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रुद्र संहिता · अध्याय 69

पार्वती का जन्म

अध्याय 68अध्याय-सूचीअध्याय 70

श्लोक 1 (shiva.rudra.69.1)

ब्रह्मोवाच अथ सस्मरतुर्भक्त्या दम्पती तौ भवाम्बिकाम् । प्रसूतिहेतवे तत्र देवकार्यार्थमादरात्

brahmovāca atha sasmaraturbhaktyā dampatī tau bhavāmbikām prasūtihetave tatra devakāryārthamādarāt

ब्रह्मा जी ने कहा — फिर वह दंपती संतान-प्राप्ति के लिए, देवकार्य की सिद्धि हेतु, आदरपूर्वक भक्तिसहित भवानी का स्मरण करने लगे।

श्लोक 2 (shiva.rudra.69.2)

ततः सा चण्डिका योगात्त्यक्तदेहा पुरा पितुः । ईहया भवितुं भूयः समैच्छद् गिरिदारतः

tataḥ sā caṇḍikā yogāttyaktadehā purā pituḥ īhayā bhavituṁ bhūyaḥ samaicchad giridārataḥ

तब वह चण्डिका, जिसने पूर्वकाल में योग से पिता के यज्ञ में देह त्याग दी थी, संकल्प करके पर्वत की पत्नी के द्वारा पुनः प्रकट होने की इच्छा करने लगीं।

श्लोक 3 (shiva.rudra.69.3)

सत्यं विधातुं स्ववचः प्रसन्नाखिलकामदा । पूर्णांशाच्छैलचित्ते सा विवेशाथ महेश्वरी

satyaṁ vidhātuṁ svavacaḥ prasannākhilakāmadā pūrṇāṁśācchailacitte sā viveśātha maheśvarī

अपने वचन को सत्य करने के लिए, सबकी कामनाएँ पूर्ण करने वाली वह प्रसन्न महेश्वरी अपने पूर्ण अंश से पर्वतपत्नी के हृदय में प्रविष्ट हुईं।

श्लोक 4 (shiva.rudra.69.4)

विरराज ततः सोऽति प्रमदोऽपूर्वसुद्युतिः । हुताशन इवाधृष्यस्तेजोराशिर्महामनाः

virarāja tataḥ so'ti pramado'pūrvasudyutiḥ hutāśana ivādhṛṣyastejorāśirmahāmanāḥ

तब वह अपूर्व द्युतिमय, अत्यंत आनंदमय तेज-पुंज अग्नि के समान अजेय होकर, महामनस्वी रूप में प्रकाशित हुआ।

श्लोक 5 (shiva.rudra.69.5)

ततो गिरिः स्वप्रियायां परिपूर्णं शिवांशकम् । समाधिमत्वात्समये समधत्त सुशङ्करे

tato giriḥ svapriyāyāṁ paripūrṇaṁ śivāṁśakam samādhimatvātsamaye samadhatta suśaṅkare

तब पर्वत ने अपनी प्रिया में, समाधि द्वारा उपयुक्त समय पर, कल्याणकारी शंकर के निमित्त, परिपूर्ण शिवांश को स्थापित किया।

श्लोक 6 (shiva.rudra.69.6)

समधत्त गिरेः पत्नी गर्भं देव्याः प्रसादतः । चित्ते स्थितायाः करुणाकरायाः सुखदं गिरेः

samadhatta gireḥ patnī garbhaṁ devyāḥ prasādataḥ citte sthitāyāḥ karuṇākarāyāḥ sukhadaṁ gireḥ

पर्वत की पत्नी ने अपने हृदय में स्थित करुणा की खान उस देवी की कृपा से गर्भ धारण किया, जो पर्वत के लिए सुखदायी था।

श्लोक 7 (shiva.rudra.69.7)

गिरिप्रिया सर्वजगन्निवासासंश्रयाधिकम् । विरेजे सुतरां मेना तेजोमण्डलगा सदा

giripriyā sarvajagannivāsāsaṁśrayādhikam vireje sutarāṁ menā tejomaṇḍalagā sadā

पर्वत की प्रिया मेना, सदा तेज-मंडल से घिरी हुई, समस्त जगत् के निवास और आश्रय से भी बढ़कर अत्यंत सुशोभित होने लगीं।

श्लोक 8 (shiva.rudra.69.8)

सुखोदयं स्वभर्तुश्च मेना दौर्हृदलक्षणम् । दधौ निदानं देवानामानन्दस्येप्सितं शुभम्

sukhodayaṁ svabhartuśca menā daurhṛdalakṣaṇam dadhau nidānaṁ devānāmānandasyepsitaṁ śubham

मेना ने अपने पति के सुख का उदय करने वाले, देवताओं के अभीष्ट और शुभ आनंद के मूल, गर्भ-लक्षणों को धारण किया।

श्लोक 9 (shiva.rudra.69.9)

देहसादादसम्पूर्णभूषणा लोध्रसम्मुखा । स्वल्पभेन्दुक्षयेकासौ विचेष्यर्क्षा विभावरी

dehasādādasampūrṇabhūṣaṇā lodhrasammukhā svalpabhendukṣayekāsau viceṣyarkṣā vibhāvarī

शरीर के क्षीण होने से उसके आभूषण अधूरे रह गए, मुख लोध्र-पुष्प के समान पीला पड़ गया; उसकी आभा उस चाँदनी रात के समान क्षीण हो गई जब चाँद घटता है।

श्लोक 10 (shiva.rudra.69.10)

तदाननं मृत्सुरभि नायं तृप्तिं गिरीश्वरः । मुने रहस्युपाघ्राय प्रेमाधिक्यं बभूव तत्

tadānanaṁ mṛtsurabhi nāyaṁ tṛptiṁ girīśvaraḥ mune rahasyupāghrāya premādhikyaṁ babhūva tat

उसका मुख मिट्टी के समान सुगंधित था, जिससे गिरीश्वर की तृप्ति ही न होती थी; हे मुने! गुप्त रूप से उसे सूँघते हुए उनका प्रेम और भी बढ़ जाता था।

श्लोक 11 (shiva.rudra.69.11)

मेना स्पृहावती केषु न मे शंसति वस्तुषु । किञ्चिदिष्टं ह्रियापृच्छदनुवेलं सखीर्गिरिः

menā spṛhāvatī keṣu na me śaṁsati vastuṣu kiñcidiṣṭaṁ hriyāpṛcchadanuvelaṁ sakhīrgiriḥ

"मेना किन वस्तुओं की अभिलाषा रखती है, जो मुझसे नहीं कहती?" — यह सोचकर संकोचवश पर्वत बार-बार उसकी सखियों से पूछते रहते कि उसे कोई इष्ट वस्तु तो नहीं चाहिए।

श्लोक 12 (shiva.rudra.69.12)

उपेत्य दौर्हृदं शैल्यं यद्वव्रेऽपश्यदाशु तत् । आनीतं नेष्टमस्याद्धा नासाध्यं त्रिदिवेऽपि हि

upetya daurhṛdaṁ śailyaṁ yadvavre'paśyadāśu tat ānītaṁ neṣṭamasyāddhā nāsādhyaṁ tridive'pi hi

पर्वतपत्नी की जो भी दोहद-इच्छा होती, वे उसे जानकर शीघ्र ही लाकर देते; उसके लिए कुछ भी अप्रिय नहीं था, और स्वर्ग में भी कुछ असाध्य नहीं था।

श्लोक 13 (shiva.rudra.69.13)

प्रचीयमानावयवा निस्तीर्य दौर्हृदव्यथाम् । रेजे मेना बाललता नद्धपत्राधिका यथा

pracīyamānāvayavā nistīrya daurhṛdavyathām reje menā bālalatā naddhapatrādhikā yathā

उसके अंग धीरे-धीरे पूर्ण होते गए, दोहद की व्यथा पार करके मेना उस बाल-लता के समान सुशोभित हुई जो सघन पत्तों से लद जाती है।

श्लोक 14 (shiva.rudra.69.14)

गिरिः सगर्भां महिषीममंस्त धरणीमिव । निधानगर्भामभ्यन्तर्लीनवह्निशमीमिव

giriḥ sagarbhāṁ mahiṣīmamaṁsta dharaṇīmiva nidhānagarbhāmabhyantarlīnavahniśamīmiva

पर्वत अपनी गर्भवती रानी को धरती के समान मानने लगे, मानो उसके भीतर कोई निधि छिपी हो — शमी वृक्ष के समान, जिसके भीतर अग्नि छिपी रहती है।

श्लोक 15 (shiva.rudra.69.15)

प्रियाप्रीतेश्च मनसः स्वार्जितद्रविणस्य च । समुन्नतेः श्रुतेः प्राज्ञः क्रियाश्चक्रे यथोचिताः

priyāprīteśca manasaḥ svārjitadraviṇasya ca samunnateḥ śruteḥ prājñaḥ kriyāścakre yathocitāḥ

प्रिया की प्रसन्नता, अपने मन की तृप्ति, अर्जित धन और वैदिक कर्मों की उन्नति के लिए उस बुद्धिमान् ने यथोचित सभी कर्म किए।

श्लोक 16 (shiva.rudra.69.16)

ददर्श काले मेनां स प्रतीतः प्रसवोन्मुखीम् । अभ्रितां च दिवं गर्भगृहे भिषगधिष्ठिते

dadarśa kāle menāṁ sa pratītaḥ prasavonmukhīm abhritāṁ ca divaṁ garbhagṛhe bhiṣagadhiṣṭhite

समय आने पर उन्होंने प्रसवोन्मुख मेना को देखा, और प्रसन्न होकर, प्रसूति-गृह को निर्मल आकाश-सा शुभ बनाकर वैद्यों से युक्त कराया।

श्लोक 17 (shiva.rudra.69.17)

दृष्ट्वा प्रियां शुभाङ्गीं वै मुमोदाति गिरीश्वरः । गर्भस्थजगदम्बां हि महातेजोवतीं तदा

dṛṣṭvā priyāṁ śubhāṅgīṁ vai mumodāti girīśvaraḥ garbhasthajagadambāṁ hi mahātejovatīṁ tadā

शुभ अंगों वाली अपनी प्रिया को देखकर गिरीश्वर अत्यंत हर्षित हुए, क्योंकि उनके गर्भ में महातेजस्विनी साक्षात् जगदम्बा विराजमान थीं।

श्लोक 18 (shiva.rudra.69.18)

तस्मिन्नवसरे देवा मुने विष्ण्वादयस्तथा । मुनयश्च समागम्य गर्भस्थां तुष्टुवुः शिवाम्

tasminnavasare devā mune viṣṇvādayastathā munayaśca samāgamya garbhasthāṁ tuṣṭuvuḥ śivām

उस अवसर पर, हे मुने! विष्णु आदि देवता तथा मुनिगण भी वहाँ एकत्र होकर गर्भस्थ शिवा की स्तुति करने लगे।

श्लोक 19 (shiva.rudra.69.19)

देवा ऊचुः दुर्गे जय जय प्राज्ञे जगदम्ब महेश्वरि । सत्यव्रते सत्यपरे त्रिसत्ये सत्यरूपिणी

devā ūcuḥ durge jaya jaya prājñe jagadamba maheśvari satyavrate satyapare trisatye satyarūpiṇī

देवताओं ने कहा — हे दुर्गे! हे प्राज्ञे! आपकी जय हो, जय हो, हे जगदम्बा! हे महेश्वरि! हे सत्यव्रता! हे सत्यपरायणा! हे त्रिसत्ये! हे सत्यरूपिणी!

श्लोक 20 (shiva.rudra.69.20)

सत्यस्थे सत्यसुप्रीते सत्ययोने च सत्यतः । सत्यवक्त्रे सत्यनेत्रे प्रपन्नाः शरणं च ते

satyasthe satyasuprīte satyayone ca satyataḥ satyavaktre satyanetre prapannāḥ śaraṇaṁ ca te

हे सत्य में स्थित, सत्य से ही प्रसन्न होने वाली, सत्य ही जिनका उद्गम है, हे सत्यमुखी! हे सत्यनेत्रे! हम आपकी शरण में आए हैं।

श्लोक 21 (shiva.rudra.69.21)

शिवप्रिये महेशानि देवदुःखक्षयङ्करि । त्रैलोक्यमाता शर्वाणी व्यापिनी भक्तवत्सला

śivapriye maheśāni devaduḥkhakṣayaṅkari trailokyamātā śarvāṇī vyāpinī bhaktavatsalā

हे शिवप्रिये! हे महेशानि! हे देवताओं के दुःख का नाश करने वाली! हे त्रैलोक्य की माता शर्वाणी! हे सर्वव्यापिनी! हे भक्तवत्सले!

श्लोक 22 (shiva.rudra.69.22)

आविर्भूय त्रिलोकेशि देवकार्यं कुरुष्व ह । सनाथाः कृपया ते हि वयं सर्वे महेश्वरि

āvirbhūya trilokeśi devakāryaṁ kuruṣva ha sanāthāḥ kṛpayā te hi vayaṁ sarve maheśvari

हे त्रिलोकेशि! प्रकट होकर देवकार्य को सिद्ध कीजिए; हे महेश्वरि! आपकी ही कृपा से हम सब सनाथ हैं।

श्लोक 23 (shiva.rudra.69.23)

त्वत्तः सर्वे च सुखिनो लभन्ते सुखमुत्तमम् । त्वां विना न हि किञ्चिद्वै शोभते त्रिभवेष्वपि

tvattaḥ sarve ca sukhino labhante sukhamuttamam tvāṁ vinā na hi kiñcidvai śobhate tribhaveṣvapi

आपसे ही सभी सुखी होकर परम सुख प्राप्त करते हैं; आपके बिना तीनों लोकों में कुछ भी सुशोभित नहीं होता।

श्लोक 24 (shiva.rudra.69.24)

ब्रह्मोवाच इत्थं कृत्वा महेशान्या गर्भस्थाया बहुस्तुतिम् । प्रसन्नमनसो देवाः स्वं स्वं धाम ययुस्तदा

brahmovāca itthaṁ kṛtvā maheśānyā garbhasthāyā bahustutim prasannamanaso devāḥ svaṁ svaṁ dhāma yayustadā

ब्रह्मा जी ने कहा — इस प्रकार गर्भस्थ महेशानी की भूरि स्तुति करके प्रसन्नचित्त देवता तब अपने-अपने धाम को गए।

श्लोक 25 (shiva.rudra.69.25)

व्यतीते नवमे मासे दशमे मासि पूर्णतः । गर्भस्था सा गतिं दध्रे कालिका जगदम्बिका

vyatīte navame māse daśame māsi pūrṇataḥ garbhasthā sā gatiṁ dadhre kālikā jagadambikā

नौवाँ महीना बीत जाने और दसवें महीने के पूर्ण होने पर गर्भस्थ जगदम्बिका कालिका ने जन्म लेने की गति धारण की।

श्लोक 26 (shiva.rudra.69.26)

तदा सुसमयश्चासीच्छान्तभग्रहतारकः । नभः प्रसन्नतां यातं प्रकाशः सर्वदिक्षु हि

tadā susamayaścāsīcchāntabhagrahatārakaḥ nabhaḥ prasannatāṁ yātaṁ prakāśaḥ sarvadikṣu hi

तब अत्यंत शुभ मुहूर्त हुआ, ग्रह-नक्षत्र शांत हो गए, आकाश निर्मल हो गया और सभी दिशाओं में प्रकाश फैल गया।

श्लोक 27 (shiva.rudra.69.27)

मही मङ्गलभूयिष्ठा सवनग्रामसागरा । सरःस्रवन्तीवापीषु पुफुल्लुः पङ्कजानि वै

mahī maṅgalabhūyiṣṭhā savanagrāmasāgarā saraḥsravantīvāpīṣu puphulluḥ paṅkajāni vai

वन, ग्राम और सागर सहित पृथ्वी मंगलमय हो उठी; सरोवरों, नदियों और बावड़ियों में कमल खिल उठे।

श्लोक 28 (shiva.rudra.69.28)

ववुश्च विविधा वाताः सुखस्पर्शा मुनीश्वर । मुमुदुः साधवः सर्वेऽसतां दुःखमभूद् द्रुतम्

vavuśca vividhā vātāḥ sukhasparśā munīśvara mumuduḥ sādhavaḥ sarve'satāṁ duḥkhamabhūd drutam

हे मुनीश्वर! नाना प्रकार की सुखद वायु बहने लगी, सभी सज्जन आनंदित हुए, और दुष्टों को शीघ्र ही दुःख होने लगा।

श्लोक 29 (shiva.rudra.69.29)

दुन्दुभीन्वादयामासुर्नभस्यागत्य निर्जराः । पुष्पवृष्टिरभूत्तत्र जगुर्गन्धर्वसत्तमाः

dundubhīnvādayāmāsurnabhasyāgatya nirjarāḥ puṣpavṛṣṭirabhūttatra jagurgandharvasattamāḥ

देवगण आकाश में आकर नगाड़े बजाने लगे; वहाँ पुष्पों की वर्षा हुई, और श्रेष्ठ गंधर्व गाने लगे।

श्लोक 30 (shiva.rudra.69.30)

विद्याधरस्त्रियो व्योम्नि ननृतुश्चाप्सरास्तथा । तदोत्सवो महानासीद्देवादीनां नभःस्थले

vidyādharastriyo vyomni nanṛtuścāpsarāstathā tadotsavo mahānāsīddevādīnāṁ nabhaḥsthale

विद्याधर-स्त्रियाँ आकाश में नाचने लगीं और अप्सराएँ भी; तब आकाश-मण्डल में देवताओं आदि का महान् उत्सव हुआ।

श्लोक 31 (shiva.rudra.69.31)

तस्मिन्नवसरे देवी पूर्वशक्तिः शिवा सती । आविर्बभूव पुरतो मेनाया निजरूपतः

tasminnavasare devī pūrvaśaktiḥ śivā satī āvirbabhūva purato menāyā nijarūpataḥ

उसी अवसर पर वह देवी, आदिशक्ति, कल्याणस्वरूपिणी सती, मेना के सामने अपने ही सच्चे रूप में प्रकट हो गईं।

श्लोक 32 (shiva.rudra.69.32)

वसन्तर्तौ मधौ मासे नवम्यां मृगधिष्ण्यके । अर्धरात्रे समुत्पन्ना गङ्गेव शशिमण्डलात्

vasantartau madhau māse navamyāṁ mṛgadhiṣṇyake ardharātre samutpannā gaṅgeva śaśimaṇḍalāt

वसंत ऋतु में, चैत्र मास में, नवमी तिथि को, मृगशिरा नक्षत्र में, आधी रात के समय, वे ऐसे उत्पन्न हुईं जैसे चंद्र-मंडल से गंगा उत्पन्न होती हैं।

श्लोक 33 (shiva.rudra.69.33)

समये तत्स्वरूपेण मेनकाजठराच्छिवा । समुद्धूय समुत्पन्ना सा लक्ष्मीरिव सागरात्

samaye tatsvarūpeṇa menakājaṭharācchivā samuddhūya samutpannā sā lakṣmīriva sāgarāt

उचित समय पर, उसी स्वरूप में, वह कल्याणकारी मेनका के गर्भ से उठकर उत्पन्न हुईं, जैसे सागर से लक्ष्मी उत्पन्न होती हैं।

श्लोक 34 (shiva.rudra.69.34)

ततस्तस्यां तु जातायां प्रसन्नोऽभूत्तदा भवः । अनुकूलो ववौ वायुर्गम्भीरो गन्धयुक् शुभः

tatastasyāṁ tu jātāyāṁ prasanno'bhūttadā bhavaḥ anukūlo vavau vāyurgambhīro gandhayuk śubhaḥ

फिर उनके जन्म लेते ही भव प्रसन्न हो गए; अनुकूल, गंभीर, सुगंधित और शुभ वायु बहने लगी।

श्लोक 35 (shiva.rudra.69.35)

बभूव पुष्पवृष्टिश्च तोयवृष्टिपुरस्सरम् । जज्वलुश्चाग्नयः शान्ता जगर्जुश्च तदा घनाः

babhūva puṣpavṛṣṭiśca toyavṛṣṭipurassaram jajvaluścāgnayaḥ śāntā jagarjuśca tadā ghanāḥ

पुष्पों की वर्षा हुई और उसके पहले जल की वर्षा हुई; शांत अग्नि भी प्रज्वलित हो उठी और मेघ उस समय गरजने लगे।

श्लोक 36 (shiva.rudra.69.36)

तस्यां तु जायमानायां सर्वस्वं समपद्यत । हिमवन्नगरे तत्र सर्वं दुःखं क्षयं गतम्

tasyāṁ tu jāyamānāyāṁ sarvasvaṁ samapadyata himavannagare tatra sarvaṁ duḥkhaṁ kṣayaṁ gatam

उनके जन्म के साथ ही सब कुछ सफल हो गया; उस हिमवान् की नगरी में सारा दुःख नष्ट हो गया।

श्लोक 37 (shiva.rudra.69.37)

तस्मिन्नवसरे तत्र विष्ण्वाद्याः सकलाः सुराः । आजग्मुः सुखिनः प्रीत्या ददृशुर्जगदम्बिकाम्

tasminnavasare tatra viṣṇvādyāḥ sakalāḥ surāḥ ājagmuḥ sukhinaḥ prītyā dadṛśurjagadambikām

उस अवसर पर विष्णु आदि सभी देवता वहाँ आए और आनंदपूर्वक प्रेमसहित जगदम्बिका के दर्शन किए।

श्लोक 38 (shiva.rudra.69.38)

तुष्टुवुस्तां शिवामम्बां कालिकां शिवकामिनीम् । दिव्यरूपां महामायां शिवलोकनिवासिनीम्

tuṣṭuvustāṁ śivāmambāṁ kālikāṁ śivakāminīm divyarūpāṁ mahāmāyāṁ śivalokanivāsinīm

उन्होंने उस कल्याणकारी माता कालिका, शिव की प्रिया, दिव्यरूपिणी महामाया, शिवलोकवासिनी की स्तुति की।

श्लोक 39 (shiva.rudra.69.39)

। देवा ऊचुः जगदम्ब महादेवि सर्वसिद्धिविधायिनि । देवकार्यकरी त्वं हि सदातस्त्वां नमामहे

devā ūcuḥ jagadamba mahādevi sarvasiddhividhāyini devakāryakarī tvaṁ hi sadātastvāṁ namāmahe

देवताओं ने कहा — हे जगदम्बा! हे महादेवि! सर्वसिद्धि प्रदान करने वाली! आप ही देवकार्य को सिद्ध करने वाली हैं, इसीलिए हम सदा आपको नमस्कार करते हैं।

श्लोक 40 (shiva.rudra.69.40)

सर्वथा कुरु कल्याणं देवानां भक्तवत्सले । मेनामनोरथः पूर्णः कृतः कुरु हरस्य च

sarvathā kuru kalyāṇaṁ devānāṁ bhaktavatsale menāmanorathaḥ pūrṇaḥ kṛtaḥ kuru harasya ca

हे भक्तवत्सले! सर्वथा देवताओं का कल्याण कीजिए; मेना का मनोरथ आपने पूर्ण किया, अब हर का भी मनोरथ पूर्ण कीजिए।

श्लोक 41 (shiva.rudra.69.41)

ब्रह्मोवाच इत्थं स्तुत्वा शिवां देवा विष्ण्वाद्याः सुप्रणम्य ताम् । स्वं स्वं धाम ययुः प्रीताः शंसन्तस्तद्गतिं पराम्

brahmovāca itthaṁ stutvā śivāṁ devā viṣṇvādyāḥ supraṇamya tām svaṁ svaṁ dhāma yayuḥ prītāḥ śaṁsantastadgatiṁ parām

ब्रह्मा जी ने कहा — इस प्रकार शिवा की स्तुति करके, उन्हें भलीभाँति प्रणाम करके, विष्णु आदि देवता उनकी परम गति की सराहना करते हुए प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने धाम को गए।

श्लोक 42 (shiva.rudra.69.42)

तां तु दृष्ट्वा तथा जातां नीलोत्पलदलप्रभाम । श्यामां सा मेनका देवीं मुदमायाति नारद

tāṁ tu dṛṣṭvā tathā jātāṁ nīlotpaladalaprabhāma śyāmāṁ sā menakā devīṁ mudamāyāti nārada

हे नारद! नीलकमल की पंखुड़ी के समान श्याम कांति वाली उस उत्पन्न देवी को देखकर मेनका को अत्यंत आनंद हुआ।

श्लोक 43 (shiva.rudra.69.43)

दिव्यरूपं विलोक्यानु ज्ञानमाप गिरिप्रिया । विज्ञाय परमेशानीं तुष्टावातिप्रहर्षिता

divyarūpaṁ vilokyānu jñānamāpa giripriyā vijñāya parameśānīṁ tuṣṭāvātipraharṣitā

उस दिव्य रूप को देखकर पर्वत-प्रिया को ज्ञान प्राप्त हुआ; उन्हें परमेश्वरी जानकर वह अत्यंत हर्षित होकर उनकी स्तुति करने लगीं।

श्लोक 44 (shiva.rudra.69.44)

मेनोवाच जगदम्ब महेशानि कृतातिकरुणा त्वया । आविर्भूता मम पुरो विलसन्ती यदम्बिके

menovāca jagadamba maheśāni kṛtātikaruṇā tvayā āvirbhūtā mama puro vilasantī yadambike

मेना ने कहा — हे जगदम्बा! हे महेशानी! आपने मुझ पर अत्यंत करुणा की है, कि हे अम्बिके! आप मेरे सामने साक्षात् विलसित होकर प्रकट हुई हैं।

श्लोक 45 (shiva.rudra.69.45)

त्वमाद्या सर्वशक्तीनां त्रिलोकजननी शिवे । शिवप्रिया सदा देवि सर्वदेवस्तुता परा

tvamādyā sarvaśaktīnāṁ trilokajananī śive śivapriyā sadā devi sarvadevastutā parā

हे शिवे! आप सभी शक्तियों की आदि हैं, तीनों लोकों की जननी हैं; हे देवी! आप सदा शिव की प्रिया, परम, समस्त देवताओं द्वारा स्तुत हैं।

श्लोक 46 (shiva.rudra.69.46)

कृपां कुरु महेशानि मम ध्यानस्थिता भव । एतद्रूपेण प्रत्यक्षं रूपं धेहि सुतासमम्

kṛpāṁ kuru maheśāni mama dhyānasthitā bhava etadrūpeṇa pratyakṣaṁ rūpaṁ dhehi sutāsamam

हे महेशानी! मुझ पर कृपा कीजिए, मेरे ध्यान में स्थित रहिए; इसी रूप में अपनी पुत्री के समान प्रत्यक्ष रूप धारण कीजिए।

श्लोक 47 (shiva.rudra.69.47)

ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य वचस्तस्या मेनाया भूधरस्त्रियाः । प्रत्युवाच शिवा देवी सुप्रसन्ना गिरिप्रियाम्

brahmovāca ityākarṇya vacastasyā menāyā bhūdharastriyāḥ pratyuvāca śivā devī suprasannā giripriyām

ब्रह्मा जी ने कहा — पर्वतपत्नी मेना का यह वचन सुनकर अत्यंत प्रसन्न होकर देवी शिवा ने उस गिरिप्रिया को उत्तर दिया।

श्लोक 48 (shiva.rudra.69.48)

देव्युवाच हे मेने त्वं पुरा मां च सुसेवितवती रता । त्वद्भक्त्या सुप्रसन्नाहं वरं दातुं गतान्तिकम्

devyuvāca he mene tvaṁ purā māṁ ca susevitavatī ratā tvadbhaktyā suprasannāhaṁ varaṁ dātuṁ gatāntikam

देवी ने कहा — हे मेने! पूर्वकाल में तुमने मेरी प्रेमपूर्वक भलीभाँति सेवा की थी; तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वर देने के लिए तुम्हारे समीप आई थी।

श्लोक 49 (shiva.rudra.69.49)

वरं ब्रूहीति मद्वाणीं श्रुत्वा ते तद्वरो वृतः । सुता भव महादेवि सा मे देवहितं कुरु

varaṁ brūhīti madvāṇīṁ śrutvā te tadvaro vṛtaḥ sutā bhava mahādevi sā me devahitaṁ kuru

"वर माँगो" — मेरी यह वाणी सुनकर तुमने वही वर चुना, "मेरी पुत्री बनो, हे महादेवी, और मेरे लिए देवताओं का हित सिद्ध करो।"

श्लोक 50 (shiva.rudra.69.50)

तथा दत्त्वा वरं तेऽहं गता स्वं पदमादरात् । समयं प्राप्य तनयाभवं ते गिरिकामिनि

tathā dattvā varaṁ te'haṁ gatā svaṁ padamādarāt samayaṁ prāpya tanayābhavaṁ te girikāmini

इस प्रकार तुम्हें वर देकर मैं आदरपूर्वक अपने पद को लौट गई थी; अब समय आने पर, हे गिरिकामिनी! मैं तुम्हारी पुत्री बन गई हूँ।

श्लोक 51 (shiva.rudra.69.51)

दिव्यरूपं धृतं मेऽद्य यत्ते मत्स्मरणं भवेत् । अन्यथा मर्त्यभावेन तवाज्ञानं भवेन्मयि

divyarūpaṁ dhṛtaṁ me'dya yatte matsmaraṇaṁ bhavet anyathā martyabhāvena tavājñānaṁ bhavenmayi

आज मैंने यह दिव्य रूप इसलिए धारण किया है, जिससे तुम्हें मेरा स्मरण बना रहे; अन्यथा मर्त्य-भाव के कारण तुम्हें मेरे विषय में अज्ञान हो जाता।

श्लोक 52 (shiva.rudra.69.52)

युवां मां पुत्रिभावेन दिव्यभावेन वासकृत् । चिन्तयन्तौ कृतस्नेहौ यातास्थो मद्गतिं पराम्

yuvāṁ māṁ putribhāvena divyabhāvena vāsakṛt cintayantau kṛtasnehau yātāstho madgatiṁ parām

तुम दोनों मुझे पुत्री-भाव से देखते हुए भी दिव्य-भाव से युक्त रहे, स्नेहपूर्वक चिंतन करते हुए तुम मेरी ही परम गति को प्राप्त हुए हो।

श्लोक 53 (shiva.rudra.69.53)

देवकार्यं करिष्यामि लीलां कृत्वाद्भुतां क्षितौ । शम्भुपत्नी भविष्यामि तारयिष्यामि सज्जनान्

devakāryaṁ kariṣyāmi līlāṁ kṛtvādbhutāṁ kṣitau śambhupatnī bhaviṣyāmi tārayiṣyāmi sajjanān

मैं पृथ्वी पर अद्भुत लीला करके देवकार्य सिद्ध करूँगी; मैं शंभु की पत्नी बनूँगी और सज्जनों का उद्धार करूँगी।

श्लोक 54 (shiva.rudra.69.54)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वासीच्छिवा तूष्णीमम्बिका स्वात्ममायया । पश्यन्त्यां मातरि प्रीत्या सद्योऽभूत्तनयातनुः

brahmovāca ityuktvāsīcchivā tūṣṇīmambikā svātmamāyayā paśyantyāṁ mātari prītyā sadyo'bhūttanayātanuḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — यह कहकर वह कल्याणकारी अम्बिका अपनी ही माया से मौन हो गईं, और माता के प्रेमपूर्वक देखते ही देखते वे तुरंत फिर से पुत्री की छोटी देह में परिणत हो गईं।

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