रुद्र संहिता · अध्याय 193
बाण-भुज-कृन्तन-गर्वापहार-वर्णन
श्लोक 1 (shiva.rudra.193.1)
व्यास उवाच । सनत्कुमार सर्वज्ञ ब्रह्मपुत्र नमोऽस्तु ते । अद्भुतेयं कथा तात श्राविता मे त्वया मुने
vyāsa uvāca sanatkumāra sarvajña brahmaputra namo'stu te adbhuteyaṁ kathā tāta śrāvitā me tvayā mune
व्यास ने कहा — हे सर्वज्ञ सनत्कुमार! हे ब्रह्मपुत्र! आपको नमस्कार है। हे तात! हे मुने! आपने मुझे यह अद्भुत कथा सुनाई है।
श्लोक 2 (shiva.rudra.193.2)
जृम्भिते जृम्भणास्त्रेण हरिणा समरे हरे । हते बाणबले बाणः किमकार्षीच्च तद्वद
jṛmbhite jṛmbhaṇāstreṇa hariṇā samare hare hate bāṇabale bāṇaḥ kimakārṣīcca tadvada
समर में जब हरि द्वारा जृम्भणास्त्र से हर उनींदे कर दिए गए और बाण की सेना नष्ट हो गई, तब बाण ने क्या किया? यह मुझे बताइए।
श्लोक 3 (shiva.rudra.193.3)
सूत उवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य व्यासस्यामिततेजसः । प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा ब्रह्मपुत्रो मुनीश्वरः
sūta uvāca ityākarṇya vacastasya vyāsasyāmitatejasaḥ pratyuvāca prasannātmā brahmaputro munīśvaraḥ
सूत ने कहा — अमित तेजस्वी व्यास के इस वचन को सुनकर प्रसन्नचित्त ब्रह्मपुत्र मुनीश्वर ने उत्तर दिया —
श्लोक 4 (shiva.rudra.193.4)
सनत्कुमार उवाच । शृणु व्यास महाप्राज्ञ कथां च परमाद्भुताम् । कृष्णशङ्करयोस्तात लोकलीलानुसारिणोः
sanatkumāra uvāca śṛṇu vyāsa mahāprājña kathāṁ ca paramādbhutām kṛṣṇaśaṅkarayostāta lokalīlānusāriṇoḥ
सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास! हे महाप्राज्ञ! हे तात! लोकलीला का अनुसरण करने वाले कृष्ण और शंकर की यह परम अद्भुत कथा सुनो।
श्लोक 5 (shiva.rudra.193.5)
शयिते लीलया रुद्रे सपुत्रे सगणे सति । बाणो विनिर्गतो युद्धं कर्तुं कृष्णेन दैत्यराट्
śayite līlayā rudre saputre sagaṇe sati bāṇo vinirgato yuddhaṁ kartuṁ kṛṣṇena daityarāṭ
जब रुद्र अपने पुत्र और गणों सहित लीलावश उनींदे होकर लेटे हुए थे, तब दैत्यराज बाण कृष्ण से युद्ध करने के लिए निकल पड़ा।
श्लोक 6 (shiva.rudra.193.6)
कुम्भाण्डसङ्गृहीताश्वो नानाशस्त्रास्त्रधृक् ततः । चकार युद्धमतुलं बलिपुत्रो महाबलः
kumbhāṇḍasaṅgṛhītāśvo nānāśastrāstradhṛk tataḥ cakāra yuddhamatulaṁ baliputro mahābalaḥ
कुम्भाण्ड द्वारा जिनके घोड़े संभाले जा रहे थे, नाना शस्त्रास्त्र धारण किए हुए, वह महाबली बलि-पुत्र अनुपम युद्ध करने लगा।
श्लोक 7 (shiva.rudra.193.7)
दृष्ट्वा निजबलं नष्टं स दैत्येन्द्रोऽत्यमर्षितः । चकार युद्धमतुलं बलिपुत्रो महाबलः
dṛṣṭvā nijabalaṁ naṣṭaṁ sa daityendro'tyamarṣitaḥ cakāra yuddhamatulaṁ baliputro mahābalaḥ
अपनी सेना को नष्ट होते देखकर वह अत्यन्त क्रुद्ध दैत्येन्द्र, वह महाबली बलि-पुत्र, अनुपम युद्ध करने लगा।
श्लोक 8 (shiva.rudra.193.8)
श्रीकृष्णोऽपि महावीरो गिरिशाप्तमहाबलः । उच्चैर्जगर्ज तत्राजौ बाणं मत्वा तृणोपमम्
śrīkṛṣṇo'pi mahāvīro giriśāptamahābalaḥ uccairjagarja tatrājau bāṇaṁ matvā tṛṇopamam
महावीर श्रीकृष्ण भी, जिनका महाबल गिरीश से प्राप्त था, बाण को तृण के समान मानते हुए उस समर में उच्च स्वर से गरजे।
श्लोक 9 (shiva.rudra.193.9)
धनुष्टङ्कारयामास शार्ङ्गाख्यं निजमद्भुतम् । त्रासयन्बाणसैन्यं तदवशिष्टं मुनीश्वर
dhanuṣṭaṅkārayāmāsa śārṅgākhyaṁ nijamadbhutam trāsayanbāṇasainyaṁ tadavaśiṣṭaṁ munīśvara
हे मुनीश्वर! उन्होंने बाण की शेष सेना को भयभीत करते हुए अपने शार्ङ्ग नामक अद्भुत धनुष की टंकार की।
श्लोक 10 (shiva.rudra.193.10)
तेन नादेन महता धनुष्टङ्कारजेन हि । द्यावाभूम्योरन्तरं वै व्याप्तमासीदनन्तरम्
tena nādena mahatā dhanuṣṭaṅkārajena hi dyāvābhūmyorantaraṁ vai vyāptamāsīdanantaram
उस धनुष की टंकार से उत्पन्न महान् नाद से द्युलोक और भूलोक के बीच का सम्पूर्ण अन्तराल तत्काल व्याप्त हो गया।
श्लोक 11 (shiva.rudra.193.11)
चिक्षेप विविधान्बाणान्बाणाय कुपितो हरिः । कर्णान्तं तद्विकृष्याथ तीक्ष्णानाशीविषोपमान्
cikṣepa vividhānbāṇānbāṇāya kupito hariḥ karṇāntaṁ tadvikṛṣyātha tīkṣṇānāśīviṣopamān
क्रुद्ध हरि ने कान तक खींचकर बाण के प्रति नाना प्रकार के तीक्ष्ण, सर्प के समान बाण छोड़े।
श्लोक 12 (shiva.rudra.193.12)
आयातस्तान्निरीक्ष्याऽथ स बाणो बलिनन्दनः । अप्राप्तानेव चिच्छेद स्वशरैः स्वधनुश्च्युतैः
āyātastānnirīkṣyā'tha sa bāṇo balinandanaḥ aprāptāneva ciccheda svaśaraiḥ svadhanuścyutaiḥ
उन आते हुए बाणों को देखकर बलिनन्दन बाण ने उन्हें पहुँचने से पहले ही अपने धनुष से छूटे बाणों द्वारा काट डाला।
श्लोक 13 (shiva.rudra.193.13)
पुनर्जगर्ज स विभुर्बाणो वैरिगणार्दनः । तत्रसुर्वृष्णयः सर्वे कृष्णात्मानो विचेतसः
punarjagarja sa vibhurbāṇo vairigaṇārdanaḥ tatrasurvṛṣṇayaḥ sarve kṛṣṇātmāno vicetasaḥ
विभु बाण, वैरिसमूह का संहारक, पुनः गरजा; इससे कृष्णचित्त सभी वृष्णिवंशी विचलित होकर भयभीत हो गए।
श्लोक 14 (shiva.rudra.193.14)
स्मृत्वा शिवपदाम्भोजं चिक्षेप निजसायकान् । स कृष्णायातिशूराय महागर्वो बलेः सुतः
smṛtvā śivapadāmbhojaṁ cikṣepa nijasāyakān sa kṛṣṇāyātiśūrāya mahāgarvo baleḥ sutaḥ
शिव के चरणकमल का स्मरण करके उस अत्यन्त गर्वित बलि-पुत्र ने अत्यन्त शूरवीर कृष्ण पर अपने बाण छोड़े।
श्लोक 15 (shiva.rudra.193.15)
कृष्णोऽपि तानसम्प्राप्तानच्छिनत्स्वशरैर्द्रुतम् । स्मृत्वा शिवपदाम्भोजममरारिर्महाबलः
kṛṣṇo'pi tānasamprāptānacchinatsvaśarairdrutam smṛtvā śivapadāmbhojamamarārirmahābalaḥ
महाबली, देवशत्रुओं के संहारक कृष्ण ने भी शिव के चरणकमल का स्मरण करके उन आते हुए बाणों को शीघ्र ही अपने बाणों से काट डाला।
श्लोक 16 (shiva.rudra.193.16)
रामादयो वृष्णयश्च स्वं स्वं योद्धारमाहवे । निजघ्नुर्बलिनःसर्वे कृत्वा क्रोधं समाकुलाः
rāmādayo vṛṣṇayaśca svaṁ svaṁ yoddhāramāhave nijaghnurbalinaḥsarve kṛtvā krodhaṁ samākulāḥ
राम आदि वृष्णिवंशी सभी बलवान् वीर क्रोध से व्याकुल होकर युद्ध में अपने-अपने प्रतिद्वन्द्वी को मार गिराने लगे।
श्लोक 17 (shiva.rudra.193.17)
इत्थं चिरतरं तत्र बलिनोश्च द्वयोरपि । बभूव तुमुलं युद्धं शृण्वतां विस्मयावहम्
itthaṁ cirataraṁ tatra balinośca dvayorapi babhūva tumulaṁ yuddhaṁ śṛṇvatāṁ vismayāvaham
इस प्रकार उन दोनों बलवानों के बीच दीर्घकाल तक ऐसा तुमुल युद्ध हुआ, जिसे सुनकर लोग विस्मित हो उठे।
श्लोक 18 (shiva.rudra.193.18)
तस्मिन्नवसरे तत्र क्रोधं कृत्वाऽति पक्षिराट् । बाणासुरबलं सर्वं पक्षाघातैरमर्दयत्
tasminnavasare tatra krodhaṁ kṛtvā'ti pakṣirāṭ bāṇāsurabalaṁ sarvaṁ pakṣāghātairamardayat
उसी अवसर पर अत्यन्त क्रुद्ध होकर पक्षिराज गरुड़ ने अपने पंखों के प्रहार से बाणासुर की सम्पूर्ण सेना को कुचल डाला।
श्लोक 19 (shiva.rudra.193.19)
मर्दितं स्वबलं दृष्ट्वा मर्दयन्तं च तं बली । चुकोपाति बलेः पुत्रः शैवराड् दितिजेश्वरः
marditaṁ svabalaṁ dṛṣṭvā mardayantaṁ ca taṁ balī cukopāti baleḥ putraḥ śaivarāḍ ditijeśvaraḥ
अपनी सेना को कुचला जाता देखकर तथा उसे कुचलते हुए गरुड़ को देखकर वह महाबली, शैवराज, दैत्यों का स्वामी बलि-पुत्र अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा।
श्लोक 20 (shiva.rudra.193.20)
स्मृत्वा शिवपदाम्भोजं सहस्रभुजवान्द्रुतम् । महत्पराक्रमं चक्रे वैरिणां दुःसहं स वै
smṛtvā śivapadāmbhojaṁ sahasrabhujavāndrutam mahatparākramaṁ cakre vairiṇāṁ duḥsahaṁ sa vai
शिव के चरणकमल का स्मरण करके उस सहस्रभुज ने तुरन्त शत्रुओं के लिए असह्य महापराक्रम प्रकट किया।
श्लोक 21 (shiva.rudra.193.21)
चिक्षेप युगपद्बाणानमितांस्तत्र वीरहा । कृष्णादिसर्वयदुषु गरुडे च पृथक् पृथक्
cikṣepa yugapadbāṇānamitāṁstatra vīrahā kṛṣṇādisarvayaduṣu garuḍe ca pṛthak pṛthak
उस वीरहन्ता ने कृष्ण आदि समस्त यादवों तथा गरुड़ पर एक साथ पृथक्-पृथक् असंख्य बाण छोड़े।
श्लोक 22 (shiva.rudra.193.22)
जघानैकेन गरुडं कृष्णमेकेन पत्त्रिणा । बलमेकेन च मुने परानपि तथा बली
jaghānaikena garuḍaṁ kṛṣṇamekena pattriṇā balamekena ca mune parānapi tathā balī
हे मुने! उसने एक बाण से गरुड़ को, एक पंखयुक्त बाण से कृष्ण को, एक से बलराम को, तथा उसी प्रकार अन्य सबको भी मार गिराया।
श्लोक 23 (shiva.rudra.193.23)
ततः कृष्णो महावीर्यो विष्णुरूपः सुरारिहा । चुकोपातिरणे तस्मिञ्जगर्ज च महेश्वरः
tataḥ kṛṣṇo mahāvīryo viṣṇurūpaḥ surārihā cukopātiraṇe tasmiñjagarja ca maheśvaraḥ
तब महापराक्रमी, विष्णु-स्वरूप, देवशत्रुओं के संहारक कृष्ण उस युद्ध में अत्यन्त क्रुद्ध होकर महेश्वर के समान गरज उठे।
श्लोक 24 (shiva.rudra.193.24)
जघान बाणं तरसा शार्ङ्गनिःसृतसच्छरैः । अति तद्बलमत्युग्रं युगपत्स्मृतशङ्करः
jaghāna bāṇaṁ tarasā śārṅganiḥsṛtasaccharaiḥ ati tadbalamatyugraṁ yugapatsmṛtaśaṅkaraḥ
शंकर का स्मरण करते हुए उन्होंने शार्ङ्ग से छूटे सच्चे बाणों द्वारा वेगपूर्वक बाण को तथा उसकी अत्यन्त उग्र सेना को एक साथ मार गिराया।
श्लोक 25 (shiva.rudra.193.25)
चिच्छेद तद्धनुः शीघ्रं छत्रादिकमनाकुलः । हयांश्च पातयामास हत्वा तान्स्वशरैर्हरिः
ciccheda taddhanuḥ śīghraṁ chatrādikamanākulaḥ hayāṁśca pātayāmāsa hatvā tānsvaśarairhariḥ
निर्विकार होकर उन्होंने शीघ्र ही उसका धनुष, छत्र आदि काट डाला; और हरि ने अपने बाणों से उसके घोड़ों को मारकर गिरा दिया।
श्लोक 26 (shiva.rudra.193.26)
बाणोऽपि च महावीरो जगर्जाति प्रकुप्य ह । कृष्णं जघान गदया सोऽपतद्धरणीतले
bāṇo'pi ca mahāvīro jagarjāti prakupya ha kṛṣṇaṁ jaghāna gadayā so'pataddharaṇītale
महावीर बाण भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर गरजा, और उसने गदा से कृष्ण को ऐसा मारा कि वे पृथ्वी पर गिर पड़े।
श्लोक 27 (shiva.rudra.193.27)
उत्थायारं ततः कृष्णो युयुधे तेन शत्रुणा । शिवभक्तेन देवर्षे लोकलीलाऽनुसारतः
utthāyāraṁ tataḥ kṛṣṇo yuyudhe tena śatruṇā śivabhaktena devarṣe lokalīlā'nusārataḥ
हे देवर्षे! तब कृष्ण तत्काल उठकर उस शिवभक्त शत्रु के साथ, अपनी-अपनी लोकलीला के अनुसार, पुनः युद्ध करने लगे।
श्लोक 28 (shiva.rudra.193.28)
एवं द्वयोश्चिरं कालं बभूव सुमहान् रणः । शिवरूपो हरिः कृष्णः स च शैवोत्तमो बली
evaṁ dvayościraṁ kālaṁ babhūva sumahān raṇaḥ śivarūpo hariḥ kṛṣṇaḥ sa ca śaivottamo balī
इस प्रकार उन दोनों — शिवरूप हरि कृष्ण और शैवोत्तम बलवान् बाण — के बीच दीर्घकाल तक अत्यन्त महान् युद्ध हुआ।
श्लोक 29 (shiva.rudra.193.29)
कृष्णोऽथ कृत्वा समरं चिरं बाणेन वीर्यवान् । शिवाऽऽज्ञया प्राप्तबलश्चुकोपाति मुनीश्वर
kṛṣṇo'tha kṛtvā samaraṁ ciraṁ bāṇena vīryavān śivā''jñayā prāptabalaścukopāti munīśvara
हे मुनीश्वर! शिव की आज्ञा से प्राप्त बल वाले वीर्यवान् कृष्ण, बाण के साथ दीर्घकाल तक युद्ध करके, अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे।
श्लोक 30 (shiva.rudra.193.30)
ततःसुदर्शनेनाशु कृष्णो बाणभुजान्बहून् । चिच्छेद भगवान् शम्भुः शासनात्परवीरहा
tataḥsudarśanenāśu kṛṣṇo bāṇabhujānbahūn ciccheda bhagavān śambhuḥ śāsanātparavīrahā
तब भगवान् शम्भु की ही आज्ञा से, परवीरहन्ता कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से बाण की अनेक भुजाओं को शीघ्र काट डाला।
श्लोक 31 (shiva.rudra.193.31)
अवशिष्टा भुजास्तस्य चत्वारोऽतीव सुन्दराः । गतव्यथो बभूवाशु शङ्करस्य प्रसादतः
avaśiṣṭā bhujāstasya catvāro'tīva sundarāḥ gatavyatho babhūvāśu śaṅkarasya prasādataḥ
उसकी शेष रह गई अत्यन्त सुन्दर चार भुजाएँ, शंकर की कृपा से तत्काल वेदनारहित हो गईं।
श्लोक 32 (shiva.rudra.193.32)
गतस्मृतिर्यदा बाणः शिरश्छेत्तुं समुद्यतः । कृष्णो वीरत्वमापन्नस्तदा रुद्रः समुत्थितः
gatasmṛtiryadā bāṇaḥ śiraśchettuṁ samudyataḥ kṛṣṇo vīratvamāpannastadā rudraḥ samutthitaḥ
जब स्मृतिहीन बाण का सिर काटने के लिए वीरत्व को प्राप्त कृष्ण उद्यत हुए, तब रुद्र स्वयं उठ खड़े हुए।
श्लोक 33 (shiva.rudra.193.33)
रुद्र उवाच । भगवन्देवकीपुत्र यदाज्ञप्तं मया पुरा । तत्कृतं च त्वया विष्णो मदाज्ञाकारिणा सदा
rudra uvāca bhagavandevakīputra yadājñaptaṁ mayā purā tatkṛtaṁ ca tvayā viṣṇo madājñākāriṇā sadā
रुद्र ने कहा — हे भगवन्! हे देवकी-पुत्र! जो मैंने पूर्वकाल में आज्ञा दी थी, हे विष्णो! वह आपने, सदा मेरी आज्ञा का पालन करने वाले ने, कर दिखाया।
श्लोक 34 (shiva.rudra.193.34)
मा बाणस्य शिरश्छिन्धि संहरस्व सुदर्शनम् । मदाज्ञया चक्रमिमममोघं मज्जने सदा
mā bāṇasya śiraśchindhi saṁharasva sudarśanam madājñayā cakramimamamoghaṁ majjane sadā
बाण का सिर मत काटो, सुदर्शन को संहृत करो; मेरी ही आज्ञा से यह अमोघ चक्र सदा तुम्हारे हाथ में रहा है।
श्लोक 35 (shiva.rudra.193.35)
दत्तं मया पुरा तुभ्यमनिवार्यं रणे तव । चक्रं जयं च गोविन्द निवर्तस्व रणात्ततः
dattaṁ mayā purā tubhyamanivāryaṁ raṇe tava cakraṁ jayaṁ ca govinda nivartasva raṇāttataḥ
मैंने ही पूर्वकाल में तुम्हें यह अजेय चक्र और युद्ध में विजय दी थी; हे गोविन्द! अब इस युद्ध से निवृत्त हो जाओ।
श्लोक 36 (shiva.rudra.193.36)
दधीचे रावणे वीरे तारकादिपुरेष्वपि । विना मदाज्ञां लक्ष्मीश रथाङ्गं नामुचः पुरा
dadhīce rāvaṇe vīre tārakādipureṣvapi vinā madājñāṁ lakṣmīśa rathāṅgaṁ nāmucaḥ purā
हे लक्ष्मीश! दधीचि, वीर रावण, तारकासुर आदि के नगरों पर भी यह चक्र मेरी आज्ञा के बिना पहले कभी नहीं चला।
श्लोक 37 (shiva.rudra.193.37)
त्वं तु योगीश्वरः साक्षात्परमात्मा जनार्दन । विचार्यतां स्वमनसा सर्वभूतहिते रतः
tvaṁ tu yogīśvaraḥ sākṣātparamātmā janārdana vicāryatāṁ svamanasā sarvabhūtahite rataḥ
हे जनार्दन! तुम तो साक्षात् योगीश्वर, परमात्मा, सर्वभूतों के हित में रत हो — अपने मन से इस पर विचार करो।
श्लोक 38 (shiva.rudra.193.38)
वरमस्य मया दत्तं न मृत्युर्भयमस्ति वै । तन्मे वचः सदा सत्यं परितुष्टोऽस्म्यहं तव
varamasya mayā dattaṁ na mṛtyurbhayamasti vai tanme vacaḥ sadā satyaṁ parituṣṭo'smyahaṁ tava
मैंने ही इसे यह वर दिया है कि इसे मृत्यु का भय नहीं है; मेरा वह वचन सदा सत्य है। मैं तुमसे परम सन्तुष्ट हूँ।
श्लोक 39 (shiva.rudra.193.39)
पुराऽयं गर्वितो मत्तो युद्धं देहीति मेऽब्रवीत् । भुजान्कण्डूयमानस्तु विस्मृतात्मगतिर्हरे
purā'yaṁ garvito matto yuddhaṁ dehīti me'bravīt bhujānkaṇḍūyamānastu vismṛtātmagatirhare
पूर्वकाल में यह गर्वित, मत्त होकर अपनी भुजाएँ खुजलाते हुए मुझसे "युद्ध दीजिए" ऐसा बोला था, हे हरे! अपनी सच्ची गति को भूलकर।
श्लोक 40 (shiva.rudra.193.40)
तदाहमशपं तं वै भुजच्छेत्ताऽऽगमिष्यति । अचिरेणातिकालेन गतगर्वो भविष्यसि
tadāhamaśapaṁ taṁ vai bhujacchettā''gamiṣyati acireṇātikālena gatagarvo bhaviṣyasi
तब मैंने ही इसे शाप दिया था कि शीघ्र ही एक भुजा-छेदक आएगा और अल्पकाल में ही तुम्हारा गर्व नष्ट हो जाएगा।
श्लोक 41 (shiva.rudra.193.41)
मदाज्ञया हरिः प्राप्तो भुजच्छेत्ता तवाऽथ वै । निवर्तस्व रणाद्गच्छ स्वगृहं सवधूवरः
madājñayā hariḥ prāpto bhujacchettā tavā'tha vai nivartasva raṇādgaccha svagṛhaṁ savadhūvaraḥ
मेरी ही आज्ञा से हरि तुम्हारी भुजाओं के छेदक बनकर आए हैं; अब युद्ध से निवृत्त होकर वधू-वर सहित अपने घर जाओ।
श्लोक 42 (shiva.rudra.193.42)
इत्युक्तः स तयोर्मैत्रीं कारयित्वा महेश्वरः । तमनुज्ञाप्य सगणः सपुत्रः स्वालयं ययौ
ityuktaḥ sa tayormaitrīṁ kārayitvā maheśvaraḥ tamanujñāpya sagaṇaḥ saputraḥ svālayaṁ yayau
सनत्कुमार ने कहा — ऐसा कहकर महेश्वर ने उन दोनों में मित्रता कराई, और बाण से विदा लेकर अपने पुत्र तथा गणों सहित अपने धाम को चले गए।
श्लोक 43 (shiva.rudra.193.43)
सनत्कुमार उवाच । इत्याकर्ण्य वचः शम्भोः संहृत्य च सुदर्शनम् । अक्षताङ्गस्तु विजयी तत्कृष्णोऽन्तःपुरं ययौ
sanatkumāra uvāca ityākarṇya vacaḥ śambhoḥ saṁhṛtya ca sudarśanam akṣatāṅgastu vijayī tatkṛṣṇo'ntaḥpuraṁ yayau
शम्भु का यह वचन सुनकर तथा सुदर्शन को संहृत करके अक्षत शरीर वाले विजयी कृष्ण तब अन्तःपुर में गए।
श्लोक 44 (shiva.rudra.193.44)
अनिरुद्धं समाश्वास्य सहितं भार्यया पुनः । जग्राह रत्नसङ्घातं बाणदत्तमनेकशः
aniruddhaṁ samāśvāsya sahitaṁ bhāryayā punaḥ jagrāha ratnasaṅghātaṁ bāṇadattamanekaśaḥ
उन्होंने अपनी पत्नी सहित पुनर्मिलित अनिरुद्ध को सान्त्वना दी, और बाण द्वारा दिए गए अनेक रत्नसमूह को स्वीकार किया।
श्लोक 45 (shiva.rudra.193.45)
तत्सखीं चित्रलेखां च गृहीत्वा परयोगिनीम् । प्रसन्नोऽभूत्ततः कृष्णः कृतकार्यः शिवाज्ञया
tatsakhīṁ citralekhāṁ ca gṛhītvā parayoginīm prasanno'bhūttataḥ kṛṣṇaḥ kṛtakāryaḥ śivājñayā
उसकी सखी, परम योगिनी चित्रलेखा को भी साथ लेकर, शिव की आज्ञा से अपना कार्य पूर्ण करने पर कृष्ण प्रसन्न हो गए।
श्लोक 46 (shiva.rudra.193.46)
हृदा प्रणम्य गिरिशमामन्त्र्य च बलेः सुतम् । परिवारसमेतस्तु जगाम स्वपुरीं हरिः
hṛdā praṇamya giriśamāmantrya ca baleḥ sutam parivārasametastu jagāma svapurīṁ hariḥ
हृदय से गिरीश को प्रणाम करके तथा बलि-पुत्र से विदा लेकर, हरि अपने परिवार सहित अपनी नगरी की ओर चल पड़े।
श्लोक 47 (shiva.rudra.193.47)
पथि जित्वा च वरुणं विरुद्धं तमनेकधा । द्वारकां च पुरीं प्राप्तः समुत्सवसमन्वितः
pathi jitvā ca varuṇaṁ viruddhaṁ tamanekadhā dvārakāṁ ca purīṁ prāptaḥ samutsavasamanvitaḥ
मार्ग में बार-बार विरोध करने वाले वरुण को जीतकर वे उत्सवपूर्ण द्वारका नगरी पहुँचे।
श्लोक 48 (shiva.rudra.193.48)
विसर्जयित्वा गरुडं सखीन्वीक्ष्योपहस्य च । द्वारकायां ततो गत्वा कामचारी चचार ह
visarjayitvā garuḍaṁ sakhīnvīkṣyopahasya ca dvārakāyāṁ tato gatvā kāmacārī cacāra ha
गरुड़ को विदा करके, अपने सखाओं को देखकर मुस्कुराते हुए, वे तब द्वारका में यथेच्छ विचरण करने लगे।