रुद्र संहिता · अध्याय 51
आकाशवाणी
श्लोक 1 (shiva.rudra.51.1)
ब्रह्मोवाच । एतस्मिन्नन्तरे तत्र नभोवाणी मुनीश्वर । अवोचच्छृण्वतां दक्षसुरादीनां यथार्थतः
brahmovāca | etasminnantare tatra nabhovāṇī munīśvara | avocacchṛṇvatāṁ dakṣasurādīnāṁ yathārthataḥ
ब्रह्मा ने कहा — हे मुनीश्वर! इसी बीच वहाँ एक आकाशवाणी हुई, जो दक्ष, देवगण आदि सबको यथार्थ रूप से सुनाई दी।
श्लोक 2 (shiva.rudra.51.2)
व्योमवाण्युवाच । रे रे दक्ष दुराचार दम्भाचारपरायण । किं कृतं ते महामूढ कर्म चानर्थकारकम्
vyomavāṇyuvāca | re re dakṣa durācāra dambhācāraparāyaṇa | kiṁ kṛtaṁ te mahāmūḍha karma cānarthakārakam
आकाशवाणी ने कहा — अरे-अरे दुराचारी, दम्भ-परायण दक्ष! यह क्या कर डाला तूने, हे महामूर्ख — यह अनर्थकारी कर्म?
श्लोक 3 (shiva.rudra.51.3)
न कृतं शैवराजस्य दधीचेर्वचनस्य हि । प्रमाणं तत्कृते मूढ सर्वानन्दकरं शुभम्
na kṛtaṁ śaivarājasya dadhīcervacanasya hi | pramāṇaṁ tatkṛte mūḍha sarvānandakaraṁ śubham
तूने शैवराज दधीचि के वचन का, जो सबके लिए आनंददायक और मंगलकारी था, कोई मान नहीं रखा, हे मूढ़!
श्लोक 4 (shiva.rudra.51.4)
निर्गतस्ते मखाद्विप्रः शापं दत्त्वा सुदुःसहम् । ततोऽपि बुद्धं किञ्चिन्नो त्वया मूढेन चेतसि
nirgataste makhādvipraḥ śāpaṁ dattvā suduḥsaham | tato'pi buddhaṁ kiñcinno tvayā mūḍhena cetasi
वह विप्र तेरे यज्ञ से अत्यंत दुःसह शाप देकर चला गया, फिर भी हे मूढ़-चित्त! तेरी बुद्धि में कुछ नहीं समझ आया।
श्लोक 5 (shiva.rudra.51.5)
ततः कृतः कथं नो वै स्वपुत्र्यास्त्वादरः परः । समागतायाः सत्याश्च मङ्गलाया गृहं स्वतः
tataḥ kṛtaḥ kathaṁ no vai svaputryāstvādaraḥ paraḥ | samāgatāyāḥ satyāśca maṅgalāyā gṛhaṁ svataḥ
फिर स्वयं आयी हुई अपनी मंगलमयी पुत्री सती का तूने परम आदर क्यों नहीं किया?
श्लोक 6 (shiva.rudra.51.6)
सतीभवौ नार्चितौ हि किमिदं ज्ञानदुर्बल । ब्रह्मपुत्र इति वृथा गर्वितोऽसि विमोहितः
satībhavau nārcitau hi kimidaṁ jñānadurbala | brahmaputra iti vṛthā garvito'si vimohitaḥ
सती और भव — दोनों का ही पूजन नहीं हुआ — यह क्या है, हे ज्ञान-दुर्बल? 'मैं ब्रह्मा का पुत्र हूँ' यह सोचकर तू व्यर्थ ही गर्वित और मोहित हो गया है।
श्लोक 7 (shiva.rudra.51.7)
सा सत्येव सदाराध्या सर्वपुण्यफलप्रदा । त्रिलोकमाता कल्याणी शङ्करार्धाङ्गभागिनी
sā satyeva sadārādhyā sarvapuṇyaphalapradā | trilokamātā kalyāṇī śaṅkarārdhāṅgabhāginī
वही सती सदा आराधनीय हैं, सम्पूर्ण पुण्य-फल देने वाली हैं, त्रिलोक की माता, कल्याणी और शंकर के अर्धांग की भागिनी हैं।
श्लोक 8 (shiva.rudra.51.8)
सा सत्येवार्चिता नित्यं सर्वसौभाग्यदायिनी । माहेश्वरी स्वभक्तानां सर्वमङ्गलदायिनी
sā satyevārcitā nityaṁ sarvasaubhāgyadāyinī | māheśvarī svabhaktānāṁ sarvamaṅgaladāyinī
वही सती सदा पूजित होकर सम्पूर्ण सौभाग्य देने वाली हैं — माहेश्वरी अपने भक्तों को सम्पूर्ण मंगल प्रदान करती हैं।
श्लोक 9 (shiva.rudra.51.9)
सा सत्येवार्चिता नित्यं संसारभयनाशिनी । मनोऽभीष्टप्रदा देवी सर्वोपद्रवहारिणी
sā satyevārcitā nityaṁ saṁsārabhayanāśinī | mano'bhīṣṭapradā devī sarvopadravahāriṇī
वही सती सदा पूजित होकर संसार के भय का नाश करती हैं — मनोवांछित फल देने वाली और सब उपद्रवों को हरने वाली देवी हैं।
श्लोक 10 (shiva.rudra.51.10)
सा सत्येवार्चिता नित्यं कीर्तिसम्पत्प्रदायिनी । परमा परमेशानी भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी
sā satyevārcitā nityaṁ kīrtisampatpradāyinī | paramā parameśānī bhuktimuktipradāyinī
वही सती सदा पूजित होकर कीर्ति और सम्पत्ति देती हैं — वे परमा, परमेश्वरी, भोग और मोक्ष दोनों की दायिनी हैं।
श्लोक 11 (shiva.rudra.51.11)
सा सत्येव जगद्धात्री जगद्रक्षणकारिणी । अनादिशक्तिः कल्पान्ते जगत्संहारकारिणी
sā satyeva jagaddhātrī jagadrakṣaṇakāriṇī | anādiśaktiḥ kalpānte jagatsaṁhārakāriṇī
वही सती जगत् को धारण करने वाली और उसकी रक्षा करने वाली हैं — अनादि शक्ति, जो कल्प के अंत में जगत् का संहार भी करती हैं।
श्लोक 12 (shiva.rudra.51.12)
सा सत्येव जगन्माता विष्णुमाता विलासिनी । ब्रह्मेन्द्रचन्द्रवह्न्यर्कदेवादिजननी स्मृता
sā satyeva jaganmātā viṣṇumātā vilāsinī | brahmendracandravahnyarkadevādijananī smṛtā
वही सती जगत् की माता हैं, विष्णु की भी विलासमयी माता हैं — ब्रह्मा, इंद्र, चंद्र, अग्नि, सूर्य आदि देवों की जननी कही गयी हैं।
श्लोक 13 (shiva.rudra.51.13)
सा सत्येव तपोधर्मदानादिफलदायिनी । शम्भुशक्तिर्महादेवी दुष्टहन्त्री परात्परा
sā satyeva tapodharmadānādiphaladāyinī | śambhuśaktirmahādevī duṣṭahantrī parātparā
वही सती तप, धर्म और दान आदि का फल देने वाली हैं — शम्भु की शक्ति, महादेवी, दुष्टों का नाश करने वाली, परात्परा।
श्लोक 14 (shiva.rudra.51.14)
ईदृग्विधा सती देवी यस्य पत्नी सदा प्रिया । तस्यै भागो न दत्तस्ते मूढेन कुविचारिणा
īdṛgvidhā satī devī yasya patnī sadā priyā | tasyai bhāgo na dattaste mūḍhena kuvicāriṇā
ऐसी देवी सती, जो उन प्रभु की सदा प्रिय पत्नी हैं, उन्हें, हे कुविचारी मूढ़! तूने कोई भाग नहीं दिया।
श्लोक 15 (shiva.rudra.51.15)
शम्भुर्हि परमेशानः सर्वस्वामी परात्परः । विष्णुब्रह्मादिसंसेव्यः सर्वकल्याणकारकः
śambhurhi parameśānaḥ sarvasvāmī parātparaḥ | viṣṇubrahmādisaṁsevyaḥ sarvakalyāṇakārakaḥ
शम्भु ही परमेश्वर हैं, सबके स्वामी, परात्पर — विष्णु और ब्रह्मा द्वारा भी सेवित, सम्पूर्ण कल्याण के कर्ता।
श्लोक 16 (shiva.rudra.51.16)
तप्यते हि तपः सिद्धैरेतद्दर्शनकाङ्क्षिभिः । युज्यते योगिभिर्योगैरेतद्दर्शनकाङ्क्षिभिः
tapyate hi tapaḥ siddhairetaddarśanakāṅkṣibhiḥ | yujyate yogibhiryogairetaddarśanakāṅkṣibhiḥ
सिद्धजन उन्हीं के दर्शन की कामना से तप करते हैं, योगीजन उन्हीं के दर्शन की कामना से योग साधते हैं।
श्लोक 17 (shiva.rudra.51.17)
अनन्तधनधान्यानां यागादीनां तथैव च । दर्शनं शङ्करस्यैव महत्फलमुदाहृतम्
anantadhanadhānyānāṁ yāgādīnāṁ tathaiva ca | darśanaṁ śaṅkarasyaiva mahatphalamudāhṛtam
अनंत धन-धान्य और यज्ञादि से भी बढ़कर, शंकर का दर्शन ही महान फल कहा गया है।
श्लोक 18 (shiva.rudra.51.18)
शिव एव जगद्धाता सर्वविद्यापतिः प्रभुः । आदिविद्यावरस्वामी सर्वमङ्गलमङ्गलः
śiva eva jagaddhātā sarvavidyāpatiḥ prabhuḥ | ādividyāvarasvāmī sarvamaṅgalamaṅgalaḥ
शिव ही जगत् के धाता हैं, समस्त विद्याओं के स्वामी और प्रभु हैं — आदि-विद्या के श्रेष्ठ स्वामी, सम्पूर्ण मंगलों के भी मंगल।
श्लोक 19 (shiva.rudra.51.19)
तच्छक्तेर्न कृतो यस्मात्सत्करोऽद्य त्वया खल । अत एवाध्वरस्यास्य विनाशो हि भविष्यति
tacchakterna kṛto yasmātsatkaro'dya tvayā khala | ata evādhvarasyāsya vināśo hi bhaviṣyati
हे दुष्ट! चूँकि तूने आज उनकी शक्ति का सत्कार नहीं किया, इसीलिए इस यज्ञ का विनाश अवश्य होगा।
श्लोक 20 (shiva.rudra.51.20)
अमङ्गलं भवत्येव पूजार्हाणामपूजया । पूज्यमाना च नासौ हि यतः पूज्यतमा शिवा
amaṅgalaṁ bhavatyeva pūjārhāṇāmapūjayā | pūjyamānā ca nāsau hi yataḥ pūjyatamā śivā
पूजनीयों का अपूजन ही अमंगल का कारण बनता है — और वे पूजित नहीं हुईं, जबकि शिवा ही सबसे अधिक पूजनीया हैं।
श्लोक 21 (shiva.rudra.51.21)
सहस्रेणापि शिरसां शेषो यत्पादजं रजः । वहत्यहरहः प्रीत्या तस्य शक्तिः शिवा सती
sahasreṇāpi śirasāṁ śeṣo yatpādajaṁ rajaḥ | vahatyaharahaḥ prītyā tasya śaktiḥ śivā satī
जिनके चरणों से उठी रज को सहस्रफण शेष भी प्रतिदिन प्रेमपूर्वक धारण करते हैं, वही शक्ति शिवा सती हैं।
श्लोक 22 (shiva.rudra.51.22)
यत्पादपद्ममनिशं ध्यात्वा सम्पूज्य सादरम् । विष्णुर्विष्णुत्वमापन्नस्तस्य शम्भोः प्रिया सती
yatpādapadmamaniśaṁ dhyātvā sampūjya sādaram | viṣṇurviṣṇutvamāpannastasya śambhoḥ priyā satī
जिनके चरण-कमल का सतत ध्यान और आदरपूर्वक पूजन करके विष्णु ने विष्णुत्व पाया, वे शम्भु की प्रिया सती ही हैं।
श्लोक 23 (shiva.rudra.51.23)
यत्पादपद्ममनिशं ध्यात्वा सम्पूज्य सादरम् । ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नस्तस्य शम्भोः प्रिया सती
yatpādapadmamaniśaṁ dhyātvā sampūjya sādaram | brahmā brahmatvamāpannastasya śambhoḥ priyā satī
जिनके चरण-कमल का सतत ध्यान और आदरपूर्वक पूजन करके ब्रह्मा ने ब्रह्मत्व पाया, वे शम्भु की प्रिया सती ही हैं।
श्लोक 24 (shiva.rudra.51.24)
यत्पादपद्ममनिशं ध्यात्वा सम्पूज्य सादरम् । इन्द्रादयो लोकपालाः प्रापुः स्वं स्वं परं पदम्
yatpādapadmamaniśaṁ dhyātvā sampūjya sādaram | indrādayo lokapālāḥ prāpuḥ svaṁ svaṁ paraṁ padam
जिनके चरण-कमल का सतत ध्यान और आदरपूर्वक पूजन करके इंद्र आदि लोकपालों ने अपना-अपना परम पद पाया।
श्लोक 25 (shiva.rudra.51.25)
जगत्पिता शिवः शक्तिर्जगन्माता च सा सती । सत्कृतौ न त्वया मूढ कथं श्रेयो भविष्यति
jagatpitā śivaḥ śaktirjaganmātā ca sā satī | satkṛtau na tvayā mūḍha kathaṁ śreyo bhaviṣyati
शिव जगत् के पिता हैं और वह शक्ति सती जगत् की माता हैं — हे मूढ़! उनका सत्कार न करके तेरा कल्याण कैसे होगा?
श्लोक 26 (shiva.rudra.51.26)
दौर्भाग्यं त्वयि सङ्क्रान्तं सङ्क्रान्तास्त्वयि चापदः । यौ चानाराधितौ भक्त्या भवानीशङ्करौ च तौ
daurbhāgyaṁ tvayi saṅkrāntaṁ saṅkrāntāstvayi cāpadaḥ | yau cānārādhitau bhaktyā bhavānīśaṅkarau ca tau
दुर्भाग्य तुझमें संक्रांत हो गया है, आपदाएँ तुझमें संक्रांत हो गयी हैं — क्योंकि तूने भक्तिपूर्वक भवानी-शंकर की आराधना नहीं की।
श्लोक 27 (shiva.rudra.51.27)
अनभ्यर्च्य शिवं शम्भुं कल्याणं प्राप्नुयामिति । किमस्ति गर्वो दुर्वारः स गर्वोऽद्य विनश्यति
anabhyarcya śivaṁ śambhuṁ kalyāṇaṁ prāpnuyāmiti | kimasti garvo durvāraḥ sa garvo'dya vinaśyati
'शिव शम्भु की अर्चना किए बिना ही मैं कल्याण पा लूँगा' — क्या यही वह दुर्निवार गर्व था? वह गर्व आज नष्ट हो रहा है।
श्लोक 28 (shiva.rudra.51.28)
सर्वेशविमुखो भूत्वा देवेष्वेतेषु कस्तव । करिष्यति सहायं तं न ते पश्यामि सर्वथा
sarveśavimukho bhūtvā deveṣveteṣu kastava | kariṣyati sahāyaṁ taṁ na te paśyāmi sarvathā
सर्वेश्वर से विमुख होकर, इन देवों में से कौन तेरी सहायता करेगा? मुझे तो कोई भी दिखाई नहीं देता।
श्लोक 29 (shiva.rudra.51.29)
यदि देवाः करिष्यन्ति साहाय्यमधुना तव । तदा नाशं समाप्स्यन्ति शलभा इव वह्निना
yadi devāḥ kariṣyanti sāhāyyamadhunā tava | tadā nāśaṁ samāpsyanti śalabhā iva vahninā
यदि देवगण अभी तेरी सहायता करेंगे, तो वे भी वैसे ही नष्ट हो जायेंगे जैसे पतंगे अग्नि में जल जाते हैं।
श्लोक 30 (shiva.rudra.51.30)
ज्वलत्वद्य मुखं ते वै यज्ञध्वंसो भवत्विति । सहायास्तव यावन्तस्ते ज्वलन्त्वद्य सत्वरम्
jvalatvadya mukhaṁ te vai yajñadhvaṁso bhavatviti | sahāyāstava yāvantaste jvalantvadya satvaram
आज तेरा मुख जल उठे! यह यज्ञ नष्ट हो जाए! और तेरे जितने भी सहायक हैं, वे सब भी आज तत्काल जल उठें।
श्लोक 31 (shiva.rudra.51.31)
अमराणां च सर्वेषां शपथोऽमङ्गलाय ते । करिष्यन्त्यद्य साहाय्यं यदेतस्य दुरात्मनः
amarāṇāṁ ca sarveṣāṁ śapatho'maṅgalāya te | kariṣyantyadya sāhāyyaṁ yadetasya durātmanaḥ
समस्त अमरों के लिए यह शपथ है — यदि वे आज इस दुरात्मा की सहायता करेंगे, तो यह उनके लिए अमंगलकारी होगा।
श्लोक 32 (shiva.rudra.51.32)
निर्गच्छन्त्वमराः स्वोकमेतदध्वरमण्डपात् । अन्यथा भवतो नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा
nirgacchantvamarāḥ svokametadadhvaramaṇḍapāt | anyathā bhavato nāśo bhaviṣyatyadya sarvathā
समस्त अमरगण इस यज्ञ-मंडप से अपने-अपने धाम को निकल जाएँ — अन्यथा आज निश्चय ही तुम्हारा विनाश होगा।
श्लोक 33 (shiva.rudra.51.33)
निर्गच्छन्त्वपरे सर्वे मुनिनागादयो मखात् । अन्यथा भवतां नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा
nirgacchantvapare sarve munināgādayo makhāt | anyathā bhavatāṁ nāśo bhaviṣyatyadya sarvathā
मुनि, नाग आदि अन्य सभी भी इस यज्ञ से निकल जाएँ — अन्यथा आज निश्चय ही तुम्हारा विनाश होगा।
श्लोक 34 (shiva.rudra.51.34)
निर्गच्छ त्वं हरे शीघ्रमेतदध्वरमण्डपात् । अन्यथा भवतो नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा
nirgaccha tvaṁ hare śīghrametadadhvaramaṇḍapāt | anyathā bhavato nāśo bhaviṣyatyadya sarvathā
हे हरि! तुम भी शीघ्र इस यज्ञ-मंडप से निकल जाओ — अन्यथा आज निश्चय ही तुम्हारा विनाश होगा।
श्लोक 35 (shiva.rudra.51.35)
निर्गच्छ त्वं विधे शीघ्रमेतदध्वरमण्डपात् । अन्यथा भवतो नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा
nirgaccha tvaṁ vidhe śīghrametadadhvaramaṇḍapāt | anyathā bhavato nāśo bhaviṣyatyadya sarvathā
हे विधे! तुम भी शीघ्र इस यज्ञ-मंडप से निकल जाओ — अन्यथा आज निश्चय ही तुम्हारा विनाश होगा।
श्लोक 36 (shiva.rudra.51.36)
ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वाध्वरशालायामखिलायां सुसंस्थितान् ॥ व्यरमत्सा नभोवाणी सर्वकल्याणकारिणी
brahmovāca | ityuktvādhvaraśālāyāmakhilāyāṁ susaṁsthitān || vyaramatsā nabhovāṇī sarvakalyāṇakāriṇī
ब्रह्मा ने कहा — सम्पूर्ण यज्ञशाला में स्थित उन सबसे यह कहकर, वह सर्व-कल्याणकारी आकाशवाणी शांत हो गयी।
श्लोक 37 (shiva.rudra.51.37)
तच्छ्रुत्वा व्योमवचनं सर्वे हर्यादयः सुराः । अकार्षुर्विस्मयं तात मुनयश्च तथापरे
tacchrutvā vyomavacanaṁ sarve haryādayaḥ surāḥ | akārṣurvismayaṁ tāta munayaśca tathāpare
हे तात! उस आकाशवाणी के वचन सुनकर हरि आदि सभी देवगण और अन्य मुनिगण भी अत्यंत विस्मित हो गये।