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रुद्र संहिता · अध्याय 65

सनत्कुमार का शाप

अध्याय 64अध्याय-सूचीअध्याय 66

श्लोक 1 (shiva.rudra.65.1)

नारद उवाच । विधे प्राज्ञ वदेदानीं मेनोत्पत्तिं समादरात् । अपि शापं समाचक्ष्व कुरु सन्देहभञ्जनम्

nārada uvāca vidhe prājña vadedānīṁ menotpattiṁ samādarāt api śāpaṁ samācakṣva kuru sandehabhañjanam

नारद ने कहा — हे विधे! हे प्राज्ञ! अब आदरपूर्वक मुझे मेना की उत्पत्ति बताइए। साथ ही उस शाप की कथा भी कहिए, जिससे मेरा संदेह दूर हो।

श्लोक 2 (shiva.rudra.65.2)

ब्रह्मोवाच । शृणु नारद सुप्रीत्या मेनोत्पत्तिं विवेकतः । मुनिभिः सह वक्ष्येऽहं सुतवर्य महाबुध

brahmovāca śṛṇu nārada suprītyā menotpattiṁ vivekataḥ munibhiḥ saha vakṣye'haṁ sutavarya mahābudha

ब्रह्मा जी ने कहा — हे नारद! हे परम बुद्धिमान् पुत्रश्रेष्ठ! प्रीतिपूर्वक और विवेकपूर्वक मेना की उत्पत्ति सुनो; मैं उसे मुनियों के साथ जुड़ी कथा सहित कहूँगा।

श्लोक 3 (shiva.rudra.65.3)

दक्षनामा मम सुतो यः पुरा कथितो मुने । तस्य जाताः सुताः षष्टिप्रमिताः सृष्टिकारणाः

dakṣanāmā mama suto yaḥ purā kathito mune tasya jātāḥ sutāḥ ṣaṣṭipramitāḥ sṛṣṭikāraṇāḥ

मेरा जो पुत्र दक्ष नाम से पहले वर्णित हुआ था, हे मुने! उसके साठ पुत्रियाँ हुईं, जो सृष्टि का कारण बनीं।

श्लोक 4 (shiva.rudra.65.4)

तासां विवाहमकरोत्स वरैः कश्यपादिभिः । विदितं ते समस्तं तत्प्रस्तुतं शृणु नारद

tāsāṁ vivāhamakarotsa varaiḥ kaśyapādibhiḥ viditaṁ te samastaṁ tatprastutaṁ śṛṇu nārada

उसने उन सबका विवाह कश्यप आदि वरों से किया — यह सब तुम्हें विदित है; अब जो प्रासंगिक है, वह सुनो, हे नारद।

श्लोक 5 (shiva.rudra.65.5)

तासां मध्ये स्वधानाम्नीं पितृभ्यो दत्तवान्सुताम् । तिस्रोऽभवन्सुतास्तस्याः सुभगा धर्ममूर्तयः

tāsāṁ madhye svadhānāmnīṁ pitṛbhyo dattavānsutām tisro'bhavansutāstasyāḥ subhagā dharmamūrtayaḥ

उनमें से एक पुत्री, जिसका नाम स्वधा था, उसने पितरों को दी; उसकी तीन पुत्रियाँ हुईं, सौभाग्यशालिनी और धर्म की साक्षात् मूर्तियाँ।

श्लोक 6 (shiva.rudra.65.6)

तासां नामानि शृणु मे पावनानि मुनीश्वर । सदा विघ्नहराण्येव महामङ्गलदानि च

tāsāṁ nāmāni śṛṇu me pāvanāni munīśvara sadā vighnaharāṇyeva mahāmaṅgaladāni ca

हे मुनीश्वर! उनके पवित्र नाम मुझसे सुनो — जो सदा विघ्नों का नाश करने वाले और महामंगलदायक हैं।

श्लोक 7 (shiva.rudra.65.7)

मेनानाम्नी सुता ज्येष्ठा मध्या धन्या कलावती । अन्त्या एताः सुताः सर्वाः पितॄणां मानसोद्भवाः

menānāmnī sutā jyeṣṭhā madhyā dhanyā kalāvatī antyā etāḥ sutāḥ sarvāḥ pitṝṇāṁ mānasodbhavāḥ

ज्येष्ठा पुत्री का नाम मेना, मध्यमा का नाम धन्या और सबसे छोटी का नाम कलावती था — ये सब पुत्रियाँ पितरों के मन से उत्पन्न हुई थीं।

श्लोक 8 (shiva.rudra.65.8)

अयोनिजाः स्वधायाश्च लोकतस्तत्सुता मताः । आसां प्रोच्य सुनामानि सर्वान्कामान् जनो लभेत्

ayonijāḥ svadhāyāśca lokatastatsutā matāḥ āsāṁ procya sunāmāni sarvānkāmān jano labhet

किसी गर्भ से न जन्मी होने पर भी वे लोक में स्वधा की पुत्रियाँ मानी गईं; इनके शुभ नामों का उच्चारण करने से मनुष्य सभी कामनाएँ प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 9 (shiva.rudra.65.9)

जगद्वन्द्याः सदा लोकमातरः परमोददाः । योगिन्यः परमा ज्ञाननिधानास्तास्त्रिलोकगाः

jagadvandyāḥ sadā lokamātaraḥ paramodadāḥ yoginyaḥ paramā jñānanidhānāstāstrilokagāḥ

वे सदा जगत् द्वारा वन्दनीय, समस्त लोकों की माताएँ, परम आनंददायिनी, योगिनी, ज्ञान की परम निधि और तीनों लोकों में विचरण करने वाली हैं।

श्लोक 10 (shiva.rudra.65.10)

एकस्मिन्समये तिस्रो भगिन्यस्ता मुनीश्वर । श्वेतद्वीपं विष्णुलोकं जग्मुर्दर्शनहेतवे

ekasminsamaye tisro bhaginyastā munīśvara śvetadvīpaṁ viṣṇulokaṁ jagmurdarśanahetave

एक बार, हे मुनीश्वर! वे तीनों बहनें दर्शन के हेतु श्वेतद्वीप, अर्थात् विष्णुलोक, गईं।

श्लोक 11 (shiva.rudra.65.11)

कृत्वा प्रणामं विष्णोश्च संस्तुतिं भक्तिसंयुताः । तस्थुस्तदाज्ञया तत्र सुसमाजो महानभूत्

kṛtvā praṇāmaṁ viṣṇośca saṁstutiṁ bhaktisaṁyutāḥ tasthustadājñayā tatra susamājo mahānabhūt

विष्णु को प्रणाम करके तथा भक्तिपूर्वक स्तुति करके वे उनकी आज्ञा से वहाँ ठहर गईं; वहाँ एक विशाल और उत्तम समाज इकट्ठा था।

श्लोक 12 (shiva.rudra.65.12)

तदैव सनकाद्यास्तु सिद्धा ब्रह्मसुता मुने । गतास्तत्र हरिं नत्वा स्तुत्वा तस्थुस्तदाज्ञया

tadaiva sanakādyāstu siddhā brahmasutā mune gatāstatra hariṁ natvā stutvā tasthustadājñayā

उसी समय, हे मुने! सनक आदि सिद्ध ब्रह्मपुत्र भी वहाँ पहुँचे; हरि को प्रणाम और स्तुति करके वे भी उनकी आज्ञा से वहाँ ठहर गए।

श्लोक 13 (shiva.rudra.65.13)

सनकाद्यान्मुनीन् दृष्ट्वोत्तस्थुस्ते सकला द्रुतम् । तत्रस्थान्संस्थितान्नत्वा देवाद्याँल्लोकवन्दितान्

sanakādyānmunīn dṛṣṭvottasthuste sakalā drutam tatrasthānsaṁsthitānnatvā devādyā~llokavanditān

सनक आदि मुनियों को देखकर वहाँ बैठे सभी लोग शीघ्र उठ खड़े हुए और लोकवंदित देवताओं आदि उन सबको प्रणाम किया।

श्लोक 14 (shiva.rudra.65.14)

तिस्रो भगिन्यस्तास्तत्र नोत्तस्थुर्मोहिता मुने । मायया दैवविवशाः शङ्करस्य परात्मनः

tisro bhaginyastāstatra nottasthurmohitā mune māyayā daivavivaśāḥ śaṅkarasya parātmanaḥ

परंतु वे तीनों बहनें वहाँ नहीं उठीं, क्योंकि, हे मुने! परमात्मा शंकर की माया से मोहित होकर वे दैव के वशीभूत हो गई थीं।

श्लोक 15 (shiva.rudra.65.15)

मोहिनी सर्वलोकानां शिवमाया गरीयसी । तदधीनं जगत्सर्वं शिवेच्छा सा प्रकीर्त्यते

mohinī sarvalokānāṁ śivamāyā garīyasī tadadhīnaṁ jagatsarvaṁ śivecchā sā prakīrtyate

शिव की वह माया समस्त लोकों को मोहित करने वाली, सबसे बड़ी है; समूचा जगत् उसी के अधीन है — उसे ही शिव की इच्छा कहा जाता है।

श्लोक 16 (shiva.rudra.65.16)

प्रारब्धं प्रोच्यते सैव तन्नामानि ह्यनेकशः । शिवेच्छया भवत्येव नात्र कार्या विचारणा

prārabdhaṁ procyate saiva tannāmāni hyanekaśaḥ śivecchayā bhavatyeva nātra kāryā vicāraṇā

उसी को प्रारब्ध भी कहा जाता है, उसके अनेक नाम हैं; वह शिव की इच्छा से ही होती है — इसमें विचार की आवश्यकता नहीं है।

श्लोक 17 (shiva.rudra.65.17)

भूत्वा तद्वशगास्ता वै न चक्रुरपि तन्नतिम् । विस्मिताः सम्प्रदृश्यैव संस्थितास्तत्र केवलम्

bhūtvā tadvaśagāstā vai na cakrurapi tannatim vismitāḥ sampradṛśyaiva saṁsthitāstatra kevalam

उसके वश में होकर वे तीनों बहनें नमस्कार भी नहीं कर सकीं; आश्चर्यचकित होकर वे केवल देखती हुई वहीं बैठी रह गईं।

श्लोक 18 (shiva.rudra.65.18)

तादृशीं तद्गतिं दृष्ट्वा सनकाद्या मुनीश्वराः । ज्ञानिनोऽपि परं चक्रुः क्रोधं दुर्विषहं च ते

tādṛśīṁ tadgatiṁ dṛṣṭvā sanakādyā munīśvarāḥ jñānino'pi paraṁ cakruḥ krodhaṁ durviṣahaṁ ca te

उनका ऐसा आचरण देखकर सनक आदि मुनीश्वर, ज्ञानी होते हुए भी, अत्यंत असह्य क्रोध से भर गए।

श्लोक 19 (shiva.rudra.65.19)

शिवेच्छामोहितस्तत्र सक्रोधस्ता उवाच ह । सनत्कुमारो योगीशः शापं दण्डकरं ददत्

śivecchāmohitastatra sakrodhastā uvāca ha sanatkumāro yogīśaḥ śāpaṁ daṇḍakaraṁ dadat

वहाँ शिव की इच्छा से मोहित, फिर भी क्रोध में भरे योगीश्वर सनत्कुमार ने उन्हें दण्डस्वरूप शाप देते हुए यह कहा।

श्लोक 20 (shiva.rudra.65.20)

सनत्कुमार उवाच । यूयं तिस्रो भगिन्यश्च मूढाः सद्वयुनोज्झिताः । अज्ञातश्रुतितत्त्वा हि पितृकन्या अपि ध्रुवम्

sanatkumāra uvāca yūyaṁ tisro bhaginyaśca mūḍhāḥ sadvayunojjhitāḥ ajñātaśrutitattvā hi pitṛkanyā api dhruvam

सनत्कुमार ने कहा — तुम तीनों बहनें मूर्ख हो, सद्ज्ञान से रहित हो; पितरों की पुत्रियाँ होकर भी तुम निश्चय ही शास्त्रों के तत्त्व को नहीं जानतीं।

श्लोक 21 (shiva.rudra.65.21)

अभ्युत्थानं कृतं नो यो नमस्कारोऽपि गर्विताः । मोहिता नरभावत्वात्स्वर्गाद् दूरा भवन्तु हि

abhyutthānaṁ kṛtaṁ no yo namaskāro'pi garvitāḥ mohitā narabhāvatvātsvargād dūrā bhavantu hi

अभिमान के कारण तुमने हमारे प्रति न तो खड़े होकर आदर दिखाया, न ही नमस्कार किया; मोहित होने के कारण तुम मनुष्य-भाव को प्राप्त होकर स्वर्ग से दूर हो जाओ।

श्लोक 22 (shiva.rudra.65.22)

नरस्त्रियः सम्भवन्तु तिस्रोऽप्य ज्ञानमोहिताः । स्वकर्मणः प्रभावेण लभध्वं फलमीदृशम्

narastriyaḥ sambhavantu tisro'pya jñānamohitāḥ svakarmaṇaḥ prabhāveṇa labhadhvaṁ phalamīdṛśam

अज्ञान से मोहित तुम तीनों मनुष्य-स्त्रियाँ बनो; अपने ही कर्म के प्रभाव से ऐसा फल प्राप्त करो।

श्लोक 23 (shiva.rudra.65.23)

ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य च साध्व्यस्तास्तिस्रोऽपि चकिता भृशम् । पतित्वा पादयोस्तस्य समूचूर्नतमस्तकाः

brahmovāca ityākarṇya ca sādhvyastāstisro'pi cakitā bhṛśam patitvā pādayostasya samūcūrnatamastakāḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — यह सुनकर वे तीनों साध्वी स्त्रियाँ अत्यंत भयभीत हो गईं और उनके चरणों में गिरकर सिर झुकाए हुए यह बोलीं।

श्लोक 24 (shiva.rudra.65.24)

पितृतनया ऊचुः मुनिवर्य दयासिन्धो प्रसन्नो भव चाधुना । त्वत्प्रणामं वयं मूढाः कुर्महे स्म न भावतः

pitṛtanayā ūcuḥ munivarya dayāsindho prasanno bhava cādhunā tvatpraṇāmaṁ vayaṁ mūḍhāḥ kurmahe sma na bhāvataḥ

पितरों की पुत्रियों ने कहा — हे मुनिवर! हे दया के सागर! अब प्रसन्न हो जाइए। हम मूर्खतावश आपको प्रणाम भाव से नहीं कर सकीं।

श्लोक 25 (shiva.rudra.65.25)

प्राप्तं च तत्फलं विप्र न ते दोषो महामुने । अनुग्रहं कुरुष्वात्र लभेम स्वर्गतिं पुनः

prāptaṁ ca tatphalaṁ vipra na te doṣo mahāmune anugrahaṁ kuruṣvātra labhema svargatiṁ punaḥ

हे विप्र! हमें उसका फल प्राप्त हो चुका, इसमें आपका कोई दोष नहीं, हे महामुने! अब हम पर अनुग्रह कीजिए, जिससे हम पुनः स्वर्ग-गति पा सकें।

श्लोक 26 (shiva.rudra.65.26)

ब्रह्मोवाच श्रुत्वा तद्वचनं तात प्रोवाच स मुनिस्तदा । शापोद्धारं प्रसन्नात्मा प्रेरितः शिवमायया

brahmovāca śrutvā tadvacanaṁ tāta provāca sa munistadā śāpoddhāraṁ prasannātmā preritaḥ śivamāyayā

ब्रह्मा जी ने कहा — हे तात! यह वचन सुनकर वे मुनि, शिव की माया से प्रेरित होकर, प्रसन्नचित्त हो गए और तब शाप की मुक्ति की घोषणा की।

श्लोक 27 (shiva.rudra.65.27)

सनत्कुमार उवाच पितॄणां तनयास्तिस्रः शृणुत प्रीतमानसाः । वचनं मम शोकघ्नं सुखदं सर्वदैव वः

sanatkumāra uvāca pitṝṇāṁ tanayāstisraḥ śṛṇuta prītamānasāḥ vacanaṁ mama śokaghnaṁ sukhadaṁ sarvadaiva vaḥ

सनत्कुमार ने कहा — हे पितरों की तीन पुत्रियो! प्रसन्नचित्त होकर मेरा यह शोकनाशक और सदा सुखदायी वचन सुनो।

श्लोक 28 (shiva.rudra.65.28)

विष्णोरंशस्य शैलस्य हिमाधारस्य कामिनी । ज्येष्ठा भवतु तत्कन्या भविष्यत्येव पार्वती

viṣṇoraṁśasya śailasya himādhārasya kāminī jyeṣṭhā bhavatu tatkanyā bhaviṣyatyeva pārvatī

तुममें से ज्येष्ठा हिम को धारण करने वाले विष्णु के अंशस्वरूप पर्वत की प्रिया बने; उसकी कन्या ही साक्षात् पार्वती होगी।

श्लोक 29 (shiva.rudra.65.29)

धन्या प्रिया द्वितीया तु योगिनी जनकस्य च । तस्याः कन्या महालक्ष्मीर्नाम्ना सीता भविष्यति

dhanyā priyā dvitīyā tu yoginī janakasya ca tasyāḥ kanyā mahālakṣmīrnāmnā sītā bhaviṣyati

दूसरी, धन्या, जनक की योगिनी-प्रिया बने; उसकी कन्या महालक्ष्मी सीता नाम से प्रसिद्ध होगी।

श्लोक 30 (shiva.rudra.65.30)

वृषभानस्य वैश्यस्य कनिष्ठा च कलावती । भविष्यति प्रिया राधा तत्सुता द्वापरान्ततः

vṛṣabhānasya vaiśyasya kaniṣṭhā ca kalāvatī bhaviṣyati priyā rādhā tatsutā dvāparāntataḥ

सबसे छोटी कलावती वैश्य वृषभानु की प्रिया बने; द्वापर के अंत में उसकी पुत्री राधा होगी।

श्लोक 31 (shiva.rudra.65.31)

मेनका योगिनी पत्या पार्वत्याश्च वरेण च । तेन देहेन कैलासं गमिष्यति परं पदम्

menakā yoginī patyā pārvatyāśca vareṇa ca tena dehena kailāsaṁ gamiṣyati paraṁ padam

मेनका योगिनी बनकर अपने पति और पार्वती के वरदान से उसी शरीर सहित कैलास, उस परम पद, को प्राप्त करेगी।

श्लोक 32 (shiva.rudra.65.32)

धन्या च सीतया सीरध्वजो जनकवंशजः । जीवन्मुक्तो महायोगी वैकुण्ठं च गमिष्यति

dhanyā ca sītayā sīradhvajo janakavaṁśajaḥ jīvanmukto mahāyogī vaikuṇṭhaṁ ca gamiṣyati

और धन्या, सीता तथा जनक-वंशज सीरध्वज (जनक) के साथ, जीवन्मुक्त महायोगी होकर वैकुण्ठ को जाएगी।

श्लोक 33 (shiva.rudra.65.33)

कलावती वृषभानस्य कौतुकात्कन्यया सह । जीवन्मुक्ता च गोलोकं गमिष्यति न संशयः

kalāvatī vṛṣabhānasya kautukātkanyayā saha jīvanmuktā ca golokaṁ gamiṣyati na saṁśayaḥ

कलावती वृषभानु के साथ आनंदपूर्वक अपनी पुत्री सहित, जीवन्मुक्त होकर निःसंदेह गोलोक को जाएगी।

श्लोक 34 (shiva.rudra.65.34)

विना विपत्तिं महिमा केषां कुत्र भविष्यति । सुकर्मिणां गते दुःखे प्रभवेद् दुर्लभं सुखम्

vinā vipattiṁ mahimā keṣāṁ kutra bhaviṣyati sukarmiṇāṁ gate duḥkhe prabhaved durlabhaṁ sukham

किसकी और कहाँ महिमा विपत्ति के बिना हुई है? सत्कर्मियों के लिए दुःख बीत जाने पर ही दुर्लभ सुख उत्पन्न होता है।

श्लोक 35 (shiva.rudra.65.35)

पितृणां तनयाः यूयं सर्वाः स्वर्गविलासिकाः । कर्मक्षयश्च युष्माकमभवद्विष्णुदर्शनात्

pitṛṇāṁ tanayāḥ yūyaṁ sarvāḥ svargavilāsikāḥ karmakṣayaśca yuṣmākamabhavadviṣṇudarśanāt

पितरों की पुत्रियो! तुम सब स्वर्ग में विलास करने वाली हो; विष्णु के दर्शन मात्र से तुम्हारा कर्म-क्षय हो चुका है।

श्लोक 36 (shiva.rudra.65.36)

इत्युक्त्वा पुनरप्याह गतक्रोधो मुनीश्वरः । शिवं संस्मृत्य मनसा ज्ञानदं भुक्तिमुक्तिदम्

ityuktvā punarapyāha gatakrodho munīśvaraḥ śivaṁ saṁsmṛtya manasā jñānadaṁ bhuktimuktidam

यह कहकर, क्रोधरहित हो चुके वे मुनीश्वर ज्ञान, भोग और मुक्ति देने वाले शिव का मन में स्मरण करके पुनः बोले।

श्लोक 37 (shiva.rudra.65.37)

अपरं शृणुत प्रीत्या मद्वचः सुखदं सदा । धन्या यूयं शिवप्रीता मान्या पूज्या ह्यभीक्ष्णशः

aparaṁ śṛṇuta prītyā madvacaḥ sukhadaṁ sadā dhanyā yūyaṁ śivaprītā mānyā pūjyā hyabhīkṣṇaśaḥ

प्रेमपूर्वक मेरा एक और सदा सुखदायी वचन सुनो — तुम धन्य हो, शिव की प्रिय हो, सदा माननीय और पूज्य हो।

श्लोक 38 (shiva.rudra.65.38)

मेनायास्तनया देवी पार्वती जगदम्बिका । भविष्यति प्रिया शम्भोस्तपः कृत्वा सुदुस्सहम्

menāyāstanayā devī pārvatī jagadambikā bhaviṣyati priyā śambhostapaḥ kṛtvā sudussaham

मेना की पुत्री, देवी पार्वती, जगदम्बिका, अत्यंत दुस्सह तप करके शम्भु की प्रिया बनेगी।

श्लोक 39 (shiva.rudra.65.39)

धन्यासुता स्मृता सीता रामपत्नी भविष्यति । लौकिकाचारमाश्रित्य रामेण विहरिष्यति

dhanyāsutā smṛtā sītā rāmapatnī bhaviṣyati laukikācāramāśritya rāmeṇa vihariṣyati

धन्या की पुत्री सीता के नाम से प्रसिद्ध होकर राम की पत्नी बनेगी; लौकिक आचार का पालन करते हुए वह राम के साथ विहार करेगी।

श्लोक 40 (shiva.rudra.65.40)

कलावतीसुता राधा साक्षाद् गोलोकवासिनी । गुप्तस्नेहनिबद्धा सा कृष्णपत्नी भविष्यति

kalāvatīsutā rādhā sākṣād golokavāsinī guptasnehanibaddhā sā kṛṣṇapatnī bhaviṣyati

कलावती की पुत्री राधा, जो साक्षात् गोलोकवासिनी है, गुप्त स्नेह से बँधी हुई कृष्ण की प्रिया बनेगी।

श्लोक 41 (shiva.rudra.65.41)

ब्रह्मोवाच । इत्थमाभाष्य स मुनिर्भ्रातृभिः सह संस्तुतः । सनत्कुमारो भगवाँस्तत्रैवान्तर्हितोऽभवत्

brahmovāca itthamābhāṣya sa munirbhrātṛbhiḥ saha saṁstutaḥ sanatkumāro bhagavā~statraivāntarhito'bhavat

ब्रह्मा जी ने कहा — इस प्रकार कहकर अपने भाइयों सहित स्तुत वे भगवान् मुनि सनत्कुमार वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 42 (shiva.rudra.65.42)

तिस्रो भगिन्यस्तास्तात पितृणां मानसीः सुताः । गतपापाः सुखं प्राप्य स्वधाम प्रययुर्द्रुतम्

tisro bhaginyastāstāta pitṛṇāṁ mānasīḥ sutāḥ gatapāpāḥ sukhaṁ prāpya svadhāma prayayurdrutam

हे तात! पितरों की उन मानसी पुत्रियों तीनों बहनों ने पापमुक्त होकर सुख पाया और शीघ्र ही अपने धाम को प्रस्थान किया।

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