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रुद्र संहिता · अध्याय 160

जलन्धर युद्ध वर्णन

अध्याय 159अध्याय-सूचीअध्याय 161

श्लोक 1 (shiva.rudra.160.1)

सनत्कुमार उवाच । अथ वीरगणै रुद्रो रौद्ररूपो महाप्रभुः । अभ्यगाद् वृषभारूढः सङ्ग्रामं प्रहसन्निव

sanatkumāra uvāca atha vīragaṇai rudro raudrarūpo mahāprabhuḥ abhyagād vṛṣabhārūḍhaḥ saṅgrāmaṁ prahasanniva

सनत्कुमार ने कहा — तब वीरगणों सहित रौद्ररूप महाप्रभु रुद्र वृषभ पर आरूढ़ होकर, मानो हँसते हुए संग्राम की ओर बढ़े।

श्लोक 2 (shiva.rudra.160.2)

रुद्रमायान्तमालोक्य सिंहनादैर्गणाः पुनः । निवृत्ताः सङ्गरे रौद्रा ये हि पूर्वं पराजिताः

rudramāyāntamālokya siṁhanādairgaṇāḥ punaḥ nivṛttāḥ saṅgare raudrā ye hi pūrvaṁ parājitāḥ

रुद्र को आते देखकर, जो रौद्र गण पहले पराजित हो गये थे, वे भी सिंहनाद करते हुए पुनः युद्ध में लौट आये।

श्लोक 3 (shiva.rudra.160.3)

वीरशब्दं च कुर्वन्तस्तेऽप्यन्ये शाङ्करा गणाः । सोत्सवाःसायुधा दैत्यान्निजघ्नुः शरवृष्टिभिः

vīraśabdaṁ ca kurvantaste'pyanye śāṅkarā gaṇāḥ sotsavāḥsāyudhā daityānnijaghnuḥ śaravṛṣṭibhiḥ

वीर-घोष करते हुए शंकर के अन्य गण भी उत्सव मनाते हुए, शस्त्रयुक्त होकर बाणों की वर्षा से दैत्यों का संहार करने लगे।

श्लोक 4 (shiva.rudra.160.4)

दैत्या हि भीषणं रुद्रं सर्वे दृष्ट्वा विदुद्रुवुः । शाङ्करं पुरुषं दृष्ट्वा पातकानीव तद्भयात्

daityā hi bhīṣaṇaṁ rudraṁ sarve dṛṣṭvā vidudruvuḥ śāṅkaraṁ puruṣaṁ dṛṣṭvā pātakānīva tadbhayāt

भीषण रुद्र को देखकर समस्त दैत्य वैसे ही भाग खड़े हुए, जैसे शंकर के भक्त को देखकर भय से पाप भाग जाते हैं।

श्लोक 5 (shiva.rudra.160.5)

अथो जलन्धरो दैत्यान्निवृत्तान्प्रेक्ष्य सङ्गरे । अभ्यधावत्स चण्डीशं मुञ्चन्बाणान्सहस्रशः

atho jalandharo daityānnivṛttānprekṣya saṅgare abhyadhāvatsa caṇḍīśaṁ muñcanbāṇānsahasraśaḥ

तब जलन्धर ने अपने दैत्यों को युद्ध से लौटते देखकर हजारों बाण छोड़ते हुए चण्डीश की ओर धावा किया।

श्लोक 6 (shiva.rudra.160.6)

निशुम्भशुम्भप्रमुखा दैत्येन्द्राश्च सहस्रशः । अभिजग्मुश्शिवं वेगाद्रोषात्सन्दष्टदच्छदाः

niśumbhaśumbhapramukhā daityendrāśca sahasraśaḥ abhijagmuśśivaṁ vegādroṣātsandaṣṭadacchadāḥ

निशुम्भ-शुम्भ आदि हजारों दैत्येन्द्र क्रोध से होंठ काटते हुए वेगपूर्वक शिव की ओर बढ़े।

श्लोक 7 (shiva.rudra.160.7)

कालनेमिस्तथा वीरः खड्गरोमा बलाहकः । घस्मरश्च प्रचण्डश्चापरे चापि शिवं ययुः

kālanemistathā vīraḥ khaḍgaromā balāhakaḥ ghasmaraśca pracaṇḍaścāpare cāpi śivaṁ yayuḥ

कालनेमि, खड्गरोमा, बलाहक, घस्मर, प्रचण्ड आदि वीर भी शिव की ओर बढ़े।

श्लोक 8 (shiva.rudra.160.8)

बाणैः सञ्छादयामासुर्द्रुतं रुद्रगणांश्च ते । अङ्गानि चिच्छिदुर्वीराः शुम्भाद्या निखिला मुने

bāṇaiḥ sañchādayāmāsurdrutaṁ rudragaṇāṁśca te aṅgāni cicchidurvīrāḥ śumbhādyā nikhilā mune

हे मुने! उन्होंने शीघ्र ही रुद्रगणों को बाणों से आच्छादित कर दिया; शुम्भ आदि समस्त वीरों ने उनके अंगों को काट डाला।

श्लोक 9 (shiva.rudra.160.9)

बाणान्धकारसञ्छन्नं दृष्ट्वा गणबलं हरः । तद्बाणजालमाच्छिद्य बाणैराववृते नभः

bāṇāndhakārasañchannaṁ dṛṣṭvā gaṇabalaṁ haraḥ tadbāṇajālamācchidya bāṇairāvavṛte nabhaḥ

बाणों के अंधकार से आच्छादित गणसेना को देखकर हर ने उस बाणजाल को काटकर स्वयं बाणों से आकाश को आवृत कर दिया।

श्लोक 10 (shiva.rudra.160.10)

दैत्यांश्च बाणवात्याभिः पीडितानकरोत्तदा । प्रचण्डबाणजालौघैरपातयत भूतले

daityāṁśca bāṇavātyābhiḥ pīḍitānakarottadā pracaṇḍabāṇajālaughairapātayata bhūtale

उन्होंने बाणों की आँधी से दैत्यों को पीड़ित कर दिया और प्रचण्ड बाणजालों की बाढ़ से उन्हें भूतल पर गिरा दिया।

श्लोक 11 (shiva.rudra.160.11)

खड्गरोमशिरः कायात्तथा परशुनाच्छिनत् । बलाहकस्य च शिरः खट्वाङ्गेनाकरोद्द्विधा

khaḍgaromaśiraḥ kāyāttathā paraśunācchinat balāhakasya ca śiraḥ khaṭvāṅgenākaroddvidhā

उन्होंने परशु से खड्गरोमा का सिर धड़ से अलग कर दिया और खट्वांग से बलाहक के सिर को दो टुकड़ों में विभक्त कर दिया।

श्लोक 12 (shiva.rudra.160.12)

स बध्वा घस्मरं दैत्यं पाशेनाभ्यहनद्भुवि । महावीरं प्रचण्डं च चकर्त्त त्रिशिखेन ह

sa badhvā ghasmaraṁ daityaṁ pāśenābhyahanadbhuvi mahāvīraṁ pracaṇḍaṁ ca cakartta triśikhena ha

उन्होंने पाश से दैत्य घस्मर को बाँधकर भूमि पर पटक दिया, और महावीर प्रचण्ड को त्रिशूल से काट डाला।

श्लोक 13 (shiva.rudra.160.13)

वृषभेण हताः केचित्केचिद्बाणैर्निपातिता । न शेकुरसुराः स्थातुं गजा सिंहार्दिता इव

vṛṣabheṇa hatāḥ kecitkecidbāṇairnipātitā na śekurasurāḥ sthātuṁ gajā siṁhārditā iva

कोई वृषभ से मारे गये, कोई बाणों से गिरा दिये गये; असुर सिंह से आतंकित हाथियों के समान वहाँ खड़े नहीं रह सके।

श्लोक 14 (shiva.rudra.160.14)

ततः क्रोधपरीतात्मा दैत्यान् धिक् कृतवान् रणे । शुम्भादिकान्महादैत्यः प्रहसन्प्राह धैर्यवान्

tataḥ krodhaparītātmā daityān dhik kṛtavān raṇe śumbhādikānmahādaityaḥ prahasanprāha dhairyavān

तब क्रोध से आविष्ट, धैर्यवान् महादैत्य जलन्धर ने युद्ध में शुम्भ आदि दैत्यों को धिक्कारते हुए मुस्कुराकर कहा।

श्लोक 15 (shiva.rudra.160.15)

जलन्धर उवाच । किं व उच्चरितैर्मातुर्धावद्भिः पृष्ठतो हतैः । न हि भीतवधः श्लाघ्यः स्वर्गदः शूरमानिनाम्

jalandhara uvāca kiṁ va uccaritairmāturdhāvadbhiḥ pṛṣṭhato hataiḥ na hi bhītavadhaḥ ślāghyaḥ svargadaḥ śūramāninām

जलन्धर ने कहा — तुम्हारे इस भागने और पीठ पर वार खाने से क्या लाभ? भयभीत होकर मरना न तो प्रशंसनीय है, न ही स्वयं को शूर मानने वालों को स्वर्ग देने वाला है।

श्लोक 16 (shiva.rudra.160.16)

यदि वः प्रधने श्रद्धा सारो वा क्षुल्लका हृदि । अग्रे तिष्ठत मात्रं मे न चेद्ग्राम्यसुखे स्पृहा

yadi vaḥ pradhane śraddhā sāro vā kṣullakā hṛdi agre tiṣṭhata mātraṁ me na cedgrāmyasukhe spṛhā

यदि तुम्हें युद्ध में श्रद्धा है या हृदय में तनिक भी साहस है, तो केवल मेरे आगे खड़े रहो; यदि नहीं, तो निश्चय ही तुम्हें ग्राम्य सुख की ही लालसा है।

श्लोक 17 (shiva.rudra.160.17)

रणे मृत्युर्वरश्चास्ति सर्वकामफलप्रदः । यशःप्रदो विशेषेण मोक्षदोऽपि प्रकीर्त्तितः

raṇe mṛtyurvaraścāsti sarvakāmaphalapradaḥ yaśaḥprado viśeṣeṇa mokṣado'pi prakīrttitaḥ

युद्ध में मृत्यु ही श्रेष्ठ वर है, जो सभी कामनाओं का फल देने वाली है; वह विशेष रूप से यश देने वाली और मोक्षदायिनी भी कही गयी है।

श्लोक 18 (shiva.rudra.160.18)

सूर्यस्य मण्डलं भित्त्वा यायाद्वै परमं पदम् । परिव्राट् परमज्ञानी रणे यः सम्मुखे हतः

sūryasya maṇḍalaṁ bhittvā yāyādvai paramaṁ padam parivrāṭ paramajñānī raṇe yaḥ sammukhe hataḥ

जो युद्ध में शत्रु के सम्मुख वीरगति को प्राप्त होता है, वह सूर्यमण्डल को भेदकर परमपद को उसी प्रकार प्राप्त होता है, जैसे परमज्ञानी संन्यासी।

श्लोक 19 (shiva.rudra.160.19)

मृत्योर्भयं न कर्तव्यं कदाचित्कुत्रचिद्बुधैः । अनिवार्यो यतो ह्येष उपायैर्निखिलैरपि

mṛtyorbhayaṁ na kartavyaṁ kadācitkutracidbudhaiḥ anivāryo yato hyeṣa upāyairnikhilairapi

बुद्धिमानों को कभी भी, कहीं भी मृत्यु से भय नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह किसी भी उपाय से टाली नहीं जा सकती।

श्लोक 20 (shiva.rudra.160.20)

मृत्युर्जन्मवतां वीरा देहेन सह जायते । अद्य वाब्दशतान्ते वा मृत्युर्वै प्राणिनां ध्रुवः

mṛtyurjanmavatāṁ vīrā dehena saha jāyate adya vābdaśatānte vā mṛtyurvai prāṇināṁ dhruvaḥ

हे वीरो! जन्मधारियों के लिए मृत्यु देह के साथ ही उत्पन्न हो जाती है; आज हो या सौ वर्ष बाद, प्राणियों के लिए मृत्यु निश्चित है।

श्लोक 21 (shiva.rudra.160.21)

तन्मृत्युभयमुत्सार्य युध्यध्वं समरे मुदा । सर्वथा परमानन्द इहामुत्राप्यसंशयः

tanmṛtyubhayamutsārya yudhyadhvaṁ samare mudā sarvathā paramānanda ihāmutrāpyasaṁśayaḥ

अतः मृत्यु के भय को त्यागकर प्रसन्नतापूर्वक युद्ध करो; इसमें निःसंदेह इस लोक और परलोक दोनों में परमानन्द है।

श्लोक 22 (shiva.rudra.160.22)

सनत्कुमार उवाच । इत्युक्त्वा बोधयामास स्ववीरान्बहुशः स हि । धैर्यं दधुर्न ते भीत्या पलायन्तो रणाद् रुतम्

sanatkumāra uvāca ityuktvā bodhayāmāsa svavīrānbahuśaḥ sa hi dhairyaṁ dadhurna te bhītyā palāyanto raṇād rutam

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार कहकर उसने अपने वीरों को बार-बार समझाया; तब धैर्य धारण कर वे भय से रणभूमि से भागना छोड़ बैठे।

श्लोक 23 (shiva.rudra.160.23)

अथ दृष्ट्वा स्वसैन्यं तत्पलायनपरायणम् । चुक्रोधाति महावीरः सिन्धुपुत्रो जलन्धरः

atha dṛṣṭvā svasainyaṁ tatpalāyanaparāyaṇam cukrodhāti mahāvīraḥ sindhuputro jalandharaḥ

अपनी सेना को इस प्रकार पलायनोन्मुख देखकर महावीर सिन्धुपुत्र जलन्धर अत्यंत क्रोधित हो उठा।

श्लोक 24 (shiva.rudra.160.24)

ततः क्रोधपरीतात्मा क्रोधाद्रुद्रं जलन्धरः । आह्वापयामास रणे तीव्राशनिसमस्वनः

tataḥ krodhaparītātmā krodhādrudraṁ jalandharaḥ āhvāpayāmāsa raṇe tīvrāśanisamasvanaḥ

तब क्रोध से आविष्ट जलन्धर ने तीव्र वज्र के समान गर्जना करते हुए क्रोधपूर्वक रुद्र को युद्ध के लिए ललकारा।

श्लोक 25 (shiva.rudra.160.25)

जलन्धर उवाच । युद्ध्यस्वाद्य मया सार्धं किमेभिर्निहतैस्तव । यच्च किञ्चिद्बलं तेऽस्ति तद्दर्शय जटाधर

jalandhara uvāca yuddhyasvādya mayā sārdhaṁ kimebhirnihataistava yacca kiñcidbalaṁ te'sti taddarśaya jaṭādhara

जलन्धर ने कहा — आज मुझसे युद्ध करो; तुम्हारे इन मृतकों से क्या लाभ? हे जटाधर! जो कुछ भी तुम्हारा बल है, वह दिखाओ।

श्लोक 26 (shiva.rudra.160.26)

सनत्कुमार उवाच । इत्युक्त्वा बाण सप्तत्या जघान वृषभध्वजम् । जलन्धरो महादैत्यः शम्भुमक्लिष्टकारिणम्

sanatkumāra uvāca ityuktvā bāṇa saptatyā jaghāna vṛṣabhadhvajam jalandharo mahādaityaḥ śambhumakliṣṭakāriṇam

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार कहकर महादैत्य जलन्धर ने सत्तर बाणों से अक्लिष्टकारी वृषभध्वज शम्भु पर प्रहार किया।

श्लोक 27 (shiva.rudra.160.27)

तानप्राप्तान्महादेवो जलन्धरशरान्द्रुतम् । निजैर्हि निशितैर्बाणैश्चिच्छेद प्रहसन्निव

tānaprāptānmahādevo jalandharaśarāndrutam nijairhi niśitairbāṇaiściccheda prahasanniva

महादेव ने मानो हँसते हुए, अपने तीक्ष्ण बाणों से जलन्धर के उन बाणों को उनके पहुँचने से पूर्व ही शीघ्र काट डाला।

श्लोक 28 (shiva.rudra.160.28)

ततो हयान्ध्वजं छत्रं धनुश्चिच्छेद सप्तभिः । जलन्धरस्य दैत्यस्य न तच्चित्रं हरे मुने

tato hayāndhvajaṁ chatraṁ dhanuściccheda saptabhiḥ jalandharasya daityasya na taccitraṁ hare mune

तब हर ने सात बाणों से दैत्य जलन्धर के घोड़ों, ध्वजा, छत्र तथा धनुष को काट डाला — हे मुने! हर के लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।

श्लोक 29 (shiva.rudra.160.29)

स च्छिन्नधन्वा विरथः पाथोधितनयोऽसुरः । अभ्यधावच्छिवं क्रुद्धो गदामुद्यम्य वेगवान्

sa cchinnadhanvā virathaḥ pāthodhitanayo'suraḥ abhyadhāvacchivaṁ kruddho gadāmudyamya vegavān

धनुष कट जाने पर, रथहीन होकर वह सागरतनय असुर क्रुद्ध होकर गदा उठाये वेगपूर्वक शिव की ओर दौड़ा।

श्लोक 30 (shiva.rudra.160.30)

प्रभुर्गदां च तत्क्षिप्तां सहसैव महेश्वरः । पाराशर्य्य महालीलो द्रुतं बाणैर्द्विधाकरोत्

prabhurgadāṁ ca tatkṣiptāṁ sahasaiva maheśvaraḥ pārāśaryya mahālīlo drutaṁ bāṇairdvidhākarot

हे पाराशर्य! महालीलाधारी प्रभु महेश्वर ने उस फेंकी हुई गदा को तत्काल ही अपने बाणों से दो टुकड़ों में विभक्त कर दिया।

श्लोक 31 (shiva.rudra.160.31)

तथापि मुष्टिमुद्यम्य महाक्रुद्धो महासुरः । अभ्युद्ययौ महावेगाद्रुद्रं तं तज्जिघांसया

tathāpi muṣṭimudyamya mahākruddho mahāsuraḥ abhyudyayau mahāvegādrudraṁ taṁ tajjighāṁsayā

फिर भी वह महाक्रुद्ध महासुर मुट्ठी उठाकर उस रुद्र को मार डालने की इच्छा से अत्यंत वेगपूर्वक उसकी ओर दौड़ा।

श्लोक 32 (shiva.rudra.160.32)

तावदेवेश्वरेणाशु बाणोघैः स जलन्धरः । अक्लिष्टकर्मकारेण क्रोशमात्रमपाकृतः

tāvadeveśvareṇāśu bāṇoghaiḥ sa jalandharaḥ akliṣṭakarmakāreṇa krośamātramapākṛtaḥ

तभी अक्लिष्टकर्मा ईश्वर ने बाणों की बाढ़ से जलन्धर को एक कोस दूर तक पीछे हटा दिया।

श्लोक 33 (shiva.rudra.160.33)

ततो जलन्धरो दैत्यो रुद्रं मत्वा बलाधिकम् । ससर्ज मायां गान्धर्वीमद्भुतां रुद्रमोहिनीम्

tato jalandharo daityo rudraṁ matvā balādhikam sasarja māyāṁ gāndharvīmadbhutāṁ rudramohinīm

तब दैत्य जलन्धर ने रुद्र को अधिक बलवान् जानकर एक अद्भुत गान्धर्वी माया की रचना की, जो रुद्र को मोहित करने वाली थी।

श्लोक 34 (shiva.rudra.160.34)

तस्य मायाप्रभावात्तु गन्धर्वाप्सरसां गणाः । आविर्भूता अनेके च रुद्रमोहनहेतवे

tasya māyāprabhāvāttu gandharvāpsarasāṁ gaṇāḥ āvirbhūtā aneke ca rudramohanahetave

उसकी माया के प्रभाव से रुद्र को मोहित करने के लिए अनेक गन्धर्व और अप्सराओं के समूह प्रकट हुए।

श्लोक 35 (shiva.rudra.160.35)

ततो जगुश्च ननृतुर्गन्धर्वाप्सरसां गणाः । तालवेणुमृदङ्गांश्च वादयन्ति स्म चापरे

tato jaguśca nanṛturgandharvāpsarasāṁ gaṇāḥ tālaveṇumṛdaṅgāṁśca vādayanti sma cāpare

तब वे गन्धर्व-अप्सराओं के समूह गाने और नाचने लगे, तथा अन्य ताल, वेणु और मृदंग बजाने लगे।

श्लोक 36 (shiva.rudra.160.36)

तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं गणै रुद्रो विमोहितः । पतितान्यपि शस्त्राणि करेभ्यो न विवेद सः

tad dṛṣṭvā mahadāścaryaṁ gaṇai rudro vimohitaḥ patitānyapi śastrāṇi karebhyo na viveda saḥ

उस महान आश्चर्य को देखकर रुद्र गन्धर्वगणों से मोहित हो गये; उनके हाथों से गिरते हुए शस्त्रों का भी उन्हें भान नहीं रहा।

श्लोक 37 (shiva.rudra.160.37)

एकाग्रीभूतमालोक्य रुद्रं दैत्यो जलन्धरः । कामतस्स जगामाशु यत्र गौरी स्थिताऽभवत्

ekāgrībhūtamālokya rudraṁ daityo jalandharaḥ kāmatassa jagāmāśu yatra gaurī sthitā'bhavat

रुद्र को इस प्रकार तन्मय देखकर दैत्य जलन्धर काम-प्रेरित होकर शीघ्र ही वहाँ गया, जहाँ गौरी विराजमान थीं।

श्लोक 38 (shiva.rudra.160.38)

युद्धे शुम्भनिशुम्भाख्यौ स्थापयित्वा महाबलौ । दशदोर्दण्डपञ्चास्यस्त्रिनेत्रश्च जटाधरः

yuddhe śumbhaniśumbhākhyau sthāpayitvā mahābalau daśadordaṇḍapañcāsyastrinetraśca jaṭādharaḥ

युद्ध में महाबली शुम्भ और निशुम्भ को नियुक्त करके, वह दस भुजाओं, पाँच मुखों, तीन नेत्रों और जटाओं से युक्त होकर —

श्लोक 39 (shiva.rudra.160.39)

महावृषभमारूढस्सर्वथा रुद्रसन्निभः । आसुर्य्या मायया व्यास स बभूव जलन्धरः

mahāvṛṣabhamārūḍhassarvathā rudrasannibhaḥ āsuryyā māyayā vyāsa sa babhūva jalandharaḥ

— विशाल वृषभ पर आरूढ़ होकर सर्वथा रुद्र के समान बन गया; हे व्यास! आसुरी माया से जलन्धर ने ऐसा रूप धारण कर लिया।

श्लोक 40 (shiva.rudra.160.40)

अथ रुद्रं समायान्तमालोक्य भववल्लभा । अभ्याययौ सखीमध्यात्तद्दर्शनपथेऽभवत्

atha rudraṁ samāyāntamālokya bhavavallabhā abhyāyayau sakhīmadhyāttaddarśanapathe'bhavat

तब रुद्र को आता हुआ मानकर भव-वल्लभा पार्वती अपनी सखियों के मध्य से निकलकर उसके सम्मुख आ गयीं।

श्लोक 41 (shiva.rudra.160.41)

यावद्ददर्श चार्वङ्गी पार्वतीं दनुजेश्वरः । तावत्स वीर्यं मुमुचे जडाङ्गश्चाभवत्तदा

yāvaddadarśa cārvaṅgī pārvatīṁ danujeśvaraḥ tāvatsa vīryaṁ mumuce jaḍāṅgaścābhavattadā

ज्योंही उस दनुजेश्वर ने सुन्दरांगी पार्वती को देखा, त्योंही उसका वीर्यपात हो गया और उसका शरीर जड़वत् हो गया।

श्लोक 42 (shiva.rudra.160.42)

अथ ज्ञात्वा तदा गौरी दानवं भयविह्वला । जगामान्तर्हिता वेगात्सा तदोत्तरमानसम्

atha jñātvā tadā gaurī dānavaṁ bhayavihvalā jagāmāntarhitā vegātsā tadottaramānasam

तब गौरी ने उसे तुरंत दानव पहचानकर भयविह्वल होकर वेगपूर्वक अन्तर्हित हो उत्तरमानस सरोवर की ओर चली गयीं।

श्लोक 43 (shiva.rudra.160.43)

तामदृष्ट्वा ततो दैत्यः क्षणाद्विद्युल्लतामिव । जवेनागात्पुनर्योद्धुं यत्र देवो महेश्वरः

tāmadṛṣṭvā tato daityaḥ kṣaṇādvidyullatāmiva javenāgātpunaryoddhuṁ yatra devo maheśvaraḥ

उन्हें न पाकर वह दैत्य, बिजली की चमक के समान क्षणभर में, पुनः युद्ध करने के लिए वहाँ लौट गया, जहाँ देव महेश्वर थे।

श्लोक 44 (shiva.rudra.160.44)

पार्वत्यपि महाविष्णुं सस्मार मनसा तदा । तावद्ददर्श तं देवं सोपविष्टं समीपगम्

pārvatyapi mahāviṣṇuṁ sasmāra manasā tadā tāvaddadarśa taṁ devaṁ sopaviṣṭaṁ samīpagam

पार्वती ने भी मन ही मन महाविष्णु का स्मरण किया; तभी उन्होंने उस देव को समीप बैठे हुए देखा।

श्लोक 45 (shiva.rudra.160.45)

तं दृष्ट्वा पार्वती विष्णुं जगन्माता शिवप्रिया । प्रसन्नमनसोवाच प्रणमन्तं कृताञ्जलिम्

taṁ dṛṣṭvā pārvatī viṣṇuṁ jaganmātā śivapriyā prasannamanasovāca praṇamantaṁ kṛtāñjalim

विष्णु को देखकर जगन्माता शिवप्रिया पार्वती ने प्रसन्नचित्त होकर, हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए उनसे कहा।

श्लोक 46 (shiva.rudra.160.46)

पार्वत्युवाच । विष्णो जलन्धरो दैत्यः कृतवान्परमाद्भुतम् । तत्किं न विदितं तेऽस्ति चेष्टितं तस्य दुर्मतेः

pārvatyuvāca viṣṇo jalandharo daityaḥ kṛtavānparamādbhutam tatkiṁ na viditaṁ te'sti ceṣṭitaṁ tasya durmateḥ

पार्वती ने कहा — हे विष्णो! दैत्य जलन्धर ने अत्यंत अद्भुत कार्य किया है; क्या उस दुर्मति के इस कृत्य का तुम्हें ज्ञान नहीं है?

श्लोक 47 (shiva.rudra.160.47)

तच्छ्रुत्वा जगदम्बाया वचनं गरुडध्वजः । प्रत्युवाच शिवां नत्वा साञ्जलिर्नम्रकन्धरः

tacchrutvā jagadambāyā vacanaṁ garuḍadhvajaḥ pratyuvāca śivāṁ natvā sāñjalirnamrakandharaḥ

जगदम्बा के इन वचनों को सुनकर गरुड़ध्वज विष्णु ने शिवा को प्रणाम करके, नतमस्तक और हाथ जोड़कर उत्तर दिया।

श्लोक 48 (shiva.rudra.160.48)

श्रीभगवानुवाच । भवत्याः कृपया देवि तद्वृत्तं विदितं मया । यदाज्ञापय मां मातस्तत्कुर्य्यां त्वदनुज्ञया

śrībhagavānuvāca bhavatyāḥ kṛpayā devi tadvṛttaṁ viditaṁ mayā yadājñāpaya māṁ mātastatkuryyāṁ tvadanujñayā

श्रीभगवान् ने कहा — हे देवि! आपकी कृपा से मुझे वह सारा वृत्तान्त ज्ञात है। हे मातः! जो आज्ञा दें, आपकी अनुमति से मैं वही करूँगा।

श्लोक 49 (shiva.rudra.160.49)

सनत्कुमार उचाच तच्छ्रुत्वा विष्णुवचनं पुनरप्याह पार्वती ॥ हृषीकेशं जगन्माता धर्मनीतिं सुशिक्षयन्

sanatkumāra ucāca tacchrutvā viṣṇuvacanaṁ punarapyāha pārvatī hṛṣīkeśaṁ jaganmātā dharmanītiṁ suśikṣayan

सनत्कुमार ने कहा — विष्णु के इस वचन को सुनकर जगन्माता पार्वती ने हृषीकेश को धर्मनीति की भलीभाँति शिक्षा देते हुए पुनः कहा।

श्लोक 50 (shiva.rudra.160.50)

पार्वत्युवाच । तेनैव दर्शितः पन्था बुध्यस्व त्वं तथैव हि । तत्स्त्रीपातिव्रतं धर्मं भ्रष्टं कुरु मदाज्ञया

pārvatyuvāca tenaiva darśitaḥ panthā budhyasva tvaṁ tathaiva hi tatstrīpātivrataṁ dharmaṁ bhraṣṭaṁ kuru madājñayā

पार्वती ने कहा — उसी ने यह मार्ग दिखा दिया है, तुम भी उसी प्रकार समझो; मेरी आज्ञा से उस स्त्री के पातिव्रत धर्म को भ्रष्ट करो।

श्लोक 51 (shiva.rudra.160.51)

नान्यथा स महादैत्यो भवेद्वध्यो रमेश्वर । पातिव्रतसमो नान्यो धर्मोऽस्ति पृथिवीतले

nānyathā sa mahādaityo bhavedvadhyo rameśvara pātivratasamo nānyo dharmo'sti pṛthivītale

हे रमेश्वर! अन्यथा वह महादैत्य वध्य नहीं हो सकता; क्योंकि पृथ्वी पर पातिव्रत धर्म के समान कोई अन्य धर्म नहीं है।

श्लोक 52 (shiva.rudra.160.52)

सनत्कुमार उवाच । इत्यनुज्ञां समाकर्ण्य शिरसाधाय तां हरिः । छल कर्त्तुं जगामाशु पुनर्जालन्धरं पुरम्

sanatkumāra uvāca ityanujñāṁ samākarṇya śirasādhāya tāṁ hariḥ chala karttuṁ jagāmāśu punarjālandharaṁ puram

सनत्कुमार ने कहा — इस आज्ञा को सुनकर और उसे शिरोधार्य करके हरि छल करने के लिए शीघ्र ही पुनः जलन्धरपुर की ओर चल पड़े।

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