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रुद्र संहिता · अध्याय 17

गुणनिधि-चरित्र

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (shiva.rudra.17.1)

सूत उवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य ब्रह्मणः स तु नारदः । पुनः पप्रच्छ तं नत्वा विनयेन मुनीश्वराः

sūta uvāca | ityākarṇya vacastasya brahmaṇaḥ sa tu nāradaḥ | punaḥ papraccha taṁ natvā vinayena munīśvarāḥ

सूत ने कहा — ब्रह्मा जी के इस वचन को सुनकर उन मुनीश्वरों में श्रेष्ठ नारद जी ने प्रणाम करके विनयपूर्वक पुनः प्रश्न किया।

श्लोक 2 (shiva.rudra.17.2)

नारद उवाच । कदा गतो हि कैलासं शङ्करो भक्तवत्सलः । क्व वा सखित्वं तस्यासीत् कुबेरेण महात्मना

nārada uvāca | kadā gato hi kailāsaṁ śaṅkaro bhaktavatsalaḥ | kva vā sakhitvaṁ tasyāsīt kubereṇa mahātmanā

नारद ने कहा — भक्तवत्सल शंकर कैलास पर्वत पर कब गए? महात्मा कुबेर के साथ उनकी मित्रता कहाँ और कैसे हुई?

श्लोक 3 (shiva.rudra.17.3)

किं चकार हरस्तत्र परिपूर्णः शिवाकृतिः । एतत्सर्वं समाचक्ष्व परं कौतूहलं मम

kiṁ cakāra harastatra paripūrṇaḥ śivākṛtiḥ | etatsarvaṁ samācakṣva paraṁ kautūhalaṁ mama

शिवस्वरूप, सर्वथा परिपूर्ण हर ने वहाँ क्या किया? यह सब मुझसे कहिए — मुझे इसकी अत्यंत उत्सुकता है।

श्लोक 4 (shiva.rudra.17.4)

ब्रह्मोवाच । शृणु नारद वक्ष्यामि चरितं शशिमौलिनः । यथा जगाम कैलासं सखित्वं धनदस्य च

brahmovāca | śṛṇu nārada vakṣyāmi caritaṁ śaśimaulinaḥ | yathā jagāma kailāsaṁ sakhitvaṁ dhanadasya ca

ब्रह्मा ने कहा — हे नारद! सुनो, मैं चंद्रमौलि शिव का वह चरित्र कहता हूँ, जिस प्रकार वे कैलास गए और धनाधिपति कुबेर से उनकी मित्रता हुई।

श्लोक 5 (shiva.rudra.17.5)

असीत् काम्पिल्यनगरे सोमयाजिकुलोद्भवः । दीक्षितो यज्ञदत्ताख्यो यज्ञविद्याविशारदः

asīt kāmpilyanagare somayājikulodbhavaḥ | dīkṣito yajñadattākhyo yajñavidyāviśāradaḥ

काम्पिल्य नगर में सोमयाजी कुल में उत्पन्न, यज्ञविद्या में निपुण, यज्ञदत्त नामक एक दीक्षित ब्राह्मण रहते थे।

श्लोक 6 (shiva.rudra.17.6)

वेदवेदाङ्गवित्प्राज्ञो वेदान्तादिषु दक्षिणः । राजमान्योऽथ बहुधा वदान्यः कीर्तिभाजनः

vedavedāṅgavitprājño vedāntādiṣu dakṣiṇaḥ | rājamānyo'tha bahudhā vadānyaḥ kīrtibhājanaḥ

वे वेद-वेदांगों के ज्ञाता, प्राज्ञ, वेदांत आदि में निपुण, राजाओं द्वारा सम्मानित, अनेक प्रकार से उदार और कीर्ति के आधार थे।

श्लोक 7 (shiva.rudra.17.7)

अग्निशुश्रूषणरतो वेदाध्ययनतत्परः । सुन्दरो रमणीयाङ्गश्चन्द्रबिम्बसमाकृतिः

agniśuśrūṣaṇarato vedādhyayanatatparaḥ | sundaro ramaṇīyāṅgaścandrabimbasamākṛtiḥ

वे अग्निहोत्र की सेवा में रत, वेदाध्ययन में तत्पर, सुंदर, मनोहर अंगों वाले तथा चंद्रमा के समान कांतिमान थे।

श्लोक 8 (shiva.rudra.17.8)

आसीद् गुणनिधिर्नाम दीक्षितस्यास्य वै सुतः । कृतोपनयनः सोऽष्टौ विद्यां जग्राह भूरिशः ॥ अथ पित्रानभिज्ञातो द्यूतकर्मरतोऽभवत्

āsīd guṇanidhirnāma dīkṣitasyāsya vai sutaḥ | kṛtopanayanaḥ so'ṣṭau vidyāṁ jagrāha bhūriśaḥ || atha pitrānabhijñāto dyūtakarmarato'bhavat

इस दीक्षित के गुणनिधि नामक एक पुत्र था। उपनयन-संस्कार होने पर उसने अनेक विद्याएँ ग्रहण कीं, किंतु फिर पिता को बिना बताए वह जुए में रत हो गया।

श्लोक 9 (shiva.rudra.17.9)

आदायादाय बहुशो धनं मातुः सकाशतः । समदाद् द्यूतकारेभ्यो मैत्रीं तैश्च चकार सः

ādāyādāya bahuśo dhanaṁ mātuḥ sakāśataḥ | samadād dyūtakārebhyo maitrīṁ taiśca cakāra saḥ

वह बार-बार माता से धन लेकर जुआरियों को भी देता और उन्हीं के साथ मित्रता करता रहा।

श्लोक 10 (shiva.rudra.17.10)

सन्त्यक्तब्राह्मणाचारः सन्ध्यास्नानपराङ्मुखः । निन्दको वेदशास्त्राणां देवब्राह्मणनिन्दकः

santyaktabrāhmaṇācāraḥ sandhyāsnānaparāṅmukhaḥ | nindako vedaśāstrāṇāṁ devabrāhmaṇanindakaḥ

उसने ब्राह्मणोचित आचार त्याग दिया, संध्या-स्नान से मुख मोड़ लिया, वेद-शास्त्रों की निंदा करने लगा और देवताओं तथा ब्राह्मणों की भी निंदा करने लगा।

श्लोक 11 (shiva.rudra.17.11)

स्मृत्याचारविहीनस्तु गीतवाद्यविनोदभाक् । नटपाखण्डभाण्डैस्तु बद्धप्रेमपरम्परः

smṛtyācāravihīnastu gītavādyavinodabhāk | naṭapākhaṇḍabhāṇḍaistu baddhapremaparamparaḥ

वह स्मृति-सम्मत आचार से रहित हो गया, गीत-वाद्य के विनोद में आसक्त रहने लगा और नटों, पाखंडियों तथा विदूषकों से गहरी प्रीति बाँध बैठा।

श्लोक 12 (shiva.rudra.17.12)

प्रेरितोऽपि जनन्या स न ययौ पितुरन्तिकम् । गृहकार्यान्तरव्याप्तो दीक्षितो दीक्षितायिनीम्

prerito'pi jananyā sa na yayau piturantikam | gṛhakāryāntaravyāpto dīkṣito dīkṣitāyinīm

माता के बार-बार प्रेरित करने पर भी वह पिता के पास नहीं जाता था। इधर गृह-कार्यों में व्यस्त उस दीक्षित की पत्नी से —

श्लोक 13 (shiva.rudra.17.13)

यदा यदैव तां पृच्छेदये गुणनिधिः सुतः । न दृश्यते मया गेहे कल्याणि विदधाति किम्

yadā yadaiva tāṁ pṛcchedaye guṇanidhiḥ sutaḥ | na dṛśyate mayā gehe kalyāṇi vidadhāti kim

जब-जब पिता पूछते — 'हे कल्याणी! हमारा पुत्र गुणनिधि मुझे घर में कहीं दिखाई नहीं देता, वह क्या कर रहा है?' —

श्लोक 14 (shiva.rudra.17.14)

तदा तदेति सा ब्रूयादिदानीं स बहिर्गतः । स्नात्वा समर्च्य वै देवानेतावन्तमनेहसम्

tadā tadeti sā brūyādidānīṁ sa bahirgataḥ | snātvā samarcya vai devānetāvantamanehasam

तब वह कहती — 'वह अभी बाहर गया है; स्नान करके और देवताओं का पूजन करके इतना समय हो गया है,

श्लोक 15 (shiva.rudra.17.15)

अधीत्याध्ययनार्थं स द्वित्रैर्मित्रैः समं ययौ । एकपुत्रेति तन्माता प्रतारयति दीक्षितम्

adhītyādhyayanārthaṁ sa dvitrairmitraiḥ samaṁ yayau | ekaputreti tanmātā pratārayati dīkṣitam

वह अध्ययन के लिए दो-तीन मित्रों के साथ गया है।' इस प्रकार 'एक ही पुत्र है' सोचकर उसकी माता उस दीक्षित को छलती रही।

श्लोक 16 (shiva.rudra.17.16)

न तत्कर्म च तद्वृत्तं किञ्चिद्वेत्ति स दीक्षितः । सर्वं केशान्तकर्मास्य चक्रे वर्षेऽथ षोडशे

na tatkarma ca tadvṛttaṁ kiñcidvetti sa dīkṣitaḥ | sarvaṁ keśāntakarmāsya cakre varṣe'tha ṣoḍaśe

उस दीक्षित को उसके इस कर्म और आचरण का कुछ भी पता न था। सोलहवें वर्ष में उन्होंने उसका केशांत-संस्कार (मुंडन आदि) पूर्ण करा दिया।

श्लोक 17 (shiva.rudra.17.17)

अथो स दीक्षितो यज्ञदत्तः पुत्रस्य तस्य च । गृह्योक्तेन विधानेन पाणिग्राहमकारयम्

atho sa dīkṣito yajñadattaḥ putrasya tasya ca | gṛhyoktena vidhānena pāṇigrāhamakārayam

तब उस दीक्षित यज्ञदत्त ने अपने पुत्र का, गृह्यसूत्र में कहे विधि के अनुसार, पाणिग्रहण (विवाह) संस्कार करवाया।

श्लोक 18 (shiva.rudra.17.18)

प्रत्यहं तस्य जननी सुतं गुणनिधिं मृदु । शास्ति स्नेहार्द्रहृदया ह्युपवेश्य स्म नारद

pratyahaṁ tasya jananī sutaṁ guṇanidhiṁ mṛdu | śāsti snehārdrahṛdayā hyupaveśya sma nārada

प्रतिदिन उसकी माता स्नेह से आर्द्र-हृदय होकर पुत्र गुणनिधि को कोमलता से बिठाकर उपदेश देती थी, हे नारद!

श्लोक 19 (shiva.rudra.17.19)

क्रोधनस्तेऽस्ति तनय स महात्मा पितेत्यलम् । यदि ज्ञास्यति ते वृत्तं त्वां च मां ताडयिष्यति

krodhanaste'sti tanaya sa mahātmā pitetyalam | yadi jñāsyati te vṛttaṁ tvāṁ ca māṁ tāḍayiṣyati

'हे पुत्र! तुम्हारे पिता क्रोधी स्वभाव के महात्मा हैं — बस, इतना ही कहना पर्याप्त है। यदि उन्हें तुम्हारा आचरण ज्ञात हो गया तो वे तुम्हें और मुझे दोनों को दंडित करेंगे।

श्लोक 20 (shiva.rudra.17.20)

आच्छादयामि ते नित्यं पितुरग्रे कुचेष्टितम् । लोकमान्योऽस्ति ते तातः सदाचारैर्न वै धनैः

ācchādayāmi te nityaṁ pituragre kuceṣṭitam | lokamānyo'sti te tātaḥ sadācārairna vai dhanaiḥ

'मैं प्रतिदिन तुम्हारे पिता से तुम्हारी दुश्चेष्टाओं को छिपाती हूँ। तुम्हारे पिता संसार में सदाचार के कारण सम्मानित हैं, केवल धन के कारण नहीं।

श्लोक 21 (shiva.rudra.17.21)

ब्राह्मणानां धनं तात सद्विद्या साधुसङ्गमः । किमर्थं न करोषि त्वं स्वरुचिं प्रीतमानसः

brāhmaṇānāṁ dhanaṁ tāta sadvidyā sādhusaṅgamaḥ | kimarthaṁ na karoṣi tvaṁ svaruciṁ prītamānasaḥ

'हे पुत्र! ब्राह्मणों का धन तो सद्विद्या और सज्जनों की संगति ही है। तुम प्रसन्नचित्त होकर अपनी सहज रुचि के अनुरूप आचरण क्यों नहीं करते?

श्लोक 22 (shiva.rudra.17.22)

सच्छ्रोत्रियास्तेऽनूचाना दीक्षिताःसोमयाजिनः । इति रूढिमिह प्राप्तास्तव पूर्वपितामहाः

sacchrotriyāste'nūcānā dīkṣitāḥsomayājinaḥ | iti rūḍhimiha prāptāstava pūrvapitāmahāḥ

'तुम्हारे पूर्वज सुश्रोत्रिय, वेदपाठी, दीक्षित और सोमयाजी — इस प्रकार की प्रतिष्ठा को यहाँ प्राप्त हुए थे।

श्लोक 23 (shiva.rudra.17.23)

त्यक्त्वा दुर्वृत्तसंसर्गं साधुसङ्गरतो भव । सद्विद्यासु मनो धेहि ब्राह्मणाचारमाचर

tyaktvā durvṛttasaṁsargaṁ sādhusaṅgarato bhava | sadvidyāsu mano dhehi brāhmaṇācāramācara

'दुष्टों की संगति त्यागकर सज्जनों की संगति में रत हो जाओ, सद्विद्या में मन लगाओ, ब्राह्मणोचित आचार का पालन करो।

श्लोक 24 (shiva.rudra.17.24)

तातानुरूपो रूपेण यशसा कुलशीलतः । ततो न त्रपसे किं नः त्यज दुर्वृत्ततां स्वकाम्

tātānurūpo rūpeṇa yaśasā kulaśīlataḥ | tato na trapase kiṁ naḥ tyaja durvṛttatāṁ svakām

'तुम रूप में, यश में, कुल-शील में अपने पिता के ही समान हो। फिर तुम हमारे समक्ष लज्जित क्यों नहीं होते? अपनी दुष्टता का त्याग करो।

श्लोक 25 (shiva.rudra.17.25)

ऊनविंशतिकोऽसि त्वमेषा षोडशवार्षिकी । एतां संवृणु सद्वृत्तां पितृभक्तियुतो भव

ūnaviṁśatiko'si tvameṣā ṣoḍaśavārṣikī | etāṁ saṁvṛṇu sadvṛttāṁ pitṛbhaktiyuto bhava

'तुम उन्नीस वर्ष के हो चुके हो और यह (तुम्हारी वधू) सोलह वर्ष की है। सद्वृत्ति से इसे अपनाओ और पितृभक्त बनो।

श्लोक 26 (shiva.rudra.17.26)

श्वशुरोऽपि हि ते मान्यः सर्वत्र गुणशीलतः । ततो न त्रपसे किं नः त्यज दुर्वृत्ततां सुत

śvaśuro'pi hi te mānyaḥ sarvatra guṇaśīlataḥ | tato na trapase kiṁ naḥ tyaja durvṛttatāṁ suta

'तुम्हारे श्वसुर भी अपने गुण-शील के कारण सर्वत्र सम्मानित हैं। फिर तुम हमारे समक्ष लज्जित क्यों नहीं होते, हे पुत्र? अपनी दुष्टता त्याग दो।

श्लोक 27 (shiva.rudra.17.27)

मातुलास्तेऽतुलाः पुत्र विद्याशीलकुलादिभिः । तेभ्योऽपि न बिभेषि त्वं शुद्धोऽस्युभयवंशतः

mātulāste'tulāḥ putra vidyāśīlakulādibhiḥ | tebhyo'pi na bibheṣi tvaṁ śuddho'syubhayavaṁśataḥ

'हे पुत्र! तुम्हारे मामा लोग विद्या, शील और कुल में अतुलनीय हैं, फिर भी तुम उनसे भी नहीं डरते — तुम तो दोनों कुलों से शुद्ध हो।

श्लोक 28 (shiva.rudra.17.28)

पश्यैतान्प्रतिवेश्मस्थान्ब्राह्मणानां कुमारकान् । गृहेऽपि शिष्यान्पश्यैतान्पितुस्ते विनयोचितान्

paśyaitānprativeśmasthānbrāhmaṇānāṁ kumārakān | gṛhe'pi śiṣyānpaśyaitānpituste vinayocitān

'पड़ोस के घरों में रहने वाले इन ब्राह्मण-पुत्रों को देखो, और अपने ही घर में तुम्हारे पिता के प्रति सुसंस्कृत इन शिष्यों को भी देखो।

श्लोक 29 (shiva.rudra.17.29)

राजापि श्रोष्यति यदा तव दुश्चेष्टितं सुत । श्रद्धां विहाय ते ताते वृत्तिलोपं करिष्यति

rājāpi śroṣyati yadā tava duśceṣṭitaṁ suta | śraddhāṁ vihāya te tāte vṛttilopaṁ kariṣyati

'हे पुत्र! जब राजा भी तुम्हारे कदाचार को सुनेगा, तो वह तुम्हारे पिता पर से श्रद्धा हटाकर उनकी वृत्ति (राजकीय अनुदान) समाप्त कर देगा।

श्लोक 30 (shiva.rudra.17.30)

बालचेष्टितमेवैतद् वदन्त्यद्यापि ते जनाः । अनन्तरं हरिष्यन्ति युक्तां दीक्षिततामिह

bālaceṣṭitamevaitad vadantyadyāpi te janāḥ | anantaraṁ hariṣyanti yuktāṁ dīkṣitatāmiha

'अभी तक लोग इसे केवल बचपन की चंचलता कहकर टाल देते हैं, किंतु शीघ्र ही वे इस उचित दीक्षित-पद को भी छीन लेंगे।

श्लोक 31 (shiva.rudra.17.31)

सर्वेऽप्याक्षारयिष्यन्ति तव तातं च मामपि । मातुश्चरित्रं तनयो धत्ते दुर्भाषणैरिति

sarve'pyākṣārayiṣyanti tava tātaṁ ca māmapi | mātuścaritraṁ tanayo dhatte durbhāṣaṇairiti

'सब लोग तुम्हारे पिता को और मुझे भी दोषी ठहराएँगे, यह कहते हुए कि पुत्र अपने अपशब्दों में माता का ही स्वभाव धारण करता है।

श्लोक 32 (shiva.rudra.17.32)

पितापि ते न पापीयाञ्छ्रुतिस्मृतिपथानुगः । तदङ्घ्रिलीनमनसो मम साक्षी महेश्वरः

pitāpi te na pāpīyāñchrutismṛtipathānugaḥ | tadaṅghrilīnamanaso mama sākṣī maheśvaraḥ

'तुम्हारे पिता पापी नहीं हैं, वे श्रुति-स्मृति के मार्ग का अनुसरण करते हैं; उनके चरणों में मेरा मन लीन है — इसके साक्षी स्वयं महेश्वर हैं।

श्लोक 33 (shiva.rudra.17.33)

न चर्तुस्नातयापीह मुखं दुष्टस्य वीक्षितम् । अहो बलीयान्स विधिर्येन जातो भवानिति

na cartusnātayāpīha mukhaṁ duṣṭasya vīkṣitam | aho balīyānsa vidhiryena jāto bhavāniti

'अभी-अभी स्नान किए हुए व्यक्ति को भी दुष्ट का मुख नहीं देखना चाहिए — हाय, कैसा प्रबल है वह विधाता, जिसके कारण तुम (ऐसे) उत्पन्न हुए हो!'

श्लोक 34 (shiva.rudra.17.34)

प्रतिक्षणं जनन्येति शिक्ष्यमाणोऽतिदुर्मतिः । न तत्याज च तद्धर्मं दुर्बोधो व्यसनी यतः

pratikṣaṇaṁ jananyeti śikṣyamāṇo'tidurmatiḥ | na tatyāja ca taddharmaṁ durbodho vyasanī yataḥ

माता द्वारा प्रतिक्षण इस प्रकार समझाए जाने पर भी वह अत्यंत दुर्बुद्धि पुत्र उस दुराचार को नहीं छोड़ता था, क्योंकि वह दुर्बोध और व्यसनी था।

श्लोक 35 (shiva.rudra.17.35)

मृगयामद्यपैशुन्यानृतचौर्यदुरोदरैः । स वारदारैर्व्यसनैरेभिः कोऽत्र न खण्डितः

mṛgayāmadyapaiśunyānṛtacauryadurodaraiḥ | sa vāradārairvyasanairebhiḥ ko'tra na khaṇḍitaḥ

आखेट, मद्यपान, चुगली, झूठ, चोरी और जुआ — इन तथा परायी स्त्रियों जैसे व्यसनों से इस संसार में कौन नहीं टूटता?

श्लोक 36 (shiva.rudra.17.36)

यद्यन्मध्यगृहे पश्येत्तत्तन्नीत्वा सुदुर्मतिः । अर्पयेद् द्यूतकाराणां सकुप्यं वसनादिकम्

yadyanmadhyagṛhe paśyettattannītvā sudurmatiḥ | arpayed dyūtakārāṇāṁ sakupyaṁ vasanādikam

घर में जो कुछ भी उसे दिखाई देता, वह अत्यंत दुर्बुद्धि उसे ले जाकर जुआरियों को दे आता — बर्तन, वस्त्र और अन्य वस्तुएँ।

श्लोक 37 (shiva.rudra.17.37)

न्यस्तां रत्नमयीं गेहे करस्य पितुरूर्मिकाम् । चोरयित्वैकदादाय दुरोदरकरेऽर्पयत्

nyastāṁ ratnamayīṁ gehe karasya piturūrmikām | corayitvaikadādāya durodarakare'rpayat

एक बार घर में रखी हुई पिता की रत्नजड़ित अंगूठी चुराकर उसने उसे ले जाकर एक जुआरी के हाथ में दे दी।

श्लोक 38 (shiva.rudra.17.38)

दीक्षितेन परिज्ञातो दैवाद् द्यूतकृतः करे । उवाच दीक्षितस्तं च कुतो लब्धा त्वयोर्मिका

dīkṣitena parijñāto daivād dyūtakṛtaḥ kare | uvāca dīkṣitastaṁ ca kuto labdhā tvayormikā

दैवयोग से वह जुआरी उस अंगूठी के साथ हाथ में पकड़ा गया, और दीक्षित ने पहचानकर उससे पूछा — 'तुझे यह अंगूठी कहाँ से मिली?'

श्लोक 39 (shiva.rudra.17.39)

पृष्टस्तेनाथ निर्बन्धादसकृत्तमुवाच सः । मामाक्षिपसि विप्रोच्चैः किं मया चौर्यकर्मणा

pṛṣṭastenātha nirbandhādasakṛttamuvāca saḥ | māmākṣipasi viproccaiḥ kiṁ mayā cauryakarmaṇā

उसके द्वारा बार-बार दबाव देकर पूछे जाने पर उसने कहा — 'हे विप्र! आप बिना कारण मुझ पर चोरी का आरोप क्यों लगा रहे हैं?

श्लोक 40 (shiva.rudra.17.40)

लब्धा मुद्रा त्वदीयेन पुत्रेणैव समर्पिता । मम मातुर्हि पूर्वेद्युर्जित्वा नीतो हि शाटकः

labdhā mudrā tvadīyena putreṇaiva samarpitā | mama māturhi pūrvedyurjitvā nīto hi śāṭakaḥ

'यह अंगूठी तो आपके अपने पुत्र ने ही मुझे दी है। और मेरी माता का वस्त्र भी उसने कल जीतकर ले लिया था।

श्लोक 41 (shiva.rudra.17.41)

न केवलं ममैवैतदङ्गुलीयं समर्पितम् । अन्येषां द्यूतकर्तॄणां भूरि तेनार्पितं वसु

na kevalaṁ mamaivaitadaṅgulīyaṁ samarpitam | anyeṣāṁ dyūtakartṝṇāṁ bhūri tenārpitaṁ vasu

'यह अंगूठी केवल मुझे ही नहीं दी गई, बल्कि उसने अन्य जुआरियों को भी बहुत-सा धन दिया है।

श्लोक 42 (shiva.rudra.17.42)

रत्नकुप्यदुकूलानि भृङ्गारप्रभृतीनि च । भाजनानि विचित्राणि कांस्यताम्रमयानि च

ratnakupyadukūlāni bhṛṅgāraprabhṛtīni ca | bhājanāni vicitrāṇi kāṁsyatāmramayāni ca

'रत्न, वस्त्र, दुकूल, कलश आदि, तथा कांस्य और तांबे के बने विचित्र प्रकार के पात्र —

श्लोक 43 (shiva.rudra.17.43)

नग्नीकृत्य प्रतिदिनं बध्यते द्यूतकारिभिः । न तेन सदृशः कश्चिदाक्षिको भूमिमण्डले

nagnīkṛtya pratidinaṁ badhyate dyūtakāribhiḥ | na tena sadṛśaḥ kaścidākṣiko bhūmimaṇḍale

'वह प्रतिदिन जुआरियों के हाथों वस्त्र-रहित तक कर दिया जाता है (हार जाता है); इस पृथ्वीमंडल में उसके समान कोई जुआरी नहीं है।

श्लोक 44 (shiva.rudra.17.44)

अद्यावधि त्वया विप्र दुरोदरशिरोमणिः । कथं नाज्ञायि तनयोऽविनयानयकोविदः

adyāvadhi tvayā vipra durodaraśiromaṇiḥ | kathaṁ nājñāyi tanayo'vinayānayakovidaḥ

'आज तक हे विप्र! आप कैसे नहीं जान पाए कि यह आपका पुत्र अविनय और अनीति में इतना निपुण, जुआरियों का शिरोमणि है?'

श्लोक 45 (shiva.rudra.17.45)

इति श्रुत्वा त्रपाभारविनम्रतरकन्धरः । प्रावृत्य वाससा मौलिं प्राविशन्निजमन्दिरम्

iti śrutvā trapābhāravinamratarakandharaḥ | prāvṛtya vāsasā mauliṁ prāviśannijamandiram

यह सुनकर लज्जा के भार से गर्दन अत्यंत झुकाए हुए वह दीक्षित अपने वस्त्र से सिर ढककर अपने घर में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 46 (shiva.rudra.17.46)

महापतिव्रतामस्य पत्नीं प्रोवाच तामथ । स दीक्षितो यज्ञदत्तः श्रौतकर्मपरायणः

mahāpativratāmasya patnīṁ provāca tāmatha | sa dīkṣito yajñadattaḥ śrautakarmaparāyaṇaḥ

श्रौत-कर्म में तत्पर वह दीक्षित यज्ञदत्त फिर अपनी महापतिव्रता पत्नी से बोला —

श्लोक 47 (shiva.rudra.17.47)

यज्ञदत्त उवाच । दीक्षितायनि कुत्रास्ति धूर्तो गुणनिधिः सुतः । अथ तिष्ठतु किं तेन क्व सा मम शुभोर्मिका

yajñadatta uvāca | dīkṣitāyani kutrāsti dhūrto guṇanidhiḥ sutaḥ | atha tiṣṭhatu kiṁ tena kva sā mama śubhormikā

यज्ञदत्त ने कहा — 'हे दीक्षितायनी! वह धूर्त पुत्र गुणनिधि कहाँ है? उसे रहने दो, उससे क्या लेना; मेरी वह शुभ अंगूठी कहाँ है?

श्लोक 48 (shiva.rudra.17.48)

अङ्गोद्वर्तनकाले या त्वया मेऽङ्गुलितो हृता । सा त्वं रत्नमयीं शीघ्रं तामानीय प्रयच्छ मे

aṅgodvartanakāle yā tvayā me'ṅgulito hṛtā | sā tvaṁ ratnamayīṁ śīghraṁ tāmānīya prayaccha me

'अंग-मर्दन के समय जो रत्नजड़ित अंगूठी तुमने मेरी उँगली से उतारी थी, उसे शीघ्र लाकर मुझे दो।'

श्लोक 49 (shiva.rudra.17.49)

इति श्रुत्वाथ तद्वाक्यं भीता सा दीक्षितायनी । प्रोवाच स्नानमध्याह्नीं क्रियां निष्पादयन्त्यथ

iti śrutvātha tadvākyaṁ bhītā sā dīkṣitāyanī | provāca snānamadhyāhnīṁ kriyāṁ niṣpādayantyatha

यह सुनकर वह दीक्षितायनी भयभीत हो गई, और मध्याह्न-स्नान की क्रिया करते हुए बोली —

श्लोक 50 (shiva.rudra.17.50)

व्यग्रास्मि देवपूजार्थमुपहारादिकर्मणि । समयोऽयमतिक्रामेदतिथीनां प्रियातिथे

vyagrāsmi devapūjārthamupahārādikarmaṇi | samayo'yamatikrāmedatithīnāṁ priyātithe

'हे प्रियतम! मैं देवपूजा और नैवेद्य आदि कार्यों में व्यस्त हूँ; अतिथियों का समय बीता जा रहा है।

श्लोक 51 (shiva.rudra.17.51)

इदानीमेव पक्वान्नकरणव्यग्रया मया । स्थापिता भाजने क्वापि विस्मृतेति न वेद्म्यहम्

idānīmeva pakvānnakaraṇavyagrayā mayā | sthāpitā bhājane kvāpi vismṛteti na vedmyaham

'अभी-अभी पक्वान्न बनाने में व्यस्त होने के कारण मैंने उसे किसी पात्र में रख दिया था, अब भूल गई हूँ — मुझे पता नहीं है कहाँ है।'

श्लोक 52 (shiva.rudra.17.52)

दीक्षित उवाच । हं हेऽसत्पुत्रजननि नित्यं सत्यप्रभाषिणि । यदा यदा त्वां सम्पृच्छे तनयः क्व गतस्त्विति

dīkṣita uvāca | haṁ he'satputrajanani nityaṁ satyaprabhāṣiṇi | yadā yadā tvāṁ sampṛcche tanayaḥ kva gatastviti

दीक्षित ने कहा — 'अहो! दुष्ट पुत्र की माता, जो सदा सत्य ही बोलती है! जब-जब मैं पूछता हूँ कि पुत्र कहाँ गया है,

श्लोक 53 (shiva.rudra.17.53)

तदा तदेति त्वं ब्रूयान्नाथेदानीं स निर्गतः । अधीत्याध्ययनार्थं च द्वित्रैर्मित्रैः सयुग्बहिः

tadā tadeti tvaṁ brūyānnāthedānīṁ sa nirgataḥ | adhītyādhyayanārthaṁ ca dvitrairmitraiḥ sayugbahiḥ

'तब-तब तुम कहती हो — हे नाथ! वह अभी दो-तीन मित्रों के साथ अध्ययन के लिए बाहर गया है।

श्लोक 54 (shiva.rudra.17.54)

कुतस्ते शाटकः पत्नि माञ्जिष्ठो यो मयार्पितः । लम्बते योऽनिशं धाम्नि तथ्यं ब्रूहि भयं त्यज

kutaste śāṭakaḥ patni māñjiṣṭho yo mayārpitaḥ | lambate yo'niśaṁ dhāmni tathyaṁ brūhi bhayaṁ tyaja

'हे पत्नी! मैंने जो लाल रंग का वस्त्र तुम्हें दिया था, वह कहाँ है? जो सदा घर में लटका रहता था, वह कहाँ गया? सच बताओ, भय त्याग दो।

श्लोक 55 (shiva.rudra.17.55)

साम्प्रतं नेक्ष्यते सोऽपि भृङ्गारो मणिमण्डितः । पट्टसूत्रमयी सापि त्रिपटी या मयार्पिता

sāmprataṁ nekṣyate so'pi bhṛṅgāro maṇimaṇḍitaḥ | paṭṭasūtramayī sāpi tripaṭī yā mayārpitā

'अब वह रत्नजड़ित कलश भी दिखाई नहीं देता, और वह रेशमी तिहरा वस्त्र भी जो मैंने तुम्हें दिया था।

श्लोक 56 (shiva.rudra.17.56)

क्व दाक्षिणात्यं तत्कांस्यं गौडी ताम्रघटी क्व सा । नागदन्तमयी सा क्व सुखकौतुकमञ्चिका

kva dākṣiṇātyaṁ tatkāṁsyaṁ gauḍī tāmraghaṭī kva sā | nāgadantamayī sā kva sukhakautukamañcikā

'वह दाक्षिणात्य कांस्य-पात्र कहाँ है, गौड़ देश की वह तांबे की घटी कहाँ है? हाथीदाँत से जड़ी वह सुख की मंचिका (आराम-सेज) कहाँ है?

श्लोक 57 (shiva.rudra.17.57)

क्व सा पर्वतदेशीया चन्द्रकान्तिरिवाद्भुता । दीपकव्यग्रहस्ताग्रालङ्कृता शालभञ्जिका

kva sā parvatadeśīyā candrakāntirivādbhutā | dīpakavyagrahastāgrālaṅkṛtā śālabhañjikā

'चंद्रमा की कांति के समान अद्भुत वह पर्वत-प्रदेश की बनी शालभंजिका (पुतली) कहाँ है, जो दीपक थामे अपनी अंगुलियों से सुसज्जित थी?

श्लोक 58 (shiva.rudra.17.58)

किं बहूक्तेन कुलजे तुभ्यं कुप्याम्यहं वृथा । तदाभ्यवहरिष्येऽहमुपयंस्याम्यहं यदा

kiṁ bahūktena kulaje tubhyaṁ kupyāmyahaṁ vṛthā | tadābhyavahariṣye'hamupayaṁsyāmyahaṁ yadā

'हे कुलजे! बहुत कहने से क्या लाभ, मैं तुम पर व्यर्थ ही क्रोधित हो रहा हूँ; अब मैं कब भोजन करूँगा, कब अपने नित्य-कर्म पूरे करूँगा?

श्लोक 59 (shiva.rudra.17.59)

अनपत्योऽस्मि तेनाहं दुष्टेन कुलदूषिणा । उत्तिष्ठानय पाथस्त्वं तस्मै दद्यां तिलाञ्जलिम्

anapatyo'smi tenāhaṁ duṣṭena kuladūṣiṇā | uttiṣṭhānaya pāthastvaṁ tasmai dadyāṁ tilāñjalim

'उस दुष्ट, कुल को दूषित करने वाले पुत्र के कारण मैं मानो पुत्रहीन ही हूँ। उठो, जल लाओ, कि मैं उसे तिलांजलि दे दूँ (उसे त्याग दूँ)।'

श्लोक 60 (shiva.rudra.17.60)

अपुत्रत्वं वरं नृणां कुपुत्रात्कुलपांसनात् । त्यजेदेकं कुलस्यार्थे नीतिरेषा सनातनी

aputratvaṁ varaṁ nṛṇāṁ kuputrātkulapāṁsanāt | tyajedekaṁ kulasyārthe nītireṣā sanātanī

पुत्रहीनता ही मनुष्यों के लिए कुल को कलंकित करने वाले कुपुत्र से श्रेष्ठ है; कुल की रक्षा के लिए एक (पुत्र) का भी त्याग कर देना चाहिए — यह सनातन नीति है।

श्लोक 61 (shiva.rudra.17.61)

स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा तस्मिन्नेवाह्नि कस्यचित् । श्रोत्रियस्य सुतां प्राप्य पाणिं जग्राह दीक्षितः

snātvā nityavidhiṁ kṛtvā tasminnevāhni kasyacit | śrotriyasya sutāṁ prāpya pāṇiṁ jagrāha dīkṣitaḥ

स्नान करके नित्य-विधि पूर्ण करके, उसी दिन एक श्रोत्रिय ब्राह्मण की कन्या को प्राप्त कर, दीक्षित ने उसका पाणिग्रहण कर लिया।

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