रुद्र संहिता · अध्याय 75
शिव और हिमवान का संवाद
श्लोक 1 (shiva.rudra.75.1)
ब्रह्मोवाच । अथ शैलपतिर्हृष्टः सत्पुष्पफलसञ्चयम् । समादाय स्वतनयासहितोऽगाद्धरान्तिकम्
brahmovāca atha śailapatirhṛṣṭaḥ satpuṣpaphalasañcayam samādāya svatanayāsahito'gāddharāntikam
ब्रह्मा जी ने कहा — तत्पश्चात् हर्षित पर्वतराज उत्तम पुष्प-फलों का संग्रह लेकर अपनी पुत्री सहित हर के समीप गए।
श्लोक 2 (shiva.rudra.75.2)
स गत्वा त्रिजगन्नाथं प्रणम्य ध्यानतत्परम् । अर्पयामास तनयां कालीं तस्मै हृदाद्भुताम्
sa gatvā trijagannāthaṁ praṇamya dhyānatatparam arpayāmāsa tanayāṁ kālīṁ tasmai hṛdādbhutām
वहाँ जाकर उन्होंने ध्यानमग्न त्रिजगन्नाथ को प्रणाम किया, और अपनी हृदय से अद्भुत पुत्री काली को उन्हें अर्पित किया।
श्लोक 3 (shiva.rudra.75.3)
फलपुष्पादिकं सर्वं तत्तदग्रे निधाय सः । अग्रे कृत्वा सुतां शम्भुमिदमाह च शैलराट्
phalapuṣpādikaṁ sarvaṁ tattadagre nidhāya saḥ agre kṛtvā sutāṁ śambhumidamāha ca śailarāṭ
वहाँ फल-पुष्प आदि सब कुछ उनके सामने रखकर तथा पुत्री को आगे करके पर्वतराज ने शम्भु से यह कहा।
श्लोक 4 (shiva.rudra.75.4)
हिमगिरिरुवाच । भगवंस्तनया मे त्वां सेवितुं चन्द्रशेखरम् । समुत्सुका समानीता त्वदाराधनकाङ्क्षया
himagiriruvāca bhagavaṁstanayā me tvāṁ sevituṁ candraśekharam samutsukā samānītā tvadārādhanakāṅkṣayā
हिमगिरि ने कहा — हे भगवन्! मेरी यह पुत्री आपकी, चंद्रशेखर की, सेवा करने के लिए अत्यंत उत्सुक है; मैं इसे आपकी आराधना की कामना से यहाँ लाया हूँ।
श्लोक 5 (shiva.rudra.75.5)
सखीभ्यां सह नित्यं त्वां सेवतामेव शङ्करम् । अनुजानीहि तां नाथ मयि ते यद्यनुग्रहः
sakhībhyāṁ saha nityaṁ tvāṁ sevatāmeva śaṅkaram anujānīhi tāṁ nātha mayi te yadyanugrahaḥ
यह अपनी दोनों सखियों के साथ सदा आपकी, शंकर की, सेवा करती रहे। हे नाथ! यदि मुझ पर आपकी कृपा हो तो इसे अनुज्ञा दीजिए।
श्लोक 6 (shiva.rudra.75.6)
ब्रह्मोवाच । अथ तां शङ्करोऽपश्यत्प्रथमारूढयौवनाम् । फुल्लेन्दीवरपत्राभां पूर्णचन्द्रनिभाननाम्
brahmovāca atha tāṁ śaṅkaro'paśyatprathamārūḍhayauvanām phullendīvarapatrābhāṁ pūrṇacandranibhānanām
ब्रह्मा जी ने कहा — तब शंकर ने उसे देखा, जो नवयौवन को प्राप्त हो रही थी, खिले हुए नीलकमल-दल के समान कान्ति वाली तथा पूर्णचंद्र के समान मुख वाली।
श्लोक 7 (shiva.rudra.75.7)
समस्तलीलासंस्थानशुभवेषविजृम्भिताम् । कम्बुग्रीवां विशालाक्षीं चारुकर्णयुगोज्ज्वलाम्
samastalīlāsaṁsthānaśubhaveṣavijṛmbhitām kambugrīvāṁ viśālākṣīṁ cārukarṇayugojjvalām
समस्त लीलामय स्वरूप और शुभ वेश से सुशोभित, शंख के समान ग्रीवा वाली, विशाल नेत्रों वाली, सुंदर कर्ण-युगल से उज्ज्वल।
श्लोक 8 (shiva.rudra.75.8)
मृणालायतपर्यन्तबाहुयुग्ममनोहराम् । राजीवकुड्मलप्रख्यौ घनपीनौदृढौस्तनौ
mṛṇālāyataparyantabāhuyugmamanoharām rājīvakuḍmalaprakhyau ghanapīnaudṛḍhaustanau
कमल-नाल के समान सुंदर लंबी भुजाओं वाली, तथा कमल-कलिका के समान सुदृढ़, सघन उन्नत वक्षस्थल वाली।
श्लोक 9 (shiva.rudra.75.9)
बिभ्रतीं क्षीणमध्यां च त्रिवलीमध्यराजिताम् । स्थलपद्मप्रतीकाशपादयुग्मविराजिताम्
bibhratīṁ kṣīṇamadhyāṁ ca trivalīmadhyarājitām sthalapadmapratīkāśapādayugmavirājitām
क्षीण कटि वाली, त्रिवली से सुशोभित मध्य भाग वाली, स्थल-कमल के समान सुंदर पैरों वाली।
श्लोक 10 (shiva.rudra.75.10)
ध्यानपञ्जरनिर्बद्धमुनिमानसमप्यलम् । दर्शनाद्भ्रंशने शक्तां योषिद्गणशिरोमणिम्
dhyānapañjaranirbaddhamunimānasamapyalam darśanādbhraṁśane śaktāṁ yoṣidgaṇaśiromaṇim
जिसका दर्शन मात्र ध्यान-पिंजर में बंधे हुए मुनियों के मन को भी विचलित करने में समर्थ था, वह नारी-समूह की शिरोमणि।
श्लोक 11 (shiva.rudra.75.11)
दृष्ट्वा तां तादृशीं तात ध्यानिनां च मनोहराम् । विग्रहे तन्त्रमन्त्राणां वर्धिनीं कामरूपिणीम्
dṛṣṭvā tāṁ tādṛśīṁ tāta dhyānināṁ ca manoharām vigrahe tantramantrāṇāṁ vardhinīṁ kāmarūpiṇīm
हे तात! ध्यानियों के मन को भी हरने वाली, तंत्र-मंत्रों की वर्धिनी, काम-स्वरूपिणी उस देवी को इस प्रकार देखकर —
श्लोक 12 (shiva.rudra.75.12)
न्यमीलयदृशौ शीघ्रं दध्यौ स्वं रूपमुत्तमम् । परतत्त्वं महायोगी त्रिगुणात्परमव्ययम्
nyamīlayadṛśau śīghraṁ dadhyau svaṁ rūpamuttamam paratattvaṁ mahāyogī triguṇātparamavyayam
उन्होंने शीघ्र ही अपने नेत्र मूँद लिए और महायोगी होकर अपने त्रिगुणातीत, अविनाशी, परम तत्त्व-स्वरूप का ध्यान करने लगे।
श्लोक 13 (shiva.rudra.75.13)
दृष्ट्वा तदानीं सकलेश्वरं विभुं तपो जुषाणं विनिमीलितेक्षणम् । कपर्दिनं चन्द्रकलाविभूषणं वेदान्तवेद्यं परमासने स्थितम्
dṛṣṭvā tadānīṁ sakaleśvaraṁ vibhuṁ tapo juṣāṇaṁ vinimīlitekṣaṇam kapardinaṁ candrakalāvibhūṣaṇaṁ vedāntavedyaṁ paramāsane sthitam
तब सर्वेश्वर, तपस्यारत, नेत्र मूँदे हुए, जटाधारी, चंद्रकला से विभूषित, वेदांत द्वारा जानने योग्य, परम आसन पर स्थित विभु को देखकर —
श्लोक 14 (shiva.rudra.75.14)
ववन्द शीर्ष्णा च पुनर्हिमाचलः स संशयं प्रापददीनसत्त्वः । उवाच वाक्यं जगदेकबन्धुं गिरीश्वरो वाक्यविदां वरिष्ठः
vavanda śīrṣṇā ca punarhimācalaḥ sa saṁśayaṁ prāpadadīnasattvaḥ uvāca vākyaṁ jagadekabandhuṁ girīśvaro vākyavidāṁ variṣṭhaḥ
— हिमाचल ने पुनः शीश झुकाकर प्रणाम किया, यद्यपि उनके अदीन हृदय में एक संशय उत्पन्न हो गया था; और वाक्यवेत्ताओं में श्रेष्ठ गिरीश्वर ने जगत के एकमात्र बंधु से यह वचन कहा।
श्लोक 15 (shiva.rudra.75.15)
हिमाचल उवाच । देवदेव महादेव करुणाकर शङ्कर । पश्य मां शरणं प्राप्तमुन्मील्य नयने विभो
himācala uvāca devadeva mahādeva karuṇākara śaṅkara paśya māṁ śaraṇaṁ prāptamunmīlya nayane vibho
हिमाचल ने कहा — हे देवदेव महादेव! हे करुणाकर शंकर! हे विभो! नेत्र खोलकर मुझ शरणागत को देखिए।
श्लोक 16 (shiva.rudra.75.16)
शिव शर्व महेशान जगदानन्दकृत्प्रभो । त्वां नतोऽहं महादेव सर्वापद्विनिवर्तकम्
śiva śarva maheśāna jagadānandakṛtprabho tvāṁ nato'haṁ mahādeva sarvāpadvinivartakam
हे शिव! हे शर्व! हे महेशान! हे जगदानंदकर्ता प्रभो! हे महादेव! सर्वापदाओं को दूर करने वाले आपको मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 17 (shiva.rudra.75.17)
न त्वां जानन्ति देवेश वेदाः शास्त्राणि कृत्स्नशः । अतीतो महिमाध्वानं तव वाङ्मनसोः सदा
na tvāṁ jānanti deveśa vedāḥ śāstrāṇi kṛtsnaśaḥ atīto mahimādhvānaṁ tava vāṅmanasoḥ sadā
हे देवेश! वेद और शास्त्र भी आपको पूर्णरूप से नहीं जानते। आपकी महिमा का मार्ग सदा वाणी और मन से परे है।
श्लोक 18 (shiva.rudra.75.18)
अतद्व्यावृत्तितस्त्वां वै चकितं चकितं सदा । अभिधत्ते श्रुतिः सर्वा परेषां का कथा मता
atadvyāvṛttitastvāṁ vai cakitaṁ cakitaṁ sadā abhidhatte śrutiḥ sarvā pareṣāṁ kā kathā matā
'यह नहीं, यह नहीं' — इस प्रकार निषेध द्वारा ही समस्त श्रुति सदा चकित होकर आपका वर्णन करती है; तब औरों की तो बात ही क्या?
श्लोक 19 (shiva.rudra.75.19)
जानन्ति बहवो भक्तास्त्वत्कृपां प्राप्य भक्तितः । शरणागत भक्तानां न कुत्रापि भ्रमादिकम्
jānanti bahavo bhaktāstvatkṛpāṁ prāpya bhaktitaḥ śaraṇāgata bhaktānāṁ na kutrāpi bhramādikam
बहुत से भक्त भक्तिपूर्वक आपकी कृपा प्राप्त कर आपको जान लेते हैं। शरणागत भक्तों को कहीं भी किसी प्रकार का भ्रम नहीं होता।
श्लोक 20 (shiva.rudra.75.20)
विज्ञप्तिं शृणु मत्प्रीत्या स्वदासस्य ममाधुना । तव देवाज्ञया तात दीनत्वाद्वर्णयामि हि
vijñaptiṁ śṛṇu matprītyā svadāsasya mamādhunā tava devājñayā tāta dīnatvādvarṇayāmi hi
हे तात! अब कृपापूर्वक अपने इस दास की विनती सुनिए। आपकी ही आज्ञा से, और अपनी दीनता के कारण, मैं यह कहता हूँ।
श्लोक 21 (shiva.rudra.75.21)
सभाग्योऽहं महादेव प्रसादात्तव शङ्कर । मत्वा स्वदासं मां नाथ कृपां कुरु नमोऽस्तु ते
sabhāgyo'haṁ mahādeva prasādāttava śaṅkara matvā svadāsaṁ māṁ nātha kṛpāṁ kuru namo'stu te
हे महादेव! हे शंकर! आपकी कृपा से मैं भाग्यशाली हूँ। हे नाथ! मुझे अपना दास मानकर मुझ पर कृपा कीजिए, आपको नमस्कार है।
श्लोक 22 (shiva.rudra.75.22)
प्रत्यहं चागमिष्यामि दर्शनार्थं तव प्रभो । अनया सुतया स्वामिन्निदेशं दातुमर्हसि
pratyahaṁ cāgamiṣyāmi darśanārthaṁ tava prabho anayā sutayā svāminnideśaṁ dātumarhasi
हे प्रभो! मैं प्रतिदिन आपके दर्शन के लिए आया करूँगा। हे स्वामिन्! इस पुत्री के साथ आप मुझे आदेश देने योग्य हैं।
श्लोक 23 (shiva.rudra.75.23)
ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्योन्मील्य नेत्रे महेश्वरः । त्यक्तध्यानः परामृश्य देवदेवोऽब्रवीद्वचः
brahmovāca ityākarṇya vacastasyonmīlya netre maheśvaraḥ tyaktadhyānaḥ parāmṛśya devadevo'bravīdvacaḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — उनके इस वचन को सुनकर महेश्वर ने नेत्र खोले, ध्यान त्यागकर विचार किया, और देवदेव ने यह वचन कहा।
श्लोक 24 (shiva.rudra.75.24)
महेश्वर उवाच । आगन्तव्यं त्वया नित्यं दर्शनार्थं ममाचल । कुमारीं सदने स्थाप्य नान्यथा मम दर्शनम्
maheśvara uvāca āgantavyaṁ tvayā nityaṁ darśanārthaṁ mamācala kumārīṁ sadane sthāpya nānyathā mama darśanam
महेश्वर ने कहा — हे अचल! तुम नित्य कुमारी को घर में छोड़कर मेरे दर्शन के लिए आया करो; इसके अतिरिक्त मेरा दर्शन नहीं होगा।
श्लोक 25 (shiva.rudra.75.25)
ब्रह्मोवाच । महेशवचनं श्रुत्वा शिवातातस्तथाविधम् । अचलः प्रत्युवाचेदं गिरिशं नतकन्धरः
brahmovāca maheśavacanaṁ śrutvā śivātātastathāvidham acalaḥ pratyuvācedaṁ giriśaṁ natakandharaḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — महेश का ऐसा वचन सुनकर शिवा (पार्वती) के पिता, अचल ने सिर झुकाकर गिरीश को यह उत्तर दिया।
श्लोक 26 (shiva.rudra.75.26)
हिमाचल उवाच । कस्मान्मयानया सार्धं नागन्तव्यं तदुच्यताम् । सेवने किमयोग्येयं नाहं वेद्म्यत्र कारणम्
himācala uvāca kasmānmayānayā sārdhaṁ nāgantavyaṁ taducyatām sevane kimayogyeyaṁ nāhaṁ vedmyatra kāraṇam
हिमाचल ने कहा — मैं इसके साथ क्यों न आऊँ, यह बताइए। क्या यह सेवा के अयोग्य है? इसका कारण मुझे ज्ञात नहीं है।
श्लोक 27 (shiva.rudra.75.27)
ब्रह्मोवाच । ततोऽब्रवीद्गिरिं शम्भुः प्रहसन्वृषभध्वजः । लोकाचारं विशेषेण दर्शयन्हि कुयोगिनाम्
brahmovāca tato'bravīdgiriṁ śambhuḥ prahasanvṛṣabhadhvajaḥ lokācāraṁ viśeṣeṇa darśayanhi kuyoginām
ब्रह्मा जी ने कहा — तब वृषभध्वज शम्भु ने हँसते हुए पर्वत से यह कहा, विशेष रूप से कुयोगियों को लोकाचार दिखाते हुए।
श्लोक 28 (shiva.rudra.75.28)
शम्भुरुवाच । इयं कुमारी सुश्रोणी तन्वी चन्द्रानना शुभा । नानेतव्या मत्समीपे वारयामि पुनः पुनः
śambhuruvāca iyaṁ kumārī suśroṇī tanvī candrānanā śubhā nānetavyā matsamīpe vārayāmi punaḥ punaḥ
शम्भु ने कहा — यह सुंदर श्रोणी वाली, तन्वी, चंद्रमुखी, शुभ कुमारी मेरे समीप न लाई जाए। मैं बार-बार इसका निषेध करता हूँ।
श्लोक 29 (shiva.rudra.75.29)
मायारूपा स्मृता नारी विद्वद्भिर्वेदपारगैः । युवती तु विशेषेण विघ्नकर्त्री तपस्विनाम्
māyārūpā smṛtā nārī vidvadbhirvedapāragaiḥ yuvatī tu viśeṣeṇa vighnakartrī tapasvinām
विद्वानों द्वारा, जो वेद के पारगामी हैं, नारी को माया-स्वरूपा कहा गया है। विशेष रूप से युवती तपस्वियों के लिए विघ्नकारिणी होती है।
श्लोक 30 (shiva.rudra.75.30)
अहं तपस्वी योगी च निर्लिप्तो मायया सदा । प्रयोजनं न युवत्या वै स्त्रिया किं मेऽस्ति भूधर
ahaṁ tapasvī yogī ca nirlipto māyayā sadā prayojanaṁ na yuvatyā vai striyā kiṁ me'sti bhūdhara
हे भूधर! मैं तपस्वी और योगी हूँ, सदा माया से निर्लिप्त। मुझे युवती स्त्री से क्या प्रयोजन है?
श्लोक 31 (shiva.rudra.75.31)
एवं पुनर्न वक्तव्यं तपस्विवरसंश्रित । वेदधर्मप्रवीणस्त्वं यतो ज्ञानिवरो बुधः
evaṁ punarna vaktavyaṁ tapasvivarasaṁśrita vedadharmapravīṇastvaṁ yato jñānivaro budhaḥ
हे तपस्विवरों के आश्रयदाता! ऐसा फिर कभी न कहना, क्योंकि तुम वेद-धर्म में निपुण और ज्ञानियों में श्रेष्ठ बुद्धिमान हो।
श्लोक 32 (shiva.rudra.75.32)
भवत्यचल तत्सङ्गाद्विषयोत्पत्तिराशु वै । विनश्यति च वैराग्यं ततो भ्रश्यति सत्तपः
bhavatyacala tatsaṅgādviṣayotpattirāśu vai vinaśyati ca vairāgyaṁ tato bhraśyati sattapaḥ
हे अचल! उसके संग से शीघ्र ही विषय-वासना उत्पन्न होती है, वैराग्य नष्ट हो जाता है, और उससे सत्तप भ्रष्ट हो जाता है।
श्लोक 33 (shiva.rudra.75.33)
अतस्तपस्विना शैल न कार्या स्त्रीषु सङ्गतिः। महाविषयमूलं सा ज्ञानवैराग्यनाशिनी
atastapasvinā śaila na kāryā strīṣu saṅgatiḥ mahāviṣayamūlaṁ sā jñānavairāgyanāśinī
इसलिए हे शैल! तपस्वी को स्त्रियों के साथ संगति नहीं करनी चाहिए। वह महाविषय की जड़ है, ज्ञान और वैराग्य का नाश करने वाली है।
श्लोक 34 (shiva.rudra.75.34)
ब्रह्मोवाच । इत्याद्युक्त्वा बहुतरं महायोगी महेश्वरः । विरराम गिरीशं तं महायोगिवरः प्रभुः
brahmovāca ityādyuktvā bahutaraṁ mahāyogī maheśvaraḥ virarāma girīśaṁ taṁ mahāyogivaraḥ prabhuḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — इस प्रकार बहुत कुछ कहकर महायोगी महेश्वर, महायोगियों में श्रेष्ठ प्रभु, उस गिरीश के सम्मुख मौन हो गए।
श्लोक 35 (shiva.rudra.75.35)
एतच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शम्भो- र्निरामयं निःस्पृहं निष्ठुरं च । कालीतातश्चकितोऽभूत्सुरर्षे तद्वत्किञ्चिद्व्याकुलश्चास तूष्णीम्
etacchrutvā vacanaṁ tasya śambho- rnirāmayaṁ niḥspṛhaṁ niṣṭhuraṁ ca kālītātaścakito'bhūtsurarṣe tadvatkiñcidvyākulaścāsa tūṣṇīm
हे सुरर्षे! शम्भु के उस निरामय, निःस्पृह किन्तु कठोर वचन को सुनकर काली के पिता चकित हो गए, और वे भी कुछ व्याकुल होकर मौन बैठ गए।
श्लोक 36 (shiva.rudra.75.36)
तपस्विनोक्तं वचनं निशम्य तथा गिरीशं चकितं विचार्य । अतः प्रणम्यैव शिवं भवानी जगाद वाक्यं विशदन्तदानीम्
tapasvinoktaṁ vacanaṁ niśamya tathā girīśaṁ cakitaṁ vicārya ataḥ praṇamyaiva śivaṁ bhavānī jagāda vākyaṁ viśadantadānīm
उस तपस्वी के वचन को सुनकर तथा गिरीश को चकित और विचारमग्न देखकर, भवानी ने शिव को प्रणाम कर उस समय यह स्पष्ट वचन कहा।