṛtpriyaḥ surarṣihitakṛnnṝṇāṁ kadāpi kugatirna hi

शम्भु स्वयं देव-ऋषियों के हितकारी हैं, तथा देव-ऋषियों का हित करने वाले उन्हें प्रिय हैं। देव-ऋषियों का हित करने वाले मनुष्यों की कभी दुर्गति नहीं होती।

श्लोक 30 (shiva.rudra.150.30)

अद्यतो मतमेतं हि प्रविष्टानां नृणां कलौ । कुगतिर्भविता ब्रूमः सत्यं नैवात्र संशयः

adyato matametaṁ hi praviṣṭānāṁ nṛṇāṁ kalau kugatirbhavitā brūmaḥ satyaṁ naivātra saṁśayaḥ

किन्तु हम सत्य कहते हैं — आज से जो मनुष्य कलियुग में इस तुम्हारे मत में प्रवेश करेंगे, उनकी दुर्गति होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 31 (shiva.rudra.150.31)

भवद्भिर्मुण्डिनो धीरा गुप्तभावान्ममाज्ञया । तावन्मरुस्थली सेव्या कलिर्यावत्समाव्रजेत्

bhavadbhirmuṇḍino dhīrā guptabhāvānmamājñayā tāvanmarusthalī sevyā kaliryāvatsamāvrajet

हे धीर मुण्डिनो! मेरी आज्ञा से तुम्हें अपने भाव को गुप्त रखते हुए, जब तक कलियुग न आये, तब तक मरुस्थल का ही सेवन करना होगा।

श्लोक 32 (shiva.rudra.150.32)

आगते च कलौ यूयं स्वमतं स्थापयिष्यथ । कलौ तु मोहिता मूढाःसङ्ग्रहीष्यन्ति वो मतम्

āgate ca kalau yūyaṁ svamataṁ sthāpayiṣyatha kalau tu mohitā mūḍhāḥsaṅgrahīṣyanti vo matam

और जब कलियुग आ जायेगा, तब तुम अपने मत की स्थापना करना। कलियुग में मोहग्रस्त मूर्ख लोग तुम्हारे मत को ग्रहण करेंगे।

श्लोक 33 (shiva.rudra.150.33)

इत्याज्ञप्ताः सुरेशैश्च मुण्डिनस्ते मुनीश्वर । नमस्कृत्य गतास्तत्र यथोद्दिष्टं स्वमाश्रमम्

ityājñaptāḥ sureśaiśca muṇḍinaste munīśvara namaskṛtya gatāstatra yathoddiṣṭaṁ svamāśramam

हे मुनीश्वर! देवेश्वरों द्वारा इस प्रकार आज्ञा दिये जाने पर वे मुण्डिन् प्रणाम करके, जैसा निर्देशित किया गया था, अपने आश्रम की ओर चले गये।

श्लोक 34 (shiva.rudra.150.34)

ततः स भगवान् रुद्रो दग्ध्वा त्रिपुरवासिनः । कृतकृत्यो महायोगी ब्रह्माद्यैरभिपूजितः

tataḥ sa bhagavān rudro dagdhvā tripuravāsinaḥ kṛtakṛtyo mahāyogī brahmādyairabhipūjitaḥ

तत्पश्चात् त्रिपुरवासियों को जलाकर, कृतकृत्य होकर, ब्रह्मा आदि द्वारा पूजित उस महायोगी भगवान् रुद्र ने —

श्लोक 35 (shiva.rudra.150.35)

स्वगणैर्निखिलैर्देव्या शिवया सहितः प्रभुः । कृत्वामरमहत्कार्यं ससुतोऽन्तरधादथ

svagaṇairnikhilairdevyā śivayā sahitaḥ prabhuḥ kṛtvāmaramahatkāryaṁ sasuto'ntaradhādatha

अपने समस्त गणों, देवी शिवा तथा पुत्र सहित, देवताओं का यह महान् कार्य सम्पन्न करके, प्रभु अन्तर्धान हो गये।

श्लोक 36 (shiva.rudra.150.36)

ततश्चान्तर्हिते देवे परिवारान्विते शिवे । धनुः शररथाद्यैश्च प्राकारोऽन्तर्द्धिमागमत्

tataścāntarhite deve parivārānvite śive dhanuḥ śararathādyaiśca prākāro'ntarddhimāgamat

तत्पश्चात् परिवार सहित शिव के अन्तर्धान होने पर, धनुष, बाण, रथ आदि प्राकार-सहित सब अन्तर्धान हो गये।

श्लोक 37 (shiva.rudra.150.37)

ततो ब्रह्मा हरिर्देवा मुनिगन्धर्वकिन्नराः । नागाः सर्पाश्चाप्सरसः संहृष्टाश्चाथ मानुषाः

tato brahmā harirdevā munigandharvakinnarāḥ nāgāḥ sarpāścāpsarasaḥ saṁhṛṣṭāścātha mānuṣāḥ

तब ब्रह्मा, विष्णु, देवगण, मुनि, गन्धर्व, किन्नर, नाग, सर्प, अप्सराएँ तथा मनुष्य भी अत्यन्त हर्षित होकर —

श्लोक 38 (shiva.rudra.150.38)

स्वं स्वं स्थानं मुदा जग्मुः शंसन्तः शाङ्करं यशः । स्वं स्वं स्थानमनुप्राप्य निर्वृतिं परमां ययुः

svaṁ svaṁ sthānaṁ mudā jagmuḥ śaṁsantaḥ śāṅkaraṁ yaśaḥ svaṁ svaṁ sthānamanuprāpya nirvṛtiṁ paramāṁ yayuḥ

शंकर के यश का बखान करते हुए हर्षपूर्वक अपने-अपने स्थान को गये, और अपने-अपने स्थान पर पहुँचकर परम शान्ति को प्राप्त हुए।

श्लोक 39 (shiva.rudra.150.39)

एतत्ते कथितं सर्वं चरितं शशिमौलिनः । त्रिपुरक्षयसंसूचि परलीलान्वितं महत्

etatte kathitaṁ sarvaṁ caritaṁ śaśimaulinaḥ tripurakṣayasaṁsūci paralīlānvitaṁ mahat

यह चन्द्रमौलि (शिव) का सम्पूर्ण चरित्र तुम्हें सुना दिया गया — त्रिपुर के विनाश को सूचित करने वाला, उनकी परम लीला से युक्त यह महान् आख्यान।

श्लोक 40 (shiva.rudra.150.40)

धन्यं यशस्यमायुष्यं धनधान्यप्रवर्द्धकम् । स्वर्गदं मोक्षदं चापि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि

dhanyaṁ yaśasyamāyuṣyaṁ dhanadhānyapravarddhakam svargadaṁ mokṣadaṁ cāpi kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi

यह कल्याणकारी, यशदायक, आयुवर्द्धक, धन-धान्य बढ़ाने वाला, स्वर्गदायक तथा मोक्षदायक भी है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

श्लोक 41 (shiva.rudra.150.41)

इदं हि परमाख्यानं यः पठेच्छृणुयात्सदा । इह भुक्त्वाखिलान्कामान् अन्ते मुक्तिमवाप्नुयात्

idaṁ hi paramākhyānaṁ yaḥ paṭhecchṛṇuyātsadā iha bhuktvākhilānkāmān ante muktimavāpnuyāt

जो कोई इस परम आख्यान को सदा पढ़ता या सुनता है, वह इस लोक में समस्त कामनाओं को भोगकर अन्त में मुक्ति प्राप्त करता है।

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