रुद्र संहिता · अध्याय 26
सन्ध्या-चरित्र (शेष)
श्लोक 1 (shiva.rudra.26.1)
ब्रह्मोवाच । सुतवर्य महाप्राज्ञ शृणु सन्ध्यातपो महत् । यच्छ्रुत्वा नश्यते पापसमूहस्तत्क्षणाद् ध्रुवम्
brahmovāca | sutavarya mahāprājña śṛṇu sandhyātapo mahat | yacchrutvā naśyate pāpasamūhastatkṣaṇād dhruvam
ब्रह्मा ने कहा - हे सूतवर्य! हे महाप्राज्ञ! सन्ध्या के महान तप को सुनो, जिसे सुनकर पापों का समूह उसी क्षण निश्चय ही नष्ट हो जाता है।
श्लोक 2 (shiva.rudra.26.2)
उपदिश्य तपोभावं वसिष्ठे स्वगृहं गते । सन्ध्यापि तपसो भावं ज्ञात्वा मोदमवाप ह
upadiśya tapobhāvaṁ vasiṣṭhe svagṛhaṁ gate | sandhyāpi tapaso bhāvaṁ jñātvā modamavāpa ha
तप की विधि बताकर वसिष्ठ के अपने घर चले जाने पर, सन्ध्या भी तप की विधि जानकर आनन्दित हुई।
श्लोक 3 (shiva.rudra.26.3)
ततः सानन्दमनसो वेषं कृत्वा तु यादृशम् । तपश्चर्तुं समारेभे बृहल्लोहिततीरगा
tataḥ sānandamanaso veṣaṁ kṛtvā tu yādṛśam | tapaścartuṁ samārebhe bṛhallohitatīragā
तब प्रसन्नचित्त होकर उपयुक्त वेष धारण करके, बृहल्लोहित सरोवर के तट पर रहने वाली सन्ध्या ने तप करना आरम्भ किया।
श्लोक 4 (shiva.rudra.26.4)
यथोक्तं तु वसिष्ठेन मन्त्रं तपसि साधनम् । मन्त्रेण तेन सद्भक्त्या पूजयामास शङ्करम्
yathoktaṁ tu vasiṣṭhena mantraṁ tapasi sādhanam | mantreṇa tena sadbhaktyā pūjayāmāsa śaṅkaram
वसिष्ठ द्वारा बताये गये तप-साधन मन्त्र से, उसी मन्त्र द्वारा सच्ची भक्ति से उसने शंकर की पूजा की।
श्लोक 5 (shiva.rudra.26.5)
एकान्तमनसस्तस्याः कुर्वन्त्याः सुमहत्तपः । शम्भौ विन्यस्तचित्ताया गतमेकं चतुर्युगम्
ekāntamanasastasyāḥ kurvantyāḥ sumahattapaḥ | śambhau vinyastacittāyā gatamekaṁ caturyugam
एकाग्रचित्त होकर महान तप करने वाली और शम्भु में मन लगाये उस सन्ध्या का एक पूरा चतुर्युग (चार युगों का चक्र) बीत गया।
श्लोक 6 (shiva.rudra.26.6)
प्रसन्नोऽभूत्तदा शम्भुस्तपसा तेन तोषितः । अन्तर्बहिस्तथाकाशे दर्शयित्वा निजं वपुः
prasanno'bhūttadā śambhustapasā tena toṣitaḥ | antarbahistathākāśe darśayitvā nijaṁ vapuḥ
तब उस तप से सन्तुष्ट होकर शम्भु प्रसन्न हुए; अपने स्वरूप को भीतर, बाहर और आकाश में दिखाते हुए,
श्लोक 7 (shiva.rudra.26.7)
यद्रूपं चिन्तयन्ती सा तेन प्रत्यक्षतां गतः
yadrūpaṁ cintayantī sā tena pratyakṣatāṁ gataḥ
जिस रूप का वह ध्यान कर रही थी, वही रूप उसके समक्ष प्रत्यक्ष हो गया।
श्लोक 8 (shiva.rudra.26.8)
अथ सा पुरतो दृष्ट्वा मनसा चिन्तितं प्रभुम् । प्रसन्नवदनं शान्तं मुमोदातीव शङ्करम्
atha sā purato dṛṣṭvā manasā cintitaṁ prabhum | prasannavadanaṁ śāntaṁ mumodātīva śaṅkaram
तब अपने सामने मन से ध्यान किये हुए, प्रसन्नमुख, शान्त प्रभु शंकर को देखकर वह अत्यन्त आनन्दित हुई।
श्लोक 9 (shiva.rudra.26.9)
ससाध्वसमहं वक्ष्ये किं कथं स्तौमि वा हरम् । इति चिन्तापरा भूत्वा न्यमीलयत चक्षुषी
sasādhvasamahaṁ vakṣye kiṁ kathaṁ staumi vā haram | iti cintāparā bhūtvā nyamīlayata cakṣuṣī
'मैं भयमिश्रित होकर क्या कहूँ, हर की स्तुति कैसे करूँ?' - ऐसा चिन्तित होकर उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं।
श्लोक 10 (shiva.rudra.26.10)
निमीलिताक्ष्यास्तस्यास्तु प्रविश्य हृदयं हरः । दिव्यं ज्ञानं ददौ तस्यै वाचं दिव्ये च चक्षुषी
nimīlitākṣyāstasyāstu praviśya hṛdayaṁ haraḥ | divyaṁ jñānaṁ dadau tasyai vācaṁ divye ca cakṣuṣī
आँखें बन्द किये हुए उसके हृदय में प्रवेश करके हर ने उसे दिव्य ज्ञान, दिव्य वाणी और दिव्य नेत्र प्रदान किये।
श्लोक 11 (shiva.rudra.26.11)
दिव्यज्ञानं दिव्यचक्षुर्दिव्यां वाचमवाप सा । प्रत्यक्षं वीक्ष्य दुर्गेशं तुष्टाव जगतां पतिम्
divyajñānaṁ divyacakṣurdivyāṁ vācamavāpa sā | pratyakṣaṁ vīkṣya durgeśaṁ tuṣṭāva jagatāṁ patim
दिव्य ज्ञान, दिव्य नेत्र और दिव्य वाणी प्राप्त करके, दुर्गेश को प्रत्यक्ष देखकर उसने जगत्पति की स्तुति की।
श्लोक 12 (shiva.rudra.26.12)
सन्ध्योवाच । निराकारं ज्ञानगम्यं परं य- न्नैव स्थूलं नापि सूक्ष्मं न चोच्चम् । अन्तश्चिन्त्यं योगिभिस्तस्य रूपं तस्मै तुभ्यं लोककर्त्रे नमोऽस्तु
sandhyovāca | nirākāraṁ jñānagamyaṁ paraṁ ya- nnaiva sthūlaṁ nāpi sūkṣmaṁ na coccam | antaścintyaṁ yogibhistasya rūpaṁ tasmai tubhyaṁ lokakartre namo'stu
सन्ध्या ने कहा - जो निराकार है, केवल ज्ञान से जाना जाता है, जो न स्थूल है, न सूक्ष्म है, न ऊँचा है, जिसका रूप योगीजन अन्तः हृदय में ध्यान करते हैं - हे लोक के रचयिता! आपको नमस्कार है।
श्लोक 13 (shiva.rudra.26.13)
सर्वं शान्तं निर्मलं निर्विकारं ज्ञानागम्यं स्वप्रकाशेऽविकारम् । खाध्वप्रख्यं ध्वान्तमार्गात्परस्ताद्- रूपं यस्य त्वां नमामि प्रसन्नम्
sarvaṁ śāntaṁ nirmalaṁ nirvikāraṁ jñānāgamyaṁ svaprakāśe'vikāram | khādhvaprakhyaṁ dhvāntamārgātparastād- rūpaṁ yasya tvāṁ namāmi prasannam
जो सर्वथा शान्त, निर्मल, निर्विकार, ज्ञान से गम्य, स्वयंप्रकाश में अविकारी है, आकाश-मार्ग के समान, अन्धकार के मार्ग से परे है - ऐसे आपके रूप को, हे प्रसन्न प्रभो! मैं नमन करती हूँ।
श्लोक 14 (shiva.rudra.26.14)
एकं शुद्धं दीप्यमानं विनाजां चिदानन्दं सहजं चाविकारि । नित्यानन्दं सत्यभूतिप्रसन्नं यस्य श्रीदं रूपमस्मै नमस्ते
ekaṁ śuddhaṁ dīpyamānaṁ vinājāṁ cidānandaṁ sahajaṁ cāvikāri | nityānandaṁ satyabhūtiprasannaṁ yasya śrīdaṁ rūpamasmai namaste
जो एक, शुद्ध, देदीप्यमान, अजन्मा, चिदानन्दस्वरूप, सहज और निर्विकार, नित्यानन्द तथा सत्य-विभूति से प्रसन्न है - हे श्रीदायक रूप वाले! आपको नमस्कार है।
श्लोक 15 (shiva.rudra.26.15)
विद्याकारोद्भावनीयं प्रभिन्नं सत्त्वच्छन्दं ध्येयमात्मस्वरूपम् । सारं पारं पावनानां पवित्रं तस्मै रूपं यस्य चैवं नमस्ते
vidyākārodbhāvanīyaṁ prabhinnaṁ sattvacchandaṁ dhyeyamātmasvarūpam | sāraṁ pāraṁ pāvanānāṁ pavitraṁ tasmai rūpaṁ yasya caivaṁ namaste
जो विद्या के आकार से प्रकट होने योग्य, पृथक्, सत्त्वमय, ध्येय और आत्मस्वरूप है, जो पवित्र करने वालों में भी सार और परम पावन है - ऐसे आपके रूप को नमस्कार है।
श्लोक 16 (shiva.rudra.26.16)
यत्त्वाकारं शुद्धरूपं मनोज्ञं रत्नाकल्पं स्वच्छकर्पूरगौरम् । इष्टाभीती शूलमुण्डं दधानं हस्तैर्नमो योगयुक्ताय तुभ्यम्
yattvākāraṁ śuddharūpaṁ manojñaṁ ratnākalpaṁ svacchakarpūragauram | iṣṭābhītī śūlamuṇḍaṁ dadhānaṁ hastairnamo yogayuktāya tubhyam
जो आपका शुद्ध, मनोहर रूप है, मानो रत्नों से अलंकृत, स्वच्छ कर्पूर के समान गौरवर्ण, जो हाथों में वरद-अभय मुद्रा, त्रिशूल और कपाल धारण करते हैं - हे योगयुक्त! आपको नमस्कार है।
श्लोक 17 (shiva.rudra.26.17)
गगनं भूर्दिशश्चैव सलिलं ज्योतिरेव च । पुनः कालश्च रूपाणि यस्य तुभ्यं नमोऽस्तु ते
gaganaṁ bhūrdiśaścaiva salilaṁ jyotireva ca | punaḥ kālaśca rūpāṇi yasya tubhyaṁ namo'stu te
आकाश, पृथ्वी, दिशाएँ, जल, तेज और काल भी - ये सब आपके ही रूप हैं; आपको नमस्कार हो।
श्लोक 18 (shiva.rudra.26.18)
प्रधानपुरुषौ यस्य कायत्वेन विनिर्गतौ । तस्मादव्यक्तरूपाय शङ्कराय नमो नमः
pradhānapuruṣau yasya kāyatvena vinirgatau | tasmādavyaktarūpāya śaṅkarāya namo namaḥ
जिनके शरीर से प्रधान (प्रकृति) और पुरुष दोनों प्रकट हुए, उन अव्यक्त-स्वरूप शंकर को बार-बार नमस्कार है।
श्लोक 19 (shiva.rudra.26.19)
यो ब्रह्मा कुरुते सृष्टिं यो विष्णुः कुरुते स्थितिम् । संहरिष्यति यो रुद्रस्तस्मै तुभ्यं नमो नमः
yo brahmā kurute sṛṣṭiṁ yo viṣṇuḥ kurute sthitim | saṁhariṣyati yo rudrastasmai tubhyaṁ namo namaḥ
जो ब्रह्मा के रूप में सृष्टि करते हैं, जो विष्णु के रूप में स्थिति करते हैं, जो रुद्र के रूप में संहार करेंगे - उन आपको बार-बार नमस्कार है।
श्लोक 20 (shiva.rudra.26.20)
नमो नमः कारणकारणाय दिव्यामृतज्ञानविभूतिदाय । समस्तलोकान्तरभूतिदाय प्रकाशरूपाय परात्पराय
namo namaḥ kāraṇakāraṇāya divyāmṛtajñānavibhūtidāya | samastalokāntarabhūtidāya prakāśarūpāya parātparāya
कारणों के भी कारण, दिव्य अमृत ज्ञान की विभूति देने वाले, समस्त लोकों में ऐश्वर्य प्रदान करने वाले, प्रकाशस्वरूप, परात्पर आपको बार-बार नमस्कार है।
श्लोक 21 (shiva.rudra.26.21)
यस्यापरं नो जगदुच्यते पदात् क्षितिर्दिशः सूर्य इन्दुर्मनोजः । बहिर्मुखा नाभितश्चान्तरिक्षं तस्मै तुभ्यं शम्भवे मे नमोऽस्तु
yasyāparaṁ no jagaducyate padāt kṣitirdiśaḥ sūrya indurmanojaḥ | bahirmukhā nābhitaścāntarikṣaṁ tasmai tubhyaṁ śambhave me namo'stu
जिनके चरण से यह सम्पूर्ण जगत् - पृथ्वी, दिशाएँ, सूर्य, मन से उत्पन्न चन्द्रमा - कहा जाता है, तथा जिनकी नाभि से अन्तरिक्ष प्रकट हुआ, हे शम्भो! उन आपको मेरा नमस्कार हो।
श्लोक 22 (shiva.rudra.26.22)
त्वं परः परमात्मा च त्वं विद्या विविधा हरः । सद्ब्रह्म च परं ब्रह्म विचारणपरायणः
tvaṁ paraḥ paramātmā ca tvaṁ vidyā vividhā haraḥ | sadbrahma ca paraṁ brahma vicāraṇaparāyaṇaḥ
आप ही परम परमात्मा हैं, आप ही हर विविध विद्या हैं, आप ही सद्ब्रह्म और परब्रह्म हैं, विचार-परायण हैं।
श्लोक 23 (shiva.rudra.26.23)
यस्य नादिर्न मध्यं च नान्तमस्ति जगद्यतः । कथं स्तोष्यामि तं देवं वाङ्मनोऽगोचरं हरम्
yasya nādirna madhyaṁ ca nāntamasti jagadyataḥ | kathaṁ stoṣyāmi taṁ devaṁ vāṅmano'gocaraṁ haram
जिनका न आदि है, न मध्य है, न अन्त है, जिनसे यह जगत् उत्पन्न होता है, उन वाणी और मन से अगोचर हर देव की मैं कैसे स्तुति करूँ?
श्लोक 24 (shiva.rudra.26.24)
यस्य ब्रह्मादयो देव मुनयश्च तपोधनाः । न विवृण्वन्ति रूपाणि वर्णनीयः कथं स मे
yasya brahmādayo deva munayaśca tapodhanāḥ | na vivṛṇvanti rūpāṇi varṇanīyaḥ kathaṁ sa me
जिनके रूपों का वर्णन ब्रह्मा आदि देवता और तपोधन मुनि भी नहीं कर सकते, उनका वर्णन मुझसे कैसे हो सकता है?
श्लोक 25 (shiva.rudra.26.25)
स्त्रिया मया ते किं ज्ञेया निर्गुणस्य गुणाः प्रभो । नैव जानन्ति यद्रूपं सेन्द्रा अपि सुरासुराः
striyā mayā te kiṁ jñeyā nirguṇasya guṇāḥ prabho | naiva jānanti yadrūpaṁ sendrā api surāsurāḥ
हे प्रभो! मुझ स्त्री द्वारा निर्गुण आपके गुण कैसे जाने जा सकते हैं? इन्द्र सहित देवता और असुर भी जिनके रूप को नहीं जानते।
श्लोक 26 (shiva.rudra.26.26)
नमस्तुभ्यं महेशान नमस्तुभ्यं तपोमय । प्रसीद शम्भो देवेश भूयो भूयो नमोऽस्तु ते
namastubhyaṁ maheśāna namastubhyaṁ tapomaya | prasīda śambho deveśa bhūyo bhūyo namo'stu te
हे महेश्वर! आपको नमस्कार है, हे तपोमय! आपको नमस्कार है। हे शम्भो! हे देवेश! प्रसन्न होइये; आपको बार-बार नमस्कार है।
श्लोक 27 (shiva.rudra.26.27)
ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः संस्तुतः परमेश्वरः । सुप्रसन्नतरश्चाभूच्छङ्करो भक्तवत्सलः
brahmovāca | ityākarṇya vacastasyāḥ saṁstutaḥ parameśvaraḥ | suprasannataraścābhūcchaṅkaro bhaktavatsalaḥ
ब्रह्मा ने कहा - उसके इन वचनों को सुनकर, इस प्रकार स्तुति किये गये परमेश्वर भक्तवत्सल शंकर अत्यन्त प्रसन्न हो गये।
श्लोक 28 (shiva.rudra.26.28)
अथ तस्याः शरीरं तु वल्कलाजिनसंयुतम् । परिच्छन्नं जटाव्रातैः पवित्रे मूर्ध्नि राजितैः
atha tasyāḥ śarīraṁ tu valkalājinasaṁyutam | paricchannaṁ jaṭāvrātaiḥ pavitre mūrdhni rājitaiḥ
तब उसके शरीर को वल्कल और मृगचर्म से युक्त, तथा पवित्र मस्तक पर सुशोभित जटाओं के समूह से आच्छादित देखकर,
श्लोक 29 (shiva.rudra.26.29)
हिमानीतर्जिताम्भोजसदृशं वदनं तदा । निरीक्ष्य कृपयाविष्टो हरः प्रोवाच तामिदम्
himānītarjitāmbhojasadṛśaṁ vadanaṁ tadā | nirīkṣya kṛpayāviṣṭo haraḥ provāca tāmidam
और उसके मुख को उस समय पाले से मुरझाये कमल के समान देखकर, करुणा से भरकर हर ने उससे यह कहा।
श्लोक 30 (shiva.rudra.26.30)
महेश्वर उवाच । प्रीतोऽस्मि तपसा भद्रे भवत्याः परमेण वै । स्तवेन च शुभप्राज्ञे वरं वरय साम्प्रतम्
maheśvara uvāca | prīto'smi tapasā bhadre bhavatyāḥ parameṇa vai | stavena ca śubhaprājñe varaṁ varaya sāmpratam
महेश्वर ने कहा - हे भद्रे! मैं तुम्हारे परम तप से तथा हे शुभप्राज्ञे! तुम्हारे स्तवन से प्रसन्न हूँ; अब वर माँगो।
श्लोक 31 (shiva.rudra.26.31)
येन ते विद्यते कार्यं वरेणास्मिन्मनोगतम् । तत्करिष्ये च भद्रं ते प्रसन्नोऽहं तव व्रतैः
yena te vidyate kāryaṁ vareṇāsminmanogatam | tatkariṣye ca bhadraṁ te prasanno'haṁ tava vrataiḥ
जो प्रयोजन तुम्हारे मन में इस वर के द्वारा सिद्ध होना है, मैं वही करूँगा; तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हारे व्रतों से प्रसन्न हूँ।
श्लोक 32 (shiva.rudra.26.32)
ब्रह्मोवाच । इति श्रुत्वा महेशस्य प्रसन्नमनसस्तदा । सन्ध्योवाच सुप्रसन्ना प्रणम्य च मुहुर्मुहुः
brahmovāca | iti śrutvā maheśasya prasannamanasastadā | sandhyovāca suprasannā praṇamya ca muhurmuhuḥ
ब्रह्मा ने कहा - महेश्वर के इन प्रसन्न वचनों को सुनकर, सन्ध्या ने बार-बार प्रणाम करके अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा।
श्लोक 33 (shiva.rudra.26.33)
सन्ध्योवाच । यदि देयो वरः प्रीत्या वरयोग्यास्म्यहं यदि । यदि शुद्धास्म्यहं जाता तस्मात्पापान्महेश्वर
sandhyovāca | yadi deyo varaḥ prītyā varayogyāsmyahaṁ yadi | yadi śuddhāsmyahaṁ jātā tasmātpāpānmaheśvara
सन्ध्या ने कहा - हे महेश्वर! यदि प्रेमपूर्वक वर देना है, यदि मैं वर पाने योग्य हूँ, यदि मैं उस पाप से शुद्ध हो गयी हूँ,
श्लोक 34 (shiva.rudra.26.34)
यदि देव प्रसन्नोऽसि तपसा मम साम्प्रतम् । वृतस्तदायं प्रथमं वरो मम विधीयताम्
yadi deva prasanno'si tapasā mama sāmpratam | vṛtastadāyaṁ prathamaṁ varo mama vidhīyatām
हे देव! यदि आप अभी मेरे तप से प्रसन्न हैं, तो यह मेरा पहला वर पूर्ण किया जाये।
श्लोक 35 (shiva.rudra.26.35)
उत्पन्नमात्रा देवेश प्राणिनोऽस्मिन् भुवस्थले । न भवन्तु समेनैव सकामाः सम्भवन्तु वै
utpannamātrā deveśa prāṇino'smin bhuvasthale | na bhavantu samenaiva sakāmāḥ sambhavantu vai
हे देवेश! इस भूतल पर उत्पन्न होते ही प्राणी कामवश्य न हों, अपितु उचित समय पर ही कामवश्य हों।
श्लोक 36 (shiva.rudra.26.36)
यद्धि वृत्ता हि लोकेषु त्रिष्वपि प्रथिता यथा । भविष्यामि तथा नान्या वर एको वृतो मया
yaddhi vṛttā hi lokeṣu triṣvapi prathitā yathā | bhaviṣyāmi tathā nānyā vara eko vṛto mayā
जैसे मैंने आचरण किया है, वैसे ही तीनों लोकों में मेरी प्रसिद्धि हो, और मेरे समान अन्य कोई न हो - यह एक ही वर मैंने माँगा है।
श्लोक 37 (shiva.rudra.26.37)
सकामा मम सृष्टिस्तु कुत्रचिन्न पतिष्यति । यो मे पतिर्भवेन्नाथ सोऽपि मेऽतिसुहृच्च वै
sakāmā mama sṛṣṭistu kutracinna patiṣyati | yo me patirbhavennātha so'pi me'tisuhṛcca vai
मेरी सृष्टि (उत्पत्ति) कहीं भी कामवश्य होकर न गिरे; और हे नाथ! जो मेरा पति हो, वह भी मेरा परम सुहृद् हो।
श्लोक 38 (shiva.rudra.26.38)
यो द्रक्ष्यति सकामो मां पुरुषस्तस्य पौरुषम् । गमिष्यति तदा नाशं स च क्लीबो भविष्यति
yo drakṣyati sakāmo māṁ puruṣastasya pauruṣam | gamiṣyati tadā nāśaṁ sa ca klībo bhaviṣyati
जो पुरुष मुझे कामभाव से देखेगा, उसका पौरुष नष्ट हो जायेगा और वह नपुंसक हो जायेगा।
श्लोक 39 (shiva.rudra.26.39)
ब्रह्मोवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्याः शङ्करो भक्तवत्सलः । उवाच सुप्रसन्नात्मा निष्पापायास्तयेरिते
brahmovāca | iti śrutvā vacastasyāḥ śaṅkaro bhaktavatsalaḥ | uvāca suprasannātmā niṣpāpāyāstayerite
ब्रह्मा ने कहा - निष्पाप सन्ध्या के इन वचनों को सुनकर, भक्तवत्सल शंकर ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा।
श्लोक 40 (shiva.rudra.26.40)
महेश्वर उवाच । शृणु देवि च सन्ध्ये त्वं त्वत्पापं भस्मतां गतम् । त्वयि त्यक्तो मया क्रोधः शुद्धा जाता तपःकरात्
maheśvara uvāca | śṛṇu devi ca sandhye tvaṁ tvatpāpaṁ bhasmatāṁ gatam | tvayi tyakto mayā krodhaḥ śuddhā jātā tapaḥkarāt
महेश्वर ने कहा - हे देवि सन्ध्ये! सुनो, तुम्हारा पाप भस्म हो गया है। मैंने तुम्हारे प्रति अपना क्रोध त्याग दिया है; तप के प्रभाव से तुम शुद्ध हो गयी हो।
श्लोक 41 (shiva.rudra.26.41)
यद्यद्वृतं त्वया भद्रे दत्तं तदखिलं मया । सुप्रसन्नेन तपसा तव सन्ध्ये वरेण हि
yadyadvṛtaṁ tvayā bhadre dattaṁ tadakhilaṁ mayā | suprasannena tapasā tava sandhye vareṇa hi
हे भद्रे! हे सन्ध्ये! तुमने जो कुछ माँगा है, तुम्हारे तप से अत्यन्त प्रसन्न होकर मैंने वह सब वर के रूप में दे दिया है।
श्लोक 42 (shiva.rudra.26.42)
प्रथमं शैशवो भावः कौमाराख्यो द्वितीयकः । तृतीयो यौवनो भावश्चतुर्थो वार्धकस्तथा
prathamaṁ śaiśavo bhāvaḥ kaumārākhyo dvitīyakaḥ | tṛtīyo yauvano bhāvaścaturtho vārdhakastathā
पहली अवस्था शैशव कहलाती है, दूसरी कौमार, तीसरी यौवन और चौथी वृद्धावस्था है।
श्लोक 43 (shiva.rudra.26.43)
तृतीये त्वथ सम्प्राप्ते वयोभागे शरीरिणः । सकामाः स्युर्द्वितीयान्ते भविष्यति क्वचित् क्वचित्
tṛtīye tvatha samprāpte vayobhāge śarīriṇaḥ | sakāmāḥ syurdvitīyānte bhaviṣyati kvacit kvacit
जब देहधारी प्राणी जीवन की तीसरी अवस्था (यौवन) को प्राप्त करते हैं, तब वे कामवश्य होंगे; दूसरी अवस्था (कौमार) के अन्त में भी कहीं-कहीं ऐसा हो सकता है।
श्लोक 44 (shiva.rudra.26.44)
तपसा तव मर्यादा जगति स्थापिता मया । उत्पन्नमात्रा न यथा सकामाः स्युः शरीरिणः
tapasā tava maryādā jagati sthāpitā mayā | utpannamātrā na yathā sakāmāḥ syuḥ śarīriṇaḥ
तुम्हारे तप से मैंने संसार में यह मर्यादा स्थापित की है कि देहधारी प्राणी उत्पन्न होते ही कामवश्य न हों।
श्लोक 45 (shiva.rudra.26.45)
त्वं च लोके सतीभावं तादृशं समवाप्नुहि । त्रिषु लोकेषु नान्यस्या यादृशं सम्भविष्यति
tvaṁ ca loke satībhāvaṁ tādṛśaṁ samavāpnuhi | triṣu lokeṣu nānyasyā yādṛśaṁ sambhaviṣyati
और तुम संसार में ऐसी सतीत्व की स्थिति प्राप्त करो, जैसी तीनों लोकों में अन्य किसी को प्राप्त न होगी।
श्लोक 46 (shiva.rudra.26.46)
यः पश्यति सकामस्त्वां पाणिग्राहमृते तव । स सद्यः क्लीबतां प्राप्य दुर्बलत्वं गमिष्यति
yaḥ paśyati sakāmastvāṁ pāṇigrāhamṛte tava | sa sadyaḥ klībatāṁ prāpya durbalatvaṁ gamiṣyati
तुम्हारे पाणिग्रहीता (पति) के अतिरिक्त जो भी तुम्हें कामभाव से देखेगा, वह तत्काल नपुंसकता प्राप्त कर दुर्बलता को प्राप्त होगा।
श्लोक 47 (shiva.rudra.26.47)
पतिस्तव महाभागस्तपोरूपसमन्वितः । सप्तकल्पान्तजीवी च भविष्यति सह त्वया
patistava mahābhāgastaporūpasamanvitaḥ | saptakalpāntajīvī ca bhaviṣyati saha tvayā
तुम्हारा पति महाभाग होगा, तपोमूर्ति होगा, और तुम्हारे साथ सात कल्पों के अन्त तक जीवित रहेगा।
श्लोक 48 (shiva.rudra.26.48)
इति ते ये वरा मत्तः प्रार्थितास्ते कृता मया । अन्यच्च ते वदिष्यामि पूर्वजन्मनि संस्थितम्
iti te ye varā mattaḥ prārthitāste kṛtā mayā | anyacca te vadiṣyāmi pūrvajanmani saṁsthitam
इस प्रकार तुमने जो वर मुझसे माँगे, वे मैंने दे दिये हैं। अब मैं तुम्हें कुछ और बताऊँगा, जो तुम्हारे पूर्वजन्म से सम्बद्ध है।
श्लोक 49 (shiva.rudra.26.49)
अग्नौ शरीरत्यागस्ते पूर्वमेव प्रतिश्रुतः । तदुपायं वदामि त्वां तत्कुरुष्व न संशयः
agnau śarīratyāgaste pūrvameva pratiśrutaḥ | tadupāyaṁ vadāmi tvāṁ tatkuruṣva na saṁśayaḥ
अग्नि में तुम्हारे शरीर-त्याग की प्रतिज्ञा पहले ही हो चुकी है; मैं तुम्हें उसका उपाय बताता हूँ, निःसंकोच वैसा करो।
श्लोक 50 (shiva.rudra.26.50)
स च मेधातिथेर्यज्ञे मुनेद्वादशवार्षिके । कृत्स्नप्रज्वलिते वह्नावचिरात् क्रियतां त्वया
sa ca medhātitheryajñe munedvādaśavārṣike | kṛtsnaprajvalite vahnāvacirāt kriyatāṁ tvayā
मुनि मेधातिथि के बारह वर्ष के यज्ञ में, पूर्ण रूप से प्रज्वलित अग्नि में तुम शीघ्र ही अपने शरीर का त्याग करो।
श्लोक 51 (shiva.rudra.26.51)
एतच्छैलोपत्यकायां चन्द्रभागानदीतटे । मेधातिथिर्महायज्ञं कुरुते तापसाश्रमे
etacchailopatyakāyāṁ candrabhāgānadītaṭe | medhātithirmahāyajñaṁ kurute tāpasāśrame
इसी पर्वत की तलहटी में, चन्द्रभागा नदी के तट पर, मेधातिथि अपने तपोवन आश्रम में महायज्ञ कर रहे हैं।
श्लोक 52 (shiva.rudra.26.52)
तत्र गत्वा स्वयं छन्दं मुनिभिर्नोपलक्षिता । मत्प्रसादाद्वह्निजाता तस्य पुत्री भविष्यसि
tatra gatvā svayaṁ chandaṁ munibhirnopalakṣitā | matprasādādvahnijātā tasya putrī bhaviṣyasi
वहाँ स्वेच्छा से जाकर, मुनियों से अलक्षित रहकर, मेरी कृपा से तुम अग्नि से उत्पन्न होकर उनकी पुत्री बनोगी।
श्लोक 53 (shiva.rudra.26.53)
यस्ते वरो वाञ्छनीयः स्वामी मनसि कश्चन । तं निधाय निजस्वान्ते त्यज वह्नौ वपुः स्वकम्
yaste varo vāñchanīyaḥ svāmī manasi kaścana | taṁ nidhāya nijasvānte tyaja vahnau vapuḥ svakam
जो पति तुम्हारे मन में वांछनीय है, उसे अपने हृदय में धारण करके अग्नि में अपने शरीर का त्याग करो।
श्लोक 54 (shiva.rudra.26.54)
यदा त्वं दारुणं सन्ध्ये तपश्चरसि पर्वते । यावच्चतुर्युगं तस्य व्यतीते तु कृते युगे
yadā tvaṁ dāruṇaṁ sandhye tapaścarasi parvate | yāvaccaturyugaṁ tasya vyatīte tu kṛte yuge
हे सन्ध्ये! जब तुम इस पर्वत पर घोर तप कर रही थीं, उस चतुर्युग में जब कृतयुग बीत गया,
श्लोक 55 (shiva.rudra.26.55)
त्रेतायाः प्रथमे भागे जाता दक्षस्य कन्यकाः । यास्ताः शीलसमापन्ना यथायोग्यं विवाहिताः
tretāyāḥ prathame bhāge jātā dakṣasya kanyakāḥ | yāstāḥ śīlasamāpannā yathāyogyaṁ vivāhitāḥ
त्रेतायुग के प्रथम भाग में दक्ष की कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जो शीलसम्पन्न होकर यथायोग्य विवाहित हुईं।
श्लोक 56 (shiva.rudra.26.56)
तन्मध्ये स ददौ कन्या विधवे सप्तविंशतिः । चन्द्रोऽन्याःसम्परित्यज्य रोहिण्यां प्रीतिमानभूत्
tanmadhye sa dadau kanyā vidhave saptaviṁśatiḥ | candro'nyāḥsamparityajya rohiṇyāṁ prītimānabhūt
उनमें से दक्ष ने सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमा को दीं; परन्तु चन्द्रमा अन्य सबको छोड़कर रोहिणी में अनुरक्त हो गया।
श्लोक 57 (shiva.rudra.26.57)
तद्धेतोर्हि यदा चन्द्रः शप्तो दक्षेण कोपिना । तदा भवत्या निकटे सर्वे देवाः समागताः
taddhetorhi yadā candraḥ śapto dakṣeṇa kopinā | tadā bhavatyā nikaṭe sarve devāḥ samāgatāḥ
इसी कारण जब क्रोधित दक्ष ने चन्द्रमा को शाप दिया, तब सभी देवता तुम्हारे निकट आये।
श्लोक 58 (shiva.rudra.26.58)
न दृष्टाश्च त्वया सन्ध्ये ते देवा ब्रह्मणा सह । मयि विन्यस्तमनसा खं च दृष्ट्वा लभेत्पुनः
na dṛṣṭāśca tvayā sandhye te devā brahmaṇā saha | mayi vinyastamanasā khaṁ ca dṛṣṭvā labhetpunaḥ
किन्तु हे सन्ध्ये! मुझमें मन लगाये होने के कारण तुमने ब्रह्मा सहित उन देवताओं को नहीं देखा; केवल आकाश को देखकर तुम पुनः चेत प्राप्त करोगी।
श्लोक 59 (shiva.rudra.26.59)
चन्द्रस्य शापमोक्षार्थं जाता चन्द्रनदी तदा । सृष्टा धात्रा तदैवात्र मेधातिथिरुपस्थितः
candrasya śāpamokṣārthaṁ jātā candranadī tadā | sṛṣṭā dhātrā tadaivātra medhātithirupasthitaḥ
चन्द्रमा को शाप से मुक्त करने के लिए तभी चन्द्र-नदी उत्पन्न हुई, जो विधाता द्वारा उसी समय बनायी गयी थी; और उसी समय यहाँ मेधातिथि उपस्थित थे।
श्लोक 60 (shiva.rudra.26.60)
तपसा तत्समो नास्ति न भूतो न भविष्यति । येन यज्ञः समारब्धो ज्योतिष्टोमो महाविधिः
tapasā tatsamo nāsti na bhūto na bhaviṣyati | yena yajñaḥ samārabdho jyotiṣṭomo mahāvidhiḥ
तप में उनके समान न कोई हुआ है, न होगा; उन्होंने ही महाविधि ज्योतिष्टोम यज्ञ का आरम्भ किया है।
श्लोक 61 (shiva.rudra.26.61)
तत्र प्रज्वलितो वह्निस्तस्मिन्त्यज वपुः स्वकम् । इदानीं सुपवित्रा त्वं सम्पूर्णोऽस्तु पणस्तव
tatra prajvalito vahnistasmintyaja vapuḥ svakam | idānīṁ supavitrā tvaṁ sampūrṇo'stu paṇastava
वहाँ अग्नि प्रज्वलित है, उसी में अपने शरीर का त्याग करो। अब तुम अत्यन्त पवित्र हो; तुम्हारी प्रतिज्ञा पूर्ण हो।
श्लोक 62 (shiva.rudra.26.62)
एतन्मया स्थापितं स्वाकार्यार्थं भो तपस्विनि । तत्कुरुष्व महाभागे याहि यज्ञे महामुनेः । कृत्वा हितं च देवेशस्तत्रैवान्तरधीयत
etanmayā sthāpitaṁ svākāryārthaṁ bho tapasvini | tatkuruṣva mahābhāge yāhi yajñe mahāmuneḥ | kṛtvā hitaṁ ca deveśastatraivāntaradhīyata
हे तपस्विनी! यह मैंने तुम्हारे कार्य की सिद्धि के लिए स्थापित किया है; हे महाभागे! यह करो, महामुनि के यज्ञ में जाओ। यह हित करके देवेश वहीं अन्तर्धान हो गये।