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रुद्र संहिता · अध्याय 42

शिवा-शिव विहार वर्णन

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43

श्लोक 1 (shiva.rudra.42.1)

ब्रह्मोवाच । कदाचिदथ दक्षस्य तनया जलदागमे । कैलासक्ष्माभृतः प्राह प्रस्थस्थं वृषभध्वजम्

brahmovāca | kadācidatha dakṣasya tanayā jaladāgame | kailāsakṣmābhṛtaḥ prāha prasthasthaṁ vṛṣabhadhvajam

ब्रह्मा ने कहा — एक बार वर्षा ऋतु के आगमन पर, दक्ष-पुत्री सती ने कैलास पर्वत की उपत्यका में स्थित वृषभध्वज शिव से कहा।

श्लोक 2 (shiva.rudra.42.2)

सत्युवाच । देवदेव महादेव शम्भो मत्प्राणवल्लभ । शृणु मे वचनं नाथ श्रुत्वा तत्कुरु मानद

satyuvāca | devadeva mahādeva śambho matprāṇavallabha | śṛṇu me vacanaṁ nātha śrutvā tatkuru mānada

सती ने कहा — हे देवाधिदेव! हे महादेव! हे शम्भो! हे मेरे प्राणों से भी प्रिय! हे नाथ! मेरी बात सुनिए, और सुनकर हे मानदाता! उसे कीजिए।

श्लोक 3 (shiva.rudra.42.3)

घनागमोऽयं सम्प्राप्तः कालः परमदुःसहः । अनेकवर्णमेघौघाः सङ्गीताम्बरदिक्चयाः

ghanāgamo'yaṁ samprāptaḥ kālaḥ paramaduḥsahaḥ | anekavarṇameghaughāḥ saṅgītāmbaradikcayāḥ

यह मेघों के आगमन का अत्यंत असह्य समय आ पहुँचा है; अनेक वर्णों के मेघ-समूह आकाश और समस्त दिशाओं को घेरे हुए हैं।

श्लोक 4 (shiva.rudra.42.4)

विवान्ति वाता हृदयं हारयन्तीति वेगिनः । कदम्बरजसा धौताः पाथोबिन्दुविकर्षणाः

vivānti vātā hṛdayaṁ hārayantīti veginaḥ | kadambarajasā dhautāḥ pāthobinduvikarṣaṇāḥ

तीव्र गति से चलती हुई वायु हृदय को हर लेने वाली है; वह कदम्ब के पराग से धुली हुई तथा जल-बिन्दुओं को खींचती हुई बहती है।

श्लोक 5 (shiva.rudra.42.5)

मेघानां गर्जितैरुच्चैर्धारासारं विमुञ्चताम् । विद्युत्पताकिनां तीव्रैः क्षुब्धं स्यात्कस्य नो मनः

meghānāṁ garjitairuccairdhārāsāraṁ vimuñcatām | vidyutpatākināṁ tīvraiḥ kṣubdhaṁ syātkasya no manaḥ

घोर गर्जना करते हुए, मूसलाधार वर्षा बरसाते तथा तीव्र बिजली की पताकाओं वाले मेघों से किसका मन विचलित नहीं होगा?

श्लोक 6 (shiva.rudra.42.6)

न सूर्यो दृश्यते नापि मेघच्छन्नो निशापतिः । दिवापि रात्रिवद्भाति विरहिव्यसनाकरः

na sūryo dṛśyate nāpi meghacchanno niśāpatiḥ | divāpi rātrivadbhāti virahivyasanākaraḥ

न तो सूर्य दिखायी देता है, न मेघों से आच्छादित चन्द्रमा; दिन भी रात्रि के समान भासित होता है, जो विरहियों के लिए दुःख का कारण है।

श्लोक 7 (shiva.rudra.42.7)

मेघा नैकत्र तिष्ठन्तो ध्वनन्तः पवनेरिताः । पतन्त इव लोकानां दृश्यन्ते मूर्ध्नि शङ्कर

meghā naikatra tiṣṭhanto dhvanantaḥ pavaneritāḥ | patanta iva lokānāṁ dṛśyante mūrdhni śaṅkara

हे शंकर! वायु से प्रेरित गरजते हुए मेघ एक स्थान पर नहीं ठहरते; वे लोगों के सिर पर मानो गिरते हुए-से दिखायी देते हैं।

श्लोक 8 (shiva.rudra.42.8)

वाताहता महावृक्षा नर्तन्त इव चाम्बरे । दृश्यन्ते हर भीरूणां त्रासदाः कामुकेप्सिताः

vātāhatā mahāvṛkṣā nartanta iva cāmbare | dṛśyante hara bhīrūṇāṁ trāsadāḥ kāmukepsitāḥ

हे हर! वायु से आहत बड़े-बड़े वृक्ष आकाश में मानो नृत्य करते हुए दिखायी देते हैं; वे भीरुजनों के लिए भयदायक और कामी जनों के लिए वांछित हैं।

श्लोक 9 (shiva.rudra.42.9)

स्निग्धनीलाञ्जनस्याशु सदिवौघस्य पृष्ठतः । बलाकराजीवात्युच्चैर्यमुनापृष्ठफेनवत्

snigdhanīlāñjanasyāśu sadivaughasya pṛṣṭhataḥ | balākarājīvātyuccairyamunāpṛṣṭhaphenavat

स्निग्ध नीले अंजन के समान तुरंत घिरे हुए मेघ-समूह की पीठ पर, बगुलों की पंक्ति यमुना के जल पर तैरते हुए फेन के समान अत्यंत ऊँची उड़ती है।

श्लोक 10 (shiva.rudra.42.10)

क्षपायामीश वलयो दृश्यन्ते करभाश्रिताः । अम्बुधाविव सन्दीप्तपावको वडवामुखः

kṣapāyāmīśa valayo dṛśyante karabhāśritāḥ | ambudhāviva sandīptapāvako vaḍavāmukhaḥ

हे ईश! रात्रि में बिजली की रेखाएँ मेघों के बीच ऐसी दिखायी देती हैं मानो समुद्र में प्रज्वलित वडवाग्नि हो।

श्लोक 11 (shiva.rudra.42.11)

प्रारोहन्तीह सस्यानि मन्दरे प्राङ्गणेष्वपि । किमन्यत्र विरूपाक्ष सस्योद्भूतिं वदाम्यहम्

prārohantīha sasyāni mandare prāṅgaṇeṣvapi | kimanyatra virūpākṣa sasyodbhūtiṁ vadāmyaham

हे विरूपाक्ष! मंदराचल के आँगनों में भी अन्न के पौधे उग रहे हैं; फिर अन्यत्र की सस्य-उत्पत्ति के विषय में मैं क्या कहूँ?

श्लोक 12 (shiva.rudra.42.12)

श्यामलै राजतै रक्तैर्विशदोऽयं हिमाचलः । मन्दराश्रयमेघौघः पत्रैर्दुग्धाम्बुधिर्यथा

śyāmalai rājatai raktairviśado'yaṁ himācalaḥ | mandarāśrayameghaughaḥ patrairdugdhāmbudhiryathā

यह श्वेत हिमाचल श्यामल, रजत और रक्तवर्ण छटाओं से युक्त है, मानो पत्तों से आच्छादित क्षीरसागर हो, और मंदराचल पर टिके मेघ-समूह उस पर छाये हुए हैं।

श्लोक 13 (shiva.rudra.42.13)

असमश्रीश्च कुटिलं भेजे यस्याथ किंशुकान् । उच्चावचान् कलौ लक्ष्मीर्गन्ता सन्त्यज्य सज्जनान्

asamaśrīśca kuṭilaṁ bheje yasyātha kiṁśukān | uccāvacān kalau lakṣmīrgantā santyajya sajjanān

जिस प्रकार कलियुग में लक्ष्मी सज्जनों को त्यागकर ऊँच-नीच का भेद किये बिना अन्यत्र चली जाती है, उसी प्रकार असमान शोभा वाले टेढ़े-मेढ़े किंशुक वृक्षों ने भी विचित्र रूप धारण कर लिया है।

श्लोक 14 (shiva.rudra.42.14)

मन्दराचलमेघानां शब्देन हृषिता मुहुः । केकायन्ते प्रतिवने सततं पृष्ठसूचकम्

mandarācalameghānāṁ śabdena hṛṣitā muhuḥ | kekāyante prativane satataṁ pṛṣṭhasūcakam

मंदराचल के मेघों की गर्जना से बार-बार हर्षित होकर, वन-वन में मोर निरन्तर पीछे के संकेत सूचित करते हुए केकारव करते हैं।

श्लोक 15 (shiva.rudra.42.15)

मेघोत्सुकानां मधुरश्चातकानां मनोहरः । धारासारशरैस्तापं पेतुः प्रतिपथोद्गतम्

meghotsukānāṁ madhuraścātakānāṁ manoharaḥ | dhārāsāraśaraistāpaṁ petuḥ pratipathodgatam

मेघों के लिए उत्सुक चातक पक्षियों की मधुर और मनोहर बोली के साथ, वृष्टि की धाराओं रूपी बाणों से पथ-पथ पर उत्पन्न ताप शान्त हो गया।

श्लोक 16 (shiva.rudra.42.16)

मेघानां पश्य मद्देहे दुर्नयं करकोत्करैः । ये छादयन्त्यनुगते मयूरांश्चातकांस्तथा

meghānāṁ paśya maddehe durnayaṁ karakotkaraiḥ | ye chādayantyanugate mayūrāṁścātakāṁstathā

देखिए, मेघों का यह अन्याय मेरे शरीर के प्रति भी है — वे ओलों की वर्षा से उन मोरों और चातकों को भी ढँक देते हैं जो उनका ही अनुसरण करते हैं।

श्लोक 17 (shiva.rudra.42.17)

शिखिसारङ्गयोर्दृष्ट्वा मित्रादपि पराभवम् । हर्षं गच्छन्ति गिरिश विदूरमपि मानसम्

śikhisāraṅgayordṛṣṭvā mitrādapi parābhavam | harṣaṁ gacchanti giriśa vidūramapi mānasam

हे गिरीश! मोर और मृग को भी अपने ही मित्र से पराभूत होते देखकर, दूर से देखने वाले का मन भी हर्ष को प्राप्त होता है।

श्लोक 18 (shiva.rudra.42.18)

एतस्मिन्विषमे काले नीडं काकाश्चकोरकाः । कुर्वन्ति त्वां विना गेहान् कथं शान्तिमवाप्स्यसि

etasminviṣame kāle nīḍaṁ kākāścakorakāḥ | kurvanti tvāṁ vinā gehān kathaṁ śāntimavāpsyasi

इस विषम काल में कौवे और चकोर भी अपने घोंसले बना लेते हैं; परन्तु आपके बिना अपना घर न होने पर मुझे शान्ति कैसे मिलेगी?

श्लोक 19 (shiva.rudra.42.19)

महतीवाद्य नो भीतिर्मां मेघोत्था पिनाकधृक् । यतस्व यस्माद्वासाय माचिरं वचनान्मम

mahatīvādya no bhītirmāṁ meghotthā pinākadhṛk | yatasva yasmādvāsāya māciraṁ vacanānmama

हे पिनाकधारी! आज मुझे मेघों से उत्पन्न महान भय हो रहा है; अतः मेरे वचन से शीघ्र ही निवास के लिए प्रयत्न कीजिए, विलम्ब मत कीजिए।

श्लोक 20 (shiva.rudra.42.20)

कैलासे वा हिमाद्रौ वा महाकोश्यामथ क्षितौ । तत्रोपयोग्यं संवासं कुरु त्वं वृषभध्वज

kailāse vā himādrau vā mahākośyāmatha kṣitau | tatropayogyaṁ saṁvāsaṁ kuru tvaṁ vṛṣabhadhvaja

हे वृषभध्वज! कैलास पर, हिमाचल पर, अथवा महाकोशी की भूमि में — जहाँ भी उपयुक्त हो, वहीं हमारे निवास की व्यवस्था कीजिए।

श्लोक 21 (shiva.rudra.42.21)

ब्रह्मोवाच । एवमुक्तस्तया शम्भुर्दाक्षायण्या तथासकृत् । सञ्जहास च शीर्षस्थचन्द्ररश्मिस्मितालयम्

brahmovāca | evamuktastayā śambhurdākṣāyaṇyā tathāsakṛt | sañjahāsa ca śīrṣasthacandraraśmismitālayam

ब्रह्मा ने कहा — दाक्षायणी के इस प्रकार बार-बार कहने पर, शम्भु मुस्कुरा उठे; उनकी मुस्कान मानो सिर पर स्थित चन्द्रमा की किरणों का ही आश्रय बन गयी।

श्लोक 22 (shiva.rudra.42.22)

अथोवाच सतीं देवीं स्मिताभिन्नौष्ठसम्पुटः । महात्मा सर्वतत्त्वज्ञस्तोषयन्परमेश्वरः

athovāca satīṁ devīṁ smitābhinnauṣṭhasampuṭaḥ | mahātmā sarvatattvajñastoṣayanparameśvaraḥ

तत्पश्चात् मुस्कान से खुले हुए ओष्ठों वाले, सर्वतत्त्वज्ञ महात्मा परमेश्वर ने देवी सती को प्रसन्न करते हुए कहा।

श्लोक 23 (shiva.rudra.42.23)

ईश्वरः उवाच । यत्र प्रीत्यै मया कार्यो वासस्तव मनोहरे । मेघास्तत्र न गन्तारः कदाचिदपि मत्प्रिये

īśvaraḥ uvāca | yatra prītyai mayā kāryo vāsastava manohare | meghāstatra na gantāraḥ kadācidapi matpriye

ईश्वर ने कहा — हे मनोहरे! हे प्रिये! जहाँ मुझे तुम्हारी प्रसन्नता के लिए निवास बनाना है, वहाँ मेघ कभी नहीं पहुँच सकते।

श्लोक 24 (shiva.rudra.42.24)

मेघा नितम्बपर्यन्तं सञ्चरन्ति महीभृतः । सदा प्रालेयसानोस्तु वर्षास्वपि मनोहरे

meghā nitambaparyantaṁ sañcaranti mahībhṛtaḥ | sadā prāleyasānostu varṣāsvapi manohare

हे मनोहरे! मेघ पर्वत के ढलानों तक ही विचरण करते हैं; परन्तु हिमालय के शिखर पर वर्षा-काल में भी सदा मनोहर स्थिति बनी रहती है।

श्लोक 25 (shiva.rudra.42.25)

कैलासस्य तथा देवि पादगाः प्रायशो घनाः । सञ्चरन्ति न गच्छन्ति तत ऊर्ध्वं कदाचन

kailāsasya tathā devi pādagāḥ prāyaśo ghanāḥ | sañcaranti na gacchanti tata ūrdhvaṁ kadācana

हे देवी! इसी प्रकार कैलास के भी मेघ प्रायः उसकी तलहटी तक ही विचरते हैं; वे उससे ऊपर कभी नहीं जाते।

श्लोक 26 (shiva.rudra.42.26)

सुमेरोर्वा गिरेरूर्ध्वं न गच्छन्ति बलाहकाः । जम्बूमूलं समासाद्य पुष्करावर्तकादयः

sumerorvā girerūrdhvaṁ na gacchanti balāhakāḥ | jambūmūlaṁ samāsādya puṣkarāvartakādayaḥ

सुमेरु पर्वत से भी ऊपर पुष्करावर्तक आदि मेघ नहीं जाते; वे जम्बू वृक्ष की जड़ तक पहुँचकर ही रुक जाते हैं।

श्लोक 27 (shiva.rudra.42.27)

इत्युक्तेषु गिरीन्द्रेषु यस्योपरि भवेद्धि ते । मनोरुचिर्निवासाय तमाचक्ष्व द्रुतं हि मे

ityukteṣu girīndreṣu yasyopari bhaveddhi te | manorucirnivāsāya tamācakṣva drutaṁ hi me

इन कहे गये पर्वत-श्रेष्ठों में से जिस किसी का शिखर निवास के लिए तुम्हारे मन को रुचिकर लगे, वह मुझे शीघ्र बताओ।

श्लोक 28 (shiva.rudra.42.28)

स्वेच्छाविहारैस्तव कौतुकानि सुवर्णपक्षानिलवृन्दवृन्दैः । शब्दोत्तरङ्गैर्मधुरस्वनैस्तै- र्मुदोपगेयानि गिरौ हिमोत्थे

svecchāvihāraistava kautukāni suvarṇapakṣānilavṛndavṛndaiḥ | śabdottaraṅgairmadhurasvanaistai- rmudopageyāni girau himotthe

उस हिम से उत्पन्न पर्वत पर, स्वर्ण-पंखों वाले पक्षियों के झुंड-के-झुंड अपने स्वेच्छा-विहार से तुम्हारे लिए कौतूहलजनक तथा मधुर, तरंगित स्वरों से हर्षपूर्वक गाये जाने योग्य गीत प्रस्तुत करेंगे।

श्लोक 29 (shiva.rudra.42.29)

सिद्धाङ्गनास्ते रचितासना भुवं काङ्क्षन्ति चैवोपहृतं सकौतुकम् । स्वेच्छाविहारे मणिकुट्टिमे गिरौ कुर्वन्ति चेष्यन्ति फलादिदानकैः

siddhāṅganāste racitāsanā bhuvaṁ kāṅkṣanti caivopahṛtaṁ sakautukam | svecchāvihāre maṇikuṭṭime girau kurvanti ceṣyanti phalādidānakaiḥ

वहाँ सिद्ध-स्त्रियाँ आसन बिछाकर भूमि पर बैठेंगी और कौतूहलपूर्वक अर्पित वस्तुओं की कामना करेंगी; मणिजड़ित भूमि वाले उस पर्वत पर स्वेच्छा-विहार करते हुए वे फल आदि अर्पण से तुम्हें प्रसन्न करेंगी।

श्लोक 30 (shiva.rudra.42.30)

फणीन्द्रकन्या गिरिकन्यकाश्च या नागकन्याश्च तुरङ्गमुख्याः । सर्वास्तु तास्ते सततं सहायतां समाचरिष्यन्त्यनुमोदविभ्रमैः

phaṇīndrakanyā girikanyakāśca yā nāgakanyāśca turaṅgamukhyāḥ | sarvāstu tāste satataṁ sahāyatāṁ samācariṣyantyanumodavibhramaiḥ

सर्प-श्रेष्ठों की कन्याएँ, पर्वत-कन्याएँ, नाग-कन्याएँ तथा अश्वमुखी कन्याएँ — ये सब सदैव आनन्दपूर्ण विलास के साथ तुम्हारी सेवा में सहायक बनेंगी।

श्लोक 31 (shiva.rudra.42.31)

रूपं तदेवमतुलं वदनं सुचारु दृष्ट्वाङ्गना निजवपुर्निजकान्तिसह्यम् । हेला निजे वपुषि रूपगणेषु नित्यं कर्तार इत्यनिमिषेक्षणचारुरूपाः

rūpaṁ tadevamatulaṁ vadanaṁ sucāru dṛṣṭvāṅganā nijavapurnijakāntisahyam | helā nije vapuṣi rūpagaṇeṣu nityaṁ kartāra ityanimiṣekṣaṇacārurūpāḥ

तुम्हारा वह अनुपम रूप और सुन्दर मुख देखकर, अन्य देवांगनाएँ अपने ही सौन्दर्य को तुच्छ मानकर, अपने रूप के प्रति उपेक्षा करने लगेंगी और अपलक नेत्रों से तुम्हारे सुन्दर रूप को ही निहारती रहेंगी।

श्लोक 32 (shiva.rudra.42.32)

या मेनका पर्वतराज जाया रूपैर्गुणैः ख्यातवती त्रिलोके । सा चापि ते तत्र मनोऽनुमोदं नित्यं करिष्यत्यनुनाथनाद्यैः

yā menakā parvatarāja jāyā rūpairguṇaiḥ khyātavatī triloke | sā cāpi te tatra mano'numodaṁ nityaṁ kariṣyatyanunāthanādyaiḥ

पर्वतराज की पत्नी मेनका, जो अपने रूप और गुणों से त्रिलोक में विख्यात हैं, वे भी वहाँ तुम्हारे मन को सदैव विनय-वचनों आदि से प्रसन्न करेंगी।

श्लोक 33 (shiva.rudra.42.33)

पुरस्थवर्गैर्गिरिराजवन्द्यैः प्रीतिं विचिन्वद्भिरुदाररूपाम् । शिक्षा सदा ते खलु शोचितापि कार्यान्वहं प्रीतियुता गुणाद्यैः

purasthavargairgirirājavandyaiḥ prītiṁ vicinvadbhirudārarūpām | śikṣā sadā te khalu śocitāpi kāryānvahaṁ prītiyutā guṇādyaiḥ

पर्वतराज के आदरणीय परिजन तुम्हारी उदार प्रसन्नता का सदैव ध्यान रखते हुए, गुणों और शिक्षा से युक्त होकर प्रतिदिन प्रेमपूर्वक तुम्हारी सेवा करेंगे।

श्लोक 34 (shiva.rudra.42.34)

विचित्रैः कोकिलालापमोदैः कुञ्जगणावृतम् । सदा वसन्तप्रभवं गन्तुमिच्छसि किं प्रिये

vicitraiḥ kokilālāpamodaiḥ kuñjagaṇāvṛtam | sadā vasantaprabhavaṁ gantumicchasi kiṁ priye

हे प्रिये! क्या तुम विविध कोयलों की मधुर बोली से आनन्दित, कुंजों से घिरे तथा सदा वसन्त-सम्पन्न उस स्थान पर जाना चाहती हो?

श्लोक 35 (shiva.rudra.42.35)

नानाबहुजलापूर्णसरः शीतसमावृतम् । पद्मिनीशतशोयुक्तमचलेन्द्रं हिमालयम्

nānābahujalāpūrṇasaraḥ śītasamāvṛtam | padminīśataśoyuktamacalendraṁ himālayam

वह हिमालय पर्वतराज अनेक जलपूर्ण सरोवरों से युक्त, शीतलता से आच्छादित तथा सैकड़ों कमलिनियों से सुशोभित है।

श्लोक 36 (shiva.rudra.42.36)

सर्वकामप्रदैर्वृक्षैः शाद्वलैः कल्पसंज्ञकैः । सक्षणं पश्य कुसुमान्यथाश्वकरिगोव्रजम्

sarvakāmapradairvṛkṣaiḥ śādvalaiḥ kalpasaṁjñakaiḥ | sakṣaṇaṁ paśya kusumānyathāśvakarigovrajam

वहाँ के वृक्ष और हरी दूब सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले कल्पवृक्ष के समान हैं; वहाँ के फूलों को देखो, तथा अश्वों, हाथियों और गौओं के झुंडों को भी।

श्लोक 37 (shiva.rudra.42.37)

प्रशान्तश्वापदगणं मुनिभिर्यतिभिर्वृतम् । देवालये महामाये नानामृगगणैर्युतम्

praśāntaśvāpadagaṇaṁ munibhiryatibhirvṛtam | devālaye mahāmāye nānāmṛgagaṇairyutam

वहाँ हिंसक पशुओं के समूह भी शान्त हैं, मुनियों और यतियों से वह घिरा हुआ है; हे महामाये! वह देवालयों तथा नाना प्रकार के मृग-समूहों से युक्त है।

श्लोक 38 (shiva.rudra.42.38)

स्फाटिकैः स्वर्णवप्राद्यै राजतैश्च विराजितम् । मानसादिसरोरङ्गैरभितः परिशोभितम्

sphāṭikaiḥ svarṇavaprādyai rājataiśca virājitam | mānasādisaroraṅgairabhitaḥ pariśobhitam

वह स्फटिक, सोने के तटबन्धों और रजत से सुशोभित है, तथा मानसरोवर आदि सरोवरों से चारों ओर सुशोभित है।

श्लोक 39 (shiva.rudra.42.39)

हिरण्मयै रत्ननालैः पङ्कजैर्मुकुलैर्वृतम् । शिशुमारैस्तथासङ्ख्यैः कच्छपैर्मकरैः करैः

hiraṇmayai ratnanālaiḥ paṅkajairmukulairvṛtam | śiśumāraistathāsaṅkhyaiḥ kacchapairmakaraiḥ karaiḥ

वह सुवर्णमय, रत्न-नालों वाले कमल-कलियों से युक्त है, तथा असंख्य शिशुमार, कछुओं, मगरों और मत्स्यों से भरा हुआ है।

श्लोक 40 (shiva.rudra.42.40)

निषेवितं मञ्जुलैश्च तथा नीलोत्पलादिभिः । देवेशि तस्मान्मुक्तैश्च सर्वगन्धैश्च कुङ्कुमैः

niṣevitaṁ mañjulaiśca tathā nīlotpalādibhiḥ | deveśi tasmānmuktaiśca sarvagandhaiśca kuṅkumaiḥ

हे देवेशि! वह सुन्दर नीलकमलों आदि से युक्त है, तथा वहाँ से मुक्त होने वाली सभी सुगन्धों और केसर से सुवासित है।

श्लोक 41 (shiva.rudra.42.41)

लसद्गन्धजलैः शुभ्रैरापूर्णैः स्वच्छकान्तिभिः । शाद्वलैस्तरुणैस्तुङ्गैस्तीरस्थैरुपशोभितम्

lasadgandhajalaiḥ śubhrairāpūrṇaiḥ svacchakāntibhiḥ | śādvalaistaruṇaistuṅgaistīrasthairupaśobhitam

वह चमकते हुए सुगन्धित, स्वच्छ और शुभ्र जल से परिपूर्ण है, तथा तट पर स्थित ऊँची हरी दूब से सुशोभित है।

श्लोक 42 (shiva.rudra.42.42)

नृत्यद्भिरिव शाखोटैर्वर्जयन्तं स्वसम्भवम् । कामदेवैः सारसैश्च मत्तचक्राङ्गशोभितैः

nṛtyadbhiriva śākhoṭairvarjayantaṁ svasambhavam | kāmadevaiḥ sārasaiśca mattacakrāṅgaśobhitaiḥ

वहाँ के शाखोट वृक्ष मानो नृत्य करते हुए अपने स्वभाव को भी त्याग देते हैं; वह स्थान चक्रवाक पक्षियों, सारसों तथा मदमत्त हंसों से सुशोभित है।

श्लोक 43 (shiva.rudra.42.43)

मधुराराविभिर्मोदकारिभिर्भ्रमरादिभिः । शब्दायमानं च मुदा कामोद्दीपनकारकम्

madhurārāvibhirmodakāribhirbhramarādibhiḥ | śabdāyamānaṁ ca mudā kāmoddīpanakārakam

मधुर गुंजार करने वाले, आनन्द देने वाले भ्रमरों आदि के शब्दों से वह गुंजित है, और वह प्रेम को उद्दीप्त करने वाला है।

श्लोक 44 (shiva.rudra.42.44)

वासवस्य कुबेरस्य यमस्य वरुणस्य च । अग्नेः कोणपराजस्य मारुतस्य परस्य च

vāsavasya kuberasya yamasya varuṇasya ca | agneḥ koṇaparājasya mārutasya parasya ca

वहाँ इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण, अग्नि, राक्षसराज तथा वायु आदि परम देवताओं के भी निवास-स्थान हैं।

श्लोक 45 (shiva.rudra.42.45)

पुरीभिः शोभिशिखरं मेरोरुच्चैः सुरालयम् । रम्भाशचीमेनकादिरम्भोरुगणसेवितम्

purībhiḥ śobhiśikharaṁ meroruccaiḥ surālayam | rambhāśacīmenakādirambhorugaṇasevitam

उसका शिखर मेरु पर्वत के समान अपनी पुरियों से सुशोभित एवं देवताओं का उच्च निवास-स्थान है, जो रम्भा, शची, मेनका आदि सुन्दरी अप्सराओं के समूह द्वारा सेवित है।

श्लोक 46 (shiva.rudra.42.46)

किं त्वमिच्छसि सर्वेषां पर्वतानां हि भूभृताम् । सारभूते महारम्ये संविहर्तुं महागिरौ

kiṁ tvamicchasi sarveṣāṁ parvatānāṁ hi bhūbhṛtām | sārabhūte mahāramye saṁvihartuṁ mahāgirau

क्या तुम समस्त पर्वतों में सारभूत, अत्यंत रमणीय उस महान पर्वत पर विहार करना चाहती हो?

श्लोक 47 (shiva.rudra.42.47)

तत्र देवी सखियुता साप्सरोगणमण्डिता । नित्यं करिष्यति शची तव योग्यां सहायताम्

tatra devī sakhiyutā sāpsarogaṇamaṇḍitā | nityaṁ kariṣyati śacī tava yogyāṁ sahāyatām

वहाँ अप्सराओं के समूह से सुशोभित तथा सखियों सहित देवी शची सदैव तुम्हारी उचित सहायता करेंगी।

श्लोक 48 (shiva.rudra.42.48)

अथवा मम कैलासे पर्वतेन्द्रे सदाश्रये । स्थानमिच्छसि वित्तेशपुरीपरिविराजिते

athavā mama kailāse parvatendre sadāśraye | sthānamicchasi vitteśapurīparivirājite

अथवा क्या तुम मेरे सदा के आश्रयस्थान, कुबेर की पुरी से सुशोभित पर्वतेन्द्र कैलास पर निवास चाहती हो?

श्लोक 49 (shiva.rudra.42.49)

गङ्गाजलौघप्रयते पूर्णचन्द्रसमप्रभे । दरीषु सानुषु सदा ब्रह्मकन्याभ्युदीरिते

gaṅgājalaughaprayate pūrṇacandrasamaprabhe | darīṣu sānuṣu sadā brahmakanyābhyudīrite

वह गंगा के जल-प्रवाह से पवित्र, पूर्णचन्द्र के समान कान्तिमान है; उसकी गुफाओं और शिखरों में सदैव ब्रह्मकन्या गंगा का घोष गूँजता रहता है।

श्लोक 50 (shiva.rudra.42.50)

नानामृगगणैर्युक्ते पद्माकरशतावृते । सर्वैर्गुणैश्च सद्वस्तुसुमेरोरपि सुन्दरे

nānāmṛgagaṇairyukte padmākaraśatāvṛte | sarvairguṇaiśca sadvastusumerorapi sundare

वह अनेक मृग-समूहों से युक्त, सैकड़ों कमल-सरोवरों से घिरा हुआ है, तथा अपने सभी उत्तम गुणों में सुमेरु से भी अधिक सुन्दर है।

श्लोक 51 (shiva.rudra.42.51)

स्थानेष्वेतेषु यत्रापि तवान्तःकरणे स्पृहा । तं द्रुतं मे समाचक्ष्व वासकर्तास्मि तत्र ते

sthāneṣveteṣu yatrāpi tavāntaḥkaraṇe spṛhā | taṁ drutaṁ me samācakṣva vāsakartāsmi tatra te

इन सभी स्थानों में से जिसकी भी इच्छा तुम्हारे अन्तःकरण में हो, वह मुझे शीघ्र बताओ; मैं वहीं तुम्हारे लिए निवास बना दूँगा।

श्लोक 52 (shiva.rudra.42.52)

ब्रह्मोवाच । इतीरिते शङ्करेण तदा दाक्षायणी शनैः । इदमाह महादेवं लक्षणं स्वप्रकाशनम्

brahmovāca | itīrite śaṅkareṇa tadā dākṣāyaṇī śanaiḥ | idamāha mahādevaṁ lakṣaṇaṁ svaprakāśanam

ब्रह्मा ने कहा — शंकर के इस प्रकार कहने पर, दाक्षायणी ने धीरे से महादेव से अपने मन का यह संकेत प्रकट करते हुए कहा।

श्लोक 53 (shiva.rudra.42.53)

सत्युवाच । हिमाद्रावेव वसितुमहमिच्छे त्वया सह । नचिरात्कुरु संवासं तस्मिन्नेव महागिरौ

satyuvāca | himādrāveva vasitumahamicche tvayā saha | nacirātkuru saṁvāsaṁ tasminneva mahāgirau

सती ने कहा — मैं आपके साथ हिमाचल पर ही निवास करना चाहती हूँ; बिना विलम्ब किये उसी महान पर्वत पर हमारे निवास की व्यवस्था कीजिए।

श्लोक 54 (shiva.rudra.42.54)

ब्रह्मोवाच । अथ तद्वाक्यमाकर्ण्य हरः परममोहितः । हिमाद्रिशिखरं तुङ्गं दाक्षायण्या समं ययौ

brahmovāca | atha tadvākyamākarṇya haraḥ paramamohitaḥ | himādriśikharaṁ tuṅgaṁ dākṣāyaṇyā samaṁ yayau

ब्रह्मा ने कहा — तत्पश्चात् उनका वह वचन सुनकर, अत्यंत प्रेममुग्ध हर, दाक्षायणी के साथ हिमाचल के ऊँचे शिखर की ओर चल पड़े।

श्लोक 55 (shiva.rudra.42.55)

सिद्धाङ्गनागणयुतमगम्यं चैव पक्षिभिः । अगमच्छिखरं रम्यं सरसीवनराजितम्

siddhāṅganāgaṇayutamagamyaṁ caiva pakṣibhiḥ | agamacchikharaṁ ramyaṁ sarasīvanarājitam

वे सिद्ध-स्त्रियों के समूह से युक्त, पक्षियों के लिए भी दुर्गम, सरोवरों और वनों से सुशोभित उस रमणीय शिखर पर पहुँचे।

श्लोक 56 (shiva.rudra.42.56)

विचित्ररूपैः कमलैः शिखरं रत्नकर्बुरम् । बालार्कसदृशं शम्भुराससाद सतीसखः

vicitrarūpaiḥ kamalaiḥ śikharaṁ ratnakarburam | bālārkasadṛśaṁ śambhurāsasāda satīsakhaḥ

सती के सखा शम्भु उस रत्नों से चित्रित शिखर पर पहुँचे, जो नाना प्रकार के कमलों से युक्त तथा उदीयमान सूर्य के समान कान्तिमान था।

श्लोक 57 (shiva.rudra.42.57)

स्फटिकाभ्रमये तस्मिन् शाद्वलद्रुमराजिते । विचित्रपुष्पावलिभिः सरसीभिश्च संयुते

sphaṭikābhramaye tasmin śādvaladrumarājite | vicitrapuṣpāvalibhiḥ sarasībhiśca saṁyute

वह शिखर स्फटिक और बादलों के समान श्वेत, हरी दूब और वृक्षों की पंक्तियों से सुशोभित तथा विचित्र पुष्पों की मालाओं और सरोवरों से युक्त था।

श्लोक 58 (shiva.rudra.42.58)

प्रफुल्लतरुशाखाग्रं गुञ्जद् भ्रमरसेवितम् । पङ्केरुहैः प्रफुल्लैश्च नीलोत्पलचयैस्तथा

praphullataruśākhāgraṁ guñjad bhramarasevitam | paṅkeruhaiḥ praphullaiśca nīlotpalacayaistathā

वहाँ वृक्षों की शाखाओं के अग्रभाग पुष्पों से खिले हुए थे, भ्रमर गुंजार कर रहे थे, तथा वह स्थान खिले हुए कमलों और नीलकमलों के समूहों से युक्त था।

श्लोक 59 (shiva.rudra.42.59)

शोभितं चक्रवाकाद्यैः कादम्बैर्हंससङ्कुलैः । प्रमत्तसारसैः क्रौञ्चैर्नीलस्कन्धैश्च शब्दितैः

śobhitaṁ cakravākādyaiḥ kādambairhaṁsasaṅkulaiḥ | pramattasārasaiḥ krauñcairnīlaskandhaiśca śabditaiḥ

वह चक्रवाक आदि पक्षियों, कादम्ब बत्तखों, हंसों के समूह, मदमत्त सारसों, क्रौंच पक्षियों तथा नीलकंठ पक्षियों के कलरव से सुशोभित था।

श्लोक 60 (shiva.rudra.42.60)

पुंस्कोकिलानां निनदैर्मधुरैर्गणसेवितैः । तुरङ्गवदनैः सिद्धैरप्सरोभिश्च गुह्यकैः

puṁskokilānāṁ ninadairmadhurairgaṇasevitaiḥ | turaṅgavadanaiḥ siddhairapsarobhiśca guhyakaiḥ

वहाँ नर कोयलों के मधुर स्वर गूँजते थे, तथा वह अश्वमुखी सिद्धों, अप्सराओं और गुह्यकों के समूहों से सेवित था।

श्लोक 61 (shiva.rudra.42.61)

विद्याधरीभिर्देवीभिः किन्नरीभिर्विहारितम् । पुरन्ध्रीभिः पार्वतीभिः कन्याभिरभिसङ्गतम्

vidyādharībhirdevībhiḥ kinnarībhirvihāritam | purandhrībhiḥ pārvatībhiḥ kanyābhirabhisaṅgatam

वह विद्याधरियों, देवियों और किन्नरियों द्वारा विहार का स्थान था, तथा गृहस्थ स्त्रियों, पर्वत-कन्याओं और अन्य कन्याओं से युक्त था।

श्लोक 62 (shiva.rudra.42.62)

विपञ्चीतान्त्रिकामत्तमृदङ्गपटहस्वनैः । नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च कौतुकोत्थैश्च शोभितम्

vipañcītāntrikāmattamṛdaṅgapaṭahasvanaiḥ | nṛtyadbhirapsarobhiśca kautukotthaiśca śobhitam

वह वीणा, तानपूरे, मृदंग और पटह की ध्वनियों से तथा नृत्य करती हुई अप्सराओं के कौतुकपूर्ण उल्लास से सुशोभित था।

श्लोक 63 (shiva.rudra.42.63)

देविकाभिर्दीर्घिकाभिर्गन्धिभिः सुसमावृतम् । प्रफुल्लकुसुमैर्नित्यं सुकुञ्जैरुपशोभितम्

devikābhirdīrghikābhirgandhibhiḥ susamāvṛtam | praphullakusumairnityaṁ sukuñjairupaśobhitam

वह सुगन्धित छोटी-छोटी बावड़ियों और दीर्घिकाओं से घिरा हुआ था, तथा नित्य खिले हुए फूलों से युक्त सुन्दर कुंजों से सुशोभित था।

श्लोक 64 (shiva.rudra.42.64)

शैलराजपुराभ्यर्णे शिखरे वृषभध्वजः । सह सत्या चिरं रेमे एवम्भूतेषु शोभनम्

śailarājapurābhyarṇe śikhare vṛṣabhadhvajaḥ | saha satyā ciraṁ reme evambhūteṣu śobhanam

पर्वतराज की पुरी के समीप उस शोभायमान शिखर पर, वृषभध्वज सती के साथ दीर्घ काल तक विहार करते रहे।

श्लोक 65 (shiva.rudra.42.65)

तस्मिन् स्वर्गसमे स्थाने दिव्यमानेन शङ्करः । दशवर्षसहस्राणि रेमे सत्या समं मुदा

tasmin svargasame sthāne divyamānena śaṅkaraḥ | daśavarṣasahasrāṇi reme satyā samaṁ mudā

उस स्वर्ग के समान स्थान पर, दिव्य गणना के अनुसार शंकर ने सती के साथ दस हजार वर्षों तक हर्षपूर्वक विहार किया।

श्लोक 66 (shiva.rudra.42.66)

स कदाचित्ततः स्थानादन्यद्याति स्थलं हरः । कदाचिन्मेरुशिखरं देवीदेववृतं सदा

sa kadācittataḥ sthānādanyadyāti sthalaṁ haraḥ | kadācinmeruśikharaṁ devīdevavṛtaṁ sadā

कभी हर उस स्थान से किसी अन्य स्थान को जाते, और कभी सदा देवताओं से घिरे हुए मेरु के शिखर पर जाते।

श्लोक 67 (shiva.rudra.42.67)

द्वीपान्नाना तथोद्यानवनानि वसुधातलम् । गत्वा गत्वा पुनस्तत्राभ्येत्य रेमे सतीसुखम्

dvīpānnānā tathodyānavanāni vasudhātalam | gatvā gatvā punastatrābhyetya reme satīsukham

विभिन्न द्वीपों, उद्यानों, वनों तथा पृथ्वीतल के अन्य स्थानों में जाकर, वे बार-बार वहीं लौट आते और सती के साथ सुखपूर्वक विहार करते थे।

श्लोक 68 (shiva.rudra.42.68)

न यज्ञे स दिवारात्रौ न ब्रह्मणि तपस्समम् । सत्यां हि मनसा शम्भुः प्रीतिमेव चकार ह

na yajñe sa divārātrau na brahmaṇi tapassamam | satyāṁ hi manasā śambhuḥ prītimeva cakāra ha

शम्भु ने न तो यज्ञ में, न दिन-रात्रि में, न ब्रह्म में, न तप में — इनमें से किसी में भी सती के प्रति अपने मन के अनुराग के समान प्रीति नहीं की।

श्लोक 69 (shiva.rudra.42.69)

एवं महादेवमुखं सत्यपश्यत्स्म सर्वदा । महादेवोऽपि सर्वत्र सदाद्राक्षीत्सतीमुखम्

evaṁ mahādevamukhaṁ satyapaśyatsma sarvadā | mahādevo'pi sarvatra sadādrākṣītsatīmukham

इस प्रकार सती सर्वदा महादेव के मुख को ही निहारती रहती थीं, और महादेव भी सर्वत्र सदा सती के मुख को ही देखते रहते थे।

श्लोक 70 (shiva.rudra.42.70)

एवमन्योन्यसंसर्गादनुरागमहीरुहम् । वर्धयामासतुः कालीशिवौ भावाम्बुसेचनैः

evamanyonyasaṁsargādanurāgamahīruham | vardhayāmāsatuḥ kālīśivau bhāvāmbusecanaiḥ

इस प्रकार परस्पर सहवास से, काली और शिव दोनों ने अपने हार्दिक भावों के जल-सिंचन से अनुराग रूपी वृक्ष को निरन्तर बढ़ाया।

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