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रुद्र संहिता · अध्याय 5

नारद का काशी-गमन

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (shiva.rudra.5.1)

सूत उवाच । अन्तर्हिते हरौ विप्रा नारदो मुनिसत्तमः । विचचार महीं पश्यन् शिवलिङ्गानि भक्तितः

sūta uvāca antarhite harau viprā nārado munisattamaḥ vicacāra mahīṁ paśyan śivaliṅgāni bhaktitaḥ

सूत जी ने कहा — हे विप्रो! हरि के अन्तर्धान हो जाने पर मुनिश्रेष्ठ नारद भक्तिपूर्वक शिवलिंगों का दर्शन करते हुए पृथ्वी पर विचरण करने लगे।

श्लोक 2 (shiva.rudra.5.2)

पृथिव्या अटनं कृत्वा शिवरूपाण्यनेकशः । ददर्श प्रीतितो विप्रा भुक्तिमुक्तिप्रदानि सः

pṛthivyā aṭanaṁ kṛtvā śivarūpāṇyanekaśaḥ dadarśa prītito viprā bhuktimuktipradāni saḥ

हे विप्रो! पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए उन्होंने भोग और मोक्ष देने वाले शिव के अनेक रूपों का प्रेमपूर्वक दर्शन किया।

श्लोक 3 (shiva.rudra.5.3)

अथ तं विचरन्तं कौ नारदं दिव्यदर्शनम् । ज्ञात्वा शम्भुगणौ तौ तु सुचित्तमुपजग्मतुः

atha taṁ vicarantaṁ kau nāradaṁ divyadarśanam jñātvā śambhugaṇau tau tu sucittamupajagmatuḥ

इस प्रकार विचरण करते हुए दिव्यदर्शी नारद को जानकर शम्भु के वे दोनों गण सुन्दर चित्त से उनके समीप आये।

श्लोक 4 (shiva.rudra.5.4)

शिरसा सुप्रणम्याशु गणावूचतुरादरात् । गृहीत्वा चरणौ तस्य शापोद्धारेच्छया च तौ

śirasā supraṇamyāśu gaṇāvūcaturādarāt gṛhītvā caraṇau tasya śāpoddhārecchayā ca tau

शीघ्र ही शीश झुकाकर प्रणाम कर और उनके चरण पकड़कर, शाप से मुक्ति की इच्छा से वे दोनों गण आदरपूर्वक बोले।

श्लोक 5 (shiva.rudra.5.5)

शिवगणावूचतुः ब्रह्मपुत्र सुरर्षे हि शृणु प्रीत्यावयोर्वचः । तवापराधकर्तारावावां विप्रौ न वस्तुतः

śivagaṇāvūcatuḥ brahmaputra surarṣe hi śṛṇu prītyāvayorvacaḥ tavāparādhakartārāvāvāṁ viprau na vastutaḥ

शिवगणों ने कहा — हे ब्रह्मपुत्र देवर्षि! प्रेमपूर्वक हमारा वचन सुनिए। हे विप्र! वास्तव में हम आपके अपराधी नहीं थे।

श्लोक 6 (shiva.rudra.5.6)

आवां हरगणौ विप्र तवागस्कारिणौ मुने । स्वयम्वरे राजपुत्र्या मायामोहितचेतसा

āvāṁ haragaṇau vipra tavāgaskāriṇau mune svayamvare rājaputryā māyāmohitacetasā

हे मुने! हम शिव के गण हैं, जिन्होंने माया से मोहित चित्त होकर राजकुमारी के स्वयंवर में आपका अपराध किया।

श्लोक 7 (shiva.rudra.5.7)

त्वया दत्तश्च नौ शापः परेशप्रेरितेन ह । ज्ञात्वा कुसमयं तत्र मौनमेव हि जीवनम्

tvayā dattaśca nau śāpaḥ pareśapreritena ha jñātvā kusamayaṁ tatra maunameva hi jīvanam

आपने हमें जो शाप दिया, वह भी परमेश्वर की ही प्रेरणा से था; उस समय की प्रतिकूलता जानकर, मौन रहना ही हमारा जीवन था।

श्लोक 8 (shiva.rudra.5.8)

स्वकर्मणः फलं प्राप्तं कस्यापि न हि दूषणम् । सुप्रसन्नो भव विभो कुर्वनुग्रहमद्य नौ

svakarmaṇaḥ phalaṁ prāptaṁ kasyāpi na hi dūṣaṇam suprasanno bhava vibho kurvanugrahamadya nau

यह हमारे ही कर्म का फल हमें प्राप्त हुआ है, इसमें किसी का दोष नहीं। हे विभो! प्रसन्न होइए, आज हम पर अनुग्रह कीजिए।

श्लोक 9 (shiva.rudra.5.9)

सूत उवाच । वच आकर्ण्य गणयोरिति भक्त्युक्तमादरात् । प्रत्युवाच मुनिः प्रीत्या पश्चात्तापमवाप्य सः

sūta uvāca vaca ākarṇya gaṇayoriti bhaktyuktamādarāt pratyuvāca muniḥ prītyā paścāttāpamavāpya saḥ

सूत जी ने कहा — दोनों गणों के इस भक्तिपूर्ण, आदरयुक्त वचन को सुनकर, पश्चाताप को प्राप्त हुए मुनि ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया।

श्लोक 10 (shiva.rudra.5.10)

नारद उवाच । शृणुतं मे महादेवगणौ मान्यतमौ सताम् । वचनं सुखदं मोहनिर्मुक्तं च यथार्थकम्

nārada uvāca śṛṇutaṁ me mahādevagaṇau mānyatamau satām vacanaṁ sukhadaṁ mohanirmuktaṁ ca yathārthakam

नारद ने कहा — हे महादेव के गणो, सज्जनों में सर्वाधिक माननीय! मेरे सुखदायी, मोह से मुक्त और यथार्थ वचन सुनो।

श्लोक 11 (shiva.rudra.5.11)

पुरा मम मतिर्भ्रष्टासीच्छिवेच्छावशाद् ध्रुवम् । सर्वथा मोहमापन्नः शप्तवान्वां कुशेमुषिः

purā mama matirbhraṣṭāsīcchivecchāvaśād dhruvam sarvathā mohamāpannaḥ śaptavānvāṁ kuśemuṣiḥ

पूर्वकाल में शिव की ही इच्छा के वशीभूत होकर मेरी बुद्धि निश्चय ही भ्रष्ट हो गई थी; पूर्णतः मोहग्रस्त होकर, दुर्बुद्धि से मैंने तुम दोनों को शाप दिया।

श्लोक 12 (shiva.rudra.5.12)

यदुक्तं तत्तथा भावि तथापि शृणुतां गणौ । शापोद्धारमहं वच्मि क्षमेथामघमद्य मे

yaduktaṁ tattathā bhāvi tathāpi śṛṇutāṁ gaṇau śāpoddhāramahaṁ vacmi kṣamethāmaghamadya me

जो कहा गया है, वह वैसे ही घटित होगा; फिर भी, हे गणो, सुनो — मैं उस शाप का उपशमन कहता हूँ। आज मेरा अपराध क्षमा करो।

श्लोक 13 (shiva.rudra.5.13)

वीर्यान्मुनिवरस्याप्त्वा राक्षसेशत्वमादिशम् । स्यातां विभवसंयुक्तौ बलिनौ सुप्रतापिनौ

vīryānmunivarasyāptvā rākṣaseśatvamādiśam syātāṁ vibhavasaṁyuktau balinau supratāpinau

एक श्रेष्ठ मुनि के तप से बल पाकर मैंने तुम्हें राक्षसों का स्वामित्व प्रदान किया है; तुम ऐश्वर्यसम्पन्न, बलवान और महाप्रतापी बनोगे।

श्लोक 14 (shiva.rudra.5.14)

सर्वब्रह्माण्डराजानौ शिवभक्तौ जितेन्द्रियौ । शिवापरतनोर्मृत्युं प्राप्य स्वं पदमाप्स्यथः

sarvabrahmāṇḍarājānau śivabhaktau jitendriyau śivāparatanormṛtyuṁ prāpya svaṁ padamāpsyathaḥ

तुम सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के राजा बनोगे, फिर भी शिवभक्त और जितेन्द्रिय रहोगे; और शिव के ही दूसरे स्वरूप के हाथों मृत्यु पाकर तुम अपने मूल पद को पुनः प्राप्त कर लोगे।

श्लोक 15 (shiva.rudra.5.15)

सूत उवाच । इत्याकर्ण्य मुनेर्वाक्यं नारदस्य महात्मनः । उभौ हरगणौ प्रीतौ स्वं पदं जग्मतुर्मुदा

sūta uvāca ityākarṇya munervākyaṁ nāradasya mahātmanaḥ ubhau haragaṇau prītau svaṁ padaṁ jagmaturmudā

सूत जी ने कहा — महात्मा नारद मुनि के इस वचन को सुनकर हर के वे दोनों गण प्रसन्न होकर हर्षपूर्वक अपने स्थान को चले गये।

श्लोक 16 (shiva.rudra.5.16)

नारदोऽपि परं प्रीतो ध्यायन् शिवमनन्यधीः । विचचार महीं पश्यन् शिवतीर्थान्यभीक्ष्णशः

nārado'pi paraṁ prīto dhyāyan śivamananyadhīḥ vicacāra mahīṁ paśyan śivatīrthānyabhīkṣṇaśaḥ

नारद भी अत्यन्त प्रसन्न होकर, एकाग्र बुद्धि से शिव का ध्यान करते हुए, बार-बार शिव-तीर्थों का दर्शन करते हुए पृथ्वी पर विचरण करने लगे।

श्लोक 17 (shiva.rudra.5.17)

काशीं प्राप्याथ स मुनिः सर्वोपरिविराजिताम् । शिवप्रियां शम्भुसुखप्रदां शम्भुस्वरूपिणीम्

kāśīṁ prāpyātha sa muniḥ sarvoparivirājitām śivapriyāṁ śambhusukhapradāṁ śambhusvarūpiṇīm

तत्पश्चात् वह मुनि सबसे उत्कृष्ट, शिव को प्रिय, शम्भु को सुख देने वाली और शम्भुस्वरूपा काशी को प्राप्त हुए।

श्लोक 18 (shiva.rudra.5.18)

दृष्ट्वा काशीं कृतार्थोऽभूत्काशीनाथं ददर्श ह । आनर्च परमप्रीत्या परमानन्दसंयुतः

dṛṣṭvā kāśīṁ kṛtārtho'bhūtkāśīnāthaṁ dadarśa ha ānarca paramaprītyā paramānandasaṁyutaḥ

काशी का दर्शन कर वे कृतार्थ हुए, और काशीनाथ (विश्वेश्वर) का दर्शन किया; परम प्रेम से, परमानन्द से भरकर उन्होंने उनकी पूजा की।

श्लोक 19 (shiva.rudra.5.19)

समुदः सेव्य तां काशीं कृतार्थो मुनिसत्तमः । नमन्संवर्णयन्भक्त्या संस्मरन्प्रेमविह्वलः

samudaḥ sevya tāṁ kāśīṁ kṛtārtho munisattamaḥ namansaṁvarṇayanbhaktyā saṁsmaranpremavihvalaḥ

आनन्दित होकर उस काशी की सेवा करते हुए, कृतार्थ हुए मुनिश्रेष्ठ, प्रणाम करते, भक्तिपूर्वक उसका वर्णन करते और प्रेम-विह्वल होकर उसका स्मरण करते हुए,

श्लोक 20 (shiva.rudra.5.20)

ब्रह्मलोकं जगामाथ शिवस्मरणसन्मतिः । शिवतत्त्वं विशेषेण ज्ञातुमिच्छुः स नारदः

brahmalokaṁ jagāmātha śivasmaraṇasanmatiḥ śivatattvaṁ viśeṣeṇa jñātumicchuḥ sa nāradaḥ

तत्पश्चात् शिव-स्मरण में लीन नारद, शिवतत्त्व को विशेष रूप से जानने की इच्छा से ब्रह्मलोक गये।

श्लोक 21 (shiva.rudra.5.21)

नत्वा तत्र विधिं भक्त्या स्तुत्वा च विविधैस्तवैः । पप्रच्छ शिवसत्तत्त्वं शिवसंयुक्तमानसः

natvā tatra vidhiṁ bhaktyā stutvā ca vividhaistavaiḥ papraccha śivasattattvaṁ śivasaṁyuktamānasaḥ

वहाँ भक्तिपूर्वक ब्रह्मा को प्रणाम कर और नाना स्तुतियों से उनकी स्तुति कर, शिव में लीन मन वाले उन्होंने शिव के सत्य-तत्त्व के विषय में पूछा।

श्लोक 22 (shiva.rudra.5.22)

नारद उवाच । ब्रह्मन्ब्रह्मस्वरूपज्ञ पितामह जगत्प्रभो । त्वत्प्रसादान्मया सर्वं विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्

nārada uvāca brahmanbrahmasvarūpajña pitāmaha jagatprabho tvatprasādānmayā sarvaṁ viṣṇormāhātmyamuttamam

नारद ने कहा — हे ब्रह्मन्! हे ब्रह्मस्वरूप के ज्ञाता, पितामह, जगत्प्रभो! आपकी कृपा से मैंने विष्णु की सम्पूर्ण उत्तम महिमा जान ली है।

श्लोक 23 (shiva.rudra.5.23)

भक्तिमार्गं ज्ञानमार्गं तपोमार्गं सुदुस्तरम् । दानमार्गं च तीर्थानां मार्गं च श्रुतवानहम्

bhaktimārgaṁ jñānamārgaṁ tapomārgaṁ sudustaram dānamārgaṁ ca tīrthānāṁ mārgaṁ ca śrutavānaham

मैंने भक्तिमार्ग, ज्ञानमार्ग, अत्यन्त दुष्कर तपोमार्ग, दानमार्ग तथा तीर्थों के मार्ग के विषय में भी सुना है।

श्लोक 24 (shiva.rudra.5.24)

न ज्ञातं शिवतत्त्वं च पूजाविधिमतः क्रमात् । चरित्रं विविधं तस्य निवेदय मम प्रभो

na jñātaṁ śivatattvaṁ ca pūjāvidhimataḥ kramāt caritraṁ vividhaṁ tasya nivedaya mama prabho

परन्तु मैंने शिवतत्त्व और उसके क्रमानुसार पूजाविधि को नहीं जाना है; हे प्रभो! मुझे उनके नाना चरित्र भी बताइये।

श्लोक 25 (shiva.rudra.5.25)

निर्गुणोऽपि शिवस्तात सगुणः शङ्करः कथम् । शिवतत्त्वं न जानामि मोहितः शिवमायया

nirguṇo'pi śivastāta saguṇaḥ śaṅkaraḥ katham śivatattvaṁ na jānāmi mohitaḥ śivamāyayā

हे तात! निर्गुण होते हुए भी शिव सगुण शंकर कैसे बनते हैं? शिव की माया से मोहित होकर मैं शिवतत्त्व को नहीं जानता।

श्लोक 26 (shiva.rudra.5.26)

सृष्टेः पूर्वं कथं शम्भुः स्वरूपेण प्रतिष्ठितः । सृष्टिमध्ये स हि कथं क्रीडन्संवर्तते प्रभुः

sṛṣṭeḥ pūrvaṁ kathaṁ śambhuḥ svarūpeṇa pratiṣṭhitaḥ sṛṣṭimadhye sa hi kathaṁ krīḍansaṁvartate prabhuḥ

सृष्टि से पूर्व शम्भु अपने स्वरूप में किस प्रकार प्रतिष्ठित रहते हैं? सृष्टि के मध्य वे प्रभु लीला करते हुए किस प्रकार रहते हैं?

श्लोक 27 (shiva.rudra.5.27)

तदन्ते च कथं देवः स तिष्ठति महेश्वरः । कथं प्रसन्नतां याति शङ्करो लोकशङ्करः

tadante ca kathaṁ devaḥ sa tiṣṭhati maheśvaraḥ kathaṁ prasannatāṁ yāti śaṅkaro lokaśaṅkaraḥ

सृष्टि के अन्त में वे महेश्वर देव किस प्रकार स्थित रहते हैं? लोक के कल्याणकारी शंकर किस प्रकार प्रसन्न होते हैं?

श्लोक 28 (shiva.rudra.5.28)

सन्तुष्टश्च स्वभक्तेभ्यः परेभ्यश्च महेश्वरः । किं फलं यच्छति विधे तत्सर्वं कथयस्व मे

santuṣṭaśca svabhaktebhyaḥ parebhyaśca maheśvaraḥ kiṁ phalaṁ yacchati vidhe tatsarvaṁ kathayasva me

हे विधे! सन्तुष्ट होकर महेश्वर अपने भक्तों को तथा अन्य जनों को क्या फल प्रदान करते हैं? वह सब मुझे बताइये।

श्लोक 29 (shiva.rudra.5.29)

सद्यः प्रसन्नो भगवान्भवतीत्यनुसंश्रुतम् । भक्तप्रयासं स महान्न पश्यति दयापरः

sadyaḥ prasanno bhagavānbhavatītyanusaṁśrutam bhaktaprayāsaṁ sa mahānna paśyati dayāparaḥ

सुना गया है कि भगवान् शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं; वे परम दयालु महान् प्रभु भक्त के परिश्रम की ओर दृष्टि नहीं डालते।

श्लोक 30 (shiva.rudra.5.30)

ब्रह्मा विष्णुर्महेशश्च त्रयो देवाः शिवांशजाः । महेशस्तत्र पूर्णांशः स्वयमेव शिवः परः

brahmā viṣṇurmaheśaśca trayo devāḥ śivāṁśajāḥ maheśastatra pūrṇāṁśaḥ svayameva śivaḥ paraḥ

ब्रह्मा, विष्णु और महेश — ये तीनों देव शिव के ही अंश से उत्पन्न हैं; उनमें महेश उनका पूर्ण अंश हैं, और शिव स्वयं उनसे भी परे हैं।

श्लोक 31 (shiva.rudra.5.31)

तस्याविर्भावमाख्याहि चरितानि विशेषतः । उमाविर्भावमाख्याहि तद्विवाहं तथा विभो

tasyāvirbhāvamākhyāhi caritāni viśeṣataḥ umāvirbhāvamākhyāhi tadvivāhaṁ tathā vibho

उनके आविर्भाव तथा चरित्रों का विशेष वर्णन कीजिए; उमा के आविर्भाव और उनके विवाह का भी वर्णन कीजिए, हे प्रभो!

श्लोक 32 (shiva.rudra.5.32)

तद्गार्हस्थ्यं विशेषेण तथा लीलाः परा अपि । एतत्सर्वं तथान्यच्च कथनीयं त्वयानघ

tadgārhasthyaṁ viśeṣeṇa tathā līlāḥ parā api etatsarvaṁ tathānyacca kathanīyaṁ tvayānagha

उनके गार्हस्थ्य जीवन का विशेष वर्णन कीजिए, तथा उनकी अन्य दिव्य लीलाओं का भी; हे निष्पाप! यह सब तथा जो कुछ और हो, वह मुझे बताइये।

श्लोक 33 (shiva.rudra.5.33)

तदुत्पत्तिं विवाहं च शिवायास्तु विशेषतः । प्रब्रूहि मे प्रजानाथ गुहजन्म तथैव च

tadutpattiṁ vivāhaṁ ca śivāyāstu viśeṣataḥ prabrūhi me prajānātha guhajanma tathaiva ca

हे प्रजानाथ! शिवा (पार्वती) की उत्पत्ति और विवाह का भी विशेष रूप से वर्णन कीजिए, और साथ ही गुह (कार्तिकेय) के जन्म का भी।

श्लोक 34 (shiva.rudra.5.34)

बहुभ्यश्च श्रुतं पूर्वं न तृप्तोऽस्मि जगत्प्रभो । अतस्त्वां शरणं प्राप्तः कृपां कुरु ममोपरि

bahubhyaśca śrutaṁ pūrvaṁ na tṛpto'smi jagatprabho atastvāṁ śaraṇaṁ prāptaḥ kṛpāṁ kuru mamopari

हे जगत्प्रभो! मैंने पहले भी बहुतों से सुना है, फिर भी तृप्त नहीं हूँ; इसलिए मैं आपकी शरण में आया हूँ, मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 35 (shiva.rudra.5.35)

इति श्रुत्वा वचस्तस्य नारदस्याङ्गजस्य हि । उवाच वचनं तत्र ब्रह्मा लोकपितामहः

iti śrutvā vacastasya nāradasyāṅgajasya hi uvāca vacanaṁ tatra brahmā lokapitāmahaḥ

अपने पुत्र नारद के इन वचनों को सुनकर लोकों के पितामह ब्रह्मा ने वहाँ यह वचन कहा।

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