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रुद्र संहिता · अध्याय 58

क्षुव-दधीचि विवाद

अध्याय 57अध्याय-सूचीअध्याय 59

श्लोक 1 (shiva.rudra.58.1)

सूत उवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य विधेरमितधीमतः । पप्रच्छ नारदः प्रीत्या विस्मितस्तं द्विजोत्तमः

sūta uvāca | ityākarṇya vacastasya vidheramitadhīmataḥ | papraccha nāradaḥ prītyā vismitastaṁ dvijottamaḥ

सूत ने कहा — अत्यंत बुद्धिमान विधाता (ब्रह्मा) के इन वचनों को सुनकर द्विजश्रेष्ठ नारद ने विस्मित होकर प्रेमपूर्वक उनसे यह प्रश्न पूछा।

श्लोक 2 (shiva.rudra.58.2)

नारद उवाच । शिवं विहाय दक्षस्य सुरैर्यज्ञं हरिर्गतः । हेतुना केन तद् ब्रूहि यत्रावज्ञाभवत्ततः

nārada uvāca | śivaṁ vihāya dakṣasya surairyajñaṁ harirgataḥ | hetunā kena tad brūhi yatrāvajñābhavattataḥ

नारद ने कहा — शिव को छोड़कर हरि देवताओं सहित दक्ष के यज्ञ में क्यों गए, जहाँ उनका अनादर हुआ — यह मुझे बताइए, किस कारण से हुआ?

श्लोक 3 (shiva.rudra.58.3)

जानाति किं स शम्भुं नो हरिः प्रलयविक्रमम् । रणं कथं च कृतवान् तद्गणैरबुधो यथा

jānāti kiṁ sa śambhuṁ no hariḥ pralayavikramam | raṇaṁ kathaṁ ca kṛtavān tadgaṇairabudho yathā

क्या हरि प्रलयकाल के समान पराक्रमी शम्भु को नहीं जानते? फिर उनके गणों से अज्ञानी की भाँति युद्ध कैसे किया?

श्लोक 4 (shiva.rudra.58.4)

एष मे संशयो भूयांस्तं छिन्धि करुणानिधे । चरितं ब्रूहि शम्भोस्तु चित्तोत्साहकरं प्रभो

eṣa me saṁśayo bhūyāṁstaṁ chindhi karuṇānidhe | caritaṁ brūhi śambhostu cittotsāhakaraṁ prabho

हे करुणानिधे! यह मेरा गहन संशय है, इसे दूर कीजिए; और हे प्रभो! मन को उत्साहित करने वाला शम्भु का यह चरित्र भी सुनाइए।

श्लोक 5 (shiva.rudra.58.5)

ब्रह्मोवाच । द्विजवर्य शृणु प्रीत्या चरितं शशिमौलिनः । यत्पृच्छते कुर्वतश्च सर्वसंशयहारकम्

brahmovāca | dvijavarya śṛṇu prītyā caritaṁ śaśimaulinaḥ | yatpṛcchate kurvataśca sarvasaṁśayahārakam

ब्रह्मा ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ! चन्द्रशेखर के इस चरित्र को प्रेमपूर्वक सुनिए, जो पूछने वाले और कहने वाले, दोनों के समस्त संशयों को हरने वाला है।

श्लोक 6 (shiva.rudra.58.6)

दधीचस्य मुनेः शापाद् भ्रष्टज्ञानो हरिः पुरा । सामरो दक्षयज्ञं वै गतः क्षुवसहायकृत्

dadhīcasya muneḥ śāpād bhraṣṭajñāno hariḥ purā | sāmaro dakṣayajñaṁ vai gataḥ kṣuvasahāyakṛt

पूर्वकाल में मुनि दधीचि के शाप से ज्ञानभ्रष्ट होकर हरि देवताओं सहित क्षुव के सहायक बनकर दक्ष के यज्ञ में गए थे।

श्लोक 7 (shiva.rudra.58.7)

नारद उवाच । किमर्थं शप्तवान्विष्णुं दधीचो मुनिसत्तमः । कोऽपकारः कृतस्तस्य हरिणा तत्सहायिना

nārada uvāca | kimarthaṁ śaptavānviṣṇuṁ dadhīco munisattamaḥ | ko'pakāraḥ kṛtastasya hariṇā tatsahāyinā

नारद ने कहा — मुनिश्रेष्ठ दधीचि ने विष्णु को किस कारण शाप दिया? उनके सहायक हरि ने उनका ऐसा क्या अपकार किया था?

श्लोक 8 (shiva.rudra.58.8)

ब्रह्मोवाच । समुत्पन्नो महातेजा राजा क्षुव इति स्मृतः । अभून्मित्रं दधीचस्य मुनीन्द्रस्य महाप्रभोः

brahmovāca | samutpanno mahātejā rājā kṣuva iti smṛtaḥ | abhūnmitraṁ dadhīcasya munīndrasya mahāprabhoḥ

ब्रह्मा ने कहा — क्षुव नामक अत्यंत तेजस्वी एक राजा उत्पन्न हुआ था, जो महाप्रभावशाली मुनीन्द्र दधीचि का मित्र बना।

श्लोक 9 (shiva.rudra.58.9)

चिरात्तपःप्रसङ्गाद्वै वादः क्षुवदधीचयोः । महानर्थकरः ख्यातस्त्रिलोकेष्वभवत्पुरा

cirāttapaḥprasaṅgādvai vādaḥ kṣuvadadhīcayoḥ | mahānarthakaraḥ khyātastrilokeṣvabhavatpurā

दीर्घकाल बाद तपस्या के प्रसंग में क्षुव और दधीचि के बीच एक ऐसा विवाद हुआ जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध महान अनर्थ का कारण बना।

श्लोक 10 (shiva.rudra.58.10)

तत्र त्रिवर्णतः श्रेष्ठो विप्र एव न संशयः । इति प्राह दधीचो हि शिवभक्तस्तु वेदवित्

tatra trivarṇataḥ śreṣṭho vipra eva na saṁśayaḥ | iti prāha dadhīco hi śivabhaktastu vedavit

वहाँ शिवभक्त और वेदज्ञ दधीचि ने यह कहा कि तीनों वर्णों में निःसंदेह ब्राह्मण ही श्रेष्ठ है।

श्लोक 11 (shiva.rudra.58.11)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य दधीचस्य महामुने । क्षुवः प्राहेति नृपतिः श्रीमदेन विमोहितः

tacchrutvā vacanaṁ tasya dadhīcasya mahāmune | kṣuvaḥ prāheti nṛpatiḥ śrīmadena vimohitaḥ

हे महामुने! दधीचि के इन वचनों को सुनकर, अपने ऐश्वर्य के मद से मोहित राजा क्षुव ने यह कहा।

श्लोक 12 (shiva.rudra.58.12)

क्षुव उवाच । अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः । तस्मान्नृपो वरिष्ठो हि वर्णाश्रमपतिः प्रभुः

kṣuva uvāca | aṣṭānāṁ lokapālānāṁ vapurdhārayate nṛpaḥ | tasmānnṛpo variṣṭho hi varṇāśramapatiḥ prabhuḥ

क्षुव ने कहा — राजा अपने शरीर में आठों लोकपालों के अंश धारण करता है, अतः राजा ही सर्वश्रेष्ठ है, वही वर्णाश्रम का स्वामी और प्रभु है।

श्लोक 13 (shiva.rudra.58.13)

सर्वदेवमयो राजा श्रुतिः प्राहेति तत्परा । महती देवता या सा सोऽहमेव ततो मुने

sarvadevamayo rājā śrutiḥ prāheti tatparā | mahatī devatā yā sā so'hameva tato mune

श्रुति भी यही कहती है कि राजा सर्वदेवमय है — जो भी महती देवता है, वह मैं ही हूँ, हे मुने।

श्लोक 14 (shiva.rudra.58.14)

तस्माद्विप्राद्वरो राजा च्यावनेय विचार्यताम् । नावमन्तव्य एवातः पूज्योऽहं सर्वथा त्वया

tasmādviprādvaro rājā cyāvaneya vicāryatām | nāvamantavya evātaḥ pūjyo'haṁ sarvathā tvayā

अतः, हे च्यवनवंशज! विचार कीजिए कि राजा ब्राह्मण से श्रेष्ठ है; इसलिए आपको मेरा अनादर नहीं करना चाहिए, बल्कि सर्वथा मेरा सम्मान ही करना चाहिए।

श्लोक 15 (shiva.rudra.58.15)

ब्रह्मोवाच । श्रुत्वा तथा मतं तस्य क्षुवस्य मुनिसत्तमः । श्रुतिस्मृतिविरुद्धं तं चुकोपातीव भार्गवः

brahmovāca | śrutvā tathā mataṁ tasya kṣuvasya munisattamaḥ | śrutismṛtiviruddhaṁ taṁ cukopātīva bhārgavaḥ

ब्रह्मा ने कहा — श्रुति-स्मृति के विरुद्ध क्षुव का यह मत सुनकर मुनिश्रेष्ठ भार्गव (दधीचि) अत्यंत क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 16 (shiva.rudra.58.16)

अथ क्रुद्धो महातेजा गौरवाच्चात्मनो मुने । अताडयत्क्षुवं मूर्ध्नि दधीचो वाममुष्टितः

atha kruddho mahātejā gauravāccātmano mune | atāḍayatkṣuvaṁ mūrdhni dadhīco vāmamuṣṭitaḥ

तब हे मुने! अपने स्वाभिमान से अत्यंत तेजस्वी और क्रुद्ध दधीचि ने अपनी बाईं मुट्ठी से क्षुव के सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 17 (shiva.rudra.58.17)

वज्रेण तं च चिच्छेद दधीचं ताडितः क्षुवः । जगर्जातीव सङ्क्रुद्धो ब्रह्माण्डाधिपतिः कुधीः

vajreṇa taṁ ca ciccheda dadhīcaṁ tāḍitaḥ kṣuvaḥ | jagarjātīva saṅkruddho brahmāṇḍādhipatiḥ kudhīḥ

उस प्रहार से क्षुव ने वज्र से दधीचि को काट डाला; और अत्यंत क्रुद्ध होकर वह दुर्बुद्धि राजा भयंकर गर्जना करने लगा।

श्लोक 18 (shiva.rudra.58.18)

पपात भूमौ निहतो तेन वज्रेण भार्गवः । शुक्रं सस्मार क्षुवकृद्भार्गवस्य कुलन्धरः

papāta bhūmau nihato tena vajreṇa bhārgavaḥ | śukraṁ sasmāra kṣuvakṛdbhārgavasya kulandharaḥ

उस वज्र से आहत होकर भार्गव भूमि पर गिर पड़े; और क्षुव द्वारा किए गए उस प्रहार से भार्गव-कुल के आधार शुक्राचार्य का स्मरण हुआ।

श्लोक 19 (shiva.rudra.58.19)

शुक्रोऽथ सन्धयामास ताडितं च क्षुवेन तु । योगी दधीचस्य तदा देहमागत्य स द्रुतम्

śukro'tha sandhayāmāsa tāḍitaṁ ca kṣuvena tu | yogī dadhīcasya tadā dehamāgatya sa drutam

तब वह योगी शुक्राचार्य शीघ्र वहाँ आकर क्षुव द्वारा आहत दधीचि के शरीर को पुनः जोड़ने लगे।

श्लोक 20 (shiva.rudra.58.20)

सन्धाय पूर्ववद्देहं दधीचस्याह भार्गवः । शिवभक्ताग्रणीर्मृत्यञ्जयविद्याप्रवर्तकः

sandhāya pūrvavaddehaṁ dadhīcasyāha bhārgavaḥ | śivabhaktāgraṇīrmṛtyañjayavidyāpravartakaḥ

शिवभक्तों में अग्रणी और मृत्युंजय-विद्या के प्रवर्तक भार्गव शुक्राचार्य ने दधीचि के शरीर को पूर्ववत् जोड़कर उनसे यह कहा।

श्लोक 21 (shiva.rudra.58.21)

शुक्र उवाच । दधीच तात सम्पूज्य शिवं सर्वेश्वरं प्रभुम् । महामृत्युञ्जयं मन्त्रं श्रौतमग्र्यं वदामि ते

śukra uvāca | dadhīca tāta sampūjya śivaṁ sarveśvaraṁ prabhum | mahāmṛtyuñjayaṁ mantraṁ śrautamagryaṁ vadāmi te

शुक्र ने कहा — हे तात दधीचि! सर्वेश्वर प्रभु शिव की भलीभाँति पूजा करके, मैं तुम्हें श्रुति-सम्मत सर्वश्रेष्ठ महामृत्युंजय मंत्र बताता हूँ।

श्लोक 22 (shiva.rudra.58.22)

त्र्यम्बकं यजामहे त्रैलोक्यं पितरं प्रभुम् । त्रिमण्डलस्य पितरं त्रिगुणस्य महेश्वरम्

tryambakaṁ yajāmahe trailokyaṁ pitaraṁ prabhum | trimaṇḍalasya pitaraṁ triguṇasya maheśvaram

हम त्र्यम्बक की उपासना करते हैं, जो तीनों लोकों के पिता और प्रभु हैं, त्रिमण्डल के पिता और त्रिगुणों के महेश्वर हैं।

श्लोक 23 (shiva.rudra.58.23)

त्रितत्त्वस्य त्रिवह्नेश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः । त्रिदिवस्य त्रिबाहोश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः

tritattvasya trivahneśca tridhābhūtasya sarvataḥ | tridivasya tribāhośca tridhābhūtasya sarvataḥ

जो त्रितत्त्व के, त्रिविध अग्नि के, और सर्वत्र त्रिविध रूप धारण करने वाले हैं; जो त्रिदिव के, त्रिबाहु के, और सर्वत्र त्रिविध रूप धारण करने वाले हैं।

श्लोक 24 (shiva.rudra.58.24)

त्रिदेवस्य महादेवः सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम् । सर्वभूतेषु सर्वत्र त्रिगुणेषु कृतौ यथा

tridevasya mahādevaḥ sugandhiṁ puṣṭivarddhanam | sarvabhūteṣu sarvatra triguṇeṣu kṛtau yathā

जो त्रिदेवों में महादेव हैं, सुगंधस्वरूप और पुष्टि बढ़ाने वाले हैं, जो सब भूतों में, सर्वत्र, और त्रिगुणों में उनकी रचना के रूप में विद्यमान हैं।

श्लोक 25 (shiva.rudra.58.25)

इन्द्रियेषु तथान्येषु देवेषु च गणेषु च । पुष्पे सुगन्धिवत्सूरः सुगन्धिरमरेश्वरः

indriyeṣu tathānyeṣu deveṣu ca gaṇeṣu ca | puṣpe sugandhivatsūraḥ sugandhiramareśvaraḥ

इन्द्रियों में तथा अन्य वस्तुओं में, देवों में और गणों में भी — जैसे पुष्प में सुगंध होती है, वैसे ही वे तेजस्वी देवेश्वर स्वयं सुगंध हैं।

श्लोक 26 (shiva.rudra.58.26)

पुष्टिश्च प्रकृतेर्यस्मात्पुरुषाद् वै द्विजोत्तम । महदादिविशेषान्तविकल्पश्चापि सुव्रत

puṣṭiśca prakṛteryasmātpuruṣād vai dvijottama | mahadādiviśeṣāntavikalpaścāpi suvrata

हे द्विजश्रेष्ठ! प्रकृति और पुरुष से जो पुष्टि होती है, तथा हे सुव्रत! महत् आदि से लेकर विशेष तत्त्वों तक जो भी विकल्प हैं —

श्लोक 27 (shiva.rudra.58.27)

विष्णोः पितामहस्यापि मुनीनां च महामुने । इन्द्रियाणां च देवानां तस्माद् वै पुष्टिवर्धनः

viṣṇoḥ pitāmahasyāpi munīnāṁ ca mahāmune | indriyāṇāṁ ca devānāṁ tasmād vai puṣṭivardhanaḥ

विष्णु के, पितामह ब्रह्मा के, मुनियों के, तथा हे महामुने! इन्द्रियों और देवों के भी, उन्हीं से पुष्टि-वृद्धि होती है।

श्लोक 28 (shiva.rudra.58.28)

तं देवममृतं रुद्रं कर्मणा तपसापि वा । स्वाध्यायेन च योगेन ध्यानेन च प्रजायते

taṁ devamamṛtaṁ rudraṁ karmaṇā tapasāpi vā | svādhyāyena ca yogena dhyānena ca prajāyate

उस अमृतस्वरूप देव रुद्र को कर्म से, तपस्या से, स्वाध्याय से, योग से और ध्यान से प्राप्त किया जाता है।

श्लोक 29 (shiva.rudra.58.29)

सत्येनान्येन सूक्ष्माग्रान्मृत्युपाशाद्भवः स्वयम् । बन्धमोक्षकरो यस्मादुर्वारुकमिव प्रभुः

satyenānyena sūkṣmāgrānmṛtyupāśādbhavaḥ svayam | bandhamokṣakaro yasmādurvārukamiva prabhuḥ

भव स्वयं सत्य और अन्य सूक्ष्म साधनों द्वारा मृत्यु के पाश से मुक्त करते हैं; क्योंकि प्रभु ही बंधन और मोक्ष दोनों के कर्ता हैं, जैसे ककड़ी अपने बंधन से मुक्त होती है।

श्लोक 30 (shiva.rudra.58.30)

मृतसञ्जीवनीमन्त्रो मम सर्वोत्तमः स्मृतः । एवं जपपरः प्रीत्या नियमेन शिवं स्मरन्

mṛtasañjīvanīmantro mama sarvottamaḥ smṛtaḥ | evaṁ japaparaḥ prītyā niyamena śivaṁ smaran

यही मेरे सब मंत्रों में सर्वोत्तम मृत-संजीवनी मंत्र माना गया है — इस प्रकार प्रेमपूर्वक इसके जप में तत्पर हो, नियमपूर्वक शिव का स्मरण करते हुए —

श्लोक 31 (shiva.rudra.58.31)

जप्त्वा हुत्वाभिमन्त्र्यैवं जलं पिब दिवानिशम् । शिवस्य सन्निधौ ध्यात्वा नास्ति मृत्युभयं क्वचित्

japtvā hutvābhimantryaivaṁ jalaṁ piba divāniśam | śivasya sannidhau dhyātvā nāsti mṛtyubhayaṁ kvacit

— इसका जप कर, हवन कर, इससे अभिमंत्रित जल को दिन-रात पीओ; शिव की सन्निधि में ध्यान करने से कहीं भी मृत्यु का भय नहीं रहता।

श्लोक 32 (shiva.rudra.58.32)

कृत्वा न्यासादिकं सर्वं सम्पूज्य विधिवच्छिवम् । संविधायेदं निर्व्यग्रः शङ्करं भक्तवत्सलम्

kṛtvā nyāsādikaṁ sarvaṁ sampūjya vidhivacchivam | saṁvidhāyedaṁ nirvyagraḥ śaṅkaraṁ bhaktavatsalam

न्यास आदि सब विधियाँ करके, विधिपूर्वक शिव की पूजा करके, भक्तवत्सल शंकर की यह सारी विधि निश्चिंत होकर संपन्न करो।

श्लोक 33 (shiva.rudra.58.33)

ध्यानमस्य प्रवक्ष्यामि यथा ध्यात्वा जपेन्मनुम् । सिद्धमन्त्रो भवेद्धीमान् यावच्छम्भुप्रभावतः

dhyānamasya pravakṣyāmi yathā dhyātvā japenmanum | siddhamantro bhaveddhīmān yāvacchambhuprabhāvataḥ

अब मैं इनका ध्यान बताता हूँ, जिसका ध्यान करके मंत्र जपने से बुद्धिमान साधक शम्भु के प्रभाव से मंत्रसिद्ध हो जाता है।

श्लोक 34 (shiva.rudra.58.34)

हस्ताम्भोजयुगस्थकुम्भयुगलादुद्धृत्य तोयं शिरः सिञ्चन्तं करयोर्युगेन दधतं स्वाङ्के सकुम्भौ करौ । अक्षस्रङ्मृगहस्तमम्बुजगतं मूर्धस्थचन्द्रस्रवत्- पीयूषार्द्रतनुं भजे सगिरिजं त्र्यक्षं च मृत्युञ्जयम्

hastāmbhojayugasthakumbhayugalāduddhṛtya toyaṁ śiraḥ siñcantaṁ karayoryugena dadhataṁ svāṅke sakumbhau karau | akṣasraṅmṛgahastamambujagataṁ mūrdhasthacandrasravat- pīyūṣārdratanuṁ bhaje sagirijaṁ tryakṣaṁ ca mṛtyuñjayam

मैं गिरिजा-सहित त्रिनेत्र मृत्युंजय की उपासना करता हूँ — जो अपने दोनों कमल-हस्तों में स्थित कलशों से जल उठाकर अपने सिर पर सींचते हैं, या उन दोनों कलशों को अपनी गोद में धारण किए रहते हैं; जिनके हाथों में अक्षमाला और मृग हैं; जो कमलासन पर विराजमान हैं; जिनका शरीर मस्तक पर स्थित चन्द्रमा से बहते अमृत से आर्द्र है।

श्लोक 35 (shiva.rudra.58.35)

ब्रह्मोवाच । उपदिश्येति शुक्रः तं दधीचिं मुनिसत्तमम् । स्वस्थानमगमत्तात संस्मरन् शङ्करं प्रभुम्

brahmovāca | upadiśyeti śukraḥ taṁ dadhīciṁ munisattamam | svasthānamagamattāta saṁsmaran śaṅkaraṁ prabhum

ब्रह्मा ने कहा — इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ दधीचि को उपदेश देकर, हे तात! शुक्राचार्य प्रभु शंकर का स्मरण करते हुए अपने स्थान को चले गए।

श्लोक 36 (shiva.rudra.58.36)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दधीचो हि महामुनिः । वनं जगाम तपसे महाप्रीत्या शिवं स्मरन्

tasya tadvacanaṁ śrutvā dadhīco hi mahāmuniḥ | vanaṁ jagāma tapase mahāprītyā śivaṁ smaran

उनके उन वचनों को सुनकर महामुनि दधीचि अत्यंत प्रेमपूर्वक शिव का स्मरण करते हुए तपस्या हेतु वन को चले गए।

श्लोक 37 (shiva.rudra.58.37)

तत्र गत्वा विधानेन महामृत्युञ्जयाभिधम् । तं मनुं प्रजपन् प्रीत्या तपस्तेपे शिवं स्मरन्

tatra gatvā vidhānena mahāmṛtyuñjayābhidham | taṁ manuṁ prajapan prītyā tapastepe śivaṁ smaran

वहाँ जाकर उन्होंने विधिपूर्वक उस महामृत्युंजय नामक मंत्र का प्रेमपूर्वक जप करते हुए शिव का स्मरण करते हुए तपस्या की।

श्लोक 38 (shiva.rudra.58.38)

तन्मनुं सुचिरं जप्त्वा तपसाराध्य शङ्करम् । शिवं सन्तोषयामास महामृत्युञ्जयं हि सः

tanmanuṁ suciraṁ japtvā tapasārādhya śaṅkaram | śivaṁ santoṣayāmāsa mahāmṛtyuñjayaṁ hi saḥ

उस मंत्र का दीर्घकाल तक जप करके और तपस्या से शंकर की आराधना करके उन्होंने महामृत्युंजय शिव को संतुष्ट कर दिया।

श्लोक 39 (shiva.rudra.58.39)

अथ शम्भुः प्रसन्नात्मा तज्जपाद्भक्तवत्सलः । आविर्बभूव पुरतस्तस्य प्रीत्या महामुने

atha śambhuḥ prasannātmā tajjapādbhaktavatsalaḥ | āvirbabhūva puratastasya prītyā mahāmune

हे महामुने! तब भक्तवत्सल शम्भु उस जप से प्रसन्न होकर प्रेमपूर्वक उनके सम्मुख प्रकट हुए।

श्लोक 40 (shiva.rudra.58.40)

तं दृष्ट्वा स्वप्रभुं शम्भुं स मुमोद मुनीश्वरः । प्रणम्य विधिवद्भक्त्या तुष्टाव सुकृताञ्जलिः

taṁ dṛṣṭvā svaprabhuṁ śambhuṁ sa mumoda munīśvaraḥ | praṇamya vidhivadbhaktyā tuṣṭāva sukṛtāñjaliḥ

अपने प्रभु शम्भु को देखकर वह मुनीश्वर अत्यंत हर्षित हुए; विधिपूर्वक भक्तिभाव से प्रणाम करके और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की।

श्लोक 41 (shiva.rudra.58.41)

अथ प्रीत्या शिवस्तात प्रसन्नश्च्यावनिं मुने । वरं ब्रूहीति स प्राह सुप्रसन्नेन चेतसा

atha prītyā śivastāta prasannaścyāvaniṁ mune | varaṁ brūhīti sa prāha suprasannena cetasā

हे मुने! तब प्रेमपूर्वक प्रसन्न हुए शिव ने अत्यंत प्रसन्न हृदय से च्यवन-पुत्र दधीचि से कहा — वर माँगो।

श्लोक 42 (shiva.rudra.58.42)

तच्छ्रुत्वा शम्भुवचनं दधीचो भक्तसत्तमः । साञ्जलिर्नतकः प्राह शङ्करं भक्तवत्सलम्

tacchrutvā śambhuvacanaṁ dadhīco bhaktasattamaḥ | sāñjalirnatakaḥ prāha śaṅkaraṁ bhaktavatsalam

शम्भु के उन वचनों को सुनकर भक्तश्रेष्ठ दधीचि ने हाथ जोड़कर, नतमस्तक होकर, भक्तवत्सल शंकर से यह कहा।

श्लोक 43 (shiva.rudra.58.43)

दधीच उवाच । देवदेव महादेव मह्यं देहि वरत्रयम् । वज्रास्थित्वमवध्यत्वमदीनत्वं हि सर्वतः

dadhīca uvāca | devadeva mahādeva mahyaṁ dehi varatrayam | vajrāsthitvamavadhyatvamadīnatvaṁ hi sarvataḥ

दधीचि ने कहा — हे देवाधिदेव महादेव! मुझे तीन वर दीजिए — मेरी अस्थियाँ वज्र के समान हो जाएँ, मैं अवध्य हो जाऊँ, और सर्वथा मेरा मन कभी दीन न हो।

श्लोक 44 (shiva.rudra.58.44)

ब्रह्मोवाच । तदुक्तवचनं श्रुत्वा प्रसन्नः परमेश्वरः । वरत्रयं ददौ तस्मै दधीचाय तथास्त्विति

brahmovāca | taduktavacanaṁ śrutvā prasannaḥ parameśvaraḥ | varatrayaṁ dadau tasmai dadhīcāya tathāstviti

ब्रह्मा ने कहा — उनके इन वचनों को सुनकर प्रसन्न परमेश्वर ने दधीचि को वे तीनों वर देते हुए 'तथास्तु' कहा।

श्लोक 45 (shiva.rudra.58.45)

वरत्रयं शिवात्प्राप्य सानन्दश्च महामुनिः । क्षुवस्थानं जगामाशु वेदमार्गे प्रतिष्ठितः

varatrayaṁ śivātprāpya sānandaśca mahāmuniḥ | kṣuvasthānaṁ jagāmāśu vedamārge pratiṣṭhitaḥ

शिव से तीनों वर पाकर आनंदित महामुनि दधीचि वेदमार्ग में प्रतिष्ठित होकर शीघ्र ही क्षुव के पास पहुँचे।

श्लोक 46 (shiva.rudra.58.46)

प्राप्यावध्यत्वमुग्रात्स वज्रास्थित्वमदीनताम् । अताडयच्च राजेन्द्रं पादमूलेन मूर्धनि

prāpyāvadhyatvamugrātsa vajrāsthitvamadīnatām | atāḍayacca rājendraṁ pādamūlena mūrdhani

उग्र वज्र से अवध्यत्व, वज्रवत् अस्थियाँ और अदीनता प्राप्त कर, उन्होंने उस राजेन्द्र के मस्तक पर अपने पैर के तलवे से प्रहार किया।

श्लोक 47 (shiva.rudra.58.47)

क्षुवो दधीचं वज्रेण जघानोरस्यथो नृपः । क्रोधं कृत्वा विशेषेण विष्णुगौरवगर्वितः

kṣuvo dadhīcaṁ vajreṇa jaghānorasyatho nṛpaḥ | krodhaṁ kṛtvā viśeṣeṇa viṣṇugauravagarvitaḥ

तब विष्णु के आश्रय से गर्वित राजा क्षुव ने विशेष रूप से क्रोधित होकर दधीचि की छाती पर वज्र से प्रहार किया।

श्लोक 48 (shiva.rudra.58.48)

नाभून्नाशाय तद्वज्रं दधीचस्य महात्मनः । प्रभावात्परमेशस्य धातृपुत्रो विसिस्मिये

nābhūnnāśāya tadvajraṁ dadhīcasya mahātmanaḥ | prabhāvātparameśasya dhātṛputro visismiye

परमेश्वर के प्रभाव से वह वज्र महात्मा दधीचि के विनाश का कारण न बन सका, और यह देखकर राजा क्षुव विस्मित हो गया।

श्लोक 49 (shiva.rudra.58.49)

दृष्ट्वाप्यवध्यत्वमदीनतां च वज्रस्य चात्यन्तपरप्रभावम् । क्षुवो दधीचस्य मुनीश्वरस्य विसिस्मिये चेतसि धातृपुत्रः

dṛṣṭvāpyavadhyatvamadīnatāṁ ca vajrasya cātyantaparaprabhāvam | kṣuvo dadhīcasya munīśvarasya visismiye cetasi dhātṛputraḥ

दधीचि मुनीश्वर की उस अवध्यता, अदीनता, तथा अपने वज्र के सर्वथा निष्फल हो जाने के अत्यंत परम प्रभाव को देखकर क्षुव मन ही मन विस्मित हो गया।

श्लोक 50 (shiva.rudra.58.50)

आराधयामास हरिं मुकुन्द- मिन्द्रानुजं काननमाशु गत्वा । प्रपन्नपालश्च पराजितो हि दधीचमृत्युञ्जयसेवकेन

ārādhayāmāsa hariṁ mukunda- mindrānujaṁ kānanamāśu gatvā | prapannapālaśca parājito hi dadhīcamṛtyuñjayasevakena

वह तुरंत वन को जाकर इन्द्र के अनुज मुकुन्द हरि की आराधना करने लगा, क्योंकि मृत्युंजय के सेवक दधीचि से पराजित होकर वह शरणागतों के पालक विष्णु की शरण में आया था।

श्लोक 51 (shiva.rudra.58.51)

पूजया तस्य सन्तुष्टो भगवान् मधुसूदनः । प्रददौ दर्शनं तस्मै दिव्यं वै गरुडध्वजः

pūjayā tasya santuṣṭo bhagavān madhusūdanaḥ | pradadau darśanaṁ tasmai divyaṁ vai garuḍadhvajaḥ

उसकी पूजा से संतुष्ट होकर गरुड़ध्वज भगवान मधुसूदन ने उसे अपना दिव्य दर्शन प्रदान किया।

श्लोक 52 (shiva.rudra.58.52)

दिव्येन दर्शनेनैव दृष्ट्वा देवं जनार्दनम् । तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणम्य गरुडध्वजम्

divyena darśanenaiva dṛṣṭvā devaṁ janārdanam | tuṣṭāva vāgbhiriṣṭābhiḥ praṇamya garuḍadhvajam

उस दिव्य दर्शन से देव जनार्दन को देखकर उसने गरुड़ध्वज को प्रणाम कर प्रिय वचनों से उनकी स्तुति की।

श्लोक 53 (shiva.rudra.58.53)

सम्पूज्य चैवं त्रिदशेश्वराद्यैः स्तुत्वा स्तुतं देवमजेयमीशम् । विज्ञापयामास निरीक्ष्य भक्त्या जनार्दनाय प्रणिपत्य मूर्ध्ना

sampūjya caivaṁ tridaśeśvarādyaiḥ stutvā stutaṁ devamajeyamīśam | vijñāpayāmāsa nirīkṣya bhaktyā janārdanāya praṇipatya mūrdhnā

इस प्रकार पूजा करके और देवेश्वर आदि द्वारा भी स्तुत उस अजेय ईश्वर की स्तुति करके, उसने भक्तिपूर्वक देखते हुए और मस्तक झुकाकर जनार्दन से अपनी प्रार्थना निवेदित की।

श्लोक 54 (shiva.rudra.58.54)

राजोवाच । भगवन् ब्राह्मणः कश्चिद्दधीच इति विश्रुतः । धर्मवेत्ता विनीतात्मा सखा मम पुराभवत्

rājovāca | bhagavan brāhmaṇaḥ kaściddadhīca iti viśrutaḥ | dharmavettā vinītātmā sakhā mama purābhavat

राजा ने कहा — हे भगवन्! दधीचि नामक एक विख्यात ब्राह्मण, जो धर्मज्ञ और विनम्र स्वभाव का है, पहले मेरा मित्र था।

श्लोक 55 (shiva.rudra.58.55)

अवध्यः सर्वदा सर्वैः शङ्करस्य प्रभावतः । तमाराध्य महादेवं मृत्युञ्जयमनामयम्

avadhyaḥ sarvadā sarvaiḥ śaṅkarasya prabhāvataḥ | tamārādhya mahādevaṁ mṛtyuñjayamanāmayam

शंकर के प्रभाव से वह सदा सबके लिए अवध्य हो गया है, क्योंकि उसने मृत्युंजय, सर्वरोगरहित महादेव की आराधना की है।

श्लोक 56 (shiva.rudra.58.56)

सावज्ञं वामपादेन मम मूर्ध्नि सदस्यपि । ताडयामास वेगेन स दधीचो महातपाः

sāvajñaṁ vāmapādena mama mūrdhni sadasyapi | tāḍayāmāsa vegena sa dadhīco mahātapāḥ

उस महातपस्वी दधीचि ने सभा में भी अनादरपूर्वक अपने बाएँ पैर से वेगपूर्वक मेरे मस्तक पर प्रहार किया।

श्लोक 57 (shiva.rudra.58.57)

उवाच मां च गर्वेण न बिभेमीति सर्वतः । मृत्युञ्जयाप्तसुवरो गर्वितो ह्यतुलं हरे

uvāca māṁ ca garveṇa na bibhemīti sarvataḥ | mṛtyuñjayāptasuvaro garvito hyatulaṁ hare

और हे हरे! उसने गर्व से मुझसे कहा — 'मुझे किसी से कोई भय नहीं है', क्योंकि मृत्युंजय से प्राप्त उत्तम वर से वह अत्यंत गर्वित हो गया है।

श्लोक 58 (shiva.rudra.58.58)

अथ ज्ञात्वा दधीचस्य ह्यवध्यत्वं महात्मनः । सस्मारास्य महेशस्य प्रभावमतुलं हरिः

atha jñātvā dadhīcasya hyavadhyatvaṁ mahātmanaḥ | sasmārāsya maheśasya prabhāvamatulaṁ hariḥ

तब महात्मा दधीचि की उस अवध्यता को जानकर हरि ने महेश के उस अनुपम प्रभाव का स्मरण किया।

श्लोक 59 (shiva.rudra.58.59)

एवं स्मृत्वा हरिः प्राह क्षुवं विधिसुतं द्रुतम् । विप्राणां नास्ति राजेन्द्र भयमण्वपि कुत्रचित्

evaṁ smṛtvā hariḥ prāha kṣuvaṁ vidhisutaṁ drutam | viprāṇāṁ nāsti rājendra bhayamaṇvapi kutracit

ऐसा स्मरण करके हरि ने तुरंत विधि-पुत्र क्षुव से कहा — हे राजेन्द्र! ब्राह्मणों को कहीं भी लेशमात्र भी भय नहीं होता।

श्लोक 60 (shiva.rudra.58.60)

विशेषाद् रुद्रभक्तानां भयं नास्ति च भूपते । दुःखं करोति विप्रस्य शापार्थं स सुरस्य मे

viśeṣād rudrabhaktānāṁ bhayaṁ nāsti ca bhūpate | duḥkhaṁ karoti viprasya śāpārthaṁ sa surasya me

हे भूपते! विशेषतः रुद्रभक्तों को तो कोई भय ही नहीं है; किंतु उस ब्राह्मण के शाप के कारण मुझ देवता को भी दुःख होगा।

श्लोक 61 (shiva.rudra.58.61)

भविता तस्य शापेन दक्षयज्ञे सुरेश्वरात् । विनाशो मम राजेन्द्र पुनरुत्थानमेव च

bhavitā tasya śāpena dakṣayajñe sureśvarāt | vināśo mama rājendra punarutthānameva ca

हे राजेन्द्र! उसके शाप से दक्ष के यज्ञ में देवेश्वर के गणों द्वारा मेरा विनाश होगा, और फिर मेरा पुनरुत्थान भी होगा।

श्लोक 62 (shiva.rudra.58.62)

तस्मात्समेत्य राजेन्द्र सर्वयज्ञो न भूयते । करोमि यत्नं राजेन्द्र दधीचविजयाय ते

tasmātsametya rājendra sarvayajño na bhūyate | karomi yatnaṁ rājendra dadhīcavijayāya te

इसलिए, हे राजेन्द्र! सब मिलकर भी यह यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकेगा; फिर भी, हे राजेन्द्र! मैं तुम्हारी दधीचि पर विजय के लिए प्रयत्न करूँगा।

श्लोक 63 (shiva.rudra.58.63)

श्रुत्वा वाक्यं क्षुवः प्राह तथास्त्विति हरेर्नृपः । तस्थौ तत्रैव तत्प्रीत्या तत्कामोत्सुकमानसः

śrutvā vākyaṁ kṣuvaḥ prāha tathāstviti harernṛpaḥ | tasthau tatraiva tatprītyā tatkāmotsukamānasaḥ

यह वचन सुनकर राजा क्षुव ने हरि से 'तथास्तु' कहा, और अपनी उस कामना की पूर्ति की उत्सुकता से प्रसन्नचित्त होकर वहीं ठहर गया।

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