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रुद्र संहिता · अध्याय 50

सतीदेहत्यागोपद्रववर्णनम्

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

श्लोक 1 (shiva.rudra.50.1)

नारद उवाच । मौनीभूता यदा सासीत्सती शङ्करवल्लभा । चरित्रं किमभूत्तत्र विधे तद्वद चादरात्

nārada uvāca | maunībhūtā yadā sāsītsatī śaṅkaravallabhā | caritraṁ kimabhūttatra vidhe tadvada cādarāt

नारद ने कहा — जब शंकर-प्रिया सती इस प्रकार मौन हो गयीं, तब हे विधे! वहाँ क्या चरित्र हुआ, वह आप आदरपूर्वक मुझे बताइए।

श्लोक 2 (shiva.rudra.50.2)

ब्रह्मोवाच । मौनीभूता सती देवी स्मृत्वा स्वपतिमादरात् । क्षितावुदीच्यां सहसा निषसाद प्रशान्तधीः

brahmovāca | maunībhūtā satī devī smṛtvā svapatimādarāt | kṣitāvudīcyāṁ sahasā niṣasāda praśāntadhīḥ

ब्रह्मा ने कहा — मौन हुई देवी सती ने आदरपूर्वक अपने पति का स्मरण किया, और प्रशांत बुद्धि से सहसा उत्तर दिशा की ओर मुख करके पृथ्वी पर बैठ गयीं।

श्लोक 3 (shiva.rudra.50.3)

जलमाचम्य विधिवत् संवृता वाससा शुचिः । दृङ् निमील्य पतिं स्मृत्वा योगमार्गं समाविशत्

jalamācamya vidhivat saṁvṛtā vāsasā śuciḥ | dṛṅ nimīlya patiṁ smṛtvā yogamārgaṁ samāviśat

विधिपूर्वक जल का आचमन कर, वस्त्र से ढकी हुई पवित्र सती ने नेत्र मूँदकर अपने पति का स्मरण किया और योग-मार्ग में प्रवेश किया।

श्लोक 4 (shiva.rudra.50.4)

कृत्वा समानावनिलौ प्राणापानौ सितानना । उत्थाप्योदानमथ च यत्नात्सा नाभिचक्रतः

kṛtvā samānāvanilau prāṇāpānau sitānanā | utthāpyodānamatha ca yatnātsā nābhicakrataḥ

उस गौर-मुखी ने प्राण और अपान वायु को समान किया, फिर प्रयत्नपूर्वक नाभि-चक्र से उदान वायु को ऊपर उठाया।

श्लोक 5 (shiva.rudra.50.5)

हृदि स्थाप्योरसि धिया स्थितं कण्ठाद् भ्रुवोः सती । अनिन्दितानयन्मध्यं शङ्करप्राणवल्लभा

hṛdi sthāpyorasi dhiyā sthitaṁ kaṇṭhād bhruvoḥ satī | aninditānayanmadhyaṁ śaṅkaraprāṇavallabhā

शंकर की प्राणप्रिया सती ने उस वायु को हृदय में, फिर वक्षस्थल में बुद्धिपूर्वक स्थापित कर, कंठ से होते हुए उसे निर्दोष भ्रू-मध्य तक पहुँचाया।

श्लोक 6 (shiva.rudra.50.6)

एवं स्वदेहं सहसा दक्षकोपाज्जिहासती । दग्धे गात्रे वायुशुचिर्धारितं योगमार्गतः

evaṁ svadehaṁ sahasā dakṣakopājjihāsatī | dagdhe gātre vāyuśucirdhāritaṁ yogamārgataḥ

इस प्रकार दक्ष के क्रोध से क्षुब्ध होकर सहसा अपनी देह त्यागने की इच्छा वाली सती ने अपने अंगों को दग्ध किया, जबकि उनका प्राण-वायु योग-मार्ग से पवित्र और स्थिर बना रहा।

श्लोक 7 (shiva.rudra.50.7)

ततः स्वभर्तुश्चरणं चिन्तयन्ती न चापरम् । अपश्यत्सा सती तत्र योगमार्गनिविष्टधीः

tataḥ svabhartuścaraṇaṁ cintayantī na cāparam | apaśyatsā satī tatra yogamārganiviṣṭadhīḥ

फिर केवल अपने पति के चरणों का ही चिंतन करती हुई, अन्य कुछ न देखती हुई सती की बुद्धि वहाँ योग-मार्ग में ही लीन हो गयी।

श्लोक 8 (shiva.rudra.50.8)

हतकल्मषतद्देहः प्रापतच्च तदग्निना । भस्मसादभवत्सद्यो मुनिश्रेष्ठ तदिच्छया

hatakalmaṣataddehaḥ prāpatacca tadagninā | bhasmasādabhavatsadyo muniśreṣṭha tadicchayā

उनकी वह देह, समस्त कल्मष से रहित होकर, अग्नि द्वारा भस्म हो गयी — हे मुनिश्रेष्ठ! अपनी ही इच्छा से वह तत्काल भस्मसात् हो गयी।

श्लोक 9 (shiva.rudra.50.9)

तत्पश्यतां च खे भूमौ वादोऽभूत्सुमहांस्तदा । हाहेति सोऽद्भुतश्चित्रः सुरादीनां भयावहः

tatpaśyatāṁ ca khe bhūmau vādo'bhūtsumahāṁstadā | hāheti so'dbhutaścitraḥ surādīnāṁ bhayāvahaḥ

यह देखने वालों में आकाश और पृथ्वी पर उस समय एक महान 'हाहा' का कोलाहल उठा — यह अद्भुत, विचित्र और देवादि सबके लिए भयावह था।

श्लोक 10 (shiva.rudra.50.10)

हन्त प्रिया परा शम्भोर्देवी दैवतमस्य हि । जहावसून् सती केन सुदुष्टेन प्रकोपिता

hanta priyā parā śambhordevī daivatamasya hi | jahāvasūn satī kena suduṣṭena prakopitā

हाय! शम्भु की परम प्रिया, इस जगत की देवी, किस अत्यंत दुष्ट के कारण कुपित होकर सती ने अपने प्राण त्याग दिए?

श्लोक 11 (shiva.rudra.50.11)

अहो त्वनात्म्यं सुमहदस्य दक्षस्य पश्यत । चराचरं प्रजा यस्य यत्पुत्रस्य प्रजापतेः

aho tvanātmyaṁ sumahadasya dakṣasya paśyata | carācaraṁ prajā yasya yatputrasya prajāpateḥ

अहो! देखो इस दक्ष का यह महान आत्म-संयमहीनता — प्रजापति होकर भी, जिसकी सारी चराचर प्रजा मानो अपनी ही संतान है!

श्लोक 12 (shiva.rudra.50.12)

अहोऽद्य विमनाभूत्सा सती देवी मनस्विनी । वृषध्वजप्रियाभीक्ष्णं मानयोग्या सतां सदा

aho'dya vimanābhūtsā satī devī manasvinī | vṛṣadhvajapriyābhīkṣṇaṁ mānayogyā satāṁ sadā

अहो! आज वह मनस्विनी देवी सती, वृषभध्वज की सदा प्रिया और सज्जनों द्वारा सदा सम्माननीया, विषण्ण होकर चली गयीं।

श्लोक 13 (shiva.rudra.50.13)

सोऽयं दुर्मर्षहृदयो ब्रह्मध्रुक् स प्रजापतिः । महतीमपकीर्तिं हि प्राप्स्यति त्वखिले भवे

so'yaṁ durmarṣahṛdayo brahmadhruk sa prajāpatiḥ | mahatīmapakīrtiṁ hi prāpsyati tvakhile bhave

यह दुर्मर्ष-हृदय प्रजापति, जो धर्म का द्रोही है, संसार भर में महान अपकीर्ति को अवश्य प्राप्त करेगा।

श्लोक 14 (shiva.rudra.50.14)

यत्स्वाङ्गजां सुतां शम्भुद्विट् न्यषेधत्समुद्यताम् । महानरकभोगी स मृतये नोऽपराधतः

yatsvāṅgajāṁ sutāṁ śambhudviṭ nyaṣedhatsamudyatām | mahānarakabhogī sa mṛtaye no'parādhataḥ

जिसने शम्भु से द्वेष करते हुए अपनी ही अंगजा पुत्री को, उद्यत खड़ी होते हुए भी, रोक दिया — वह हमारे प्रति अपराधी होकर महानरक भोगेगा और मृत्यु को प्राप्त होगा।

श्लोक 15 (shiva.rudra.50.15)

वदत्येवं जने सत्या दृष्ट्वासुत्यागमद्भुतम् । द्रुतं तत्पार्षदाः क्रोधादुदतिष्ठन्नुदायुधाः

vadatyevaṁ jane satyā dṛṣṭvāsutyāgamadbhutam | drutaṁ tatpārṣadāḥ krodhādudatiṣṭhannudāyudhāḥ

लोग जब इस प्रकार सती के अद्भुत प्राण-त्याग को देखकर कह ही रहे थे, तब उनके पार्षद-गण क्रोध से शीघ्र ही शस्त्र उठाकर खड़े हो गये।

श्लोक 16 (shiva.rudra.50.16)

द्वारि स्थिता गणाः सर्वे रसायुतमिता रुषा । शङ्करस्य प्रभावात्तेऽक्रुध्यन्नतिमहाबलाः

dvāri sthitā gaṇāḥ sarve rasāyutamitā ruṣā | śaṅkarasya prabhāvātte'krudhyannatimahābalāḥ

द्वार पर खड़े साठ हजार गणगण रोष से भर गये — शंकर के प्रभाव से वे अत्यंत बलशाली गण कुपित हो उठे।

श्लोक 17 (shiva.rudra.50.17)

हाहाकारमकुर्वंस्ते धिग् धिग् नो नेति वादिनः । उच्चैः सर्वेऽसकृद्वीराः शङ्करस्य गणाधिपाः

hāhākāramakurvaṁste dhig dhig no neti vādinaḥ | uccaiḥ sarve'sakṛdvīrāḥ śaṅkarasya gaṇādhipāḥ

'धिक्! धिक्! ऐसा न हो!' — यह कहते हुए शंकर के वे समस्त वीर गणाधिप बार-बार ऊँचे स्वर में हाहाकार करने लगे।

श्लोक 18 (shiva.rudra.50.18)

हाहाकारेण महता व्याप्तमासीद्दिगन्तरम् । सर्वे प्रापन् भयं देवा मुनयोऽन्येऽपि ते स्थिताः

hāhākāreṇa mahatā vyāptamāsīddigantaram | sarve prāpan bhayaṁ devā munayo'nye'pi te sthitāḥ

उस महान हाहाकार से समस्त दिशाएँ व्याप्त हो गयीं; वहाँ उपस्थित सभी देव और अन्य मुनि भी भयभीत हो उठे।

श्लोक 19 (shiva.rudra.50.19)

गणाः सम्मन्त्र्य ते सर्वेऽभूवन् क्रुद्धा उदायुधाः । कुर्वन्तः प्रलयं वाद्यैः शस्त्रैर्व्याप्तं दिगन्तरम्

gaṇāḥ sammantrya te sarve'bhūvan kruddhā udāyudhāḥ | kurvantaḥ pralayaṁ vādyaiḥ śastrairvyāptaṁ digantaram

आपस में परामर्श कर वे सभी गण क्रुद्ध होकर शस्त्र उठा लिए, और वाद्यों तथा शस्त्रों से मानो प्रलय-सा करते हुए दिशाओं को व्याप्त कर दिया।

श्लोक 20 (shiva.rudra.50.20)

शस्त्रैरघ्नन्निजाङ्गानि केचित्तत्र शुचाकुलाः । शिरोमुखानि देवर्षे सुतीक्ष्णैः प्राणनाशिभिः

śastrairaghnannijāṅgāni kecittatra śucākulāḥ | śiromukhāni devarṣe sutīkṣṇaiḥ prāṇanāśibhiḥ

हे देवर्षे! उनमें से कुछ शोकाकुल गण अत्यंत तीक्ष्ण, प्राणनाशक शस्त्रों से अपने ही अंगों को, सिर और मुख को काटने लगे।

श्लोक 21 (shiva.rudra.50.21)

इत्थं ते विलयं प्राप्ता दाक्षायण्याः समं तदा । गणायुते द्वे च तदा तदद्भुतमिवाभवत्

itthaṁ te vilayaṁ prāptā dākṣāyaṇyāḥ samaṁ tadā | gaṇāyute dve ca tadā tadadbhutamivābhavat

इस प्रकार दाक्षायणी के साथ ही उस समय बीस हजार गणों ने भी अपनी देह त्याग दी — यह भी मानो एक अद्भुत घटना थी।

श्लोक 22 (shiva.rudra.50.22)

गणा नाशावशिष्टा ये शङ्करस्य महात्मनः । दक्षं तं क्रोधितं हन्तुमुदतिष्ठन्नुदायुधाः

gaṇā nāśāvaśiṣṭā ye śaṅkarasya mahātmanaḥ | dakṣaṁ taṁ krodhitaṁ hantumudatiṣṭhannudāyudhāḥ

महात्मा शंकर के जो गण उस विनाश के बाद शेष रह गये थे, वे कुपित दक्ष का वध करने के लिए शस्त्र उठाकर खड़े हो गये।

श्लोक 23 (shiva.rudra.50.23)

तेषामापततां वेगं निशम्य भगवान् भृगुः । यज्ञघ्नघ्नेन यजुषा दक्षिणाग्नौ जुहोन्मुने

teṣāmāpatatāṁ vegaṁ niśamya bhagavān bhṛguḥ | yajñaghnaghnena yajuṣā dakṣiṇāgnau juhonmune

उनके आक्रमण के वेग को जानकर भगवान भृगु ने यज्ञ-विनाशकों को नष्ट करने वाले यजुष-मंत्र से दक्षिणाग्नि में आहुति दी।

श्लोक 24 (shiva.rudra.50.24)

हूयमाने च भृगुणा समुत्पेतुर्महासुराः । ऋभवो नाम प्रबला वीरास्तत्र सहस्रशः

hūyamāne ca bhṛguṇā samutpeturmahāsurāḥ | ṛbhavo nāma prabalā vīrāstatra sahasraśaḥ

भृगु के हवन करते ही वहाँ सहस्रों की संख्या में ऋभु नामक अत्यंत बलशाली महान वीर उत्पन्न हो गये।

श्लोक 25 (shiva.rudra.50.25)

तैरलातायुधैस्तत्र प्रमथानां मुनीश्वर । अभूद्युद्धं सुविकटं शृण्वतां रोमहर्षणम्

tairalātāyudhaistatra pramathānāṁ munīśvara | abhūdyuddhaṁ suvikaṭaṁ śṛṇvatāṁ romaharṣaṇam

हे मुनीश्वर! अलात (जलती लकड़ी) को शस्त्र बनाये उन ऋभुओं के साथ प्रमथगणों का अत्यंत भयंकर युद्ध हुआ, जो सुनने वालों के रोंगटे खड़े कर दे।

श्लोक 26 (shiva.rudra.50.26)

ऋभुभिस्तैर्महावीरैर्हन्यमानाः समन्ततः । अयत्नयानाः प्रमथा उशद्भिर्ब्रह्मतेजसा

ṛbhubhistairmahāvīrairhanyamānāḥ samantataḥ | ayatnayānāḥ pramathā uśadbhirbrahmatejasā

ब्रह्म-तेज से देदीप्यमान उन महावीर ऋभुओं द्वारा चारों ओर से आहत होकर प्रमथगण बिना प्रयत्न के ही तितर-बितर हो गये।

श्लोक 27 (shiva.rudra.50.27)

एवं शिवगणास्ते वै हता विद्राविता द्रुतम् । शिवेच्छया महाशक्त्या तदद्भुतमिवाभवत्

evaṁ śivagaṇāste vai hatā vidrāvitā drutam | śivecchayā mahāśaktyā tadadbhutamivābhavat

इस प्रकार शिव के वे गण मारे जाकर शीघ्र ही तितर-बितर कर दिये गये — शिव की ही इच्छा और उस महाशक्ति से — यह भी मानो एक अद्भुत घटना थी।

श्लोक 28 (shiva.rudra.50.28)

तद् दृष्ट्वा ऋषयो देवाः शक्राद्याः समरुद्गणाः । विश्वेऽश्विनौ लोकपालास्तूष्णीं भूतास्तदाभवन्

tad dṛṣṭvā ṛṣayo devāḥ śakrādyāḥ samarudgaṇāḥ | viśve'śvinau lokapālāstūṣṇīṁ bhūtāstadābhavan

यह देखकर ऋषिगण, इंद्र आदि देवगण मरुद्गणों सहित, विश्वेदेव, दोनों अश्विनीकुमार तथा लोकपाल — सब मौन हो गये।

श्लोक 29 (shiva.rudra.50.29)

केचिद्विष्णुं प्रभुं तत्र प्रार्थयन्तः समन्ततः । उद्विग्ना मन्त्रयन्तश्च विघ्नाभावं मुहुर्मुहुः

kecidviṣṇuṁ prabhuṁ tatra prārthayantaḥ samantataḥ | udvignā mantrayantaśca vighnābhāvaṁ muhurmuhuḥ

उनमें से कुछ, अत्यंत उद्विग्न होकर, चारों ओर से भगवान विष्णु से प्रार्थना करने लगे और बार-बार यह विचार करने लगे कि यह विघ्न कैसे टले।

श्लोक 30 (shiva.rudra.50.30)

सुविचार्योदर्कफलं महोद्विग्नाः सुबुद्धयः । सुरविष्ण्वादयोऽभूवंस्तन्नाशाद्रावणान्मुहुः

suvicāryodarkaphalaṁ mahodvignāḥ subuddhayaḥ | suraviṣṇvādayo'bhūvaṁstannāśādrāvaṇānmuhuḥ

इसके परिणाम पर भलीभाँति विचार करके विष्णु आदि सुबुद्धि देवगण अत्यंत उद्विग्न हो गये, और इस विनाश से बार-बार व्याकुल होकर विलाप करने लगे।

श्लोक 31 (shiva.rudra.50.31)

एवम्भूतस्तदा यज्ञो विघ्नो जातो दुरात्मनः । ब्रह्मबन्धोश्च दक्षस्य शङ्करद्रोहिणो मुने

evambhūtastadā yajño vighno jāto durātmanaḥ | brahmabandhośca dakṣasya śaṅkaradrohiṇo mune

हे मुने! इस प्रकार शंकर के उस द्रोही, केवल नाम से ब्राह्मण-बंधु दुरात्मा दक्ष के यज्ञ में यह विघ्न उत्पन्न हुआ।

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51