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रुद्र संहिता · अध्याय 59

विष्णु-दधीचि युद्ध वर्णन

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

श्लोक 1 (shiva.rudra.59.1)

ब्रह्मोवाच । क्षुवस्य हितकृत्येन दधीचस्याश्रमं ययौ । विप्ररूपमथास्थाय भगवान् भक्तवत्सलः

brahmovāca | kṣuvasya hitakṛtyena dadhīcasyāśramaṁ yayau | viprarūpamathāsthāya bhagavān bhaktavatsalaḥ

ब्रह्मा ने कहा — क्षुव के हित के लिए भक्तवत्सल भगवान विष्णु ब्राह्मण का रूप धारण कर दधीचि के आश्रम को गए।

श्लोक 2 (shiva.rudra.59.2)

दधीचं प्राह विप्रर्षिमभिवन्द्य जगद्गुरुः । क्षुवकार्यार्थमुद्युक्तः शैवेन्द्रं छलमाश्रितः

dadhīcaṁ prāha viprarṣimabhivandya jagadguruḥ | kṣuvakāryārthamudyuktaḥ śaivendraṁ chalamāśritaḥ

जगद्गुरु विष्णु ने क्षुव के कार्य हेतु उद्यत होकर तथा शैव-छल का आश्रय लेकर विप्रर्षि दधीचि को प्रणाम कर उनसे कहा।

श्लोक 3 (shiva.rudra.59.3)

विष्णुरुवाच । भो भो दधीच विप्रर्षे भवार्चनरताव्यय । वरमेकं वृणे त्वत्तस्तद्भवान् दातुमर्हति

viṣṇuruvāca | bho bho dadhīca viprarṣe bhavārcanaratāvyaya | varamekaṁ vṛṇe tvattastadbhavān dātumarhati

विष्णु ने कहा — हे दधीचि, हे विप्रर्षे! हे शिव-अर्चना में तत्पर अविनाशी! मैं आपसे एक वर माँगता हूँ, वह आपको देना चाहिए।

श्लोक 4 (shiva.rudra.59.4)

ब्रह्मोवाच । याचितो देवदेवेन दधीचः शैवसत्तमः ॥ क्षुवकार्यार्थिना शीघ्रं जगाद वचनं हरिम्

brahmovāca | yācito devadevena dadhīcaḥ śaivasattamaḥ || kṣuvakāryārthinā śīghraṁ jagāda vacanaṁ harim

ब्रह्मा ने कहा — देवाधिदेव द्वारा याचना किए जाने पर, शिव के परम भक्त दधीचि ने, क्षुव के कार्य हेतु आए हुए हरि को शीघ्र यह उत्तर दिया।

श्लोक 5 (shiva.rudra.59.5)

दधीच उवाच । ज्ञातं तवेप्सितं विप्र क्षुवकार्यार्थमागतः । भगवान् विप्ररूपेण मायी त्वमसि वै हरिः

dadhīca uvāca | jñātaṁ tavepsitaṁ vipra kṣuvakāryārthamāgataḥ | bhagavān viprarūpeṇa māyī tvamasi vai hariḥ

दधीचि ने कहा — हे विप्र! मैं आपका अभीष्ट जान गया — आप क्षुव के कार्य के लिए आए हैं। आप ब्राह्मण-रूप धरे मायावी भगवान हरि ही हैं।

श्लोक 6 (shiva.rudra.59.6)

भूतं भविष्यं देवेश वर्तमानं जनार्दन । ज्ञानं प्रसादाद् रुद्रस्य सदा त्रैकालिकं मम

bhūtaṁ bhaviṣyaṁ deveśa vartamānaṁ janārdana | jñānaṁ prasādād rudrasya sadā traikālikaṁ mama

हे देवेश जनार्दन! रुद्र की कृपा से मुझे सदा भूत, भविष्य और वर्तमान — तीनों कालों का ज्ञान प्राप्त है।

श्लोक 7 (shiva.rudra.59.7)

त्वां जानेऽहं हरिं विष्णुं द्विजत्वं त्यज सुव्रत । आराधितोऽसि भूपेन क्षुवेण खलबुद्धिना

tvāṁ jāne'haṁ hariṁ viṣṇuṁ dvijatvaṁ tyaja suvrata | ārādhito'si bhūpena kṣuveṇa khalabuddhinā

मैं आपको हरि विष्णु ही जानता हूँ — हे सुव्रत! यह द्विजरूप त्याग दीजिए। दुर्बुद्धि राजा क्षुव ने आपकी आराधना की है।

श्लोक 8 (shiva.rudra.59.8)

जाने तवैव भगवन् भक्तवत्सलतां हरे । छलं त्यज स्वरूपं हि स्वीकुरु स्मर शङ्करम्

jāne tavaiva bhagavan bhaktavatsalatāṁ hare | chalaṁ tyaja svarūpaṁ hi svīkuru smara śaṅkaram

हे भगवन् हरे! मैं आपकी भक्तवत्सलता जानता ही हूँ; छल त्यागकर अपना स्वरूप स्वीकार कीजिए और शंकर का स्मरण कीजिए।

श्लोक 9 (shiva.rudra.59.9)

अस्ति चेत्कस्यचिद्भीतिर्भवार्चनरतस्य मे । वक्तुमर्हसि यत्नेन सत्यधारणपूर्वकम्

asti cetkasyacidbhītirbhavārcanaratasya me | vaktumarhasi yatnena satyadhāraṇapūrvakam

यदि भव की अर्चना में तत्पर मुझसे किसी को भी भय हो, तो प्रयत्नपूर्वक सत्य पर आधारित होकर आपको वह मुझसे कहना चाहिए।

श्लोक 10 (shiva.rudra.59.10)

वदामि न मृषा क्वापि शिवस्मरणसक्तधीः । न बिभेमि जगत्यस्मिन्देवदैत्यादिकादपि

vadāmi na mṛṣā kvāpi śivasmaraṇasaktadhīḥ | na bibhemi jagatyasmindevadaityādikādapi

मैं कभी असत्य नहीं कहता, शिव-स्मरण में सदा तत्पर बुद्धि वाला हूँ; मैं इस संसार में देव-दैत्य आदि किसी से भी भयभीत नहीं हूँ।

श्लोक 11 (shiva.rudra.59.11)

विष्णुरुवाच । भयं दधीच सर्वत्र नष्टं च तव सुव्रत । भवार्चनरतो यस्माद्भवान्सर्वज्ञ एव च

viṣṇuruvāca | bhayaṁ dadhīca sarvatra naṣṭaṁ ca tava suvrata | bhavārcanarato yasmādbhavānsarvajña eva ca

विष्णु ने कहा — हे दधीचि, हे सुव्रत! तुम्हारा भय तो सर्वत्र नष्ट हो ही चुका है, क्योंकि तुम भव के अर्चन में तत्पर और सर्वज्ञ हो।

श्लोक 12 (shiva.rudra.59.12)

बिभेमीति सकृद्वक्तुमर्हसि त्वं नमस्तव । नियोगान्मम राजेन्द्र क्षुवात् प्रतिसहादहम्

bibhemīti sakṛdvaktumarhasi tvaṁ namastava | niyogānmama rājendra kṣuvāt pratisahādaham

फिर भी तुम्हें एक बार 'मुझे भय है' यह कह देना चाहिए — तुम्हें नमस्कार है — क्योंकि क्षुव की आज्ञा से मैं तुम्हारे विरुद्ध खड़ा हुआ हूँ।

श्लोक 13 (shiva.rudra.59.13)

ब्रह्मोवाच । एवं श्रुत्वापि तद्वाक्यं विष्णोः स तु महामुनिः । विहस्य निर्भयः प्राह दधीचः शैवसत्तमः

brahmovāca | evaṁ śrutvāpi tadvākyaṁ viṣṇoḥ sa tu mahāmuniḥ | vihasya nirbhayaḥ prāha dadhīcaḥ śaivasattamaḥ

ब्रह्मा ने कहा — विष्णु के इस वचन को सुनकर भी, शैवश्रेष्ठ महामुनि दधीचि निर्भय होकर हँस पड़े और यह बोले।

श्लोक 14 (shiva.rudra.59.14)

दधीच उवाच । न बिभेमि सदा क्वापि कुतश्चिदपि किञ्चन । प्रभावाद्देवदेवस्य शम्भोः साक्षात्पिनाकिनः

dadhīca uvāca | na bibhemi sadā kvāpi kutaścidapi kiñcana | prabhāvāddevadevasya śambhoḥ sākṣātpinākinaḥ

दधीचि ने कहा — मैं सदा कहीं भी, किसी से भी कुछ भी भयभीत नहीं होता — साक्षात् पिनाकधारी देवाधिदेव शम्भु के प्रभाव से।

श्लोक 15 (shiva.rudra.59.15)

ब्रह्मोवाच । ततस्तस्य मुनेः श्रुत्वा वचनं कुपितो हरिः । चक्रमुद्यम्य सन्तस्थौ दिधक्षुर्मुनिसत्तमम्

brahmovāca | tatastasya muneḥ śrutvā vacanaṁ kupito hariḥ | cakramudyamya santasthau didhakṣurmunisattamam

ब्रह्मा ने कहा — तत्पश्चात् उस मुनि के वचन सुनकर क्रुद्ध हरि ने चक्र उठाकर उस मुनिश्रेष्ठ को भस्म करने की इच्छा से खड़े होकर देखा।

श्लोक 16 (shiva.rudra.59.16)

अभवत्कुण्ठितं तत्र विप्रे चक्रं सुदारुणम् । प्रभावाच्च तदीशस्य नृपतेः सन्निधावपि

abhavatkuṇṭhitaṁ tatra vipre cakraṁ sudāruṇam | prabhāvācca tadīśasya nṛpateḥ sannidhāvapi

वहाँ राजा की उपस्थिति में भी, उस विप्र के ईश्वर के प्रभाव से वह अत्यंत भयंकर चक्र कुण्ठित हो गया।

श्लोक 17 (shiva.rudra.59.17)

दृष्ट्वा तं कुण्ठितास्यं तच्चक्रं विष्णुं जगाद ह । दधीचः सस्मितं साक्षात्सदसद्व्यक्तिकारणम्

dṛṣṭvā taṁ kuṇṭhitāsyaṁ taccakraṁ viṣṇuṁ jagāda ha | dadhīcaḥ sasmitaṁ sākṣātsadasadvyaktikāraṇam

उस चक्र को कुण्ठित हुआ देखकर, सत् और असत् दोनों की अभिव्यक्ति के साक्षात् कारण दधीचि ने मुस्कुराते हुए विष्णु से यह कहा।

श्लोक 18 (shiva.rudra.59.18)

दधीच उवाच । भगवन् भवता लब्धं पुरातीव सुदारुणम् । सुदर्शनमिति ख्यातं चक्रं विष्णोः प्रयत्नतः । भवस्य तच्छुभं चक्रं न जिघांसति मामिह

dadhīca uvāca | bhagavan bhavatā labdhaṁ purātīva sudāruṇam | sudarśanamiti khyātaṁ cakraṁ viṣṇoḥ prayatnataḥ | bhavasya tacchubhaṁ cakraṁ na jighāṁsati māmiha

दधीचि ने कहा — हे भगवन्! पहले आपने अत्यंत प्रयत्न से यह भयंकर, सुदर्शन नाम से प्रसिद्ध चक्र प्राप्त किया था — भव का यह मंगलकारी चक्र यहाँ मुझे मारना नहीं चाहता।

श्लोक 19 (shiva.rudra.59.19)

भगवानथ क्रुद्धोऽस्मै सर्वास्त्राणि क्रमाद्धरिः । ब्रह्मास्त्राद्यैः शरैश्चास्त्रैः प्रयत्नं कर्तुमर्हसि

bhagavānatha kruddho'smai sarvāstrāṇi kramāddhariḥ | brahmāstrādyaiḥ śaraiścāstraiḥ prayatnaṁ kartumarhasi

फिर, हे भगवन्! क्रोध से मुझ पर आप ब्रह्मास्त्र आदि सभी अस्त्र-शस्त्र क्रमशः प्रयत्नपूर्वक प्रयोग कीजिए।

श्लोक 20 (shiva.rudra.59.20)

ब्रह्मोवाच । स तस्य वचनं श्रुत्वा दृष्ट्वा निर्वीर्यमानुषम् । ससर्जाथ क्रुधा तस्मै सर्वास्त्राणि क्रमाद्धरिः

brahmovāca | sa tasya vacanaṁ śrutvā dṛṣṭvā nirvīryamānuṣam | sasarjātha krudhā tasmai sarvāstrāṇi kramāddhariḥ

ब्रह्मा ने कहा — उनके इस वचन को सुनकर और उन्हें एक निर्बल मनुष्य मात्र समझकर, हरि ने क्रोधवश उन पर क्रमशः अपने सभी अस्त्र चला दिए।

श्लोक 21 (shiva.rudra.59.21)

चक्रुर्देवास्ततस्तस्य विष्णोःसाहाय्यमादरात् । द्विजेनैकेन संयोद्धुं प्रसृतस्य विबुद्धयः

cakrurdevāstatastasya viṣṇoḥsāhāyyamādarāt | dvijenaikena saṁyoddhuṁ prasṛtasya vibuddhayaḥ

तब देवताओं ने आदरपूर्वक विष्णु की सहायता की, क्योंकि वे एक अकेले द्विज से युद्ध करने में प्रवृत्त हुए थे।

श्लोक 22 (shiva.rudra.59.22)

चिक्षिपुः स्वानि स्वान्याशु शस्त्राण्यस्त्राणि सर्वतः । दधीचोपरि वेगेन शक्राद्या हरिपाक्षिकाः

cikṣipuḥ svāni svānyāśu śastrāṇyastrāṇi sarvataḥ | dadhīcopari vegena śakrādyā haripākṣikāḥ

इन्द्र आदि हरिपक्षीय देवताओं ने वेगपूर्वक अपने-अपने सभी शस्त्र-अस्त्र चारों ओर से दधीचि पर बरसा दिए।

श्लोक 23 (shiva.rudra.59.23)

कुशमुष्टिमथादाय दधीचः संस्मरन् शिवम् । ससर्ज सर्वदेवेभ्यो वज्रास्थिः सर्वतो वशी

kuśamuṣṭimathādāya dadhīcaḥ saṁsmaran śivam | sasarja sarvadevebhyo vajrāsthiḥ sarvato vaśī

तब सर्वत्र संयमी, वज्रवत् अस्थियों वाले दधीचि ने कुश की एक मुट्ठी लेकर, शिव का स्मरण करते हुए, उसे उन सब देवताओं पर फेंक दिया।

श्लोक 24 (shiva.rudra.59.24)

शङ्करस्य प्रभावात्तु कुशमुष्टिर्मुनेर्हि सा । दिव्यं त्रिशूलमभवत् कालाग्निसदृशं मुने

śaṅkarasya prabhāvāttu kuśamuṣṭirmunerhi sā | divyaṁ triśūlamabhavat kālāgnisadṛśaṁ mune

हे मुने! शंकर के प्रभाव से उस मुनि की कुश-मुट्ठी कालाग्नि के समान एक दिव्य त्रिशूल बन गई।

श्लोक 25 (shiva.rudra.59.25)

दग्धुं देवान् मतिं चक्रे सायुधान् सशिखं च तत् । प्रज्वलत्सर्वतः शैवं युगान्ताग्न्यधिकप्रभम्

dagdhuṁ devān matiṁ cakre sāyudhān saśikhaṁ ca tat | prajvalatsarvataḥ śaivaṁ yugāntāgnyadhikaprabham

वह प्रज्वलित, चारों ओर से देदीप्यमान, प्रलयाग्नि से भी अधिक तेजस्वी, शिखायुक्त शैव त्रिशूल आयुधधारी देवताओं को जलाने का विचार करने लगा।

श्लोक 26 (shiva.rudra.59.26)

नारायणेन्द्रमुख्यैस्तु देवैः क्षिप्तानि यानि च । आयुधानि समस्तानि प्रणेमुस्त्रिशिखं च तत्

nārāyaṇendramukhyaistu devaiḥ kṣiptāni yāni ca | āyudhāni samastāni praṇemustriśikhaṁ ca tat

नारायण, इन्द्र आदि प्रमुख देवताओं द्वारा फेंके गए वे सभी आयुध उस त्रिशिख त्रिशूल के आगे नत हो गए।

श्लोक 27 (shiva.rudra.59.27)

देवाश्च दुद्रुवुः सर्वे ध्वस्तवीर्या दिवौकसः । तस्थौ तत्र हरिर्भीतः केवलं मायिनां वरः

devāśca dudruvuḥ sarve dhvastavīryā divaukasaḥ | tasthau tatra harirbhītaḥ kevalaṁ māyināṁ varaḥ

सारे स्वर्गवासी देवता, अपना पराक्रम नष्ट होते देख भाग खड़े हुए; केवल मायावियों में श्रेष्ठ हरि ही वहाँ भयभीत होकर खड़े रह गए।

श्लोक 28 (shiva.rudra.59.28)

ससर्ज भगवान् विष्णुः स्वदेहात्पुरुषोत्तमः । आत्मनः सदृशान् दिव्यान् लक्षलक्षायुतान् गणान्

sasarja bhagavān viṣṇuḥ svadehātpuruṣottamaḥ | ātmanaḥ sadṛśān divyān lakṣalakṣāyutān gaṇān

तब पुरुषोत्तम भगवान विष्णु ने अपने ही शरीर से अपने समान लाखों-करोड़ों दिव्य गणों को उत्पन्न कर दिया।

श्लोक 29 (shiva.rudra.59.29)

ते चापि युयुधुस्तत्र वीरा विष्णुगणास्ततः । मुनिनैकेन देवर्षे दधीचेन शिवात्मना

te cāpi yuyudhustatra vīrā viṣṇugaṇāstataḥ | muninaikena devarṣe dadhīcena śivātmanā

हे देवर्षे! वे विष्णु के वीर गण भी शिव में लीन चित्त वाले उस अकेले मुनि दधीचि से वहाँ युद्ध करने लगे।

श्लोक 30 (shiva.rudra.59.30)

ततो विष्णुगणांस्तान्वै नियुध्य बहुशो रणे । ददाह सहसा सर्वान् दधीचः शैवसत्तमः

tato viṣṇugaṇāṁstānvai niyudhya bahuśo raṇe | dadāha sahasā sarvān dadhīcaḥ śaivasattamaḥ

तत्पश्चात् उन विष्णु-गणों से रणभूमि में बारंबार युद्ध करके, शैवश्रेष्ठ दधीचि ने उन सबको एकसाथ भस्म कर डाला।

श्लोक 31 (shiva.rudra.59.31)

ततस्तद्विस्मयार्थाय दधीचस्य मुनेर्हरिः । विश्वमूर्तिरभूच्छीघ्रं महामायाविशारदः

tatastadvismayārthāya dadhīcasya munerhariḥ | viśvamūrtirabhūcchīghraṁ mahāmāyāviśāradaḥ

तब दधीचि मुनि को विस्मित करने के लिए, महामायाविशारद हरि तुरंत विश्वरूप हो गए।

श्लोक 32 (shiva.rudra.59.32)

तस्य देहे हरेः साक्षादपश्यद् द्विजसत्तमः । दधीचो देवतादीनां जीवानां च सहस्रकम्

tasya dehe hareḥ sākṣādapaśyad dvijasattamaḥ | dadhīco devatādīnāṁ jīvānāṁ ca sahasrakam

उस विप्रश्रेष्ठ दधीचि ने हरि के उस शरीर में साक्षात् देवताओं और जीवों की सहस्रों संख्या देखी।

श्लोक 33 (shiva.rudra.59.33)

भूतानां कोटयश्चैव गणानां कोटयस्तथा । अण्डानां कोटयश्चैव विश्वमूर्तेस्तनौ तदा

bhūtānāṁ koṭayaścaiva gaṇānāṁ koṭayastathā | aṇḍānāṁ koṭayaścaiva viśvamūrtestanau tadā

उस विश्वरूप शरीर में उन्होंने भूतों के करोड़ों समूह, गणों के करोड़ों समूह, तथा ब्रह्माण्डों के करोड़ों समूह भी देखे।

श्लोक 34 (shiva.rudra.59.34)

दृष्ट्वैतदखिलं तत्र च्यावनिः सततं तदा । विष्णुमाह जगन्नाथं जगत्स्तवमजं विभुम्

dṛṣṭvaitadakhilaṁ tatra cyāvaniḥ satataṁ tadā | viṣṇumāha jagannāthaṁ jagatstavamajaṁ vibhum

यह सब देखकर भी च्यवनपुत्र दधीचि सर्वथा अविचलित रहे और जगत्स्तुत, अजन्मे, सर्वव्यापी जगन्नाथ विष्णु से यह कहा।

श्लोक 35 (shiva.rudra.59.35)

दधीच उवाच । मायां त्यज महाबाहो प्रतिभासो विचारतः । विज्ञातानि सहस्राणि दुर्विज्ञेयानि माधव

dadhīca uvāca | māyāṁ tyaja mahābāho pratibhāso vicārataḥ | vijñātāni sahasrāṇi durvijñeyāni mādhava

दधीचि ने कहा — हे महाबाहो! यह माया त्यागिए — विचार करने पर यह मात्र आभासमात्र है। हे माधव! ऐसी दुर्विज्ञेय सहस्रों वस्तुएँ मुझे पहले ही ज्ञात हैं।

श्लोक 36 (shiva.rudra.59.36)

मयि पश्य जगत्सर्वं त्वया युक्तमतन्द्रितः । ब्रह्माणं च तथा रुद्रं दिव्यां दृष्टिं ददामि ते

mayi paśya jagatsarvaṁ tvayā yuktamatandritaḥ | brahmāṇaṁ ca tathā rudraṁ divyāṁ dṛṣṭiṁ dadāmi te

मुझमें, आपके साथ संयुक्त इस समस्त जगत को, तथा ब्रह्मा और रुद्र को भी बिना किसी शिथिलता के देखिए — मैं आपको दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ।

श्लोक 37 (shiva.rudra.59.37)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा दर्शयामास स्वतनौ निखिलं मुनिः । ब्रह्माण्डं च्यावनिः शम्भुतेजसा पूर्णदेहकः

brahmovāca | ityuktvā darśayāmāsa svatanau nikhilaṁ muniḥ | brahmāṇḍaṁ cyāvaniḥ śambhutejasā pūrṇadehakaḥ

ब्रह्मा ने कहा — यह कहकर, शम्भु के तेज से परिपूर्ण देह वाले च्यवनपुत्र मुनि ने अपने ही शरीर में समस्त ब्रह्माण्ड दिखा दिया।

श्लोक 38 (shiva.rudra.59.38)

तदाह विष्णुं देवेशं दधीचः शैवसत्तमः । संस्मरन् शङ्करं चित्ते विहसन् विभयः सुधीः

tadāha viṣṇuṁ deveśaṁ dadhīcaḥ śaivasattamaḥ | saṁsmaran śaṅkaraṁ citte vihasan vibhayaḥ sudhīḥ

तब चित्त में शंकर का स्मरण करते हुए, हँसते हुए, निर्भय एवं सुबुद्धि शैवश्रेष्ठ दधीचि ने देवेश्वर विष्णु से यह कहा।

श्लोक 39 (shiva.rudra.59.39)

दधीच उवाच । मायया त्वनया किं वा मन्त्रशक्त्याथ वा हरे । सत्कामनामिमां कृत्वा योद्धुमर्हसि यत्नतः

dadhīca uvāca | māyayā tvanayā kiṁ vā mantraśaktyātha vā hare | satkāmanāmimāṁ kṛtvā yoddhumarhasi yatnataḥ

दधीचि ने कहा — हे हरे! इस माया से अथवा मंत्र-शक्ति से क्या लाभ? यह व्यर्थ की कामना त्यागकर, आपको प्रयत्नपूर्वक युद्ध ही करना चाहिए।

श्लोक 40 (shiva.rudra.59.40)

ब्रह्मोवाच । एतच्छुत्वा मुनेस्तस्य वचनं निर्भयस्तदा । शम्भुतेजोमयं विष्णुः चुकोपातीव तं मुनिम्

brahmovāca | etacchutvā munestasya vacanaṁ nirbhayastadā | śambhutejomayaṁ viṣṇuḥ cukopātīva taṁ munim

ब्रह्मा ने कहा — उस निर्भय मुनि के इस वचन को सुनकर, शम्भु के तेज से परिपूर्ण उस मुनि पर विष्णु अत्यंत क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 41 (shiva.rudra.59.41)

देवाश्च दुद्रुवुर्भूयो देवं नारायणं च तम् । योद्धुकामाश्च मुनिना दधीचेन प्रतापिना

devāśca dudruvurbhūyo devaṁ nārāyaṇaṁ ca tam | yoddhukāmāśca muninā dadhīcena pratāpinā

और प्रतापी मुनि दधीचि से युद्ध करने की इच्छा रखने वाले देवगण, स्वयं देव नारायण के साथ, पुनः भाग खड़े हुए।

श्लोक 42 (shiva.rudra.59.42)

एतस्मिन्नन्तरे तत्रागमन्मत्सङ्गमः क्षुवः । अवारयन्तं निश्चेष्टं पद्मयोनिं हरिं सुरान्

etasminnantare tatrāgamanmatsaṅgamaḥ kṣuvaḥ | avārayantaṁ niśceṣṭaṁ padmayoniṁ hariṁ surān

इसी बीच मेरा साथी क्षुव वहाँ आ पहुँचा, और उसने निश्चेष्ट खड़े हुए हरि तथा देवताओं को रोकते हुए देखा।

श्लोक 43 (shiva.rudra.59.43)

निशम्य वचनं मे हि ब्राह्मणो न विनिर्जितः । जगाम निकटं तस्य प्रणनाम मुनिं हरिः

niśamya vacanaṁ me hi brāhmaṇo na vinirjitaḥ | jagāma nikaṭaṁ tasya praṇanāma muniṁ hariḥ

मेरे यह वचन सुनकर कि 'यह ब्राह्मण पराजित नहीं हुआ है', हरि उसके निकट गए और उस मुनि को प्रणाम किया।

श्लोक 44 (shiva.rudra.59.44)

क्षुवो दीनतरो भूत्वा गत्वा तत्र मुनीश्वरम् । दधीचमभिवाद्यैव प्रार्थयामास विक्लवः

kṣuvo dīnataro bhūtvā gatvā tatra munīśvaram | dadhīcamabhivādyaiva prārthayāmāsa viklavaḥ

तब क्षुव अत्यंत दीन होकर उस मुनीश्वर दधीचि के पास गया, और उन्हें अभिवादन कर व्याकुल होकर प्रार्थना करने लगा।

श्लोक 45 (shiva.rudra.59.45)

क्षुव उवाच । प्रसीद मुनिशार्दूल शिवभक्तशिरोमणे । प्रसीद परमेशान दुर्लक्ष्यो दुर्जनैः सदा

kṣuva uvāca | prasīda muniśārdūla śivabhaktaśiromaṇe | prasīda parameśāna durlakṣyo durjanaiḥ sadā

क्षुव ने कहा — हे मुनिशार्दूल! हे शिवभक्तशिरोमणे! प्रसन्न होइए — हे परमेशान! दुर्जनों के लिए सदा अगम्य, आप प्रसन्न होइए।

श्लोक 46 (shiva.rudra.59.46)

ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य राज्ञः सुरगणस्य हि । अनुजग्राह तं विप्रो दधीचस्तपसां निधिः

brahmovāca | ityākarṇya vacastasya rājñaḥ suragaṇasya hi | anujagrāha taṁ vipro dadhīcastapasāṁ nidhiḥ

ब्रह्मा ने कहा — राजा और देवगण के इन वचनों को सुनकर, तपस्या के निधि विप्र दधीचि ने उन पर अनुग्रह किया।

श्लोक 47 (shiva.rudra.59.47)

अथ दृष्ट्वा रमेशादीन् क्रोधविह्वलितो मुनिः । हृदि स्मृत्वा शिवं विष्णुं शशाप च सुरानपि

atha dṛṣṭvā rameśādīn krodhavihvalito muniḥ | hṛdi smṛtvā śivaṁ viṣṇuṁ śaśāpa ca surānapi

तब रमेश (विष्णु) आदि को देखकर क्रोध से विह्वल हुए मुनि ने, हृदय में शिव का स्मरण करते हुए, विष्णु और देवताओं को भी शाप दे दिया।

श्लोक 48 (shiva.rudra.59.48)

दधीच उवाच । रुद्रकोपाग्निना देवाः सदेवेन्द्रा मुनीश्वराः । ध्वस्ता भवन्तु देवेन विष्णुना च समं गणैः

dadhīca uvāca | rudrakopāgninā devāḥ sadevendrā munīśvarāḥ | dhvastā bhavantu devena viṣṇunā ca samaṁ gaṇaiḥ

दधीचि ने कहा — रुद्र के क्रोधाग्नि से इन्द्र सहित देवगण और मुनीश्वर भी, तथा गणों सहित देव विष्णु भी नष्ट हो जाएँ!

श्लोक 49 (shiva.rudra.59.49)

ब्रह्मोवाच । एवं शप्त्वा सुरान् प्रेक्ष्य क्षुवमाह ततो मुनिः । देवैश्च पूज्यो राजेन्द्र नृपैश्चैव द्विजोत्तमः

brahmovāca | evaṁ śaptvā surān prekṣya kṣuvamāha tato muniḥ | devaiśca pūjyo rājendra nṛpaiścaiva dvijottamaḥ

ब्रह्मा ने कहा — इस प्रकार देवताओं को शाप देकर, क्षुव की ओर देखते हुए मुनि ने उससे कहा — हे राजेन्द्र! द्विजश्रेष्ठ ही देवताओं और राजाओं द्वारा पूज्य है।

श्लोक 50 (shiva.rudra.59.50)

ब्राह्मणा एव राजेन्द्र बलिनः प्रभविष्णवः । इत्युक्त्वा स स्फुटं विप्रः प्रविवेश निजाश्रमम्

brāhmaṇā eva rājendra balinaḥ prabhaviṣṇavaḥ | ityuktvā sa sphuṭaṁ vipraḥ praviveśa nijāśramam

हे राजेन्द्र! ब्राह्मण ही बलवान और सामर्थ्यवान हैं — यह स्पष्ट कहकर वह विप्र अपने आश्रम में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 51 (shiva.rudra.59.51)

दधीचमभिवन्द्यैव क्षुवो निजगृहं गतः । विष्णुर्जगाम स्वं लोकं सुरैः सह यथागतम्

dadhīcamabhivandyaiva kṣuvo nijagṛhaṁ gataḥ | viṣṇurjagāma svaṁ lokaṁ suraiḥ saha yathāgatam

दधीचि को प्रणाम कर क्षुव अपने घर चला गया; और विष्णु भी देवताओं सहित जैसे आए थे वैसे ही अपने लोक को लौट गए।

श्लोक 52 (shiva.rudra.59.52)

तदेवं तीर्थमभवत् स्थानेश्वर इति स्मृतम् । स्थानेश्वरमनुप्राप्य शिवसायुज्यमाप्नुयात्

tadevaṁ tīrthamabhavat sthāneśvara iti smṛtam | sthāneśvaramanuprāpya śivasāyujyamāpnuyāt

इस प्रकार वह तीर्थ स्थानेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ — स्थानेश्वर को प्राप्त कर मनुष्य शिव-सायुज्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 53 (shiva.rudra.59.53)

कथितस्तव सङ्क्षेपाद्वादः क्षुवदधीचयोः । नृपाप्तशापयोस्तात ब्रह्मविष्ण्वोः शिवं विना

kathitastava saṅkṣepādvādaḥ kṣuvadadhīcayoḥ | nṛpāptaśāpayostāta brahmaviṣṇvoḥ śivaṁ vinā

हे तात! मैंने तुम्हें संक्षेप में क्षुव और दधीचि का यह विवाद बता दिया, जिसके कारण शिव से पृथक हुए ब्रह्मा और विष्णु को भी उस मुनि के शाप की प्राप्ति हुई।

श्लोक 54 (shiva.rudra.59.54)

य इदं कीर्तयेन्नित्यं वादं क्षुवदधीचयोः । जित्वापमृत्युं देहान्ते ब्रह्मलोकं प्रयाति सः

ya idaṁ kīrtayennityaṁ vādaṁ kṣuvadadhīcayoḥ | jitvāpamṛtyuṁ dehānte brahmalokaṁ prayāti saḥ

जो कोई इस क्षुव-दधीचि विवाद का नित्य कीर्तन करता है, वह अकाल-मृत्यु को जीतकर देहान्त के पश्चात् ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 55 (shiva.rudra.59.55)

रणे यः कीर्तयित्वेदं प्रविशेत्तस्य सर्वदा । मृत्युभीतिर्भवेन्नैव विजयी च भविष्यति

raṇe yaḥ kīrtayitvedaṁ praviśettasya sarvadā | mṛtyubhītirbhavennaiva vijayī ca bhaviṣyati

जो युद्ध में इसका कीर्तन करके प्रवेश करता है, उसे कभी मृत्यु का भय नहीं होता और वह सदा विजयी होता है।

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