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रुद्र संहिता · अध्याय 154

विष्णु का युद्ध में प्रवेश

अध्याय 153अध्याय-सूचीअध्याय 155

श्लोक 1 (shiva.rudra.154.1)

सनत्कुमार उवाच । पुनर्दैत्यं समायान्तं दृष्ट्वा देवाः सवासवाः । भयात्प्रकम्पिताः सर्वे सहैवादुद्रुवुर्द्रुतम्

sanatkumāra uvāca punardaityaṁ samāyāntaṁ dṛṣṭvā devāḥ savāsavāḥ bhayātprakampitāḥ sarve sahaivādudruvurdrutam

सनत्कुमार ने कहा — उस दैत्य को पुनः आते देखकर इन्द्र सहित सभी देवगण भय से काँपते हुए एक साथ ही शीघ्र भाग गये।

श्लोक 2 (shiva.rudra.154.2)

वैकुण्ठं प्रययुः सर्वे पुरस्कृत्य प्रजापतिम् । तुष्टुवुस्ते सुरा नत्वा सप्रजापतयोऽखिलाः

vaikuṇṭhaṁ prayayuḥ sarve puraskṛtya prajāpatim tuṣṭuvuste surā natvā saprajāpatayo'khilāḥ

वे सभी प्रजापति (ब्रह्मा) को आगे करके वैकुण्ठ गये; वहाँ प्रजापति सहित सभी देवताओं ने प्रणाम करके स्तुति की।

श्लोक 3 (shiva.rudra.154.3)

देवा ऊचुः । हृषीकेश महाबाहो भगवन् मधुसूदन । नमस्ते देवदेवेश सर्वदैत्यविनाशक

devā ūcuḥ hṛṣīkeśa mahābāho bhagavan madhusūdana namaste devadeveśa sarvadaityavināśaka

देवताओं ने कहा — हे हृषीकेश! हे महाबाहो! हे भगवन् मधुसूदन! हे देवदेवेश! हे सर्वदैत्यविनाशक! आपको नमस्कार है।

श्लोक 4 (shiva.rudra.154.4)

मत्स्यरूपाय ते विष्णो वेदान्नीतवते नमः । सत्यव्रतेन सद्राज्ञा प्रलयाब्धिविहारिणे

matsyarūpāya te viṣṇo vedānnītavate namaḥ satyavratena sadrājñā pralayābdhivihāriṇe

हे विष्णो! मत्स्यरूप धारणकर वेदों को लाने वाले आपको नमस्कार है, जो सत्यव्रत नामक सत्पुरुष राजा के साथ प्रलय-सागर में विहार करते थे।

श्लोक 5 (shiva.rudra.154.5)

कुर्वाणानां सुराणां च मथनायोद्यमं भृशम् । बिभ्रते मन्दरगिरिं कूर्मरूपाय ते नमः

kurvāṇānāṁ surāṇāṁ ca mathanāyodyamaṁ bhṛśam bibhrate mandaragiriṁ kūrmarūpāya te namaḥ

मन्थन के लिए अत्यन्त प्रयत्नशील देवताओं हेतु मन्दराचल को धारण करने वाले, कूर्मरूप धारी आपको नमस्कार है।

श्लोक 6 (shiva.rudra.154.6)

नमस्ते भगवन्नाथ क्रतवे सूकरात्मने । वसुन्धरां जनाधारां मूर्द्धतो बिभ्रते नमः

namaste bhagavannātha kratave sūkarātmane vasundharāṁ janādhārāṁ mūrddhato bibhrate namaḥ

हे भगवन् नाथ! हे यज्ञस्वरूप! सूकररूप धारण करने वाले आपको नमस्कार है। समस्त प्रजा के आधार वसुन्धरा को अपने मस्तक पर धारण करने वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 7 (shiva.rudra.154.7)

वामनाय नमस्तुभ्यमुप्रेन्द्राख्याय विष्णवे । विप्ररूपेण दैत्येन्द्रं बलिं छलयते विभो

vāmanāya namastubhyamuprendrākhyāya viṣṇave viprarūpeṇa daityendraṁ baliṁ chalayate vibho

हे विष्णो! उपेन्द्र नाम धारण करने वाले वामन रूप को नमस्कार है। हे विभो! ब्राह्मणरूप धारणकर दैत्येन्द्र बलि को छलने वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 8 (shiva.rudra.154.8)

नमः परशुरामाय क्षत्रनिः क्षत्रकारिणे । मातुर्हितकृते तुभ्यं कुपितायासतां द्रुहे

namaḥ paraśurāmāya kṣatraniḥ kṣatrakāriṇe māturhitakṛte tubhyaṁ kupitāyāsatāṁ druhe

क्षत्रियों की पृथ्वी को क्षत्रियरहित करने वाले परशुराम को नमस्कार है। माता के हित हेतु कुपित होकर असतों के शत्रु बने आपको नमस्कार है।

श्लोक 9 (shiva.rudra.154.9)

रामाय लोकरामाय मर्यादापुरुषाय ते । रावणान्तकरायाशु सीतायाः पतये नमः

rāmāya lokarāmāya maryādāpuruṣāya te rāvaṇāntakarāyāśu sītāyāḥ pataye namaḥ

लोक को रमाने वाले, मर्यादापुरुष, रावण का अन्त करने वाले, सीता के पति राम को शीघ्र ही नमस्कार है।

श्लोक 10 (shiva.rudra.154.10)

नमस्ते ज्ञानगूढाय कृष्णाय परमात्मने । राधाविहारशीलाय नानालीलाकराय च

namaste jñānagūḍhāya kṛṣṇāya paramātmane rādhāvihāraśīlāya nānālīlākarāya ca

ज्ञान को गुप्त रखने वाले, परमात्मारूप, राधा के साथ विहारशील, नाना लीलाएँ करने वाले कृष्ण को नमस्कार है।

श्लोक 11 (shiva.rudra.154.11)

नमस्ते गूढदेहाय वेदनिन्दाकराय च । योगाचार्याय जैनाय बौद्धरूपाय मापते

namaste gūḍhadehāya vedanindākarāya ca yogācāryāya jaināya bauddharūpāya māpate

गूढदेह धारणकर वेदनिन्दा कराने वाले, योगाचार्य, जिन तथा बौद्धरूप धारण करने वाले, हे लक्ष्मीपते! आपको नमस्कार है।

श्लोक 12 (shiva.rudra.154.12)

नमस्ते कल्किरूपाय म्लेच्छानामन्तकारिणे । अनन्तशक्तिरूपाय सद्धर्मस्थापनाय च

namaste kalkirūpāya mlecchānāmantakāriṇe anantaśaktirūpāya saddharmasthāpanāya ca

म्लेच्छों का अन्त करने वाले, अनन्त शक्तिरूप, सद्धर्म की स्थापना करने वाले कल्किरूप को नमस्कार है।

श्लोक 13 (shiva.rudra.154.13)

नमः कपिलरूपाय देवहूत्यै महात्मने । वदते साङ्ख्ययोगं च साङ्ख्याचार्याय वै प्रभो

namaḥ kapilarūpāya devahūtyai mahātmane vadate sāṅkhyayogaṁ ca sāṅkhyācāryāya vai prabho

हे प्रभो! देवहूति को साङ्ख्ययोग का उपदेश देने वाले, महात्मा, साङ्ख्याचार्य कपिलरूप को नमस्कार है।

श्लोक 14 (shiva.rudra.154.14)

नमः परमहंसाय ज्ञानं संवदते परम् । विधात्रे ज्ञानरूपाय येनात्मा सम्प्रसीदति

namaḥ paramahaṁsāya jñānaṁ saṁvadate param vidhātre jñānarūpāya yenātmā samprasīdati

परम ज्ञान का उपदेश देने वाले, विधाता, ज्ञानस्वरूप परमहंस को नमस्कार है, जिनके द्वारा आत्मा भलीभाँति प्रसन्न होती है।

श्लोक 15 (shiva.rudra.154.15)

वेदव्यासाय वेदानां विभागं कुर्वते नमः । हिताय सर्वलोकानां पुराणरचनाय च

vedavyāsāya vedānāṁ vibhāgaṁ kurvate namaḥ hitāya sarvalokānāṁ purāṇaracanāya ca

वेदों का विभाजन करने वाले, समस्त लोकों के हित हेतु पुराणों की रचना करने वाले वेदव्यास को नमस्कार है।

श्लोक 16 (shiva.rudra.154.16)

एवं मत्स्यादितनुभिर्भक्तकार्योद्यताय ते । सर्गस्थितिध्वंसकर्त्रे नमस्ते ब्रह्मणे प्रभो

evaṁ matsyāditanubhirbhaktakāryodyatāya te sargasthitidhvaṁsakartre namaste brahmaṇe prabho

इस प्रकार मत्स्य आदि विविध रूपों द्वारा भक्तों के कार्य में सदा तत्पर, सृष्टि-स्थिति-संहार करने वाले, हे प्रभो ब्रह्मन्! आपको नमस्कार है।

श्लोक 17 (shiva.rudra.154.17)

आर्तिहन्त्रे स्वदासानां सुखदाय शुभाय च । पीताम्बराय हरये तार्क्ष्ययानाय ते नमः । सर्वक्रियायैककर्त्रे शरण्याय नमो नमः

ārtihantre svadāsānāṁ sukhadāya śubhāya ca pītāmbarāya haraye tārkṣyayānāya te namaḥ sarvakriyāyaikakartre śaraṇyāya namo namaḥ

अपने दासों की पीड़ा हरने वाले, सुखदायक, शुभ, पीताम्बरधारी, गरुड़वाहन हरि को नमस्कार है। सर्वक्रियाओं के एकमात्र कर्ता, शरण्य को बारम्बार नमस्कार है।

श्लोक 18 (shiva.rudra.154.18)

दैत्यसन्तापितामर्त्यदुःखादिध्वंसवज्रक । शेषतल्पशयायार्कचन्द्रनेत्राय ते नमः

daityasantāpitāmartyaduḥkhādidhvaṁsavajraka śeṣatalpaśayāyārkacandranetrāya te namaḥ

दैत्यों से संतप्त अमरों के दुःख आदि का नाश करने वाले वज्र-स्वरूप! शेषशय्या पर शयन करने वाले, सूर्य-चन्द्र नेत्रों वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 19 (shiva.rudra.154.19)

कृपासिन्धो रमानाथ पाहि नः शरणागतान् । जलन्धरेण देवाश्च स्वर्गात्सर्वे निराकृताः

kṛpāsindho ramānātha pāhi naḥ śaraṇāgatān jalandhareṇa devāśca svargātsarve nirākṛtāḥ

हे कृपासिन्धो! हे रमानाथ! शरणागत हम सभी की रक्षा कीजिये। जलन्धर द्वारा समस्त देवगण स्वर्ग से निकाल दिये गये हैं।

श्लोक 20 (shiva.rudra.154.20)

सूर्यो निस्सारितः स्थानाच्चन्द्रो वह्निस्तथैव च । पातालान्नागराजश्च धर्मराजो निराकृतः

sūryo nissāritaḥ sthānāccandro vahnistathaiva ca pātālānnāgarājaśca dharmarājo nirākṛtaḥ

सूर्य अपने स्थान से निकाल दिये गये हैं, चन्द्रमा तथा अग्नि भी; नागराज पाताल से तथा धर्मराज भी निकाल दिये गये हैं।

श्लोक 21 (shiva.rudra.154.21)

विचरन्ति यथा मर्त्याः शोभन्ते नैव ते सुराः । शरणं ते वयं प्राप्ता वधस्तस्य विचिन्त्यताम्

vicaranti yathā martyāḥ śobhante naiva te surāḥ śaraṇaṁ te vayaṁ prāptā vadhastasya vicintyatām

ये देवगण अब मनुष्यों के समान भटक रहे हैं, वे शोभा नहीं पा रहे। हम आपकी शरण में आये हैं; उसके वध का विचार कीजिये।

श्लोक 22 (shiva.rudra.154.22)

सनत्कुमार उवाच । इति दीनवचः श्रुत्वा देवानां मधुसूदनः । जगाद करुणासिन्धुर्मेघनिर्ह्रादया गिरा

sanatkumāra uvāca iti dīnavacaḥ śrutvā devānāṁ madhusūdanaḥ jagāda karuṇāsindhurmeghanirhrādayā girā

सनत्कुमार ने कहा — देवताओं का यह दीन वचन सुनकर करुणासिन्धु मधुसूदन ने मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा।

श्लोक 23 (shiva.rudra.154.23)

विष्णुरुवाच । भयं त्यजत हे देवा गमिष्याम्यहमाहवम् । जलन्धरेण दैत्येन करिष्यामि पराक्रमम्

viṣṇuruvāca bhayaṁ tyajata he devā gamiṣyāmyahamāhavam jalandhareṇa daityena kariṣyāmi parākramam

विष्णु ने कहा — हे देवगण! भय त्याग दो। मैं युद्ध में जाऊँगा और दैत्य जलन्धर के साथ पराक्रम करूँगा।

श्लोक 24 (shiva.rudra.154.24)

इत्युक्त्वा सहसोत्थाय दैत्यारिः खिन्नमानसः । आरोहद्गरुडं वेगात्कृपया भक्तवत्सलः

ityuktvā sahasotthāya daityāriḥ khinnamānasaḥ ārohadgaruḍaṁ vegātkṛpayā bhaktavatsalaḥ

यह कहकर उदास मन वाले दैत्यारि विष्णु तत्क्षण उठकर, कृपापूर्वक, भक्तवत्सल होकर वेगपूर्वक गरुड़ पर आरूढ़ हुए।

श्लोक 25 (shiva.rudra.154.25)

गच्छन्तं वल्लभं दृष्ट्वा देवैस्सार्द्धं समुद्रजा । साञ्जलिर्बाष्पनयना लक्ष्मीर्वचनमब्रवीत्

gacchantaṁ vallabhaṁ dṛṣṭvā devaissārddhaṁ samudrajā sāñjalirbāṣpanayanā lakṣmīrvacanamabravīt

अपने प्रियतम को देवताओं सहित जाते देखकर समुद्रजा लक्ष्मी ने हाथ जोड़कर, अश्रुपूरित नेत्रों से यह वचन कहा।

श्लोक 26 (shiva.rudra.154.26)

लक्ष्म्युवाच । अहं ते वल्लभा नाथ भक्ता यदि च सर्वदा । तत्कथं ते मम भ्राता युद्धे वध्यः कृपानिधे

lakṣmyuvāca ahaṁ te vallabhā nātha bhaktā yadi ca sarvadā tatkathaṁ te mama bhrātā yuddhe vadhyaḥ kṛpānidhe

लक्ष्मी ने कहा — हे नाथ! यदि मैं आपकी प्रिया हूँ, सदैव आपकी भक्त हूँ, तो हे कृपानिधे! मेरा भाई युद्ध में आपके द्वारा कैसे वध्य हो सकता है?

श्लोक 27 (shiva.rudra.154.27)

विष्णुरुवाच । जलन्धरेण दैत्येन करिष्यामि पराक्रमम् । तैः संस्तुतो गमिष्यामि युद्धाय त्वरितान्वितः

viṣṇuruvāca jalandhareṇa daityena kariṣyāmi parākramam taiḥ saṁstuto gamiṣyāmi yuddhāya tvaritānvitaḥ

विष्णु ने कहा — मैं दैत्य जलन्धर के साथ अवश्य पराक्रम करूँगा। उन देवताओं से स्तुत होकर मैं शीघ्रतापूर्वक युद्ध के लिए जा रहा हूँ।

श्लोक 28 (shiva.rudra.154.28)

रुद्रांशसम्भवत्वाच्च ब्रह्मणो वचनादपि । प्रीत्या च तव नैवायं मम वध्यो जलन्धरः

rudrāṁśasambhavatvācca brahmaṇo vacanādapi prītyā ca tava naivāyaṁ mama vadhyo jalandharaḥ

किन्तु यह रुद्रांश से उत्पन्न है, तथा ब्रह्मा के वचन से भी, और तुम्हारे प्रति स्नेह के कारण भी, यह जलन्धर वस्तुतः मेरे द्वारा वध्य नहीं है।

श्लोक 29 (shiva.rudra.154.29)

सनत्कुमार उवाच । इत्युक्त्वा गरुडारूढः शङ्खचक्रगदासिभृत् । विष्णुर्वेगाद्ययौ योद्धुं देवैः शक्रादिभिस्सह

sanatkumāra uvāca ityuktvā garuḍārūḍhaḥ śaṅkhacakragadāsibhṛt viṣṇurvegādyayau yoddhuṁ devaiḥ śakrādibhissaha

सनत्कुमार ने कहा — यह कहकर, गरुड़ पर आरूढ़, शंख-चक्र-गदा-खड्ग धारण करने वाले विष्णु शक्र आदि देवताओं सहित वेगपूर्वक युद्ध हेतु चल पड़े।

श्लोक 30 (shiva.rudra.154.30)

द्रुतं स प्राप तत्रैव यत्र दैत्यो जलन्धरः । कुर्वन् सिंहरवं देवैर्ज्वलद्भिर्विष्णुतेजसा

drutaṁ sa prāpa tatraiva yatra daityo jalandharaḥ kurvan siṁharavaṁ devairjvaladbhirviṣṇutejasā

वे शीघ्र ही वहाँ पहुँच गये, जहाँ दैत्य जलन्धर था, सिंहनाद करते हुए, विष्णु के तेज से प्रज्वलित उन देवताओं के साथ।

श्लोक 31 (shiva.rudra.154.31)

अथारुणानुजजवपक्षवातप्रपीडिताः । वात्याविवर्तिता दैत्या बभ्रमुः खे यथा घनाः

athāruṇānujajavapakṣavātaprapīḍitāḥ vātyāvivartitā daityā babhramuḥ khe yathā ghanāḥ

तब अरुण के अनुज (गरुड़) के पंखों की वायु से पीड़ित होकर दैत्य आँधी में उड़ते बादलों की भाँति आकाश में भटकने लगे।

श्लोक 32 (shiva.rudra.154.32)

ततो जलन्धरो दृष्ट्वा दैत्यान् वात्याप्रपीडितान् । उद्धृत्य वचनं क्रोधाद् द्रुतं विष्णुं समभ्यगात्

tato jalandharo dṛṣṭvā daityān vātyāprapīḍitān uddhṛtya vacanaṁ krodhād drutaṁ viṣṇuṁ samabhyagāt

तब जलन्धर ने आँधी से पीड़ित दैत्यों को देखकर, क्रोधपूर्वक वचन बोलते हुए, शीघ्र ही विष्णु के समीप जा पहुँचा।

श्लोक 33 (shiva.rudra.154.33)

एतस्मिन्नन्तरे देवाश्चक्रुर्युद्धं प्रहर्षिताः । तेजसा च हरेः पुष्टा महाबलसमन्विताः

etasminnantare devāścakruryuddhaṁ praharṣitāḥ tejasā ca hareḥ puṣṭā mahābalasamanvitāḥ

इसी बीच देवगण अत्यन्त हर्षित होकर, हरि के तेज से पुष्ट तथा महाबल से युक्त होकर युद्ध करने लगे।

श्लोक 34 (shiva.rudra.154.34)

युद्धोद्यतं समालोक्य देवसैन्यमुपस्थितम् । दैत्यानाज्ञापयामास समरे चातिदुर्मदान्

yuddhodyataṁ samālokya devasainyamupasthitam daityānājñāpayāmāsa samare cātidurmadān

युद्ध के लिए तत्पर देवसेना को उपस्थित देखकर उसने संग्राम में अत्यन्त उन्मत्त उन दैत्यों को आज्ञा दी।

श्लोक 35 (shiva.rudra.154.35)

जलन्धर उवाच । भो भो दैत्यवरा यूयं युद्धं कुरुत दुस्तरम् । शक्राद्यैरमरैरद्य प्रबलैः कातरैः सदा

jalandhara uvāca bho bho daityavarā yūyaṁ yuddhaṁ kuruta dustaram śakrādyairamarairadya prabalaiḥ kātaraiḥ sadā

जलन्धर ने कहा — हे दैत्यवरो! शक्र आदि उन अमरों से, जो कभी प्रबल थे किन्तु आज सदा भयभीत रहते हैं, आज एक दुर्दम्य युद्ध करो।

श्लोक 36 (shiva.rudra.154.36)

मौर्यास्तु लक्षसङ्ख्याता धौम्रा हि शतसङ्ख्यकाः । असुराः कोटिसङ्ख्याताः कालकेयास्तथैव च

mauryāstu lakṣasaṅkhyātā dhaumrā hi śatasaṅkhyakāḥ asurāḥ koṭisaṅkhyātāḥ kālakeyāstathaiva ca

लाखों की संख्या में मौर्य, सैकड़ों की संख्या में धौम्र, करोड़ों की संख्या में असुर तथा कालकेय भी —

श्लोक 37 (shiva.rudra.154.37)

कालकानां दौर्हृदानां कङ्कानां लक्षसङ्ख्यया । अन्येऽपि स्वबलैर्युक्ता विनिर्यान्तु ममाज्ञया

kālakānāṁ daurhṛdānāṁ kaṅkānāṁ lakṣasaṅkhyayā anye'pi svabalairyuktā viniryāntu mamājñayā

कालक, दौर्हृद, कंक — लाखों की संख्या में, तथा अन्य भी अपनी-अपनी सेनाओं सहित मेरी आज्ञा से निकल पड़ें।

श्लोक 38 (shiva.rudra.154.38)

सर्वे सज्जा विनिर्यात बहुसेनाभिसंयुताः । नानाशस्त्रास्त्रसंयुक्ता निर्भया गतसंशयाः

sarve sajjā viniryāta bahusenābhisaṁyutāḥ nānāśastrāstrasaṁyuktā nirbhayā gatasaṁśayāḥ

तुम सब सज्ज होकर विशाल सेनाओं सहित, विविध शस्त्रास्त्रों से युक्त होकर, निर्भय तथा निःसंशय होकर निकल पड़ो।

श्लोक 39 (shiva.rudra.154.39)

भो भो शुम्भनिशुम्भौ च देवान्समरकातरान् । क्षणेन सुमहावीर्यौ तुच्छान्नाशयतं युवाम्

bho bho śumbhaniśumbhau ca devānsamarakātarān kṣaṇena sumahāvīryau tucchānnāśayataṁ yuvām

हे शुम्भ! हे निशुम्भ! तुम दोनों महापराक्रमी संग्राम में कायर उन तुच्छ देवताओं को क्षणभर में नष्ट कर दो।

श्लोक 40 (shiva.rudra.154.40)

सनत्कुमार उवाच । दैत्या जलन्धराज्ञप्ता इत्थं युद्धविशारदाः । युयुधुस्तेऽसुराः सर्वे चतुरङ्गबलान्विताः

sanatkumāra uvāca daityā jalandharājñaptā itthaṁ yuddhaviśāradāḥ yuyudhuste'surāḥ sarve caturaṅgabalānvitāḥ

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार जलन्धर द्वारा आज्ञप्त, युद्धविशारद वे सभी असुर चतुरंगिणी सेना सहित युद्ध करने लगे।

श्लोक 41 (shiva.rudra.154.41)

गदाभिस्तीक्ष्णबाणैश्च शूलपट्टिशतोमरैः । केचित्परशुशूलैश्च निजघ्नुस्ते परस्परम्

gadābhistīkṣṇabāṇaiśca śūlapaṭṭiśatomaraiḥ kecitparaśuśūlaiśca nijaghnuste parasparam

गदाओं, तीक्ष्ण बाणों, त्रिशूलों, पट्टिशों तथा तोमरों से — कुछ परशु तथा शूलों से — वे परस्पर एक-दूसरे का वध करने लगे।

श्लोक 42 (shiva.rudra.154.42)

नानायुधैः परैस्तत्र निजघ्नुस्ते बलान्विताः । देवास्तथा महावीरा हृषीकेशबलान्विताः । युयुधुस्तीक्ष्णबाणाश्च क्षिपन्तः सिंहवद्रवाः

nānāyudhaiḥ paraistatra nijaghnuste balānvitāḥ devāstathā mahāvīrā hṛṣīkeśabalānvitāḥ yuyudhustīkṣṇabāṇāśca kṣipantaḥ siṁhavadravāḥ

वहाँ बलशाली वे असुर विविध अन्य शस्त्रों से देवताओं का वध करने लगे; तथा हृषीकेश के बल से युक्त महावीर देवगण भी सिंह के समान गर्जना करते हुए तीक्ष्ण बाण चलाकर युद्ध करने लगे।

श्लोक 43 (shiva.rudra.154.43)

केचिद्बाणैः सुतीक्ष्णैश्च केचिन्मुसलतोमरैः । केचित्परशुशूलैश्च निजघ्नुस्ते परस्परम्

kecidbāṇaiḥ sutīkṣṇaiśca kecinmusalatomaraiḥ kecitparaśuśūlaiśca nijaghnuste parasparam

कुछ अत्यन्त तीक्ष्ण बाणों से, कुछ मूसलों और तोमरों से, कुछ परशु और शूलों से — वे परस्पर एक-दूसरे का वध करने लगे।

श्लोक 44 (shiva.rudra.154.44)

इत्थं सुराणां दैत्यानां सङ्ग्रामः समभून्महान् । अत्युल्बणो मुनीनां हि सिद्धानां भयकारकः

itthaṁ surāṇāṁ daityānāṁ saṅgrāmaḥ samabhūnmahān atyulbaṇo munīnāṁ hi siddhānāṁ bhayakārakaḥ

इस प्रकार देवताओं और दैत्यों के बीच एक महान् संग्राम हुआ — अत्यन्त भीषण, जो मुनियों और सिद्धों के लिए भी भयकारक था।

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