रुद्र संहिता · अध्याय 57
दक्ष यज्ञ का विध्वंस
श्लोक 1 (shiva.rudra.57.1)
ब्रह्मोवाच । वीरभद्रोऽथ युद्धे वै विष्णुना स महाबलः । संस्मृत्य शङ्करं चित्ते सर्वापद्विनिवारणम्
brahmovāca | vīrabhadro'tha yuddhe vai viṣṇunā sa mahābalaḥ | saṁsmṛtya śaṅkaraṁ citte sarvāpadvinivāraṇam
ब्रह्मा ने कहा — तत्पश्चात् उस युद्ध में महाबली वीरभद्र ने सभी विपत्तियों का निवारण करने वाले शंकर का मन में स्मरण किया।
श्लोक 2 (shiva.rudra.57.2)
आरुह्य स्यन्दनं दिव्यं सर्ववैरिविमर्दनः । गृहीत्वा परमास्त्राणि सिंहनादं जगर्ज ह
āruhya syandanaṁ divyaṁ sarvavairivimardanaḥ | gṛhītvā paramāstrāṇi siṁhanādaṁ jagarja ha
सभी शत्रुओं का मर्दन करने वाले उस वीर ने दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर परम अस्त्र ग्रहण किए और सिंहनाद किया।
श्लोक 3 (shiva.rudra.57.3)
विष्णुश्चापि महाघोषं पाञ्चजन्याभिधं निजम् । दध्मौ बली महाशङ्खं स्वकीयान् हर्षयन्निव
viṣṇuścāpi mahāghoṣaṁ pāñcajanyābhidhaṁ nijam | dadhmau balī mahāśaṅkhaṁ svakīyān harṣayanniva
बलवान विष्णु ने भी अपने पाञ्चजन्य नामक महाशंख को बजाया, मानो अपने ही जनों को हर्षित कर रहे हों।
श्लोक 4 (shiva.rudra.57.4)
तच्छ्रुत्वा शङ्खनिर्ह्रादं देवा ये च पलायिताः । रणं हित्वा गताः पूर्वं ते द्रुतं पुनराययुः
tacchrutvā śaṅkhanirhrādaṁ devā ye ca palāyitāḥ | raṇaṁ hitvā gatāḥ pūrvaṁ te drutaṁ punarāyayuḥ
उस शंख की गर्जना सुनकर जो देवगण पहले युद्ध छोड़कर भाग गए थे, वे शीघ्र ही पुनः लौट आए।
श्लोक 5 (shiva.rudra.57.5)
वीरभद्रगणैस्ते तु लोकपालाः सवासवाः । युद्धं चक्रुस्तथा सिंहनादं कृत्वा बलान्विताः
vīrabhadragaṇaiste tu lokapālāḥ savāsavāḥ | yuddhaṁ cakrustathā siṁhanādaṁ kṛtvā balānvitāḥ
तब लोकपाल इन्द्र सहित बलशाली होकर वीरभद्र के गणों से सिंहनाद करते हुए युद्ध करने लगे।
श्लोक 6 (shiva.rudra.57.6)
गणानां लोकपालानां द्वन्द्वयुद्धं भयावहम् । अभवत्तत्र तुमुलं गर्जतां सिंहनादतः
gaṇānāṁ lokapālānāṁ dvandvayuddhaṁ bhayāvaham | abhavattatra tumulaṁ garjatāṁ siṁhanādataḥ
गणों और लोकपालों के मध्य वह भयंकर द्वन्द्व-युद्ध वहाँ अत्यंत भयावह हो उठा, सिंहनादों से गूँजता हुआ।
श्लोक 7 (shiva.rudra.57.7)
नन्दिना युयुधे शक्रोऽनलो वै चाश्मना तथा । कुबेरोऽपि हि कूष्माण्डपतिना युयुधे बली
nandinā yuyudhe śakro'nalo vai cāśmanā tathā | kubero'pi hi kūṣmāṇḍapatinā yuyudhe balī
इन्द्र ने नन्दी से, अनल ने अश्मा से युद्ध किया; तथा बलवान कुबेर ने कूष्माण्ड के स्वामी से युद्ध किया।
श्लोक 8 (shiva.rudra.57.8)
तदेन्द्रेण हतो नन्दी वज्रेण शतपर्वणा
tadendreṇa hato nandī vajreṇa śataparvaṇā
तब इन्द्र ने अपने शतपर्व वज्र से नन्दी पर आघात किया।
श्लोक 9 (shiva.rudra.57.9)
नन्दिना च हतः शक्रस्त्रिशूलेन स्तनान्तरे
nandinā ca hataḥ śakrastriśūlena stanāntare
और नन्दी ने अपने त्रिशूल से इन्द्र की छाती के मध्य में प्रहार किया।
श्लोक 10 (shiva.rudra.57.10)
बलिनौ द्वावपि प्रीत्या युयुधाते परस्परम् । नानाघातांश्च कुर्वन्तौ नन्दिशक्रौ जिगीषया
balinau dvāvapi prītyā yuyudhāte parasparam | nānāghātāṁśca kurvantau nandiśakrau jigīṣayā
वे दोनों बलवान नन्दी और इन्द्र विजय की इच्छा से एक-दूसरे पर विविध प्रहार करते हुए प्रीतिपूर्वक युद्ध करने लगे।
श्लोक 11 (shiva.rudra.57.11)
शक्त्या जघान चाश्मानं शुचिः परमकोपनः । सोऽपि शूलेन तं वेगाच्छितधारेण पावकम्
śaktyā jaghāna cāśmānaṁ śuciḥ paramakopanaḥ | so'pi śūlena taṁ vegācchitadhāreṇa pāvakam
अत्यंत क्रोधित शुचि (अग्नि) ने शक्ति से अश्मा पर प्रहार किया; उसने भी वेगपूर्वक तीक्ष्ण त्रिशूल से पावक (अग्नि) पर प्रहार किया।
श्लोक 12 (shiva.rudra.57.12)
यमेन सह सङ्ग्रामं महालोको गणाग्रणीः । चकार तुमुलं वीरो महादेवं स्मरन्मुदा
yamena saha saṅgrāmaṁ mahāloko gaṇāgraṇīḥ | cakāra tumulaṁ vīro mahādevaṁ smaranmudā
गणों में अग्रणी महालोक ने आनंदपूर्वक महादेव का स्मरण करते हुए यम के साथ भयंकर युद्ध किया।
श्लोक 13 (shiva.rudra.57.13)
नैरृतेन समागम्य चण्डश्च बलवत्तरः । युयुधे परमास्त्रैश्च नैरृतिं निविडम्बयन्
nairṛtena samāgamya caṇḍaśca balavattaraḥ | yuyudhe paramāstraiśca nairṛtiṁ niviḍambayan
अधिक बलवान चण्ड ने नैर्ऋत से भेंट कर परम अस्त्रों से युद्ध करते हुए उसे अत्यंत विवश कर दिया।
श्लोक 14 (shiva.rudra.57.14)
वरुणेन समं वीरो मुण्डश्चैव महाबलः । युयुधे परया शक्त्या त्रिलोकीं विस्मयन्निव
varuṇena samaṁ vīro muṇḍaścaiva mahābalaḥ | yuyudhe parayā śaktyā trilokīṁ vismayanniva
महाबली वीर मुण्ड ने वरुण के साथ परम शक्ति से युद्ध किया, मानो तीनों लोकों को विस्मित कर रहा हो।
श्लोक 15 (shiva.rudra.57.15)
वायुना च हतो भृङ्गी स्वास्त्रेण परमौजसा । भृङ्गिणा च हतो वायुस्त्रिशूलेन प्रतापिना
vāyunā ca hato bhṛṅgī svāstreṇa paramaujasā | bhṛṅgiṇā ca hato vāyustriśūlena pratāpinā
वायु ने अपने परम तेजस्वी अस्त्र से भृंगी पर प्रहार किया; और भृंगी ने भी अपने त्रिशूल से प्रतापी वायु पर प्रहार किया।
श्लोक 16 (shiva.rudra.57.16)
कुबेरेणैव सङ्गम्य कूष्माण्डपतिरादरात् । युयुधे बलवान् वीरो ध्यात्वा हृदि महेश्वरम्
kubereṇaiva saṅgamya kūṣmāṇḍapatirādarāt | yuyudhe balavān vīro dhyātvā hṛdi maheśvaram
कुबेर से आदरपूर्वक भेंट कर, महेश्वर का हृदय में ध्यान करते हुए, कूष्माण्डपति बलवान वीर ने युद्ध किया।
श्लोक 17 (shiva.rudra.57.17)
योगिनीचक्रसंयुक्तो भैरवीनायको महान् । विदार्य देवानखिलान् पपौ शोणितमद्भुतम्
yoginīcakrasaṁyukto bhairavīnāyako mahān | vidārya devānakhilān papau śoṇitamadbhutam
योगिनियों के समूह से युक्त भैरवियों के महान नायक ने समस्त देवों को विदीर्ण कर उनका अद्भुत रुधिर पान किया।
श्लोक 18 (shiva.rudra.57.18)
क्षेत्रपालास्तथा तत्र बुभुक्षुः सुरपुङ्गवान् । काली चापि विदार्यैव तान्पपौ रुधिरं बहु
kṣetrapālāstathā tatra bubhukṣuḥ surapuṅgavān | kālī cāpi vidāryaiva tānpapau rudhiraṁ bahu
वहाँ क्षेत्रपाल भी भूख से पीड़ित होकर श्रेष्ठ देवों पर टूट पड़े; और काली ने भी उन्हें विदीर्ण कर उनका बहुत-सा रुधिर पान किया।
श्लोक 19 (shiva.rudra.57.19)
अथ विष्णुर्महातेजा युयुधे तैश्च शत्रुहा । चक्रं चिक्षेप वेगेन दहन्निव दिशो दश
atha viṣṇurmahātejā yuyudhe taiśca śatruhā | cakraṁ cikṣepa vegena dahanniva diśo daśa
तब शत्रुओं के नाशक महातेजस्वी विष्णु ने उनसे युद्ध करते हुए इतने वेग से चक्र फेंका मानो दसों दिशाओं को जला रहे हों।
श्लोक 20 (shiva.rudra.57.20)
क्षेत्रपालः समायान्तं चक्रमालोक्य वेगतः । तत्रागत्यागतो वीरश्चाग्रसत्सहसा बली
kṣetrapālaḥ samāyāntaṁ cakramālokya vegataḥ | tatrāgatyāgato vīraścāgrasatsahasā balī
उस वेगपूर्वक आते हुए चक्र को देखकर वीर क्षेत्रपाल तुरंत वहाँ आकर उसे एकाएक निगल गया।
श्लोक 21 (shiva.rudra.57.21)
चक्रं ग्रसितमालोक्य विष्णुः परपुरञ्जयः । मुखं तस्य परामृज्य तमुद्गालितवानरिम्
cakraṁ grasitamālokya viṣṇuḥ parapurañjayaḥ | mukhaṁ tasya parāmṛjya tamudgālitavānarim
अपने चक्र को निगला हुआ देखकर शत्रु-नगरों के विजेता विष्णु ने उसका मुख मसलकर उससे चक्र को पुनः उगलवा दिया।
श्लोक 22 (shiva.rudra.57.22)
स्वचक्रमादाय महानुभावः चुकोप चातीव भवैकभर्ता । महाबली तैर्युयुधे प्रवीरैः सङ्क्रुद्धनानायुधधारकोऽस्त्रैः
svacakramādāya mahānubhāvaḥ cukopa cātīva bhavaikabhartā | mahābalī tairyuyudhe pravīraiḥ saṅkruddhanānāyudhadhārako'straiḥ
संसार के एकमात्र आधार वे महानुभाव विष्णु अपना चक्र वापस लेकर अत्यंत क्रुद्ध हो उठे; वह महाबली उन प्रवीर गणों से क्रोधपूर्वक नाना अस्त्र-शस्त्र धारण कर युद्ध करने लगे।
श्लोक 23 (shiva.rudra.57.23)
चक्रे महारणं विष्णुः तैः सार्धं युयुधे मुदा । नानायुधानि सङ्क्षिप्य तुमुलं भीमविक्रमम्
cakre mahāraṇaṁ viṣṇuḥ taiḥ sārdhaṁ yuyudhe mudā | nānāyudhāni saṅkṣipya tumulaṁ bhīmavikramam
विष्णु ने उनके साथ आनंदपूर्वक महायुद्ध छेड़ा, नाना आयुध चलाते हुए अत्यंत भीषण पराक्रम का तुमुल युद्ध किया।
श्लोक 24 (shiva.rudra.57.24)
अथ ते भैरवाद्याश्च युयुधुस्तेन भूरिशः । नानास्त्राणि विमुञ्चन्तः सङ्कुद्धाः परमौजसा
atha te bhairavādyāśca yuyudhustena bhūriśaḥ | nānāstrāṇi vimuñcantaḥ saṅkuddhāḥ paramaujasā
तब भैरव आदि गणों ने भी अत्यंत क्रुद्ध होकर परम बल से बार-बार नाना अस्त्र छोड़ते हुए उनसे युद्ध किया।
श्लोक 25 (shiva.rudra.57.25)
इत्थं तेषां रणं दृष्ट्वा हरिणातुलतेजसा । विनिवृत्य समागम्य तान्स्वयं युयुधे बली
itthaṁ teṣāṁ raṇaṁ dṛṣṭvā hariṇātulatejasā | vinivṛtya samāgamya tānsvayaṁ yuyudhe balī
उनका ऐसा युद्ध देखकर अतुल तेजस्वी हरि स्वयं लौट आए और उनके पास पहुँचकर स्वयं बलपूर्वक युद्ध करने लगे।
श्लोक 26 (shiva.rudra.57.26)
अथ विष्णुर्महातेजाश्चक्रमुद्यम्य मूर्च्छितः । युयुधे भगवांस्तेन वीरभद्रेण माधवः
atha viṣṇurmahātejāścakramudyamya mūrcchitaḥ | yuyudhe bhagavāṁstena vīrabhadreṇa mādhavaḥ
तब अत्यंत क्रोधित हो, चक्र उठाकर, महातेजस्वी भगवान माधव विष्णु ने वीरभद्र से युद्ध किया।
श्लोक 27 (shiva.rudra.57.27)
तयोः समभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम् । महावीराब्धिपत्योस्तु नानास्त्रधरयोर्मुने
tayoḥ samabhavadyuddhaṁ sughoraṁ romaharṣaṇam | mahāvīrābdhipatyostu nānāstradharayormune
हे मुने! उन दोनों महावीरों — जो बल के समुद्र समान थे और नाना अस्त्र धारण किए थे — के मध्य अत्यंत भयंकर और रोमांचकारी युद्ध हुआ।
श्लोक 28 (shiva.rudra.57.28)
विष्णोर्योगबलात्तस्य देहादेव सुदारुणाः । शङ्खचक्रगदाहस्ता असङ्ख्याताश्च जज्ञिरे
viṣṇoryogabalāttasya dehādeva sudāruṇāḥ | śaṅkhacakragadāhastā asaṅkhyātāśca jajñire
विष्णु के योगबल से उन्हीं के शरीर से शंख, चक्र और गदा धारण किए हुए असंख्य अत्यंत भयंकर योद्धा उत्पन्न हो गए।
श्लोक 29 (shiva.rudra.57.29)
ते चापि युयुधुस्तेन वीरभद्रेण भाषता । विष्णुवत् बलवन्तो हि नानायुधधरा गणाः
te cāpi yuyudhustena vīrabhadreṇa bhāṣatā | viṣṇuvat balavanto hi nānāyudhadharā gaṇāḥ
विष्णु के समान बलवान, नाना आयुधधारी वे गण भी वीरभद्र के बोलते-बोलते ही उनसे युद्ध करने लगे।
श्लोक 30 (shiva.rudra.57.30)
तान्सर्वानपि वीरोऽसौ नारायणसमप्रभान् । भस्मीचकार शूलेन हत्वा स्मृत्वा शिवं प्रभुम्
tānsarvānapi vīro'sau nārāyaṇasamaprabhān | bhasmīcakāra śūlena hatvā smṛtvā śivaṁ prabhum
उस वीर ने प्रभु शिव का स्मरण करते हुए, नारायण के समान तेजस्वी उन सभी को त्रिशूल से मारकर भस्म कर दिया।
श्लोक 31 (shiva.rudra.57.31)
ततश्चोरसि तं विष्णुं लीलयैव रणाजिरे । जघान वीरभद्रो हि त्रिशूलेन महाबली
tataścorasi taṁ viṣṇuṁ līlayaiva raṇājire | jaghāna vīrabhadro hi triśūlena mahābalī
तत्पश्चात् महाबली वीरभद्र ने रणभूमि में मानो क्रीड़ा करते हुए ही अपने त्रिशूल से विष्णु की छाती पर प्रहार किया।
श्लोक 32 (shiva.rudra.57.32)
तेन घातेन सहसा विहतः पुरुषोत्तमः । पपात च तदा भूमौ विसंज्ञोऽभून्मुने हरिः
tena ghātena sahasā vihataḥ puruṣottamaḥ | papāta ca tadā bhūmau visaṁjño'bhūnmune hariḥ
उस प्रहार से पुरुषोत्तम विष्णु एकाएक आहत होकर भूमि पर गिर पड़े और हे मुने! अचेत हो गए।
श्लोक 33 (shiva.rudra.57.33)
ततो जज्ञेऽद्भुतं तेजः प्रलयानलसन्निभम् । त्रैलोक्यदाहकं तीव्रं वीराणामपि भीकरम्
tato jajñe'dbhutaṁ tejaḥ pralayānalasannibham | trailokyadāhakaṁ tīvraṁ vīrāṇāmapi bhīkaram
तब वहाँ प्रलयाग्नि के समान एक अद्भुत तेज उत्पन्न हुआ, जो तीव्र था, तीनों लोकों को जलाने वाला था, और वीरों को भी भयभीत करने वाला था।
श्लोक 34 (shiva.rudra.57.34)
क्रोधरक्तेक्षणः श्रीमान् पुनरुत्थाय स प्रभुः । प्रहर्तुं चक्रमुद्यम्य ह्यतिष्ठत्पुरुषर्षभः
krodharaktekṣaṇaḥ śrīmān punarutthāya sa prabhuḥ | prahartuṁ cakramudyamya hyatiṣṭhatpuruṣarṣabhaḥ
क्रोध से रक्त-नेत्र हुए वे श्रीमान प्रभु, पुरुषों में श्रेष्ठ, पुनः उठकर प्रहार करने हेतु चक्र उठाकर खड़े हो गए।
श्लोक 35 (shiva.rudra.57.35)
तस्य चक्रं महारौद्रं कालादित्यसमप्रभम् । व्यष्टम्भयददीनात्मा वीरभद्रः शिवः प्रभुः
tasya cakraṁ mahāraudraṁ kālādityasamaprabham | vyaṣṭambhayadadīnātmā vīrabhadraḥ śivaḥ prabhuḥ
प्रलयकालीन सूर्य के समान तेजस्वी उनके उस अत्यंत रौद्र चक्र को अदीन-आत्मा प्रभु वीरभद्र शिव ने स्तंभित कर दिया।
श्लोक 36 (shiva.rudra.57.36)
मुने शम्भोः प्रभावात्तु मायेशस्य महाप्रभोः । न चचाल हरेश्चक्रं करस्थं स्तम्भितं ध्रुवम्
mune śambhoḥ prabhāvāttu māyeśasya mahāprabhoḥ | na cacāla hareścakraṁ karasthaṁ stambhitaṁ dhruvam
हे मुने! माया के स्वामी महाप्रभु शम्भु के प्रभाव से हरि का वह चक्र हाथ में ही निश्चल होकर रुक गया, वह तनिक भी नहीं हिला।
श्लोक 37 (shiva.rudra.57.37)
अथ विष्णुर्गणेशेन वीरभद्रेण भाषता । अतिष्ठत् स्तम्भितस्तेन शृङ्गवानिव निश्चलः
atha viṣṇurgaṇeśena vīrabhadreṇa bhāṣatā | atiṣṭhat stambhitastena śṛṅgavāniva niścalaḥ
तब गणों के स्वामी वीरभद्र के बोलते-बोलते ही स्तंभित हुए विष्णु पर्वत-शिखर के समान निश्चल खड़े रह गए।
श्लोक 38 (shiva.rudra.57.38)
ततो विष्णुः स्तम्भितो हि वीरभद्रेण नारद । यज्वोपमन्त्रणमनुं निःस्तम्भनकरं जपन्
tato viṣṇuḥ stambhito hi vīrabhadreṇa nārada | yajvopamantraṇamanuṁ niḥstambhanakaraṁ japan
हे नारद! तब वीरभद्र द्वारा स्तंभित किए गए विष्णु ने यज्वा द्वारा उपदिष्ट, स्तंभन को दूर करने वाले मंत्र का जप किया।
श्लोक 39 (shiva.rudra.57.39)
ततः स्तम्भननिर्मुक्तः शार्ङ्गधन्वा रमेश्वरः । शार्ङ्गं जग्राह स क्रुद्धः स्वधनुः सशरं मुने
tataḥ stambhananirmuktaḥ śārṅgadhanvā rameśvaraḥ | śārṅgaṁ jagrāha sa kruddhaḥ svadhanuḥ saśaraṁ mune
तब उस स्तंभन से मुक्त होकर, हे मुने! शार्ङ्गधन्वा रमेश्वर विष्णु ने क्रुद्ध होकर बाणसहित अपना शार्ङ्ग धनुष उठा लिया।
श्लोक 40 (shiva.rudra.57.40)
त्रिभिश्च धर्षितं बाणैस्तेन शार्ङ्गधनुर्हरेः । वीरभद्रेण तत्तात त्रिधाभूत्तत्क्षणान्मुने
tribhiśca dharṣitaṁ bāṇaistena śārṅgadhanurhareḥ | vīrabhadreṇa tattāta tridhābhūttatkṣaṇānmune
किंतु हे तात, हे मुने! वीरभद्र के तीन बाणों से आहत होकर हरि का वह शार्ङ्ग धनुष उसी क्षण तीन टुकड़ों में टूट गया।
श्लोक 41 (shiva.rudra.57.41)
अथ विष्णुर्महावाण्या बोधितस्तं महागणम् । असह्यवर्चसं ज्ञात्वा ह्यन्तर्धातुं मनो दधे
atha viṣṇurmahāvāṇyā bodhitastaṁ mahāgaṇam | asahyavarcasaṁ jñātvā hyantardhātuṁ mano dadhe
तब उस महान वाणी से जागृत हुए विष्णु ने उस महागण के तेज को असह्य जानकर अंतर्ध्यान होने का मन बना लिया।
श्लोक 42 (shiva.rudra.57.42)
ज्ञात्वा च तत्सर्वमिदं भविष्यं सतीकृतं दुष्प्रसहं परेषाम् । गताः स्वलोकं स्वगणान्वितास्तु स्मृत्वा शिवं सर्वपतिं स्वतन्त्रम्
jñātvā ca tatsarvamidaṁ bhaviṣyaṁ satīkṛtaṁ duṣprasahaṁ pareṣām | gatāḥ svalokaṁ svagaṇānvitāstu smṛtvā śivaṁ sarvapatiṁ svatantram
यह सब कुछ सती द्वारा किए जाने से भविष्य में होने वाला ही था, और दूसरों के लिए असह्य था — यह जानकर वे सब अपने-अपने गणों सहित, सबके स्वतंत्र स्वामी शिव का स्मरण करते हुए, अपने-अपने लोक को चले गए।
श्लोक 43 (shiva.rudra.57.43)
सत्यलोकगतश्चाहं पुत्रशोकेन पीडितः । अचिन्तयं सुदुःखार्तो मया किं कार्यमद्य वै
satyalokagataścāhaṁ putraśokena pīḍitaḥ | acintayaṁ suduḥkhārto mayā kiṁ kāryamadya vai
मैं सत्यलोक जाकर पुत्र-शोक से पीड़ित हो, अत्यंत दुःखार्त होकर सोचने लगा — अब मुझे क्या करना चाहिए?
श्लोक 44 (shiva.rudra.57.44)
विष्णौ मयि गते चैव देवाश्च मुनिभिः सह । विनिर्जिता गणैः सर्वे ये ते यज्ञोपजीविनः
viṣṇau mayi gate caiva devāśca munibhiḥ saha | vinirjitā gaṇaiḥ sarve ye te yajñopajīvinaḥ
विष्णु और मेरे चले जाने पर, उस यज्ञ पर आश्रित रहने वाले सभी देव और मुनि गणों द्वारा पूर्णतः पराजित हो गए।
श्लोक 45 (shiva.rudra.57.45)
तमुपद्रवमालक्ष्य विध्वस्तं च महामखम् । मृगस्वरूपो यज्ञो हि महाभीतोऽपि दुद्रुवे
tamupadravamālakṣya vidhvastaṁ ca mahāmakham | mṛgasvarūpo yajño hi mahābhīto'pi dudruve
उस उपद्रव और महायज्ञ के विध्वंस को देखकर, मृगरूपधारी यज्ञ भी अत्यंत भयभीत होकर भाग खड़ा हुआ।
श्लोक 46 (shiva.rudra.57.46)
तं तदा मृगरूपेण धावन्तं गगनं प्रति । वीरभद्रः समादाय विशिरस्कमथाकरोत्
taṁ tadā mṛgarūpeṇa dhāvantaṁ gaganaṁ prati | vīrabhadraḥ samādāya viśiraskamathākarot
तब आकाश की ओर मृगरूप में भागते हुए उस यज्ञ को वीरभद्र ने पकड़कर उसका सिर काट डाला।
श्लोक 47 (shiva.rudra.57.47)
ततः प्रजापतिं धर्मं कश्यपं च प्रगृह्य सः । अरिष्टनेमिनं वीरो बहुपुत्रं मुनीश्वरम्
tataḥ prajāpatiṁ dharmaṁ kaśyapaṁ ca pragṛhya saḥ | ariṣṭaneminaṁ vīro bahuputraṁ munīśvaram
तत्पश्चात् उस वीर ने प्रजापति धर्म को, कश्यप को, तथा बहुपुत्र मुनिश्रेष्ठ अरिष्टनेमि को पकड़ लिया।
श्लोक 48 (shiva.rudra.57.48)
मुनिमङ्गिरसं चैव कृशाश्वं च महागणः । जघान मूर्ध्नि पादेन दत्तं च मुनिपुङ्गवम्
munimaṅgirasaṁ caiva kṛśāśvaṁ ca mahāgaṇaḥ | jaghāna mūrdhni pādena dattaṁ ca munipuṅgavam
उस महागण ने मुनि अंगिरा और कृशाश्व को भी मारा, तथा मुनिश्रेष्ठ दत्त को सिर पर पैर रखकर रौंद डाला।
श्लोक 49 (shiva.rudra.57.49)
सरस्वत्याश्च नासाग्रं देवमातुस्तथैव च । चिच्छेद करजाग्रेण वीरभद्रः प्रतापवान्
sarasvatyāśca nāsāgraṁ devamātustathaiva ca | ciccheda karajāgreṇa vīrabhadraḥ pratāpavān
प्रतापी वीरभद्र ने अपने नखाग्र से सरस्वती की और देवमाता (अदिति) की नासिका के अग्रभाग को काट डाला।
श्लोक 50 (shiva.rudra.57.50)
ततोऽन्यानपि देवादीन् विदार्य पृथिवीतले । पातयामास सोऽयं वै क्रोधाक्रान्तातिलोचनः
tato'nyānapi devādīn vidārya pṛthivītale | pātayāmāsa so'yaṁ vai krodhākrāntātilocanaḥ
तत्पश्चात् क्रोध से अत्यंत आक्रांत नेत्रों वाले उस वीरभद्र ने अन्य देवों को भी विदीर्ण कर पृथ्वी पर गिरा दिया।
श्लोक 51 (shiva.rudra.57.51)
वीरभद्रो विदार्यापि देवान्मुख्यान्मुनीनपि । नाभूच्छान्तो द्रुतक्रोधः फणिराडिव मण्डितः
vīrabhadro vidāryāpi devānmukhyānmunīnapi | nābhūcchānto drutakrodhaḥ phaṇirāḍiva maṇḍitaḥ
देवों के प्रमुखों और मुनियों को भी विदीर्ण करने पर भी वीरभद्र का तीव्र क्रोध शांत नहीं हुआ — वह नागराज के समान सुशोभित हो रहा था।
श्लोक 52 (shiva.rudra.57.52)
वीरभद्रोद्धृतारातिः केसरीव वनद्विपान् । दिशो विलोकयामास कः कुत्रास्तीत्यनुक्षणम्
vīrabhadroddhṛtārātiḥ kesarīva vanadvipān | diśo vilokayāmāsa kaḥ kutrāstītyanukṣaṇam
वन के हाथियों के बीच सिंह के समान अपने शत्रुओं को उखाड़ फेंकने वाले वीरभद्र ने क्षण-क्षण में दिशाओं की ओर देखा, कि कौन कहाँ है।
श्लोक 53 (shiva.rudra.57.53)
व्यपोथयद् भृगुं यावन्मणिभद्रः प्रतापवान् । पदाक्रम्योरसि तदाकार्षीत्तच्छ्मश्रुलुञ्चनम्
vyapothayad bhṛguṁ yāvanmaṇibhadraḥ pratāpavān | padākramyorasi tadākārṣīttacchmaśruluñcanam
इतने में प्रतापी मणिभद्र ने भृगु को कुचल डाला और उनकी छाती पर पैर रखकर उनकी दाढ़ी-मूँछ उखाड़ डाली।
श्लोक 54 (shiva.rudra.57.54)
चण्डश्चोत्पाटयामास पूष्णो दन्तान् प्रवेगतः । शप्यमाने हरे पूर्वं योऽहसद्दर्शयन्दतः
caṇḍaścotpāṭayāmāsa pūṣṇo dantān pravegataḥ | śapyamāne hare pūrvaṁ yo'hasaddarśayandataḥ
चण्ड ने पूषा के दाँत वेगपूर्वक तोड़ डाले, जो पहले हरि को शाप देते समय दाँत दिखाकर हँसा था।
श्लोक 55 (shiva.rudra.57.55)
नन्दी भगस्य नेत्रे हि पातितस्य रुषा भुवि । उज्जहार दक्षमक्ष्णा यः शपन्तमसूसुचत्
nandī bhagasya netre hi pātitasya ruṣā bhuvi | ujjahāra dakṣamakṣṇā yaḥ śapantamasūsucat
नन्दी ने क्रोधवश भग को भूमि पर गिराकर उसकी दोनों आँखें उखाड़ डालीं — क्योंकि शाप देते समय उसी ने आँख के संकेत से उसका समर्थन किया था।
श्लोक 56 (shiva.rudra.57.56)
विडम्बिता स्वधा तत्र सा स्वाहा दक्षिणा तथा । मन्त्रास्तन्त्रास्तथा चान्ये तत्रस्था गणनायकैः
viḍambitā svadhā tatra sā svāhā dakṣiṇā tathā | mantrāstantrāstathā cānye tatrasthā gaṇanāyakaiḥ
वहाँ गणनायकों ने स्वधा, स्वाहा, और दक्षिणा का तथा वहाँ उपस्थित अन्य मंत्र और तंत्र देवताओं का भी उपहास किया।
श्लोक 57 (shiva.rudra.57.57)
ववृषुस्ते पुरीषाणि वितानाग्नौ रुषा गणाः । अनिर्वाच्यं तदा चक्रुर्गणा वीरास्तमध्वरम्
vavṛṣuste purīṣāṇi vitānāgnau ruṣā gaṇāḥ | anirvācyaṁ tadā cakrurgaṇā vīrāstamadhvaram
क्रोधित गणों ने यज्ञ-मण्डप की अग्नि पर मल-मूत्र की वर्षा की; उन वीर गणों ने उस यज्ञ को सर्वथा अवर्णनीय बना दिया।
श्लोक 58 (shiva.rudra.57.58)
अन्तर्वेद्यन्तरगतं निलीनं तद्भयाद् बलात् । आनिनाय समाज्ञाय वीरभद्रः स्वभूःसुतम्
antarvedyantaragataṁ nilīnaṁ tadbhayād balāt | ānināya samājñāya vīrabhadraḥ svabhūḥsutam
भय से बलपूर्वक वेदी के भीतर छिपे हुए स्वयंभू-पुत्र दक्ष को खोजकर वीरभद्र उसे बाहर खींच लाए।
श्लोक 59 (shiva.rudra.57.59)
कपोलेऽस्य गृहीत्वा तु खड्गेनोपहृतं शिरः । अभेद्यमभवत्तस्य तच्च योगप्रभावतः
kapole'sya gṛhītvā tu khaḍgenopahṛtaṁ śiraḥ | abhedyamabhavattasya tacca yogaprabhāvataḥ
उसके कपोल को पकड़कर तलवार से उसका सिर काटने का प्रयास किया, किंतु योग-प्रभाव से वह सिर अभेद्य रहा।
श्लोक 60 (shiva.rudra.57.60)
अभेद्यं तच्छिरो मत्वा शस्त्रास्त्रैश्च तु सर्वशः । करेण त्रोटयामास पद्भ्यामाक्रम्य चोरसि
abhedyaṁ tacchiro matvā śastrāstraiśca tu sarvaśaḥ | kareṇa troṭayāmāsa padbhyāmākramya corasi
उस सिर को शस्त्र-अस्त्रों से भी सर्वथा अभेद्य जानकर, उन्होंने उसकी छाती पर दोनों पैर रखकर हाथ से ही उसे उखाड़ डाला।
श्लोक 61 (shiva.rudra.57.61)
तच्छिरस्तस्य दुष्टस्य दक्षस्य हरवैरिणः । अग्निकुण्डे प्रचिक्षेप वीरभद्रो गणाग्रणीः
tacchirastasya duṣṭasya dakṣasya haravairiṇaḥ | agnikuṇḍe pracikṣepa vīrabhadro gaṇāgraṇīḥ
गणों में अग्रणी वीरभद्र ने हर के शत्रु उस दुष्ट दक्ष के उस सिर को यज्ञ-कुण्ड की अग्नि में डाल दिया।
श्लोक 62 (shiva.rudra.57.62)
रेजे तदा वीरभद्रस्त्रिशूलं भ्रामयन्करे । क्रुद्धा रणाक्षसंवर्ताः प्रज्वाल्य पर्वतोपमाः
reje tadā vīrabhadrastriśūlaṁ bhrāmayankare | kruddhā raṇākṣasaṁvartāḥ prajvālya parvatopamāḥ
तब वीरभद्र हाथ में त्रिशूल घुमाते हुए सुशोभित हुए, और उनके क्रुद्ध रणदानव पर्वतों के समान प्रज्वलित हो उठे।
श्लोक 63 (shiva.rudra.57.63)
अनायासेन हत्वैतान् वीरभद्रस्ततोऽग्निना । ज्वालयामास सक्रोधो दीप्ताग्निः शलभानिव
anāyāsena hatvaitān vīrabhadrastato'gninā | jvālayāmāsa sakrodho dīptāgniḥ śalabhāniva
वीरभद्र ने बिना किसी परिश्रम के उन्हें मार डाला और क्रोधपूर्वक अग्नि से उन्हें ऐसे जला दिया जैसे प्रज्वलित अग्नि पतंगों को जला देती है।
श्लोक 64 (shiva.rudra.57.64)
वीरभद्रस्ततो दग्धान् दृष्ट्वा दक्षपुरोगमान् । अट्टाट्टहासमकरोत् पूरयंश्च जगत्त्रयम्
vīrabhadrastato dagdhān dṛṣṭvā dakṣapurogamān | aṭṭāṭṭahāsamakarot pūrayaṁśca jagattrayam
दक्ष के उन अग्रगण्य अनुयायियों को भस्म हुआ देखकर, वीरभद्र ने तीनों लोकों को भर देने वाला अट्टहास किया।
श्लोक 65 (shiva.rudra.57.65)
वीरश्रिया वृतस्तत्र ततो नन्दनसम्भवा । पुष्पवृष्टिरभूद्दिव्या वीरभद्रे गणान्विते
vīraśriyā vṛtastatra tato nandanasambhavā | puṣpavṛṣṭirabhūddivyā vīrabhadre gaṇānvite
वहाँ वीर-श्री से घिरे और गणों सहित उन वीरभद्र पर नंदन वन से उत्पन्न दिव्य पुष्पों की वर्षा हुई।
श्लोक 66 (shiva.rudra.57.66)
ववुर्गन्धवहाः शीताः सुगन्धाः सुखदाः शनैः । देवदुन्दुभयो नेदुः सममेव ततः परम्
vavurgandhavahāḥ śītāḥ sugandhāḥ sukhadāḥ śanaiḥ | devadundubhayo neduḥ samameva tataḥ param
शीतल, सुगंधित और सुखदायी वायु धीरे-धीरे बहने लगी, और उसी क्षण देवताओं की दुन्दुभियाँ एक साथ बज उठीं।
श्लोक 67 (shiva.rudra.57.67)
कैलासं स ययौ वीरः कृतकार्यस्ततः परम् । विनाशितदृढध्वान्तो भानुमानिव सत्वरम्
kailāsaṁ sa yayau vīraḥ kṛtakāryastataḥ param | vināśitadṛḍhadhvānto bhānumāniva satvaram
तत्पश्चात् वह वीर, अपना कार्य पूर्ण कर, सघन अंधकार को नष्ट करने वाले सूर्य के समान शीघ्र कैलास को चले गए।
श्लोक 68 (shiva.rudra.57.68)
कृतकार्यं वीरभद्रं दृष्ट्वा सन्तुष्टमानसः । शम्भुर्वीरगणाध्यक्षं चकार परमेश्वरः
kṛtakāryaṁ vīrabhadraṁ dṛṣṭvā santuṣṭamānasaḥ | śambhurvīragaṇādhyakṣaṁ cakāra parameśvaraḥ
अपना कार्य पूर्ण करने वाले वीरभद्र को देखकर परमेश्वर शम्भु अत्यंत संतुष्ट हुए और उन्हें अपने वीर-गणों का अधिपति बना दिया।