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रुद्र संहिता · अध्याय 43

भक्ति-प्रभाव वर्णन

अध्याय 42अध्याय-सूचीअध्याय 44

श्लोक 1 (shiva.rudra.43.1)

ब्रह्मोवाच । एवं कृत्वा विहारं वै शङ्करेण च सा सती । सन्तुष्टा साभवच्चाति विरागा समजायत

brahmovāca | evaṁ kṛtvā vihāraṁ vai śaṅkareṇa ca sā satī | santuṣṭā sābhavaccāti virāgā samajāyata

ब्रह्मा ने कहा — इस प्रकार शंकर के साथ विहार करके सती अत्यंत संतुष्ट हो गयीं, और साथ ही उनमें अत्यंत वैराग्य भी उत्पन्न हो गया।

श्लोक 2 (shiva.rudra.43.2)

एकस्मिन्दिवसे देवी सती रहसि सङ्गता । शिवं प्रणम्य सद्भक्त्या न्यस्योच्चैः सुकृताञ्जलिः

ekasmindivase devī satī rahasi saṅgatā | śivaṁ praṇamya sadbhaktyā nyasyoccaiḥ sukṛtāñjaliḥ

एक दिन एकांत में शिव के साथ बैठी हुई देवी सती ने सच्ची भक्ति से प्रणाम कर, हाथ जोड़कर ऊँचे स्वर में कहा।

श्लोक 3 (shiva.rudra.43.3)

सुप्रसन्नं प्रभुं नत्वा सा दक्षतनया सती । उवाच साञ्जलिर्भक्त्या विनयावनता ततः

suprasannaṁ prabhuṁ natvā sā dakṣatanayā satī | uvāca sāñjalirbhaktyā vinayāvanatā tataḥ

दक्ष-पुत्री सती ने प्रसन्नचित्त प्रभु को प्रणाम कर, हाथ जोड़े हुए, भक्तिपूर्वक विनम्रता से झुककर तब यह कहा।

श्लोक 4 (shiva.rudra.43.4)

सत्युवाच । देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो । दीनोद्धर महायोगिन् कृपां कुरु ममोपरि

satyuvāca | devadeva mahādeva karuṇāsāgara prabho | dīnoddhara mahāyogin kṛpāṁ kuru mamopari

सती ने कहा — हे देवाधिदेव! हे महादेव! हे करुणासागर प्रभो! हे दीनोद्धारक! हे महायोगिन्! मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 5 (shiva.rudra.43.5)

त्वं परः पुरुषः स्वामी रजःसत्त्वतमः परः । निर्गुणः सगुणः साक्षी निर्विकारी महाप्रभुः

tvaṁ paraḥ puruṣaḥ svāmī rajaḥsattvatamaḥ paraḥ | nirguṇaḥ saguṇaḥ sākṣī nirvikārī mahāprabhuḥ

आप परम पुरुष, स्वामी, तथा रज-सत्त्व-तम से परे हैं; आप निर्गुण भी हैं और सगुण भी, साक्षी, निर्विकारी और महाप्रभु हैं।

श्लोक 6 (shiva.rudra.43.6)

धन्याहं ते प्रिया जाता कामिनी सुविहारिणी । जातस्त्वं मे पतिः स्वामिन् भक्तवात्सल्यतो हर

dhanyāhaṁ te priyā jātā kāminī suvihāriṇī | jātastvaṁ me patiḥ svāmin bhaktavātsalyato hara

मैं धन्य हूँ कि आपकी प्रिया, प्रेममयी सहचरी बनी हूँ; हे स्वामिन्! हे हर! भक्तों पर वात्सल्य के कारण ही आप मेरे पति बने हैं।

श्लोक 7 (shiva.rudra.43.7)

कृतो बहुसमा नाथ विहारः परमस्त्वया । सन्तुष्टाहं महेशान निवृत्तं मे मनस्ततः

kṛto bahusamā nātha vihāraḥ paramastvayā | santuṣṭāhaṁ maheśāna nivṛttaṁ me manastataḥ

हे नाथ! आपने अनेक वर्षों तक मेरे साथ परम विहार किया; हे महेश! मैं अब संतुष्ट हो गयी हूँ, और मेरा मन अब उससे निवृत्त हो गया है।

श्लोक 8 (shiva.rudra.43.8)

ज्ञातुमिच्छामि देवेश परं तत्त्वं सुखावहम् । येन संसारदुःखाद्वै तरेज्जीवोऽञ्जसा हर

jñātumicchāmi deveśa paraṁ tattvaṁ sukhāvaham | yena saṁsāraduḥkhādvai tarejjīvo'ñjasā hara

हे देवेश! अब मैं उस परम सुखदायी तत्त्व को जानना चाहती हूँ, जिससे हे हर! जीव संसार के दुःख से सहज ही पार हो सके।

श्लोक 9 (shiva.rudra.43.9)

यत्कृत्वा विषयी जीवः स लभेत्परमं पदम् । संसारी न भवेन्नाथ तत्त्वं वद कृपां कुरु

yatkṛtvā viṣayī jīvaḥ sa labhetparamaṁ padam | saṁsārī na bhavennātha tattvaṁ vada kṛpāṁ kuru

जिसे करने से विषयासक्त जीव भी परम पद प्राप्त कर ले और पुनः संसारी न बने — हे नाथ! वह तत्त्व मुझे बताइए, मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 10 (shiva.rudra.43.10)

ब्रह्मोवाच । इत्यपृच्छत्स्म सद्भक्त्या शङ्करं सा सती मुने । आदिशक्तिर्महेशानी जीवोद्धाराय केवलम्

brahmovāca | ityapṛcchatsma sadbhaktyā śaṅkaraṁ sā satī mune | ādiśaktirmaheśānī jīvoddhārāya kevalam

ब्रह्मा ने कहा — हे मुने! आदिशक्ति महेश्वरी सती ने केवल जीवों के उद्धार के लिए ही सच्ची भक्ति से शंकर से इस प्रकार पूछा।

श्लोक 11 (shiva.rudra.43.11)

आकर्ण्य तच्छिवः स्वामी स्वेच्छयोपात्तविग्रहः । अवोचत्परमप्रीतः सतीं योगविरक्तधीः

ākarṇya tacchivaḥ svāmī svecchayopāttavigrahaḥ | avocatparamaprītaḥ satīṁ yogaviraktadhīḥ

उसे सुनकर, अपनी इच्छा से देह धारण करने वाले स्वामी शिव अत्यंत प्रसन्न होकर, योग और वैराग्य से युक्त बुद्धि वाली सती से बोले।

श्लोक 12 (shiva.rudra.43.12)

शिव उवाच । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि दाक्षायणि महेश्वरि । परं तत्त्वं तदेवानुशयी मुक्तो भवेद्यतः

śiva uvāca | śṛṇu devi pravakṣyāmi dākṣāyaṇi maheśvari | paraṁ tattvaṁ tadevānuśayī mukto bhavedyataḥ

शिव ने कहा — हे देवि! हे दाक्षायणि! हे महेश्वरि! सुनो, मैं वह परम तत्त्व बताता हूँ, जिसका अनुसरण करने से जीव मुक्त हो जाता है।

श्लोक 13 (shiva.rudra.43.13)

परतत्त्वं विजानीहि विज्ञानं परमेश्वरी । द्वितीयं स्मरणं यत्र नाहं ब्रह्मेति शुद्धधीः

paratattvaṁ vijānīhi vijñānaṁ parameśvarī | dvitīyaṁ smaraṇaṁ yatra nāhaṁ brahmeti śuddhadhīḥ

हे परमेश्वरी! जान लो कि वह परम तत्त्व विज्ञान ही है, जिसमें द्वैत का स्मरण नहीं रहता, तथा जिसमें शुद्ध बुद्धि से यह भाव उत्पन्न होता है कि "मैं ब्रह्म ही हूँ, इससे भिन्न कुछ नहीं।"

श्लोक 14 (shiva.rudra.43.14)

तद्दुर्लभं त्रिलोकेऽस्मिंस्तज्ज्ञाता विरलः प्रिये । यादृशो यः स दासोऽहं ब्रह्म साक्षात्परात्परः

taddurlabhaṁ triloke'smiṁstajjñātā viralaḥ priye | yādṛśo yaḥ sa dāso'haṁ brahma sākṣātparātparaḥ

हे प्रिये! वह इन तीनों लोकों में अत्यंत दुर्लभ है, और उसका ज्ञाता भी विरला ही है; जो भी वैसा ज्ञानी है, उसका मैं दास हूँ, यद्यपि मैं स्वयं साक्षात् परात्पर ब्रह्म हूँ।

श्लोक 15 (shiva.rudra.43.15)

तन्माता मम भक्तिश्च भुक्तिमुक्तिफलप्रदा । सुलभा मत्प्रसादाद्धि नवधा सा प्रकीर्तिता

tanmātā mama bhaktiśca bhuktimuktiphalapradā | sulabhā matprasādāddhi navadhā sā prakīrtitā

उस ज्ञान की जननी मेरी भक्ति ही है, जो भोग और मोक्ष दोनों फल देने वाली है; वह मेरी कृपा से सुलभ है, और नौ प्रकार की कही गयी है।

श्लोक 16 (shiva.rudra.43.16)

भक्तौ ज्ञाने न भेदो हि तत्कर्तुः सर्वदा सुखम् । विज्ञानं न भवत्येव सति भक्तिविरोधिनः

bhaktau jñāne na bhedo hi tatkartuḥ sarvadā sukham | vijñānaṁ na bhavatyeva sati bhaktivirodhinaḥ

भक्ति और ज्ञान में वस्तुतः कोई भेद नहीं है; उसे करने वाले को सदैव सुख प्राप्त होता है। जहाँ भक्ति का विरोध हो, वहाँ विज्ञान कभी उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 17 (shiva.rudra.43.17)

भक्त्याधीः सदाहं वै तत्प्रभावाद् गृहेष्वपि । नीचानां जातिहीनानां यामि देवि न संशयः

bhaktyādhīḥ sadāhaṁ vai tatprabhāvād gṛheṣvapi | nīcānāṁ jātihīnānāṁ yāmi devi na saṁśayaḥ

हे देवि! मैं सदैव भक्ति के अधीन हूँ; उसी के प्रभाव से मैं नीच और जातिहीन लोगों के घरों में भी जाता हूँ, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 18 (shiva.rudra.43.18)

सा भक्तिर्द्विविधा देवि सगुणा निर्गुणा मता । वैधी स्वाभाविकी या या वरा सा त्ववरा स्मृता

sā bhaktirdvividhā devi saguṇā nirguṇā matā | vaidhī svābhāvikī yā yā varā sā tvavarā smṛtā

हे देवि! वह भक्ति दो प्रकार की मानी गयी है — सगुणा और निर्गुणा; तथा वह विधिपूर्वक और स्वाभाविक भी है, जिसमें स्वाभाविक भक्ति श्रेष्ठ तथा विधिपूर्वक भक्ति उससे निम्नतर कही गयी है।

श्लोक 19 (shiva.rudra.43.19)

नैष्ठिक्यनैष्ठिकी भेदाद् द्विविधे द्विविधे हि ते । षड्विधा नैष्ठिकी ज्ञेया द्वितीयैकविधा स्मृता

naiṣṭhikyanaiṣṭhikī bhedād dvividhe dvividhe hi te | ṣaḍvidhā naiṣṭhikī jñeyā dvitīyaikavidhā smṛtā

निष्ठायुक्त और निष्ठारहित के भेद से भी वे दोनों-दोनों प्रकार की हैं; उनमें निष्ठायुक्त भक्ति को छह प्रकार की तथा दूसरी को एक ही प्रकार की जानना चाहिए।

श्लोक 20 (shiva.rudra.43.20)

विहिताविहिताभेदात्तामनेकां विदुर्बुधाः । तयोर्बहुविधत्वाच्च तत्त्वं त्वन्यत्र वर्णितम्

vihitāvihitābhedāttāmanekāṁ vidurbudhāḥ | tayorbahuvidhatvācca tattvaṁ tvanyatra varṇitam

विहित और अविहित के भेद से विद्वानों ने उसे अनेक प्रकार का बताया है; उन दोनों की बहुविधता का वास्तविक तत्त्व अन्यत्र वर्णित है।

श्लोक 21 (shiva.rudra.43.21)

ते नवाङ्गे उभे ज्ञेये वर्णिते मुनिभिः प्रिये । वर्णयामि नवाङ्गानि प्रेमतः शृणु दक्षजे

te navāṅge ubhe jñeye varṇite munibhiḥ priye | varṇayāmi navāṅgāni premataḥ śṛṇu dakṣaje

हे प्रिये! उन दोनों प्रकार की भक्ति के नौ अंग मुनियों द्वारा वर्णित हैं और वे जानने योग्य हैं। हे दक्षजे! अब मैं प्रेमपूर्वक वे नवांग वर्णन करता हूँ, सुनो।

श्लोक 22 (shiva.rudra.43.22)

श्रवणं कीर्तनं चैव स्मरणं सेवनं तथा । दास्यं तथार्चनं देवि वन्दनं मम सर्वदा

śravaṇaṁ kīrtanaṁ caiva smaraṇaṁ sevanaṁ tathā | dāsyaṁ tathārcanaṁ devi vandanaṁ mama sarvadā

हे देवि! श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य, अर्चन, तथा मेरा सदैव वन्दन —

श्लोक 23 (shiva.rudra.43.23)

सख्यमात्मार्पणं चेति नवाङ्गानि विदुर्बुधाः । उपाङ्गानि शिवे तस्या बहूनि कथितानि वै

sakhyamātmārpaṇaṁ ceti navāṅgāni vidurbudhāḥ | upāṅgāni śive tasyā bahūni kathitāni vai

— सख्यभाव और आत्म-समर्पण, इन्हें विद्वानों ने भक्ति के नौ अंग कहा है। हे शिवे! उसके उपांग भी अनेक कहे गये हैं।

श्लोक 24 (shiva.rudra.43.24)

शृणु देवि नवाङ्गानां लक्षणानि पृथक् पृथक् । मम भक्तेर्मनो दत्त्वा भुक्तिमुक्तिप्रदानि हि

śṛṇu devi navāṅgānāṁ lakṣaṇāni pṛthak pṛthak | mama bhaktermano dattvā bhuktimuktipradāni hi

हे देवि! अब मन लगाकर सुनो मेरी भक्ति के उन नौ अंगों के अलग-अलग लक्षण, जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाले हैं।

श्लोक 25 (shiva.rudra.43.25)

कथादेर्नित्यसम्मानं कुर्वन्देहादिभिर्मुदा । स्थिरासनेन तत्पानं यत्तच्छ्रवणमुच्यते

kathādernityasammānaṁ kurvandehādibhirmudā | sthirāsanena tatpānaṁ yattacchravaṇamucyate

कथा आदि का नित्य सम्मान करते हुए, शरीर आदि से आनन्दपूर्वक स्थिर आसन में बैठकर उसका पान करना — यही श्रवण कहलाता है।

श्लोक 26 (shiva.rudra.43.26)

हृदाकाशेन सम्पश्यन् जन्मकर्माणि वै मम । प्रीत्योच्चोच्चारणं तेषामेतत्कीर्तनमुच्यते

hṛdākāśena sampaśyan janmakarmāṇi vai mama | prītyoccoccāraṇaṁ teṣāmetatkīrtanamucyate

हृदयाकाश में मेरे जन्म और कर्मों का साक्षात्कार करते हुए, प्रेमपूर्वक उनका उच्च स्वर में उच्चारण करना — यही कीर्तन कहलाता है।

श्लोक 27 (shiva.rudra.43.27)

व्यापकं देवि मां दृष्ट्वा नित्यं सर्वत्र सर्वदा । निर्भयत्वं सदा लोके स्मरणं तदुदाहृतम्

vyāpakaṁ devi māṁ dṛṣṭvā nityaṁ sarvatra sarvadā | nirbhayatvaṁ sadā loke smaraṇaṁ tadudāhṛtam

हे देवि! मुझे सर्वत्र और सदा व्याप्त देखकर, संसार में सदैव निर्भय रहना — यही स्मरण कहा गया है।

श्लोक 28 (shiva.rudra.43.28)

अरुणोदयमारभ्य सेवाकालेऽञ्चिता हृदा । निर्भयत्वं सदा लोके स्मरणं तदुदाहृतम्

aruṇodayamārabhya sevākāle'ñcitā hṛdā | nirbhayatvaṁ sadā loke smaraṇaṁ tadudāhṛtam

प्रातःकाल के अरुणोदय से लेकर सेवा के समय तक हृदय से समर्पित रहना — संसार में सदैव निर्भय रहना — यही स्मरण कहा गया है।

श्लोक 29 (shiva.rudra.43.29)

सदा सेव्यानुकूल्येन सेवनं तद्धि गोगणैः । हृदयामृतभोगेन प्रियं दास्यमुदाहृतम्

sadā sevyānukūlyena sevanaṁ taddhi gogaṇaiḥ | hṛdayāmṛtabhogena priyaṁ dāsyamudāhṛtam

सेव्य के अनुकूल आचरण के द्वारा गौओं आदि की सेवा के समान सदैव सेवा करना — यह सेवन कहलाता है; तथा हृदय के अमृत-भोग द्वारा प्रिय सेवा करना दास्य कहा गया है।

श्लोक 30 (shiva.rudra.43.30)

सदा भृत्यानुकूल्येन विधिना मे परात्मने । अर्पणं षोडशानां वै पाद्यादीनां तदर्चनम्

sadā bhṛtyānukūlyena vidhinā me parātmane | arpaṇaṁ ṣoḍaśānāṁ vai pādyādīnāṁ tadarcanam

सदैव सेवक के समान अनुकूल भाव से, विधिपूर्वक मुझ परमात्मा को पाद्य आदि सोलह उपचारों का अर्पण करना — यही अर्चन कहलाता है।

श्लोक 31 (shiva.rudra.43.31)

मन्त्रोच्चारणध्यानाभ्यां मनसा वचसा क्रमात् । यदष्टाङ्गेन भूस्पर्शं तद्वै वन्दनमुच्यते

mantroccāraṇadhyānābhyāṁ manasā vacasā kramāt | yadaṣṭāṅgena bhūsparśaṁ tadvai vandanamucyate

मन्त्रोच्चारण और ध्यान के द्वारा, मन और वाणी से क्रमपूर्वक, अष्टांग द्वारा भूमि का स्पर्श करना — यही वन्दन कहलाता है।

श्लोक 32 (shiva.rudra.43.32)

मङ्गलामङ्गलं यद्यत्करोतीतीश्वरो हि मे । सर्वं तन्मङ्गलायेति विश्वासः सख्यलक्षणम्

maṅgalāmaṅgalaṁ yadyatkarotītīśvaro hi me | sarvaṁ tanmaṅgalāyeti viśvāsaḥ sakhyalakṣaṇam

ईश्वर जो कुछ भी करता है, चाहे वह मंगलकारी हो या अमंगलकारी दिखायी दे, वह सब मेरे मंगल के लिए ही है — ऐसा विश्वास रखना ही सख्यभाव का लक्षण है।

श्लोक 33 (shiva.rudra.43.33)

कृत्वा देहादिकं तस्य प्रीत्यै सर्वं तदर्पणम् । निर्वाहाय च शून्यत्वं यत्तदात्मसमर्पणम्

kṛtvā dehādikaṁ tasya prītyai sarvaṁ tadarpaṇam | nirvāhāya ca śūnyatvaṁ yattadātmasamarpaṇam

शरीर आदि जो कुछ भी है, उसे उसकी प्रसन्नता के लिए सर्वस्व अर्पित कर देना, तथा निर्वाह के लिए भी अपने को शून्य समझना — यही आत्म-समर्पण है।

श्लोक 34 (shiva.rudra.43.34)

नवाङ्गानीति मद्भक्तेर्भुक्तिमुक्तिप्रदानि च । मम प्रियाणि चातीव ज्ञानोत्पत्तिकराणि च

navāṅgānīti madbhakterbhuktimuktipradāni ca | mama priyāṇi cātīva jñānotpattikarāṇi ca

ये मेरी भक्ति के नौ अंग हैं, जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाले हैं, मुझे अत्यंत प्रिय हैं, और ज्ञान की उत्पत्ति करने वाले भी हैं।

श्लोक 35 (shiva.rudra.43.35)

उपाङ्गानि च मद्भक्तेर्बहूनि कथितानि वै । बिल्वादिसेवनादीनि समूह्यानि विचारतः

upāṅgāni ca madbhakterbahūni kathitāni vai | bilvādisevanādīni samūhyāni vicārataḥ

मेरी भक्ति के अनेक उपांग भी कहे गये हैं, जैसे बिल्वपत्र आदि से सेवा करना; वे विचारपूर्वक ग्रहण करने योग्य हैं।

श्लोक 36 (shiva.rudra.43.36)

इत्थं साङ्गोपाङ्गभक्तिर्मम सर्वोत्तमा प्रिये । ज्ञानवैराग्यजननी मुक्तिदासी विराजते

itthaṁ sāṅgopāṅgabhaktirmama sarvottamā priye | jñānavairāgyajananī muktidāsī virājate

हे प्रिये! इस प्रकार अंगों और उपांगों सहित मेरी भक्ति ही सर्वोत्तम है; वह ज्ञान और वैराग्य को जन्म देने वाली और मुक्ति की दासी बनकर विराजमान है।

श्लोक 37 (shiva.rudra.43.37)

सर्वकर्मफलोत्पत्तिः सर्वदा त्वत्समप्रिया । यच्चित्ते सा स्थिता नित्यं सर्वदा सोऽति मत्प्रियः

sarvakarmaphalotpattiḥ sarvadā tvatsamapriyā | yaccitte sā sthitā nityaṁ sarvadā so'ti matpriyaḥ

सभी कर्मों के फल की उत्पत्ति सदैव उसी के समान प्रिय है; जिसके चित्त में वह नित्य स्थित रहती है, वह मुझे सदैव अत्यंत प्रिय है।

श्लोक 38 (shiva.rudra.43.38)

त्रैलोक्ये भक्तिसदृशः पन्था नास्ति सुखावहः । चतुर्युगेषु देवेशि कलौ तु सुविशेषतः

trailokye bhaktisadṛśaḥ panthā nāsti sukhāvahaḥ | caturyugeṣu deveśi kalau tu suviśeṣataḥ

हे देवेशि! तीनों लोकों में भक्ति के समान सुखदायी कोई मार्ग नहीं है; चारों युगों में भी, विशेषकर कलियुग में तो और भी अधिक।

श्लोक 39 (shiva.rudra.43.39)

कलौ तु ज्ञानवैराग्यौ वृद्धरूपौ निरुत्सवौ । ग्राहकाभावतो देवि जातौ जर्जरतामति

kalau tu jñānavairāgyau vṛddharūpau nirutsavau | grāhakābhāvato devi jātau jarjaratāmati

हे देवि! कलियुग में तो ज्ञान और वैराग्य वृद्ध रूप धारण किये हुए, उत्साहरहित हो गये हैं; ग्राहक के अभाव से वे दोनों अत्यंत जर्जर हो गये हैं।

श्लोक 40 (shiva.rudra.43.40)

कलौ प्रत्यक्षफलदा भक्तिः सर्वयुगेष्वपि । तत्प्रभावादहं नित्यं तद्वशो नात्र संशयः

kalau pratyakṣaphaladā bhaktiḥ sarvayugeṣvapi | tatprabhāvādahaṁ nityaṁ tadvaśo nātra saṁśayaḥ

कलियुग में भक्ति ही प्रत्यक्ष फल देने वाली है, यद्यपि वह सभी युगों में भी ऐसी ही है; उसी के प्रभाव से मैं सदैव उसके वश में रहता हूँ, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 41 (shiva.rudra.43.41)

यो भक्तिमान्पुमाँल्लोके सदाहं तत्सहायकृत् । विघ्नहर्ता रिपुस्तस्य दण्ड्यो नात्र च संशयः

yo bhaktimānpumā~lloke sadāhaṁ tatsahāyakṛt | vighnahartā ripustasya daṇḍyo nātra ca saṁśayaḥ

संसार में जो भी पुरुष भक्तिमान है, मैं सदैव उसका सहायक और विघ्नों का हरण करने वाला हूँ; उसका शत्रु दण्ड का भागी होता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 42 (shiva.rudra.43.42)

भक्तहेतोरहं देवि कालं क्रोधपरिप्लुतः । अदहं वह्निना नेत्रभवेन निजरक्षकः

bhaktahetorahaṁ devi kālaṁ krodhapariplutaḥ | adahaṁ vahninā netrabhavena nijarakṣakaḥ

हे देवि! भक्त के हेतु ही मैंने क्रोध से भरकर, अपने नेत्र से उत्पन्न अग्नि से काल को दग्ध कर दिया, अपने भक्त का रक्षक बनकर।

श्लोक 43 (shiva.rudra.43.43)

भक्तहेतोरहं देवि रव्युपर्यभवं किल । अतिक्रोधान्वितः शूलं गृहीत्वान्वजयं पुरा

bhaktahetorahaṁ devi ravyuparyabhavaṁ kila | atikrodhānvitaḥ śūlaṁ gṛhītvānvajayaṁ purā

हे देवि! भक्त के हेतु ही मैंने पूर्वकाल में अत्यंत क्रोधित होकर त्रिशूल उठाकर सूर्य पर भी आक्रमण किया था।

श्लोक 44 (shiva.rudra.43.44)

भक्तहेतोरहं देवि रावणं सगणं क्रुधा । त्यजामि स्म कृतो नैव पक्षपातो हि तस्य वै

bhaktahetorahaṁ devi rāvaṇaṁ sagaṇaṁ krudhā | tyajāmi sma kṛto naiva pakṣapāto hi tasya vai

हे देवि! भक्त के हेतु ही मैंने क्रोधवश रावण को उसके गणों सहित त्याग दिया था; उसके प्रति मैंने कोई पक्षपात नहीं किया।

श्लोक 45 (shiva.rudra.43.45)

भक्तहेतोरहं देवि व्यासं हि कुमतिग्रहम् । काश्या न्यसारयं क्रोधाद्दण्डयित्वा च नन्दिना

bhaktahetorahaṁ devi vyāsaṁ hi kumatigraham | kāśyā nyasārayaṁ krodhāddaṇḍayitvā ca nandinā

हे देवि! भक्त के हेतु ही मैंने दुर्बुद्धि से ग्रस्त व्यास को क्रोधवश नन्दी द्वारा दण्डित करवाकर काशी से बाहर निकलवा दिया था।

श्लोक 46 (shiva.rudra.43.46)

किं बहूक्तेन देवेशि भक्त्याधीनः सदा ह्यहम् । तत्कर्तुः पुरुषस्यातिवशगो नात्र संशयः

kiṁ bahūktena deveśi bhaktyādhīnaḥ sadā hyaham | tatkartuḥ puruṣasyātivaśago nātra saṁśayaḥ

हे देवेशि! अधिक कहने से क्या लाभ? मैं सदैव भक्ति के अधीन हूँ; उस भक्ति को करने वाले पुरुष के मैं सर्वथा वशीभूत रहता हूँ, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 47 (shiva.rudra.43.47)

ब्रह्मोवाच । इत्थमाकर्ण्य भक्तेस्तु महत्त्वं दक्षजा सती । जहर्षातीव मनसि प्रणनाम शिवं मुदा

brahmovāca | itthamākarṇya bhaktestu mahattvaṁ dakṣajā satī | jaharṣātīva manasi praṇanāma śivaṁ mudā

ब्रह्मा ने कहा — भक्ति की इस महिमा को सुनकर, दक्ष-पुत्री सती मन में अत्यंत हर्षित हुईं और आनन्दपूर्वक शिव को प्रणाम किया।

श्लोक 48 (shiva.rudra.43.48)

पुनः पप्रच्छ सद्भक्त्या तत्काण्डविषयं मुने । शास्त्रं सुखकरं लोके जीवोद्धारपरायणम्

punaḥ papraccha sadbhaktyā tatkāṇḍaviṣayaṁ mune | śāstraṁ sukhakaraṁ loke jīvoddhāraparāyaṇam

हे मुने! उन्होंने पुनः सच्ची भक्ति से उसी विषय से सम्बन्धित शास्त्र के बारे में पूछा, जो संसार में सुखदायी और जीवों के उद्धार में तत्पर है।

श्लोक 49 (shiva.rudra.43.49)

सयन्त्रमन्त्रशास्त्रं च तन्माहात्म्यं विशेषतः । अन्यानि धर्मवस्तूनि जीवोद्धारकराणि हि

sayantramantraśāstraṁ ca tanmāhātmyaṁ viśeṣataḥ | anyāni dharmavastūni jīvoddhārakarāṇi hi

उन्होंने यन्त्र और मन्त्र सहित शास्त्र के विषय में तथा विशेष रूप से उनकी महिमा के विषय में, तथा जीवों का उद्धार करने वाली अन्य धर्म-वस्तुओं के विषय में भी पूछा।

श्लोक 50 (shiva.rudra.43.50)

शङ्करोऽपि तदाकर्ण्य सतीप्रश्नं प्रहृष्टधीः । वर्णयामास सुप्रीत्या जीवोद्धाराय कृत्स्नशः

śaṅkaro'pi tadākarṇya satīpraśnaṁ prahṛṣṭadhīḥ | varṇayāmāsa suprītyā jīvoddhārāya kṛtsnaśaḥ

शंकर भी सती के इस प्रश्न को सुनकर अत्यंत प्रसन्नचित्त हुए, और जीवों के उद्धार के लिए उन्होंने अत्यंत प्रेमपूर्वक सम्पूर्ण विषय का वर्णन किया।

श्लोक 51 (shiva.rudra.43.51)

तन्त्रशास्त्रं सयन्त्रं हि सपञ्चाङ्गं महेश्वरः । बभाषे महिमानं च तत्तद्देववरस्य वै

tantraśāstraṁ sayantraṁ hi sapañcāṅgaṁ maheśvaraḥ | babhāṣe mahimānaṁ ca tattaddevavarasya vai

महेश्वर ने यन्त्र और पंचांग सहित तन्त्रशास्त्र का वर्णन किया, तथा उन-उन श्रेष्ठ देवताओं की महिमा का भी वर्णन किया।

श्लोक 52 (shiva.rudra.43.52)

सेतिहासकथां तेषां भक्तमाहात्म्यमेव च । सवर्णाश्रमधर्मांश्च नृपधर्मान् मुनीश्वर

setihāsakathāṁ teṣāṁ bhaktamāhātmyameva ca | savarṇāśramadharmāṁśca nṛpadharmān munīśvara

हे मुनीश्वर! उन्होंने उन देवताओं की इतिहास-कथाओं सहित, भक्तों की महिमा, वर्णाश्रम-धर्मों तथा राजाओं के धर्मों का भी वर्णन किया।

श्लोक 53 (shiva.rudra.43.53)

सुतस्त्रीधर्ममाहात्म्यं वर्णाश्रममनश्वरम् । वैद्यशास्त्रं तथा ज्योतिःशास्त्रं जीवसुखावहम्

sutastrīdharmamāhātmyaṁ varṇāśramamanaśvaram | vaidyaśāstraṁ tathā jyotiḥśāstraṁ jīvasukhāvaham

उन्होंने पुत्र और स्त्री के धर्म की महिमा, अविनाशी वर्णाश्रम-धर्म, वैद्यक शास्त्र तथा जीवों को सुख देने वाले ज्योतिष शास्त्र का भी वर्णन किया।

श्लोक 54 (shiva.rudra.43.54)

सामुद्रिकं परं शास्त्रमन्यच्छास्त्राणि भूरिशः । कृपां कृत्वा महेशानो वर्णयामास तत्त्वतः

sāmudrikaṁ paraṁ śāstramanyacchāstrāṇi bhūriśaḥ | kṛpāṁ kṛtvā maheśāno varṇayāmāsa tattvataḥ

महेश्वर ने कृपा करके, हस्तरेखा आदि सामुद्रिक शास्त्र तथा अन्य अनेक शास्त्रों का भी यथार्थ रूप से वर्णन किया।

श्लोक 55 (shiva.rudra.43.55)

इत्थं त्रिलोकसुखदौ सर्वज्ञौ च सतीशिवौ । लोकोपकारकरणधृतसद्गुणविग्रहौ

itthaṁ trilokasukhadau sarvajñau ca satīśivau | lokopakārakaraṇadhṛtasadguṇavigrahau

इस प्रकार त्रिलोक को सुख देने वाले, सर्वज्ञ सती और शिव — दोनों ही लोक-कल्याण के कार्यों में तत्पर, सद्गुणों से युक्त शरीर वाले —

श्लोक 56 (shiva.rudra.43.56)

चिक्रीडाते बहुविधं कैलासे हिमवद् गिरौ । अन्यस्थलेषु च तदा परब्रह्मस्वरूपिणौ

cikrīḍāte bahuvidhaṁ kailāse himavad girau | anyasthaleṣu ca tadā parabrahmasvarūpiṇau

— वे दोनों, जो परब्रह्म के ही स्वरूप हैं, उस समय कैलास पर, हिमालय पर्वत पर तथा अन्य अनेक स्थानों में विविध प्रकार से क्रीड़ा करते रहे।

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