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रुद्र संहिता · अध्याय 165

शङ्खचूड-उत्पत्ति-वर्णन

अध्याय 164अध्याय-सूचीअध्याय 166

श्लोक 1 (shiva.rudra.165.1)

सनत्कुमार उवाच । अथान्यच्छम्भुचरितं प्रेमतः शृणु वै मुने । यस्य श्रवणमात्रेण शिवभक्तिर्दृढा भवेत्

sanatkumāra uvāca athānyacchambhucaritaṁ premataḥ śṛṇu vai mune yasya śravaṇamātreṇa śivabhaktirdṛḍhā bhavet

सनत्कुमार ने कहा — हे मुने! अब शम्भु का एक अन्य चरित्र प्रेमपूर्वक सुनो, जिसके श्रवणमात्र से शिवभक्ति दृढ़ हो जाती है।

श्लोक 2 (shiva.rudra.165.2)

शङ्खचूडाभिधो वीरो दानवो देवकण्टकः । यथा शिवेन निहतो रणमूर्ध्नि त्रिशूलतः

śaṅkhacūḍābhidho vīro dānavo devakaṇṭakaḥ yathā śivena nihato raṇamūrdhni triśūlataḥ

शङ्खचूड नामक वीर दानव, जो देवताओं के लिए कण्टकस्वरूप था, जिस प्रकार शिव द्वारा युद्ध के चरम पर त्रिशूल से मारा गया —

श्लोक 3 (shiva.rudra.165.3)

तच्छम्भुचरितं दिव्यं पवित्रं पापनाशनम् । शृणु व्यास सुसम्प्रीत्या वच्मि सुस्नेहतस्तव

tacchambhucaritaṁ divyaṁ pavitraṁ pāpanāśanam śṛṇu vyāsa susamprītyā vacmi susnehatastava

वह शम्भु का दिव्य, पवित्र और पापनाशक चरित्र है — हे व्यास! उसे प्रेमपूर्वक सुनो, मैं तुम्हें स्नेहवश ही यह कह रहा हूँ।

श्लोक 4 (shiva.rudra.165.4)

मरीचेस्तनयो धातुः पुत्रो यः कश्यपो मुनिः । स धर्मिष्ठःसृष्टिकर्त्ता विद्याज्ञप्तः प्रजापतिः

marīcestanayo dhātuḥ putro yaḥ kaśyapo muniḥ sa dharmiṣṭhaḥsṛṣṭikarttā vidyājñaptaḥ prajāpatiḥ

मरीचि के पुत्र धातु हुए, और धातु के पुत्र मुनि कश्यप हुए, जो अत्यंत धर्मिष्ठ, सृष्टिकर्ता, विद्यासम्पन्न प्रजापति थे।

श्लोक 5 (shiva.rudra.165.5)

दक्षः प्रीत्या ददौ तस्मै निजकन्यास्त्रयोदश । तासां प्रसूतिः प्रसभं न कथ्या बहुविस्तृताः

dakṣaḥ prītyā dadau tasmai nijakanyāstrayodaśa tāsāṁ prasūtiḥ prasabhaṁ na kathyā bahuvistṛtāḥ

दक्ष ने प्रेमपूर्वक उन्हें अपनी तेरह कन्याएँ प्रदान कीं; उनकी सन्तानें इतनी विस्तृत थीं कि उनका वर्णन करना सम्भव नहीं।

श्लोक 6 (shiva.rudra.165.6)

यत्र देवादिनिखिलं चराचरमभूज्जगत् । विस्तरात्तत्प्रवक्तुं च कः क्षमोऽस्ति त्रिलोकके

yatra devādinikhilaṁ carācaramabhūjjagat vistarāttatpravaktuṁ ca kaḥ kṣamo'sti trilokake

उन्हीं से देवादि सहित यह सम्पूर्ण चराचर जगत उत्पन्न हुआ — त्रिलोक में ऐसा कौन समर्थ है, जो उसका विस्तारपूर्वक वर्णन कर सके?

श्लोक 7 (shiva.rudra.165.7)

प्रस्तुतं शृणु वृत्तान्तं शम्भुलीलान्वितं च यत् । तदेव कथयाम्यद्य शृणु भक्तिप्रवर्द्धनम्

prastutaṁ śṛṇu vṛttāntaṁ śambhulīlānvitaṁ ca yat tadeva kathayāmyadya śṛṇu bhaktipravarddhanam

अब प्रस्तुत उस वृत्तान्त को सुनो, जो शम्भु की लीला से संयुक्त है; वही मैं आज कह रहा हूँ, भक्ति बढ़ाने वाले इस वृत्तान्त को सुनो।

श्लोक 8 (shiva.rudra.165.8)

तासु कश्यपपत्नीषु दनुस्त्वेका वराङ्गना । महारूपवती साध्वी पतिसौभाग्यवर्द्धिता

tāsu kaśyapapatnīṣu danustvekā varāṅganā mahārūpavatī sādhvī patisaubhāgyavarddhitā

कश्यप की उन पत्नियों में से एक थीं दनु नामक श्रेष्ठ नारी — अत्यंत रूपवती, साध्वी तथा पति के सौभाग्य से समृद्ध।

श्लोक 9 (shiva.rudra.165.9)

आसंस्तस्या दनोः पुत्रा बहवो बलवत्तराः । तेषां नामानि नोच्यन्ते विस्तारभयतो मुने

āsaṁstasyā danoḥ putrā bahavo balavattarāḥ teṣāṁ nāmāni nocyante vistārabhayato mune

उस दनु के अनेक अत्यंत बलशाली पुत्र थे; हे मुने! विस्तार-भय से उनके नाम यहाँ नहीं गिनाये जा रहे।

श्लोक 10 (shiva.rudra.165.10)

तेष्वेको विप्रचित्तिस्तु महाबलपराक्रमः । तत्पुत्रो धार्मिको दम्भो विष्णुभक्तो जितेन्द्रियः

teṣveko vipracittistu mahābalaparākramaḥ tatputro dhārmiko dambho viṣṇubhakto jitendriyaḥ

उनमें एक विप्रचित्ति नामक महाबलपराक्रमी पुत्र था; उसका पुत्र धार्मिक, विष्णुभक्त तथा जितेन्द्रिय दम्भ था।

श्लोक 11 (shiva.rudra.165.11)

नासीत्तत्तनयो वीरस्ततश्चिन्तापरोऽभवत् । शुक्राचार्यं गुरुं कृत्वा कृष्णमन्त्रमवाप्य च

nāsīttattanayo vīrastataścintāparo'bhavat śukrācāryaṁ guruṁ kṛtvā kṛṣṇamantramavāpya ca

उसके कोई वीर पुत्र नहीं था, अतः वह चिन्तित रहने लगा; तब शुक्राचार्य को गुरु बनाकर तथा कृष्णमन्त्र प्राप्त कर —

श्लोक 12 (shiva.rudra.165.12)

तपश्चकार परमं पुष्करे लक्षवर्षकम् । कृष्णमन्त्रं जजापैव दृढं बद्ध्वासनं चिरम्

tapaścakāra paramaṁ puṣkare lakṣavarṣakam kṛṣṇamantraṁ jajāpaiva dṛḍhaṁ baddhvāsanaṁ ciram

उसने पुष्कर में एक लाख वर्षों तक परम तपस्या की तथा दृढ़तापूर्वक आसन लगाकर दीर्घकाल तक कृष्णमन्त्र का जप करता रहा।

श्लोक 13 (shiva.rudra.165.13)

तपः प्रकुर्वतस्तस्य मूर्ध्नो निःसृत्य प्रज्वलत् । विससार च सर्वत्र तत्तेजो हि सुदुःसहम्

tapaḥ prakurvatastasya mūrdhno niḥsṛtya prajvalat visasāra ca sarvatra tattejo hi suduḥsaham

तपस्या करते हुए उसके मस्तक से एक प्रज्वलित तेज निकलकर सर्वत्र फैल गया, जो अत्यंत असहनीय था।

श्लोक 14 (shiva.rudra.165.14)

तेन तप्ताः सुराः सर्वे मुनयो मनवस्तथा । सुनासीरं पुरस्कृत्य ब्रह्माणं शरणं ययुः

tena taptāḥ surāḥ sarve munayo manavastathā sunāsīraṁ puraskṛtya brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ

उससे संतप्त हुए समस्त देवता, मुनि तथा मनुगण इन्द्र को आगे कर ब्रह्मा की शरण में गये।

श्लोक 15 (shiva.rudra.165.15)

प्रणम्य च विधातारं दातारं सर्वसम्पदाम् । तुष्टुवुर्विकलाः प्रोचुः स्ववृत्तान्तं विशेषतः

praṇamya ca vidhātāraṁ dātāraṁ sarvasampadām tuṣṭuvurvikalāḥ procuḥ svavṛttāntaṁ viśeṣataḥ

सर्वसम्पदाओं के दाता विधाता को प्रणाम कर, व्याकुल होकर उन्होंने उनकी स्तुति की तथा अपना समस्त वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह सुनाया।

श्लोक 16 (shiva.rudra.165.16)

तदाकर्ण्य विधातापि वैकुण्ठं तैर्ययौ सह । तदेव विज्ञापयितुं निखिलेन हि विष्णवे

tadākarṇya vidhātāpi vaikuṇṭhaṁ tairyayau saha tadeva vijñāpayituṁ nikhilena hi viṣṇave

यह सुनकर विधाता भी उनके साथ वैकुण्ठ को गये, ताकि विष्णु को समस्त वृत्तान्त की सूचना दे सकें।

श्लोक 17 (shiva.rudra.165.17)

तत्र गत्वा त्रिलोकेशं विष्णुं रक्षाकरं परम् । प्रणम्य तुष्टुवुःसर्वे करौ बद्ध्वा विनम्रकाः

tatra gatvā trilokeśaṁ viṣṇuṁ rakṣākaraṁ param praṇamya tuṣṭuvuḥsarve karau baddhvā vinamrakāḥ

वहाँ जाकर त्रिलोकेश्वर, परम रक्षक विष्णु को प्रणाम कर, समस्त देवगण हाथ जोड़े विनम्र होकर उनकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 18 (shiva.rudra.165.18)

देवा ऊचुः । देवदेव न जानीमो जातं किं कारणं त्विह । सन्तप्ताः सकला जातास्तेजसा केन तद्वद

devā ūcuḥ devadeva na jānīmo jātaṁ kiṁ kāraṇaṁ tviha santaptāḥ sakalā jātāstejasā kena tadvada

देवताओं ने कहा — हे देवदेव! हम नहीं जानते कि यहाँ क्या घटित हुआ है और उसका कारण क्या है; हम सभी संतप्त हो गये हैं, कृपया बताइये यह किसके तेज से हुआ है।

श्लोक 19 (shiva.rudra.165.19)

तप्तात्मनां त्वमविता दीनबन्धोऽनुजीविनाम् । रक्ष रक्ष रमानाथ शरण्यः शरणागतान्

taptātmanāṁ tvamavitā dīnabandho'nujīvinām rakṣa rakṣa ramānātha śaraṇyaḥ śaraṇāgatān

हे दीनबन्धो! आप ही संतप्त प्राणियों तथा आश्रितों के रक्षक हैं। हे रमानाथ! हे शरण्य! शरणागतों की रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।

श्लोक 20 (shiva.rudra.165.20)

सनत्कुमार उवाच । इति श्रुत्वा वचो विष्णुर्ब्रह्मादीनां दिवौकसाम् । उवाच विहसन्प्रेम्णा शरणागतवत्सलः

sanatkumāra uvāca iti śrutvā vaco viṣṇurbrahmādīnāṁ divaukasām uvāca vihasanpremṇā śaraṇāgatavatsalaḥ

सनत्कुमार ने कहा — ब्रह्मादि देवताओं की यह बात सुनकर शरणागतवत्सल विष्णु मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले।

श्लोक 21 (shiva.rudra.165.21)

विष्णुरुवाच । सुस्वस्था भवताव्यग्रा न भयं कुरुतामराः । नोपप्लवा भविष्यन्ते लयकालो न विद्यते

viṣṇuruvāca susvasthā bhavatāvyagrā na bhayaṁ kurutāmarāḥ nopaplavā bhaviṣyante layakālo na vidyate

विष्णु ने कहा — हे अमरो! स्वस्थ और निश्चिन्त रहो, भय मत करो; कोई उपद्रव उत्पन्न नहीं होगा और न ही यह प्रलयकाल है।

श्लोक 22 (shiva.rudra.165.22)

दानवो दम्भनामा हि मद्भक्तः कुरुते तपः । पुत्रार्थी शमयिष्यामि तमहं वरदानतः

dānavo dambhanāmā hi madbhaktaḥ kurute tapaḥ putrārthī śamayiṣyāmi tamahaṁ varadānataḥ

दम्भ नामक एक दानव, जो मेरा भक्त है, पुत्र-प्राप्ति की कामना से तपस्या कर रहा है; मैं उसे वर देकर शान्त कर दूँगा।

श्लोक 23 (shiva.rudra.165.23)

सनत्कुमार उवाच । इत्युक्तास्ते सुराःसर्वे धैर्यमालम्ब्य वै मुने । ययुर्ब्रह्मादयः सुस्थाः स्वस्वधामानि सर्वशः

sanatkumāra uvāca ityuktāste surāḥsarve dhairyamālambya vai mune yayurbrahmādayaḥ susthāḥ svasvadhāmāni sarvaśaḥ

सनत्कुमार ने कहा — हे मुने! इस प्रकार आश्वस्त होकर धैर्य धारण कर ब्रह्मादि समस्त देवगण निश्चिन्त होकर अपने-अपने धाम को चले गये।

श्लोक 24 (shiva.rudra.165.24)

अच्युतोऽपि वरं दातुं पुष्करं सञ्जगाम ह । तपश्चरति यत्रासौ दम्भनामा हि दानवः

acyuto'pi varaṁ dātuṁ puṣkaraṁ sañjagāma ha tapaścarati yatrāsau dambhanāmā hi dānavaḥ

अच्युत भी वर देने के लिए पुष्कर गये, जहाँ दम्भ नामक वह दानव तपस्या कर रहा था।

श्लोक 25 (shiva.rudra.165.25)

तत्र गत्वा वरं ब्रूहीत्युवाच परिसान्त्वयन् । गिरा सूनृतया भक्तं जपन्तं स्वमनुं हरिः

tatra gatvā varaṁ brūhītyuvāca parisāntvayan girā sūnṛtayā bhaktaṁ japantaṁ svamanuṁ hariḥ

वहाँ जाकर हरि ने अपने मन्त्र का जप करते हुए भक्त को मधुर वाणी से सान्त्वना देते हुए कहा — 'वर माँगो।'

श्लोक 26 (shiva.rudra.165.26)

तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णोर्दृष्ट्वा तं च पुरः स्थितम् । प्रणनाम महाभक्त्या तुष्टाव च पुनः पुनः

tacchrutvā vacanaṁ viṣṇordṛṣṭvā taṁ ca puraḥ sthitam praṇanāma mahābhaktyā tuṣṭāva ca punaḥ punaḥ

विष्णु का यह वचन सुनकर और उन्हें सामने खड़ा देखकर, उसने महान भक्ति से उन्हें प्रणाम किया और बार-बार उनकी स्तुति की।

श्लोक 27 (shiva.rudra.165.27)

दम्भ उवाच । देवदेव नमस्तेऽस्तु पुण्डरीकविलोचन । रमानाथ त्रिलोकेश कृपां कुरु ममोपरि

dambha uvāca devadeva namaste'stu puṇḍarīkavilocana ramānātha trilokeśa kṛpāṁ kuru mamopari

दम्भ ने कहा — हे देवदेव! हे पुण्डरीकविलोचन! आपको नमस्कार है। हे रमानाथ! हे त्रिलोकेश! मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 28 (shiva.rudra.165.28)

स्वभक्तं तनयं देहि महाबल पराक्रमम् । त्रिलोकजयिनं वीरमजेयं च दिवौकसाम्

svabhaktaṁ tanayaṁ dehi mahābala parākramam trilokajayinaṁ vīramajeyaṁ ca divaukasām

मुझे अपना भक्त, महाबल और पराक्रमी पुत्र प्रदान कीजिए, जो त्रिलोक-विजयी वीर हो तथा देवताओं के लिए भी अजेय हो।

श्लोक 29 (shiva.rudra.165.29)

सनत्कुमार उवाच । इत्युक्तो दानवेन्द्रेण तं वरं प्रददौ हरिः । निवर्त्य चोग्रतपसः ततः सोऽन्तरधान्मुने

sanatkumāra uvāca ityukto dānavendreṇa taṁ varaṁ pradadau hariḥ nivartya cogratapasaḥ tataḥ so'ntaradhānmune

सनत्कुमार ने कहा — दानवेन्द्र के इस निवेदन पर हरि ने उसे वह वर प्रदान किया, तथा उसे उग्र तप से निवृत्त कराकर, हे मुने! वे अन्तर्धान हो गये।

श्लोक 30 (shiva.rudra.165.30)

गते हरौ दानवेन्द्रः कृत्वा तस्यै दिशे नमः । जगाम स्वगृहं सिद्धतपाः पूर्णमनोरथः

gate harau dānavendraḥ kṛtvā tasyai diśe namaḥ jagāma svagṛhaṁ siddhatapāḥ pūrṇamanorathaḥ

हरि के चले जाने पर दानवेन्द्र ने उसी दिशा में प्रणाम कर, तप सिद्ध होने तथा मनोरथ पूर्ण होने पर अपने घर को प्रस्थान किया।

श्लोक 31 (shiva.rudra.165.31)

कालेनाल्पेन तत्पत्नी सगर्भा भाग्यवत्यभूत् । रराज तेजसात्यन्तं रोचयन्ती गृहान्तरम्

kālenālpena tatpatnī sagarbhā bhāgyavatyabhūt rarāja tejasātyantaṁ rocayantī gṛhāntaram

अल्प समय में ही उसकी पत्नी सौभाग्यवती होकर गर्भवती हुई; वह अत्यंत तेज से देदीप्यमान होकर गृह के भीतरी भाग को प्रकाशित करने लगी।

श्लोक 32 (shiva.rudra.165.32)

सुदामा नाम गोपो यो कृष्णस्य पार्षदाग्रणीः । तस्या गर्भे विवेशासौ राधाशप्तश्च यन्मुने

sudāmā nāma gopo yo kṛṣṇasya pārṣadāgraṇīḥ tasyā garbhe viveśāsau rādhāśaptaśca yanmune

सुदामा नामक गोप, जो कृष्ण के पार्षदों में अग्रणी था, और जो राधा द्वारा शापित हो गया था — हे मुने! वही उस स्त्री के गर्भ में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 33 (shiva.rudra.165.33)

असूत समये साध्वी सुप्रभं तनयं ततः । जातकं सुचकारासौ पिताऽऽहूय मुनीन्बहून्

asūta samaye sādhvī suprabhaṁ tanayaṁ tataḥ jātakaṁ sucakārāsau pitā''hūya munīnbahūn

समय आने पर उस साध्वी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया; पिता ने अनेक मुनियों को बुलाकर उसका विधिवत जातकर्म सम्पन्न किया।

श्लोक 34 (shiva.rudra.165.34)

उत्सवः सुमहानासीत्तस्मिञ्जाते द्विजोत्तम । नाम चक्रे पिता तस्य शङ्खचूडेति सद्दिने

utsavaḥ sumahānāsīttasmiñjāte dvijottama nāma cakre pitā tasya śaṅkhacūḍeti saddine

हे द्विजोत्तम! उसके जन्म पर अत्यंत महान उत्सव हुआ; शुभ दिन में पिता ने उसका नाम शङ्खचूड रखा।

श्लोक 35 (shiva.rudra.165.35)

पितुर्गेहे स ववृधे शुक्लपक्षे यथा शशी । शैशवेऽभ्यस्तविद्यस्तु स बभूव सुदीप्तिमान्

piturgehe sa vavṛdhe śuklapakṣe yathā śaśī śaiśave'bhyastavidyastu sa babhūva sudīptimān

वह अपने पिता के घर में शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान बढ़ने लगा; बाल्यावस्था में ही विद्याभ्यास कर वह अत्यंत तेजस्वी हो गया।

श्लोक 36 (shiva.rudra.165.36)

स बालक्रीडया नित्यं पित्रोर्हर्षं ततान ह । प्रियो बभूव सर्वेषां कुलजानां विशेषतः

sa bālakrīḍayā nityaṁ pitrorharṣaṁ tatāna ha priyo babhūva sarveṣāṁ kulajānāṁ viśeṣataḥ

वह अपनी बाल-क्रीड़ाओं से नित्य ही माता-पिता के हर्ष को बढ़ाता रहा; वह सभी को, विशेषतः कुल के जनों को अत्यंत प्रिय हो गया।

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