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रुद्र संहिता · अध्याय 95

सप्तर्षियों का आगमन

अध्याय 94अध्याय-सूचीअध्याय 96

श्लोक 1 (shiva.rudra.95.1)

ब्रह्मोवाच । ब्राह्मणस्य वचः श्रुत्वा मेनोवाच हिमालयम् । शोकेनसाधुनयना हृदयेन विदूयता

brahmovāca brāhmaṇasya vacaḥ śrutvā menovāca himālayam śokenasādhunayanā hṛdayena vidūyatā

ब्रह्मा ने कहा -- "ब्राह्मण के वचन सुनकर मेना ने हिमालय से कहा, उनकी सुंदर आँखें शोक से भरी थीं और हृदय व्यथा से जल रहा था।"

श्लोक 2 (shiva.rudra.95.2)

मेनोवाच । शृणु शैलेन्द्र मद्वाक्यं परिणामे सुखावहम् । पृच्छ शैववरान्सर्वान्किमुक्तं ब्राह्मणेन ह

menovāca śṛṇu śailendra madvākyaṁ pariṇāme sukhāvaham pṛccha śaivavarānsarvānkimuktaṁ brāhmaṇena ha

मेना ने कहा -- "हे शैलेन्द्र! मेरी बात सुनिए, जो अन्ततः सुखदायी होगी; शिव के सभी श्रेष्ठ भक्तों से पूछिए कि उस ब्राह्मण ने क्या कहा।"

श्लोक 3 (shiva.rudra.95.3)

निन्दानेन कृता शम्भोर्वैष्णवेन द्विजन्मना । श्रुत्वा तां मे मनोऽतीव निर्विण्णं हि नगेश्वर

nindānena kṛtā śambhorvaiṣṇavena dvijanmanā śrutvā tāṁ me mano'tīva nirviṇṇaṁ hi nageśvara

"उस वैष्णव द्विज द्वारा की गई शम्भु की निन्दा -- उसे सुनकर, हे नगेश्वर! मेरा मन अत्यंत निराश हो गया है।"

श्लोक 4 (shiva.rudra.95.4)

तस्मै रुद्राय शैलेश न दास्यामि सुतामहम् । कुरूपशीलनाम्ने हि सुलक्षणयुतां निजाम्

tasmai rudrāya śaileśa na dāsyāmi sutāmaham kurūpaśīlanāmne hi sulakṣaṇayutāṁ nijām

"हे शैलेश! उस कुरूप, कुशील, कुनामी रुद्र को मैं अपनी सुलक्षणा पुत्री नहीं दूँगी।"

श्लोक 5 (shiva.rudra.95.5)

न मन्यसे वचो चेन्मे मरिष्यामि न संशयः । त्यक्ष्यामि च गृहं सद्यो भक्षयिष्यामि वा विषम्

na manyase vaco cenme mariṣyāmi na saṁśayaḥ tyakṣyāmi ca gṛhaṁ sadyo bhakṣayiṣyāmi vā viṣam

"यदि आप मेरी बात नहीं मानेंगे, तो मैं निश्चय ही मर जाऊँगी; मैं तुरंत घर त्याग दूँगी, या विष खा लूँगी।"

श्लोक 6 (shiva.rudra.95.6)

गले बद्ध्वाम्बिकां रज्ज्वा यास्यामि गहनं वनम् । महाम्बुधौ मज्जयिष्ये तस्मै दास्यामि नो सुताम्

gale baddhvāmbikāṁ rajjvā yāsyāmi gahanaṁ vanam mahāmbudhau majjayiṣye tasmai dāsyāmi no sutām

"गले में रस्सी बाँधकर मैं घने वन में चली जाऊँगी; महासागर में डूब जाऊँगी -- उसे मैं अपनी पुत्री नहीं दूँगी।"

श्लोक 7 (shiva.rudra.95.7)

इत्युक्त्वाशु तथा गत्वा मेना कोपालयं शुचा । त्यक्त्वा हारं रुदन्ती सा चकार शयनं भुवि

ityuktvāśu tathā gatvā menā kopālayaṁ śucā tyaktvā hāraṁ rudantī sā cakāra śayanaṁ bhuvi

"यह कहकर मेना क्रोध और शोक से शीघ्र अपने कक्ष में गई; हार उतारकर, रोती हुई वह भूमि पर लेट गई।"

श्लोक 8 (shiva.rudra.95.8)

एतस्मिन्नन्तरे तात शम्भुना सप्त एव ते । संस्मृता ऋषयः सद्यो विरहव्याकुलात्मना

etasminnantare tāta śambhunā sapta eva te saṁsmṛtā ṛṣayaḥ sadyo virahavyākulātmanā

"इसी बीच हे तात! विरह से व्याकुल-मन शम्भु ने तत्काल उन्हीं सप्तर्षियों का स्मरण किया।"

श्लोक 9 (shiva.rudra.95.9)

ऋषयश्चैव ते सर्वे शम्भुना संस्मृता यदा । तदाजग्मुः स्वयं सद्यः कल्पवृक्षा इवापरे

ṛṣayaścaiva te sarve śambhunā saṁsmṛtā yadā tadājagmuḥ svayaṁ sadyaḥ kalpavṛkṣā ivāpare

"जब शम्भु द्वारा वे सब ऋषि इस प्रकार स्मरण किए गए, तब वे मानो अन्य कल्पवृक्षों की भाँति स्वयं तत्काल आ गए।"

श्लोक 10 (shiva.rudra.95.10)

अरुन्धती तथायाता साक्षात्सिद्धिरिवापरा । तान्दृष्ट्वा सूर्यसङ्काशान्विजहौ स्वजपं हरः

arundhatī tathāyātā sākṣātsiddhirivāparā tāndṛṣṭvā sūryasaṅkāśānvijahau svajapaṁ haraḥ

"अरुन्धती भी इस प्रकार आईं, मानो साक्षात् सिद्धि की एक और मूर्ति हों; सूर्य के समान तेजस्वी उन्हें देखकर हर ने अपना जप छोड़ दिया।"

श्लोक 11 (shiva.rudra.95.11)

स्थित्वाग्रे ऋषयः श्रेष्ठा नत्वा स्तुत्वा शिवं मुने । मेनिरे च तदात्मानं कृतार्थं ते तपस्विनः

sthitvāgre ṛṣayaḥ śreṣṭhā natvā stutvā śivaṁ mune menire ca tadātmānaṁ kṛtārthaṁ te tapasvinaḥ

"हे मुने! उनके समक्ष खड़े होकर उन श्रेष्ठ ऋषियों ने प्रणाम कर शिव की स्तुति की; और उन तपस्वियों ने उस क्षण अपने को कृतार्थ माना।"

श्लोक 12 (shiva.rudra.95.12)

ततो विस्मयमापन्ना नमस्कृत्य स्थिताः पुनः । प्रोचुः प्राञ्जलयस्ते वै शिवं लोकनमस्कृतम्

tato vismayamāpannā namaskṛtya sthitāḥ punaḥ procuḥ prāñjalayaste vai śivaṁ lokanamaskṛtam

"तब विस्मित होकर उन्होंने पुनः नमस्कार कर स्थिति ली; हाथ जोड़े हुए उन्होंने लोक-वन्दित शिव से कहा।"

श्लोक 13 (shiva.rudra.95.13)

ऋषय ऊचुः । सर्वोत्कृष्ट महाराज सार्वभौम दिवौकसाम् । स्वभाग्यं वर्ण्यतेऽस्माभिः किं पुनः सकलोत्तमम्

ṛṣaya ūcuḥ sarvotkṛṣṭa mahārāja sārvabhauma divaukasām svabhāgyaṁ varṇyate'smābhiḥ kiṁ punaḥ sakalottamam

ऋषियों ने कहा -- "हे महाराज! हे देवताओं में सर्वोत्कृष्ट सार्वभौम! हम अपने सौभाग्य का वर्णन करते हैं -- फिर आप सर्वश्रेष्ठ के विषय में क्या कहा जाए?"

श्लोक 14 (shiva.rudra.95.14)

तपस्तप्तं त्रिधा पूर्वं वेदाध्ययनमुत्तमम् । अग्नयश्च हुताः पूर्वं तीर्थानि विविधानि च

tapastaptaṁ tridhā pūrvaṁ vedādhyayanamuttamam agnayaśca hutāḥ pūrvaṁ tīrthāni vividhāni ca

"पूर्व में जो त्रिविध तप तपा गया, जो उत्तम वेदाध्ययन हुआ, पूर्वकाल में जो अग्नि-होम हुए और जो नाना तीर्थ किए गए --"

श्लोक 15 (shiva.rudra.95.15)

वाङ्मनः कायजं किञ्चित्पुण्यं स्मरणसम्भवम् । तत्सर्वं सङ्गतं चाद्य स्मरणानुग्रहात्तव

vāṅmanaḥ kāyajaṁ kiñcitpuṇyaṁ smaraṇasambhavam tatsarvaṁ saṅgataṁ cādya smaraṇānugrahāttava

"वाणी, मन और शरीर से उत्पन्न जो कुछ भी पुण्य स्मरण से उत्पन्न होता है -- वह सब आज आपके स्मरण-अनुग्रह से एकत्र हो गया।"

श्लोक 16 (shiva.rudra.95.16)

यो वै भजति नित्यं त्वां कृतकृत्यो भवेन्नरः । किं पुण्यं वर्ण्यते तेषां येषां च स्मरणं तव

yo vai bhajati nityaṁ tvāṁ kṛtakṛtyo bhavennaraḥ kiṁ puṇyaṁ varṇyate teṣāṁ yeṣāṁ ca smaraṇaṁ tava

"जो सदा आपको भजता है, वह कृतकृत्य हो जाता है; फिर उनके लिए क्या पुण्य कहा जाए जिन्हें आप स्वयं स्मरण करते हैं?"

श्लोक 17 (shiva.rudra.95.17)

सर्वोत्कृष्टा वयं जाताः स्मरणात्ते सदाशिव । मनोरथपथं नैव गच्छसि त्वं कथञ्चन

sarvotkṛṣṭā vayaṁ jātāḥ smaraṇātte sadāśiva manorathapathaṁ naiva gacchasi tvaṁ kathañcana

"हे सदाशिव! आपके स्मरण से हम सर्वोत्कृष्ट हो गए; आप किसी भी प्रकार मनोरथ के मार्ग से कभी नहीं चूकते।"

श्लोक 18 (shiva.rudra.95.18)

वामनस्य फलं यद्वज्जन्मान्धस्य दृशौ यथा । वाचालत्वञ्च मूकस्य रङ्कस्य निधिदर्शनम्

vāmanasya phalaṁ yadvajjanmāndhasya dṛśau yathā vācālatvañca mūkasya raṅkasya nidhidarśanam

"जैसे बौने के लिए [ऊँचाई का] फल, जन्मांध के लिए नेत्र, गूँगे के लिए वाणी, दरिद्र के लिए निधि-दर्शन --"

श्लोक 19 (shiva.rudra.95.19)

पङ्गोर्गिरिवराक्रान्तिर्वन्ध्यायाः प्रसवस्तथा । दर्शनं भवतस्तद्वज्जातं नो दुर्लभं प्रभो

paṅgorgirivarākrāntirvandhyāyāḥ prasavastathā darśanaṁ bhavatastadvajjātaṁ no durlabhaṁ prabho

"जैसे लंगड़े के लिए महान पर्वत को लाँघना, बाँझ के लिए संतान होना -- वैसे ही, हे प्रभो! आपका यह दुर्लभ दर्शन हमें प्राप्त हुआ।"

श्लोक 20 (shiva.rudra.95.20)

अद्यप्रभृति लोकेषु मान्याः पूज्या मुनीश्वराः । जातास्ते दर्शनादेव स्वमुच्चैः पदमाश्रिताः

adyaprabhṛti lokeṣu mānyāḥ pūjyā munīśvarāḥ jātāste darśanādeva svamuccaiḥ padamāśritāḥ

"आज से लोक में मुनीश्वर मान्य और पूज्य होंगे -- क्योंकि इस दर्शन मात्र से ही उन्होंने अपना उच्च पद प्राप्त कर लिया।"

श्लोक 21 (shiva.rudra.95.21)

अत्र किं बहुनोक्तेन सर्वथा मान्यतां गताः । दर्शनात्तव देवेश सर्वदेवेश्वरस्य हि

atra kiṁ bahunoktena sarvathā mānyatāṁ gatāḥ darśanāttava deveśa sarvadeveśvarasya hi

"यहाँ अधिक कहने से क्या? हे देवेश! हे सर्वदेवेश्वर! आपके दर्शन मात्र से हम सर्वथा मान्यता को प्राप्त हो गए।"

श्लोक 22 (shiva.rudra.95.22)

पूर्णानां किञ्च कर्तव्यमस्ति चेत्परमा कृपा । सदृशं सेवकानां तु देयं कार्यं त्वया शुभम्

pūrṇānāṁ kiñca kartavyamasti cetparamā kṛpā sadṛśaṁ sevakānāṁ tu deyaṁ kāryaṁ tvayā śubham

"और यदि पूर्णकाम लोगों के लिए भी कोई कार्य शेष हो, तो वह परम कृपा है; आपके सेवकों के योग्य जो शुभ कार्य हो, वह आप हमें सौंपिए।"

श्लोक 23 (shiva.rudra.95.23)

ब्रह्मोवाच । इत्येवं वचनं श्रुत्वा तेषां शम्भुर्महेश्वरः । लौकिकाचारमाश्रित्य रम्यं वाक्यमुपाददे

brahmovāca ityevaṁ vacanaṁ śrutvā teṣāṁ śambhurmaheśvaraḥ laukikācāramāśritya ramyaṁ vākyamupādade

ब्रह्मा ने कहा -- "उनके इन वचनों को सुनकर शम्भु महेश्वर ने लौकिक आचार का आश्रय लेकर मधुर वचन कहे।"

श्लोक 24 (shiva.rudra.95.24)

शिव उवाच । ऋषयश्च सदा पूज्या भवन्तश्च विशेषतः । युष्माकं कारणाद्विप्राः स्मरणं च मया कृतम्

śiva uvāca ṛṣayaśca sadā pūjyā bhavantaśca viśeṣataḥ yuṣmākaṁ kāraṇādviprāḥ smaraṇaṁ ca mayā kṛtam

शिव ने कहा -- "मुनि सदा पूज्य हैं, और आप विशेष रूप से; हे विप्रो! आपके ही निमित्त मैंने स्मरण किया है।"

श्लोक 25 (shiva.rudra.95.25)

ममावस्था भवद्भिश्च ज्ञायते ह्युपकारिका । साधनीया विशेषेण लोकानां सिद्धिहेतवे

mamāvasthā bhavadbhiśca jñāyate hyupakārikā sādhanīyā viśeṣeṇa lokānāṁ siddhihetave

"मेरी वर्तमान अवस्था आप लोगों द्वारा उपकारी जानी जाती है; लोकों की सिद्धि के लिए इसे विशेष रूप से सिद्ध किया जाना चाहिए।"

श्लोक 26 (shiva.rudra.95.26)

देवानां दुःखमुत्पन्नं तारकात्सुदुरात्मनः । ब्रह्मणा च वरो दत्तः किं करोमि दुरासदः

devānāṁ duḥkhamutpannaṁ tārakātsudurātmanaḥ brahmaṇā ca varo dattaḥ kiṁ karomi durāsadaḥ

"अत्यंत दुरात्मा तारक से देवताओं को दुःख उत्पन्न हुआ है; और ब्रह्मा ने उसे वर दिया है -- मैं क्या करूँ, वह तो दुरासद है।"

श्लोक 27 (shiva.rudra.95.27)

मूर्तयोऽष्टौ च याः प्रोक्ता मदीयाः परमर्षयः । ताः सर्वा उपकाराय न तु स्वार्थाय तत्स्फुटम्

mūrtayo'ṣṭau ca yāḥ proktā madīyāḥ paramarṣayaḥ tāḥ sarvā upakārāya na tu svārthāya tatsphuṭam

"जो आठ मूर्तियाँ मेरी कही गई हैं, हे परमर्षियो! वे सभी स्पष्टतः दूसरों के उपकार के लिए हैं, अपने स्वार्थ के लिए नहीं।"

श्लोक 28 (shiva.rudra.95.28)

तथा च कर्तुकामोऽहं विवाहं शिवया सह । तया वै सुतपस्तप्तं दुष्करं परमर्षिभिः

tathā ca kartukāmo'haṁ vivāhaṁ śivayā saha tayā vai sutapastaptaṁ duṣkaraṁ paramarṣibhiḥ

"उसी प्रकार मैं शिवा के साथ विवाह करना चाहता हूँ; उन्होंने ऐसा उत्तम तप तपा है, जो परमर्षियों के लिए भी दुष्कर है।"

श्लोक 29 (shiva.rudra.95.29)

तस्यै परं फलं देयमभीष्टं तद्धितावहम् । एतादृशः पणो मे हि भक्तानन्दप्रदः स्फुटम्

tasyai paraṁ phalaṁ deyamabhīṣṭaṁ taddhitāvaham etādṛśaḥ paṇo me hi bhaktānandapradaḥ sphuṭam

"उसे वह परम, अभीष्ट, हितकारी फल दिया जाना चाहिए; यही मेरी प्रतिज्ञा है, जो स्पष्टतः भक्तों को आनन्द देने वाली है।"

श्लोक 30 (shiva.rudra.95.30)

पार्वतीवचनाद्भिक्षुरूपो यातो गिरेर्गृहम् । अहं पावितवान्कालीं यतो लीलाविशारदः

pārvatīvacanādbhikṣurūpo yāto girergṛham ahaṁ pāvitavānkālīṁ yato līlāviśāradaḥ

"पार्वती के वचन से मैं भिक्षु-रूप में पर्वत के घर गया; लीला में निपुण होने के कारण मैंने काली को पवित्र करने के लिए ऐसा किया।"

श्लोक 31 (shiva.rudra.95.31)

मां ज्ञात्वा तौ परं ब्रह्म दम्पती परभक्तितः । दातुकामावभूतां च स्वसुतां वेदरीतितः

māṁ jñātvā tau paraṁ brahma dampatī parabhaktitaḥ dātukāmāvabhūtāṁ ca svasutāṁ vedarītitaḥ

"मुझे परब्रह्म जानकर उस दम्पती ने परम भक्ति से वेद-रीति के अनुसार अपनी पुत्री देने की इच्छा की।"

श्लोक 32 (shiva.rudra.95.32)

देवप्रेरणयाहं वै कृतवानस्मि निन्दनम् । तदा स्वस्य च तद्भक्तिं विहन्तुं वैष्णवात्मना

devapreraṇayāhaṁ vai kṛtavānasmi nindanam tadā svasya ca tadbhaktiṁ vihantuṁ vaiṣṇavātmanā

"देवताओं की प्रेरणा से मैंने तब वैष्णव-रूप में अपनी ही निन्दा की, अपने प्रति उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए।"

श्लोक 33 (shiva.rudra.95.33)

तच्छ्रुत्वा तौ सुनिर्विण्णौ तद्धीनौ सम्बभूवतुः । स्वकन्यां नेच्छतो दातुं मह्यं हि मुनयोऽधुना

tacchrutvā tau sunirviṇṇau taddhīnau sambabhūvatuḥ svakanyāṁ necchato dātuṁ mahyaṁ hi munayo'dhunā

"यह सुनकर वे दोनों अत्यंत निराश हो गए और उससे अभिभूत हो गए; अब, हे मुनियो! वे मुझे अपनी पुत्री देने को इच्छुक नहीं हैं।"

श्लोक 34 (shiva.rudra.95.34)

तस्माद्भवन्तो गच्छन्तु हिमाचलगृहं ध्रुवम् । तत्र गत्वा गिरिवरं तत्पत्नीञ्च प्रबोधय

tasmādbhavanto gacchantu himācalagṛhaṁ dhruvam tatra gatvā girivaraṁ tatpatnīñca prabodhaya

"अतः आप निश्चय ही हिमाचल के घर जाइए; वहाँ जाकर उस श्रेष्ठ पर्वत और उनकी पत्नी को समझाइए।"

श्लोक 35 (shiva.rudra.95.35)

कथनीयं प्रयत्नेन वचनं वेदसम्मितम् । सर्वथा करणीयं तद्यथा स्यात्कार्यमुत्तमम्

kathanīyaṁ prayatnena vacanaṁ vedasammitam sarvathā karaṇīyaṁ tadyathā syātkāryamuttamam

"प्रयत्नपूर्वक वेदसम्मत वचन कहे जाने चाहिए; सर्वथा वह किया जाना चाहिए जिससे कार्य उत्तम रूप से सिद्ध हो।"

श्लोक 36 (shiva.rudra.95.36)

उद्वाहं कर्तुमिच्छामि तत्पुत्र्या सह सत्तमाः । स्वीकृतस्तद्विवाहो मे वरो दत्तश्च तादृशः

udvāhaṁ kartumicchāmi tatputryā saha sattamāḥ svīkṛtastadvivāho me varo dattaśca tādṛśaḥ

"हे सत्तमो! मैं उनकी पुत्री के साथ विवाह करना चाहता हूँ; वह विवाह मेरे द्वारा स्वीकार किया जा चुका है, और वैसा वर मेरे द्वारा दिया जा चुका है।"

श्लोक 37 (shiva.rudra.95.37)

अत्र किं बहुनोक्तेन बोधनीयो हिमालयः । तथा मेना च बोद्धव्या देवानां स्याद्धितं यथा

atra kiṁ bahunoktena bodhanīyo himālayaḥ tathā menā ca boddhavyā devānāṁ syāddhitaṁ yathā

"यहाँ अधिक कहने से क्या? हिमालय को समझाया जाना चाहिए, और मेना को भी समझाया जाना चाहिए, जिससे देवताओं का हित हो।"

श्लोक 38 (shiva.rudra.95.38)

भवद्भिः कल्पितो यो वै विधिः स्यादधिकस्ततः । भवताञ्चैव कार्यं तु भवन्तः कार्यभागिनः

bhavadbhiḥ kalpito yo vai vidhiḥ syādadhikastataḥ bhavatāñcaiva kāryaṁ tu bhavantaḥ kāryabhāginaḥ

"आपके द्वारा जो विधि रची जाएगी, वह अन्य किसी से भी बढ़कर होगी; और यह कार्य आपका ही है, आप ही इस कार्य के भागी हैं।"

श्लोक 39 (shiva.rudra.95.39)

ब्रह्मोवाच । इत्येवं वचनं श्रुत्वा मुनयस्तेऽमलाशयाः । आनन्दं लेभिरे सर्वे प्रभुणानुग्रहीकृताः

brahmovāca ityevaṁ vacanaṁ śrutvā munayaste'malāśayāḥ ānandaṁ lebhire sarve prabhuṇānugrahīkṛtāḥ

ब्रह्मा ने कहा -- "यह वचन सुनकर वे निर्मल-हृदय मुनि सभी प्रभु की कृपा से अनुगृहीत होकर परम आनन्द को प्राप्त हुए।"

श्लोक 40 (shiva.rudra.95.40)

वयं धन्या अभूवंश्च कृतकृत्याश्च सर्वथा । वन्द्या जाताश्च सर्वेषां पूजनीया विशेषतः

vayaṁ dhanyā abhūvaṁśca kṛtakṛtyāśca sarvathā vandyā jātāśca sarveṣāṁ pūjanīyā viśeṣataḥ

"'हम धन्य हुए और सर्वथा कृतकृत्य हुए; हम सबके वन्दनीय और विशेष रूप से पूजनीय हो गए।'"

श्लोक 41 (shiva.rudra.95.41)

ब्रह्मणा विष्णुना यो वै वन्द्यः सर्वार्थसाधकः । सोऽस्मान्प्रेषयते प्रेष्यान्कार्ये लोकसुखावहे

brahmaṇā viṣṇunā yo vai vandyaḥ sarvārthasādhakaḥ so'smānpreṣayate preṣyānkārye lokasukhāvahe

"'जो ब्रह्मा और विष्णु द्वारा वन्दित हैं, सर्वार्थसाधक हैं, वे ही हमें, अपने सेवकों को, लोक-सुखकर कार्य में भेज रहे हैं।'"

श्लोक 42 (shiva.rudra.95.42)

अयं वै जगतां स्वामी पिता सा जननी मता । अयं युक्तश्च सम्बन्धो वर्द्धतां चन्द्रवत्सदा

ayaṁ vai jagatāṁ svāmī pitā sā jananī matā ayaṁ yuktaśca sambandho varddhatāṁ candravatsadā

"'यही जगत् के स्वामी और पिता हैं, और वे माता हैं; यह उपयुक्त सम्बन्ध चन्द्रमा के समान सदा बढ़ता रहे।'"

श्लोक 43 (shiva.rudra.95.43)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा ऋषयो दिव्या नमस्कृत्य शिवं तदा । गता आकाशमार्गेण यत्रास्ति हिमवत्पुरम्

brahmovāca ityuktvā ṛṣayo divyā namaskṛtya śivaṁ tadā gatā ākāśamārgeṇa yatrāsti himavatpuram

ब्रह्मा ने कहा -- "यह कहकर वे दिव्य ऋषि शिव को प्रणाम कर आकाश-मार्ग से वहाँ गए, जहाँ हिमवान की नगरी थी।"

श्लोक 44 (shiva.rudra.95.44)

दृष्ट्वा तां च पुरीं दिव्यां ऋषयस्तेऽतिविस्मिताः । वर्णयन्तश्च स्वं पुण्यमब्रुवन्वै परस्परम्

dṛṣṭvā tāṁ ca purīṁ divyāṁ ṛṣayaste'tivismitāḥ varṇayantaśca svaṁ puṇyamabruvanvai parasparam

"उस दिव्य नगरी को देखकर वे अत्यंत विस्मित ऋषि अपने पुण्य का वर्णन करते हुए आपस में बोले।"

श्लोक 45 (shiva.rudra.95.45)

ऋषय ऊचुः । पुण्यवन्तो वयं धन्या दृष्ट्वैतद्धिमवत्पुरम् । यस्मादेवंविधे कार्ये शिवेनैव नियोजिताः

ṛṣaya ūcuḥ puṇyavanto vayaṁ dhanyā dṛṣṭvaitaddhimavatpuram yasmādevaṁvidhe kārye śivenaiva niyojitāḥ

ऋषियों ने कहा -- "हम पुण्यवान हैं, हम धन्य हैं, कि हमने हिमवान की यह नगरी देखी; क्योंकि हमें स्वयं शिव द्वारा ऐसे कार्य में नियुक्त किया गया है।"

श्लोक 46 (shiva.rudra.95.46)

अलकायाश्च स्वर्गाच्च भोगवत्यास्तथा पुनः । विशेषेणामरावत्या दृश्यते पुरमुत्तमम्

alakāyāśca svargācca bhogavatyāstathā punaḥ viśeṣeṇāmarāvatyā dṛśyate puramuttamam

"अलका, स्वर्ग, भोगवती से भी, और विशेष रूप से अमरावती से भी बढ़कर यह उत्तम नगरी दिखाई देती है।"

श्लोक 47 (shiva.rudra.95.47)

सुगृहाणि सुरम्याणि स्फटिकैर्विविधैर्वरैः । मणिभिर्वा विचित्राणि रचितान्यङ्गणानि च

sugṛhāṇi suramyāṇi sphaṭikairvividhairvaraiḥ maṇibhirvā vicitrāṇi racitānyaṅgaṇāni ca

"सुंदर, अत्यंत रमणीय घर, विविध उत्तम स्फटिकों या मणियों से विचित्र रूप से रचित आँगन।"

श्लोक 48 (shiva.rudra.95.48)

सूर्यकान्ताश्च मणयश्चन्द्रकान्तास्तथैव च । गृहे गृहे विचित्राश्च वृक्षाः स्वर्गसमुद्भवाः

sūryakāntāśca maṇayaścandrakāntāstathaiva ca gṛhe gṛhe vicitrāśca vṛkṣāḥ svargasamudbhavāḥ

"सूर्यकांत तथा चन्द्रकांत मणियाँ भी, घर-घर में, और स्वर्ग से उत्पन्न विचित्र वृक्ष।"

श्लोक 49 (shiva.rudra.95.49)

तोरणानां तथा लक्ष्मीर्दृश्यते च गृहे गृहे । विविधानि विचित्राणि शुकहंसैर्विमानकैः

toraṇānāṁ tathā lakṣmīrdṛśyate ca gṛhe gṛhe vividhāni vicitrāṇi śukahaṁsairvimānakaiḥ

"तोरणों की शोभा भी घर-घर में दिखाई देती है, विविध और विचित्र, शुक-हंसों और विमानिकाओं से युक्त।"

श्लोक 50 (shiva.rudra.95.50)

वितानानि विचित्राणि चैलवत्तोरणैः सह । जलाशयान्यनेकानि दीर्घिका विविधाः स्थिताः

vitānāni vicitrāṇi cailavattoraṇaiḥ saha jalāśayānyanekāni dīrghikā vividhāḥ sthitāḥ

"विचित्र चंदोवे वस्त्रयुक्त तोरणों के साथ; अनेक जलाशय और विविध दीर्घिकाएँ स्थित थीं।"

श्लोक 51 (shiva.rudra.95.51)

उद्यानानि विचित्राणि प्रसन्नैः पूजितान्यथ । नराश्च देवताः सर्वे स्त्रियश्चाप्सरसस्तथा

udyānāni vicitrāṇi prasannaiḥ pūjitānyatha narāśca devatāḥ sarve striyaścāpsarasastathā

"प्रसन्नतापूर्वक संवारे गए विचित्र उद्यान, तथा मनुष्य, समस्त देवता, स्त्रियाँ और अप्सराएँ भी वहाँ थीं।"

श्लोक 52 (shiva.rudra.95.52)

कर्मभूमौ याज्ञिकाश्च पौराणाः स्वर्गकाम्यया । कुर्वन्ति ते वृथा सर्वे विहाय हिमवत्पुरम्

karmabhūmau yājñikāśca paurāṇāḥ svargakāmyayā kurvanti te vṛthā sarve vihāya himavatpuram

"कर्मभूमि के याज्ञिक और पुरवासी हिमवत्पुरी को छोड़कर स्वर्ग की कामना से व्यर्थ ही परिश्रम करते हैं।"

श्लोक 53 (shiva.rudra.95.53)

यावन्न दृष्टमेतच्च तावत्स्वर्गपरा नराः । दृष्ट्मेतद्यदा विप्राः किं स्वर्गेण प्रयोजनम्

yāvanna dṛṣṭametacca tāvatsvargaparā narāḥ dṛṣṭmetadyadā viprāḥ kiṁ svargeṇa prayojanam

"जब तक यह नहीं देखा जाता, तब तक लोग स्वर्ग की ओर उन्मुख रहते हैं; परन्तु हे विप्रो! इसे देख लेने पर स्वर्ग से क्या प्रयोजन?"

श्लोक 54 (shiva.rudra.95.54)

ब्रह्मोवाच । इत्येवमृषिवर्यास्ते वर्णयन्तः पुरञ्च तत् । गता हैमालयं सर्वे गृहं सर्वसमृद्धिमत्

brahmovāca ityevamṛṣivaryāste varṇayantaḥ purañca tat gatā haimālayaṁ sarve gṛhaṁ sarvasamṛddhimat

ब्रह्मा ने कहा -- "इस प्रकार उस नगरी का वर्णन करते हुए वे श्रेष्ठ ऋषि सब समृद्धिपूर्ण हिमालय के घर पहुँचे।"

श्लोक 55 (shiva.rudra.95.55)

तान्दृष्ट्वा सूर्यसङ्काशान् हिमवान्विस्मितोऽब्रवीत् । दूरादाकाशमार्गस्थान्मुनीन्सप्त सुतेजसः

tāndṛṣṭvā sūryasaṅkāśān himavānvismito'bravīt dūrādākāśamārgasthānmunīnsapta sutejasaḥ

"आकाश-मार्ग में दूर से सूर्य के समान तेजस्वी उन सप्तर्षियों को देखकर हिमवान विस्मित होकर बोले।"

श्लोक 56 (shiva.rudra.95.56)

हिमवानुवाच । सप्तैते सूर्यसङ्काशाः समायान्ति मदन्तिके । पूजा कार्या प्रयत्नेन मुनीनां च मयाधुना

himavānuvāca saptaite sūryasaṅkāśāḥ samāyānti madantike pūjā kāryā prayatnena munīnāṁ ca mayādhunā

हिमवान ने कहा -- "सूर्य के समान तेजस्वी ये सातों मेरे निकट आ रहे हैं; मुझे अब प्रयत्नपूर्वक इन मुनियों की पूजा करनी चाहिए।"

श्लोक 57 (shiva.rudra.95.57)

वयं धन्या गृहस्थाश्च सर्वेषां सुखदायिनः । येषां गृहे समायान्ति महात्मानो यदीदृशाः

vayaṁ dhanyā gṛhasthāśca sarveṣāṁ sukhadāyinaḥ yeṣāṁ gṛhe samāyānti mahātmāno yadīdṛśāḥ

"हम गृहस्थ धन्य हैं और सबके सुखदायी हैं, जिनके घर ऐसे महात्मा पधारते हैं।"

श्लोक 58 (shiva.rudra.95.58)

ब्रह्मोवाच । एतस्मिन्नन्तरे चैवाकाशादेत्य भुवि स्थितान् । सम्मुखे हिमवान्दृष्ट्वा ययौ मानपुरस्सरम्

brahmovāca etasminnantare caivākāśādetya bhuvi sthitān sammukhe himavāndṛṣṭvā yayau mānapurassaram

ब्रह्मा ने कहा -- "इसी बीच आकाश से उतरकर सामने भूमि पर खड़े उन्हें देखकर हिमवान सम्मानपूर्वक आगे बढ़े।"

श्लोक 59 (shiva.rudra.95.59)

कृताञ्जलिर्नतस्कन्धः सप्तर्षीन्सुप्रणम्य सः । पूजां चकार तेषां वै बहुमानपुरस्सरम्

kṛtāñjalirnataskandhaḥ saptarṣīnsupraṇamya saḥ pūjāṁ cakāra teṣāṁ vai bahumānapurassaram

"हाथ जोड़े, कंधे झुकाए, सप्तर्षियों को भलीभाँति प्रणाम कर उन्होंने अत्यंत सम्मानपूर्वक उनकी पूजा की।"

श्लोक 60 (shiva.rudra.95.60)

हिताः सप्तर्षयस्ते च हिमवन्तं नगेश्वरम् । गृहीत्वोचुः प्रसन्नास्या वचनं मङ्गलालयम्

hitāḥ saptarṣayaste ca himavantaṁ nageśvaram gṛhītvocuḥ prasannāsyā vacanaṁ maṅgalālayam

"उन कल्याणकारी सप्तर्षियों ने पर्वतेश्वर हिमवान का हाथ पकड़कर, प्रसन्नमुख होकर मंगल के आगार ऐसे वचन कहे।"

श्लोक 61 (shiva.rudra.95.61)

यथाग्रतश्च तान्कृत्वा धन्यो मम गृहाश्रमः । इत्युक्त्वासनमानीय ददौ भक्तिपुरस्सरम्

yathāgrataśca tānkṛtvā dhanyo mama gṛhāśramaḥ ityuktvāsanamānīya dadau bhaktipurassaram

"'मेरा गृहस्थाश्रम धन्य हो गया, क्योंकि मैंने इन्हें सबसे आगे स्थान दिया' -- यह कहकर वे आसन लाकर भक्तिपूर्वक भेंट करने लगे।"

श्लोक 62 (shiva.rudra.95.62)

आसनेषूपविष्टेषु तदाज्ञप्तः स्वयं स्थितः । उवाच हिमवांस्तत्र मुनीन् ज्योतिर्मयांस्तदा

āsaneṣūpaviṣṭeṣu tadājñaptaḥ svayaṁ sthitaḥ uvāca himavāṁstatra munīn jyotirmayāṁstadā

"जब वे आसनों पर विराजमान हो गए, और वे स्वयं उनकी आज्ञा से वहीं खड़े रहे, तब हिमवान ने उन ज्योतिर्मय मुनियों से कहा।"

श्लोक 63 (shiva.rudra.95.63)

हिमालय उवाच । धन्यो हि कृतकृत्योऽहं सफलं जीवितं मम । लोकेषु दर्शनीयोऽहं बहुतीर्थसमो मतः

himālaya uvāca dhanyo hi kṛtakṛtyo'haṁ saphalaṁ jīvitaṁ mama lokeṣu darśanīyo'haṁ bahutīrthasamo mataḥ

हिमालय ने कहा -- "मैं धन्य और कृतकृत्य हूँ, मेरा जीवन सफल हुआ; अब मैं लोक में अनेक तीर्थों के समान दर्शनीय माना जाऊँगा।"

श्लोक 64 (shiva.rudra.95.64)

यस्माद्भवन्तो मद्गेहमागता विष्णुरूपिणः । पूर्णानां भवतां कार्यं कृपणानां गृहेषु किम्

yasmādbhavanto madgehamāgatā viṣṇurūpiṇaḥ pūrṇānāṁ bhavatāṁ kāryaṁ kṛpaṇānāṁ gṛheṣu kim

"चूँकि आप विष्णुस्वरूप होकर मेरे घर पधारे हैं -- आप जैसे पूर्णकाम व्यक्ति को हम जैसे दीनों के घर क्या कार्य हो सकता है?"

श्लोक 65 (shiva.rudra.95.65)

तथापि किञ्चित्कार्यं च सदृशं सेवकस्य मे । कथनीयं सुदयया सफलं स्याज्जनुर्मम

tathāpi kiñcitkāryaṁ ca sadṛśaṁ sevakasya me kathanīyaṁ sudayayā saphalaṁ syājjanurmama

"फिर भी आपके सेवक के योग्य जो भी कार्य हो, वह मुझे बड़ी कृपा से बताइए; तभी मेरा यह जन्म सफल होगा।"

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