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रुद्र संहिता · अध्याय 152

जलन्धर का जन्म एवं विवाह

अध्याय 151अध्याय-सूचीअध्याय 153

श्लोक 1 (shiva.rudra.152.1)

व्यास उवाच । सनत्कुमार सर्वज्ञ ब्रह्मपुत्र नमोऽस्तु ते । श्रुतेयमद्भुता मेऽद्य कथा शम्भोर्महात्मनः

vyāsa uvāca sanatkumāra sarvajña brahmaputra namo'stu te śruteyamadbhutā me'dya kathā śambhormahātmanaḥ

व्यास ने कहा — हे सर्वज्ञ ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार! आपको नमस्कार है। आज मैंने महात्मा शम्भु की यह अद्भुत कथा सुनी।

श्लोक 2 (shiva.rudra.152.2)

क्षिप्ते स्वतेजसि ब्रह्मन्भालनेत्रसमुद्भवे । लवणाम्भसि किं ताताभवत्तत्र वदाशु तत्

kṣipte svatejasi brahmanbhālanetrasamudbhave lavaṇāmbhasi kiṁ tātābhavattatra vadāśu tat

हे ब्रह्मन्! जब भाल-नेत्र से उत्पन्न वह तेज लवण-समुद्र में फेंका गया, तब हे तात! वहाँ क्या हुआ? शीघ्र बताइये।

श्लोक 3 (shiva.rudra.152.3)

सनत्कुमार उवाच । शृणु तात महाप्राज्ञ शिवलीलां महाद्भुताम् । यच्छ्रुत्वा श्रद्धया भक्तो योगिनां गतिमाप्नुयात्

sanatkumāra uvāca śṛṇu tāta mahāprājña śivalīlāṁ mahādbhutām yacchrutvā śraddhayā bhakto yogināṁ gatimāpnuyāt

सनत्कुमार ने कहा — हे महाप्राज्ञ तात! शिव की उस महाद्भुत लीला को सुनो, जिसे श्रद्धापूर्वक सुनकर भक्त योगियों की गति को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 4 (shiva.rudra.152.4)

अथो शिवस्य तत्तेजो भालनेत्रसमुद्भवम् । क्षिप्तं च लवणाम्भोधौ सद्यो बालत्वमाप ह

atho śivasya tattejo bhālanetrasamudbhavam kṣiptaṁ ca lavaṇāmbhodhau sadyo bālatvamāpa ha

तब शिव का वह भाल-नेत्र से उत्पन्न तेज लवण-समुद्र में फेंके जाने पर तत्काल ही बालक का रूप धारण कर गया।

श्लोक 5 (shiva.rudra.152.5)

तत्र वै सिन्धुगङ्गायाः सागरस्य च सङ्गमे । रुरोदोच्चैः स वै बालः सर्वलोकभयङ्करः

tatra vai sindhugaṅgāyāḥ sāgarasya ca saṅgame rurodoccaiḥ sa vai bālaḥ sarvalokabhayaṅkaraḥ

वहाँ सिन्धु-गंगा और सागर के संगम पर, वह बालक, जो समस्त लोकों के लिए भयंकर था, ऊँचे स्वर से रोने लगा।

श्लोक 6 (shiva.rudra.152.6)

रुदतस्तस्य शब्देन प्राकम्पद्धरणी मुहुः । स्वर्गश्च सत्यलोकश्च तत्स्वनाद् बधिरीकृतः

rudatastasya śabdena prākampaddharaṇī muhuḥ svargaśca satyalokaśca tatsvanād badhirīkṛtaḥ

उसके रोने की ध्वनि से पृथ्वी बार-बार काँप उठी; उस ध्वनि से स्वर्ग और सत्यलोक भी बधिर हो गये।

श्लोक 7 (shiva.rudra.152.7)

बालस्य रोदनेनैव सर्वे लोकाश्च तत्रसुः । सर्वतो लोकपालाश्च विह्वलीकृतमानसाः

bālasya rodanenaiva sarve lokāśca tatrasuḥ sarvato lokapālāśca vihvalīkṛtamānasāḥ

उस बालक के रोने से ही सभी लोक भयभीत हो उठे, तथा सभी दिशाओं के लोकपाल भी व्याकुलचित्त हो गये।

श्लोक 8 (shiva.rudra.152.8)

किं बहूक्तेन विप्रेन्द्र चचाल सचराचरम् । भुवनं निखिलं तात रोदनात्तच्छिशोर्विभो

kiṁ bahūktena viprendra cacāla sacarācaram bhuvanaṁ nikhilaṁ tāta rodanāttacchiśorvibho

हे विप्रेन्द्र! अधिक कहने से क्या लाभ? हे तात! हे विभो! उस शिशु के रोने से सम्पूर्ण चराचर भुवन काँप उठा।

श्लोक 9 (shiva.rudra.152.9)

अथ ते व्याकुलाः सर्वे देवाः समुनयो द्रुतम् । पितामहं लोकगुरुं ब्रह्माणं शरणं ययुः

atha te vyākulāḥ sarve devāḥ samunayo drutam pitāmahaṁ lokaguruṁ brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ

तब सभी व्याकुल देवगण मुनियों सहित शीघ्र ही पितामह, लोकगुरु ब्रह्मा की शरण में गये।

श्लोक 10 (shiva.rudra.152.10)

तत्र गत्वा च ते देवा मुनयश्च सवासवाः । प्रणम्य च सुसंस्तुत्य प्रोचुस्तं परमेष्ठिनम्

tatra gatvā ca te devā munayaśca savāsavāḥ praṇamya ca susaṁstutya procustaṁ parameṣṭhinam

वहाँ जाकर वे देवगण, मुनिगण तथा इन्द्र सहित सब, प्रणाम करके एवं भलीभाँति स्तुति करके उन परमेष्ठी ब्रह्मा से बोले।

श्लोक 11 (shiva.rudra.152.11)

देवा ऊचुः । लोकाधीश सुराधीश भयं नः समुपस्थितम् । तन्नाशय महायोगिन् जातोऽयं ह्यद्भुतो रवः

devā ūcuḥ lokādhīśa surādhīśa bhayaṁ naḥ samupasthitam tannāśaya mahāyogin jāto'yaṁ hyadbhuto ravaḥ

देवताओं ने कहा — हे लोकाधीश! हे सुराधीश! हमें भय उत्पन्न हो गया है। हे महायोगिन्! इसका नाश कीजिये — यह अद्भुत गर्जन उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 12 (shiva.rudra.152.12)

सनत्कुमार उवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तेषां ब्रह्मा लोकपितामहः । गन्तुमैच्छत्ततस्तत्र किमेतदिति विस्मितः

sanatkumāra uvāca ityākarṇya vacasteṣāṁ brahmā lokapitāmahaḥ gantumaicchattatastatra kimetaditi vismitaḥ

सनत्कुमार ने कहा — उनके इस वचन को सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा, यह क्या है, यह सोचकर विस्मित हुए और वहाँ जाने की इच्छा करने लगे।

श्लोक 13 (shiva.rudra.152.13)

ततो ब्रह्मा सुरैस्तातावतरत्सत्यलोकतः । रसां तज्ज्ञातुमिच्छन्स समुद्रमगमत्तदा

tato brahmā suraistātāvataratsatyalokataḥ rasāṁ tajjñātumicchansa samudramagamattadā

तब ब्रह्मा जी हे तात! देवताओं सहित सत्यलोक से उतरे, और उस रहस्य को जानने की इच्छा से समुद्र की ओर गये।

श्लोक 14 (shiva.rudra.152.14)

यावत्तत्रागतो ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः । तावत्समुद्रस्योत्सङ्गे तं बालं स ददर्श ह

yāvattatrāgato brahmā sarvalokapitāmahaḥ tāvatsamudrasyotsaṅge taṁ bālaṁ sa dadarśa ha

ज्यों ही सर्वलोकपितामह ब्रह्मा वहाँ पहुँचे, त्यों ही उन्होंने समुद्र की गोद में उस बालक को देखा।

श्लोक 15 (shiva.rudra.152.15)

आगतं विधिमालोक्य देवरूप्यथ सागरः । प्रणम्य शिरसा बालं तस्योत्सङ्गे न्यवेशयत्

āgataṁ vidhimālokya devarūpyatha sāgaraḥ praṇamya śirasā bālaṁ tasyotsaṅge nyaveśayat

विधि (ब्रह्मा) को आया हुआ देखकर देवरूपी सागर ने सिर झुककर प्रणाम किया और बालक को उनकी गोद में रख दिया।

श्लोक 16 (shiva.rudra.152.16)

ततो ब्रह्माब्रवीद्वाक्यं सागरं विस्मयान्वितः । जलराशे द्रुतं ब्रूहि कस्यायं शिशुरद्भुतः

tato brahmābravīdvākyaṁ sāgaraṁ vismayānvitaḥ jalarāśe drutaṁ brūhi kasyāyaṁ śiśuradbhutaḥ

तब आश्चर्यचकित ब्रह्मा ने सागर से कहा — हे जलराशे! शीघ्र बताओ, यह अद्भुत शिशु किसका है?

श्लोक 17 (shiva.rudra.152.17)

सनत्कुमार उवाच । ब्रह्मणो वाक्यमाकर्ण्य मुदितः सागरस्तदा । प्रत्युवाच प्रजेशं स नत्वा स्तुत्वा कृताञ्जलिः

sanatkumāra uvāca brahmaṇo vākyamākarṇya muditaḥ sāgarastadā pratyuvāca prajeśaṁ sa natvā stutvā kṛtāñjaliḥ

सनत्कुमार ने कहा — ब्रह्मा के वचन को सुनकर हर्षित सागर ने प्रणाम एवं स्तुति करके, हाथ जोड़कर प्रजापति से उत्तर दिया।

श्लोक 18 (shiva.rudra.152.18)

समुद्र उवाच । भो भो ब्रह्मन्मया प्राप्तो बालकोऽयमजानता । प्रभवं सिन्धुगङ्गायामकस्मात्सर्वलोकप

samudra uvāca bho bho brahmanmayā prāpto bālako'yamajānatā prabhavaṁ sindhugaṅgāyāmakasmātsarvalokapa

समुद्र ने कहा — हे ब्रह्मन्! हे ब्रह्मन्! हे सर्वलोकपालक! मैंने इस बालक को अकस्मात् सिन्धु-गंगा में पाया है, इसका उद्गम मुझे ज्ञात नहीं है।

श्लोक 19 (shiva.rudra.152.19)

जातकर्मादिसंस्कारान्कुरुष्वास्य जगद्गुरो । जातकोक्तफलं सर्वं विधातर्वक्तुमर्हसि

jātakarmādisaṁskārānkuruṣvāsya jagadguro jātakoktaphalaṁ sarvaṁ vidhātarvaktumarhasi

हे जगद्गुरो! इसके जातकर्म आदि संस्कार आप ही कीजिये। हे विधातः! इसके जन्मकुण्डली से कहे जाने वाले सम्पूर्ण फल भी आप ही बताइये।

श्लोक 20 (shiva.rudra.152.20)

सनत्कुमार उवाच । एवं वदति पाथोधौ स बालः सागरात्मजः । ब्रह्माणमग्रहीत्कण्ठे विधुन्वन्तं मुहुर्मुहुः

sanatkumāra uvāca evaṁ vadati pāthodhau sa bālaḥ sāgarātmajaḥ brahmāṇamagrahītkaṇṭhe vidhunvantaṁ muhurmuhuḥ

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार समुद्र के कहते-कहते ही, सागरपुत्र उस बालक ने ब्रह्मा जी का गला पकड़ लिया और उन्हें बार-बार हिलाने लगा।

श्लोक 21 (shiva.rudra.152.21)

विधूननं च तस्यैवं सर्वलोककृतो विधेः । पीडितस्य च कालेय नेत्राभ्यामगमज्जलम्

vidhūnanaṁ ca tasyaivaṁ sarvalokakṛto vidheḥ pīḍitasya ca kāleya netrābhyāmagamajjalam

हे कालेय (व्यास)! सम्पूर्ण लोकों के रचयिता विधि इस प्रकार हिलाये जाने से इतने पीड़ित हुए कि उनके दोनों नेत्रों से जल बहने लगा।

श्लोक 22 (shiva.rudra.152.22)

कराभ्यामब्धिजातस्य तत्सुतस्य महौजसः । कथञ्चिन्मुक्तकण्ठस्तु ब्रह्मा प्रोवाच सादरम्

karābhyāmabdhijātasya tatsutasya mahaujasaḥ kathañcinmuktakaṇṭhastu brahmā provāca sādaram

उस महाबली सागरपुत्र के हाथों से किसी प्रकार गला छुड़ाकर ब्रह्मा जी ने आदरपूर्वक कहा।

श्लोक 23 (shiva.rudra.152.23)

ब्रह्मोवाच । शृणु सागर वक्ष्यामि तवास्य तनयस्य हि । जातकोक्तफलं सर्वं समाधानरतः खलु

brahmovāca śṛṇu sāgara vakṣyāmi tavāsya tanayasya hi jātakoktaphalaṁ sarvaṁ samādhānarataḥ khalu

ब्रह्मा ने कहा — हे सागर! सुनो, मैं अपने चित्त को स्थिर करते हुए तुम्हारे इस पुत्र के जातकफल का सम्पूर्ण वर्णन करता हूँ।

श्लोक 24 (shiva.rudra.152.24)

नेत्राभ्यां विधृतं यस्मादनेनैव जलं मम । तस्माज्जलन्धरेतीह ख्यातो नाम्ना भवत्वसौ

netrābhyāṁ vidhṛtaṁ yasmādanenaiva jalaṁ mama tasmājjalandharetīha khyāto nāmnā bhavatvasau

चूँकि इसी ने मेरे दोनों नेत्रों से जल निकलवा दिया है, इसलिए यह यहाँ 'जलन्धर' नाम से प्रसिद्ध होगा।

श्लोक 25 (shiva.rudra.152.25)

अधुनैवैष तरुणः सर्वशास्त्रार्थपारगः । महापराक्रमो धीरो योद्धा च रणदुर्मदः

adhunaivaiṣa taruṇaḥ sarvaśāstrārthapāragaḥ mahāparākramo dhīro yoddhā ca raṇadurmadaḥ

यह युवक अभी से ही समस्त शास्त्रों के अर्थ में पारंगत, महापराक्रमी, धीर, तथा युद्ध में उन्मत्त योद्धा होगा।

श्लोक 26 (shiva.rudra.152.26)

भविष्यति च गम्भीरः त्वं यथा समरे गुहः । सर्वजेता च सङ्ग्रामे सर्वसम्पद्विराजितः

bhaviṣyati ca gambhīraḥ tvaṁ yathā samare guhaḥ sarvajetā ca saṅgrāme sarvasampadvirājitaḥ

यह युद्ध में गुह (कार्तिकेय) के समान गम्भीर होगा; संग्राम में सर्वविजेता तथा सर्वसम्पदाओं से सुशोभित होगा।

श्लोक 27 (shiva.rudra.152.27)

दैत्यानामधिपो बालः सर्वेषां च भविष्यति । विष्णोरपि भवेज्जेता न कुतश्चित्पराभवः

daityānāmadhipo bālaḥ sarveṣāṁ ca bhaviṣyati viṣṇorapi bhavejjetā na kutaścitparābhavaḥ

यह बालक समस्त दैत्यों का अधिपति होगा। यह विष्णु का भी विजेता होगा — इसकी पराजय कहीं से भी नहीं होगी।

श्लोक 28 (shiva.rudra.152.28)

अवध्यः सर्वभूतानां विना रुद्रं भविष्यति । यत एष समुद्भूतस्तत्रेदानीं गमिष्यति

avadhyaḥ sarvabhūtānāṁ vinā rudraṁ bhaviṣyati yata eṣa samudbhūtastatredānīṁ gamiṣyati

यह रुद्र को छोड़कर सभी प्राणियों के लिए अवध्य होगा। जहाँ से यह उत्पन्न हुआ है, अब यह वहीं को जायेगा।

श्लोक 29 (shiva.rudra.152.29)

पतिव्रतास्य भविता पत्नी सौभाग्यवर्द्धिनी । सर्वाङ्गसुन्दरी रम्या प्रियवाक्छीलसागरा

pativratāsya bhavitā patnī saubhāgyavarddhinī sarvāṅgasundarī ramyā priyavākchīlasāgarā

इसकी पत्नी पतिव्रता, सौभाग्यवर्द्धिनी, सर्वांगसुन्दरी, रमणीय, प्रियवचन बोलने वाली तथा शीलसागर होगी।

श्लोक 30 (shiva.rudra.152.30)

सनत्कुमार उवाच । इत्युक्त्वा शुक्रमाहूय राज्ये तं चाभ्यषेचयत् । आमन्त्र्य सरितां नाथं ब्रह्मान्तर्द्धानमन्वगात्

sanatkumāra uvāca ityuktvā śukramāhūya rājye taṁ cābhyaṣecayat āmantrya saritāṁ nāthaṁ brahmāntarddhānamanvagāt

सनत्कुमार ने कहा — यह कहकर शुक्राचार्य को बुलाकर उन्होंने उससे उस बालक का राज्याभिषेक करवाया, और नदियों के स्वामी (सागर) से विदा लेकर ब्रह्मा जी अन्तर्धान हो गये।

श्लोक 31 (shiva.rudra.152.31)

अथ तद्दर्शनोत्फुल्लनयनः सागरस्तदा । तमात्मजं समादाय स्वगेहमगमन्मुदा

atha taddarśanotphullanayanaḥ sāgarastadā tamātmajaṁ samādāya svagehamagamanmudā

तब उस दृश्य से आनन्दित नेत्रों वाला सागर उस पुत्र को लेकर हर्षपूर्वक अपने घर गया।

श्लोक 32 (shiva.rudra.152.32)

अपोषयन्महोपायैः स्वबालं मुदितात्मकः । सर्वाङ्गसुन्दरं रम्यं महाद्भुतसुतेजसम्

apoṣayanmahopāyaiḥ svabālaṁ muditātmakaḥ sarvāṅgasundaraṁ ramyaṁ mahādbhutasutejasam

प्रसन्नचित्त सागर ने अपने सर्वांगसुन्दर, रमणीय तथा महान् अद्भुत तेजयुक्त उस बालक का बड़े उपायों से पालन-पोषण किया।

श्लोक 33 (shiva.rudra.152.33)

अथाम्बुधिः समाहूय कालनेमिं महासुरम् । वृन्दाभिधां सुतां तस्य तद्भार्यार्थमयाचत

athāmbudhiḥ samāhūya kālanemiṁ mahāsuram vṛndābhidhāṁ sutāṁ tasya tadbhāryārthamayācata

तब समुद्र ने महासुर कालनेमि को बुलाकर उसकी वृन्दा नामक पुत्री को जलन्धर की पत्नी बनाने हेतु याचना की।

श्लोक 34 (shiva.rudra.152.34)

कालनेम्यसुरो वीरोऽसुराणां प्रवरः सुधीः । साधु मेनेम्बुधेर्याच्ञां स्वकर्मनिपुणो मुने

kālanemyasuro vīro'surāṇāṁ pravaraḥ sudhīḥ sādhu menembudheryācñāṁ svakarmanipuṇo mune

हे मुने! वीर, बुद्धिमान् तथा असुरों में श्रेष्ठ, अपने कर्म में निपुण कालनेमि असुर ने समुद्र की उस याचना को उचित माना।

श्लोक 35 (shiva.rudra.152.35)

जलन्धराय वीराय सागरप्रभवाय च । ददौ ब्रह्मविधानेन स्वसुतां प्राणवल्लभाम्

jalandharāya vīrāya sāgaraprabhavāya ca dadau brahmavidhānena svasutāṁ prāṇavallabhām

उसने वैदिक विधि से अपनी प्राणप्रिय पुत्री सागरजात वीर जलन्धर को अर्पित कर दी।

श्लोक 36 (shiva.rudra.152.36)

तदोत्सवो महानासीद्विवाहे च तयोस्तदा । सुखं प्रापुर्नदा नद्योऽसुराश्चैवाखिला मुने

tadotsavo mahānāsīdvivāhe ca tayostadā sukhaṁ prāpurnadā nadyo'surāścaivākhilā mune

हे मुने! उन दोनों के विवाह में उस समय महान् उत्सव हुआ; समस्त नद-नदियाँ तथा सभी असुर सुख को प्राप्त हुए।

श्लोक 37 (shiva.rudra.152.37)

समुद्रोऽति सुखं प्राप सुतं दृष्ट्वा हि सस्त्रियम् । दानं ददौ द्विजातिभ्योऽप्यन्येभ्यश्च यथाविधि

samudro'ti sukhaṁ prāpa sutaṁ dṛṣṭvā hi sastriyam dānaṁ dadau dvijātibhyo'pyanyebhyaśca yathāvidhi

पुत्र को पत्नी सहित देखकर समुद्र अत्यन्त सुखी हुआ; उसने विधिपूर्वक द्विजों तथा अन्य जनों को भी दान दिया।

श्लोक 38 (shiva.rudra.152.38)

ये देवैर्निर्जिताः पूर्वं दैत्याः पातालसंस्थिताः । ते हि भूमण्डलं याता निर्भयाः तमुपाश्रिताः

ye devairnirjitāḥ pūrvaṁ daityāḥ pātālasaṁsthitāḥ te hi bhūmaṇḍalaṁ yātā nirbhayāḥ tamupāśritāḥ

जो दैत्य पूर्वकाल में देवताओं द्वारा पराजित होकर पाताल में रह रहे थे, वे भी अब निर्भय होकर भूमण्डल पर आये और उसकी शरण में गये।

श्लोक 39 (shiva.rudra.152.39)

ते कालनेमिप्रमुखास्ततोऽसुराः तस्मै सुतां सिन्धुसुताय दत्त्वा । बभूवुरत्यन्तमुदान्विता हि तमाश्रिता देवविनिर्जयाय

te kālanemipramukhāstato'surāḥ tasmai sutāṁ sindhusutāya dattvā babhūvuratyantamudānvitā hi tamāśritā devavinirjayāya

कालनेमि आदि उन असुरों ने अपनी कन्या उस सिन्धुपुत्र को देकर अत्यन्त हर्षित हुए, तथा देवताओं पर विजय पाने के उद्देश्य से उसकी शरण ली।

श्लोक 40 (shiva.rudra.152.40)

स चापि वीरोऽम्बुधिबालकोऽसौ जलन्धराख्योऽसुरवीरवीरः । सम्प्राप्य भार्यामतिसुन्दरीं वशी चकार राज्यं हि कविप्रभावात्

sa cāpi vīro'mbudhibālako'sau jalandharākhyo'suravīravīraḥ samprāpya bhāryāmatisundarīṁ vaśī cakāra rājyaṁ hi kaviprabhāvāt

और वह वीर, सागरपुत्र, असुरवीरों में भी वीर, जितेन्द्रिय जलन्धर, अत्यन्त सुन्दर पत्नी को प्राप्तकर कवि (शुक्राचार्य) के प्रभाव से राज्य करने लगा।

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