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रुद्र संहिता · अध्याय 195

गजासुर-वध-वर्णन

अध्याय 194अध्याय-सूचीअध्याय 196

श्लोक 1 (shiva.rudra.195.1)

सनत्कुमार उवाच । शृणु व्यास महाप्रेम्णा चरितं शशिमौलिनः । यथाऽवधीत् त्रिशूलेन दानवेन्द्रं गजासुरम्

sanatkumāra uvāca śṛṇu vyāsa mahāpremṇā caritaṁ śaśimaulinaḥ yathā'vadhīt triśūlena dānavendraṁ gajāsuram

सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास! महाप्रेम से शशिमौलि (शिव) के उस चरित्र को सुनो, जिसमें उन्होंने त्रिशूल से दानवेन्द्र गजासुर का वध किया।

श्लोक 2 (shiva.rudra.195.2)

दानवे निहते देव्या समरे महिषासुरे । देवानां च हितार्थाय पुरा देवाः सुखं ययुः

dānave nihate devyā samare mahiṣāsure devānāṁ ca hitārthāya purā devāḥ sukhaṁ yayuḥ

जब पूर्वकाल में देवी द्वारा युद्ध में दानव महिषासुर देवताओं के हित के लिए मारा गया, तब देवता सुखी हो गए।

श्लोक 3 (shiva.rudra.195.3)

तस्य पुत्रो महावीरो मुनीश्वर गजासुरः । पितुर्वधं हि संस्मृत्य कृतं देव्या सुरार्थनात्

tasya putro mahāvīro munīśvara gajāsuraḥ piturvadhaṁ hi saṁsmṛtya kṛtaṁ devyā surārthanāt

हे मुनीश्वर! उसका पुत्र महावीर गजासुर, देवताओं की प्रार्थना पर देवी द्वारा किए गए अपने पिता के वध का स्मरण करके,

श्लोक 4 (shiva.rudra.195.4)

स तद्वैरमनुस्मृत्य तपोऽर्थं गतवान् वने । समुद्दिश्य विधिं प्रीत्या तताप परमं तपः

sa tadvairamanusmṛtya tapo'rthaṁ gatavān vane samuddiśya vidhiṁ prītyā tatāpa paramaṁ tapaḥ

उस वैर का स्मरण करते हुए वह तपस्या के लिए वन में गया, और ब्रह्मा को लक्ष्य कर प्रेमपूर्वक परम तप करने लगा।

श्लोक 5 (shiva.rudra.195.5)

अवध्योऽहं भविष्यामि स्त्रीपुंसैः कामनिर्जितैः । संविचार्येति मनसाऽभूत्तपोरतमानसः

avadhyo'haṁ bhaviṣyāmi strīpuṁsaiḥ kāmanirjitaiḥ saṁvicāryeti manasā'bhūttaporatamānasaḥ

"मैं काम-विजयी स्त्री-पुरुष दोनों के लिए भी अवध्य हो जाऊँ" — ऐसा मन में विचार करके वह तपस्या में तल्लीन हो गया।

श्लोक 6 (shiva.rudra.195.6)

स तेपे हिमवद् द्रोण्यां तपः परमदारुणम् । ऊर्ध्वबाहुर्नभोदृष्टिः पादाङ्गुष्ठाश्रितावनिः

sa tepe himavad droṇyāṁ tapaḥ paramadāruṇam ūrdhvabāhurnabhodṛṣṭiḥ pādāṅguṣṭhāśritāvaniḥ

उसने हिमालय की एक घाटी में परम भयंकर तपस्या की — ऊर्ध्व भुजाएँ, आकाश की ओर दृष्टि, केवल पैरों के अँगूठों से भूमि को छूते हुए।

श्लोक 7 (shiva.rudra.195.7)

जटाभारैः स वै रेजे प्रलयार्क इवांशुभिः । महिषासुरपुत्रोऽसौ गजासुर उदारधीः

jaṭābhāraiḥ sa vai reje pralayārka ivāṁśubhiḥ mahiṣāsuraputro'sau gajāsura udāradhīḥ

उदार बुद्धि वाला वह महिषासुर-पुत्र गजासुर अपनी जटाओं के भार से प्रलयकालीन सूर्य के समान अपनी किरणों से देदीप्यमान हो उठा।

श्लोक 8 (shiva.rudra.195.8)

तस्य मूर्ध्नः समुद्भूतः सधूमोऽग्निस्तपोमयः । तिर्यगूर्ध्वमधोलोकांस्तापयन्विष्वगीरितः

tasya mūrdhnaḥ samudbhūtaḥ sadhūmo'gnistapomayaḥ tiryagūrdhvamadholokāṁstāpayanviṣvagīritaḥ

उसके मस्तक से धूमयुक्त, तपोमय अग्नि उत्पन्न होकर तिरछी, ऊपर और नीचे की ओर फैलती हुई सभी लोकों को संतप्त करने लगी।

श्लोक 9 (shiva.rudra.195.9)

चुक्षुभुर्नद्युदन्वन्तश्चाग्नेर्मूर्द्धसमुद्भवात् । निपेतुः सग्रहास्तारा जज्ज्वलुश्च दिशो दश

cukṣubhurnadyudanvantaścāgnermūrddhasamudbhavāt nipetuḥ sagrahāstārā jajjvaluśca diśo daśa

उस मस्तक से उत्पन्न अग्नि से नदियाँ और समुद्र क्षुब्ध हो उठे; ग्रहों सहित तारे गिरने लगे और दसों दिशाएँ जल उठीं।

श्लोक 10 (shiva.rudra.195.10)

तेन तप्ताः सुराः सर्वे दिवं त्यक्त्वा सवासवाः । ब्रह्मलोकं ययुर्विज्ञापयामासुश्चचाल भूः

tena taptāḥ surāḥ sarve divaṁ tyaktvā savāsavāḥ brahmalokaṁ yayurvijñāpayāmāsuścacāla bhūḥ

उससे संतप्त होकर सभी देवता, इन्द्र सहित, स्वर्ग को त्यागकर ब्रह्मलोक गए और उन्होंने ब्रह्मा से निवेदन किया; पृथ्वी काँपने लगी।

श्लोक 11 (shiva.rudra.195.11)

देवा ऊचुः । विधे गजासुरतपस्तप्ता वयमथाकुलाः । न शक्नुमो दिवि स्थातुमतस्ते शरणं गताः

devā ūcuḥ vidhe gajāsuratapastaptā vayamathākulāḥ na śaknumo divi sthātumataste śaraṇaṁ gatāḥ

देवताओं ने कहा — हे विधे! गजासुर की तपस्या से हम अत्यन्त संतप्त और व्याकुल हैं; हम स्वर्ग में नहीं रह सकते, अतः हम आपकी शरण में आए हैं।

श्लोक 12 (shiva.rudra.195.12)

विधे ह्युपशमं तस्य चान्याञ्जीवयितुं कृथा । लोका नङ्क्ष्यत्यन्यथा हि सत्यं सत्यं ब्रुवामहे

vidhe hyupaśamaṁ tasya cānyāñjīvayituṁ kṛthā lokā naṅkṣyatyanyathā hi satyaṁ satyaṁ bruvāmahe

हे विधे! उसकी इस तपस्या को शान्त कीजिए और अन्य प्राणियों को जीवित रहने दीजिए; अन्यथा लोक नष्ट हो जाएँगे — यह हम सत्य-सत्य कह रहे हैं।

श्लोक 13 (shiva.rudra.195.13)

इति विज्ञापितो देवैर्वासवाद्यैः स आत्मभूः । भृगुदक्षादिभिर्ब्रह्मा ययौ दैत्यवराश्रमम्

iti vijñāpito devairvāsavādyaiḥ sa ātmabhūḥ bhṛgudakṣādibhirbrahmā yayau daityavarāśramam

इस प्रकार इन्द्र आदि देवताओं द्वारा तथा भृगु-दक्ष आदि द्वारा निवेदन किए जाने पर स्वयंभू ब्रह्मा उस श्रेष्ठ दैत्य के आश्रम में गए।

श्लोक 14 (shiva.rudra.195.14)

तपन्तं तपसा लोकान् यथाऽभ्रापिहितं दिवि । विलक्ष्य विस्मितः प्राह विहसन्सृष्टिकारकः

tapantaṁ tapasā lokān yathā'bhrāpihitaṁ divi vilakṣya vismitaḥ prāha vihasansṛṣṭikārakaḥ

आकाश में मानो बादलों से ढके सूर्य के समान अपनी तपस्या से लोकों को संतप्त करते हुए उसे देखकर, विस्मित सृष्टिकर्ता मुस्कुराते हुए बोले —

श्लोक 15 (shiva.rudra.195.15)

ब्रह्मोवाच । उत्तिष्ठोत्तिष्ठ दैत्येन्द्र तपः सिद्धोऽसि माहिषे । प्राप्तोऽहं वरदस्तात वरं वृणु यथेप्सितम्

brahmovāca uttiṣṭhottiṣṭha daityendra tapaḥ siddho'si māhiṣe prāpto'haṁ varadastāta varaṁ vṛṇu yathepsitam

ब्रह्मा ने कहा — हे दैत्येन्द्र! हे माहिषेय! उठो, उठो! तुम्हारी तपस्या सिद्ध हो गई है। हे तात! मैं वरदाता के रूप में आया हूँ; यथेच्छ वर माँगो।

श्लोक 16 (shiva.rudra.195.16)

सनत्कुमार उवाच । उत्थायोत्थाय दैत्येन्द्र ईक्षमाणो दृशा विभुम् । गिरा गद्गदया प्रीतोऽगृणाद्देवं स माहिषिः

sanatkumāra uvāca utthāyotthāya daityendra īkṣamāṇo dṛśā vibhum girā gadgadayā prīto'gṛṇāddevaṁ sa māhiṣiḥ

सनत्कुमार ने कहा — बार-बार उठते हुए वह दैत्येन्द्र माहिषेय, उस विभु को अपनी दृष्टि से निहारते हुए, प्रसन्नतापूर्वक गद्गद वाणी में देव को सम्बोधित करने लगा।

श्लोक 17 (shiva.rudra.195.17)

गजासुर उवाच । नमस्ते देवदेवेश यदि दास्यसि मे वरम् । अवध्योऽहं भवेयं वै स्त्रीपुंसैः कामनिर्जितैः

gajāsura uvāca namaste devadeveśa yadi dāsyasi me varam avadhyo'haṁ bhaveyaṁ vai strīpuṁsaiḥ kāmanirjitaiḥ

गजासुर ने कहा — हे देवदेवेश! आपको नमस्कार है; यदि आप मुझे वर देंगे, तो मैं काम-विजयी स्त्री-पुरुष दोनों के लिए भी अवध्य हो जाऊँ —

श्लोक 18 (shiva.rudra.195.18)

महाबलो महावीर्योऽजेयो देवादिभिः सदा । सर्वेषां लोकपालानां निखिलर्द्धिसुभुग्विभो

mahābalo mahāvīryo'jeyo devādibhiḥ sadā sarveṣāṁ lokapālānāṁ nikhilarddhisubhugvibho

महाबली, महावीर्यशाली, सदा देवताओं आदि द्वारा अजेय, तथा हे विभो! समस्त लोकपालों की सम्पूर्ण ऐश्वर्य-सम्पदा का भोक्ता बनूँ।

श्लोक 19 (shiva.rudra.195.19)

सनत्कुमार उवाच । एवं वृतः शतधृतिर्दानवेन स तेन वै । प्रादात्तत्तपसा प्रीतो वरं तस्य सुदुर्लभम्

sanatkumāra uvāca evaṁ vṛtaḥ śatadhṛtirdānavena sa tena vai prādāttattapasā prīto varaṁ tasya sudurlabham

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार उस दानव द्वारा प्रार्थित होने पर, उसकी तपस्या से प्रसन्न शतधृति (ब्रह्मा) ने उसे वह अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान किया।

श्लोक 20 (shiva.rudra.195.20)

एवं लब्धवरो दैत्यो माहिषिश्च गजासुरः । सुप्रसन्नमनाः सोऽथ स्वधाम प्रत्यपद्यत

evaṁ labdhavaro daityo māhiṣiśca gajāsuraḥ suprasannamanāḥ so'tha svadhāma pratyapadyata

इस प्रकार वर प्राप्त कर वह माहिषेय दैत्य गजासुर, अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर अपने धाम को लौट गया।

श्लोक 21 (shiva.rudra.195.21)

स विजित्य दिशः सर्वा लोकांश्च त्रीन्महासुरः । देवासुरमनुष्येन्द्रान् गन्धर्वगरुडोरगान्

sa vijitya diśaḥ sarvā lokāṁśca trīnmahāsuraḥ devāsuramanuṣyendrān gandharvagaruḍoragān

उस महासुर ने समस्त दिशाओं तथा तीनों लोकों — देव, असुर, मनुष्यों के अधिपतियों, गन्धर्वों, गरुड़ों और नागों —

श्लोक 22 (shiva.rudra.195.22)

इत्यादीन्निखिलाञ्जित्वा वशमानीय विश्वजित् । जहार लोकपालानां स्थानानि सह तेजसा

ityādīnnikhilāñjitvā vaśamānīya viśvajit jahāra lokapālānāṁ sthānāni saha tejasā

आदि सभी को जीतकर तथा अपने वश में लाकर, विश्वविजयी उसने लोकपालों के स्थानों को उनके तेज सहित छीन लिया।

श्लोक 23 (shiva.rudra.195.23)

देवोद्यानश्रियाजुष्टमध्यास्ते स्म त्रिविष्टपम् । महेन्द्रभवनं साक्षान्निर्मितं विश्वकर्मणा

devodyānaśriyājuṣṭamadhyāste sma triviṣṭapam mahendrabhavanaṁ sākṣānnirmitaṁ viśvakarmaṇā

वह देव-उद्यानों की शोभा से सुशोभित स्वर्ग में, विश्वकर्मा द्वारा निर्मित साक्षात् महेन्द्र के भवन में जा बसा।

श्लोक 24 (shiva.rudra.195.24)

तस्मिन्महेन्द्रस्य गृहे महाबलो महामना निर्जितलोक एकराट् । रेमेऽभिवन्द्याङ्घ्रियुगः सुरादिभिः प्रतापितैरूर्जितचण्डशासनः

tasminmahendrasya gṛhe mahābalo mahāmanā nirjitaloka ekarāṭ reme'bhivandyāṅghriyugaḥ surādibhiḥ pratāpitairūrjitacaṇḍaśāsanaḥ

महेन्द्र के उसी भवन में वह महाबली, महामना, विश्वविजयी एकराट्, प्रतापित देवताओं आदि द्वारा जिसके दोनों चरण वन्दित होते थे, प्रचण्ड और उग्र शासनकर्ता होकर विहार करने लगा।

श्लोक 25 (shiva.rudra.195.25)

स इत्थं निर्जितककुबेकराड् विषयान्प्रियान् । यथोपजोषं भुञ्जानो नातृप्यदजितेन्द्रियः

sa itthaṁ nirjitakakubekarāḍ viṣayānpriyān yathopajoṣaṁ bhuñjāno nātṛpyadajitendriyaḥ

इस प्रकार सम्पूर्ण दिशाओं का एकराट् बनकर वह प्रिय विषयों का यथेच्छ भोग करता रहा, फिर भी अजितेन्द्रिय होने के कारण तृप्त न हो सका।

श्लोक 26 (shiva.rudra.195.26)

एवमैश्वर्यमत्तस्य दृप्तस्योच्छास्त्रवर्तिनः । काले व्यतीते महति पापबुद्धिरभूत्ततः

evamaiśvaryamattasya dṛptasyocchāstravartinaḥ kāle vyatīte mahati pāpabuddhirabhūttataḥ

इस प्रकार ऐश्वर्य से उन्मत्त, गर्वित, शास्त्र-विरुद्ध आचरण करने वाले उसमें दीर्घकाल बीत जाने पर पापबुद्धि उत्पन्न हो गई।

श्लोक 27 (shiva.rudra.195.27)

महिषासुरपुत्रोऽसौ सञ्चिक्लेश द्विजान्वरान् । तापसान्नितरां पृथ्व्यां दानवः सुरमर्दनः

mahiṣāsuraputro'sau sañcikleśa dvijānvarān tāpasānnitarāṁ pṛthvyāṁ dānavaḥ suramardanaḥ

देवताओं का दमन करने वाला वह महिषासुर-पुत्र दानव पृथ्वी भर के श्रेष्ठ ब्राह्मणों और तपस्वियों को अत्यन्त क्लेश देने लगा।

श्लोक 28 (shiva.rudra.195.28)

सुरान्नरांश्च प्रमथान्सर्वाञ्चिक्लेशदुर्मतिः । धर्मान्वितान्विशेषेण पूर्ववैरमनुस्मरन्

surānnarāṁśca pramathānsarvāñcikleśadurmatiḥ dharmānvitānviśeṣeṇa pūrvavairamanusmaran

दुर्बुद्धि वह पूर्ववैर का स्मरण करते हुए विशेष रूप से धर्मपरायण देवताओं, मनुष्यों तथा समस्त प्रमथगणों को क्लेश पहुँचाने लगा।

श्लोक 29 (shiva.rudra.195.29)

एकस्मिन्समये तात दानवोऽसौ महाबलः । अगच्छद्राजधानीं व शङ्करस्य गजासुरः

ekasminsamaye tāta dānavo'sau mahābalaḥ agacchadrājadhānīṁ va śaṅkarasya gajāsuraḥ

हे तात! एक समय वह महाबली दानव गजासुर शंकर की राजधानी में जा पहुँचा।

श्लोक 30 (shiva.rudra.195.30)

समागतेऽसुरेन्द्रे हि महान्कलकलो मुने । त्रात त्रातेति तत्रासीदानन्दनवासिनाम्

samāgate'surendre hi mahānkalakalo mune trāta trāteti tatrāsīdānandanavāsinām

हे मुने! उस असुरेन्द्र के आने पर वहाँ के आनन्दनगर-निवासियों में "रक्षा करो, रक्षा करो" ऐसा महान कोलाहल मच गया।

श्लोक 31 (shiva.rudra.195.31)

महिषाऽसुरपुत्रोऽसौ यदा पुर्यां समागतः । प्रमथन्प्रमथान्सर्वान्निजवीर्यमदोद्धतः

mahiṣā'suraputro'sau yadā puryāṁ samāgataḥ pramathanpramathānsarvānnijavīryamadoddhataḥ

जब वह महिषासुर-पुत्र नगरी में आया, तब अपने पराक्रम के मद से उद्धत होकर उसने समस्त प्रमथगणों को कुचल डाला।

श्लोक 32 (shiva.rudra.195.32)

तस्मिन्नवसरे देवाः शक्राद्यास्तत्पराजिताः । शिवस्य शरणं जग्मुर्नत्वा तुष्टुवुरादरात्

tasminnavasare devāḥ śakrādyāstatparājitāḥ śivasya śaraṇaṁ jagmurnatvā tuṣṭuvurādarāt

उस अवसर पर उससे पराजित इन्द्र आदि देवता शिव की शरण में गए, प्रणाम करके आदरपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 33 (shiva.rudra.195.33)

न्यवेदयन्दानवस्य तस्य काश्यां समागमम् । क्लेशाधिक्यं तत्रत्यानां तन्नाथानां विशेषतः

nyavedayandānavasya tasya kāśyāṁ samāgamam kleśādhikyaṁ tatratyānāṁ tannāthānāṁ viśeṣataḥ

उन्होंने उस दानव के काशी में आगमन तथा वहाँ के निवासियों को, विशेषतः उनके स्वामी को, हो रहे अत्यधिक क्लेश का निवेदन किया।

श्लोक 34 (shiva.rudra.195.34)

देवा ऊचुः । देवदेव महादेव तव पुर्य्यां गतोऽसुरः । कष्टं दत्ते त्वज्जनानां तं जहि त्वं कृपानिधे

devā ūcuḥ devadeva mahādeva tava puryyāṁ gato'suraḥ kaṣṭaṁ datte tvajjanānāṁ taṁ jahi tvaṁ kṛpānidhe

देवताओं ने कहा — हे देवदेव! हे महादेव! एक असुर आपकी ही नगरी में आ पहुँचा है; वह आपके ही जनों को कष्ट दे रहा है; हे कृपानिधे! उसका वध कीजिए।

श्लोक 35 (shiva.rudra.195.35)

यत्र यत्र धरायां च चरणं प्रमिणोति हि । अचलां सचलां तत्र करोति निज भारतः

yatra yatra dharāyāṁ ca caraṇaṁ pramiṇoti hi acalāṁ sacalāṁ tatra karoti nija bhārataḥ

जहाँ-जहाँ वह पृथ्वी पर चरण रखता है, वहाँ-वहाँ वह अपने भार से स्थिर को भी चलायमान कर देता है।

श्लोक 36 (shiva.rudra.195.36)

ऊरुवेगेन तरवः पतन्ति शिखरैः सह । यस्य दोर्दण्डघातेन चूर्णाः स्युश्च शिलोच्चयाः

ūruvegena taravaḥ patanti śikharaiḥ saha yasya dordaṇḍaghātena cūrṇāḥ syuśca śiloccayāḥ

जिसकी जंघाओं के वेग से शिखरों सहित वृक्ष गिर पड़ते हैं, जिसकी भुजदण्ड की चोट से पर्वतों के ढेर चूर-चूर हो जाते हैं।

श्लोक 37 (shiva.rudra.195.37)

यस्य मौलिजसङ्घर्षाद् घना व्योम त्यजन्त्यपि । नीलिमानं न चाद्यापि जह्युस्तत्केशसङ्गजम्

yasya maulijasaṅgharṣād ghanā vyoma tyajantyapi nīlimānaṁ na cādyāpi jahyustatkeśasaṅgajam

जिसके मुकुट के घर्षण से घने बादल आकाश छोड़ने पर विवश हो जाते हैं, किन्तु आज तक उन्होंने उसके केशों के संसर्ग से प्राप्त नीलिमा को नहीं छोड़ा है।

श्लोक 38 (shiva.rudra.195.38)

यस्य निश्वाससम्भारैरुत्तरङ्गा महाब्धयः । नद्योऽप्यमन्दकल्लोला भवन्ति तिमिभिः सह

yasya niśvāsasambhārairuttaraṅgā mahābdhayaḥ nadyo'pyamandakallolā bhavanti timibhiḥ saha

जिसकी श्वास के भार से महासागर उत्ताल तरंगों वाले हो जाते हैं, और नदियाँ भी अपने महामत्स्यों सहित प्रबल कल्लोलों वाली हो जाती हैं।

श्लोक 39 (shiva.rudra.195.39)

योजनानां सहस्राणि नव यस्य समुच्छ्रयः । तावानेव हि विस्तारः तनोर्मायाविनोऽस्य हि

yojanānāṁ sahasrāṇi nava yasya samucchrayaḥ tāvāneva hi vistāraḥ tanormāyāvino'sya hi

जिसकी ऊँचाई नौ सहस्र योजन है, उस मायावी दानव के शरीर का विस्तार भी उतना ही है।

श्लोक 40 (shiva.rudra.195.40)

यन्नेत्रयोः पिङ्गलिमा तथा तरलिमा पुनः । विद्युताः नोह्यतेऽद्यापि सोऽयं स्माऽऽयाति सत्वरम्

yannetrayoḥ piṅgalimā tathā taralimā punaḥ vidyutāḥ nohyate'dyāpi so'yaṁ smā''yāti satvaram

जिसके नेत्रों की पीतवर्णता तथा चंचलता की बराबरी आज तक बिजली भी नहीं कर पाई — वही यह शीघ्रता से यहाँ आ रहा है।

श्लोक 41 (shiva.rudra.195.41)

यां यां दिशं समभ्येति सोऽयं दुःसह दानवः । अवध्योऽहं भवामीति स्त्रीपुंसैः कामनिर्जितैः

yāṁ yāṁ diśaṁ samabhyeti so'yaṁ duḥsaha dānavaḥ avadhyo'haṁ bhavāmīti strīpuṁsaiḥ kāmanirjitaiḥ

जिस-जिस दिशा में वह असह्य दानव जाता है, वहाँ-वहाँ वह "मैं काम-विजयी स्त्री-पुरुष के लिए भी अवध्य हूँ" ऐसा घोषित करता है।

श्लोक 42 (shiva.rudra.195.42)

इत्येवं चेष्टितं तस्य दानवस्य निवेदितम् । रक्षस्व भक्तान्देवेश काशीरक्षणतत्पर

ityevaṁ ceṣṭitaṁ tasya dānavasya niveditam rakṣasva bhaktāndeveśa kāśīrakṣaṇatatpara

इस प्रकार उस दानव के आचरण का हमने निवेदन किया; हे देवेश! हे काशी-रक्षण-तत्पर! अपने भक्तों की रक्षा कीजिए।

श्लोक 43 (shiva.rudra.195.43)

सनत्कुमार उवाच । इति सम्प्रार्थितो देवैर्भक्तरक्षणतत्परः । तत्राऽऽजगाम सोरं तद्वधकामनया हरः

sanatkumāra uvāca iti samprārthito devairbhaktarakṣaṇatatparaḥ tatrā''jagāma soraṁ tadvadhakāmanayā haraḥ

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार देवताओं द्वारा प्रार्थना किए जाने पर, भक्तों की रक्षा में तत्पर हर उसके वध की इच्छा से वहाँ पहुँचे।

श्लोक 44 (shiva.rudra.195.44)

आगतं तं समालोक्य शङ्करं भक्तवत्सलम् । त्रिशूलहस्तं गर्जन्तं जगर्ज स गजासुरः

āgataṁ taṁ samālokya śaṅkaraṁ bhaktavatsalam triśūlahastaṁ garjantaṁ jagarja sa gajāsuraḥ

भक्तवत्सल शंकर को त्रिशूल हाथ में लिए, गरजते हुए आया देखकर गजासुर भी गरज उठा।

श्लोक 45 (shiva.rudra.195.45)

ततस्तयोर्महानासीत्समरो दारुणोऽद्भुतः । नानास्त्रशस्त्रसम्पातैर्वीरारावं प्रकुर्वतोः

tatastayormahānāsītsamaro dāruṇo'dbhutaḥ nānāstraśastrasampātairvīrārāvaṁ prakurvatoḥ

तत्पश्चात् उन दोनों के बीच नाना अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा से वीर-गर्जना करते हुए एक महान्, भयंकर, अद्भुत युद्ध हुआ।

श्लोक 46 (shiva.rudra.195.46)

गजासुरोऽतितेजस्वी महाबलपराक्रमः । विव्याध गिरिशं बाणैस्तीक्ष्णैर्दानवघातिनम्

gajāsuro'titejasvī mahābalaparākramaḥ vivyādha giriśaṁ bāṇaistīkṣṇairdānavaghātinam

अत्यन्त तेजस्वी, महाबली और पराक्रमी गजासुर ने दानवों के संहारक गिरीश को तीक्ष्ण बाणों से बींध दिया।

श्लोक 47 (shiva.rudra.195.47)

अथ रुद्रो रौद्रतनुः स्वशरैरतिदारुणैः । तच्छरांश्चिच्छिदे तूर्णमप्राप्तांस्तिलशो मुने

atha rudro raudratanuḥ svaśarairatidāruṇaiḥ taccharāṁścicchide tūrṇamaprāptāṁstilaśo mune

हे मुने! तब रौद्र शरीर वाले रुद्र ने अपने अत्यन्त भयंकर बाणों से उन बाणों को पहुँचने से पहले ही तिल-तिल कर काट डाला।

श्लोक 48 (shiva.rudra.195.48)

ततो गजासुरः क्रुद्धोऽभ्यधावत्तं महेश्वरम् । खड्गहस्तः प्रगर्ज्योच्चैर्हतोऽसीत्यद्य वै मया

tato gajāsuraḥ kruddho'bhyadhāvattaṁ maheśvaram khaḍgahastaḥ pragarjyoccairhato'sītyadya vai mayā

तब गजासुर क्रुद्ध होकर खड्ग हाथ में लिए, उच्च स्वर से गरजते हुए महेश्वर की ओर दौड़ा — "आज मैं तुझे मार डालूँगा!"

श्लोक 49 (shiva.rudra.195.49)

ततस्त्रिशूलहेतिस्तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम् । विज्ञायावध्यमन्येन शूलेनाभिजघान तम्

tatastriśūlahetistamāyāntaṁ daityapuṅgavam vijñāyāvadhyamanyena śūlenābhijaghāna tam

तब त्रिशूलधारी शिव ने उस आते हुए दैत्यश्रेष्ठ को किसी अन्य के द्वारा अवध्य जानकर अपने ही त्रिशूल से उसे मार गिराया।

श्लोक 50 (shiva.rudra.195.50)

प्रोतस्तेन त्रिशूलेन स च दैत्यो गजासुरः । छत्रीकृतमिवात्मानं मन्यमानो जगौ हरम्

protastena triśūlena sa ca daityo gajāsuraḥ chatrīkṛtamivātmānaṁ manyamāno jagau haram

उस त्रिशूल से बिंधा हुआ वह दैत्य गजासुर, मानो स्वयं को छत्रयुक्त हुआ मानते हुए, हर की स्तुति करने लगा।

श्लोक 51 (shiva.rudra.195.51)

गजासुर उवाच । देवदेव महादेव तव भक्तोऽस्मि सर्वथा । जाने त्वां त्रिदिवेशानं त्रिशूलिन्स्मरहारिणम्

gajāsura uvāca devadeva mahādeva tava bhakto'smi sarvathā jāne tvāṁ tridiveśānaṁ triśūlinsmarahāriṇam

गजासुर ने कहा — हे देवदेव! हे महादेव! मैं सर्वथा आपका भक्त हूँ; हे त्रिशूलिन्! मैं आपको त्रिलोक के स्वामी, कामदेव के संहारक के रूप में जानता हूँ।

श्लोक 52 (shiva.rudra.195.52)

तव हस्ते मम वधो महाश्रेयस्करो मतः । अन्धकारे महेशान त्रिपुरान्तक सर्वग

tava haste mama vadho mahāśreyaskaro mataḥ andhakāre maheśāna tripurāntaka sarvaga

आपके हाथ से मेरा वध मुझे परम कल्याणकारी प्रतीत होता है, हे महेशान! हे अन्धकासुर-संहारक! हे त्रिपुरान्तक! हे सर्वव्यापी!

श्लोक 53 (shiva.rudra.195.53)

किञ्चिद्विज्ञप्तुमिच्छामि तच्छृणुष्व कृपाकर । सत्यं ब्रवीमि नासत्यं मृत्युञ्जय विचारय

kiñcidvijñaptumicchāmi tacchṛṇuṣva kṛpākara satyaṁ bravīmi nāsatyaṁ mṛtyuñjaya vicāraya

हे कृपाकर! मैं कुछ निवेदन करना चाहता हूँ, उसे सुनिए; मैं सत्य कह रहा हूँ, असत्य नहीं — हे मृत्युंजय! विचार कीजिए।

श्लोक 54 (shiva.rudra.195.54)

त्वमेको जगतां वन्द्यो विश्वस्योपरि संस्थितः । कालेन सर्वैर्मर्तव्यं श्रेयसे मृत्युरीदृशः

tvameko jagatāṁ vandyo viśvasyopari saṁsthitaḥ kālena sarvairmartavyaṁ śreyase mṛtyurīdṛśaḥ

आप ही अकेले संसार के वन्दनीय हैं, समस्त विश्व के ऊपर स्थित हैं; काल के अनुसार सबको मरना ही है — ऐसी मृत्यु ही कल्याणकारी है।

श्लोक 55 (shiva.rudra.195.55)

सनत्कुमार उवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य शङ्करः करुणानिधिः । प्रहस्य प्रत्युवाचेशो माहिषेयं गजासुरम्

sanatkumāra uvāca ityākarṇya vacastasya śaṅkaraḥ karuṇānidhiḥ prahasya pratyuvāceśo māhiṣeyaṁ gajāsuram

सनत्कुमार ने कहा — उसका यह वचन सुनकर करुणानिधि शंकर ईश्वर ने मुस्कुराते हुए उस माहिषेय गजासुर को उत्तर दिया —

श्लोक 56 (shiva.rudra.195.56)

ईश्वर उवाच । महापराक्रमनिधे दानवोत्तम सन्मते । गजासुर प्रसन्नोऽस्मि स्वानुकूलं वरं वृणु

īśvara uvāca mahāparākramanidhe dānavottama sanmate gajāsura prasanno'smi svānukūlaṁ varaṁ vṛṇu

ईश्वर ने कहा — हे महापराक्रमनिधे! हे दानवोत्तम! हे सन्मते! हे गजासुर! मैं प्रसन्न हूँ; अपने लिए अनुकूल वर माँगो।

श्लोक 57 (shiva.rudra.195.57)

सनत्कुमार उवाच । इत्याकर्ण्य महेशस्य वचनं वरदस्य हि । प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा दानवेन्द्रो गजासुरः

sanatkumāra uvāca ityākarṇya maheśasya vacanaṁ varadasya hi pratyuvāca prasannātmā dānavendro gajāsuraḥ

सनत्कुमार ने कहा — वरदाता महेश का यह वचन सुनकर प्रसन्नचित्त दानवेन्द्र गजासुर ने उत्तर दिया —

श्लोक 58 (shiva.rudra.195.58)

गजासुर उवाच । यदि प्रसन्नो दिग्वासस्तदा नित्यं वसान मे । इमां कृत्तिं महेशान त्वत्त्रिशूलाग्निपाविताम्

gajāsura uvāca yadi prasanno digvāsastadā nityaṁ vasāna me imāṁ kṛttiṁ maheśāna tvattriśūlāgnipāvitām

गजासुर ने कहा — यदि आप प्रसन्न हैं, हे दिगम्बर, तो आपके ही त्रिशूल की अग्नि से पवित्र हुई मेरी इस चर्म-कृत्ति को सदा धारण कीजिए,

श्लोक 59 (shiva.rudra.195.59)

स्वप्रमाणां सुखस्पर्शां रणाङ्गणपणीकृताम् । दर्शनीयां महादिव्यां सर्वदैव सुखावहाम्

svapramāṇāṁ sukhasparśāṁ raṇāṅgaṇapaṇīkṛtām darśanīyāṁ mahādivyāṁ sarvadaiva sukhāvahām

जो अपने ही प्रमाण की, सुखस्पर्श वाली, इस रणभूमि में अर्जित, दर्शनीय, महादिव्य तथा सदैव सुखदायी है।

श्लोक 60 (shiva.rudra.195.60)

इष्टगन्धिः सदैवास्तु सदैवास्त्वतिकोमला । सदैव निर्मला चास्तु सदैवास्त्वतिमण्डना

iṣṭagandhiḥ sadaivāstu sadaivāstvatikomalā sadaiva nirmalā cāstu sadaivāstvatimaṇḍanā

यह सदा इष्ट-गन्ध वाली रहे, सदा अत्यन्त कोमल रहे, सदा निर्मल रहे, तथा सदा अत्यन्त सुशोभित रहे।

श्लोक 61 (shiva.rudra.195.61)

महातपोनलज्वालां प्राप्यापि सुचिरं विभो । न दग्धा कृत्तिरेषा मे पुण्यगन्धनिधेस्ततः

mahātaponalajvālāṁ prāpyāpi suciraṁ vibho na dagdhā kṛttireṣā me puṇyagandhanidhestataḥ

हे विभो! महातपस्या की अग्नि-ज्वाला को दीर्घकाल तक सहन करने पर भी मेरी यह कृत्ति नहीं जली — क्योंकि यह पुण्य-गन्ध की निधि है।

श्लोक 62 (shiva.rudra.195.62)

यदि पुण्यवती नैषा मम कृत्तिर्दिगम्बर । तदा त्वदङ्गसङ्गोस्याः कथं जातो रणाङ्गणे

yadi puṇyavatī naiṣā mama kṛttirdigambara tadā tvadaṅgasaṅgosyāḥ kathaṁ jāto raṇāṅgaṇe

हे दिगम्बर! यदि मेरी यह कृत्ति पुण्यवती न होती, तो यह आपके अंग का संसर्ग रणभूमि में कैसे प्राप्त कर पाती?

श्लोक 63 (shiva.rudra.195.63)

अन्यं च मे वरं देहि यदि तुष्टोऽसि शङ्कर । नामास्तु कृत्तिवासास्ते प्रारभ्याद्यतनं दिनम्

anyaṁ ca me varaṁ dehi yadi tuṣṭo'si śaṅkara nāmāstu kṛttivāsāste prārabhyādyatanaṁ dinam

हे शंकर! यदि आप सन्तुष्ट हैं तो मुझे एक अन्य वर भी दीजिए — आज के दिन से आपका नाम "कृत्तिवासा" (चर्म धारण करने वाला) हो।

श्लोक 64 (shiva.rudra.195.64)

सनत्कुमार उवाच । श्रुत्वेति स वचस्तस्य शङ्करो भक्तवत्सलः । तथेत्युवाच सुप्रीतो महिषासुरजं च तम्

sanatkumāra uvāca śrutveti sa vacastasya śaṅkaro bhaktavatsalaḥ tathetyuvāca suprīto mahiṣāsurajaṁ ca tam

सनत्कुमार ने कहा — उसका यह वचन सुनकर भक्तवत्सल शंकर ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उस महिषासुर-पुत्र से "तथास्तु" कहा।

श्लोक 65 (shiva.rudra.195.65)

पुनः प्रोवाच प्रीतात्मा दानवं तं गजासुरम् । भक्तप्रियो महेशानो भक्तिनिर्मलमानसम्

punaḥ provāca prītātmā dānavaṁ taṁ gajāsuram bhaktapriyo maheśāno bhaktinirmalamānasam

भक्तप्रिय महेशान ने प्रसन्नचित्त होकर उस भक्ति से निर्मल-मन वाले दानव गजासुर से पुनः कहा —

श्लोक 66 (shiva.rudra.195.66)

ईश्वर उवाच । इदं पुण्यं शरीरं ते क्षेत्रेऽस्मिन्मुक्तिसाधने । मम लिङ्गं भवत्वत्र सर्वेषां मुक्तिदायकम्

īśvara uvāca idaṁ puṇyaṁ śarīraṁ te kṣetre'sminmuktisādhane mama liṅgaṁ bhavatvatra sarveṣāṁ muktidāyakam

ईश्वर ने कहा — यह तुम्हारा पवित्र शरीर, मुक्ति-साधक इस क्षेत्र में, यहाँ मेरा लिंग बने, जो सबको मुक्ति देने वाला हो।

श्लोक 67 (shiva.rudra.195.67)

कृत्तिवासेश्वरं नाम महापातकनाशनम् । सर्वेषामेव लिङ्गानां शिरोभूतं विमुक्तिदम्

kṛttivāseśvaraṁ nāma mahāpātakanāśanam sarveṣāmeva liṅgānāṁ śirobhūtaṁ vimuktidam

यह "कृत्तिवासेश्वर" नाम से प्रसिद्ध हो, महापातकों का नाशक हो, तथा समस्त लिंगों में शिरोमणि, मुक्तिदायक हो।

श्लोक 68 (shiva.rudra.195.68)

कथयित्वेति देवेशस्तत्कृतिं परिगृह्य च । गजासुरस्य महतीं प्रावृणोद्धि दिगम्बरः

kathayitveti deveśastatkṛtiṁ parigṛhya ca gajāsurasya mahatīṁ prāvṛṇoddhi digambaraḥ

सनत्कुमार ने कहा — ऐसा कहकर देवेश दिगम्बर ने उस गजासुर के महान् चर्म को ग्रहण कर उसे धारण कर लिया।

श्लोक 69 (shiva.rudra.195.69)

महामहोत्सवो जातस्तस्मिन्नह्नि मुनीश्वर । हर्षमापुर्जनाः सर्वे काशीस्थाः प्रमथास्तथा

mahāmahotsavo jātastasminnahni munīśvara harṣamāpurjanāḥ sarve kāśīsthāḥ pramathāstathā

हे मुनीश्वर! उस दिन काशी में महान् महोत्सव हुआ; काशीवासी सभी जन तथा प्रमथगण हर्षित हो उठे।

श्लोक 70 (shiva.rudra.195.70)

हरिब्रह्मादयो देवा हर्षनिर्भरमानसाः । तुष्टुवुस्तं महेशानं नत्वा साञ्जलयस्ततः

haribrahmādayo devā harṣanirbharamānasāḥ tuṣṭuvustaṁ maheśānaṁ natvā sāñjalayastataḥ

हरि, ब्रह्मा आदि देवता, हर्ष से भरे हृदय से, हाथ जोड़कर प्रणाम करके उस महेशान की स्तुति करने लगे।

श्लोक 71 (shiva.rudra.195.71)

हते तस्मिन्दानवेशे माहिषे हि गजासुरे । स्वस्थानं भेजिरे देवा जगत्स्वास्थ्यमवाप च

hate tasmindānaveśe māhiṣe hi gajāsure svasthānaṁ bhejire devā jagatsvāsthyamavāpa ca

उस दानवेश माहिषेय गजासुर के वध होने पर देवता अपने-अपने स्थान को लौट गए, और जगत् ने स्वास्थ्य प्राप्त किया।

श्लोक 72 (shiva.rudra.195.72)

इत्युक्तं चरितं शम्भोर्भक्तवात्सल्यसूचकम् । स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं धनधान्यप्रवर्द्धनम्

ityuktaṁ caritaṁ śambhorbhaktavātsalyasūcakam svargyaṁ yaśasyamāyuṣyaṁ dhanadhānyapravarddhanam

इस प्रकार शम्भु का यह भक्तवात्सल्य-सूचक चरित्र कहा गया, जो स्वर्ग, यश, आयु तथा धन-धान्य की वृद्धि करने वाला है।

श्लोक 73 (shiva.rudra.195.73)

य इदं शृणुयात्प्रीत्या श्रावयेद्वा शुचिव्रतः । स भुक्त्वा च महासौख्यं लभेतान्ते परं सुखम्

ya idaṁ śṛṇuyātprītyā śrāvayedvā śucivrataḥ sa bhuktvā ca mahāsaukhyaṁ labhetānte paraṁ sukham

जो कोई शुचिव्रत होकर इसे प्रेमपूर्वक सुनता है या दूसरों को सुनाता है, वह महासुख भोगकर अन्त में परम सुख प्राप्त करता है।

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