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रुद्र संहिता · अध्याय 72

मेना की शंका और दोनों स्वप्न

अध्याय 71अध्याय-सूचीअध्याय 73

श्लोक 1 (shiva.rudra.72.1)

नारद उवाच । विधे तात त्वया शैववर प्राज्ञाद्भुता कथा । वर्णिता करुणां कृत्वा प्रीतिर्मे वर्धिताधिका

nārada uvāca vidhe tāta tvayā śaivavara prājñādbhutā kathā varṇitā karuṇāṁ kṛtvā prītirme vardhitādhikā

नारद ने कहा — हे तात विधे! हे शैव-श्रेष्ठ! आपने कृपा करके यह प्रज्ञामय अद्भुत कथा सुनाई है, जिससे मेरा प्रेम अधिकाधिक बढ़ गया है।

श्लोक 2 (shiva.rudra.72.2)

विधे गते स्वकं धाम मयि वै दिव्यदर्शने । ततः किमभवत्तात कृपया तद्वदाधुना

vidhe gate svakaṁ dhāma mayi vai divyadarśane tataḥ kimabhavattāta kṛpayā tadvadādhunā

हे विधे! उस दिव्य दर्शन के पश्चात् जब आप अपने धाम को गए, तब हे तात! आगे क्या हुआ? कृपा करके अब वह मुझे बताइए।

श्लोक 3 (shiva.rudra.72.3)

ब्रह्मोवाच गते त्वयि मुने स्वर्गे कियत्काले गते सति । मेना प्राप्यैकदा शैलनिकटं प्रणनाम सा

brahmovāca gate tvayi mune svarge kiyatkāle gate sati menā prāpyaikadā śailanikaṭaṁ praṇanāma sā

ब्रह्मा जी ने कहा — हे मुने! आपके स्वर्ग चले जाने के पश्चात् जब कुछ समय बीत गया, तब एक दिन मेना ने पर्वतराज के समीप जाकर उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 4 (shiva.rudra.72.4)

स्थित्वा सविनयं प्राह स्वनाथं गिरिकामिनी । तत्र शैलाधिनाथं सा प्राणप्रियसुता सती

sthitvā savinayaṁ prāha svanāthaṁ girikāminī tatra śailādhināthaṁ sā prāṇapriyasutā satī

वहाँ खड़ी होकर उस पर्वत-पत्नी, अपनी प्राणप्रिय पुत्री की माता ने विनयपूर्वक अपने स्वामी शैलाधिनाथ से कहा।

श्लोक 5 (shiva.rudra.72.5)

मेनोवाच मुनिवाक्यं न बुद्धं मे सम्यङ्नारीस्वभावतः । विवाहं कुरु कन्यायाःसुन्दरेण वरेण ह

menovāca munivākyaṁ na buddhaṁ me samyaṅnārīsvabhāvataḥ vivāhaṁ kuru kanyāyāḥsundareṇa vareṇa ha

मेना ने कहा — नारी-स्वभाव के कारण मैं मुनि के वचनों को भलीभाँति नहीं समझ पाई। आप कन्या का विवाह किसी सुंदर वर से कीजिए।

श्लोक 6 (shiva.rudra.72.6)

सर्वथा हि भवेत्तत्रोद्वाहोऽपूर्वसुखावहः । वरश्च गिरिजायास्तु सुलक्षणकुलोद्भवः

sarvathā hi bhavettatrodvāho'pūrvasukhāvahaḥ varaśca girijāyāstu sulakṣaṇakulodbhavaḥ

वह विवाह सब प्रकार से अपूर्व सुख देने वाला हो, और गिरिजा का वर शुभ लक्षणों वाले उत्तम कुल में उत्पन्न हो।

श्लोक 7 (shiva.rudra.72.7)

प्राणप्रिया सुता मे हि सुखिता स्याद्यथा प्रिया । सद्वरं प्राप्य सुप्रीता तथा कुरु नमोऽस्तु ते

prāṇapriyā sutā me hi sukhitā syādyathā priyā sadvaraṁ prāpya suprītā tathā kuru namo'stu te

मेरी प्राणप्रिय पुत्री सुखी हो, जिस प्रकार वह प्रिय है उसी प्रकार उत्तम वर पाकर अति प्रसन्न हो। वैसा ही कीजिए, आपको नमस्कार है।

श्लोक 8 (shiva.rudra.72.8)

ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वाश्रुमुखी मेना पत्यङ्घ्र्योः पतिता तदा । तामुत्थाप्य गिरिः प्राह यथावत्प्राज्ञसत्तमः

brahmovāca ityuktvāśrumukhī menā patyaṅghryoḥ patitā tadā tāmutthāpya giriḥ prāha yathāvatprājñasattamaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — यह कहकर अश्रुपूर्ण मुख वाली मेना अपने पति के चरणों में गिर पड़ीं। उन्हें उठाकर परम प्राज्ञ पर्वतराज ने यथोचित वचन कहे।

श्लोक 9 (shiva.rudra.72.9)

हिमालय उवाच । शृणु त्वं मेनके देवि यथार्थं वच्मि तत्त्वतः । भ्रमं त्यज मुनेर्वाक्यं वितथं न कदाचन

himālaya uvāca śṛṇu tvaṁ menake devi yathārthaṁ vacmi tattvataḥ bhramaṁ tyaja munervākyaṁ vitathaṁ na kadācana

हिमालय ने कहा — हे देवी मेनके! सुनो, मैं तुम्हें यथार्थ सत्य बात कहता हूँ। भ्रम त्याग दो, मुनि का वचन कभी असत्य नहीं होता।

श्लोक 10 (shiva.rudra.72.10)

यदि स्नेहः सुतायास्ते सुतां शिक्षय सादरम् । तपः कुर्याच्छङ्करस्य सा भक्त्या स्थिरचेतसा

yadi snehaḥ sutāyāste sutāṁ śikṣaya sādaram tapaḥ kuryācchaṅkarasya sā bhaktyā sthiracetasā

यदि तुम्हें पुत्री से स्नेह है तो आदरपूर्वक उसे यह शिक्षा दो कि वह स्थिर चित्त से भक्तिपूर्वक शंकर की तपस्या करे।

श्लोक 11 (shiva.rudra.72.11)

चेत्प्रसन्नः शिवः काल्याः पाणिं गृह्णाति मेनके । सर्वं भूयाच्छुभं नश्येन्नारदोक्तममङ्गलम्

cetprasannaḥ śivaḥ kālyāḥ pāṇiṁ gṛhṇāti menake sarvaṁ bhūyācchubhaṁ naśyennāradoktamamaṅgalam

हे मेनके! यदि प्रसन्न होकर शिव काली का पाणिग्रहण करें, तो सब कुछ शुभ हो जाएगा और नारद द्वारा कही गई अमंगल बात नष्ट हो जाएगी।

श्लोक 12 (shiva.rudra.72.12)

अमङ्गलानि सर्वाणि मङ्गलानि सदा शिवे । तस्मात्सुतां शिवप्राप्त्यै तपसे शिक्षय द्रुतम्

amaṅgalāni sarvāṇi maṅgalāni sadā śive tasmātsutāṁ śivaprāptyai tapase śikṣaya drutam

शिव में सभी अमंगल सदा के लिए मंगल बन जाते हैं। इसलिए शिव-प्राप्ति के लिए शीघ्र ही पुत्री को तपस्या की शिक्षा दो।

श्लोक 13 (shiva.rudra.72.13)

ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य गिरेर्वाक्यं मेना प्रीततराभवत् । सुतोपकण्ठमगमदुपदेष्टुं तपोरुचिम्

brahmovāca ityākarṇya girervākyaṁ menā prītatarābhavat sutopakaṇṭhamagamadupadeṣṭuṁ taporucim

ब्रह्मा जी ने कहा — पर्वतराज के इस वचन को सुनकर मेना अत्यंत प्रसन्न हुईं और तपस्या का उपदेश देने के लिए पुत्री के समीप गईं।

श्लोक 14 (shiva.rudra.72.14)

सुताङ्गं सुकुमारं हि दृष्ट्वातीवाथ मेनका । विव्यथे नेत्रयुग्मे चाश्रुपूर्णेऽभवतां द्रुतम्

sutāṅgaṁ sukumāraṁ hi dṛṣṭvātīvātha menakā vivyathe netrayugme cāśrupūrṇe'bhavatāṁ drutam

किन्तु पुत्री के अत्यंत सुकुमार अंगों को देखकर मेना बहुत व्यथित हो गईं, और उनके दोनों नेत्र तुरंत अश्रुओं से भर गए।

श्लोक 15 (shiva.rudra.72.15)

सुतां समुपदेष्टुं तन्न शशाक गिरिप्रिया । बुबुधे पार्वती तद्वै जननीङ्गितमाशु सा

sutāṁ samupadeṣṭuṁ tanna śaśāka giripriyā bubudhe pārvatī tadvai jananīṅgitamāśu sā

पर्वत-प्रिया अपनी पुत्री को उपदेश देने में समर्थ नहीं हो सकीं। पार्वती ने तुरंत ही माता के भाव को समझ लिया।

श्लोक 16 (shiva.rudra.72.16)

अथ सा कालिका देवी सर्वज्ञा परमेश्वरी । उवाच जननीं सद्यः समाश्वास्य पुनः पुनः

atha sā kālikā devī sarvajñā parameśvarī uvāca jananīṁ sadyaḥ samāśvāsya punaḥ punaḥ

तब वह सर्वज्ञा परमेश्वरी कालिका देवी अपनी माता को बार-बार सांत्वना देकर तुरंत बोलीं।

श्लोक 17 (shiva.rudra.72.17)

पार्वत्युवाच । मातः शृणु महाप्राज्ञेऽद्यतनेऽजमुहूर्तके । रात्रौ दृष्टो मया स्वप्नस्तं वदामि कृपां कुरु

pārvatyuvāca mātaḥ śṛṇu mahāprājñe'dyatane'jamuhūrtake rātrau dṛṣṭo mayā svapnastaṁ vadāmi kṛpāṁ kuru

पार्वती ने कहा — हे माता! हे महाप्राज्ञे! सुनो, आज रात्रि के ब्रह्ममुहूर्त में मैंने एक स्वप्न देखा है, वह मैं तुम्हें बताती हूँ, कृपा करो।

श्लोक 18 (shiva.rudra.72.18)

विप्रश्चैव तपस्वी मां सदयः प्रीतिपूर्वकम् । उपादिदेश सुतपः कर्तुं मातः शिवस्य वै

vipraścaiva tapasvī māṁ sadayaḥ prītipūrvakam upādideśa sutapaḥ kartuṁ mātaḥ śivasya vai

एक ब्राह्मण तपस्वी ने दयापूर्वक, प्रेमपूर्वक मुझे उपदेश दिया, हे माता, कि मैं शिव के लिए उत्तम तपस्या करूँ।

श्लोक 19 (shiva.rudra.72.19)

ब्रह्मोवाच । तच्छ्रुत्वा मेनका शीघ्रं पतिमाहूय तत्र च । तत्स्वप्नं कथयामास सुतादृष्टमशेषतः

brahmovāca tacchrutvā menakā śīghraṁ patimāhūya tatra ca tatsvapnaṁ kathayāmāsa sutādṛṣṭamaśeṣataḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — यह सुनकर मेना ने तुरंत अपने पति को वहाँ बुलाया और पुत्री द्वारा देखे गए उस स्वप्न को पूर्णरूप से कह सुनाया।

श्लोक 20 (shiva.rudra.72.20)

सुतास्वप्नमथाकर्ण्य मेनकातो गिरीश्वरः । उवाच परमप्रीतः प्रियां सम्बोधयन्गिरा

sutāsvapnamathākarṇya menakāto girīśvaraḥ uvāca paramaprītaḥ priyāṁ sambodhayangirā

पुत्री के स्वप्न को मेना से सुनकर पर्वतेश्वर अत्यंत प्रसन्न हुए और अपनी प्रिया को वाणी से संबोधित करते हुए बोले।

श्लोक 21 (shiva.rudra.72.21)

गिरीश्वर उवाच हे प्रियेऽपररात्रान्ते स्वप्नो दृष्टो मयापि हि । तं शृणु त्वं महाप्रीत्या वच्म्यहं तं समादरात्

girīśvara uvāca he priye'pararātrānte svapno dṛṣṭo mayāpi hi taṁ śṛṇu tvaṁ mahāprītyā vacmyahaṁ taṁ samādarāt

पर्वतेश्वर ने कहा — हे प्रिये! रात्रि के अंतिम भाग में मैंने भी एक स्वप्न देखा है। उसे बड़े प्रेम से सुनो, मैं आदरपूर्वक उसे कहता हूँ।

श्लोक 22 (shiva.rudra.72.22)

एकस्तपस्वी परमो नारदोक्तवराङ्गधृक् । पुरोपकण्ठं सुप्रीत्या तपः कर्तुं समागतः

ekastapasvī paramo nāradoktavarāṅgadhṛk puropakaṇṭhaṁ suprītyā tapaḥ kartuṁ samāgataḥ

नारद द्वारा वर्णित उत्तम अंग-कान्ति धारण किए हुए एक परम तपस्वी बड़े प्रेम से हमारे नगर के समीप तपस्या करने आया।

श्लोक 23 (shiva.rudra.72.23)

गृहीत्वा स्वसुतां तत्रागमं प्रीततरोऽप्यहम् । मया ज्ञातः स वै शम्भुर्नारदोक्तवरः प्रभुः

gṛhītvā svasutāṁ tatrāgamaṁ prītataro'pyaham mayā jñātaḥ sa vai śambhurnāradoktavaraḥ prabhuḥ

अपनी पुत्री को लेकर मैं भी अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक वहाँ गया, और मैंने जान लिया कि वे नारद द्वारा वर्णित प्रभु शम्भु ही हैं।

श्लोक 24 (shiva.rudra.72.24)

सेवार्थं तस्य तनयामुपदिश्य तपस्विनः । तं वै प्रार्थितवांस्तस्यां न तदाङ्गीचकार सः

sevārthaṁ tasya tanayāmupadiśya tapasvinaḥ taṁ vai prārthitavāṁstasyāṁ na tadāṅgīcakāra saḥ

उस तपस्वी की सेवा के लिए पुत्री को नियुक्त कर, मैंने उससे (विवाह हेतु) प्रार्थना की, किन्तु उसने उसे स्वीकार नहीं किया।

श्लोक 25 (shiva.rudra.72.25)

अभूद्विवादः सुमहान्साङ्ख्यवेदान्तसम्मतः । ततस्तदाज्ञया तत्र संस्थितासीत्सुता मम

abhūdvivādaḥ sumahānsāṅkhyavedāntasammataḥ tatastadājñayā tatra saṁsthitāsītsutā mama

तब सांख्य और वेदांत के सिद्धांतों पर आधारित एक महान विवाद हुआ। इसके पश्चात् उसकी आज्ञा से मेरी पुत्री वहीं स्थित रही।

श्लोक 26 (shiva.rudra.72.26)

निधाय हृदि तं कामं सिषेवे भक्तितश्च सा । इति दृष्टं मया स्वप्नं प्रोक्तवांस्ते वरानने

nidhāya hṛdi taṁ kāmaṁ siṣeve bhaktitaśca sā iti dṛṣṭaṁ mayā svapnaṁ proktavāṁste varānane

उस अभिलाषा को हृदय में धारण कर वह भक्तिपूर्वक उसकी सेवा करती रही। हे वरानने! यह स्वप्न मैंने देखा है, जो मैंने तुम्हें बता दिया।

श्लोक 27 (shiva.rudra.72.27)

ततो मेने कियत्कालं परीक्ष्यं तत्फलं प्रिये । योग्यमस्तीदमेवेह बुध्यस्व त्वं मम ध्रुवम्

tato mene kiyatkālaṁ parīkṣyaṁ tatphalaṁ priye yogyamastīdameveha budhyasva tvaṁ mama dhruvam

हे प्रिये! तब मैंने विचार किया कि कुछ समय तक इसके फल की परीक्षा की जाए। यही यहाँ उचित है, तुम इसे मेरा निश्चित मत समझो।

श्लोक 28 (shiva.rudra.72.28)

ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा गिरिराजश्च मेनका वै मुनीश्वर । सन्तस्थतुः परीक्षन्तौ तत्फलं शुद्धचेतसौ

brahmovāca ityuktvā girirājaśca menakā vai munīśvara santasthatuḥ parīkṣantau tatphalaṁ śuddhacetasau

ब्रह्मा जी ने कहा — हे मुनीश्वर! यह कहकर पर्वतराज और मेना दोनों शुद्ध चित्त से उस फल की परीक्षा करते हुए वहीं ठहर गए।

श्लोक 29 (shiva.rudra.72.29)

इत्थं व्यतीतेऽल्पदिने परमेशः सतां गतिः । सतीविरहसुव्यग्रो भ्रमन्सर्वत्र सूतिकृत्

itthaṁ vyatīte'lpadine parameśaḥ satāṁ gatiḥ satīvirahasuvyagro bhramansarvatra sūtikṛt

इस प्रकार कुछ दिन बीतने पर, सत्पुरुषों के आश्रय, सृष्टिकर्ता परमेश्वर, सती के विरह से अत्यंत व्याकुल होकर सर्वत्र भ्रमण करने लगे।

श्लोक 30 (shiva.rudra.72.30)

तत्राजगाम सुप्रीत्या कियद्गणयुतः प्रभुः । तपः कर्तुं सतीप्रेमविरहाकुलमानसः

tatrājagāma suprītyā kiyadgaṇayutaḥ prabhuḥ tapaḥ kartuṁ satīpremavirahākulamānasaḥ

वहाँ प्रभु कुछ गणों सहित प्रसन्नतापूर्वक आए, सती के प्रेम-वियोग से व्याकुल मन लिए तपस्या करने हेतु।

श्लोक 31 (shiva.rudra.72.31)

तपश्चकार स्वं तत्र पार्वती सेवने रता । सखीभ्यां सहिता नित्यं प्रसन्नार्थमभूत्तदा

tapaścakāra svaṁ tatra pārvatī sevane ratā sakhībhyāṁ sahitā nityaṁ prasannārthamabhūttadā

वे वहाँ अपनी तपस्या करने लगे, और पार्वती अपनी दो सखियों सहित सेवा में रत होकर नित्य उन्हें प्रसन्न करने में लगी रहीं।

श्लोक 32 (shiva.rudra.72.32)

विद्धोऽपि मार्गणैः शम्भुर्विकृतिं नाप स प्रभुः । प्रेषितेन सुरैः स्वात्ममोहनार्थं स्मरेण वै

viddho'pi mārgaṇaiḥ śambhurvikṛtiṁ nāpa sa prabhuḥ preṣitena suraiḥ svātmamohanārthaṁ smareṇa vai

देवताओं द्वारा स्वयं को मोहित करने हेतु भेजे गए काम के बाणों से बिंधकर भी प्रभु शम्भु में कोई विकार नहीं हुआ।

श्लोक 33 (shiva.rudra.72.33)

दग्ध्वा स्मरं च तत्रैव स्ववह्निनयनेन सः । स्मृत्वा मम वचः क्रुद्धो मह्यमन्तर्दधे ततः

dagdhvā smaraṁ ca tatraiva svavahninayanena saḥ smṛtvā mama vacaḥ kruddho mahyamantardadhe tataḥ

वहीं उन्होंने अपनी अग्नि-दृष्टि से काम को भस्म कर दिया, और तत्पश्चात् मेरे वचन का स्मरण कर क्रुद्ध होकर मुझसे अंतर्धान हो गए।

श्लोक 34 (shiva.rudra.72.34)

ततः कालेन कियता विनाश्य गिरिजामदम् । प्रसादितः सुतपसा प्रसन्नोऽभून्महेश्वरः

tataḥ kālena kiyatā vināśya girijāmadam prasāditaḥ sutapasā prasanno'bhūnmaheśvaraḥ

इसके पश्चात् कुछ काल बीतने पर, गिरिजा के अहंकार को नष्ट करके, उनकी उत्तम तपस्या से प्रसन्न होकर महेश्वर संतुष्ट हो गए।

श्लोक 35 (shiva.rudra.72.35)

लौकिकाचारमाश्रित्य रुद्रो विष्णुप्रसादितः । कालीं विवाहयामास ततोऽभूद्बहुमङ्गलम्

laukikācāramāśritya rudro viṣṇuprasāditaḥ kālīṁ vivāhayāmāsa tato'bhūdbahumaṅgalam

लौकिक आचार का आश्रय लेकर तथा विष्णु द्वारा प्रसन्न किए गए रुद्र ने काली से विवाह किया, जिससे अत्यंत मंगल हुआ।

श्लोक 36 (shiva.rudra.72.36)

इत्येतत्कथितं तात समासाच्चरितं विभोः । शङ्करस्य परं दिव्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि

ityetatkathitaṁ tāta samāsāccaritaṁ vibhoḥ śaṅkarasya paraṁ divyaṁ kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi

हे तात! इस प्रकार विभु शंकर का यह परम दिव्य चरित्र संक्षेप में तुम्हें कहा गया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

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