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रुद्र संहिता · अध्याय 163

देवस्तुति-वर्णन

अध्याय 162अध्याय-सूचीअध्याय 164

श्लोक 1 (shiva.rudra.163.1)

सनत्कुमार उवाच । अथ ब्रह्मादयो देवा मुनयश्चाखिलास्तथा । तुष्टुवुर्देवदेवेशं वाग्भिरिष्टाभिरानताः

sanatkumāra uvāca atha brahmādayo devā munayaścākhilāstathā tuṣṭuvurdevadeveśaṁ vāgbhiriṣṭābhirānatāḥ

सनत्कुमार ने कहा — तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवगण तथा समस्त मुनिजन नतमस्तक होकर प्रिय वचनों से देवदेवेश की स्तुति करने लगे।

श्लोक 2 (shiva.rudra.163.2)

देवा ऊचुः । देवदेव महादेव शरणागतवत्सल । साधुसौख्यप्रदस्त्वं हि सर्वदा भक्तदुःखहा

devā ūcuḥ devadeva mahādeva śaraṇāgatavatsala sādhusaukhyapradastvaṁ hi sarvadā bhaktaduḥkhahā

देवताओं ने कहा — हे देवाधिदेव महादेव! शरणागतवत्सल! आप सदा सज्जनों को सुख देने वाले तथा भक्तों के दुःख का नाश करने वाले हैं।

श्लोक 3 (shiva.rudra.163.3)

त्वं महाद्भुतसल्लीलो भक्तिगम्यो दुरासदः । दुराराध्योऽसतां नाथ प्रसन्नः सर्वदा भव

tvaṁ mahādbhutasallīlo bhaktigamyo durāsadaḥ durārādhyo'satāṁ nātha prasannaḥ sarvadā bhava

आपकी लीला अत्यंत अद्भुत है, आप भक्ति से ही सुलभ होते हैं किन्तु अन्यथा दुष्प्राप्य हैं; दुष्टों के लिए दुराराध्य हैं, हे नाथ! आप सदा प्रसन्न रहें।

श्लोक 4 (shiva.rudra.163.4)

वेदोऽपि महिमानं ते न जानाति हि तत्त्वतः । यथामति महात्मानः सर्वे गायन्ति सद्यशः

vedo'pi mahimānaṁ te na jānāti hi tattvataḥ yathāmati mahātmānaḥ sarve gāyanti sadyaśaḥ

वेद भी आपकी महिमा को यथार्थतः नहीं जान पाता; सभी महात्मा अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार ही आपके सद्यश का गान करते हैं।

श्लोक 5 (shiva.rudra.163.5)

माहात्म्यमतिगूढं ते सहस्रवदनादयः । सदा गायन्ति सुप्रीत्या पुनन्ति स्वगिरं हि ते

māhātmyamatigūḍhaṁ te sahasravadanādayaḥ sadā gāyanti suprītyā punanti svagiraṁ hi te

आपकी महिमा अत्यंत गूढ़ है; सहस्रमुख शेष आदि सदा प्रीतिपूर्वक उसका गान करते हुए अपनी वाणी को ही पवित्र करते हैं।

श्लोक 6 (shiva.rudra.163.6)

कृपया तव देवेश ब्रह्मज्ञानी भवेज्जडः । भक्तिगम्यः सदा त्वं वा इति वेदा ब्रुवन्ति हि

kṛpayā tava deveśa brahmajñānī bhavejjaḍaḥ bhaktigamyaḥ sadā tvaṁ vā iti vedā bruvanti hi

हे देवेश! आपकी कृपा से जड़ बुद्धि वाला भी ब्रह्मज्ञानी हो जाता है; वेद भी यही कहते हैं कि आप सदा भक्ति से ही सुलभ हैं।

श्लोक 7 (shiva.rudra.163.7)

त्वं वै दीनदयालुश्च सर्वत्र व्यापकः सदा । आविर्भवसि सद्भक्त्या निर्विकारःसतां गतिः

tvaṁ vai dīnadayāluśca sarvatra vyāpakaḥ sadā āvirbhavasi sadbhaktyā nirvikāraḥsatāṁ gatiḥ

आप दीनों पर दया करने वाले तथा सर्वत्र सदा व्याप्त हैं; सच्ची भक्ति से ही आप प्रकट होते हैं, निर्विकार होकर भी सज्जनों की गति हैं।

श्लोक 8 (shiva.rudra.163.8)

भक्त्यैव ते महेशान बहवः सिद्धिमागताः । इह सर्वसुखं भुक्त्वा दुःखिता निर्विकारतः

bhaktyaiva te maheśāna bahavaḥ siddhimāgatāḥ iha sarvasukhaṁ bhuktvā duḥkhitā nirvikārataḥ

हे महेशान! आपकी भक्ति से ही अनेक जन सिद्धि को प्राप्त हुए हैं; उन्होंने इस लोक में समस्त सुख भोगकर, दुःखों का अंत कर, निर्विकार पद प्राप्त किया।

श्लोक 9 (shiva.rudra.163.9)

पुरा यदुपतिर्भक्तो दाशार्हः सिद्धिमागतः । कलावती च तत्पत्नी भक्त्यैव परमां प्रभो

purā yadupatirbhakto dāśārhaḥ siddhimāgataḥ kalāvatī ca tatpatnī bhaktyaiva paramāṁ prabho

पूर्वकाल में भक्त यदुपति दाशार्ह ने सिद्धि प्राप्त की, और हे प्रभो! उनकी पत्नी कलावती ने भी केवल भक्ति से ही परम गति पाई।

श्लोक 10 (shiva.rudra.163.10)

तथा मित्रसहो राजा मदयन्ती च तत्प्रिया । भक्त्यैव तव देवेश कैवल्यं परमं ययौ

tathā mitrasaho rājā madayantī ca tatpriyā bhaktyaiva tava deveśa kaivalyaṁ paramaṁ yayau

इसी प्रकार राजा मित्रसह और उनकी प्रिया मदयन्ती ने भी, हे देवेश! केवल आपकी भक्ति से ही परम कैवल्य प्राप्त किया।

श्लोक 11 (shiva.rudra.163.11)

सौमिनी नाम तनया कैकेयाग्रभुवस्तथा । तव भक्त्या सुखं प्राप परं सद्योगिदुर्लभम्

sauminī nāma tanayā kaikeyāgrabhuvastathā tava bhaktyā sukhaṁ prāpa paraṁ sadyogidurlabham

इसी प्रकार कैकेय-वंश की ज्येष्ठ कन्या सौमिनी नामक कन्या ने आपकी भक्ति से वह परम सुख प्राप्त किया, जो सच्चे योगियों के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 12 (shiva.rudra.163.12)

विमर्षणो नृपवरः सप्तजन्मावधि प्रभो । भुक्त्वा भोगांश्च विविधांस्त्वद्भक्त्या प्राप सद्गतिम्

vimarṣaṇo nṛpavaraḥ saptajanmāvadhi prabho bhuktvā bhogāṁśca vividhāṁstvadbhaktyā prāpa sadgatim

हे प्रभो! राजश्रेष्ठ विमर्षण ने सात जन्मों तक विविध भोग भोगकर आपकी भक्ति से सद्गति प्राप्त की।

श्लोक 13 (shiva.rudra.163.13)

चन्द्रसेनो नृपवरः त्वद्भक्त्या सर्वभोगभुक् । दुःखमुक्तः सुखं प्राप परमत्र परत्र च

candraseno nṛpavaraḥ tvadbhaktyā sarvabhogabhuk duḥkhamuktaḥ sukhaṁ prāpa paramatra paratra ca

राजश्रेष्ठ चन्द्रसेन ने आपकी भक्ति से समस्त भोगों को भोगते हुए दुःख से मुक्त होकर इस लोक तथा परलोक दोनों में सुख प्राप्त किया।

श्लोक 14 (shiva.rudra.163.14)

गोपीपुत्रः श्रीकरस्ते भक्त्या भुक्त्वेह सद्गतिम् । परं सुखं महावीरशिष्यः प्राप परत्र वै

gopīputraḥ śrīkaraste bhaktyā bhuktveha sadgatim paraṁ sukhaṁ mahāvīraśiṣyaḥ prāpa paratra vai

गोपी-पुत्र श्रीकर ने आपकी भक्ति से इस लोक में भोग भोगकर सद्गति पाई, तथा महावीर के शिष्य ने परलोक में परम सुख प्राप्त किया।

श्लोक 15 (shiva.rudra.163.15)

त्वं सत्यरथभूजानेर्दुःखहर्ता गतिप्रदः । धर्मगुप्तं राजपुत्रमतार्षीःसुखिनं त्विह

tvaṁ satyarathabhūjānerduḥkhahartā gatipradaḥ dharmaguptaṁ rājaputramatārṣīḥsukhinaṁ tviha

आप सत्यरथ के पुत्र के दुःख को हरने वाले तथा उसे गति प्रदान करने वाले हैं; आपने राजकुमार धर्मगुप्त को भी इस लोक में सुखी बनाया।

श्लोक 16 (shiva.rudra.163.16)

तथा शुचिव्रतं विप्रमदरिद्रं महाप्रभो । त्वद्भक्तिवर्तिनं मात्रा ज्ञानिनं कृपयाऽकरोः

tathā śucivrataṁ vipramadaridraṁ mahāprabho tvadbhaktivartinaṁ mātrā jñāninaṁ kṛpayā'karoḥ

हे महाप्रभो! इसी प्रकार निर्धन ब्राह्मण शुचिव्रत को, जो आपकी भक्ति में रत था, आपने अपनी कृपा से महान ज्ञानी बना दिया।

श्लोक 17 (shiva.rudra.163.17)

चित्रवर्मा नृपवरस्त्वद्भक्त्या प्राप सद्गतिम् । इह लोके सदा भुक्त्वा भोगानमरदुर्लभान्

citravarmā nṛpavarastvadbhaktyā prāpa sadgatim iha loke sadā bhuktvā bhogānamaradurlabhān

राजश्रेष्ठ चित्रवर्मा ने आपकी भक्ति से, इस लोक में सदा देवताओं को भी दुर्लभ भोगों को भोगकर, सद्गति प्राप्त की।

श्लोक 18 (shiva.rudra.163.18)

चन्द्राङ्गदो राजपुत्रः सीमन्तिन्या स्त्रिया सह । विहाय सकलं दुःखं सुखी प्राप महागतिम्

candrāṅgado rājaputraḥ sīmantinyā striyā saha vihāya sakalaṁ duḥkhaṁ sukhī prāpa mahāgatim

राजकुमार चन्द्राङ्गद ने अपनी पत्नी सीमन्तिनी के साथ समस्त दुःखों को त्यागकर सुखपूर्वक महान गति प्राप्त की।

श्लोक 19 (shiva.rudra.163.19)

द्विजो मन्दरनामापि वेश्यागामी खलोऽधमः । त्वद्भक्तः शिव सम्पूज्य तया सह गतिं गतः

dvijo mandaranāmāpi veśyāgāmī khalo'dhamaḥ tvadbhaktaḥ śiva sampūjya tayā saha gatiṁ gataḥ

हे शिव! मन्दर नामक ब्राह्मण, यद्यपि वेश्यागामी दुष्ट और अधम था, तथापि आपका भक्त होकर आपकी पूजा करके उस वेश्या के साथ ही सद्गति को प्राप्त हुआ।

श्लोक 20 (shiva.rudra.163.20)

भद्रायुस्ते नृपसुतः सुखमाप गतव्यथः । त्वद्भक्तिकृपया मात्रा गतिं च परमां प्रभो

bhadrāyuste nṛpasutaḥ sukhamāpa gatavyathaḥ tvadbhaktikṛpayā mātrā gatiṁ ca paramāṁ prabho

हे प्रभो! आपके भक्त राजपुत्र भद्रायु ने पीड़ा से मुक्त होकर सुख प्राप्त किया, तथा आपकी भक्ति की कृपा से उनकी माता ने भी परम गति प्राप्त की।

श्लोक 21 (shiva.rudra.163.21)

सर्वस्त्रीभोगनिरतो दुर्जनस्तव सेवया । विमुक्तोऽभूदपि सदाऽभक्ष्यभोजी महेश्वर

sarvastrībhoganirato durjanastava sevayā vimukto'bhūdapi sadā'bhakṣyabhojī maheśvara

हे महेश्वर! समस्त स्त्रियों के भोग में लिप्त एवं सदा अभक्ष्य भोजन करने वाला दुर्जन भी आपकी सेवा से मुक्त हो गया।

श्लोक 22 (shiva.rudra.163.22)

शम्बरः शङ्करे भक्तश्चिताभस्मधरः सदा । नियमाद्भस्मनः शम्भो स्वस्त्रिया ते पुरं गतः

śambaraḥ śaṅkare bhaktaścitābhasmadharaḥ sadā niyamādbhasmanaḥ śambho svastriyā te puraṁ gataḥ

शम्बर नामक भक्त सदा चिता-भस्म धारण किया करता था; हे शम्भो! भस्म-धारण के नियम के प्रभाव से वह अपनी पत्नी सहित आपके परमधाम को प्राप्त हुआ।

श्लोक 23 (shiva.rudra.163.23)

भद्रसेनस्य तनयस्तथा मन्त्रिसुतः प्रभो । सुधर्मशुभकर्माणो सदा रुद्राक्षधारिणौ

bhadrasenasya tanayastathā mantrisutaḥ prabho sudharmaśubhakarmāṇo sadā rudrākṣadhāriṇau

हे प्रभो! इसी प्रकार भद्रसेन का पुत्र तथा मंत्री का पुत्र, दोनों ही सुधर्मपरायण, शुभकर्मा और सदा रुद्राक्ष धारण करने वाले थे —

श्लोक 24 (shiva.rudra.163.24)

त्वत्कृपातश्च तौ मुक्तावास्तां भुक्त्वेह सत्सुखम् । पूर्वजन्मनि यौ कीशकुक्कुटौ रुद्रभूषणौ

tvatkṛpātaśca tau muktāvāstāṁ bhuktveha satsukham pūrvajanmani yau kīśakukkuṭau rudrabhūṣaṇau

आपकी कृपा से वे दोनों इस लोक में सच्चा सुख भोगकर मुक्त हो गये — जो पूर्वजन्म में रुद्र के आभूषण (रुद्राक्ष) से सुशोभित बन्दर और मुर्गा थे।

श्लोक 25 (shiva.rudra.163.25)

पिङ्गला च महानन्दा वेश्ये द्वे तव भक्तितः । सद्गतिं प्रापतुर्नाथ भक्तोद्धारपरायण

piṅgalā ca mahānandā veśye dve tava bhaktitaḥ sadgatiṁ prāpaturnātha bhaktoddhāraparāyaṇa

हे भक्तोद्धारपरायण नाथ! पिंगला और महानन्दा नामक दो वेश्याएँ भी आपकी भक्ति से सद्गति को प्राप्त हुईं।

श्लोक 26 (shiva.rudra.163.26)

शारदा विप्रतनया बालवैधव्यमागता । तव भक्तेः प्रभावात्तु पुत्रसौभाग्यवत्यभूत्

śāradā vipratanayā bālavaidhavyamāgatā tava bhakteḥ prabhāvāttu putrasaubhāgyavatyabhūt

शारदा नामक ब्राह्मण-कन्या, जो बाल्यावस्था में ही विधवा हो गयी थी, आपकी भक्ति के प्रभाव से पुत्रवती एवं सौभाग्यवती हो गयी।

श्लोक 27 (shiva.rudra.163.27)

बिन्दुगो द्विजमात्रो हि वेश्याभोगी च तत्प्रिया । वञ्चुका त्वद्यशः श्रुत्वा परमां गतिमाययौ

bindugo dvijamātro hi veśyābhogī ca tatpriyā vañcukā tvadyaśaḥ śrutvā paramāṁ gatimāyayau

बिन्दुग नामक ब्राह्मण, जो मात्र नाममात्र का द्विज था और वेश्यागामी था, तथा उसकी छलिनी प्रेयसी — दोनों ही आपका यश सुनकर परम गति को प्राप्त हुए।

श्लोक 28 (shiva.rudra.163.28)

इत्यादि बहवः सिद्धिं गता जीवास्तव प्रभो । भक्तिभावान्महेशान दीनबन्धो कृपालय

ityādi bahavaḥ siddhiṁ gatā jīvāstava prabho bhaktibhāvānmaheśāna dīnabandho kṛpālaya

हे प्रभो! हे महेशान! हे दीनबन्धो! हे कृपालय! इस प्रकार अनेक जीव आपकी भक्ति-भावना से सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 29 (shiva.rudra.163.29)

त्वं परः प्रकृतेर्ब्रह्म पुरुषात्परमेश्वर । निर्गुणस्त्रिगुणाधारो ब्रह्मविष्णुहरात्मकः

tvaṁ paraḥ prakṛterbrahma puruṣātparameśvara nirguṇastriguṇādhāro brahmaviṣṇuharātmakaḥ

हे परमेश्वर! आप प्रकृति से परे ब्रह्म हैं, पुरुष से भी परे हैं; निर्गुण होते हुए भी त्रिगुणों के आधार हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और हर — तीनों रूप आप ही हैं।

श्लोक 30 (shiva.rudra.163.30)

नानाकर्मकरो नित्यं निर्विकारोऽखिलेश्वरः । वयं ब्रह्मादयः सर्वे तव दासा महेश्वर

nānākarmakaro nityaṁ nirvikāro'khileśvaraḥ vayaṁ brahmādayaḥ sarve tava dāsā maheśvara

आप नाना कर्म करते हुए भी नित्य निर्विकार हैं तथा समस्त जगत के ईश्वर हैं; हे महेश्वर! हम ब्रह्मादि सभी आपके ही दास हैं।

श्लोक 31 (shiva.rudra.163.31)

प्रसन्नो भव देवेश रक्षास्मान्सर्वदा शिव । त्वत्प्रजाश्च वयं नाथ सदा त्वच्छरणं गताः

prasanno bhava deveśa rakṣāsmānsarvadā śiva tvatprajāśca vayaṁ nātha sadā tvaccharaṇaṁ gatāḥ

हे देवेश! हे शिव! प्रसन्न होइए और सदा हमारी रक्षा कीजिए। हे नाथ! हम आपकी ही प्रजा हैं तथा सदा आपकी शरण में हैं।

श्लोक 32 (shiva.rudra.163.32)

सनत्कुमार उवाच । इति स्तुत्वा च ते देवा ब्रह्माद्याः समुनीश्वराः । तूष्णीं बभूवुर्हि तदा शिवाङ्घ्रिद्वन्द्वचेतसः

sanatkumāra uvāca iti stutvā ca te devā brahmādyāḥ samunīśvarāḥ tūṣṇīṁ babhūvurhi tadā śivāṅghridvandvacetasaḥ

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार स्तुति करके ब्रह्मा आदि देवगण तथा महर्षिगण मौन हो गये, उनका चित्त शिव के चरण-युगल में लीन हो गया।

श्लोक 33 (shiva.rudra.163.33)

अथ शम्भुर्महेशानः श्रुत्वा देवस्तुतिं शुभाम् । दत्त्वा वरान् वरान् सद्यः तत्रैवान्तर्दधे प्रभुः

atha śambhurmaheśānaḥ śrutvā devastutiṁ śubhām dattvā varān varān sadyaḥ tatraivāntardadhe prabhuḥ

तब शम्भु महेशान ने देवताओं की शुभ स्तुति सुनकर तत्काल उन्हें उत्तम वर देकर वहीं अन्तर्धान हो गये।

श्लोक 34 (shiva.rudra.163.34)

देवाःसर्वेऽपि मुदिता ब्रह्माद्या हतशत्रवः । स्वं स्वं धाम ययुः प्रीता गायन्तः शिवसद्यशः

devāḥsarve'pi muditā brahmādyā hataśatravaḥ svaṁ svaṁ dhāma yayuḥ prītā gāyantaḥ śivasadyaśaḥ

शत्रु के नष्ट हो जाने से आनन्दित ब्रह्मादि समस्त देवगण प्रसन्नतापूर्वक शिव के सद्यश का गान करते हुए अपने-अपने धाम को चले गये।

श्लोक 35 (shiva.rudra.163.35)

इदं परममाख्यानं जलन्धरविमर्दनम् । महेशचरितं पुण्यं महाघौघविनाशनम्

idaṁ paramamākhyānaṁ jalandharavimardanam maheśacaritaṁ puṇyaṁ mahāghaughavināśanam

जलन्धर के विनाश का यह परम आख्यान, महेश का यह पुण्य चरित्र, महापापों के समूह का नाश करने वाला है।

श्लोक 36 (shiva.rudra.163.36)

देवस्तुतिरियं पुण्या सर्वपापप्रणाशिनी । सर्वसौख्यप्रदा नित्यं महेशानन्ददायिनी

devastutiriyaṁ puṇyā sarvapāpapraṇāśinī sarvasaukhyapradā nityaṁ maheśānandadāyinī

यह पुण्यमयी देवस्तुति समस्त पापों का नाश करने वाली है, सदा सर्वसुख प्रदान करने वाली तथा महेश के आनन्द की दात्री है।

श्लोक 37 (shiva.rudra.163.37)

यः पठेत्पाठयेद्वापि समाख्यानमिदं द्वयम् । स भुक्त्वेह परं सौख्यं गाणपत्यमवाप्नुयात्

yaḥ paṭhetpāṭhayedvāpi samākhyānamidaṁ dvayam sa bhuktveha paraṁ saukhyaṁ gāṇapatyamavāpnuyāt

जो कोई इस द्विविध आख्यान को पढ़े या पढ़ाये, वह इस लोक में परम सुख भोगकर गणपति-पद को प्राप्त होता है।

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