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रुद्र संहिता · अध्याय 174

परस्परयुद्ध-वर्णन

अध्याय 173अध्याय-सूचीअध्याय 175

श्लोक 1 (shiva.rudra.174.1)

सनत्कुमार उवाच । स दूतस्तत्र गत्वा च शिववाक्यं जगाद ह । सविस्तरं यथार्थं च निश्चयं तस्य तत्त्वतः

sanatkumāra uvāca sa dūtastatra gatvā ca śivavākyaṁ jagāda ha savistaraṁ yathārthaṁ ca niścayaṁ tasya tattvataḥ

सनत्कुमार ने कहा — वह दूत वहाँ जाकर शिव के वचन को यथार्थ रूप से, विस्तारपूर्वक तथा उनके सत्य निश्चय सहित कह सुनाया।

श्लोक 2 (shiva.rudra.174.2)

तच्छुत्वा शङ्खचूडोऽसौ दानवेन्द्रः प्रतापवान् । अङ्गीचकार सुप्रीत्या रणमेव स दानवः

tacchutvā śaṅkhacūḍo'sau dānavendraḥ pratāpavān aṅgīcakāra suprītyā raṇameva sa dānavaḥ

यह सुनकर वह प्रतापी दानवेन्द्र शङ्खचूड प्रसन्नतापूर्वक युद्ध को ही स्वीकार करने लगा।

श्लोक 3 (shiva.rudra.174.3)

समारुरोह यानं च सहामात्यैश्च सत्वरः । आदिदेश स्वसैन्यं च युद्धार्थं शङ्करेण च

samāruroha yānaṁ ca sahāmātyaiśca satvaraḥ ādideśa svasainyaṁ ca yuddhārthaṁ śaṅkareṇa ca

वह अपने मन्त्रियों सहित शीघ्र ही रथ पर आरूढ़ हुआ, और अपनी सेना को शंकर के विरुद्ध युद्ध के लिये आज्ञा दी।

श्लोक 4 (shiva.rudra.174.4)

शिवः स्वसैन्यं देवांश्च प्रेरयामास सत्वरः । स्वयमप्यखिलेशोऽपि सन्नद्धोऽभूच्च लीलया

śivaḥ svasainyaṁ devāṁśca prerayāmāsa satvaraḥ svayamapyakhileśo'pi sannaddho'bhūcca līlayā

शिव ने भी शीघ्र ही अपनी सेना तथा देवताओं को आगे बढ़ाया; और स्वयं समस्त के स्वामी होते हुए भी लीलापूर्वक युद्ध के लिये सन्नद्ध हो गये।

श्लोक 5 (shiva.rudra.174.5)

युद्धारम्भो बभूवाशु नेदुर्वाद्यानि भूरिशः । कोलाहलश्च सञ्जातो वीरशब्दस्तथैव च

yuddhārambho babhūvāśu nedurvādyāni bhūriśaḥ kolāhalaśca sañjāto vīraśabdastathaiva ca

तुरन्त ही युद्ध का आरम्भ हो गया; अनेक वाद्य बज उठे, कोलाहल मच गया तथा वीरों की गर्जना भी सुनाई देने लगी।

श्लोक 6 (shiva.rudra.174.6)

देवदानवयोर्युद्धं परस्परमभून्मुने । धर्मतो युयुधे तत्र देवदानवयोर्गणः

devadānavayoryuddhaṁ parasparamabhūnmune dharmato yuyudhe tatra devadānavayorgaṇaḥ

हे मुने! तब देवताओं और दानवों में परस्पर युद्ध छिड़ गया; वहाँ देव और दानव दोनों की सेनाएँ नियमपूर्वक लड़ने लगीं।

श्लोक 7 (shiva.rudra.174.7)

स्वयं महेन्द्रो युयुधे सार्धं च वृषपर्वणा । भास्करो युयुधे विप्रचित्तिना सह धर्मतः

svayaṁ mahendro yuyudhe sārdhaṁ ca vṛṣaparvaṇā bhāskaro yuyudhe vipracittinā saha dharmataḥ

स्वयं महेन्द्र वृषपर्वा के साथ युद्ध करने लगे; भास्कर विप्रचित्ति के साथ विधिपूर्वक युद्ध करने लगे।

श्लोक 8 (shiva.rudra.174.8)

दम्भेन सह विष्णुश्च चकार परमं रणम् । कालासुरेण कालश्च गोकर्णेन हुताशनः

dambhena saha viṣṇuśca cakāra paramaṁ raṇam kālāsureṇa kālaśca gokarṇena hutāśanaḥ

विष्णु ने दम्भ के साथ घोर युद्ध किया; काल ने कालासुर के साथ तथा अग्नि ने गोकर्ण के साथ युद्ध किया।

श्लोक 9 (shiva.rudra.174.9)

कुबेरः कालकेयेन विश्वकर्मा मयेन च । भयङ्करेण मृत्युश्च संहारेण यमस्तथा

kuberaḥ kālakeyena viśvakarmā mayena ca bhayaṅkareṇa mṛtyuśca saṁhāreṇa yamastathā

कुबेर कालकेय के साथ, विश्वकर्मा मय के साथ; मृत्यु भयङ्कर के साथ तथा यम संहार के साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 10 (shiva.rudra.174.10)

कालम्बिकेन वरुणश्चञ्चलेन समीरणः । बुधश्च घटपृष्ठेन रक्ताक्षेण शनैश्चरः

kālambikena varuṇaścañcalena samīraṇaḥ budhaśca ghaṭapṛṣṭhena raktākṣeṇa śanaiścaraḥ

वरुण कालम्बिक के साथ, वायु चंचल के साथ; बुध घटपृष्ठ के साथ तथा शनैश्चर रक्ताक्ष के साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 11 (shiva.rudra.174.11)

जयन्तो रत्नसारेण वसवो वर्चसां गणैः । अश्विनौ दीप्तिमद्भ्यां च धूम्रेण नलकूबरः

jayanto ratnasāreṇa vasavo varcasāṁ gaṇaiḥ aśvinau dīptimadbhyāṁ ca dhūmreṇa nalakūbaraḥ

जयन्त रत्नसार के साथ, वसुगण वर्चस् के गणों के साथ; दोनों अश्विनीकुमार दोनों दीप्तिमानों के साथ तथा नलकूबर धूम्र के साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 12 (shiva.rudra.174.12)

धुरन्धरेण धर्मश्च गणकाक्षेण मङ्गलः । शोभाकरेण वैश्वानः पिपिटेन च मन्मथः

dhurandhareṇa dharmaśca gaṇakākṣeṇa maṅgalaḥ śobhākareṇa vaiśvānaḥ pipiṭena ca manmathaḥ

धर्म धुरन्धर के साथ, मंगल गणकाक्ष के साथ; वैश्वान शोभाकर के साथ तथा मन्मथ पिपिट के साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 13 (shiva.rudra.174.13)

गोकामुखेन चूर्णेन खड्गनाम्नासुरेण च । धूम्रेण संहलेनापि विश्वेन च प्रतापिना

gokāmukhena cūrṇena khaḍganāmnāsureṇa ca dhūmreṇa saṁhalenāpi viśvena ca pratāpinā

गोकामुख, चूर्ण, खड्ग नामक असुर, धूम्र, संहल तथा प्रतापी विश्व के साथ भी अन्य वीर युद्ध करने लगे।

श्लोक 14 (shiva.rudra.174.14)

द्वादशार्का पलाशेन युयुधुर्धर्मतः परे । असुरैरमराः सार्द्धं शिवसाहाय्यशालिनः

dvādaśārkā palāśena yuyudhurdharmataḥ pare asurairamarāḥ sārddhaṁ śivasāhāyyaśālinaḥ

बारह आदित्य पलाश के साथ नियमपूर्वक युद्ध करने लगे; और शिव के सहायक अन्य देवगण भी अन्य असुरों के साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 15 (shiva.rudra.174.15)

एकादश महारुद्राश्चैकादशभयङ्करैः । असुरैर्युयुधुर्वीरैर्महाबलपराक्रमैः

ekādaśa mahārudrāścaikādaśabhayaṅkaraiḥ asurairyuyudhurvīrairmahābalaparākramaiḥ

ग्यारह महारुद्र भी ग्यारह भयंकर, महाबली-पराक्रमी असुर वीरों के साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 16 (shiva.rudra.174.16)

महामणिश्च युयुधे चोग्रचण्डादिभिः सह । राहुणा सह चन्द्रश्च जीवः शुक्रेण धर्मतः

mahāmaṇiśca yuyudhe cogracaṇḍādibhiḥ saha rāhuṇā saha candraśca jīvaḥ śukreṇa dharmataḥ

महामणि उग्रचण्ड आदि के साथ युद्ध करने लगे; चन्द्रमा राहु के साथ तथा बृहस्पति शुक्र के साथ नियमपूर्वक युद्ध करने लगे।

श्लोक 17 (shiva.rudra.174.17)

नन्दीश्वरादयः सर्वे दानवप्रवरैः सह । युयुधुश्च महायुद्धे नोक्ता विस्तरतः पृथक्

nandīśvarādayaḥ sarve dānavapravaraiḥ saha yuyudhuśca mahāyuddhe noktā vistarataḥ pṛthak

नन्दीश्वर आदि अन्य सभी गण भी उस महायुद्ध में श्रेष्ठ दानवों के साथ युद्ध करने लगे — इन सबका पृथक्-पृथक् विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं किया जा सकता।

श्लोक 18 (shiva.rudra.174.18)

वटमूले तदा शम्भुस्तस्थौ काल्याः सुतेन च । सर्वे च युयुधुः सैन्यसमूहाः सततं मुने

vaṭamūle tadā śambhustasthau kālyāḥ sutena ca sarve ca yuyudhuḥ sainyasamūhāḥ satataṁ mune

उस समय शम्भु काली के पुत्र (स्कन्द) सहित वटवृक्ष के नीचे ही ठहरे रहे; और हे मुने! सम्पूर्ण सेनाएँ निरन्तर युद्ध करती रहीं।

श्लोक 19 (shiva.rudra.174.19)

रत्नसिंहासने रम्ये कोटिदानवसंयुते । उवास शङ्खचूडश्च रत्नभूषणभूषितः

ratnasiṁhāsane ramye koṭidānavasaṁyute uvāsa śaṅkhacūḍaśca ratnabhūṣaṇabhūṣitaḥ

शङ्खचूड भी रत्नाभूषणों से विभूषित होकर, करोड़ों दानवों से घिरे हुए एक रमणीय रत्नसिंहासन पर विराजमान रहा।

श्लोक 20 (shiva.rudra.174.20)

महायुद्धो बभूवाथ देवासुरविमर्दनः । नानायुधानि दिव्यानि चलन्ति स्म महामृधे

mahāyuddho babhūvātha devāsuravimardanaḥ nānāyudhāni divyāni calanti sma mahāmṛdhe

तब देवताओं और असुरों के बीच घोर संहारक महायुद्ध छिड़ गया; उस महासंग्राम में अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र चलने लगे।

श्लोक 21 (shiva.rudra.174.21)

गदर्ष्टिपट्टिशाश्चक्रभुशुण्डिप्रासमुद्गराः । निस्त्रिंशभल्लपरिघाः शक्त्युन्मुखपरश्वधाः

gadarṣṭipaṭṭiśāścakrabhuśuṇḍiprāsamudgarāḥ nistriṁśabhallaparighāḥ śaktyunmukhaparaśvadhāḥ

गदा, ऋष्टि, पट्टिश, चक्र, भुशुण्डि, प्रास तथा मुद्गर; तलवार, भल्ल, परिघ, शक्ति तथा परशु —

श्लोक 22 (shiva.rudra.174.22)

शरतोमरखड्गाश्च शतघ्न्यश्च सहस्रशः । भिन्दिपालादयश्चान्ये वीरहस्तेषु शोभिताः

śaratomarakhaḍgāśca śataghnyaśca sahasraśaḥ bhindipālādayaścānye vīrahasteṣu śobhitāḥ

बाण, तोमर, खड्ग तथा सहस्रों शतघ्नियाँ; भिन्दिपाल आदि अन्य शस्त्र भी वीरों के हाथों में सुशोभित हो रहे थे।

श्लोक 23 (shiva.rudra.174.23)

शिरांसि चिच्छिदुश्चैभिर्वीरास्तत्र महोत्सवाः । वीराणामुभयोश्चैव सैन्ययोर्गर्जतो रणे

śirāṁsi cicchiduścaibhirvīrāstatra mahotsavāḥ vīrāṇāmubhayoścaiva sainyayorgarjato raṇe

इन्हीं शस्त्रों से वीरगण महोत्सव के समान हर्षपूर्वक शत्रुओं के शिर काट रहे थे; दोनों सेनाओं के वीर युद्ध में गरज रहे थे।

श्लोक 24 (shiva.rudra.174.24)

गजास्तुरङ्गा बहवः स्यन्दनाश्च पदातयः । सारोहवाहा विविधास्तत्रासन् सुविखण्डिताः

gajāsturaṅgā bahavaḥ syandanāśca padātayaḥ sārohavāhā vividhāstatrāsan suvikhaṇḍitāḥ

अनेक हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिक अपने सवारों तथा वाहनों सहित वहाँ खण्ड-खण्ड होकर बिखरे पड़े थे।

श्लोक 25 (shiva.rudra.174.25)

निकृत्तबाहूरुकरकटिकर्णयुगाङ्घ्रयः । सञ्छिन्नध्वजबाणासितनुत्रवरभूषणाः

nikṛttabāhūrukarakaṭikarṇayugāṅghrayaḥ sañchinnadhvajabāṇāsitanutravarabhūṣaṇāḥ

कटी हुई भुजाएँ, जाँघें, हाथ, कमर, दोनों कान तथा पैर बिखरे पड़े थे; कटी हुई ध्वजाएँ, बाण, तलवारें, कवच तथा उत्तम आभूषण भी वहाँ पड़े थे।

श्लोक 26 (shiva.rudra.174.26)

समुद्धतकिरीटैश्च शिरोभिः सह कुण्डलैः । संरम्भनष्टैरास्तीर्णा बभौ भूः करभोरुभिः

samuddhatakirīṭaiśca śirobhiḥ saha kuṇḍalaiḥ saṁrambhanaṣṭairāstīrṇā babhau bhūḥ karabhorubhiḥ

मुकुटों तथा कुण्डलों सहित उछले हुए शिरों से, और युद्ध के आवेश में गिरे हुए हाथी की सूँड़ जैसी जंघाओं से पटी हुई वह भूमि अत्यंत विचित्र दिखायी देने लगी।

श्लोक 27 (shiva.rudra.174.27)

महाभुजैः साभरणैः सञ्छिन्नैः सायुधैस्तथा । अङ्गैरन्यैश्च सहसा पटलैर्वा ससारघैः

mahābhujaiḥ sābharaṇaiḥ sañchinnaiḥ sāyudhaistathā aṅgairanyaiśca sahasā paṭalairvā sasāraghaiḥ

आभूषणों तथा शस्त्रों सहित कटी हुई विशाल भुजाओं से, तथा सहसा कटे हुए अन्य अंगों एवं रक्त की धाराओं से पटी हुई —

श्लोक 28 (shiva.rudra.174.28)

मृधे भटाः प्रधावन्तः कबन्धान् स्वशिरोक्षिभिः । पश्यन्तस्तत्र चोत्पेतुरुद्यतायुधसद्भुजैः

mṛdhe bhaṭāḥ pradhāvantaḥ kabandhān svaśirokṣibhiḥ paśyantastatra cotpeturudyatāyudhasadbhujaiḥ

उस युद्ध में सिर कटे हुए धड़ भी अपने ही कटे शिरों की आँखों से देखते हुए, उठे हुए शस्त्रों सहित उत्तम भुजाओं के साथ इधर-उधर दौड़ने लगे।

श्लोक 29 (shiva.rudra.174.29)

वल्गन्तोऽतितरां वीरा युयुधुश्च परस्परम् । शस्त्रास्त्रैर्विविधैस्तत्र महाबलपराक्रमाः

valganto'titarāṁ vīrā yuyudhuśca parasparam śastrāstrairvividhaistatra mahābalaparākramāḥ

अत्यंत उछलते-कूदते हुए वे महाबली-पराक्रमी वीर वहाँ नाना प्रकार के शस्त्र-अस्त्रों से परस्पर युद्ध करने लगे।

श्लोक 30 (shiva.rudra.174.30)

केचित्स्वर्णमुखैर्बाणैर्विनिहत्य भटान्मृधे । व्यनदन् वीरसन्नादं सतोया इव तोयदाः

kecitsvarṇamukhairbāṇairvinihatya bhaṭānmṛdhe vyanadan vīrasannādaṁ satoyā iva toyadāḥ

कोई-कोई युद्ध में स्वर्णमुखी बाणों से योद्धाओं को मारकर, जल से भरे मेघों के समान वीर-गर्जना करने लगे।

श्लोक 31 (shiva.rudra.174.31)

सर्वतः शरकूटेन वीरः सरथसारथिम् । वीरं सञ्छादयामास प्रावृट्सूर्यमिवाम्बुदः

sarvataḥ śarakūṭena vīraḥ sarathasārathim vīraṁ sañchādayāmāsa prāvṛṭsūryamivāmbudaḥ

एक वीर ने चारों ओर से बाणों के समूह द्वारा रथ तथा सारथि सहित दूसरे वीर को इस प्रकार ढक दिया, जैसे वर्षा ऋतु का मेघ सूर्य को ढक लेता है।

श्लोक 32 (shiva.rudra.174.32)

अन्योऽन्यमभिसंसृत्य युयुधुर्द्वन्द्वयोधिनः । आह्वयन्तो विशन्तोऽग्रे क्षिपन्तो मर्मभिर्मिथः

anyo'nyamabhisaṁsṛtya yuyudhurdvandvayodhinaḥ āhvayanto viśanto'gre kṣipanto marmabhirmithaḥ

युद्धकुशल द्वन्द्वयोद्धा एक-दूसरे के निकट पहुँचकर, आह्वान करते, आगे बढ़ते तथा एक-दूसरे के मर्मस्थलों पर प्रहार करते हुए लड़ने लगे।

श्लोक 33 (shiva.rudra.174.33)

सर्वतो वीरसङ्घाश्च नानाबाहुध्वजायुधाः । व्यदृश्यन्त महासङ्ख्ये कुर्वन्तः सिंहसंरवम्

sarvato vīrasaṅghāśca nānābāhudhvajāyudhāḥ vyadṛśyanta mahāsaṅkhye kurvantaḥ siṁhasaṁravam

उस महासंग्राम में चारों ओर अनेक भुजाओं, ध्वजाओं तथा शस्त्रों से युक्त वीरों के समूह सिंह के समान गर्जना करते हुए दिखायी दे रहे थे।

श्लोक 34 (shiva.rudra.174.34)

महारवान् स्वशङ्खांश्च विदध्मुर्वै पृथक् पृथक् । वल्गनं चक्रिरे तत्र महावीराः प्रहर्षिताः

mahāravān svaśaṅkhāṁśca vidadhmurvai pṛthak pṛthak valganaṁ cakrire tatra mahāvīrāḥ praharṣitāḥ

वे सब अपने-अपने शंखों को अलग-अलग महाध्वनि से बजाने लगे; और वहाँ अत्यंत हर्षित होकर महावीरगण उछल-कूद करने लगे।

श्लोक 35 (shiva.rudra.174.35)

एवं चिरतरं कालं देवदानवयोर्महत् । बभूव युद्धं विकटं करालं वीरहर्षदम्

evaṁ cirataraṁ kālaṁ devadānavayormahat babhūva yuddhaṁ vikaṭaṁ karālaṁ vīraharṣadam

इस प्रकार दीर्घकाल तक देवताओं और दानवों के बीच वह विकट, भयंकर तथा वीरों को हर्ष देने वाला महायुद्ध चलता रहा।

श्लोक 36 (shiva.rudra.174.36)

महाप्रभोश्च लीलेयं शङ्करस्य परात्मनः । यया समोहितं सर्वं सदेवासुरमानुषम्

mahāprabhośca līleyaṁ śaṅkarasya parātmanaḥ yayā samohitaṁ sarvaṁ sadevāsuramānuṣam

यह सब उस महाप्रभु परमात्मा शंकर की ही लीला थी, जिससे देवता, असुर तथा मनुष्य — सभी मोहित हो गये।

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