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रुद्र संहिता · अध्याय 74

शिव और हिमवान का समागम

अध्याय 73अध्याय-सूचीअध्याय 75

श्लोक 1 (shiva.rudra.74.1)

ब्रह्मोवाच । वर्धमाना गिरेः पुत्री सा शक्तिर्लोकपूजिता । अष्टवर्षा यदा जाता हिमालयगृहे सती

brahmovāca vardhamānā gireḥ putrī sā śaktirlokapūjitā aṣṭavarṣā yadā jātā himālayagṛhe satī

ब्रह्मा जी ने कहा — पर्वतराज की वह पुत्री, लोकपूजित शक्ति, बढ़ती जा रही थी; जब हिमालय के घर में जन्मी सती आठ वर्ष की हुईं।

श्लोक 2 (shiva.rudra.74.2)

तज्जन्म गिरिशो ज्ञात्वा सतीविरहकातरः । कृत्वा तमद्भुतामन्तर्मुमोदातीव नारद

tajjanma giriśo jñātvā satīvirahakātaraḥ kṛtvā tamadbhutāmantarmumodātīva nārada

उस जन्म को जानकर, सती के विरह से व्याकुल गिरीश हे नारद! उसे अद्भुत मानकर मन ही मन अत्यंत हर्षित हुए।

श्लोक 3 (shiva.rudra.74.3)

तस्मिन्नेवान्तरे शम्भुर्लौकिकीं गतिमाश्रितः । समाधातुं मनःसम्यक्तपः कर्तुं समैच्छत

tasminnevāntare śambhurlaukikīṁ gatimāśritaḥ samādhātuṁ manaḥsamyaktapaḥ kartuṁ samaicchata

उसी बीच लौकिक व्यवहार का आश्रय लेकर शम्भु ने अपने मन को भलीभाँति एकाग्र करने तथा तपस्या करने की इच्छा की।

श्लोक 4 (shiva.rudra.74.4)

कांश्चिद्गणवरान् शान्तान् नन्द्यादीनवगृह्य च । गङ्गावतारमगमद्धिमवत्प्रस्थमुत्तमम्

kāṁścidgaṇavarān śāntān nandyādīnavagṛhya ca gaṅgāvatāramagamaddhimavatprasthamuttamam

नंदी आदि कुछ शांत श्रेष्ठ गणों को साथ लेकर वे गंगावतरण-स्थल, हिमवान के उत्तम पठार पर गए।

श्लोक 5 (shiva.rudra.74.5)

यत्र गङ्गा निपतिता पुरा ब्रह्मपुरात्स्रुता । सर्वाघौघविनाशाय पावनी परमा मुने

yatra gaṅgā nipatitā purā brahmapurātsrutā sarvāghaughavināśāya pāvanī paramā mune

हे मुने! जहाँ प्राचीन काल में ब्रह्मलोक से बहकर गंगा गिरी थीं, वह सम्पूर्ण पापसमूह का नाश करने वाली परम पावनी नदी है।

श्लोक 6 (shiva.rudra.74.6)

तपःप्रारम्भमकरोत्स्थित्वा तत्र वशी हरः । एकाग्रं चिन्तयामास स्वमात्मानमतन्द्रितः

tapaḥprārambhamakarotsthitvā tatra vaśī haraḥ ekāgraṁ cintayāmāsa svamātmānamatandritaḥ

वहाँ स्थित होकर संयमी हर ने तपस्या का प्रारंभ किया, और अथक होकर एकाग्रचित्त से अपने आत्मस्वरूप का चिंतन करने लगे।

श्लोक 7 (shiva.rudra.74.7)

चेतो ज्ञानभवं नित्यं ज्योतीरूपं निरामयम् । जगन्मयं चिदानन्दं द्वैतहीनं निराश्रयम्

ceto jñānabhavaṁ nityaṁ jyotīrūpaṁ nirāmayam jaganmayaṁ cidānandaṁ dvaitahīnaṁ nirāśrayam

वह चित्त ज्ञानमय, नित्य, ज्योतिस्वरूप, निरामय, जगन्मय, चिदानंदस्वरूप, द्वैतरहित तथा निराश्रय है।

श्लोक 8 (shiva.rudra.74.8)

हरे ध्यानपरे तस्मिन्प्रमथा ध्यानतत्पराः । अभवन्केचिदपरे नन्दिभृङ्ग्यादयो गणाः

hare dhyānapare tasminpramathā dhyānatatparāḥ abhavankecidapare nandibhṛṅgyādayo gaṇāḥ

हर के ध्यानपरायण होने पर कुछ प्रमथगण भी ध्यान में तत्पर हो गए, और नंदी-भृंगी आदि अन्य गण (सेवा में रहे)।

श्लोक 9 (shiva.rudra.74.9)

सेवां चक्रुस्तदा केचिद्गणाः शम्भोः परात्मनः । नैवाकूजंस्तु मौना हि द्वारपाः केचनाभवन्

sevāṁ cakrustadā kecidgaṇāḥ śambhoḥ parātmanaḥ naivākūjaṁstu maunā hi dvārapāḥ kecanābhavan

कुछ गण उस समय परमात्मा शम्भु की सेवा करने लगे, और कुछ मौन होकर द्वारपाल बन गए, वे किंचित् भी शब्द नहीं करते थे।

श्लोक 10 (shiva.rudra.74.10)

एतस्मिन्नन्तरे तत्र जगाम हिमभूधरः । शङ्करस्यौषधिप्रस्थे श्रुत्वागमनमादरात्

etasminnantare tatra jagāma himabhūdharaḥ śaṅkarasyauṣadhiprasthe śrutvāgamanamādarāt

इसी बीच हिमभूधर, शंकर के औषधिप्रस्थ में आगमन का समाचार सुनकर, आदरपूर्वक वहाँ पहुँचे।

श्लोक 11 (shiva.rudra.74.11)

प्रणनाम प्रभुं रुद्रं सगणो भूधरेश्वरः । समानर्च च सुप्रीतस्तुष्टाव स कृताञ्जलिः

praṇanāma prabhuṁ rudraṁ sagaṇo bhūdhareśvaraḥ samānarca ca suprītastuṣṭāva sa kṛtāñjaliḥ

भूधरेश्वर ने अपने परिजनों सहित प्रभु रुद्र को प्रणाम किया, और अत्यंत प्रसन्न होकर उनकी पूजा की तथा हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की।

श्लोक 12 (shiva.rudra.74.12)

हिमालय उवाच । देवदेव महादेव कपर्दिच्छङ्कर प्रभो । त्वयैव लोकनाथेन पालितं भुवनत्रयम्

himālaya uvāca devadeva mahādeva kapardicchaṅkara prabho tvayaiva lokanāthena pālitaṁ bhuvanatrayam

हिमालय ने कहा — हे देवदेव महादेव! हे जटाधारी शंकर प्रभो! आप लोकनाथ द्वारा ही यह त्रिभुवन पालित है।

श्लोक 13 (shiva.rudra.74.13)

नमस्ते देवदेवेश योगिरूपधराय च । निर्गुणाय नमस्तुभ्यं सगुणाय विहारिणे

namaste devadeveśa yogirūpadharāya ca nirguṇāya namastubhyaṁ saguṇāya vihāriṇe

हे देवदेवेश! योगीरूपधारी आपको नमस्कार है। हे निर्गुण! आपको नमस्कार है, और हे सगुण विहारी! आपको भी नमस्कार है।

श्लोक 14 (shiva.rudra.74.14)

कैलासवासिने शम्भो सर्वलोकाटनाय च । नमस्ते परमेशाय लीलाकाराय शूलिने

kailāsavāsine śambho sarvalokāṭanāya ca namaste parameśāya līlākārāya śūline

हे शम्भो! कैलास-वासी तथा सर्वलोक-भ्रमणशील, हे परमेश! हे लीलाकार! हे शूलिन्! आपको नमस्कार है।

श्लोक 15 (shiva.rudra.74.15)

परिपूर्णगुणाधानविकाररहिताय ते । नमोऽनीहाय वीहाय धीराय परमात्मने

paripūrṇaguṇādhānavikārarahitāya te namo'nīhāya vīhāya dhīrāya paramātmane

पूर्ण गुणों के आधार, विकाररहित आपको नमस्कार है। इच्छारहित, फिर भी सक्रिय, धीर, परमात्मा आपको नमस्कार है।

श्लोक 16 (shiva.rudra.74.16)

अबहिर्भोगकाराय जनवत्सलते नमः । त्रिगुणाधीश मायेश ब्रह्मणे परमात्मने

abahirbhogakārāya janavatsalate namaḥ triguṇādhīśa māyeśa brahmaṇe paramātmane

बाह्य भोग से रहित, प्रजावत्सल आपको नमस्कार है। हे त्रिगुणाधीश! हे मायेश! हे ब्रह्मन्! हे परमात्मन्! आपको नमस्कार है।

श्लोक 17 (shiva.rudra.74.17)

विष्णुब्रह्मादिसेव्याय विष्णुब्रह्मस्वरूपिणे । विष्णुब्रह्मैकदात्रे ते भक्तप्रिय नमोऽस्तु ते

viṣṇubrahmādisevyāya viṣṇubrahmasvarūpiṇe viṣṇubrahmaikadātre te bhaktapriya namo'stu te

विष्णु-ब्रह्मादि द्वारा सेव्य, विष्णु-ब्रह्मस्वरूप, विष्णु और ब्रह्मा दोनों के एकमात्र दाता, हे भक्तप्रिय! आपको नमस्कार है।

श्लोक 18 (shiva.rudra.74.18)

तपोरत तपःस्थान सुतपःफलदायिने । तपःप्रियाय शान्ताय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे

taporata tapaḥsthāna sutapaḥphaladāyine tapaḥpriyāya śāntāya namaste brahmarūpiṇe

हे तपोरत! हे तपःस्थान! हे उत्तम तप के फलदाता! हे तपःप्रिय! हे शान्त! हे ब्रह्मरूपिन्! आपको नमस्कार है।

श्लोक 19 (shiva.rudra.74.19)

व्यवहारकरायैव लोकाचारकराय ते । सगुणाय परेशाय नमोऽस्तु परमात्मने

vyavahārakarāyaiva lokācārakarāya te saguṇāya pareśāya namo'stu paramātmane

व्यवहार करने वाले, लोकाचार करने वाले, सगुण, परेश, परमात्मा आपको नमस्कार है।

श्लोक 20 (shiva.rudra.74.20)

लीला तव महेशानावेद्या साधुसुखप्रदा । भक्ताधीनस्वरूपोऽसि भक्तवश्यो हि कर्मकृत्

līlā tava maheśānāvedyā sādhusukhapradā bhaktādhīnasvarūpo'si bhaktavaśyo hi karmakṛt

हे महेशान! आपकी लीला अवेद्य है, वह साधुजनों को सुख देने वाली है। आप भक्तों के अधीन स्वरूप वाले हैं, भक्तवश्य होकर ही कर्म करते हैं।

श्लोक 21 (shiva.rudra.74.21)

मम भाग्योदयात्तत्र त्वमागत इह प्रभो । सनाथ कृतवान्मां त्वं वर्णितो दीनवत्सलः

mama bhāgyodayāttatra tvamāgata iha prabho sanātha kṛtavānmāṁ tvaṁ varṇito dīnavatsalaḥ

मेरे भाग्य के उदय से ही आप यहाँ पधारे हैं, हे प्रभो! दीनवत्सल के रूप में विख्यात आपने मुझे सनाथ कर दिया है।

श्लोक 22 (shiva.rudra.74.22)

अद्य मे सफलं जन्म सफलं जीवनं मम । अद्य मे सफलं सर्वं यदत्र त्वं समागतः

adya me saphalaṁ janma saphalaṁ jīvanaṁ mama adya me saphalaṁ sarvaṁ yadatra tvaṁ samāgataḥ

आज मेरा जन्म सफल है, आज मेरा जीवन सफल है। आज मेरा सब कुछ सफल है, क्योंकि आप यहाँ पधारे हैं।

श्लोक 23 (shiva.rudra.74.23)

ज्ञात्वा मां दासमव्यग्रमाज्ञां देहि महेश्वर । त्वत्सेवां च महाप्रीत्या कुर्यामहमनन्यधीः

jñātvā māṁ dāsamavyagramājñāṁ dehi maheśvara tvatsevāṁ ca mahāprītyā kuryāmahamananyadhīḥ

हे महेश्वर! मुझे अपना अटल दास जानकर आज्ञा दीजिए। मैं अनन्य चित्त से बड़े प्रेम से आपकी सेवा करूँगा।

श्लोक 24 (shiva.rudra.74.24)

ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य गिरीशस्य महेश्वरः । किञ्चिदुन्मील्य नेत्रे च ददर्श सगणं गिरिम्

brahmovāca ityākarṇya vacastasya girīśasya maheśvaraḥ kiñcidunmīlya netre ca dadarśa sagaṇaṁ girim

ब्रह्मा जी ने कहा — गिरीश के इस वचन को सुनकर महेश्वर ने कुछ नेत्र खोलकर अपने गणों सहित पर्वत को देखा।

श्लोक 25 (shiva.rudra.74.25)

सगणं तं तथा दृष्ट्वा गिरिराजं वृषध्वजः । उवाच ध्यानयोगस्थः स्मयन्निव जगत्पतिः

sagaṇaṁ taṁ tathā dṛṣṭvā girirājaṁ vṛṣadhvajaḥ uvāca dhyānayogasthaḥ smayanniva jagatpatiḥ

उस पर्वतराज को अपने गणों सहित देखकर, ध्यानयोगस्थ वृषध्वज जगत्पति मानो मुस्कराते हुए बोले।

श्लोक 26 (shiva.rudra.74.26)

महेश्वर उवाच । तव पृष्ठे तपस्तप्तुं रहस्यमहमागतः । यथा न कोऽपि निकटं समायातु तथा कुरु

maheśvara uvāca tava pṛṣṭhe tapastaptuṁ rahasyamahamāgataḥ yathā na ko'pi nikaṭaṁ samāyātu tathā kuru

महेश्वर ने कहा — तुम्हारे पर्वत की पीठ पर मैं गुप्त रूप से तपस्या करने आया हूँ। ऐसा करो कि कोई भी समीप न आ सके।

श्लोक 27 (shiva.rudra.74.27)

त्वं महात्मा तपोधामा मुनीनां च सदाश्रयः । देवानां राक्षसानां च परेषां च महात्मनाम्

tvaṁ mahātmā tapodhāmā munīnāṁ ca sadāśrayaḥ devānāṁ rākṣasānāṁ ca pareṣāṁ ca mahātmanām

तुम महात्मा हो, तप के धाम हो, मुनियों, देवताओं, राक्षसों तथा अन्य महात्माओं के सदा आश्रयस्थान हो।

श्लोक 28 (shiva.rudra.74.28)

सदा वासो द्विजादीनां गङ्गापूतश्च नित्यदा । परोपकारी सर्वेषां गिरीणामधिपः प्रभुः

sadā vāso dvijādīnāṁ gaṅgāpūtaśca nityadā paropakārī sarveṣāṁ girīṇāmadhipaḥ prabhuḥ

तुम सदा द्विजादियों के निवासस्थान हो, नित्य गंगाजल से पवित्र हो, सबका उपकार करने वाले तथा पर्वतों के अधिपति प्रभु हो।

श्लोक 29 (shiva.rudra.74.29)

अहं तपश्चराम्यत्र गङ्गावतरणे स्थले । आश्रितस्तव सुप्रीतो गिरिराज यतात्मवान्

ahaṁ tapaścarāmyatra gaṅgāvataraṇe sthale āśritastava suprīto girirāja yatātmavān

हे गिरिराज! मैं तुम्हारा आश्रय लेकर, संयमी होकर, अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक इसी गंगावतरण-स्थल पर तपस्या करूँगा।

श्लोक 30 (shiva.rudra.74.30)

निर्विघ्नं मे तपश्चात्र हेतुना येन शैलप । सर्वथा हि गिरिश्रेष्ठ सुयत्नं कुरु साम्प्रतम्

nirvighnaṁ me tapaścātra hetunā yena śailapa sarvathā hi giriśreṣṭha suyatnaṁ kuru sāmpratam

हे शैलप! जिस उपाय से मेरा यह तप निर्विघ्न हो, हे गिरिश्रेष्ठ! उसका सब प्रकार से अभी उत्तम प्रयत्न करो।

श्लोक 31 (shiva.rudra.74.31)

ममेदमेव परमं सेवनं पर्वतोत्तम । स्वगृहं गच्छ सत्प्रीत्या तत्सम्पादय यत्नतः

mamedameva paramaṁ sevanaṁ parvatottama svagṛhaṁ gaccha satprītyā tatsampādaya yatnataḥ

हे पर्वतोत्तम! यही मेरी परम सेवा है। तुम प्रेमपूर्वक अपने घर जाओ और प्रयत्नपूर्वक इसे सम्पन्न करो।

श्लोक 32 (shiva.rudra.74.32)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा जगतां नाथस्तूष्णीमास स सूतिकृत् । गिरिराजस्तदा शम्भुं प्रणयादिदमब्रवीत्

brahmovāca ityuktvā jagatāṁ nāthastūṣṇīmāsa sa sūtikṛt girirājastadā śambhuṁ praṇayādidamabravīt

ब्रह्मा जी ने कहा — यह कहकर जगन्नाथ सृष्टिकर्ता मौन हो गए। तब पर्वतराज ने प्रेमपूर्वक शम्भु से यह कहा।

श्लोक 33 (shiva.rudra.74.33)

हिमालय उवाच । पूजितोऽसि जगन्नाथ मया त्वं परमेश्वर । स्वागतेनाद्य विषये स्थितं त्वां प्रार्थयामि किम्

himālaya uvāca pūjito'si jagannātha mayā tvaṁ parameśvara svāgatenādya viṣaye sthitaṁ tvāṁ prārthayāmi kim

हिमालय ने कहा — हे जगन्नाथ! हे परमेश्वर! आज मैंने आपकी पूजा की है, स्वागतपूर्वक। मेरे राज्य में स्थित आपसे मैं क्या प्रार्थना करूँ?

श्लोक 34 (shiva.rudra.74.34)

महता तपसा त्वं हि देवैर्यत्नपराश्रितैः । न प्राप्यसे महेशान स त्वं स्वयमुपस्थितः

mahatā tapasā tvaṁ hi devairyatnaparāśritaiḥ na prāpyase maheśāna sa tvaṁ svayamupasthitaḥ

हे महेशान! जिन देवताओं ने महान प्रयत्नपूर्वक तपस्या का आश्रय लिया, वे भी जिन्हें प्राप्त नहीं कर पाते, वही आप स्वयं यहाँ उपस्थित हुए हैं।

श्लोक 35 (shiva.rudra.74.35)

मत्तोऽप्यन्यतमो नास्ति न मत्तोऽन्योऽस्ति पुण्यवान् । भवानिति च मत्पृष्ठे तपसे समुपस्थितः

matto'pyanyatamo nāsti na matto'nyo'sti puṇyavān bhavāniti ca matpṛṣṭhe tapase samupasthitaḥ

मेरे समान कोई अन्य नहीं है, मेरे से अधिक पुण्यवान कोई नहीं है, क्योंकि आप स्वयं मेरे पर्वत की पीठ पर तपस्या के लिए उपस्थित हुए हैं।

श्लोक 36 (shiva.rudra.74.36)

देवेन्द्रादधिकं मन्ये स्वात्मानं परमेश्वर । सगणेन त्वयागत्य कृतोऽनुग्रहभागहम्

devendrādadhikaṁ manye svātmānaṁ parameśvara sagaṇena tvayāgatya kṛto'nugrahabhāgaham

हे परमेश्वर! मैं अपने को देवेंद्र से भी अधिक मानता हूँ, क्योंकि आपने गणों सहित यहाँ पधारकर मुझे अनुग्रह का भागी बनाया है।

श्लोक 37 (shiva.rudra.74.37)

निर्विघ्नं कुरु देवेश स्वतन्त्रः परमं तपः । करिष्येऽहं तथा सेवां दासोऽहं ते सदा प्रभो

nirvighnaṁ kuru deveśa svatantraḥ paramaṁ tapaḥ kariṣye'haṁ tathā sevāṁ dāso'haṁ te sadā prabho

हे देवेश! स्वतंत्र होकर निर्विघ्न परम तप कीजिए। मैं वैसी ही सेवा करूँगा, हे प्रभो! मैं सदा आपका दास हूँ।

श्लोक 38 (shiva.rudra.74.38)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा गिरिराजोऽसौ स्वं वेश्म द्रुतमागतः । वृत्तान्तं तं समाचख्यौ प्रियायै च समादरात्

brahmovāca ityuktvā girirājo'sau svaṁ veśma drutamāgataḥ vṛttāntaṁ taṁ samācakhyau priyāyai ca samādarāt

ब्रह्मा जी ने कहा — यह कहकर पर्वतराज शीघ्र ही अपने घर लौटे, और आदरपूर्वक अपनी प्रिया को सारा वृत्तांत बताया।

श्लोक 39 (shiva.rudra.74.39)

नीयमानान्परीवारान् स्वगणानपि नारद । समाहूयाखिलाञ्छैलपतिः प्रोवाच तत्त्वतः

nīyamānānparīvārān svagaṇānapi nārada samāhūyākhilāñchailapatiḥ provāca tattvataḥ

हे नारद! तब पर्वतपति ने अपने समस्त परिवारजनों तथा गणों को बुलाकर उन्हें यथार्थ बात कह सुनाई।

श्लोक 40 (shiva.rudra.74.40)

हिमालय उवाच । अद्य प्रभृति नो यातु कोऽपि गङ्गावतारणम् । मच्छासनेन मत्प्रस्थं सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम्

himālaya uvāca adya prabhṛti no yātu ko'pi gaṅgāvatāraṇam macchāsanena matprasthaṁ satyametadbravīmyaham

हिमालय ने कहा — आज से मेरी आज्ञा से गंगावतरण-स्थल, मेरे प्रस्थ पर कोई भी न जाए। यह मैं सत्य कहता हूँ।

श्लोक 41 (shiva.rudra.74.41)

गमिष्यति जनः कश्चित्तत्र चेत्तं महाखलम् । दण्डयिष्ये विशेषेण सत्यमेतन्मयोदितम्

gamiṣyati janaḥ kaścittatra cettaṁ mahākhalam daṇḍayiṣye viśeṣeṇa satyametanmayoditam

यदि कोई व्यक्ति वहाँ जाएगा, तो मैं उस महादुष्ट को विशेष रूप से दंडित करूँगा — यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 42 (shiva.rudra.74.42)

इति तान्स नियम्याशु स्वगणान्निखिलान्मुने । सुयत्नं कृतवाञ्छैलस्तं शृणु त्वं वदामि ते

iti tānsa niyamyāśu svagaṇānnikhilānmune suyatnaṁ kṛtavāñchailastaṁ śṛṇu tvaṁ vadāmi te

हे मुने! इस प्रकार अपने समस्त गणों को शीघ्र नियमबद्ध कर पर्वत ने उत्तम प्रयत्न किया। अब सुनो, मैं तुम्हें आगे की बात कहता हूँ।

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