रुद्र संहिता · अध्याय 39
विवाह में शिव-लीला
श्लोक 1 (shiva.rudra.39.1)
ब्रह्मोवाच । कृत्वा दक्षः सुतादानं यौतकं विविधं ददौ । हराय सुप्रसन्नश्च द्विजेभ्यो विविधं धनम्
brahmovāca | kṛtvā dakṣaḥ sutādānaṁ yautakaṁ vividhaṁ dadau | harāya suprasannaśca dvijebhyo vividhaṁ dhanam
ब्रह्मा ने कहा - कन्यादान करके दक्ष ने नाना प्रकार का यौतक (दहेज) हर को दिया, और अत्यन्त प्रसन्न होकर द्विजों को भी विविध धन दिया।
श्लोक 2 (shiva.rudra.39.2)
अथ शम्भुमुपागत्य समुत्थाय कृताञ्जलिः । सार्धं कमलया चेदमुवाच गरुडध्वजः
atha śambhumupāgatya samutthāya kṛtāñjaliḥ | sārdhaṁ kamalayā cedamuvāca garuḍadhvajaḥ
तब गरुड़ध्वज विष्णु उठकर, हाथ जोड़कर, कमला (लक्ष्मी) सहित शम्भु के पास आकर यह बोले।
श्लोक 3 (shiva.rudra.39.3)
विष्णुरुवाच । देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो । त्वं पिता जगतां तात सती माताखिलस्य च
viṣṇuruvāca | devadeva mahādeva karuṇāsāgara prabho | tvaṁ pitā jagatāṁ tāta satī mātākhilasya ca
विष्णु ने कहा - हे देवाधिदेव! हे महादेव! हे करुणासागर प्रभो! हे तात! आप जगत् के पिता हैं और सती सबकी माता हैं।
श्लोक 4 (shiva.rudra.39.4)
युवां लीलावतारौ वै सतां क्षेमाय सर्वदा । खलानां निग्रहार्थाय श्रुतिरेषा सनातनी
yuvāṁ līlāvatārau vai satāṁ kṣemāya sarvadā | khalānāṁ nigrahārthāya śrutireṣā sanātanī
आप दोनों सदा सज्जनों के कल्याण और दुष्टों के दमन के लिये लीलावतार हैं - यह सनातन श्रुति है।
श्लोक 5 (shiva.rudra.39.5)
स्निग्धनीलाञ्जनश्यामशोभया शोभसे हर । दाक्षायण्या यथा चाहं प्रतिलोमेन पद्मया
snigdhanīlāñjanaśyāmaśobhayā śobhase hara | dākṣāyaṇyā yathā cāhaṁ pratilomena padmayā
हे हर! आप स्निग्ध नील अंजन की शोभा से सुशोभित हैं, दाक्षायणी के साथ; जैसे विपरीत क्रम में मैं पद्मा (लक्ष्मी) के साथ सुशोभित हूँ।
श्लोक 6 (shiva.rudra.39.6)
देवानां वा नृणां रक्षां कुरु सत्यानया सताम् । संसारसारिणां शम्भो मङ्गलं सर्वदा तथा
devānāṁ vā nṛṇāṁ rakṣāṁ kuru satyānayā satām | saṁsārasāriṇāṁ śambho maṅgalaṁ sarvadā tathā
हे शम्भो! इस सती के द्वारा देवताओं और मनुष्यों की, तथा संसार-यात्रा करने वाले सज्जनों की सदा रक्षा और मंगल कीजिये।
श्लोक 7 (shiva.rudra.39.7)
य एनां साभिलाषो वै दृष्ट्वा श्रुत्वाथवा भवेत् । तं हन्याः सर्वभूतेश विज्ञप्तिरिति मे प्रभो
ya enāṁ sābhilāṣo vai dṛṣṭvā śrutvāthavā bhavet | taṁ hanyāḥ sarvabhūteśa vijñaptiriti me prabho
जो भी इसे देखकर या सुनकर कामाभिलाषी हो जाये, हे सर्वभूतेश! उसे मार डालिये - यही मेरा प्रभु से निवेदन है।
श्लोक 8 (shiva.rudra.39.8)
ब्रह्मोवाच । इति श्रुत्वा वचो विष्णोर्विहस्य परमेश्वरः । एवमस्त्विति सर्वज्ञः प्रोवाच मधुसूदनम्
brahmovāca | iti śrutvā vaco viṣṇorvihasya parameśvaraḥ | evamastviti sarvajñaḥ provāca madhusūdanam
ब्रह्मा ने कहा - विष्णु के इस वचन को सुनकर सर्वज्ञ परमेश्वर ने हँसते हुए मधुसूदन से 'ऐसा ही हो' कहा।
श्लोक 9 (shiva.rudra.39.9)
स्वस्थानं हरिरागत्य स्थित आसीन्मुनीश्वर । उत्सवं कारयामास जुगोप चरितं च तत्
svasthānaṁ harirāgatya sthita āsīnmunīśvara | utsavaṁ kārayāmāsa jugopa caritaṁ ca tat
हे मुनीश्वर! हरि अपने स्थान पर आकर वहीं स्थित रहे, उत्सव कराते रहे और उस आचरण की रक्षा करते रहे।
श्लोक 10 (shiva.rudra.39.10)
अहं देवीं समागत्य गृह्योक्तविधिनाखिलम् । अग्निकार्यं यथोद्दिष्टमकार्षं च सुविस्तरम्
ahaṁ devīṁ samāgatya gṛhyoktavidhinākhilam | agnikāryaṁ yathoddiṣṭamakārṣaṁ ca suvistaram
मैं देवी के समीप जाकर गृह्यसूत्र में कहे गये विधान के अनुसार सम्पूर्ण अग्नि-कार्य विस्तारपूर्वक सम्पन्न करने लगा।
श्लोक 11 (shiva.rudra.39.11)
ततः शिवा शिवश्चैव यथाविधि प्रहृष्टवत् । अग्नेः प्रदक्षिणं चक्रे मदाचार्यद्विजाज्ञया
tataḥ śivā śivaścaiva yathāvidhi prahṛṣṭavat | agneḥ pradakṣiṇaṁ cakre madācāryadvijājñayā
तत्पश्चात् शिवा और शिव दोनों प्रसन्नतापूर्वक, आचार्यरूप मुझ द्विज की आज्ञा से, विधिवत अग्नि की प्रदक्षिणा करने लगे।
श्लोक 12 (shiva.rudra.39.12)
तदा महोत्सवस्तत्राद्भुतोऽभूद् द्विजसत्तम । सर्वेषां सुखदं वाद्यं गीतनृत्यपुरःसरम्
tadā mahotsavastatrādbhuto'bhūd dvijasattama | sarveṣāṁ sukhadaṁ vādyaṁ gītanṛtyapuraḥsaram
हे द्विजश्रेष्ठ! तब वहाँ नृत्य-गान और वाद्य से पूर्ण, सबको सुख देने वाला एक अद्भुत महोत्सव हुआ।
श्लोक 13 (shiva.rudra.39.13)
तदानीमद्भुतं तत्र चरितं समभूदति । सुविस्मयकरं तात तच्छृणु त्वं वदामि ते
tadānīmadbhutaṁ tatra caritaṁ samabhūdati | suvismayakaraṁ tāta tacchṛṇu tvaṁ vadāmi te
हे तात! उस समय वहाँ अत्यन्त अद्भुत और विस्मयकारी एक घटना घटी; उसे सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 14 (shiva.rudra.39.14)
दुर्ज्ञेया शाम्भवी माया तया सम्मोहितं जगत् । सचराचरमत्यन्तं सदेवासुरमानुषम्
durjñeyā śāmbhavī māyā tayā sammohitaṁ jagat | sacarācaramatyantaṁ sadevāsuramānuṣam
शाम्भवी माया दुर्ज्ञेय है; उसी से देव, असुर और मनुष्य सहित सारा चराचर जगत् अत्यन्त मोहित रहता है।
श्लोक 15 (shiva.rudra.39.15)
योऽहं शम्भुं मोहयितुं पुरैच्छं कपटेन ह । मां च तं शङ्करस्तात मोहयामास लीलया
yo'haṁ śambhuṁ mohayituṁ puraicchaṁ kapaṭena ha | māṁ ca taṁ śaṅkarastāta mohayāmāsa līlayā
मैं, जो कभी छल से शम्भु को मोहित करना चाहता था, हे तात! शंकर ने अपनी ही लीला से मुझे मोहित कर दिया।
श्लोक 16 (shiva.rudra.39.16)
इच्छेत्परापकारं यः स तस्यैव भवेद् ध्रुवम् । इति मत्वापकारं नो कुर्यादन्यस्य पूरुषः
icchetparāpakāraṁ yaḥ sa tasyaiva bhaved dhruvam | iti matvāpakāraṁ no kuryādanyasya pūruṣaḥ
जो दूसरे का अपकार चाहता है, वह अपकार निश्चित रूप से उसी पर लौट आता है; यह जानकर मनुष्य को दूसरे का अपकार नहीं करना चाहिये।
श्लोक 17 (shiva.rudra.39.17)
प्रदक्षिणां प्रकुर्वन्त्या वह्नेः सत्याः पदद्वयम् । आविर्बभूव वसनात्तदद्राक्षमहं मुने
pradakṣiṇāṁ prakurvantyā vahneḥ satyāḥ padadvayam | āvirbabhūva vasanāttadadrākṣamahaṁ mune
अग्नि की प्रदक्षिणा करती हुई सती के दोनों चरण वस्त्र के नीचे से प्रकट हो गये; हे मुने! वह मैंने देख लिया।
श्लोक 18 (shiva.rudra.39.18)
मदनाविष्टचेताश्च भूत्वाङ्गानि व्यलोकयम् । अहं सत्या द्विजश्रेष्ठ शिवमायाविमोहितः
madanāviṣṭacetāśca bhūtvāṅgāni vyalokayam | ahaṁ satyā dvijaśreṣṭha śivamāyāvimohitaḥ
हे द्विजश्रेष्ठ! शिव की माया से मोहित होकर, कामाविष्ट-चित्त होकर मैं सती के अंगों को देखने लगा।
श्लोक 19 (shiva.rudra.39.19)
यथा यथाहं रम्याणि व्यैक्षमङ्गानि कौतुकात् । सत्या बभूव संहृष्टः कामार्तो हि तथा तथा
yathā yathāhaṁ ramyāṇi vyaikṣamaṅgāni kautukāt | satyā babhūva saṁhṛṣṭaḥ kāmārto hi tathā tathā
जैसे-जैसे मैं कौतुकवश उसके मनोहर अंगों को देखता गया, वैसे-वैसे सती भी कामातुर होकर हर्षित होती गयी।
श्लोक 20 (shiva.rudra.39.20)
अहमेवं तथा दृष्ट्वा दक्षजां च पतिव्रताम् । स्मराविष्टमना वक्त्रं द्रष्टुकामोऽभवं मुने
ahamevaṁ tathā dṛṣṭvā dakṣajāṁ ca pativratām | smarāviṣṭamanā vaktraṁ draṣṭukāmo'bhavaṁ mune
इस प्रकार उस पतिव्रता दक्षजा को देखकर, हे मुने! कामाविष्ट-चित्त होकर मैं भी उसका मुख देखने की इच्छा करने लगा।
श्लोक 21 (shiva.rudra.39.21)
न शम्भोर्लज्जया वक्त्रं प्रत्यक्षं च विलोकितम् । न च सा लज्जयाविष्टा करोति प्रकटं मुखम्
na śambhorlajjayā vaktraṁ pratyakṣaṁ ca vilokitam | na ca sā lajjayāviṣṭā karoti prakaṭaṁ mukham
शम्भु के लज्जावश उसका मुख साक्षात् नहीं देखा गया, और वह भी लज्जा से आविष्ट होकर अपना मुख प्रकट नहीं करती थी।
श्लोक 22 (shiva.rudra.39.22)
ततस्तद्दर्शनार्थाय सदुपायं विचारयन् । धूम्रघोरेण कामार्तोऽकार्षं तच्च ततः परम्
tatastaddarśanārthāya sadupāyaṁ vicārayan | dhūmraghoreṇa kāmārto'kārṣaṁ tacca tataḥ param
तब उसे देखने का सुन्दर उपाय सोचते हुए, कामातुर होकर मैंने घने काले धुएँ के द्वारा यह किया।
श्लोक 23 (shiva.rudra.39.23)
आर्द्रेन्धनानि भूरीणि क्षिप्त्वा तत्र विभावसौ । स्वल्पाज्याहुतिविन्यासादार्द्रद्रव्योद्भवस्तथा
ārdrendhanāni bhūrīṇi kṣiptvā tatra vibhāvasau | svalpājyāhutivinyāsādārdradravyodbhavastathā
अग्नि में प्रचुर गीली लकड़ियाँ डालकर और अल्प घी की आहुति देने से, गीली वस्तु से उत्पन्न धुआँ वहाँ फैलने लगा।
श्लोक 24 (shiva.rudra.39.24)
प्रादुर्भूतस्ततो धूमो भूयांस्तत्र समन्ततः । तादृग् येन तमोभूतं वेदीभूमिविनिर्मितम्
prādurbhūtastato dhūmo bhūyāṁstatra samantataḥ | tādṛg yena tamobhūtaṁ vedībhūmivinirmitam
तब वहाँ चारों ओर इतना अधिक धुआँ फैल गया कि उससे वेदी की समस्त भूमि अंधकारमय हो गयी।
श्लोक 25 (shiva.rudra.39.25)
ततो धूमाकुले नेत्रे महेशः परमेश्वरः । हस्ताभ्यां छादयामास बहुलीलाकरः प्रभुः
tato dhūmākule netre maheśaḥ parameśvaraḥ | hastābhyāṁ chādayāmāsa bahulīlākaraḥ prabhuḥ
तब बहुत लीला करने वाले प्रभु परमेश्वर महेश ने धुएँ से पीड़ित अपनी दोनों आँखों को हाथों से ढक लिया।
श्लोक 26 (shiva.rudra.39.26)
ततो वस्त्रं समुत्क्षिप्य सतीवक्त्रमहं मुने । अवेक्षं किल कामार्तः प्रहृष्टेनान्तरात्मना
tato vastraṁ samutkṣipya satīvaktramahaṁ mune | avekṣaṁ kila kāmārtaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā
तब घूँघट को उठाकर, हे मुने! कामातुर होकर, प्रसन्न अन्तरात्मा से मैंने सती का मुख देखा।
श्लोक 27 (shiva.rudra.39.27)
मुहुर्मुहुरहं तात पश्यामि स्म सतीमुखम् । अथेन्द्रियविकारं च प्राप्तवानस्मि सोऽवशः
muhurmuhurahaṁ tāta paśyāmi sma satīmukham | athendriyavikāraṁ ca prāptavānasmi so'vaśaḥ
हे तात! मैं बारम्बार सती का मुख देखता रहा, और फिर असमर्थ होकर मैंने इन्द्रिय-विकार का अनुभव किया।
श्लोक 28 (shiva.rudra.39.28)
मम रेतः प्रचस्कन्द ततस्तद्वीक्षणाद् द्रुतम् । चतुर्बिन्दुमितं भूमौ तुषारचयसन्निभम्
mama retaḥ pracaskanda tatastadvīkṣaṇād drutam | caturbindumitaṁ bhūmau tuṣāracayasannibham
उस दर्शन से ही तत्काल मेरा वीर्य स्खलित हो गया, चार बूँदें भूमि पर गिरीं, मानो हिम के कणों के समान।
श्लोक 29 (shiva.rudra.39.29)
ततोऽहं शङ्कितो मौनी तत्क्षणं विस्मितो मुने । आच्छादये स्म तद्रेतो यथा कश्चिद् बुबोध न
tato'haṁ śaṅkito maunī tatkṣaṇaṁ vismito mune | ācchādaye sma tadreto yathā kaścid bubodha na
तब मैं आशंकित और मौन होकर, हे मुने! उसी क्षण विस्मित होकर, उस वीर्य को इस प्रकार छिपाने लगा कि कोई जान न सके।
श्लोक 30 (shiva.rudra.39.30)
अथ तद्भगवान् शम्भुर्ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा । रेतोऽवस्कन्दनात्तस्य कोपादेतदुवाच ह
atha tadbhagavān śambhurjñātvā divyena cakṣuṣā | reto'vaskandanāttasya kopādetaduvāca ha
तब भगवान शम्भु ने अपनी दिव्य दृष्टि से यह जानकर, उस वीर्यपात के कारण क्रोधपूर्वक यह कहा।
श्लोक 31 (shiva.rudra.39.31)
रुद्र उवाच । किमेतद्विहितं पाप त्वया कर्म विगर्हितम् । विवाहे मम कान्ताया वक्त्रं दृष्टं न रागतः
rudra uvāca | kimetadvihitaṁ pāpa tvayā karma vigarhitam | vivāhe mama kāntāyā vaktraṁ dṛṣṭaṁ na rāgataḥ
रुद्र ने कहा - हे पापी! तूने यह कैसा निन्दनीय कर्म किया? मेरे विवाह में तूने राग से मेरी प्रिया का मुख देखा!
श्लोक 32 (shiva.rudra.39.32)
त्वं वेत्सि शङ्करेणैतत्कर्म ज्ञातं न किञ्चन । त्रैलोक्येऽपि न मेऽज्ञातं गूढं तस्मात्कथं विधे
tvaṁ vetsi śaṅkareṇaitatkarma jñātaṁ na kiñcana | trailokye'pi na me'jñātaṁ gūḍhaṁ tasmātkathaṁ vidhe
क्या तू सोचता है कि यह कर्म शंकर को ज्ञात नहीं हुआ? त्रिलोक में भी मुझसे कुछ अज्ञात नहीं है; फिर, हे विधे! यह कैसे छिपा रह सकता है?
श्लोक 33 (shiva.rudra.39.33)
यत्किञ्चित् त्रिषु लोकेषु जङ्गमं स्थावरं तथा । तस्याहं मध्यगो मूढ तैलं यद्वत्तिलान्तिगम्
yatkiñcit triṣu lokeṣu jaṅgamaṁ sthāvaraṁ tathā | tasyāhaṁ madhyago mūḍha tailaṁ yadvattilāntigam
हे मूढ़! तीनों लोकों में जो भी चर या अचर है, उस सबके मध्य मैं ही व्याप्त हूँ, जैसे तेल तिलों के भीतर व्याप्त रहता है।
श्लोक 34 (shiva.rudra.39.34)
ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा प्रियविष्णुर्मां तदा विष्णुवचः स्मरन् । इयेष हन्तुं ब्रह्माणं शूलमुद्यम्य शङ्करः
brahmovāca | ityuktvā priyaviṣṇurmāṁ tadā viṣṇuvacaḥ smaran | iyeṣa hantuṁ brahmāṇaṁ śūlamudyamya śaṅkaraḥ
ब्रह्मा ने कहा - ऐसा कहकर, विष्णु के प्रिय वचन का स्मरण करते हुए भी शंकर उस समय शूल उठाकर मुझ ब्रह्मा को मारने की इच्छा करने लगे।
श्लोक 35 (shiva.rudra.39.35)
शम्भुनोद्यमिते शूले मां च हन्तुं द्विजोत्तम । मरीचिप्रमुखास्ते वै हाहाकारं च चक्रिरे
śambhunodyamite śūle māṁ ca hantuṁ dvijottama | marīcipramukhāste vai hāhākāraṁ ca cakrire
हे द्विजोत्तम! शम्भु द्वारा शूल उठाये जाने पर मुझे मारने के लिये उद्यत देखकर मरीचि आदि पुत्रों ने हाहाकार मचाया।
श्लोक 36 (shiva.rudra.39.36)
ततो देवगणाः सर्वे मुनयश्चाखिलास्तथा । तुष्टुवुः शङ्करं तत्र प्रज्वलन्तं भयातुराः
tato devagaṇāḥ sarve munayaścākhilāstathā | tuṣṭuvuḥ śaṅkaraṁ tatra prajvalantaṁ bhayāturāḥ
तब समस्त देवगण और सभी मुनि भी भय से आतुर होकर वहाँ प्रज्वलित शंकर की स्तुति करने लगे।
श्लोक 37 (shiva.rudra.39.37)
देवा ऊचुः । देवदेव महादेव शरणागतवत्सल । ब्रह्माणं रक्ष रक्षेश कृपां कुरु महेश्वर
devā ūcuḥ | devadeva mahādeva śaraṇāgatavatsala | brahmāṇaṁ rakṣa rakṣeśa kṛpāṁ kuru maheśvara
देवताओं ने कहा - हे देवाधिदेव! हे महादेव! हे शरणागतवत्सल! ब्रह्मा की रक्षा कीजिये, हे रक्षक! हे महेश्वर! कृपा कीजिये।
श्लोक 38 (shiva.rudra.39.38)
जगत्पिता महेश त्वं जगन्माता सती मता । हरिब्रह्मादयः सर्वे तव दासाः सुरप्रभो
jagatpitā maheśa tvaṁ jaganmātā satī matā | haribrahmādayaḥ sarve tava dāsāḥ suraprabho
हे महेश! आप जगत् के पिता हैं, सती जगन्माता मानी जाती हैं; हरि, ब्रह्मा आदि सभी आपके ही दास हैं, हे सुरप्रभो!
श्लोक 39 (shiva.rudra.39.39)
अद्भुताकृतिलीलस्त्वं तव मायाद्भुता प्रभो । तया विमोहितं सर्वं विना त्वद्भक्तिमीश्वर
adbhutākṛtilīlastvaṁ tava māyādbhutā prabho | tayā vimohitaṁ sarvaṁ vinā tvadbhaktimīśvara
हे प्रभो! आप अद्भुत रूप-लीला वाले हैं, आपकी माया भी अद्भुत है; आपकी भक्ति के बिना उसी से सारा जगत् मोहित है, हे ईश्वर!
श्लोक 40 (shiva.rudra.39.40)
ब्रह्मोवाच । इत्थं बहुतरं दीना निर्जरा मुनयश्च ते । तुष्टुवुर्देवदेवेशं क्रोधाविष्टं महेश्वरम्
brahmovāca | itthaṁ bahutaraṁ dīnā nirjarā munayaśca te | tuṣṭuvurdevadeveśaṁ krodhāviṣṭaṁ maheśvaram
ब्रह्मा ने कहा - इस प्रकार अत्यन्त दीन हुए वे अजर मुनि क्रोध से आविष्ट देवाधिदेव महेश्वर की बारम्बार स्तुति करने लगे।
श्लोक 41 (shiva.rudra.39.41)
दक्षो मैवं मैवमिति पाणिमुद्यम्य शङ्कितः । वारयामास भूतेशं क्षिप्रमेत्य पुरोगतः
dakṣo maivaṁ maivamiti pāṇimudyamya śaṅkitaḥ | vārayāmāsa bhūteśaṁ kṣiprametya purogataḥ
आशंकित दक्ष ने हाथ उठाकर 'ऐसा मत करो, ऐसा मत करो' कहते हुए शीघ्र आगे आकर भूतेश को रोकने का प्रयत्न किया।
श्लोक 42 (shiva.rudra.39.42)
अथाग्रे सङ्गतं वीक्ष्य तदा दक्षं महेश्वरः । प्रत्युवाचाप्रियमिदं संस्मरन्प्रार्थनां हरेः
athāgre saṅgataṁ vīkṣya tadā dakṣaṁ maheśvaraḥ | pratyuvācāpriyamidaṁ saṁsmaranprārthanāṁ hareḥ
तब सामने आये हुए दक्ष को देखकर महेश्वर ने हरि की उस पूर्व-विनती का स्मरण करते हुए यह अप्रिय वचन कहा।
श्लोक 43 (shiva.rudra.39.43)
महेश्वर उवाच । विष्णुना मेऽतिभक्तेन यदिदानीमुदीरितम् । मयाप्यङ्गीकृतं कर्तुं तदिहैव प्रजापते
maheśvara uvāca | viṣṇunā me'tibhaktena yadidānīmudīritam | mayāpyaṅgīkṛtaṁ kartuṁ tadihaiva prajāpate
महेश्वर ने कहा - हे प्रजापते! अत्यन्त भक्त विष्णु ने अभी जो कहा था, उसे मैंने भी यहीं करने के लिये स्वीकार किया है।
श्लोक 44 (shiva.rudra.39.44)
सतीं यः साभिलाषः सन् वीक्षेत वध तं प्रभो । इति विष्णुवचः सत्यं विधिं हत्वा करोम्यहम्
satīṁ yaḥ sābhilāṣaḥ san vīkṣeta vadha taṁ prabho | iti viṣṇuvacaḥ satyaṁ vidhiṁ hatvā karomyaham
'जो भी कामाभिलाषी होकर सती को देखे, हे प्रभो! उसे मार डालिये' - यह विष्णु का सत्य वचन पूर्ण करते हुए मैं विधाता को मारता हूँ।
श्लोक 45 (shiva.rudra.39.45)
साभिलाषः कथं ब्रह्मा सतीं समवलोकयत् । अभवत् त्यक्तरेतास्तु ततो हन्मि कृतागसम्
sābhilāṣaḥ kathaṁ brahmā satīṁ samavalokayat | abhavat tyaktaretāstu tato hanmi kṛtāgasam
ब्रह्मा कामाभिलाषी होकर सती को कैसे देख सकता है? इसका वीर्यपात हुआ है, अतः मैं इस अपराधी को मारता हूँ।
श्लोक 46 (shiva.rudra.39.46)
ब्रह्मोवाच । इत्युक्तवति देवेश महेशे क्रोधसङ्कुले । चकम्पिरे जनाः सर्वे सदेवमुनिमानुषाः
brahmovāca | ityuktavati deveśa maheśe krodhasaṅkule | cakampire janāḥ sarve sadevamunimānuṣāḥ
ब्रह्मा ने कहा - जब क्रोध से भरे देवेश महेश ने ऐसा कहा, तब देवता, मुनि और मनुष्य सहित सभी प्राणी काँप उठे।
श्लोक 47 (shiva.rudra.39.47)
हाहाकारो महानासीदौदासीन्यं च सर्वशः । अभूवं विकलोऽतीव तदाहं तद्विमोहितः
hāhākāro mahānāsīdaudāsīnyaṁ ca sarvaśaḥ | abhūvaṁ vikalo'tīva tadāhaṁ tadvimohitaḥ
वहाँ बड़ा हाहाकार और सर्वत्र उदासीनता छा गयी; और उसी मोह में पड़कर मैं भी अत्यन्त विकल हो गया।
श्लोक 48 (shiva.rudra.39.48)
अथ विष्णुर्महेशातिप्रियः कार्यविचक्षणः । तमेवंवादिनं रुद्रं तुष्टाव प्रणतः सुधीः
atha viṣṇurmaheśātipriyaḥ kāryavicakṣaṇaḥ | tamevaṁvādinaṁ rudraṁ tuṣṭāva praṇataḥ sudhīḥ
तब महेश के अत्यन्त प्रिय, कार्य में निपुण, बुद्धिमान विष्णु ने प्रणाम करके ऐसा कहते हुए उस रुद्र को प्रसन्न करना आरम्भ किया।
श्लोक 49 (shiva.rudra.39.49)
स्तुत्वा च विविधैः स्तोत्रैः शङ्करं भक्तवत्सलम् । इदमूचे वारयंस्तं क्षिप्रं भूत्वा पुरः सरः
stutvā ca vividhaiḥ stotraiḥ śaṅkaraṁ bhaktavatsalam | idamūce vārayaṁstaṁ kṣipraṁ bhūtvā puraḥ saraḥ
भक्तवत्सल शंकर की विविध स्तोत्रों से स्तुति करके, शीघ्र सामने आकर, उन्हें रोकते हुए विष्णु ने यह कहा।
श्लोक 50 (shiva.rudra.39.50)
विष्णुरुवाच । विधिं न जहि भूतेश स्रष्टारं जगतां प्रभुम् । अयं शरणगस्तेऽद्य शरणागतवत्सलः
viṣṇuruvāca | vidhiṁ na jahi bhūteśa sraṣṭāraṁ jagatāṁ prabhum | ayaṁ śaraṇagaste'dya śaraṇāgatavatsalaḥ
विष्णु ने कहा - हे भूतेश! विधाता को, जगत् के स्रष्टा को मत मारिये; यह आज आपकी शरण में आया है, और आप शरणागतवत्सल हैं।
श्लोक 51 (shiva.rudra.39.51)
अहं तेऽतिप्रियो भक्तो भक्तराज इतीरितः । विज्ञप्तिं हृदि मे मत्वा कृपां कुरु ममोपरि
ahaṁ te'tipriyo bhakto bhaktarāja itīritaḥ | vijñaptiṁ hṛdi me matvā kṛpāṁ kuru mamopari
मैं आपका अत्यन्त प्रिय भक्त हूँ, 'भक्तराज' कहलाता हूँ; मेरे हृदय की इस विनती को मानकर मुझ पर कृपा कीजिये।
श्लोक 52 (shiva.rudra.39.52)
अन्यच्च शृणु मे नाथ वचनं हेतुगर्भितम् । तन्मनुष्व महेशान कृपां कृत्वा ममोपरि
anyacca śṛṇu me nātha vacanaṁ hetugarbhitam | tanmanuṣva maheśāna kṛpāṁ kṛtvā mamopari
हे नाथ! मेरा एक और युक्तिसंगत वचन सुनिये; हे महेशान! मुझ पर कृपा करके इसे मानिये।
श्लोक 53 (shiva.rudra.39.53)
प्रजाः स्रष्टुमयं शम्भो प्रादुर्भूतश्चतुर्मुखः । अस्मिन् हते प्रजास्रष्टा नास्त्यन्यः प्राकृतोऽधुना
prajāḥ sraṣṭumayaṁ śambho prādurbhūtaścaturmukhaḥ | asmin hate prajāsraṣṭā nāstyanyaḥ prākṛto'dhunā
हे शम्भो! यह चतुर्मुख प्रजा की सृष्टि के लिये ही प्रकट हुआ है; इसके मारे जाने पर अभी कोई अन्य साधारण प्राणी प्रजा का स्रष्टा नहीं है।
श्लोक 54 (shiva.rudra.39.54)
सृष्टिस्थित्यन्तकर्माणि करिष्यामः पुनः पुनः । त्रयो देवा वयं नाथ शिवरूप त्वदाज्ञया
sṛṣṭisthityantakarmāṇi kariṣyāmaḥ punaḥ punaḥ | trayo devā vayaṁ nātha śivarūpa tvadājñayā
हे नाथ! हम तीनों देवता आपके ही शिव-रूप में, आपकी ही आज्ञा से बारम्बार सृष्टि, स्थिति और संहार के कार्य करते हैं।
श्लोक 55 (shiva.rudra.39.55)
एतस्मिन्निहते शम्भो कस्त्वत्कर्म करिष्यति । तस्मान्न वध्यो भवता सृष्टिकृल्लयकृद्विभो
etasminnihate śambho kastvatkarma kariṣyati | tasmānna vadhyo bhavatā sṛṣṭikṛllayakṛdvibho
हे शम्भो! इसके मारे जाने पर आपका कार्य कौन करेगा? अतः, हे सृष्टि और संहार करने वाले प्रभो! यह आपके द्वारा वध्य नहीं है।
श्लोक 56 (shiva.rudra.39.56)
अनेनैव सती कन्या दक्षस्य च शिवा विभो । सदुपायेन वै भार्या भवदर्थे प्रकल्पिता
anenaiva satī kanyā dakṣasya ca śivā vibho | sadupāyena vai bhāryā bhavadarthe prakalpitā
हे विभो! इसी के द्वारा तो दक्ष की पुत्री सती, जो साक्षात् शिवा हैं, उचित उपाय से आपकी पत्नी बनने के लिये नियोजित की गयी थीं।
श्लोक 57 (shiva.rudra.39.57)
ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य महेशस्तु विज्ञप्तिं विष्णुना कृताम् । प्रत्युवाचाखिलांस्तांश्च श्रावयंश्च दृढव्रतः
brahmovāca | ityākarṇya maheśastu vijñaptiṁ viṣṇunā kṛtām | pratyuvācākhilāṁstāṁśca śrāvayaṁśca dṛḍhavrataḥ
ब्रह्मा ने कहा - विष्णु की इस विनती को सुनकर दृढ़व्रत महेश ने सबको सुनाते हुए उन सबसे यह उत्तर दिया।
श्लोक 58 (shiva.rudra.39.58)
महेश उवाच । देवदेव रमेशान विष्णो मत्प्राणवल्लभ । न निवारय मां तात वधादस्य खलस्त्वयम्
maheśa uvāca | devadeva rameśāna viṣṇo matprāṇavallabha | na nivāraya māṁ tāta vadhādasya khalastvayam
महेश ने कहा - हे देवाधिदेव! हे रमेशान! हे विष्णो! हे मेरे प्राणों से भी प्रिय! हे तात! इसके वध से मुझे मत रोकिये, यह दुष्ट है।
श्लोक 59 (shiva.rudra.39.59)
पूरयिष्यामि विज्ञप्तिं पूर्वान्तेऽङ्गीकृतां मया । महापापकरं दुष्टं हन्म्येनं चतुराननम्
pūrayiṣyāmi vijñaptiṁ pūrvānte'ṅgīkṛtāṁ mayā | mahāpāpakaraṁ duṣṭaṁ hanmyenaṁ caturānanam
मैंने पहले जो विनती स्वीकार की थी, उसे मैं पूर्ण करूँगा; इस महापापी, दुष्ट चतुरानन को मैं मार डालता हूँ।
श्लोक 60 (shiva.rudra.39.60)
अहमेव प्रजाः स्रक्ष्ये सर्वाः स्थिरचरा अपि । अन्यं स्रक्ष्ये सृष्टिकरमथवाहं स्वतेजसा
ahameva prajāḥ srakṣye sarvāḥ sthiracarā api | anyaṁ srakṣye sṛṣṭikaramathavāhaṁ svatejasā
मैं स्वयं ही सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्रजाओं की सृष्टि करूँगा; अथवा मैं अपने ही तेज से एक अन्य सृष्टिकर्ता को उत्पन्न करूँगा।
श्लोक 61 (shiva.rudra.39.61)
हत्वैनं विधिमेवाहं स्वपणं पूरयन् कृतम् । स्रष्टारमेकं स्रक्ष्यामि न निवारय मेश माम्
hatvainaṁ vidhimevāhaṁ svapaṇaṁ pūrayan kṛtam | sraṣṭāramekaṁ srakṣyāmi na nivāraya meśa mām
इसे मारकर, अपनी की गयी प्रतिज्ञा को पूर्ण करते हुए, मैं एक ही स्रष्टा उत्पन्न करूँगा; हे ईश! मुझे मत रोकिये।
श्लोक 62 (shiva.rudra.39.62)
ब्रह्मोवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा गिरीशस्याह चाच्युतः । स्मितप्रभिन्नहृदयः पुनर्मैवमितीरयन्
brahmovāca | iti tasya vacaḥ śrutvā girīśasyāha cācyutaḥ | smitaprabhinnahṛdayaḥ punarmaivamitīrayan
ब्रह्मा ने कहा - गिरीश के इस वचन को सुनकर, मुस्कुराहट से हृदय द्रवित हुए अच्युत ने पुनः 'ऐसा मत कीजिये' यह कहा।
श्लोक 63 (shiva.rudra.39.63)
अच्युत उवाच । प्रतिज्ञापूरणं योग्यं परस्मिन्पुरुषेऽस्ति वै । विचारयस्व वध्येश भवत्यात्मनि न प्रभो
acyuta uvāca | pratijñāpūraṇaṁ yogyaṁ parasminpuruṣe'sti vai | vicārayasva vadhyeśa bhavatyātmani na prabho
अच्युत ने कहा - किसी दूसरे पुरुष के प्रति की गयी प्रतिज्ञा का पूर्ण होना ही उचित है; हे वध्येश! विचार कीजिये, यह अपनी ही आत्मा के विषय में लागू नहीं होता, हे प्रभो!
श्लोक 64 (shiva.rudra.39.64)
त्रयो देवा वयं शम्भो त्वदात्मानः परा नहि । एकरूपा न भिन्नाश्च तत्त्वतः सुविचारय
trayo devā vayaṁ śambho tvadātmānaḥ parā nahi | ekarūpā na bhinnāśca tattvataḥ suvicāraya
हे शम्भो! हम तीनों देवता आपकी ही आत्माएँ हैं, आपसे पृथक् नहीं; हम एक ही स्वरूप हैं, भिन्न नहीं - तत्त्वतः भलीभाँति विचार कीजिये।
श्लोक 65 (shiva.rudra.39.65)
ततस्तद्वचनं श्रुत्वा विष्णोः स्वातिप्रियस्य सः । शम्भुरूचे पुनस्तं वै ख्यापयन्नात्मनो गतिम्
tatastadvacanaṁ śrutvā viṣṇoḥ svātipriyasya saḥ | śambhurūce punastaṁ vai khyāpayannātmano gatim
तब अपने अत्यन्त प्रिय विष्णु के उस वचन को सुनकर शम्भु ने अपनी ही गति को प्रकट करते हुए उनसे पुनः यह कहा।
श्लोक 66 (shiva.rudra.39.66)
शम्भुरुवाच । हे विष्णो सर्वभक्तेश कथमात्मा विधिर्मम । लक्ष्यते भिन्न एवायं प्रत्यक्षेणाग्रतः स्थितः
śambhuruvāca | he viṣṇo sarvabhakteśa kathamātmā vidhirmama | lakṣyate bhinna evāyaṁ pratyakṣeṇāgrataḥ sthitaḥ
शम्भु ने कहा - हे विष्णो! हे सर्वभक्तेश! यह ब्रह्मा, जो मेरी ही आत्मा है, सामने साक्षात् खड़ा हुआ भिन्न ही क्यों दिखायी देता है?
श्लोक 67 (shiva.rudra.39.67)
ब्रह्मोवाच । इत्याज्ञप्तो महेशेन सर्वेषां पुरतस्तदा । इदमूचे महादेवं तोषयन् गरुडध्वजः
brahmovāca | ityājñapto maheśena sarveṣāṁ puratastadā | idamūce mahādevaṁ toṣayan garuḍadhvajaḥ
ब्रह्मा ने कहा - महेश द्वारा इस प्रकार आज्ञप्त होकर, सबके सामने, महादेव को प्रसन्न करते हुए गरुड़ध्वज ने यह कहा।
श्लोक 68 (shiva.rudra.39.68)
विष्णुरुवाच । न ब्रह्मा भवतो भिन्नो न त्वं तस्मात्सदाशिव । न वाहं भवतो भिन्नो न मत् त्वं परमेश्वर
viṣṇuruvāca | na brahmā bhavato bhinno na tvaṁ tasmātsadāśiva | na vāhaṁ bhavato bhinno na mat tvaṁ parameśvara
विष्णु ने कहा - हे सदाशिव! ब्रह्मा आपसे भिन्न नहीं है, न आप उससे भिन्न हैं; हे परमेश्वर! मैं भी आपसे भिन्न नहीं हूँ, न आप मुझसे भिन्न हैं।
श्लोक 69 (shiva.rudra.39.69)
सर्वं जानासि सर्वज्ञ परमेश सदाशिव । मन्मुखादखिलान्सर्वं संश्रावयितुमिच्छसि
sarvaṁ jānāsi sarvajña parameśa sadāśiva | manmukhādakhilānsarvaṁ saṁśrāvayitumicchasi
हे सर्वज्ञ! हे परमेश! हे सदाशिव! आप सब कुछ जानते हैं; आप मेरे ही मुख से यह सब सबको सुनाना चाहते हैं।
श्लोक 70 (shiva.rudra.39.70)
त्वदाज्ञया वदामीश शृण्वन्तु निखिलाः सुराः । मुनयश्चापरे शैवं तत्त्वं सन्धार्य स्वं मनः
tvadājñayā vadāmīśa śṛṇvantu nikhilāḥ surāḥ | munayaścāpare śaivaṁ tattvaṁ sandhārya svaṁ manaḥ
हे ईश! आपकी आज्ञा से मैं कहता हूँ - समस्त देवता और अन्य मुनि, अपने मन में इस शैव तत्त्व को धारण करके सुनें।
श्लोक 71 (shiva.rudra.39.71)
प्रधानस्याप्रधानस्य भागाभागस्य रूपिणः । ज्योतिर्मयस्य भागास्ते वयं देवाः प्रभोस्त्रयः
pradhānasyāpradhānasya bhāgābhāgasya rūpiṇaḥ | jyotirmayasya bhāgāste vayaṁ devāḥ prabhostrayaḥ
हे प्रभो! प्रधान और अप्रधान, भाग और अभाग-स्वरूप, ज्योतिर्मय आपके ही अंश हम तीनों देवता हैं।
श्लोक 72 (shiva.rudra.39.72)
कस्त्वं कोऽहं च को ब्रह्मा तवैव परमात्मनः । अंशत्रयमिदं भिन्नं सृष्टिस्थित्यन्तकारणम्
kastvaṁ ko'haṁ ca ko brahmā tavaiva paramātmanaḥ | aṁśatrayamidaṁ bhinnaṁ sṛṣṭisthityantakāraṇam
आपके ही परमात्मा से सम्बद्ध, कौन आप, कौन मैं और कौन ब्रह्मा - यह भिन्न प्रतीत होने वाला त्रिविध अंश ही सृष्टि, स्थिति और संहार का कारण है।
श्लोक 73 (shiva.rudra.39.73)
चिन्तयस्वात्मनात्मानं स्वलीलाधृतविग्रहः । एकस्त्वं ब्रह्म सगुणो ह्यंशभूता वयं त्रयः
cintayasvātmanātmānaṁ svalīlādhṛtavigrahaḥ | ekastvaṁ brahma saguṇo hyaṁśabhūtā vayaṁ trayaḥ
हे अपनी लीला से देह धारण करने वाले! अपने द्वारा अपनी ही आत्मा का चिन्तन कीजिये; आप एक ही सगुण ब्रह्म हैं, हम तीनों उसी के अंशस्वरूप हैं।
श्लोक 74 (shiva.rudra.39.74)
शिरोग्रीवादिभेदेन यथैकस्यैव वर्ष्मणः । अङ्गानि ते तथेशस्य तस्य भागत्रयं हर
śirogrīvādibhedena yathaikasyaiva varṣmaṇaḥ | aṅgāni te tatheśasya tasya bhāgatrayaṁ hara
हे हर! जैसे सिर, गर्दन आदि के भेद से एक ही शरीर के अंग कहे जाते हैं, वैसे ही यह त्रिविध भाग उसी एक ईश्वर के अंग हैं।
श्लोक 75 (shiva.rudra.39.75)
यज्ज्योतिरभ्रं स्वपुरं पुराणं कूटस्थमव्यक्तमनन्तरूपम् । नित्यं च दीर्घादिविशेषणाद्यै- र्हीनं शिवस्त्वं तत एव सर्वम्
yajjyotirabhraṁ svapuraṁ purāṇaṁ kūṭasthamavyaktamanantarūpam | nityaṁ ca dīrghādiviśeṣaṇādyai- rhīnaṁ śivastvaṁ tata eva sarvam
जो ज्योति अनन्त, अपना ही सनातन धाम, कूटस्थ, अव्यक्त, अनन्तरूप, नित्य है और 'दीर्घ' आदि किसी विशेषण से रहित है - वही, हे शिव! आप हैं, और उसी से यह सब कुछ है।
श्लोक 76 (shiva.rudra.39.76)
ब्रह्मोवाच । एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य महादेवो मुनीश्वर ॥ बभूव सुप्रसन्नश्च न जघान स मां ततः
brahmovāca | etacchrutvā vacastasya mahādevo munīśvara || babhūva suprasannaśca na jaghāna sa māṁ tataḥ
ब्रह्मा ने कहा - हे मुनीश्वर! उनके इस वचन को सुनकर महादेव अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उसके बाद उन्होंने मुझे नहीं मारा।