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रुद्र संहिता · अध्याय 54

यज्ञवाटे देवानां दुःशकुनदर्शनम्

अध्याय 53अध्याय-सूचीअध्याय 55

श्लोक 1 (shiva.rudra.54.1)

ब्रह्मोवाच । एवं प्रचलिते चास्मिन् वीरभद्रे गणान्विते । दुष्टचिह्नानि दक्षेण दृष्टानि विबुधैरपि

brahmovāca | evaṁ pracalite cāsmin vīrabhadre gaṇānvite | duṣṭacihnāni dakṣeṇa dṛṣṭāni vibudhairapi

ब्रह्मा ने कहा — इस प्रकार गणों सहित वीरभद्र के चल पड़ने पर, दक्ष और देवगणों ने भी दुष्ट लक्षण देखे।

श्लोक 2 (shiva.rudra.54.2)

उत्पाता विविधाश्चासन् वीरभद्रे गणान्विते । त्रिविधा अपि देवर्षे यज्ञविध्वंससूचकाः

utpātā vividhāścāsan vīrabhadre gaṇānvite | trividhā api devarṣe yajñavidhvaṁsasūcakāḥ

हे देवर्षे! वीरभद्र के आगे बढ़ने पर नाना प्रकार के उत्पात हुए — तीन प्रकार के, जो सभी यज्ञ के विध्वंस के सूचक थे।

श्लोक 3 (shiva.rudra.54.3)

दक्षवामाक्षिबाहूरुविस्पन्दः समजायत । नानाकष्टप्रदस्तात सर्वथाशुभसूचकः

dakṣavāmākṣibāhūruvispandaḥ samajāyata | nānākaṣṭapradastāta sarvathāśubhasūcakaḥ

दक्ष की बायीं आँख, भुजा और जांघ फड़कने लगीं — हे तात! यह नाना कष्ट देने वाला, सर्वथा अशुभ का सूचक था।

श्लोक 4 (shiva.rudra.54.4)

भूकम्पः समभूत्तत्र दक्षयागस्थले तदा । दक्षोऽपश्यच्च मध्याह्ने नक्षत्राण्यद्भुतानि च

bhūkampaḥ samabhūttatra dakṣayāgasthale tadā | dakṣo'paśyacca madhyāhne nakṣatrāṇyadbhutāni ca

उस समय दक्ष के यज्ञ-स्थल में भूकंप हुआ, और दक्ष ने मध्याह्न में ही अद्भुत नक्षत्रों को देखा।

श्लोक 5 (shiva.rudra.54.5)

दिशश्चासन्सुमलिनाः कर्बुरोऽभूद्दिवाकरः । परिवेषसहस्रेण सङ्क्रान्तश्च भयङ्करः

diśaścāsansumalināḥ karburo'bhūddivākaraḥ | pariveṣasahasreṇa saṅkrāntaśca bhayaṅkaraḥ

दिशाएँ अत्यंत मलिन हो गयीं, सूर्य चितकबरा हो गया, और सहस्र भयंकर परिवेषों (प्रभामंडलों) से घिर गया।

श्लोक 6 (shiva.rudra.54.6)

नक्षत्राणि पतन्ति स्म विद्युदग्निप्रभाणि च । नक्षत्राणामभूद्वक्रा गतिश्चाधोमुखी तदा

nakṣatrāṇi patanti sma vidyudagniprabhāṇi ca | nakṣatrāṇāmabhūdvakrā gatiścādhomukhī tadā

बिजली और अग्नि के समान प्रभा वाले नक्षत्र गिरने लगे, और नक्षत्रों की गति टेढ़ी होकर नीचे की ओर मुड़ गयी।

श्लोक 7 (shiva.rudra.54.7)

गृध्रा दक्षशिरः स्पृष्ट्वा समुद्भूताः सहस्रशः । आसीद् गृध्रपक्षच्छायैः सच्छायो यागमण्डपः

gṛdhrā dakṣaśiraḥ spṛṣṭvā samudbhūtāḥ sahasraśaḥ | āsīd gṛdhrapakṣacchāyaiḥ sacchāyo yāgamaṇḍapaḥ

दक्ष के सिर का स्पर्श करती हुई हजारों गिद्ध उठ खड़े हुए, और यज्ञ-मंडप गिद्धों के पंखों की छाया से आच्छादित हो गया।

श्लोक 8 (shiva.rudra.54.8)

ववाशिरे यागभूमौ क्रोष्टारो नेत्रकस्तदा । उल्कावृष्टिरभूत्तत्र श्वेतवृश्चिकसम्भवा

vavāśire yāgabhūmau kroṣṭāro netrakastadā | ulkāvṛṣṭirabhūttatra śvetavṛścikasambhavā

यज्ञ-भूमि पर उस समय गीदड़ आँखें गड़ाए हुए बोलने लगे, और वहाँ श्वेत बिच्छुओं के रूप में उल्का-वर्षा हुई।

श्लोक 9 (shiva.rudra.54.9)

खरा वाता ववुस्तत्र पांशुवृष्टिसमन्विताः । शलभाश्च समुद्भूता विवर्तानिलकम्पिताः

kharā vātā vavustatra pāṁśuvṛṣṭisamanvitāḥ | śalabhāśca samudbhūtā vivartānilakampitāḥ

वहाँ धूल-वर्षा से युक्त तीक्ष्ण आँधियाँ चलीं, और बवंडर से कंपित होकर टिड्डियाँ उमड़ पड़ीं।

श्लोक 10 (shiva.rudra.54.10)

नीतश्च पवनैरूर्ध्वं स दक्षाध्वरमण्डपः । दैवान्वितेन दक्षेण यः कृतो नूतनोऽद्भुतः

nītaśca pavanairūrdhvaṁ sa dakṣādhvaramaṇḍapaḥ | daivānvitena dakṣeṇa yaḥ kṛto nūtano'dbhutaḥ

और दैववश दक्ष द्वारा नवीन तथा अद्भुत बनाया गया वह यज्ञ-मंडप हवाओं से ऊपर उठा लिया गया।

श्लोक 11 (shiva.rudra.54.11)

वेमुर्दक्षादयः सर्वे तदा शोणितमद्भुतम् । वेमुश्च मांसखण्डानि सशल्यानि मुहुर्मुहुः

vemurdakṣādayaḥ sarve tadā śoṇitamadbhutam | vemuśca māṁsakhaṇḍāni saśalyāni muhurmuhuḥ

दक्ष आदि सब लोगों ने तब अद्भुत रुधिर की वमन की, और बार-बार हड्डी के टुकड़ों सहित मांस-खंडों को भी उगला।

श्लोक 12 (shiva.rudra.54.12)

सकम्पाश्च बभूवुस्ते दीपा वातहता इव । दुःखिताश्चाभवन्सर्वे शस्त्रधाराहता इव

sakampāśca babhūvuste dīpā vātahatā iva | duḥkhitāścābhavansarve śastradhārāhatā iva

वे वायु से आहत दीपकों के समान काँपने लगे, और शस्त्र-धार से आहत लोगों के समान सब दुःखी हो गये।

श्लोक 13 (shiva.rudra.54.13)

तदा निनादजातानि बाष्पवर्षाणि तत्क्षणे । प्रातस्तुषारवर्षीणि पद्मानीव वनान्तरे

tadā ninādajātāni bāṣpavarṣāṇi tatkṣaṇe | prātastuṣāravarṣīṇi padmānīva vanāntare

तब तत्क्षण ही करुण ध्वनियों सहित अश्रु-वर्षा हुई — मानो वन के भीतर प्रातःकाल के तुषार से भीगे कमल हों।

श्लोक 14 (shiva.rudra.54.14)

दक्षाद्यक्षीणि जातानि ह्यकस्माद्विशदान्यपि । निशायां कमलाश्चैव कुमुदानीव सङ्गवे

dakṣādyakṣīṇi jātāni hyakasmādviśadānyapi | niśāyāṁ kamalāścaiva kumudānīva saṅgave

दक्ष आदि की आँखें सहसा पीली और खुली हुई-सी हो गयीं — मानो निशा में कमल, अथवा प्रातःकाल की सभा में कुमुद हों।

श्लोक 15 (shiva.rudra.54.15)

असृग्ववर्ष देवश्च तिमिरेणावृता दिशः । दिग्दाहोऽभूद्विशेषेण त्रासयन् सकलाञ्जनान्

asṛgvavarṣa devaśca timireṇāvṛtā diśaḥ | digdāho'bhūdviśeṣeṇa trāsayan sakalāñjanān

देवता ने रुधिर की वर्षा की, दिशाएँ अंधकार से आच्छादित हो गयीं; विशेष रूप से दिग्दाह हुआ, जो सम्पूर्ण लोगों को अत्यंत भयभीत कर रहा था।

श्लोक 16 (shiva.rudra.54.16)

एवंविधान्यरिष्टानि ददृशुर्विबुधादयः । भयमापेदिरेऽत्यन्तं मुने विष्ण्वादिकास्तदा

evaṁvidhānyariṣṭāni dadṛśurvibudhādayaḥ | bhayamāpedire'tyantaṁ mune viṣṇvādikāstadā

हे मुने! ऐसे-ऐसे अपशकुनों को देखकर देवगण आदि, विष्णु आदि भी, अत्यंत भय को प्राप्त हो गये।

श्लोक 17 (shiva.rudra.54.17)

भुवि ते मूर्छिताः पेतुर्हा हताः स्म इतीरयन् । तरवस्तीरसञ्जाता नदीवेगहता इव

bhuvi te mūrchitāḥ peturhā hatāḥ sma itīrayan | taravastīrasañjātā nadīvegahatā iva

वे मूर्छित होकर 'हाय! हम मारे गये' यह कहते हुए भूमि पर गिर पड़े — मानो नदी के वेग से गिराये गये तटवर्ती वृक्ष हों।

श्लोक 18 (shiva.rudra.54.18)

पतित्वा ते स्थिता भूमौ क्रूराः सर्पा हता इव । कन्दुका इव ते भूयः पतिताः पुनरुत्थिताः

patitvā te sthitā bhūmau krūrāḥ sarpā hatā iva | kandukā iva te bhūyaḥ patitāḥ punarutthitāḥ

गिरकर वे भूमि पर ऐसे पड़े रहे मानो मारे गये क्रूर सर्प हों, फिर गेंद के समान गिरकर पुनः उठ खड़े होते।

श्लोक 19 (shiva.rudra.54.19)

ततस्ते तापसन्तप्ता रुरुदुः कुररी इव । रोदनध्वनिसङ्क्रातोरुक्तिप्रत्युक्तिका इव

tataste tāpasantaptā ruruduḥ kurarī iva | rodanadhvanisaṅkrātoruktipratyuktikā iva

फिर संताप से जले हुए वे कुररी पक्षी के समान रोने लगे — मानो उनकी रोदन-ध्वनि ही परस्पर वचनों का आदान-प्रदान कर रही हो।

श्लोक 20 (shiva.rudra.54.20)

सवैकुण्ठास्ततः सर्वे तदा कुण्ठितशक्तयः । स्वस्वोपकण्ठमाकण्ठं लुलुठुः कमठा इव

savaikuṇṭhāstataḥ sarve tadā kuṇṭhitaśaktayaḥ | svasvopakaṇṭhamākaṇṭhaṁ luluṭhuḥ kamaṭhā iva

फिर वैकुंठपति सहित वे सभी, शक्तिहीन होकर, कछुओं के समान अपना-अपना गला दबाकर बिलखने लगे।

श्लोक 21 (shiva.rudra.54.21)

एतस्मिन्नन्तरे तत्र सञ्जाता चाशरीरवाक् । श्रावयत्यखिलान् देवान् दक्षं चैव विशेषतः

etasminnantare tatra sañjātā cāśarīravāk | śrāvayatyakhilān devān dakṣaṁ caiva viśeṣataḥ

इसी बीच वहाँ एक अशरीर वाणी प्रकट हुई, जो सम्पूर्ण देवों को और विशेष रूप से दक्ष को सुनाई पड़ी।

श्लोक 22 (shiva.rudra.54.22)

आकाशवाण्युवाच । धिक् जन्म तव दक्षाद्य महामूढोऽसि पापधीः ॥ भविष्यति महद्दुःखमनिवार्यं हरोद्भवम्

ākāśavāṇyuvāca | dhik janma tava dakṣādya mahāmūḍho'si pāpadhīḥ || bhaviṣyati mahadduḥkhamanivāryaṁ harodbhavam

आकाशवाणी ने कहा — हे दक्ष! आज तेरे जन्म को धिक्कार है, तू महामूर्ख और पापबुद्धि है। हर से उत्पन्न महान, अनिवार्य दुःख अब होगा।

श्लोक 23 (shiva.rudra.54.23)

सहायिनोऽत्र ये मूढास्तव देवादयः स्थिताः । तेषामपि महद्दुःखं भविष्यति न संशयः

sahāyino'tra ye mūḍhāstava devādayaḥ sthitāḥ | teṣāmapi mahadduḥkhaṁ bhaviṣyati na saṁśayaḥ

यहाँ जो मूढ़ देवगण आदि तेरे सहायक बनकर खड़े हैं, उन्हें भी निश्चय ही महान दुःख प्राप्त होगा।

श्लोक 24 (shiva.rudra.54.24)

ब्रह्मोवाच । तच्छ्रुत्वाकाशवचनं दृष्ट्वारिष्टानि तानि च । दक्षः प्रापद्भयं चाति परे देवादयोऽपि ह

brahmovāca | tacchrutvākāśavacanaṁ dṛṣṭvāriṣṭāni tāni ca | dakṣaḥ prāpadbhayaṁ cāti pare devādayo'pi ha

ब्रह्मा ने कहा — उस आकाशवाणी को सुनकर और उन अपशकुनों को देखकर दक्ष अत्यंत भयभीत हो गया, और अन्य देवगण भी।

श्लोक 25 (shiva.rudra.54.25)

वेपमानस्तदा दक्षो विकलश्चाति चेतसि । अगच्छच्छरणं विष्णोः स्वप्रभोरिन्दिरापतेः

vepamānastadā dakṣo vikalaścāti cetasi | agacchaccharaṇaṁ viṣṇoḥ svaprabhorindirāpateḥ

तब कांपता हुआ, चित्त में अत्यंत विकल दक्ष अपने स्वामी, इंदिरापति विष्णु की शरण में गया।

श्लोक 26 (shiva.rudra.54.26)

सुप्रणम्य भयाविष्टः संस्तूय च विचेतनः । अवोचद्देवदेवं तं विष्णुं स्वजनवत्सलम्

supraṇamya bhayāviṣṭaḥ saṁstūya ca vicetanaḥ | avocaddevadevaṁ taṁ viṣṇuṁ svajanavatsalam

भयाकुल और विचेतन-सा भलीभाँति प्रणाम कर, स्तुति करते हुए, उसने अपने भक्तों के प्रति सदा स्नेहशील उन देवाधिदेव विष्णु से यह कहा।

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