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रुद्र संहिता · अध्याय 68

मेना का तप और वरदान

अध्याय 67अध्याय-सूचीअध्याय 69

श्लोक 1 (shiva.rudra.68.1)

नारद उवाच । अन्तर्हितायां देव्यां तु दुर्गायां स्वगृहेषु च । गतेष्वमरवृन्देषु किमभूत्तदनन्तरम्

nārada uvāca antarhitāyāṁ devyāṁ tu durgāyāṁ svagṛheṣu ca gateṣvamaravṛndeṣu kimabhūttadanantaram

नारद ने कहा — जब देवी दुर्गा अंतर्धान हो गईं और देवताओं के समूह अपने-अपने घर चले गए, तब उसके बाद क्या हुआ?

श्लोक 2 (shiva.rudra.68.2)

कथं मेनागिरीशौ च तेपाते परमं तपः । कथं सुताभवत्तस्य मेनायां तात तद्वद

kathaṁ menāgirīśau ca tepāte paramaṁ tapaḥ kathaṁ sutābhavattasya menāyāṁ tāta tadvada

हे तात! मेना और गिरीश ने किस प्रकार परम तप किया? और मेना से उनकी पुत्री किस प्रकार उत्पन्न हुई — यह मुझे बताइए।

श्लोक 3 (shiva.rudra.68.3)

ब्रह्मोवाच विप्रवर्य सुतश्रेष्ठ शृणु तच्चरितं महत् । प्रणम्य शङ्करं भक्त्या वच्मि भक्तिविवर्धनम्

brahmovāca vipravarya sutaśreṣṭha śṛṇu taccaritaṁ mahat praṇamya śaṅkaraṁ bhaktyā vacmi bhaktivivardhanam

ब्रह्मा जी ने कहा — हे विप्रश्रेष्ठ! हे पुत्रश्रेष्ठ! उस महान् चरित्र को सुनो; शंकर को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके मैं भक्ति बढ़ाने वाला यह चरित्र कहता हूँ।

श्लोक 4 (shiva.rudra.68.4)

उपदिश्य गते तात सुरवृन्दे गिरीश्वरः । हर्यादौ मेनका चापि तेपाते परमं तपः

upadiśya gate tāta suravṛnde girīśvaraḥ haryādau menakā cāpi tepāte paramaṁ tapaḥ

हे तात! उपदेश देकर देवसमूह के चले जाने पर हरि आदि के जाने के बाद गिरीश्वर और मेनका ने परम तप किया।

श्लोक 5 (shiva.rudra.68.5)

अहर्निशं शिवां शम्भुं चिन्तयन्तौ च दम्पती । सम्यगारेधतुर्नित्यं भक्तियुक्तेन चेतसा

aharniśaṁ śivāṁ śambhuṁ cintayantau ca dampatī samyagāredhaturnityaṁ bhaktiyuktena cetasā

वह दंपती रात-दिन शिवा और शंभु का चिंतन करते हुए भक्तियुक्त हृदय से सदा भलीभाँति उनकी आराधना करते रहे।

श्लोक 6 (shiva.rudra.68.6)

गिरिप्रियातीव मुदानर्च देवीं शिवेन सा । दानं ददौ द्विजेभ्यश्च सदा तत्तोषहेतवे

giripriyātīva mudānarca devīṁ śivena sā dānaṁ dadau dvijebhyaśca sadā tattoṣahetave

पर्वत की प्रिया मेना ने अत्यंत हर्षपूर्वक शिव सहित देवी की पूजा की; उनकी प्रसन्नता के लिए वे सदा ब्राह्मणों को दान देती रहीं।

श्लोक 7 (shiva.rudra.68.7)

चैत्रमासं समारभ्य सप्तविंशतिवत्सरान् । शिवां सम्पूजयामासापत्यार्थिन्यन्वहं रता

caitramāsaṁ samārabhya saptaviṁśativatsarān śivāṁ sampūjayāmāsāpatyārthinyanvahaṁ ratā

चैत्र मास से आरंभ करके सत्ताईस वर्षों तक, संतान की कामना से, उन्होंने नित्य निरंतर तत्पर होकर शिवा की पूजा की।

श्लोक 8 (shiva.rudra.68.8)

अष्टम्यामुपवासं तु कृत्वादान्नवमीतिथौ । मोदकैर्बलिपिष्टैश्च पायसैर्गन्धपुष्पकैः

aṣṭamyāmupavāsaṁ tu kṛtvādānnavamītithau modakairbalipiṣṭaiśca pāyasairgandhapuṣpakaiḥ

अष्टमी को उपवास करके नवमी तिथि को मोदक, बलि-पिष्ट, खीर और सुगंधित पुष्पों से अर्पण करती थीं।

श्लोक 9 (shiva.rudra.68.9)

गङ्गायामौषधिप्रस्थे कृत्वा मूर्तिं महीमयीम् । उमायाः पूजयामास नानावस्तुसमर्पणैः

gaṅgāyāmauṣadhiprasthe kṛtvā mūrtiṁ mahīmayīm umāyāḥ pūjayāmāsa nānāvastusamarpaṇaiḥ

गंगा तट पर औषधिप्रस्थ में मिट्टी की मूर्ति बनाकर वे उमा की पूजा नाना प्रकार की सामग्री अर्पित करके करती थीं।

श्लोक 10 (shiva.rudra.68.10)

कदाचित्सा निराहारा कदाचित्सा धृतव्रता । कदाचित्पवनाहारा कदाचिज्जलभुघ्यभूत्

kadācitsā nirāhārā kadācitsā dhṛtavratā kadācitpavanāhārā kadācijjalabhughyabhūt

कभी वे बिना भोजन के रहतीं, कभी कठोर व्रत धारण करतीं; कभी केवल वायु का आहार लेतीं, कभी केवल जल पर ही निर्वाह करतीं।

श्लोक 11 (shiva.rudra.68.11)

शिवाविन्यस्तचेतस्का सप्तविंशतिवत्सरान् । निनाय मेनका प्रीत्या परं सा मृष्टवर्चसा

śivāvinyastacetaskā saptaviṁśativatsarān nināya menakā prītyā paraṁ sā mṛṣṭavarcasā

मन को शिवा में लगाकर मेनका ने प्रेमपूर्वक सत्ताईस वर्ष इस प्रकार व्यतीत किए, उनका तेज उत्तरोत्तर निर्मल होता गया।

श्लोक 12 (shiva.rudra.68.12)

सप्तविंशतिवर्षान्ते जगन्माता जगन्मयी । सुप्रीताभवदत्यर्थमुमा शङ्करकामिनी

saptaviṁśativarṣānte jaganmātā jaganmayī suprītābhavadatyarthamumā śaṅkarakāminī

सत्ताईस वर्ष पूर्ण होने पर जगन्माता, जगन्मयी, शंकर की प्रिया उमा अत्यंत प्रसन्न हो गईं।

श्लोक 13 (shiva.rudra.68.13)

अनुग्रहाय मेनायाः पुरतः परमेश्वरी । आविर्बभूव सा देवी सन्तुष्टा तत्सुभक्तितः

anugrahāya menāyāḥ purataḥ parameśvarī āvirbabhūva sā devī santuṣṭā tatsubhaktitaḥ

मेना पर अनुग्रह करने के लिए वह परमेश्वरी देवी, उसकी गहरी भक्ति से संतुष्ट होकर, उसके सम्मुख प्रकट हुईं।

श्लोक 14 (shiva.rudra.68.14)

दिव्यावयवसंयुक्ता तेजोमण्डलमध्यगा । उवाच विहसन्ती सा मेनां प्रत्यक्षतां गता

divyāvayavasaṁyuktā tejomaṇḍalamadhyagā uvāca vihasantī sā menāṁ pratyakṣatāṁ gatā

दिव्य अंगों से युक्त, तेज-मंडल के मध्य स्थित, प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुई वह देवी मुस्कुराते हुए मेना से बोलीं।

श्लोक 15 (shiva.rudra.68.15)

देव्युवाच । वरं ब्रूहि महासाध्वि यत्ते मनसि वर्तते । सुप्रसन्ना च तपसा तवाहं गिरिकामिनि

devyuvāca varaṁ brūhi mahāsādhvi yatte manasi vartate suprasannā ca tapasā tavāhaṁ girikāmini

देवी ने कहा — हे महासाध्वी! जो तुम्हारे मन में है, वह वर माँगो; हे गिरिकामिनी! तुम्हारे तप से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।

श्लोक 16 (shiva.rudra.68.16)

यत्प्रार्थितं त्वया मेने तपोव्रतसमाधिना । दास्ये तेऽहं च तत्सर्वं वाञ्छितं यद्यदा भवेत्

yatprārthitaṁ tvayā mene tapovratasamādhinā dāsye te'haṁ ca tatsarvaṁ vāñchitaṁ yadyadā bhavet

हे मेने! तुमने तप, व्रत और समाधि से जो कुछ भी प्रार्थना की है, वह सब मैं तुम्हें दूँगी, जो कुछ भी तुम चाहती हो।

श्लोक 17 (shiva.rudra.68.17)

ततःसा मेनका देवीं प्रत्यक्षां कालिकां तदा । दृष्ट्वा च प्रणनामाथ वचनं चेदमब्रवीत्

tataḥsā menakā devīṁ pratyakṣāṁ kālikāṁ tadā dṛṣṭvā ca praṇanāmātha vacanaṁ cedamabravīt

तब मेनका ने प्रत्यक्ष देवी कालिका को देखकर प्रणाम किया, और फिर यह वचन कहा।

श्लोक 18 (shiva.rudra.68.18)

मेनोवाच देवि प्रत्यक्षतो रूपं दृष्टं तव मयाधुना । त्वामहं स्तोतुमिच्छामि प्रसन्ना भव कालिके

menovāca devi pratyakṣato rūpaṁ dṛṣṭaṁ tava mayādhunā tvāmahaṁ stotumicchāmi prasannā bhava kālike

मेना ने कहा — हे देवी! अब मैंने आपका रूप प्रत्यक्ष देखा है; मैं आपकी स्तुति करना चाहती हूँ — हे कालिके! प्रसन्न होइए।

श्लोक 19 (shiva.rudra.68.19)

ब्रह्मोवाच अथ सा मेनयेत्युक्ता कालिका सर्वमोहिनी । बाहुभ्यां सुप्रसन्नात्मा मेनकां परिषस्वजे

brahmovāca atha sā menayetyuktā kālikā sarvamohinī bāhubhyāṁ suprasannātmā menakāṁ pariṣasvaje

ब्रह्मा जी ने कहा — तब मेना के ऐसा कहने पर सर्वमोहिनी कालिका, अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर, अपनी दोनों भुजाओं से मेनका को आलिंगन कर लिया।

श्लोक 20 (shiva.rudra.68.20)

ततः प्राप्तमहाज्ञाना मेनका कालिकां शिवम् । तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्भक्त्या प्रत्यक्षतां गताम्

tataḥ prāptamahājñānā menakā kālikāṁ śivam tuṣṭāva vāgbhiriṣṭābhirbhaktyā pratyakṣatāṁ gatām

तब महान् ज्ञान प्राप्त कर चुकी मेनका ने प्रत्यक्ष प्रकट हुई कल्याणकारी कालिका की भक्तिपूर्वक अपने प्रिय शब्दों से स्तुति की।

श्लोक 21 (shiva.rudra.68.21)

मेनोवाच । महामायां जगद्धात्रीं चण्डिकां लोकधारिणीम् । प्रणमामि महादेवीं सर्वकामार्थदायिनीम्

menovāca mahāmāyāṁ jagaddhātrīṁ caṇḍikāṁ lokadhāriṇīm praṇamāmi mahādevīṁ sarvakāmārthadāyinīm

मेना ने कहा — जो महामाया, जगत् की धारण करने वाली, लोकों को धारण करने वाली चण्डिका हैं, उन सर्वकामप्रदायिनी महादेवी को मैं प्रणाम करती हूँ।

श्लोक 22 (shiva.rudra.68.22)

नित्यानन्दकरीं मायां योगनिद्रां जगत्प्रसूम् । प्रणमामि सदा सिद्धां शुभसारसमालिनीम्

nityānandakarīṁ māyāṁ yoganidrāṁ jagatprasūm praṇamāmi sadā siddhāṁ śubhasārasamālinīm

नित्य आनंद देने वाली माया, योगनिद्रा, जगत् की जननी को मैं प्रणाम करती हूँ — जो सदा सिद्ध हैं, शुभ सार से सुशोभित हैं।

श्लोक 23 (shiva.rudra.68.23)

मातामहीं सदानन्दां भक्तशोकविनाशिनीम् । आकल्पं वनितानां च प्राणिनां बुद्धिरूपिणीम्

mātāmahīṁ sadānandāṁ bhaktaśokavināśinīm ākalpaṁ vanitānāṁ ca prāṇināṁ buddhirūpiṇīm

जो सबकी मातामही हैं, सदा आनंदमयी हैं, भक्तों के शोक का नाश करने वाली हैं, स्त्रियों की शोभा हैं, समस्त प्राणियों में बुद्धि का साक्षात् रूप हैं।

श्लोक 24 (shiva.rudra.68.24)

सा त्वं बन्धच्छेदहेतुर्यतीनां कस्ते गेयो मादृशीभिः प्रभावः । हिंसां या वाथर्ववेदस्य सा त्वं नित्यं कामं त्वं ममेष्टं विधेहि

sā tvaṁ bandhacchedaheturyatīnāṁ kaste geyo mādṛśībhiḥ prabhāvaḥ hiṁsāṁ yā vātharvavedasya sā tvaṁ nityaṁ kāmaṁ tvaṁ mameṣṭaṁ vidhehi

आप ही योगियों के बंधन को काटने वाली हैं — मुझ जैसी के द्वारा आपके प्रभाव का क्या गान हो सकता है? आप ही अथर्ववेद की संहार-शक्ति हैं — सदा मेरी अभीष्ट कामना पूर्ण कीजिए।

श्लोक 25 (shiva.rudra.68.25)

नित्यानित्यैर्भावहीनैः परास्तै- स्तत्तन्मात्रैर्योज्यते भूतवर्गः । तेषां शक्तिस्त्वं सदा नित्यरूपा काले योषा योगयुक्ता समर्था

nityānityairbhāvahīnaiḥ parāstai- stattanmātrairyojyate bhūtavargaḥ teṣāṁ śaktistvaṁ sadā nityarūpā kāle yoṣā yogayuktā samarthā

नित्य और अनित्य, भावरहित, परे स्थित सूक्ष्म तत्त्वों से ही प्राणियों का समूह जुड़ता है; उन सबकी शक्ति सदा नित्यरूपा आप ही हैं — काल में योगयुक्त सामर्थ्यवती नारी-रूप।

श्लोक 26 (shiva.rudra.68.26)

योनिर्धरित्री जगतां त्वमेव त्वमेव नित्या प्रकृतिः परस्तात् । यया वशं क्रियते ब्रह्मरूपं सा त्वं नित्या मे प्रसीदाद्य मातः

yonirdharitrī jagatāṁ tvameva tvameva nityā prakṛtiḥ parastāt yayā vaśaṁ kriyate brahmarūpaṁ sā tvaṁ nityā me prasīdādya mātaḥ

आप ही सब जगत् की योनि और धरती हैं, आप ही परे स्थित नित्य प्रकृति हैं; जिनके वश में ब्रह्मरूप भी हो जाता है — वह नित्या आप ही हैं; हे माता! आज मुझ पर प्रसन्न होइए।

श्लोक 27 (shiva.rudra.68.27)

त्वं जातवेदोगतशक्तिरुग्रा त्वं दाहिका सूर्यकरस्य शक्तिः । आह्लादिका त्वं बहुचन्द्रिका या तां त्वामहं स्तौमि नमामि चण्डीम्

tvaṁ jātavedogataśaktirugrā tvaṁ dāhikā sūryakarasya śaktiḥ āhlādikā tvaṁ bahucandrikā yā tāṁ tvāmahaṁ staumi namāmi caṇḍīm

आप अग्नि में स्थित उग्र शक्ति हैं, आप सूर्य की किरणों की दाहक शक्ति हैं; आप ही अनेक चंद्रमा-सी आह्लादकारी ज्योत्स्ना हैं — हे चण्डी! उन आपकी मैं स्तुति करती हूँ, आपको नमस्कार करती हूँ।

श्लोक 28 (shiva.rudra.68.28)

योषाणां सत्प्रिया च त्वं नित्या त्वं चोर्ध्वरेतसाम् । वाञ्छा त्वं सर्वजगतां माया च त्वं यथा हरेः

yoṣāṇāṁ satpriyā ca tvaṁ nityā tvaṁ cordhvaretasām vāñchā tvaṁ sarvajagatāṁ māyā ca tvaṁ yathā hareḥ

आप स्त्रियों की सच्ची प्रिय सखी हैं, और ऊर्ध्वरेता योगियों की भी नित्य सहचरी हैं; आप ही समस्त लोकों की कामना हैं, और आप ही हरि की माया के समान हैं।

श्लोक 29 (shiva.rudra.68.29)

या चेष्टरूपाणि विधाय देवी सृष्टिस्थितिर्नाशमयी च कर्त्री । ब्रह्माच्युतस्थाणुशरीरहेतुः सा त्वं प्रसीदाद्य पुनर्नमस्ते

yā ceṣṭarūpāṇi vidhāya devī sṛṣṭisthitirnāśamayī ca kartrī brahmācyutasthāṇuśarīrahetuḥ sā tvaṁ prasīdādya punarnamaste

जो देवी इच्छित रूपों को रचकर सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाली हैं, जो ब्रह्मा, अच्युत और स्थाणु के शरीरों का भी कारण हैं — वह आप आज प्रसन्न होइए; मैं पुनः आपको नमस्कार करती हूँ।

श्लोक 30 (shiva.rudra.68.30)

ब्रह्मोवाच तत इत्थं स्तुता दुर्गा कालिका पुनरेव हि । उवाच मेनकां देवीं वाञ्छितं वरयेत्युत

brahmovāca tata itthaṁ stutā durgā kālikā punareva hi uvāca menakāṁ devīṁ vāñchitaṁ varayetyuta

ब्रह्मा जी ने कहा — इस प्रकार स्तुत होकर दुर्गा कालिका ने पुनः देवी मेनका से कहा — "अपना इच्छित वर माँगो।"

श्लोक 31 (shiva.rudra.68.31)

उमोवाच प्राणप्रिया मम त्वं हि हिमाचलविलासिनि । यदिच्छसि ध्रुवं दास्ये नादेयं विद्यते मम

umovāca prāṇapriyā mama tvaṁ hi himācalavilāsini yadicchasi dhruvaṁ dāsye nādeyaṁ vidyate mama

उमा ने कहा — हे हिमाचल की विलासिनी! तुम मुझे अपने प्राणों के समान प्रिय हो; जो तुम चाहती हो, वह मैं निश्चय ही दूँगी — मेरे पास कुछ भी अदेय नहीं है।

श्लोक 32 (shiva.rudra.68.32)

इति श्रुत्वा महेशान्याः पीयूषसदृशं वचः । उवाच परितुष्टा सा मेनका गिरिकामिनी

iti śrutvā maheśānyāḥ pīyūṣasadṛśaṁ vacaḥ uvāca parituṣṭā sā menakā girikāminī

महेशानी का यह अमृत के समान वचन सुनकर, अत्यंत संतुष्ट होकर गिरिकामिनी मेनका ने कहा।

श्लोक 33 (shiva.rudra.68.33)

मेनोवाच शिवे जय जय प्राज्ञे महेश्वरि भवाम्बिके । वरयोग्यास्म्यहं चेत्ते वृणे भूयो वरं वरम्

menovāca śive jaya jaya prājñe maheśvari bhavāmbike varayogyāsmyahaṁ cette vṛṇe bhūyo varaṁ varam

मेना ने कहा — हे शिवे! हे प्राज्ञे! हे महेश्वरि! हे भवाम्बिके! आपकी जय हो, जय हो। यदि मैं वर पाने योग्य हूँ तो मैं फिर से उत्तम वर माँगती हूँ।

श्लोक 34 (shiva.rudra.68.34)

प्रथमं शतपुत्रा मे भवन्तु जगदम्बिके । बह्वायुषो वीर्यवन्त ऋद्धिसिद्धिसमन्विताः

prathamaṁ śataputrā me bhavantu jagadambike bahvāyuṣo vīryavanta ṛddhisiddhisamanvitāḥ

हे जगदम्बिके! पहले मुझे सौ पुत्र हों — दीर्घायु, वीर्यवान, ऋद्धि-सिद्धि से संपन्न।

श्लोक 35 (shiva.rudra.68.35)

पश्चात्तथैका तनया स्वरूपगुणशालिनी । कुलद्वयानन्दकरी भुवनत्रयपूजिता

paścāttathaikā tanayā svarūpaguṇaśālinī kuladvayānandakarī bhuvanatrayapūjitā

उसके बाद एक कन्या हो, जो रूप-गुण से सुशोभित हो, दोनों कुलों को आनंद देने वाली हो, और तीनों लोकों में पूजित हो।

श्लोक 36 (shiva.rudra.68.36)

सुता भव मम शिवे देवकार्यार्थमेव हि । रुद्रपत्नी भव तथा लीलां कुरु भवाम्बिके

sutā bhava mama śive devakāryārthameva hi rudrapatnī bhava tathā līlāṁ kuru bhavāmbike

हे शिवे! देवकार्य की सिद्धि के लिए ही आप मेरी पुत्री बनिए; रुद्र की पत्नी बनिए और हे भवाम्बिके! अपनी लीला कीजिए।

श्लोक 37 (shiva.rudra.68.37)

ब्रह्मोवाच तच्छ्रुत्वा मेनकोक्तं हि प्राह देवी प्रसन्नधीः । स्मितपूर्वं वचस्तस्याः पूरयन्ती मनोरथम्

brahmovāca tacchrutvā menakoktaṁ hi prāha devī prasannadhīḥ smitapūrvaṁ vacastasyāḥ pūrayantī manoratham

ब्रह्मा जी ने कहा — मेना का यह वचन सुनकर प्रसन्नचित्त देवी ने मुस्कुराते हुए उसका मनोरथ पूर्ण करने वाला वचन कहा।

श्लोक 38 (shiva.rudra.68.38)

देव्युवाच । शतपुत्राः सम्भवन्तु भवत्या वीर्यसंयुताः । तत्रैको बलवान्मुख्यः प्रथमं सम्भविष्यति

devyuvāca śataputrāḥ sambhavantu bhavatyā vīryasaṁyutāḥ tatraiko balavānmukhyaḥ prathamaṁ sambhaviṣyati

देवी ने कहा — तुम्हें वीर्यवान् सौ पुत्र हों, उनमें भी सबसे पहले एक बलवान् और प्रमुख पुत्र उत्पन्न होगा।

श्लोक 39 (shiva.rudra.68.39)

सुताहं सम्भविष्यामि सन्तुष्टा तव भक्तितः । देवकार्यं करिष्यामि सेविता निखिलैः सुरैः

sutāhaṁ sambhaviṣyāmi santuṣṭā tava bhaktitaḥ devakāryaṁ kariṣyāmi sevitā nikhilaiḥ suraiḥ

और मैं स्वयं तुम्हारी भक्ति से संतुष्ट होकर तुम्हारी पुत्री बनूँगी; समस्त देवताओं द्वारा सेवित होकर मैं देवकार्य सिद्ध करूँगी।

श्लोक 40 (shiva.rudra.68.40)

ब्रह्मोवाच एवमुक्त्वा जगद्धात्री कालिका परमेश्वरी । पश्यन्त्या मेनकायास्तु तत्रैवान्तर्दधे शिवा

brahmovāca evamuktvā jagaddhātrī kālikā parameśvarī paśyantyā menakāyāstu tatraivāntardadhe śivā

ब्रह्मा जी ने कहा — यह कहकर जगत् की धात्री, परमेश्वरी कालिका, शिवा, मेनका के देखते-देखते ही वहीं अंतर्धान हो गईं।

श्लोक 41 (shiva.rudra.68.41)

मेनकापि वरं लब्ध्वा महेशान्या अभीप्सितम् । मुदं प्रापामितां तात तपःक्लेशोऽप्यनश्यत

menakāpi varaṁ labdhvā maheśānyā abhīpsitam mudaṁ prāpāmitāṁ tāta tapaḥkleśo'pyanaśyata

हे तात! महेशानी से इच्छित वर पाकर मेनका को असीम आनंद प्राप्त हुआ, और उसके तप का सारा क्लेश भी नष्ट हो गया।

श्लोक 42 (shiva.rudra.68.42)

दिशि तस्यां नमस्कृत्य सुप्रहृष्टमनाः सती । जयशब्दं प्रोच्चरन्ती स्वस्थानं प्रविवेश ह

diśi tasyāṁ namaskṛtya suprahṛṣṭamanāḥ satī jayaśabdaṁ proccarantī svasthānaṁ praviveśa ha

उस दिशा में प्रणाम करके अत्यंत हर्षित मन वाली वह साध्वी जय-जयकार करती हुई अपने स्थान में प्रविष्ट हुई।

श्लोक 43 (shiva.rudra.68.43)

अथ तस्मै स्वपतये शशंस सुवरं च तम् । स्वचिह्नबुद्धमिव वै सुवाचा पुनरुक्तया

atha tasmai svapataye śaśaṁsa suvaraṁ ca tam svacihnabuddhamiva vai suvācā punaruktayā

फिर उसने अपने पति को वह उत्तम वर, अपने ही शुभ चिह्न के समान मानो, मधुर वाणी में बार-बार दुहराकर सुनाया।

श्लोक 44 (shiva.rudra.68.44)

श्रुत्वा शैलपतिर्हृष्टोऽभवन्मेनावचो हि तत् । प्रशशंस प्रियां प्रीत्या शिवाभक्तिरतां च ताम्

śrutvā śailapatirhṛṣṭo'bhavanmenāvaco hi tat praśaśaṁsa priyāṁ prītyā śivābhaktiratāṁ ca tām

मेना का यह वचन सुनकर पर्वतराज अत्यंत हर्षित हो गए; उन्होंने प्रेमपूर्वक अपनी प्रिया की, जो शिवा-भक्ति में लीन थी, भूरि-भूरि प्रशंसा की।

श्लोक 45 (shiva.rudra.68.45)

कालक्रमेणाथ तयोः प्रवृत्ते सुरते मुने । गर्भो बभूव मेनाया ववृधे प्रत्यहं च सः

kālakrameṇātha tayoḥ pravṛtte surate mune garbho babhūva menāyā vavṛdhe pratyahaṁ ca saḥ

हे मुने! फिर कालक्रम से उन दोनों के दांपत्य-संबंध होने पर मेना को गर्भ हुआ, और वह गर्भ प्रतिदिन बढ़ता गया।

श्लोक 46 (shiva.rudra.68.46)

असूत सा नागवधूपभोग्यं सुतमुत्तमम् । समुद्रबद्धसत्सख्यं मैनाकाभिधमद्भुतम्

asūta sā nāgavadhūpabhogyaṁ sutamuttamam samudrabaddhasatsakhyaṁ mainākābhidhamadbhutam

उन्होंने एक उत्तम पुत्र को जन्म दिया, जो नागकन्या का पति बना, समुद्र का सच्चा सखा, अद्भुत, मैनाक नाम से प्रसिद्ध।

श्लोक 47 (shiva.rudra.68.47)

वृत्रशत्रावपि क्रुद्धे वेदनाज्ञं सपक्षकम् । पविक्षतानां देवर्षे पक्षच्छिदि वराङ्गकम्

vṛtraśatrāvapi kruddhe vedanājñaṁ sapakṣakam pavikṣatānāṁ devarṣe pakṣacchidi varāṅgakam

हे देवर्षे! वह पुत्र, वृत्र के शत्रु इंद्र के क्रुद्ध होने पर भी, पीड़ा जानने वाला और पंखों से युक्त था — उस समय जब पर्वतों के पंख वज्र से काटे जा रहे थे, वह उत्तम अंगों वाला बच निकला।

श्लोक 48 (shiva.rudra.68.48)

प्रवरं शतपुत्राणां महाबलपराक्रमम् । स्वोद्भवानां महीध्राणां पर्वतेन्द्रैकधिष्ठितम्

pravaraṁ śataputrāṇāṁ mahābalaparākramam svodbhavānāṁ mahīdhrāṇāṁ parvatendraikadhiṣṭhitam

वह सौ पुत्रों में श्रेष्ठ, महान् बल-पराक्रम से युक्त, अपने से उत्पन्न पर्वतों का एकमात्र स्वामी बना।

श्लोक 49 (shiva.rudra.68.49)

आसीन्महोत्सवस्तत्र हिमाचलपुरेऽद्भुतः । दम्पत्योः प्रमुदाधिक्यं बभूव क्लेशसङ्क्षयः

āsīnmahotsavastatra himācalapure'dbhutaḥ dampatyoḥ pramudādhikyaṁ babhūva kleśasaṅkṣayaḥ

हिमाचल की उस नगरी में एक अद्भुत महोत्सव हुआ; दंपती का आनंद अत्यधिक बढ़ गया, और उनका सारा क्लेश सर्वथा नष्ट हो गया।

श्लोक 50 (shiva.rudra.68.50)

दानं ददौ द्विजातिभ्योऽन्येभ्यश्च प्रददौ धनम् । शिवाशिवपदद्वन्द्वे स्नेहोऽभूदधिकस्तयोः

dānaṁ dadau dvijātibhyo'nyebhyaśca pradadau dhanam śivāśivapadadvandve sneho'bhūdadhikastayoḥ

उन्होंने ब्राह्मणों को दान दिया और अन्यों को भी धन प्रदान किया; शिव-शिवा के युगल चरणों में उन दोनों का स्नेह और भी बढ़ गया।

अध्याय 67अध्याय-सूचीअध्याय 69