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रुद्र संहिता · अध्याय 7

विष्णु-ब्रह्मा विवाद

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (shiva.rudra.7.1)

ब्रह्मोवाच । सुप्ते नारायणे देवे नाभौ पङ्कजमुत्तमम् । आविर्बभूव सहसा बृहद्वै शङ्करेच्छया

brahmovāca supte nārāyaṇe deve nābhau paṅkajamuttamam āvirbabhūva sahasā bṛhadvai śaṅkarecchayā

ब्रह्मा ने कहा — देव नारायण के सो जाने पर उनकी नाभि में शंकर की इच्छा से अचानक एक विशाल और उत्तम कमल प्रकट हो गया।

श्लोक 2 (shiva.rudra.7.2)

अनन्तयष्टिकायुक्तं कर्णिकारसमप्रभम् । अनन्तयोजनायाममनन्तोच्छ्रायसंयुतम्

anantayaṣṭikāyuktaṁ karṇikārasamaprabham anantayojanāyāmamanantocchrāyasaṁyutam

वह अनन्त डण्ठल वाला, कर्णिकार पुष्प के समान कान्तिमान, अनन्त योजन लम्बा और अनन्त ऊँचाई से युक्त था।

श्लोक 3 (shiva.rudra.7.3)

कोटिसूर्यप्रतीकाशं सुन्दरं तत्त्वसंयुतम् । अत्यद्भुतं महारम्यं दर्शनीयमनुत्तमम्

koṭisūryapratīkāśaṁ sundaraṁ tattvasaṁyutam atyadbhutaṁ mahāramyaṁ darśanīyamanuttamam

वह करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी, सुन्दर, तत्त्व से युक्त, अत्यन्त अद्भुत, महारमणीय और दर्शनीयता में अनुपम था।

श्लोक 4 (shiva.rudra.7.4)

कृत्वा यत्नं पूर्ववत्स शङ्करः परमेश्वरः । दक्षिणाङ्गान्निजान्मां वै साम्बः शम्भुरजीजनत्

kṛtvā yatnaṁ pūrvavatsa śaṅkaraḥ parameśvaraḥ dakṣiṇāṅgānnijānmāṁ vai sāmbaḥ śambhurajījanat

पूर्व की भाँति प्रयत्न कर, परमेश्वर शंकर ने अम्बा के साथ अपने दाहिने अंग से मुझे — शम्भु ने ही स्वयं — उत्पन्न किया।

श्लोक 5 (shiva.rudra.7.5)

स मायामोहितं कृत्वा मां महेशो द्रुतं मुने । तन्नाभिपङ्कजादाविर्भावयामास लीलया

sa māyāmohitaṁ kṛtvā māṁ maheśo drutaṁ mune tannābhipaṅkajādāvirbhāvayāmāsa līlayā

हे मुने! उन महेश ने मुझे माया से मोहित कर, शीघ्र ही अपनी लीला से उस (विष्णु की) नाभि-कमल से प्रकट करा दिया।

श्लोक 6 (shiva.rudra.7.6)

एवं पद्मात्ततो जज्ञे पुत्रोऽहं हेमगर्भकः । चतुर्मुखो रक्तवर्णस्त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकः

evaṁ padmāttato jajñe putro'haṁ hemagarbhakaḥ caturmukho raktavarṇastripuṇḍrāṅkitamastakaḥ

इस प्रकार उस पद्म से पुत्र के रूप में मैं उत्पन्न हुआ, स्वर्णगर्भ, चतुर्मुख, रक्तवर्ण और त्रिपुण्ड्र से अंकित मस्तक वाला।

श्लोक 7 (shiva.rudra.7.7)

तन्मायामोहितश्चाहं नाविदं कमलं विना । स्वदेहजनकं तात पितरं ज्ञानदुर्बलः

tanmāyāmohitaścāhaṁ nāvidaṁ kamalaṁ vinā svadehajanakaṁ tāta pitaraṁ jñānadurbalaḥ

हे तात! उस माया से मोहित होकर, ज्ञान से दुर्बल होकर, मैं उस कमल के अतिरिक्त अपने शरीर के जनक, अपने पिता को नहीं जान सका।

श्लोक 8 (shiva.rudra.7.8)

कोऽहं वा कुत आयातः किं कार्यं तु मदीयकम् । कस्य पुत्रोऽहमुत्पन्नः केनैव निर्मितोऽधुना

ko'haṁ vā kuta āyātaḥ kiṁ kāryaṁ tu madīyakam kasya putro'hamutpannaḥ kenaiva nirmito'dhunā

मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरा क्या कार्य है? मैं किसका पुत्र हूँ, अभी किसके द्वारा रचा गया हूँ?

श्लोक 9 (shiva.rudra.7.9)

इति संशयमापन्नं बुद्धिर्मां समपद्यत । किमर्थं मोहमायामि तज्ज्ञानं सुकरं खलु

iti saṁśayamāpannaṁ buddhirmāṁ samapadyata kimarthaṁ mohamāyāmi tajjñānaṁ sukaraṁ khalu

इस प्रकार संशय में पड़ी मेरी बुद्धि ने सोचा — मैं मोह में क्यों रहूँ? वह ज्ञान तो सहज ही प्राप्त हो सकता है।

श्लोक 10 (shiva.rudra.7.10)

एतत्कमलपुष्पस्य पत्रारोहस्थलं ह्यधः । मत्कर्ता च स वै तत्र भविष्यति न संशयः

etatkamalapuṣpasya patrārohasthalaṁ hyadhaḥ matkartā ca sa vai tatra bhaviṣyati na saṁśayaḥ

इस कमल-पुष्प के पत्ते जहाँ से उठे हैं, उसके नीचे ही मेरा रचयिता निश्चय ही वहीं मिलेगा।

श्लोक 11 (shiva.rudra.7.11)

इति बुद्धिं समास्थाय कमलादवरोहयम् । नाले नाले गतस्तत्र वर्षाणां शतकं मुने

iti buddhiṁ samāsthāya kamalādavarohayam nāle nāle gatastatra varṣāṇāṁ śatakaṁ mune

यह विचार कर मैं कमल से नीचे उतरा; हे मुने! उस डण्ठल में गाँठ-गाँठ जाते हुए मुझे सौ वर्ष बीत गये।

श्लोक 12 (shiva.rudra.7.12)

न लब्धं तु मया तत्र कमलस्थानमुत्तमम् । संशयं च पुनः प्राप्तः कमले गन्तुमुत्सुकः

na labdhaṁ tu mayā tatra kamalasthānamuttamam saṁśayaṁ ca punaḥ prāptaḥ kamale gantumutsukaḥ

फिर भी मुझे वहाँ कमल का वह उत्तम मूल-स्थान नहीं मिला; पुनः संशय में पड़कर कमल की ओर लौटने के लिए उत्सुक हुआ।

श्लोक 13 (shiva.rudra.7.13)

आरुरोहाथ कमलं नालमार्गेण वै मुने । कुड्मलं कमलस्याथ लब्धवान्न विमोहितः

ārurohātha kamalaṁ nālamārgeṇa vai mune kuḍmalaṁ kamalasyātha labdhavānna vimohitaḥ

हे मुने! फिर मैं उसी डण्ठल के मार्ग से कमल पर चढ़ा; परन्तु मोहग्रस्त होने से कमल की कली भी नहीं पा सका।

श्लोक 14 (shiva.rudra.7.14)

नालमार्गेण भ्रमतो गतं वर्षशतं पुनः । क्षणमात्रं तदा तत्र ततस्तिष्ठन्विमोहितः

nālamārgeṇa bhramato gataṁ varṣaśataṁ punaḥ kṣaṇamātraṁ tadā tatra tatastiṣṭhanvimohitaḥ

डण्ठल के मार्ग में भटकते हुए फिर सौ वर्ष बीत गये, मानो वह क्षणमात्र हो; तब मैं वहीं मोहित होकर खड़ा रह गया।

श्लोक 15 (shiva.rudra.7.15)

तदा वाणी समुत्पन्ना तपेति परमा शुभा । शिवेच्छया परा व्योम्नो मोहविध्वंसिनी मुने

tadā vāṇī samutpannā tapeti paramā śubhā śivecchayā parā vyomno mohavidhvaṁsinī mune

हे मुने! तब शिव की इच्छा से आकाश से 'तप करो' — यह परम शुभ, मोह-नाशिनी वाणी उत्पन्न हुई।

श्लोक 16 (shiva.rudra.7.16)

तच्छ्रुत्वा व्योमवचनं द्वादशाब्दं प्रयत्नतः । पुनस्तप्तं तपो घोरं द्रष्टुं स्वजनकं तदा

tacchrutvā vyomavacanaṁ dvādaśābdaṁ prayatnataḥ punastaptaṁ tapo ghoraṁ draṣṭuṁ svajanakaṁ tadā

आकाशवाणी सुनकर, अपने पिता का दर्शन पाने के लिए मैंने बारह वर्ष तक यत्नपूर्वक पुनः घोर तपस्या की।

श्लोक 17 (shiva.rudra.7.17)

तदा हि भगवान्विष्णुश्चतुर्बाहुः सुलोचनः । मय्येवानुग्रहं कर्तुं द्रुतमाविर्बभूव ह

tadā hi bhagavānviṣṇuścaturbāhuḥ sulocanaḥ mayyevānugrahaṁ kartuṁ drutamāvirbabhūva ha

तब भगवान विष्णु, चतुर्भुज, सुन्दर नेत्रों वाले, मुझ पर अनुग्रह करने के लिए शीघ्र प्रकट हो गये।

श्लोक 18 (shiva.rudra.7.18)

शङ्खचक्रायुधकरो गदापद्मधरः परः । घनश्यामलसर्वाङ्गः पीताम्बरधरः परः

śaṅkhacakrāyudhakaro gadāpadmadharaḥ paraḥ ghanaśyāmalasarvāṅgaḥ pītāmbaradharaḥ paraḥ

शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हाथों वाले, मेघ के समान श्याम सर्वांग, पीताम्बर धारण किये।

श्लोक 19 (shiva.rudra.7.19)

मुकुटादिमहाभूषः प्रसन्नमुखपङ्कजः । कोटिकन्दर्पसङ्काशःसन्दृष्टो मोहितेन सः

mukuṭādimahābhūṣaḥ prasannamukhapaṅkajaḥ koṭikandarpasaṅkāśaḥsandṛṣṭo mohitena saḥ

मुकुट आदि महान आभूषणों से सुसज्जित, प्रसन्न मुखकमल वाले, करोड़ों कामदेवों के समान तेजस्वी — इस प्रकार मोहित मैंने उन्हें देखा।

श्लोक 20 (shiva.rudra.7.20)

तद् दृष्ट्वा सुन्दरं रूपं विस्मयं परमं गतः । कालाभं काञ्चनाभं च सर्वात्मानं चतुर्भुजम्

tad dṛṣṭvā sundaraṁ rūpaṁ vismayaṁ paramaṁ gataḥ kālābhaṁ kāñcanābhaṁ ca sarvātmānaṁ caturbhujam

उस सुन्दर रूप को देखकर मुझे परम आश्चर्य हुआ — मेघ के समान श्याम और स्वर्ण के समान कान्तिमान, सर्वात्मा, चतुर्भुज।

श्लोक 21 (shiva.rudra.7.21)

तथाभूतमहं दृष्ट्वा सदसन्मयमात्मना । नारायणं महाबाहुं हर्षितो ह्यभवं तदा

tathābhūtamahaṁ dṛṣṭvā sadasanmayamātmanā nārāyaṇaṁ mahābāhuṁ harṣito hyabhavaṁ tadā

सत् और असत् दोनों स्वरूप वाले, महाबाहु नारायण को इस प्रकार देखकर मैं तब हर्षित हो उठा।

श्लोक 22 (shiva.rudra.7.22)

मायया मोहितः शम्भोस्तदा लीलात्मनः प्रभोः । अविज्ञाय स्वजनकं तमवोचं प्रहर्षितः

māyayā mohitaḥ śambhostadā līlātmanaḥ prabhoḥ avijñāya svajanakaṁ tamavocaṁ praharṣitaḥ

लीलामय प्रभु शम्भु की माया से मोहित होकर, अपने ही पिता को न पहचानते हुए, मैंने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे कहा।

श्लोक 23 (shiva.rudra.7.23)

ब्रह्मोवाच । कस्त्वं वदेति हस्तेन समुत्थाप्य सनातनम् । तदा हस्तप्रहारेण तीव्रेण सुदृढेन तु

brahmovāca kastvaṁ vadeti hastena samutthāpya sanātanam tadā hastaprahāreṇa tīvreṇa sudṛḍhena tu

ब्रह्मा ने कहा — 'तुम कौन हो, बताओ' — यह कहकर अपने हाथ से उस सनातन को उठाते हुए, तीव्र और सुदृढ़ हस्तप्रहार से,

श्लोक 24 (shiva.rudra.7.24)

प्रबुद्ध्योत्थाय शयनात्समासीनः क्षणं वशी । ददर्श निद्राविक्लिन्न नीरजामललोचनः

prabuddhyotthāya śayanātsamāsīnaḥ kṣaṇaṁ vaśī dadarśa nidrāviklinna nīrajāmalalocanaḥ

वे नींद से जागकर, थोड़ी देर संयत होकर बैठे — निद्रा से भीगे हुए, कमल के समान निर्मल नेत्रों से मुझे देखते हुए।

श्लोक 25 (shiva.rudra.7.25)

मामत्र संस्थितं भासाध्यासितो भगवान्हरिः । आह चोत्थाय ब्रह्माणं हसन्मां मधुरं सकृत्

māmatra saṁsthitaṁ bhāsādhyāsito bhagavānhariḥ āha cotthāya brahmāṇaṁ hasanmāṁ madhuraṁ sakṛt

मुझे वहाँ खड़ा देखकर, उस तेज से आच्छादित भगवान हरि ने उठकर हँसते हुए मधुर वाणी में एक बार मुझसे कहा।

श्लोक 26 (shiva.rudra.7.26)

विष्णुरुवाच । स्वागतं स्वागतं वत्स पितामह महाद्युते । निर्भयो भव दास्येऽहं सर्वान्कामान्न संशयः

viṣṇuruvāca svāgataṁ svāgataṁ vatsa pitāmaha mahādyute nirbhayo bhava dāsye'haṁ sarvānkāmānna saṁśayaḥ

विष्णु ने कहा — हे वत्स, हे महातेजस्वी पितामह, स्वागत है, स्वागत है! निर्भय रहो, मैं तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूर्ण करूँगा, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 27 (shiva.rudra.7.27)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स्मितपूर्वं सुरर्षभः । रजसा बद्धवैरश्च तमवोचं जनार्दनम्

tasya tadvacanaṁ śrutvā smitapūrvaṁ surarṣabhaḥ rajasā baddhavairaśca tamavocaṁ janārdanam

हे सुरश्रेष्ठ! उनके इस वचन को सुनकर पहले तो मैं मुस्कुराया, परन्तु फिर रजोगुण से बद्ध वैर होकर मैंने उन जनार्दन से कहा।

श्लोक 28 (shiva.rudra.7.28)

ब्रह्मोवाच । भाषसे वत्स वत्सेति सर्वसंहारकारणम् । मामिहाति स्मितं कृत्वा गुरुः शिष्यमिवानघ

brahmovāca bhāṣase vatsa vatseti sarvasaṁhārakāraṇam māmihāti smitaṁ kṛtvā guruḥ śiṣyamivānagha

ब्रह्मा ने कहा — हे निष्पाप! तुम मुझे — सबके संहार के कारण को — 'वत्स, वत्स' कहते हो, मानो गुरु शिष्य को सम्बोधित कर रहा हो!

श्लोक 29 (shiva.rudra.7.29)

कर्तारं जगतां साक्षात्प्रकृतेश्च प्रवर्तकम् । सनातनमजं विष्णुं विरिञ्चिं विष्णुसम्भवम्

kartāraṁ jagatāṁ sākṣātprakṛteśca pravartakam sanātanamajaṁ viṣṇuṁ viriñciṁ viṣṇusambhavam

जगत् का साक्षात् कर्ता, प्रकृति का प्रवर्तक, सनातन, अजन्मा वह मैं विष्णु हूँ — विरिंचि (ब्रह्मा) भी विष्णु से ही उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 30 (shiva.rudra.7.30)

विश्वात्मानं विधातारं धातारं पङ्कजेक्षणम् । किमर्थं भाषसे मोहाद्वक्तुमर्हसि सत्वरम्

viśvātmānaṁ vidhātāraṁ dhātāraṁ paṅkajekṣaṇam kimarthaṁ bhāṣase mohādvaktumarhasi satvaram

विश्वात्मा, विधाता, धाता, कमल-नेत्र वाले मुझसे तुम मोहवश ऐसा क्यों कहते हो? शीघ्र स्पष्ट कहो।

श्लोक 31 (shiva.rudra.7.31)

वेदो मां वक्ति नियमात्स्वयम्भुवमजं विभुम् । पितामहं स्वराजं च परमेष्ठिनमुत्तमम्

vedo māṁ vakti niyamātsvayambhuvamajaṁ vibhum pitāmahaṁ svarājaṁ ca parameṣṭhinamuttamam

वेद स्वयं मुझे नियमपूर्वक स्वयंभू, अजन्मा, सर्वव्यापी, पितामह, स्वराट् और परमश्रेष्ठ परमेष्ठी कहता है।

श्लोक 32 (shiva.rudra.7.32)

इत्याकर्ण्य हरिर्वाक्यं मम क्रुद्धो रमापतिः । सोऽपि मामाह जाने त्वां कर्तारमिति लोकतः

ityākarṇya harirvākyaṁ mama kruddho ramāpatiḥ so'pi māmāha jāne tvāṁ kartāramiti lokataḥ

हरि का यह वचन सुनकर, क्रुद्ध होकर मैंने भी उन रमापति से कहा — मैं तो लोक-प्रसिद्धि से तुम्हें एक 'कर्ता' के रूप में जानता हूँ।

श्लोक 33 (shiva.rudra.7.33)

विष्णुरुवाच । कर्तुं धर्तुं भवानङ्गादवतीर्णो ममाव्ययात् । विस्मृतोऽसि जगन्नाथं नारायणमनामयम्

viṣṇuruvāca kartuṁ dhartuṁ bhavānaṅgādavatīrṇo mamāvyayāt vismṛto'si jagannāthaṁ nārāyaṇamanāmayam

विष्णु ने कहा — तुम सृष्टि और पालन के लिए मेरे ही अविनाशी अंग से अवतरित हुए हो; तुम निर्दोष जगन्नाथ नारायण को भूल गये हो।

श्लोक 34 (shiva.rudra.7.34)

पुरुषं परमात्मानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम् । विष्णुमच्युतमीशानं विश्वस्य प्रभवोद्भवम्

puruṣaṁ paramātmānaṁ puruhūtaṁ puruṣṭutam viṣṇumacyutamīśānaṁ viśvasya prabhavodbhavam

परम पुरुष, परमात्मा, अनेकों द्वारा आहूत, अनेकों द्वारा स्तुत; विष्णु, अच्युत, ईशान, विश्व के उत्पत्ति-स्थान —

श्लोक 35 (shiva.rudra.7.35)

नारायणं महाबाहुं सर्वव्यापकमीश्वरम् । मन्नाभिपद्मतस्त्वं हि प्रसूतो नात्र संशयः

nārāyaṇaṁ mahābāhuṁ sarvavyāpakamīśvaram mannābhipadmatastvaṁ hi prasūto nātra saṁśayaḥ

महाबाहु नारायण, सर्वव्यापी ईश्वर — तुम मेरे ही नाभि-कमल से उत्पन्न हुए हो, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 36 (shiva.rudra.7.36)

तवापराधो नास्त्यत्र त्वयि मायाकृतं मम । शृणु सत्यं चतुर्वक्त्र सर्वदेवेश्वरो ह्यहम्

tavāparādho nāstyatra tvayi māyākṛtaṁ mama śṛṇu satyaṁ caturvaktra sarvadeveśvaro hyaham

इसमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं, यह तो मेरी ही माया का कार्य है तुम पर। हे चतुर्मुख! सत्य सुनो, मैं ही समस्त देवों का ईश्वर हूँ।

श्लोक 37 (shiva.rudra.7.37)

कर्ता हर्ता च भर्ता च न मयास्ति समो विभुः । अहमेव परं ब्रह्म परं तत्त्वं पितामह

kartā hartā ca bhartā ca na mayāsti samo vibhuḥ ahameva paraṁ brahma paraṁ tattvaṁ pitāmaha

कर्ता, संहारकर्ता और पालनकर्ता — मेरे समान कोई सर्वव्यापी प्रभु नहीं है; हे पितामह! मैं ही परब्रह्म, परम तत्त्व हूँ।

श्लोक 38 (shiva.rudra.7.38)

अहमेव परं ज्योतिः परमात्मा त्वहं विभुः । अद्य दृष्टं श्रुतं सर्वं जगत्यस्मिञ्चराचरम्

ahameva paraṁ jyotiḥ paramātmā tvahaṁ vibhuḥ adya dṛṣṭaṁ śrutaṁ sarvaṁ jagatyasmiñcarācaram

मैं ही परम ज्योति हूँ, मैं ही परमात्मा और सर्वव्यापी हूँ; इस चराचर जगत् में आज जो कुछ भी देखा-सुना गया है,

श्लोक 39 (shiva.rudra.7.39)

तत्तद्विद्धि चतुर्वक्त्र सर्वं मन्मयमित्यथ । मया सृष्टं पुराव्यक्तं चतुर्विंशतितत्त्वकम्

tattadviddhi caturvaktra sarvaṁ manmayamityatha mayā sṛṣṭaṁ purāvyaktaṁ caturviṁśatitattvakam

हे चतुर्मुख! उस सबको मेरा ही स्वरूप जानो; मैंने ही पहले अव्यक्त चौबीस तत्त्वों की सृष्टि की थी।

श्लोक 40 (shiva.rudra.7.40)

नित्यं तेष्वणवो बद्धाः सृष्टाः क्रोधभयादयः । प्रभावाच्च भवानङ्गान्यनेकानीह लीलया

nityaṁ teṣvaṇavo baddhāḥ sṛṣṭāḥ krodhabhayādayaḥ prabhāvācca bhavānaṅgānyanekānīha līlayā

उनमें अणु (जीव) सदा बद्ध हैं, तथा क्रोध, भय आदि भी सृजित हुए हैं; मेरे ही प्रभाव से लीलापूर्वक तुम्हारे अनेक अंग (सन्तति) भी उत्पन्न हुए।

श्लोक 41 (shiva.rudra.7.41)

सृष्टा बुद्धिर्मया तस्यामहङ्कारस्त्रिधा ततः । तन्मात्रं पञ्चकं तस्मान्मनो देहेन्द्रियाणि च

sṛṣṭā buddhirmayā tasyāmahaṅkārastridhā tataḥ tanmātraṁ pañcakaṁ tasmānmano dehendriyāṇi ca

मेरे द्वारा ही बुद्धि सृजित हुई, उससे त्रिविध अहंकार, उससे पाँच तन्मात्राएँ, फिर उनसे मन, देह और इन्द्रियाँ हुईं।

श्लोक 42 (shiva.rudra.7.42)

आकाशादीनि भूतानि भौतिकानि च लीलया । इति बुद्ध्वा प्रजानाथ शरणं व्रज मे विधे

ākāśādīni bhūtāni bhautikāni ca līlayā iti buddhvā prajānātha śaraṇaṁ vraja me vidhe

आकाश आदि भूत और भौतिक पदार्थ भी लीलापूर्वक ही सृजे गये। हे प्रजानाथ! यह जानकर मेरी शरण में आओ।

श्लोक 43 (shiva.rudra.7.43)

अहं त्वां सर्वदुःखेभ्यो रक्षिष्यामि न संशयः । ब्रह्मोवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्य ब्रह्मा क्रोधसमन्वितः । को वा त्वमिति सम्भर्त्स्याब्रुवं मायाविमोहितः

ahaṁ tvāṁ sarvaduḥkhebhyo rakṣiṣyāmi na saṁśayaḥ brahmovāca iti śrutvā vacastasya brahmā krodhasamanvitaḥ ko vā tvamiti sambhartsyābruvaṁ māyāvimohitaḥ

मैं तुम्हें सभी दुःखों से रक्षा करूँगा, इसमें सन्देह नहीं। ब्रह्मा ने कहा — उनका यह वचन सुनकर, क्रोध से भरकर, माया से मोहित होकर मैंने कहा — तुम आखिर कौन हो?

श्लोक 44 (shiva.rudra.7.44)

किमर्थं भाषसे भूरि बह्वनर्थकरं वचः । नेश्वरस्त्वं परं ब्रह्म कश्चित्कर्ता भवेत्तव

kimarthaṁ bhāṣase bhūri bahvanarthakaraṁ vacaḥ neśvarastvaṁ paraṁ brahma kaścitkartā bhavettava

इतने अनर्थकारी वचन तुम इतनी अधिकता से क्यों बोलते हो? तुम ईश्वर, परब्रह्म नहीं हो — तुम्हारा भी कोई कर्ता होगा।

श्लोक 45 (shiva.rudra.7.45)

मायया मोहितश्चाहं युद्धं चक्रे सुदारुणम् । हरिणा तेन वै सार्धं शङ्करस्य महाप्रभोः

māyayā mohitaścāhaṁ yuddhaṁ cakre sudāruṇam hariṇā tena vai sārdhaṁ śaṅkarasya mahāprabhoḥ

महाप्रभु शंकर की माया से मोहित होकर मैंने उन हरि के साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध छेड़ दिया।

श्लोक 46 (shiva.rudra.7.46)

एवं मम हरेश्चासीत्सङ्गरो रोमहर्षणः । प्रलयार्णवमध्ये तु रजसा बद्धवैरयोः

evaṁ mama hareścāsītsaṅgaro romaharṣaṇaḥ pralayārṇavamadhye tu rajasā baddhavairayoḥ

इस प्रकार प्रलय-सागर के मध्य, रजोगुण से बद्ध वैर वाले मेरे और हरि के बीच एक रोमांचकारी संग्राम हुआ।

श्लोक 47 (shiva.rudra.7.47)

एतस्मिन्नन्तरे लिङ्गमभवच्चावयोः पुरः । विवादशमनार्थं हि प्रबोधार्थं तथावयोः

etasminnantare liṅgamabhavaccāvayoḥ puraḥ vivādaśamanārthaṁ hi prabodhārthaṁ tathāvayoḥ

इसी बीच हम दोनों के सामने एक लिंग प्रकट हुआ — हमारे विवाद को शान्त करने के लिए, और हम दोनों को बोध कराने के लिए।

श्लोक 48 (shiva.rudra.7.48)

ज्वालामालासहस्राढ्यं कालानलशतोपमम् । क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम्

jvālāmālāsahasrāḍhyaṁ kālānalaśatopamam kṣayavṛddhivinirmuktamādimadhyāntavarjitam

वह सहस्रों ज्वाला-मालाओं से युक्त, सैकड़ों प्रलयाग्नियों के समान, क्षय-वृद्धि से मुक्त, आदि-मध्य-अन्त रहित था।

श्लोक 49 (shiva.rudra.7.49)

अनौपम्यमनिर्देश्यमव्यक्तं विश्वसम्भवम् । तस्य ज्वालासहस्रेण मोहितो भगवान्हरिः

anaupamyamanirdeśyamavyaktaṁ viśvasambhavam tasya jvālāsahasreṇa mohito bhagavānhariḥ

अनुपम, अनिर्देश्य, अव्यक्त, और विश्व का उत्पत्ति-स्थान था। उसकी सहस्र ज्वालाओं से भगवान हरि भी विस्मित हो गये।

श्लोक 50 (shiva.rudra.7.50)

मोहितं चाह मामत्र किमर्थं स्पर्धसेऽधुना । आगतस्तु तृतीयोऽत्र तिष्ठतां युद्धमावयोः

mohitaṁ cāha māmatra kimarthaṁ spardhase'dhunā āgatastu tṛtīyo'tra tiṣṭhatāṁ yuddhamāvayoḥ

विस्मित होकर उन्होंने मुझसे कहा — अब हम यहाँ किसलिए स्पर्धा करें? यहाँ एक तीसरा (तत्त्व) आ गया है; हमारा युद्ध यहीं रुके।

श्लोक 51 (shiva.rudra.7.51)

कुत एवात्र सम्भूतः परीक्षावोऽग्निसम्भवम् । अधो गमिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च

kuta evātra sambhūtaḥ parīkṣāvo'gnisambhavam adho gamiṣyāmyanalastambhasyānupamasya ca

यह आखिर कहाँ से उत्पन्न हुआ, आओ इस अग्निरूप की परीक्षा करें — मैं इस अनुपम अग्निस्तम्भ के नीचे की ओर जाता हूँ।

श्लोक 52 (shiva.rudra.7.52)

परीक्षार्थं प्रजानाथ तस्य वै वायुवेगतः । भवानूर्ध्वं प्रयत्नेन गन्तुमर्हति सत्वरम्

parīkṣārthaṁ prajānātha tasya vai vāyuvegataḥ bhavānūrdhvaṁ prayatnena gantumarhati satvaram

हे प्रजानाथ! इसकी परीक्षा हेतु तुम वायु के वेग से यत्नपूर्वक शीघ्र ऊपर की ओर जाओ।

श्लोक 53 (shiva.rudra.7.53)

ब्रह्मोवाच । एवं व्याहृत्य विश्वात्मा स्वरूपमकरोत्तदा । वाराहमहमप्याशु हंसत्वं प्राप्तवान्मुने

brahmovāca evaṁ vyāhṛtya viśvātmā svarūpamakarottadā vārāhamahamapyāśu haṁsatvaṁ prāptavānmune

ब्रह्मा ने कहा — इस प्रकार कहकर विश्वात्मा विष्णु ने तब वाराह का रूप धारण किया; और हे मुने, मैंने भी शीघ्र हंस का रूप धारण किया।

श्लोक 54 (shiva.rudra.7.54)

तदाप्रभृति मामाहुर्हंसहंसो विराडिति । हंस हंसेति यो ब्रूयात्स हंसोऽथ भविष्यति

tadāprabhṛti māmāhurhaṁsahaṁso virāḍiti haṁsa haṁseti yo brūyātsa haṁso'tha bhaviṣyati

तभी से मुझे 'हंस हंस विराट्' कहा जाता है; जो 'हंस हंस' कहेगा, वह भी हंसत्व को प्राप्त होगा।

श्लोक 55 (shiva.rudra.7.55)

सुश्वेतो ह्यनलप्रख्यो विश्वतः पक्षसंयुतः । मनोऽनिलजवो भूत्वा गतोर्ध्वं चोर्ध्वतः पुरा

suśveto hyanalaprakhyo viśvataḥ pakṣasaṁyutaḥ mano'nilajavo bhūtvā gatordhvaṁ cordhvataḥ purā

अत्यन्त श्वेत, अग्नि के समान तेजस्वी, चारों ओर पंखों से युक्त, मन और वायु के समान वेगवान होकर मैं ऊपर, और ऊपर की ओर बढ़ता गया।

श्लोक 56 (shiva.rudra.7.56)

नारायणोऽपि विश्वात्मा सुश्वेतो ह्यभवत्तदा । दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम्

nārāyaṇo'pi viśvātmā suśveto hyabhavattadā daśayojanavistīrṇaṁ śatayojanamāyatam

नारायण भी, विश्वात्मा, तब अत्यन्त श्वेत हो गये — दस योजन विस्तृत और सौ योजन लम्बे,

श्लोक 57 (shiva.rudra.7.57)

मेरुपर्वतवर्ष्माणं गौरतीक्ष्णोग्रदंष्ट्रिणम् । कालादित्यसमाभासं दीर्घघोणं महास्वनम्

meruparvatavarṣmāṇaṁ gauratīkṣṇogradaṁṣṭriṇam kālādityasamābhāsaṁ dīrghaghoṇaṁ mahāsvanam

मेरु पर्वत जैसे विशाल शरीर वाले, गौरवर्ण, तीक्ष्ण और भयंकर दाढ़ों वाले, प्रलयकालीन सूर्य के समान तेजस्वी, लम्बी थूथन और महाध्वनि वाले।

श्लोक 58 (shiva.rudra.7.58)

ह्रस्वपादं विचित्राङ्गं जैत्रं दृढमनौपमम् । वाराहाकारमास्थाय गतवांस्तदधौ जवात्

hrasvapādaṁ vicitrāṅgaṁ jaitraṁ dṛḍhamanaupamam vārāhākāramāsthāya gatavāṁstadadhau javāt

छोटे पैरों, विचित्र अंगों वाले, सदा विजयी, दृढ़ और अनुपम, वाराह का रूप धारण कर वे उस जल में वेगपूर्वक नीचे चले गये।

श्लोक 59 (shiva.rudra.7.59)

एवं वर्षसहस्रं च चरन्विष्णुरधो गतः । तदाप्रभृति लोकेषु श्वेतवाराहसंज्ञकः

evaṁ varṣasahasraṁ ca caranviṣṇuradho gataḥ tadāprabhṛti lokeṣu śvetavārāhasaṁjñakaḥ

इस प्रकार हजार वर्षों तक विचरण करते हुए विष्णु नीचे जाते रहे; तभी से वे लोकों में श्वेतवाराह के नाम से जाने जाते हैं।

श्लोक 60 (shiva.rudra.7.60)

कल्पो बभूव देवर्षे नराणां कालसंज्ञकः । बभ्राम बहुधा विष्णुः प्रभविष्णुरधोगतः

kalpo babhūva devarṣe narāṇāṁ kālasaṁjñakaḥ babhrāma bahudhā viṣṇuḥ prabhaviṣṇuradhogataḥ

हे देवर्षे! वह अवधि एक कल्प बन गई, जिसे मनुष्यों में 'काल' कहा जाता है; प्रभावशाली विष्णु नीचे जाते हुए विविध रूपों में विचरते रहे।

श्लोक 61 (shiva.rudra.7.61)

नापश्यदल्पमप्यस्य मूलं लिङ्गस्य सूकरः । तावत्कालं गतश्चोर्ध्वमहमप्यरिसूदन

nāpaśyadalpamapyasya mūlaṁ liṅgasya sūkaraḥ tāvatkālaṁ gataścordhvamahamapyarisūdana

उस वराह को उस लिंग का जरा-सा भी मूल नहीं मिला; हे शत्रुनाशक! उतने ही समय तक मैं भी ऊपर की ओर जाता रहा।

श्लोक 62 (shiva.rudra.7.62)

सत्वरं सर्वयत्नेन तस्यान्तं ज्ञातुमिच्छया । श्रान्तो न दृष्ट्वा तस्यान्तमहं कालादधोगतः

satvaraṁ sarvayatnena tasyāntaṁ jñātumicchayā śrānto na dṛṣṭvā tasyāntamahaṁ kālādadhogataḥ

उसका अन्त जानने की इच्छा से शीघ्रतापूर्वक सभी प्रयत्न करके भी, थककर, उसका अन्त न पाकर मैं उतने काल के बाद नीचे लौट आया।

श्लोक 63 (shiva.rudra.7.63)

तथैव भगवान्विष्णुः श्रान्तः कमललोचनः । सर्वदेवनिभस्तूर्णमुत्थितः स महावपुः

tathaiva bhagavānviṣṇuḥ śrāntaḥ kamalalocanaḥ sarvadevanibhastūrṇamutthitaḥ sa mahāvapuḥ

उसी प्रकार थके हुए, कमल-नेत्र भगवान विष्णु भी, सभी देवों के समान तेजस्वी, वह महाकाय, शीघ्र ही ऊपर उठ आये।

श्लोक 64 (shiva.rudra.7.64)

समागतो मया सार्धं प्रणिपत्य भवं मुहुः । मायया मोहितः शम्भोस्तस्थौ संविग्नमानसः

samāgato mayā sārdhaṁ praṇipatya bhavaṁ muhuḥ māyayā mohitaḥ śambhostasthau saṁvignamānasaḥ

मेरे साथ आकर, बार-बार भव को प्रणाम करते हुए, शम्भु की माया से अब भी मोहित होकर, वे व्याकुल चित्त से खड़े रहे।

श्लोक 65 (shiva.rudra.7.65)

पृष्ठतः पार्श्वतश्चैव ह्यग्रतः परमेश्वरम् । प्रणिपत्य मया सार्धं सस्मार किमिदं त्विति

pṛṣṭhataḥ pārśvataścaiva hyagrataḥ parameśvaram praṇipatya mayā sārdhaṁ sasmāra kimidaṁ tviti

पीछे, बगल से, और सामने से भी परमेश्वर को प्रणाम कर, मेरे साथ उन्होंने विचार किया — यह आखिर क्या है?

श्लोक 66 (shiva.rudra.7.66)

अनिर्देश्यं च तद्रूपमनाम कर्मवर्जितम् । अलिङ्गं लिङ्गतां प्राप्तं ध्यानमार्गेऽप्यगोचरम्

anirdeśyaṁ ca tadrūpamanāma karmavarjitam aliṅgaṁ liṅgatāṁ prāptaṁ dhyānamārge'pyagocaram

वह रूप अनिर्देश्य, नामरहित, क्रियारहित था; अलिंग होते हुए भी लिंगरूप को प्राप्त, ध्यान के मार्ग से भी अगोचर था।

श्लोक 67 (shiva.rudra.7.67)

स्वस्थं चित्तं तदा कृत्वा नमस्कारपरायणौ । बभूवतुरुभावावामहं हरिरपि ध्रुवम्

svasthaṁ cittaṁ tadā kṛtvā namaskāraparāyaṇau babhūvaturubhāvāvāmahaṁ harirapi dhruvam

तब चित्त को स्थिर कर, हम दोनों — मैं और हरि भी — निश्चय ही नमस्कार में तत्पर हो गये।

श्लोक 68 (shiva.rudra.7.68)

जानीवो न हि ते रूपं योऽसि सोऽसि महाप्रभो । नमोऽस्तु ते महेशान रूपं दर्शय नौ त्वरम्

jānīvo na hi te rūpaṁ yo'si so'si mahāprabho namo'stu te maheśāna rūpaṁ darśaya nau tvaram

हम तुम्हारे रूप को नहीं जानते; जो भी तुम हो, तुम्हीं हो, हे महाप्रभो! हे महेशान, तुम्हें नमस्कार है; शीघ्र हमें अपना रूप दिखाओ।

श्लोक 69 (shiva.rudra.7.69)

एवं शरच्छतान्यासन्नमस्कारं प्रकुर्वतोः । आवयोर्मुनिशार्दूल मदमास्थितयोस्तदा

evaṁ śaracchatānyāsannamaskāraṁ prakurvatoḥ āvayormuniśārdūla madamāsthitayostadā

हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार गर्व से युक्त हम दोनों के नमस्कार करते-करते सैकड़ों शरद ऋतुएँ बीत गईं।

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