रुद्र संहिता · अध्याय 66
देवताओं की स्तुति
श्लोक 1 (shiva.rudra.66.1)
नारद उवाच । विधे प्राज्ञ महाधीमन्वद मे वदतां वर । ततः परं किमभवच्चरितं विष्णुसद्गुरोः
nārada uvāca vidhe prājña mahādhīmanvada me vadatāṁ vara tataḥ paraṁ kimabhavaccaritaṁ viṣṇusadguroḥ
नारद ने कहा — हे विधे! हे परम बुद्धिमान् प्राज्ञ! हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! उसके बाद क्या हुआ, हे सच्चे गुरु, वह चरित्र मुझे बताइए।
श्लोक 2 (shiva.rudra.66.2)
अद्भुतेयं कथा प्रोक्ता मेनापूर्वगतिः शुभा । विवाहश्च श्रुतः सम्यक् परमं चरितं वद
adbhuteyaṁ kathā proktā menāpūrvagatiḥ śubhā vivāhaśca śrutaḥ samyak paramaṁ caritaṁ vada
मेना की पूर्व-गति की यह अद्भुत और शुभ कथा तो कही गई, और विवाह भी मैंने भलीभाँति सुना; अब उसके आगे का परम चरित्र कहिए।
श्लोक 3 (shiva.rudra.66.3)
मेनां विवाह्य स गिरिः कृतवान् किं ततः परम् । पार्वती कथमुत्पन्ना तस्यां वै जगदम्बिका
menāṁ vivāhya sa giriḥ kṛtavān kiṁ tataḥ param pārvatī kathamutpannā tasyāṁ vai jagadambikā
मेना का विवाह करके उस पर्वत ने उसके बाद क्या किया? पार्वती, वह साक्षात् जगदम्बिका, उसके गर्भ से कैसे उत्पन्न हुई?
श्लोक 4 (shiva.rudra.66.4)
तपः सुदुस्सहं कृत्वा कथं प्राप पतिं हरम् । एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तराच्छाङ्करं यशः
tapaḥ sudussahaṁ kṛtvā kathaṁ prāpa patiṁ haram etatsarvaṁ samācakṣva vistarācchāṅkaraṁ yaśaḥ
अत्यंत दुस्सह तप करके उसने किस प्रकार हर को पति रूप में प्राप्त किया? यह शांकर यश मुझे विस्तारपूर्वक कहिए।
श्लोक 5 (shiva.rudra.66.5)
ब्रह्मोवाच । मुने त्वं शृणु सुप्रीत्या शाङ्करं सुयशः शुभम् । यच्छ्रुत्वा ब्रह्महा शुद्ध्येत्सर्वान्कामानवाप्नुयात्
brahmovāca mune tvaṁ śṛṇu suprītyā śāṅkaraṁ suyaśaḥ śubham yacchrutvā brahmahā śuddhyetsarvānkāmānavāpnuyāt
ब्रह्मा जी ने कहा — हे मुने! प्रीतिपूर्वक इस शुभ शांकर-यश को सुनो, जिसे सुनकर ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध होकर सभी कामनाएँ प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 6 (shiva.rudra.66.6)
यदा मेनाविवाहं तु कृत्वागच्छद्गिरिर्गृहम् । तदा समुत्सवो जातस्त्रिषु लोकेषु नारद
yadā menāvivāhaṁ tu kṛtvāgacchadgirirgṛham tadā samutsavo jātastriṣu lokeṣu nārada
जब मेना से विवाह करके पर्वत घर लौटा, तब, हे नारद! तीनों लोकों में महान् उत्सव हुआ।
श्लोक 7 (shiva.rudra.66.7)
हिमाचलोऽपि सुप्रीतश्चकार परमोत्सवम् । भूसुरान् बन्धुवर्गांश्च परानानर्च सद्धिया
himācalo'pi suprītaścakāra paramotsavam bhūsurān bandhuvargāṁśca parānānarca saddhiyā
हिमाचल ने भी अत्यंत प्रसन्न होकर परम उत्सव मनाया; उसने सद्बुद्धि से भूसुरों (ब्राह्मणों), बंधुजनों और अन्य सबका सत्कार किया।
श्लोक 8 (shiva.rudra.66.8)
सर्वे द्विजाश्च सन्तुष्टा दत्त्वाशीर्वचनं वरम् । ययुस्तस्मै स्वस्वधाम बन्धुवर्गास्तथापरे
sarve dvijāśca santuṣṭā dattvāśīrvacanaṁ varam yayustasmai svasvadhāma bandhuvargāstathāpare
सभी ब्राह्मण अत्यंत संतुष्ट होकर उत्तम आशीर्वचन देकर अपने-अपने धाम को गए, और बंधुजन तथा अन्य लोग भी वैसे ही गए।
श्लोक 9 (shiva.rudra.66.9)
हिमाचलोऽपि सुप्रीतो मेनया सुखदे गृहे । रेमेऽन्यत्र च सुस्थाने नन्दनादिवनेष्वपि
himācalo'pi suprīto menayā sukhade gṛhe reme'nyatra ca susthāne nandanādivaneṣvapi
हिमाचल भी अत्यंत प्रसन्न होकर अपने सुखद घर में मेना के साथ विहार करता रहा, और अन्य सुंदर स्थानों में तथा नंदन आदि वनों में भी।
श्लोक 10 (shiva.rudra.66.10)
तस्मिन्नवसरे देवा मुने विष्ण्वादयोऽखिलाः । मुनयश्च महात्मानः प्रजग्मुर्भूधरान्तिके
tasminnavasare devā mune viṣṇvādayo'khilāḥ munayaśca mahātmānaḥ prajagmurbhūdharāntike
उस अवसर पर, हे मुने! विष्णु आदि सभी देवता और महात्मा मुनिगण उस पर्वत के समीप आए।
श्लोक 11 (shiva.rudra.66.11)
दृष्ट्वा तानागतान्देवान्प्रणनाम मुदा गिरिः । सम्मानं कृतवान् भक्त्या प्रशंसन् स्वविधिं महान्
dṛṣṭvā tānāgatāndevānpraṇanāma mudā giriḥ sammānaṁ kṛtavān bhaktyā praśaṁsan svavidhiṁ mahān
उन आगत देवताओं को देखकर पर्वत ने हर्षपूर्वक प्रणाम किया; उस महान् ने भक्तिपूर्वक उनका सम्मान करते हुए अपने सौभाग्य की सराहना की।
श्लोक 12 (shiva.rudra.66.12)
साञ्जलिर्नतशीर्षो हि स तुष्टाव सुभक्तितः । रोमोद्गमो महानासीद्गिरेः प्रेमाश्रवोऽपतन्
sāñjalirnataśīrṣo hi sa tuṣṭāva subhaktitaḥ romodgamo mahānāsīdgireḥ premāśravo'patan
हाथ जोड़े, सिर झुकाए हुए उसने अत्यंत भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की; पर्वत के रोंगटे खड़े हो गए और प्रेम के आँसू बह चले।
श्लोक 13 (shiva.rudra.66.13)
ततः प्रणम्य सुप्रीतो हिमशैलः प्रसन्नधीः । उवाच प्रणतो भूत्वा मुने विष्ण्वादिकान्सुरान्
tataḥ praṇamya suprīto himaśailaḥ prasannadhīḥ uvāca praṇato bhūtvā mune viṣṇvādikānsurān
तब प्रणाम करके, प्रसन्न और स्वच्छ मन वाला वह हिमशैल विनम्र होकर, हे मुने! विष्णु आदि देवताओं से बोला।
श्लोक 14 (shiva.rudra.66.14)
हिमाचल उवाच । अद्य मे सफलं जन्म सफलं सुमहत्तपः । अद्य मे सफलं ज्ञानमद्य मे सफलाः क्रियाः
himācala uvāca adya me saphalaṁ janma saphalaṁ sumahattapaḥ adya me saphalaṁ jñānamadya me saphalāḥ kriyāḥ
हिमाचल ने कहा — आज मेरा जन्म सफल हुआ, मेरा महान् तप सफल हुआ; आज मेरा ज्ञान सफल हुआ, आज मेरे सभी कर्म सफल हुए।
श्लोक 15 (shiva.rudra.66.15)
धन्योऽहमद्य सञ्जातो धन्या मे सकला क्षितिः । धन्यं कुलं तथा दाराः सर्वं धन्यं न संशयः
dhanyo'hamadya sañjāto dhanyā me sakalā kṣitiḥ dhanyaṁ kulaṁ tathā dārāḥ sarvaṁ dhanyaṁ na saṁśayaḥ
आज मैं धन्य हो गया, मेरी सारी धरती धन्य हुई; मेरा कुल और मेरी पत्नी धन्य हुए — सब कुछ धन्य हो गया, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 16 (shiva.rudra.66.16)
यतः समागता यूयं मिलित्वा सर्व एकदा । मां निदेशयत प्रीत्योचितं मत्वा स्वसेवकम्
yataḥ samāgatā yūyaṁ militvā sarva ekadā māṁ nideśayata prītyocitaṁ matvā svasevakam
चूँकि आप सब एक साथ मिलकर यहाँ पधारे हैं, इसलिए मुझे अपना उचित सेवक मानते हुए प्रेमपूर्वक आज्ञा दीजिए।
श्लोक 17 (shiva.rudra.66.17)
ब्रह्मोवाच । इति श्रुत्वा महीध्रस्य वचनं ते सुरास्तदा । ऊचुर्हर्यादयः प्रीताः सिद्धिं मत्वा स्वकार्यतः
brahmovāca iti śrutvā mahīdhrasya vacanaṁ te surāstadā ūcurharyādayaḥ prītāḥ siddhiṁ matvā svakāryataḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — पर्वत का यह वचन सुनकर हरि आदि प्रसन्न देवताओं ने अपने कार्य की सिद्धि मानते हुए यह कहा।
श्लोक 18 (shiva.rudra.66.18)
देवा ऊचुः । हिमाचल महाप्राज्ञ शृण्वस्मद्वचनं हितम् । यदर्थमागताः सर्वे तद् ब्रूमः प्रीतितो वयम्
devā ūcuḥ himācala mahāprājña śṛṇvasmadvacanaṁ hitam yadarthamāgatāḥ sarve tad brūmaḥ prītito vayam
देवताओं ने कहा — हे परम बुद्धिमान् हिमाचल! हमारा यह हितकर वचन सुनिए; जिस प्रयोजन से हम सब आए हैं, वह हम प्रेमपूर्वक कहते हैं।
श्लोक 19 (shiva.rudra.66.19)
या पुरा जगदम्बोमा दक्षकन्याभवद्गिरे । रुद्रपत्नी हि सा भूत्वा चिक्रीडे सुचिरं भुवि
yā purā jagadambomā dakṣakanyābhavadgire rudrapatnī hi sā bhūtvā cikrīḍe suciraṁ bhuvi
हे पर्वत! जो पूर्वकाल में जगदम्बा उमा दक्ष की पुत्री हुई थीं, वे रुद्र की पत्नी बनकर बहुत काल तक इस पृथ्वी पर विहार करती रहीं।
श्लोक 20 (shiva.rudra.66.20)
पितृतोऽनादरं प्राप्य संस्मृत्य स्वपणं सती । जगाम स्वपदं त्यक्त्वा तच्छरीरं तदाम्बिका
pitṛto'nādaraṁ prāpya saṁsmṛtya svapaṇaṁ satī jagāma svapadaṁ tyaktvā taccharīraṁ tadāmbikā
पिता से अनादर पाकर, अपने प्रण का स्मरण करके सती, वह अम्बिका, अपने पद को प्राप्त होने के लिए उस देह को त्यागकर चली गईं।
श्लोक 21 (shiva.rudra.66.21)
सा कथा विदिता लोके तवापि हिमभूधर । एवं सति महालाभो भवेद्देवगणस्य हि
sā kathā viditā loke tavāpi himabhūdhara evaṁ sati mahālābho bhaveddevagaṇasya hi
हे हिमगिरे! वह कथा जगत् में विदित है, आपको भी ज्ञात है; ऐसा होने पर देवसमूह का महान् लाभ हो सकता है।
श्लोक 22 (shiva.rudra.66.22)
सर्वस्य भवतश्चापि स्युः सर्वे ते वशाः सुराः
sarvasya bhavataścāpi syuḥ sarve te vaśāḥ surāḥ
और आपके लिए भी सभी देवता आपके वश में हो जाएँगे।
श्लोक 23 (shiva.rudra.66.23)
ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तेषां हर्यादीनां गिरीश्वरः । तथास्त्विति प्रसन्नात्मा प्रोवाच न च आदरात्
brahmovāca ityākarṇya vacasteṣāṁ haryādīnāṁ girīśvaraḥ tathāstviti prasannātmā provāca na ca ādarāt
ब्रह्मा जी ने कहा — हरि आदि देवताओं का यह वचन सुनकर पर्वतराज ने प्रसन्नचित्त होकर बड़े आदर से "तथास्तु" कहा।
श्लोक 24 (shiva.rudra.66.24)
अथ ते च समादिश्य तद्विधिं परमादरात् । स्वयं जग्मुश्च शरणमुमायाः शङ्करस्त्रियः
atha te ca samādiśya tadvidhiṁ paramādarāt svayaṁ jagmuśca śaraṇamumāyāḥ śaṅkarastriyaḥ
फिर उन्होंने परम आदरपूर्वक उसे विधि समझाकर स्वयं शंकर की पत्नी उमा की शरण में गमन किया।
श्लोक 25 (shiva.rudra.66.25)
सुस्थले मनसा स्थित्वा सस्मरुर्जगदम्बिकाम् । प्रणम्य बहुशस्तत्र तुष्टुवुः श्रद्धया सुराः
susthale manasā sthitvā sasmarurjagadambikām praṇamya bahuśastatra tuṣṭuvuḥ śraddhayā surāḥ
एक शुभ स्थान में स्थिर मन से खड़े होकर उन्होंने जगदम्बिका का स्मरण किया; बार-बार प्रणाम करके देवताओं ने वहाँ श्रद्धापूर्वक स्तुति की।
श्लोक 26 (shiva.rudra.66.26)
देवा ऊचुः । देव्युमे जगतामम्ब शिवलोकनिवासिनि । सदाशिवप्रिये दुर्गे त्वां नमामो महेश्वरि
devā ūcuḥ devyume jagatāmamba śivalokanivāsini sadāśivapriye durge tvāṁ namāmo maheśvari
देवताओं ने कहा — हे देवी उमे! हे जगत् की माता! हे शिवलोकवासिनी! हे सदाशिव की प्रिये! हे दुर्गे! हे महेश्वरी! हम आपको प्रणाम करते हैं।
श्लोक 27 (shiva.rudra.66.27)
श्रीशक्तिं पावनां शान्तां पुष्टिं परमपावनीम् । वयं नमामहे भक्त्या महदव्यक्तरूपिणीम्
śrīśaktiṁ pāvanāṁ śāntāṁ puṣṭiṁ paramapāvanīm vayaṁ namāmahe bhaktyā mahadavyaktarūpiṇīm
हम भक्तिपूर्वक आपको प्रणाम करते हैं, जो श्री हैं, शक्ति हैं, पवित्र और शांत हैं, पुष्टि हैं, परम पावन हैं, महान् अव्यक्त रूप वाली हैं।
श्लोक 28 (shiva.rudra.66.28)
शिवां शिवकरां शुद्धां स्थूलां सूक्ष्मां परायणाम् । अन्तर्विद्यासुविद्याभ्यां सुप्रीतां त्वां नमामहे
śivāṁ śivakarāṁ śuddhāṁ sthūlāṁ sūkṣmāṁ parāyaṇām antarvidyāsuvidyābhyāṁ suprītāṁ tvāṁ namāmahe
हम आपको प्रणाम करते हैं, जो शिवा हैं, शिवकरी हैं, शुद्ध हैं, स्थूल और सूक्ष्म रूप में परायण हैं, अंतर्विद्या और सुविद्या से जिन्हें अत्यंत प्रसन्नता है।
श्लोक 29 (shiva.rudra.66.29)
त्वं श्रद्धा त्वं धृतिस्त्वं श्रीस्त्वमेव सर्वगोचरा । त्वं दीधितिस्सूर्यगता स्वप्रपञ्चप्रकाशिनी
tvaṁ śraddhā tvaṁ dhṛtistvaṁ śrīstvameva sarvagocarā tvaṁ dīdhitissūryagatā svaprapañcaprakāśinī
आप ही श्रद्धा हैं, आप ही धृति हैं, आप ही श्री हैं, आप ही सर्वत्र विद्यमान हैं; आप ही सूर्य में स्थित किरण हैं, अपने ही रचे प्रपंच को प्रकाशित करने वाली।
श्लोक 30 (shiva.rudra.66.30)
या च ब्रह्माण्डसंस्थाने जगज्जीवेषु या जगत् । आप्याययति ब्रह्मादितृणान्तं तां नमामहे
yā ca brahmāṇḍasaṁsthāne jagajjīveṣu yā jagat āpyāyayati brahmāditṛṇāntaṁ tāṁ namāmahe
जो ब्रह्माण्ड में स्थित होकर संसार के जीवों में जगत् का पोषण करती हैं, ब्रह्मा से लेकर तृण तक — उन्हें हम प्रणाम करते हैं।
श्लोक 31 (shiva.rudra.66.31)
गायत्री त्वं वेदमाता त्वं सावित्री सरस्वती । त्वं वार्ता सर्वजगतां त्वं त्रयी धर्मरूपिणी
gāyatrī tvaṁ vedamātā tvaṁ sāvitrī sarasvatī tvaṁ vārtā sarvajagatāṁ tvaṁ trayī dharmarūpiṇī
आप ही गायत्री हैं, वेदमाता हैं, आप ही सावित्री और सरस्वती हैं; आप ही सभी लोकों की जीविका हैं, आप ही धर्मरूपिणी त्रयी हैं।
श्लोक 32 (shiva.rudra.66.32)
निद्रा त्वं सर्वभूतेषु क्षुधा तृप्तिस्त्वमेव हि । तृष्णा कान्तिश्छविस्तुष्टिः सर्वानन्दकरी सदा
nidrā tvaṁ sarvabhūteṣu kṣudhā tṛptistvameva hi tṛṣṇā kāntiśchavistuṣṭiḥ sarvānandakarī sadā
आप ही सभी प्राणियों में निद्रा हैं, आप ही क्षुधा और तृप्ति हैं; तृष्णा, कांति, आभा और संतोष — सदा सबको आनंद देने वाली आप ही हैं।
श्लोक 33 (shiva.rudra.66.33)
त्वं लक्ष्मीः पुण्यकर्तॄणां त्वं ज्येष्ठा पापिनां सदा । त्वं शान्तिः सर्वजगतां त्वं धात्री प्राणपोषिणी
tvaṁ lakṣmīḥ puṇyakartṝṇāṁ tvaṁ jyeṣṭhā pāpināṁ sadā tvaṁ śāntiḥ sarvajagatāṁ tvaṁ dhātrī prāṇapoṣiṇī
आप पुण्यकर्मियों के लिए लक्ष्मी हैं, पापियों के लिए सदा ज्येष्ठा (दुर्भाग्य-रूपा) हैं; आप ही सब लोकों की शांति हैं, प्राणों का पोषण करने वाली धात्री हैं।
श्लोक 34 (shiva.rudra.66.34)
त्वं तत्त्वरूपा भूतानां पञ्चानामपि सारकृत् । त्वं हि नीतिभृतां नीतिर्व्यवसायस्वरूपिणी
tvaṁ tattvarūpā bhūtānāṁ pañcānāmapi sārakṛt tvaṁ hi nītibhṛtāṁ nītirvyavasāyasvarūpiṇī
आप पंचभूतों के तत्त्व-रूप हैं, उनका सार करने वाली हैं; आप ही नीतिमानों की नीति हैं, प्रयत्न की साक्षात् मूर्ति हैं।
श्लोक 35 (shiva.rudra.66.35)
गीतिस्त्वं सामवेदस्य ग्रन्थिस्त्वं यजुषां हुतिः । ऋग्वेदस्य तथा मात्राथर्वणस्य परा गतिः
gītistvaṁ sāmavedasya granthistvaṁ yajuṣāṁ hutiḥ ṛgvedasya tathā mātrātharvaṇasya parā gatiḥ
आप सामवेद का गान हैं, यजुर्वेद की संरचना और आहुति हैं; तथा ऋग्वेद की मात्रा और अथर्ववेद की परम गति भी आप ही हैं।
श्लोक 36 (shiva.rudra.66.36)
समस्तगीर्वाणगणस्य शक्ति- स्तमोमयी धातृगुणैकदृश्या । रजः प्रपञ्चात्तु भवैकरूपा या नः श्रुता भव्यकरी स्तुतेह
samastagīrvāṇagaṇasya śakti- stamomayī dhātṛguṇaikadṛśyā rajaḥ prapañcāttu bhavaikarūpā yā naḥ śrutā bhavyakarī stuteha
देवताओं के समस्त समूह की शक्ति, तमोमयी, ब्रह्मा के गुणों से ही दृश्य होने वाली; रजोगुण से जगत् का साक्षात् रूप धारण करने वाली — जिनकी हमने महिमा सुनी है, उन कल्याणकारिणी की हम यहाँ स्तुति करते हैं।
श्लोक 37 (shiva.rudra.66.37)
संसारसागरकरालभवाङ्गदुःख- निस्तारकारितरणिं च निवीतहीनाम् । अष्टाङ्गयोगपरिपालनकेलिदक्षां विन्ध्यागवासनिरतां प्रणमाम तां वै
saṁsārasāgarakarālabhavāṅgaduḥkha- nistārakāritaraṇiṁ ca nivītahīnām aṣṭāṅgayogaparipālanakelidakṣāṁ vindhyāgavāsaniratāṁ praṇamāma tāṁ vai
संसार-सागर के भयंकर दुःखों से पार उतारने वाली नौका के समान, यज्ञोपवीत रहित, अष्टांग योग के पालन में कुशल, विंध्यपर्वत पर निवास में रत — उन्हें हम प्रणाम करते हैं।
श्लोक 38 (shiva.rudra.66.38)
नासाक्षिवक्त्रभुजवक्षसि मानसे च धृत्या सुखानि वितनोति सदैव जन्तोः । निद्रेति याति सुभगा जगती भवानां सा नः प्रसीदतु भवस्थितिपालनाय
nāsākṣivaktrabhujavakṣasi mānase ca dhṛtyā sukhāni vitanoti sadaiva jantoḥ nidreti yāti subhagā jagatī bhavānāṁ sā naḥ prasīdatu bhavasthitipālanāya
जो सदा प्राणियों की नाक, आँख, मुख, भुजाओं, वक्षस्थल और मन में धैर्यपूर्वक सुख का विस्तार करती हैं, और सौभाग्यशालिनी होकर संसार में निद्रा रूप में विचरण करती हैं — वे हम पर प्रसन्न हों, ताकि संसार की स्थिति की रक्षा हो।
श्लोक 39 (shiva.rudra.66.39)
ब्रह्मोवाच । इति स्तुत्वा महेशानीं जगदम्बामुमां सतीम् । सुप्रेममनसः सर्वे तस्थुस्ते दर्शनेप्सवः
brahmovāca iti stutvā maheśānīṁ jagadambāmumāṁ satīm supremamanasaḥ sarve tasthuste darśanepsavaḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — इस प्रकार महेशानी, जगदम्बा, सती उमा की स्तुति करके, प्रेमपूर्ण हृदय वाले वे सब उनके दर्शन की कामना से वहीं ठहर गए।