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रुद्र संहिता · अध्याय 49

सतीवाक्यम्

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50

श्लोक 1 (shiva.rudra.49.1)

ब्रह्मोवाच । दाक्षायणी गता तत्र यत्र यज्ञो महाप्रभः । सुरासुरमुनीन्द्रादिकुतूहलसमन्वितः

brahmovāca | dākṣāyaṇī gatā tatra yatra yajño mahāprabhaḥ | surāsuramunīndrādikutūhalasamanvitaḥ

ब्रह्मा ने कहा — दक्ष-पुत्री वहाँ गयीं जहाँ वह महाप्रभावशाली यज्ञ हो रहा था, जो देवों, असुरों और महामुनियों के कुतूहल से भरा हुआ था।

श्लोक 2 (shiva.rudra.49.2)

स्वपितुर्भवनं तत्र नानाश्चर्यसमन्वितम् । ददर्श सुप्रभं चारु सुरर्षिगणसंयुतम्

svapiturbhavanaṁ tatra nānāścaryasamanvitam | dadarśa suprabhaṁ cāru surarṣigaṇasaṁyutam

वहाँ उन्होंने अपने पिता के भवन को देखा, जो अनेक आश्चर्यों से युक्त, अत्यंत सुंदर और तेजस्वी था, तथा देव-ऋषियों के समूह से भरा हुआ था।

श्लोक 3 (shiva.rudra.49.3)

द्वारि स्थिता तदा देवी ह्यवरुह्य निजासनात् । नन्दिनोऽभ्यन्तरं शीघ्रमेकैवागच्छदध्वरम्

dvāri sthitā tadā devī hyavaruhya nijāsanāt | nandino'bhyantaraṁ śīghramekaivāgacchadadhvaram

देवी अपने वाहन से शीघ्र उतरकर द्वार पर खड़ी हुईं, और फिर अकेली ही यज्ञ-स्थल के भीतर शीघ्रता से चली गयीं।

श्लोक 4 (shiva.rudra.49.4)

आगतां च सतीं दृष्ट्वासिक्नी माता यशस्विनी । अकरोदादरं तस्या भगिन्यश्च यथोचितम्

āgatāṁ ca satīṁ dṛṣṭvāsiknī mātā yaśasvinī | akarodādaraṁ tasyā bhaginyaśca yathocitam

सती को आया देखकर उनकी यशस्विनी माता असिक्नी और बहनों ने यथोचित सत्कार किया।

श्लोक 5 (shiva.rudra.49.5)

नाकरोदादरं दक्षो दृष्ट्वा तामपि किञ्चन । नान्योऽपि तद्भयात्तत्र शिवमायाविमोहितः

nākarodādaraṁ dakṣo dṛṣṭvā tāmapi kiñcana | nānyo'pi tadbhayāttatra śivamāyāvimohitaḥ

किंतु दक्ष ने उन्हें देखकर भी कोई आदर नहीं दिया, और शिव की माया से मोहित होकर तथा दक्ष के भय से वहाँ अन्य किसी ने भी उनका सत्कार नहीं किया।

श्लोक 6 (shiva.rudra.49.6)

अथ सा मातरं देवी पितरं च सती मुने । अनमद्विस्मितात्यन्तं सर्वलोकपराभवात्

atha sā mātaraṁ devī pitaraṁ ca satī mune | anamadvismitātyantaṁ sarvalokaparābhavāt

हे मुने! तब देवी सती ने अपनी माता और पिता को प्रणाम किया, किंतु सम्पूर्ण सभा के इस अपमान से वे अत्यंत विस्मित हो गयीं।

श्लोक 7 (shiva.rudra.49.7)

भागानपश्यद्देवानां हर्यादीनां तदध्वरे । न शम्भुभागमकरोत् क्रोधं दुर्विषहं सती

bhāgānapaśyaddevānāṁ haryādīnāṁ tadadhvare | na śambhubhāgamakarot krodhaṁ durviṣahaṁ satī

उन्होंने वहाँ इंद्र आदि देवों के भाग तो देखे, किंतु शम्भु का कोई भाग नहीं देखा — और सती का क्रोध असह्य हो उठा।

श्लोक 8 (shiva.rudra.49.8)

तदा दक्षं दहन्तीव रुषा पूर्णा सती भृशम् । क्रूरदृष्ट्या विलोक्यैव सर्वानप्यपमानिता

tadā dakṣaṁ dahantīva ruṣā pūrṇā satī bhṛśam | krūradṛṣṭyā vilokyaiva sarvānapyapamānitā

तब मानो दक्ष को अपने क्रोध से जला देने वाली सती अत्यंत रोष से भर गयीं, और स्वयं को अपमानित अनुभव करते हुए सबको क्रूर दृष्टि से देखने लगीं।

श्लोक 9 (shiva.rudra.49.9)

सत्युवाच । अनाहूतस्त्वया कस्माच्छम्भुः परमशोभनः । येन पूतमिदं विश्वं समग्रं सचराचरम्

satyuvāca | anāhūtastvayā kasmācchambhuḥ paramaśobhanaḥ | yena pūtamidaṁ viśvaṁ samagraṁ sacarācaram

सती ने कहा — आपने परम शोभन शम्भु को क्यों नहीं बुलाया, जिनसे यह सम्पूर्ण चराचर विश्व पवित्र होता है?

श्लोक 10 (shiva.rudra.49.10)

यज्ञो यज्ञविदां श्रेष्ठो यज्ञाङ्गो यज्ञदक्षिणः । यज्ञकर्ता च यः शम्भुस्तं विना च कथं मखः

yajño yajñavidāṁ śreṣṭho yajñāṅgo yajñadakṣiṇaḥ | yajñakartā ca yaḥ śambhustaṁ vinā ca kathaṁ makhaḥ

शम्भु ही यज्ञ हैं, यज्ञ जानने वालों में श्रेष्ठ हैं, यज्ञ के अंग हैं, यज्ञ की दक्षिणा हैं और यज्ञ के कर्ता हैं — उनके बिना यह यज्ञ कैसे सम्पन्न होगा?

श्लोक 11 (shiva.rudra.49.11)

यस्य स्मरणमात्रेण सर्वं पूतं भवत्यहो । विना तेन कृतं सर्वमपवित्रं भविष्यति

yasya smaraṇamātreṇa sarvaṁ pūtaṁ bhavatyaho | vinā tena kṛtaṁ sarvamapavitraṁ bhaviṣyati

अहो! जिनके स्मरण मात्र से सब कुछ पवित्र हो जाता है, उनके बिना किया गया सब कुछ अपवित्र ही होगा।

श्लोक 12 (shiva.rudra.49.12)

द्रव्यमन्त्रादिकं सर्वं हव्यं कव्यं च यन्मयम् । शम्भुना हि विना तेन कथं यज्ञः प्रवर्तितः

dravyamantrādikaṁ sarvaṁ havyaṁ kavyaṁ ca yanmayam | śambhunā hi vinā tena kathaṁ yajñaḥ pravartitaḥ

सब द्रव्य, मंत्र, देवों-पितरों को दी जाने वाली आहुतियाँ — सब कुछ उन्हीं का स्वरूप है। शम्भु के बिना यह यज्ञ कैसे आरम्भ किया गया?

श्लोक 13 (shiva.rudra.49.13)

किं शिवं सुरसामान्यं मत्वाकार्षीरनादरम् । भ्रष्टबुद्धिर्भवानद्य जातोऽसि जनकाधम

kiṁ śivaṁ surasāmānyaṁ matvākārṣīranādaram | bhraṣṭabuddhirbhavānadya jāto'si janakādhama

क्या आपने शिव को साधारण देवता समझकर उनका अनादर किया? हे नीच पिता! आज आप भ्रष्ट-बुद्धि हो गये हैं।

श्लोक 14 (shiva.rudra.49.14)

विष्णुब्रह्मादयो देवा यं संसेव्य महेश्वरम् । प्राप्ताः स्वपदवीं सर्वे तं न जानासि रे हरम्

viṣṇubrahmādayo devā yaṁ saṁsevya maheśvaram | prāptāḥ svapadavīṁ sarve taṁ na jānāsi re haram

विष्णु-ब्रह्मा आदि जिस महेश्वर की सेवा करके अपना-अपना पद पाते हैं, उन्हीं हर को, अरे! आप नहीं जानते।

श्लोक 15 (shiva.rudra.49.15)

एते कथं समायाता विष्णुब्रह्मादयः सुराः । तव यज्ञे विना शम्भुं स्वप्रभुं मुनयस्तथा

ete kathaṁ samāyātā viṣṇubrahmādayaḥ surāḥ | tava yajñe vinā śambhuṁ svaprabhuṁ munayastathā

आपके इस यज्ञ में विष्णु-ब्रह्मा आदि देव और मुनिगण अपने स्वामी शम्भु को छोड़कर कैसे आ गये?

श्लोक 16 (shiva.rudra.49.16)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा परमेशानी विष्ण्वादीन्सकलान् प्रति । पृथक्पृथगवोचत्सा भर्त्सयन्ती भवात्मिका

brahmovāca | ityuktvā parameśānī viṣṇvādīnsakalān prati | pṛthakpṛthagavocatsā bhartsayantī bhavātmikā

ब्रह्मा ने कहा — यह कहकर परमेश्वरी सती ने विष्णु आदि सभी की ओर मुड़कर एक-एक को अलग-अलग फटकारते हुए यह कहा।

श्लोक 17 (shiva.rudra.49.17)

सत्युवाच । हे विष्णो त्वं महादेवं किं न जानासि तत्त्वतः । सगुणं निर्गुणं चापि श्रुतयो यं वदन्ति ह

satyuvāca | he viṣṇo tvaṁ mahādevaṁ kiṁ na jānāsi tattvataḥ | saguṇaṁ nirguṇaṁ cāpi śrutayo yaṁ vadanti ha

सती ने कहा — हे विष्णो! जिसे श्रुतियाँ सगुण और निर्गुण दोनों रूपों में कहती हैं, उस महादेव को क्या आप वास्तव में नहीं जानते?

श्लोक 18 (shiva.rudra.49.18)

यद्यपि त्वां करं दत्त्वा बहुवारं महेश्वरः । अशिक्षयत्पुरा शाल्वप्रमुखाकृतिभिर्हरे

yadyapi tvāṁ karaṁ dattvā bahuvāraṁ maheśvaraḥ | aśikṣayatpurā śālvapramukhākṛtibhirhare

यद्यपि महेश्वर ने पूर्वकाल में शाल्व आदि के रूप धारण कर बार-बार आपका हाथ पकड़कर आपको शिक्षा दी थी —

श्लोक 19 (shiva.rudra.49.19)

तदपि ज्ञानमायातं न ते चेतसि दुर्मते । भागार्थी दक्षयज्ञेऽस्मिन् शिवं स्वस्वामिनं विना

tadapi jñānamāyātaṁ na te cetasi durmate | bhāgārthī dakṣayajñe'smin śivaṁ svasvāminaṁ vinā

— तो भी हे दुर्मते! वह ज्ञान आपके चित्त में नहीं आया; आप अपने स्वामी शिव को छोड़कर इस दक्ष-यज्ञ में केवल अपने भाग की कामना से आये हैं।

श्लोक 20 (shiva.rudra.49.20)

पुरा पञ्चमुखो भूत्वा गर्वितोऽसि सदाशिवम् । कृतश्चतुर्मुखस्तेन विस्मृतोऽसि तदद्भुतम्

purā pañcamukho bhūtvā garvito'si sadāśivam | kṛtaścaturmukhastena vismṛto'si tadadbhutam

पूर्वकाल में पंचमुख होकर आप सदाशिव के समक्ष ही गर्वित हो गये थे, तब उन्होंने आपको चतुर्मुख बना दिया — वह अद्भुत घटना भी आप भूल गये हैं।

श्लोक 21 (shiva.rudra.49.21)

इन्द्र त्वं किं न जानासि महादेवस्य विक्रमम् । भस्मीकृतः पविस्ते हि हरेण क्रूरकर्मणा

indra tvaṁ kiṁ na jānāsi mahādevasya vikramam | bhasmīkṛtaḥ paviste hi hareṇa krūrakarmaṇā

हे इंद्र! आप महादेव के पराक्रम को क्यों नहीं जानते? आपका वज्र ही हर के क्रूर कर्म से भस्म कर दिया गया था।

श्लोक 22 (shiva.rudra.49.22)

हे सुराः किन्न जानीथ महादेवस्य विक्रमम् । अत्रे वसिष्ठ मुनयो युष्माभिः किं कृतं त्विह

he surāḥ kinna jānītha mahādevasya vikramam | atre vasiṣṭha munayo yuṣmābhiḥ kiṁ kṛtaṁ tviha

हे देवगण! आप महादेव के पराक्रम को क्यों नहीं जानते? हे अत्रि-वसिष्ठ आदि मुनियो! आपने भी यहाँ क्या किया है?

श्लोक 23 (shiva.rudra.49.23)

भिक्षाटनं च कृतवान् पुरा दारुवने विभुः । शप्तो यद्भिक्षुको रुद्रो भवद्भिर्मुनिभिस्तदा

bhikṣāṭanaṁ ca kṛtavān purā dāruvane vibhuḥ | śapto yadbhikṣuko rudro bhavadbhirmunibhistadā

पूर्वकाल में सर्वव्यापी शिव ने दारुवन में भिक्षाटन किया था, तब आप मुनियों ने ही उन्हें भिक्षुक समझकर शाप दे दिया था।

श्लोक 24 (shiva.rudra.49.24)

शप्तेनापि च रुद्रेण यत्कृतं विस्मृतं कथम् । तल्लिङ्गेनाखिलं दग्धं भुवनं सचराचरम्

śaptenāpi ca rudreṇa yatkṛtaṁ vismṛtaṁ katham | talliṅgenākhilaṁ dagdhaṁ bhuvanaṁ sacarācaram

उस शाप के बाद भी रुद्र ने जो किया, वह आप कैसे भूल गये — उनके उसी लिंग से सारा चराचर भुवन दग्ध हो गया था।

श्लोक 25 (shiva.rudra.49.25)

सर्वे मूढाश्च सञ्जाता विष्णुब्रह्मादयः सुराः । मुनयोऽन्ये विना शम्भुमागता यदिहाध्वरे

sarve mūḍhāśca sañjātā viṣṇubrahmādayaḥ surāḥ | munayo'nye vinā śambhumāgatā yadihādhvare

विष्णु-ब्रह्मा आदि सब देव और अन्य मुनि भी अत्यंत मूढ़ हो गये हैं, कि शम्भु को छोड़कर इस यज्ञ में आ गये हैं।

श्लोक 26 (shiva.rudra.49.26)

सर्वे वेदाश्च सम्भूता साङ्गाः शास्त्राणि वाग्यतः । योऽसौ वेदान्तगः शम्भुः कैश्चिज्ज्ञातुं न पार्यते

sarve vedāśca sambhūtā sāṅgāḥ śāstrāṇi vāgyataḥ | yo'sau vedāntagaḥ śambhuḥ kaiścijjñātuṁ na pāryate

समस्त वेद और अंगसहित शास्त्र वाणी से ही प्रकट हुए हैं, किंतु उस वेदांतगामी शम्भु को कोई विरले ही जान पाते हैं।

श्लोक 27 (shiva.rudra.49.27)

ब्रह्मोवाच । इत्यनेकविधा वाणीरगदज्जगदम्बिका । कोपान्विता सती तत्र हृदयेन विदूयता

brahmovāca | ityanekavidhā vāṇīragadajjagadambikā | kopānvitā satī tatra hṛdayena vidūyatā

ब्रह्मा ने कहा — इस प्रकार अनेक प्रकार के वचन कहती हुई जगदम्बिका सती वहाँ क्रोध से युक्त होकर हृदय में अत्यंत व्यथित हो उठीं।

श्लोक 28 (shiva.rudra.49.28)

विष्ण्वादयोऽखिला देवा मुनयो ये च तद्वचः । मौनीभूतास्तदाकर्ण्य भयव्याकुलमानसाः

viṣṇvādayo'khilā devā munayo ye ca tadvacaḥ | maunībhūtāstadākarṇya bhayavyākulamānasāḥ

उनके उस वचन को सुनकर विष्णु आदि समस्त देवगण और मुनिगण भय से व्याकुल हो मौन हो गये।

श्लोक 29 (shiva.rudra.49.29)

अथ दक्षः समाकर्ण्य स्वपुत्र्यास्तादृशं वचः । विलोक्य क्रूरदृष्ट्या तां सतीं क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः

atha dakṣaḥ samākarṇya svaputryāstādṛśaṁ vacaḥ | vilokya krūradṛṣṭyā tāṁ satīṁ kruddho'bravīdvacaḥ

तब दक्ष अपनी पुत्री के ऐसे वचन सुनकर, उन्हें क्रूर दृष्टि से देखकर, क्रोधित होकर यह वचन बोले।

श्लोक 30 (shiva.rudra.49.30)

दक्ष उवाच । तव किं बहुनोक्तेन कार्यं नास्तीह साम्प्रतम् । गच्छ वा तिष्ठ वा भद्रे कस्मात्त्वं हि समागता

dakṣa uvāca | tava kiṁ bahunoktena kāryaṁ nāstīha sāmpratam | gaccha vā tiṣṭha vā bhadre kasmāttvaṁ hi samāgatā

दक्ष ने कहा — इतना अधिक कहने से क्या लाभ, अब यहाँ इसका कोई प्रयोजन नहीं है। हे भद्रे! तुम जाओ या रहो, पर तुम यहाँ आयी ही क्यों?

श्लोक 31 (shiva.rudra.49.31)

अमङ्गलस्तु ते भर्ता शिवोऽसौ गम्यते बुधैः । अकुलीनो वेदबाह्यो भूतप्रेतपिशाचराट्

amaṅgalastu te bhartā śivo'sau gamyate budhaiḥ | akulīno vedabāhyo bhūtapretapiśācarāṭ

तुम्हारा वह पति शिव विद्वानों द्वारा अमंगल माना जाता है — कुलहीन, वेदबाह्य, भूत-प्रेत-पिशाचों का राजा।

श्लोक 32 (shiva.rudra.49.32)

तस्मान्नाह्वायितो रुद्रो यज्ञार्थं सुकुवेषभृत् । देवर्षिसंसदि मया ज्ञात्वा पुत्रि विपश्चिता

tasmānnāhvāyito rudro yajñārthaṁ sukuveṣabhṛt | devarṣisaṁsadi mayā jñātvā putri vipaścitā

इसीलिए हे पुत्री! मैंने विद्वान होकर देव-ऋषियों की सभा में यह जानकर ही रुद्र को इस यज्ञ में नहीं बुलाया।

श्लोक 33 (shiva.rudra.49.33)

विधिना प्रेरितेन त्वं दत्ता मन्देन पापिना । रुद्रायाविदितार्थाय चोद्धताय दुरात्मने

vidhinā preritena tvaṁ dattā mandena pāpinā | rudrāyāviditārthāya coddhatāya durātmane

विधि से प्रेरित होकर मैंने मंद और पापी होकर ही तुम्हें अज्ञात कुल के, उद्धत और दुरात्मा रुद्र को दे दिया था।

श्लोक 34 (shiva.rudra.49.34)

तस्मात्कोपं परित्यज्य स्वस्था भव शुचिस्मिते । यद्यागतासि यज्ञेऽस्मिन् दायं गृह्णीष्व चात्मना

tasmātkopaṁ parityajya svasthā bhava śucismite | yadyāgatāsi yajñe'smin dāyaṁ gṛhṇīṣva cātmanā

इसलिए हे शुचिस्मिते! क्रोध त्यागकर स्वस्थ हो जाओ। यदि तुम इस यज्ञ में आयी ही हो तो अपना भाग ग्रहण करो।

श्लोक 35 (shiva.rudra.49.35)

ब्रह्मोवाच । दक्षेणोक्तेति सा पुत्री सती त्रैलोक्यपूजिता । निन्दायुक्तं स्वपितरं दृष्ट्वासीद् रुषिता भृशम्

brahmovāca | dakṣeṇokteti sā putrī satī trailokyapūjitā | nindāyuktaṁ svapitaraṁ dṛṣṭvāsīd ruṣitā bhṛśam

ब्रह्मा ने कहा — दक्ष के इस प्रकार कहने पर त्रैलोक्य-पूजिता वह पुत्री सती अपने पिता को निंदापूर्ण देखकर अत्यंत क्रोधित हो उठीं।

श्लोक 36 (shiva.rudra.49.36)

अचिन्तयत्तदा सेति कथं यास्यामि शङ्करम् । शङ्करं द्रष्टुकामाहं पृष्टा वक्ष्ये किमुत्तरम्

acintayattadā seti kathaṁ yāsyāmi śaṅkaram | śaṅkaraṁ draṣṭukāmāhaṁ pṛṣṭā vakṣye kimuttaram

उन्होंने सोचा — अब मैं शंकर के पास कैसे जाऊँगी? शंकर को देखने की इच्छा रखने वाली मैं, यदि उन्होंने पूछा तो क्या उत्तर दूँगी?

श्लोक 37 (shiva.rudra.49.37)

अथ प्रोवाच पितरं दक्षं तं दुष्टमानसम् । निःश्वसन्ती रुषाविष्टा सा सती त्रिजगत्प्रसूः

atha provāca pitaraṁ dakṣaṁ taṁ duṣṭamānasam | niḥśvasantī ruṣāviṣṭā sā satī trijagatprasūḥ

फिर त्रिजगत्-जननी सती दीर्घ श्वास लेती हुई और क्रोध से आविष्ट होकर उस दुष्ट-हृदय पिता दक्ष से बोलीं।

श्लोक 38 (shiva.rudra.49.38)

सत्युवाच । यो निन्दति महादेवं निन्द्यमानं शृणोति वा । तावुभौ नरकं यातौ यावच्चन्द्रदिवाकरौ

satyuvāca | yo nindati mahādevaṁ nindyamānaṁ śṛṇoti vā | tāvubhau narakaṁ yātau yāvaccandradivākarau

सती ने कहा — जो महादेव की निंदा करता है, अथवा उनकी निंदा सुनता है — वे दोनों जब तक सूर्य-चंद्र रहते हैं तब तक नरक भोगते हैं।

श्लोक 39 (shiva.rudra.49.39)

तस्मात्त्यक्ष्याम्यहं देहं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् । किं जीवितेन मे तात शृण्वन्त्यानादरं प्रभोः

tasmāttyakṣyāmyahaṁ dehaṁ pravekṣyāmi hutāśanam | kiṁ jīvitena me tāta śṛṇvantyānādaraṁ prabhoḥ

इसलिए मैं यह देह त्याग दूँगी, अग्नि में प्रवेश करूँगी। हे तात! अपने प्रभु का अनादर सुनते हुए इस जीवन से मुझे क्या प्रयोजन?

श्लोक 40 (shiva.rudra.49.40)

यदि शक्तः स्वयं शम्भोर्निन्दकस्य विशेषतः । छिन्द्यात् प्रसह्य रसनां तदा शुद्ध्येन्न संशयः

yadi śaktaḥ svayaṁ śambhornindakasya viśeṣataḥ | chindyāt prasahya rasanāṁ tadā śuddhyenna saṁśayaḥ

यदि समर्थ हो तो शम्भु की निंदा करने वाले की जिह्वा बलपूर्वक काट डालनी चाहिए, तभी निःसंदेह शुद्धि होती है।

श्लोक 41 (shiva.rudra.49.41)

यद्यशक्तो जनस्तत्र निरयात्सुपिधाय वै । कर्णौ धीमान् ततः शुद्ध्येद् वदन्तीदं बुधा वराः

yadyaśakto janastatra nirayātsupidhāya vai | karṇau dhīmān tataḥ śuddhyed vadantīdaṁ budhā varāḥ

यदि व्यक्ति असमर्थ हो, तो बुद्धिमान पुरुष को अपने दोनों कान भलीभाँति बंद करके वहाँ से चले जाना चाहिए — विद्वान लोग ऐसा ही कहते हैं, तभी वह शुद्ध होता है।

श्लोक 42 (shiva.rudra.49.42)

ब्रह्मोवाच । इत्थमुक्त्वा धर्मनीतिं पश्चात्तापमवाप सा । अस्मरच्छाङ्करं वाक्यं दूयमानेन चेतसा

brahmovāca | itthamuktvā dharmanītiṁ paścāttāpamavāpa sā | asmaracchāṅkaraṁ vākyaṁ dūyamānena cetasā

ब्रह्मा ने कहा — इस धर्म-नीति को कहकर सती को पश्चाताप हुआ, और व्यथित हृदय से उन्हें शंकर का वचन स्मरण हो आया।

श्लोक 43 (shiva.rudra.49.43)

ततः सङ्क्रुद्ध्य सा दक्षं निःशङ्कं प्राह तानपि । सर्वान्विष्ण्वादिकान्देवान्मुनीनपि सती ध्रुवम्

tataḥ saṅkruddhya sā dakṣaṁ niḥśaṅkaṁ prāha tānapi | sarvānviṣṇvādikāndevānmunīnapi satī dhruvam

तब अत्यंत क्रुद्ध होकर सती ने निःशंक भाव से दक्ष को और विष्णु आदि समस्त देवों तथा मुनियों को भी दृढ़तापूर्वक यह कहा।

श्लोक 44 (shiva.rudra.49.44)

सत्युवाच । तात त्वं निन्दकः शम्भोः पश्चात्तापं गमिष्यसि । इह भुक्त्वा महादुःखमन्ते यास्यसि यातनाम्

satyuvāca | tāta tvaṁ nindakaḥ śambhoḥ paścāttāpaṁ gamiṣyasi | iha bhuktvā mahāduḥkhamante yāsyasi yātanām

सती ने कहा — हे तात! शम्भु के निंदक आप पश्चाताप को प्राप्त होंगे। यहाँ महादुःख भोगकर अंत में आप यातना को प्राप्त होंगे।

श्लोक 45 (shiva.rudra.49.45)

यस्य लोकेऽप्रियो नास्ति प्रियश्चैव परात्मनः । तस्मिन्नवैरे शर्वेऽस्मिन् त्वां विना कः प्रतीपकः

yasya loke'priyo nāsti priyaścaiva parātmanaḥ | tasminnavaire śarve'smin tvāṁ vinā kaḥ pratīpakaḥ

जिसका संसार में कोई अप्रिय नहीं है और जो परमात्मा-रूप में सबका प्रिय है, उस निर्वैर शर्व के प्रति आपके सिवा और कौन विरोधी हो सकता है?

श्लोक 46 (shiva.rudra.49.46)

महद्विनिन्दा नाश्चर्यं सर्वदासत्सु सेर्ष्यकम् । महदङ्घ्रिरजोध्वस्ततमःसु नैव शोभना

mahadvinindā nāścaryaṁ sarvadāsatsu serṣyakam | mahadaṅghrirajodhvastatamaḥsu naiva śobhanā

महापुरुष की निंदा में कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि दुष्ट सदैव ईर्ष्यालु होते हैं — महापुरुष के चरण-रज से जो अंधकार नष्ट होता है, वह उन्हें कभी शोभन नहीं लगता।

श्लोक 47 (shiva.rudra.49.47)

शिवेति द्व्यक्षरं यस्य नृणां नाम गिरेरितम् । सकृत्प्रसङ्गात्सकलमघमाशु विहन्ति तत्

śiveti dvyakṣaraṁ yasya nṛṇāṁ nāma gireritam | sakṛtprasaṅgātsakalamaghamāśu vihanti tat

'शिव' — यह दो अक्षरों वाला नाम मनुष्यों के मुख से एक बार भी उच्चारित होते ही समस्त पाप को तत्काल नष्ट कर देता है।

श्लोक 48 (shiva.rudra.49.48)

पवित्रकीर्तिममलं भवान् द्वेष्टि शिवेतरः । अलङ्घ्यशासनं शम्भुमहो सर्वेश्वरं खलः

pavitrakīrtimamalaṁ bhavān dveṣṭi śivetaraḥ | alaṅghyaśāsanaṁ śambhumaho sarveśvaraṁ khalaḥ

आप उस पवित्र और निर्मल कीर्ति वाले, सर्वेश्वर, अलंघ्य-शासन शम्भु से द्वेष करते हैं — अरे दुष्ट! आप स्वयं अमंगल हैं।

श्लोक 49 (shiva.rudra.49.49)

यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिसुनिषेवितम् । सर्वार्थदं ब्रह्मरसैः सर्वार्थिभिरथादरात्

yatpādapadmaṁ mahatāṁ mano'lisuniṣevitam | sarvārthadaṁ brahmarasaiḥ sarvārthibhirathādarāt

जिनके चरण-कमल को महात्माओं का मन भ्रमर के समान सदा सेवता है, जो सब अर्थों को देने वाले हैं और जिनकी सब अर्थार्थी आदरपूर्वक ब्रह्मरस से अर्चना करते हैं —

श्लोक 50 (shiva.rudra.49.50)

यद्वर्षत्यर्थिनः शीघ्रं लोकस्य शिव आदरात् । भवान् द्रुह्यति मूर्खत्वात् तस्मै चाशेषबन्धवे

yadvarṣatyarthinaḥ śīghraṁ lokasya śiva ādarāt | bhavān druhyati mūrkhatvāt tasmai cāśeṣabandhave

— जो शीघ्र ही याचकों की कामना पूर्ण कर देते हैं, संसार के प्रति उनकी कृपा से — उन्हीं सर्वबंधु शिव से आप मूर्खतावश द्रोह करते हैं।

श्लोक 51 (shiva.rudra.49.51)

किंवा शिवाख्यमशिवं त्वदन्ये न विदुर्बुधाः । ब्रह्मादयस्तं मुनयः सनकाद्यास्तथापरे

kiṁvā śivākhyamaśivaṁ tvadanye na vidurbudhāḥ | brahmādayastaṁ munayaḥ sanakādyāstathāpare

क्या आपके सिवा अन्य विद्वान — ब्रह्मा आदि मुनि, सनक आदि — 'शिव' नाम को अमंगल नहीं जानते?

श्लोक 52 (shiva.rudra.49.52)

अवकीर्य जटा भूतैः श्मशाने स कपालधृक् । तन्माल्यभस्म वा ज्ञात्वा प्रीत्यावसदुदारधीः

avakīrya jaṭā bhūtaiḥ śmaśāne sa kapāladhṛk | tanmālyabhasma vā jñātvā prītyāvasadudāradhīḥ

वे जटाएँ बिखेरे, भूतगणों के साथ श्मशान में कपाल धारण किये विचरते हैं — किंतु उसी भस्म को अपना आभूषण मानकर उदार-बुद्धि वाला व्यक्ति वहाँ प्रेमपूर्वक निवास करता है।

श्लोक 53 (shiva.rudra.49.53)

ये मूर्द्धभिर्दधति तच्चरणोत्सृष्टमादरात् । निर्माल्यं मुनयो देवाः स शिवः परमेश्वरः

ye mūrddhabhirdadhati taccaraṇotsṛṣṭamādarāt | nirmālyaṁ munayo devāḥ sa śivaḥ parameśvaraḥ

जो मुनि और देव उनके चरणों से गिरे निर्माल्य को आदरपूर्वक अपने मस्तक पर धारण करते हैं — वही शिव परमेश्वर हैं।

श्लोक 54 (shiva.rudra.49.54)

प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म चोदितम् । वेदे विविच्य वृत्तं च तद्विचार्यं मनीषिभिः

pravṛttaṁ ca nivṛttaṁ ca dvividhaṁ karma coditam | vede vivicya vṛttaṁ ca tadvicāryaṁ manīṣibhiḥ

वेद में प्रवृत्ति और निवृत्ति — ये दो प्रकार के कर्म भलीभाँति विवेचित होकर कहे गये हैं; बुद्धिमानों को उनका विचार करना चाहिए।

श्लोक 55 (shiva.rudra.49.55)

विरोधियौगपद्यैककर्तृके च तथा द्वयम् । परब्रह्मणि शम्भौ तु कर्मर्च्छन्ति न किञ्चन

virodhiyaugapadyaikakartṛke ca tathā dvayam | parabrahmaṇi śambhau tu karmarcchanti na kiñcana

एक ही कर्ता से परस्पर विरोधी होकर भी युगपत् उत्पन्न ये दोनों — किंतु परब्रह्म शम्भु में ऐसा कोई कर्म-दोष लागू नहीं होता।

श्लोक 56 (shiva.rudra.49.56)

मा वः पदव्यः स्म पितः या अस्मदास्थिताः सदा । यज्ञशालासु वो धूम्रवर्त्मभुक्तोज्झिताः परम्

mā vaḥ padavyaḥ sma pitaḥ yā asmadāsthitāḥ sadā | yajñaśālāsu vo dhūmravartmabhuktojjhitāḥ param

हे पिता! जिन मार्गों पर हम सदा आश्रित रहे हैं, वे मार्ग अब कभी आपके न हों — आपकी यज्ञशालाओं में अब देवगण केवल धूम्र-मार्ग से ही तृप्त रह जायेंगे।

श्लोक 57 (shiva.rudra.49.57)

नोऽव्यक्तलिङ्गः सततमवधूतसुसेवितः । अभिमानमतो न त्वं कुरु तात कुबुद्धिधृक्

no'vyaktaliṅgaḥ satatamavadhūtasusevitaḥ | abhimānamato na tvaṁ kuru tāta kubuddhidhṛk

हमारे प्रभु अव्यक्त-लिंग हैं, अवधूतों द्वारा सदा सुसेवित हैं — इसलिए हे तात! ऐसा अभिमान मत कीजिए, यह कुबुद्धि है।

श्लोक 58 (shiva.rudra.49.58)

किं बहूक्तेन वचसा दुष्टस्त्वं सर्वथा कुधीः । त्वदुद्भवेन देहेन न मे किञ्चित्प्रयोजनम्

kiṁ bahūktena vacasā duṣṭastvaṁ sarvathā kudhīḥ | tvadudbhavena dehena na me kiñcitprayojanam

अधिक कहने से क्या लाभ — आप सर्वथा दुष्ट और कुबुद्धि हैं। अब मुझे आपसे उत्पन्न इस देह से कोई प्रयोजन नहीं रहा।

श्लोक 59 (shiva.rudra.49.59)

तज्जन्म धिग्यो महतां सर्वथावद्यकृत्खलः । परित्याज्यो विशेषेण तत्सम्बन्धो विपश्चिता

tajjanma dhigyo mahatāṁ sarvathāvadyakṛtkhalaḥ | parityājyo viśeṣeṇa tatsambandho vipaścitā

धिक्कार है उस जन्म को जो महात्माओं के प्रति सर्वथा अपराध करने वाले दुष्ट से हो — विद्वानों को विशेष रूप से ऐसा संबंध त्याग देना चाहिए।

श्लोक 60 (shiva.rudra.49.60)

गोत्रं त्वदीयं भगवान् यदाह वृषभध्वजः । दाक्षायणीति सहसाहं भवामि सुदुर्मना

gotraṁ tvadīyaṁ bhagavān yadāha vṛṣabhadhvajaḥ | dākṣāyaṇīti sahasāhaṁ bhavāmi sudurmanā

वृषभध्वज भगवान ने आपके ही गोत्र से मुझे 'दाक्षायणी' कहा है — इसीलिए मैं सहसा अत्यंत दुखी हो उठी हूँ।

श्लोक 61 (shiva.rudra.49.61)

तस्मात्त्वदङ्गजं देहं कुणपं गर्हितं सदा । व्युत्सृज्य नूनमधुना भविष्यामि सुखावहा

tasmāttvadaṅgajaṁ dehaṁ kuṇapaṁ garhitaṁ sadā | vyutsṛjya nūnamadhunā bhaviṣyāmi sukhāvahā

इसलिए सदा गर्हित इस कुणप-सम आपसे उत्पन्न देह को त्यागकर, अब निश्चय ही मैं सुखी हो जाऊँगी।

श्लोक 62 (shiva.rudra.49.62)

हे सुरा मुनयः सर्वे यूयं शृणुत मद्वचः । सर्वथानुचितं कर्म युष्माकं दुष्टचेतसाम्

he surā munayaḥ sarve yūyaṁ śṛṇuta madvacaḥ | sarvathānucitaṁ karma yuṣmākaṁ duṣṭacetasām

हे देवगण, हे मुनिगण! आप सब मेरा वचन सुनें — दुष्ट-चित्त आप सबका यह कर्म सर्वथा अनुचित है।

श्लोक 63 (shiva.rudra.49.63)

सर्वे यूयं विमूढा हि शिवनिन्दाः कलिप्रियाः । प्राप्स्यन्ति दण्डं नियतमखिलं च हराद् ध्रुवम्

sarve yūyaṁ vimūḍhā hi śivanindāḥ kalipriyāḥ | prāpsyanti daṇḍaṁ niyatamakhilaṁ ca harād dhruvam

आप सब अत्यंत मोहित हैं, शिव की निंदा करने वाले और कलह-प्रिय हैं — आप सबको हर से निश्चय ही पूर्ण दंड प्राप्त होगा।

श्लोक 64 (shiva.rudra.49.64)

ब्रह्मोवाच । दक्षमुक्त्वाध्वरे तस्मिन् व्यरमत्सा सती तदा । अनूद्य चेतसा शम्भुमस्मरत्प्राणवल्लभम्

brahmovāca | dakṣamuktvādhvare tasmin vyaramatsā satī tadā | anūdya cetasā śambhumasmaratprāṇavallabham

ब्रह्मा ने कहा — उस यज्ञ में दक्ष से यह कहकर सती मौन हो गयीं, और अपने हृदय में अपने प्राणवल्लभ शम्भु का स्मरण करने लगीं।

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