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रुद्र संहिता · अध्याय 97

अनरण्यचरितवर्णनम्

अध्याय 96अध्याय-सूचीअध्याय 98

श्लोक 1 (shiva.rudra.97.1)

वसिष्ठ उवाच । मनोर्वंशोद्भवो राजा सोऽनरण्यो नृपेश्वरः । इन्द्रसावर्णिसंज्ञस्य चतुर्दशमितस्य हि

vasiṣṭha uvāca manorvaṁśodbhavo rājā so'naraṇyo nṛpeśvaraḥ indrasāvarṇisaṁjñasya caturdaśamitasya hi

वसिष्ठ ने कहा -- "वह राजा अनरण्य, नृपेश्वर, मनु के वंश में उत्पन्न हुआ था -- उस मनु के, जो इन्द्रसावर्णि नाम से चौदहवें मनु कहलाते हैं।"

श्लोक 2 (shiva.rudra.97.2)

अनरण्यो नृपश्रेष्ठः सप्तद्वीपमहीपतिः । शम्भुभक्तो विशेषेण मङ्गलारण्यजो बली

anaraṇyo nṛpaśreṣṭhaḥ saptadvīpamahīpatiḥ śambhubhakto viśeṣeṇa maṅgalāraṇyajo balī

"अनरण्य, राजाओं में श्रेष्ठ, सप्त द्वीपों वाली पृथ्वी के स्वामी थे; वे विशेष रूप से शम्भु के भक्त, मङ्गलारण्य में जन्मे बलशाली राजा थे।"

श्लोक 3 (shiva.rudra.97.3)

भृगुं पुरोधसं कृत्वा शतं यज्ञांश्चकार सः । न स्वीचकार शक्रत्वं दीयमानं सुरैरपि

bhṛguṁ purodhasaṁ kṛtvā śataṁ yajñāṁścakāra saḥ na svīcakāra śakratvaṁ dīyamānaṁ surairapi

"भृगु को अपना पुरोहित बनाकर उन्होंने सौ यज्ञ किए; परन्तु देवताओं द्वारा दिए जाने पर भी उन्होंने इन्द्र-पद स्वीकार नहीं किया।"

श्लोक 4 (shiva.rudra.97.4)

बभूवुः शतपुत्राश्च राज्ञस्तस्य हिमालय । कन्यैका सुन्दरी नाम्ना पद्मा पद्मालया समा

babhūvuḥ śataputrāśca rājñastasya himālaya kanyaikā sundarī nāmnā padmā padmālayā samā

"हे हिमालय! उस राजा के सौ पुत्र थे और एक सुन्दर कन्या थी, जिसका नाम पद्मा था, जो पद्मालया (लक्ष्मी) के समान थी।"

श्लोक 5 (shiva.rudra.97.5)

यः स्नेहः पुत्रशतके कन्यायाञ्च ततोऽधिकः । नृपस्य तस्य तस्यां हि बभूव नगसत्तम

yaḥ snehaḥ putraśatake kanyāyāñca tato'dhikaḥ nṛpasya tasya tasyāṁ hi babhūva nagasattama

"हे नगसत्तम! राजा को अपने सौ पुत्रों से जितना स्नेह था, उससे भी अधिक स्नेह उस कन्या से था।"

श्लोक 6 (shiva.rudra.97.6)

प्राणाधिका प्रियतमा महिष्यः सर्वयोषितः । नृपस्य पत्न्यः पञ्चासन् सर्वाः सौभाग्यसंयुताः

prāṇādhikā priyatamā mahiṣyaḥ sarvayoṣitaḥ nṛpasya patnyaḥ pañcāsan sarvāḥ saubhāgyasaṁyutāḥ

"वह प्राणों से भी अधिक प्रिय और सभी स्त्रियों से बढ़कर प्रियतमा थी। राजा की पाँच रानियाँ थीं, जो सभी सौभाग्यशालिनी थीं।"

श्लोक 7 (shiva.rudra.97.7)

सा कन्या यौवनस्था च बभूव स्वपितुर्गृहे । पत्रं प्रस्थापयामास सुवरानयनाय सः

sā kanyā yauvanasthā ca babhūva svapiturgṛhe patraṁ prasthāpayāmāsa suvarānayanāya saḥ

"वह कन्या यौवनावस्था को प्राप्त होकर अपने पिता के घर में ही रहती थी; राजा ने उपयुक्त वर लाने के लिए पत्र भेजे।"

श्लोक 8 (shiva.rudra.97.8)

एकदा पिप्पलादर्षिर्गन्तुं स्वाश्रममुत्सुकः । तपःस्थाने निर्जने च गन्धर्वं स ददर्श ह

ekadā pippalādarṣirgantuṁ svāśramamutsukaḥ tapaḥsthāne nirjane ca gandharvaṁ sa dadarśa ha

"एक बार सन्मुनि पिप्पलाद अपने आश्रम को जाने के लिए उत्सुक होकर एक निर्जन तपःस्थान में एक गन्धर्व को देखा।"

श्लोक 9 (shiva.rudra.97.9)

स्त्रीयुतं मग्नचित्तं च शृङ्गारे रससागरे । विहरन्तं महाप्रेम्णा कामशास्त्रविशारदम्

strīyutaṁ magnacittaṁ ca śṛṅgāre rasasāgare viharantaṁ mahāpremṇā kāmaśāstraviśāradam

"-- वह गन्धर्व एक स्त्री के साथ, शृंगार-रस के सागर में मग्नचित्त होकर, अत्यंत प्रेम से विहार करता हुआ, कामशास्त्र में निपुण था।"

श्लोक 10 (shiva.rudra.97.10)

दृष्ट्वा तं मुनिशार्दूलः सकामः सम्बभूव सः । तपःस्वदत्तचित्तश्चाचिन्तयद्दारसङ्ग्रहम्

dṛṣṭvā taṁ muniśārdūlaḥ sakāmaḥ sambabhūva saḥ tapaḥsvadattacittaścācintayaddārasaṅgraham

"उसे देखकर वह मुनिश्रेष्ठ स्वयं भी कामासक्त हो गया; जिसका चित्त पहले तपस्या में लगा था, वह अब पत्नी प्राप्त करने का विचार करने लगा।"

श्लोक 11 (shiva.rudra.97.11)

एवंवृत्तस्य तस्यैव पिप्पलादस्य सन्मुनेः । कियत्कालो गतस्तत्र कामोन्मथितचेतसः

evaṁvṛttasya tasyaiva pippalādasya sanmuneḥ kiyatkālo gatastatra kāmonmathitacetasaḥ

"इस प्रकार के आचरण वाले उस सन्मुनि पिप्पलाद के, जिसका चित्त काम से व्याकुल हो गया था, वहाँ कुछ समय बीत गया।"

श्लोक 12 (shiva.rudra.97.12)

एकदा पुष्पभद्रायां स्नातुं गच्छन्मुनीश्वरः । ददर्श पद्मां युवतीं पद्मामिव मनोरमाम्

ekadā puṣpabhadrāyāṁ snātuṁ gacchanmunīśvaraḥ dadarśa padmāṁ yuvatīṁ padmāmiva manoramām

"एक दिन पुष्पभद्रा नदी में स्नान करने जाते हुए उस मुनीश्वर ने युवती पद्मा को देखा, जो पद्मा (लक्ष्मी) के समान मनोहर थी।"

श्लोक 13 (shiva.rudra.97.13)

केयं कन्येति पप्रच्छ समीपस्थाञ्जनान्मुनिः । जना निवेदयाञ्चक्रुर्नत्वा शापनियन्त्रिताः

keyaṁ kanyeti papraccha samīpasthāñjanānmuniḥ janā nivedayāñcakrurnatvā śāpaniyantritāḥ

"मुनि ने पास खड़े लोगों से पूछा, 'यह कन्या कौन है?' शाप के भय से नियंत्रित लोगों ने प्रणाम कर उन्हें बता दिया।"

श्लोक 14 (shiva.rudra.97.14)

जना ऊचुः । अनरण्यसुतेयं वै पद्मा नाम रमापरा । वरारोहा प्रार्थ्यमाना नृपश्रेष्ठैर्गुणालया

janā ūcuḥ anaraṇyasuteyaṁ vai padmā nāma ramāparā varārohā prārthyamānā nṛpaśreṣṭhairguṇālayā

लोगों ने कहा -- "यह अनरण्य की पुत्री है, नाम से पद्मा, मानो दूसरी रमा (लक्ष्मी); सुंदर अंगों वाली, गुणों की आश्रयस्थली, जिसे श्रेष्ठ राजा माँग रहे हैं।"

श्लोक 15 (shiva.rudra.97.15)

ब्रह्मोवाच । तच्छ्रुत्वा स मुनिर्वाक्यं जनानां तथ्यवादिनाम् । चुक्षोभातीव मनसि तल्लिप्सुरभवच्च सः

brahmovāca tacchrutvā sa munirvākyaṁ janānāṁ tathyavādinām cukṣobhātīva manasi tallipsurabhavacca saḥ

ब्रह्मा ने कहा -- "उन सत्यवादी लोगों का यह वचन सुनकर, मुनि का मन अत्यंत विचलित हो गया और वे उसे पाने के इच्छुक हो गए।"

श्लोक 16 (shiva.rudra.97.16)

मुनिः स्नात्वाभीष्टदेवं सम्पूज्य विधिवच्छिवम् । जगाम कामी भिक्षार्थमनरण्यसभां गिरे

muniḥ snātvābhīṣṭadevaṁ sampūjya vidhivacchivam jagāma kāmī bhikṣārthamanaraṇyasabhāṁ gire

"हे गिरे! स्नान करके अपने इष्टदेव शिव की विधिवत् पूजा करके, वह कामातुर मुनि भिक्षा माँगने अनरण्य की सभा में गया।"

श्लोक 17 (shiva.rudra.97.17)

राजा शीघ्रं मुनिं दृष्ट्वा प्रणनाम भयाकुलः । मधुपर्कादिकं दत्त्वा पूजयामास भक्तितः

rājā śīghraṁ muniṁ dṛṣṭvā praṇanāma bhayākulaḥ madhuparkādikaṁ dattvā pūjayāmāsa bhaktitaḥ

"राजा ने मुनि को देखते ही भयाकुल होकर शीघ्र प्रणाम किया; मधुपर्क आदि अर्पण कर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की।"

श्लोक 18 (shiva.rudra.97.18)

कामात्सर्वं गृहीत्वा च ययाचे कन्यकां मुनिः । मौनी बभूव नृपतिः किञ्चिन्निर्वक्तुमक्षमः

kāmātsarvaṁ gṛhītvā ca yayāce kanyakāṁ muniḥ maunī babhūva nṛpatiḥ kiñcinnirvaktumakṣamaḥ

"काम के वशीभूत होकर सब कुछ ग्रहण करने के पश्चात् मुनि ने कन्या माँगी। राजा कुछ भी कह पाने में असमर्थ होकर मौन हो गए।"

श्लोक 19 (shiva.rudra.97.19)

मुनिर्ययाचे कन्यां स तां देहीति नृपेश्वर । अन्यथा भस्मसात्सर्वं करिष्यामि क्षणेन च

muniryayāce kanyāṁ sa tāṁ dehīti nṛpeśvara anyathā bhasmasātsarvaṁ kariṣyāmi kṣaṇena ca

"मुनि ने पुनः कन्या माँगते हुए कहा, 'हे नृपेश्वर! उसे मुझे दे दो, अन्यथा मैं क्षणभर में सब कुछ भस्म कर दूँगा।'"

श्लोक 20 (shiva.rudra.97.20)

सर्वे बभूवुराच्छन्ना गणास्तत्तेजसा मुने । रुदोद राजा सगणो दृष्ट्वा विप्रं जरातुरम्

sarve babhūvurācchannā gaṇāstattejasā mune rudoda rājā sagaṇo dṛṣṭvā vipraṁ jarāturam

"हे मुने! सारी सभा उस तेज से आच्छादित हो गई; राजा अपने परिजनों सहित उस वृद्धावस्था से पीड़ित ब्राह्मण को देखकर रो पड़ा।"

श्लोक 21 (shiva.rudra.97.21)

महिष्यो रुरुदुस्सर्वा इतिकर्तव्यताक्षमाः । मूर्च्छामाप महाराज्ञी कन्यामाता शुचाकुला

mahiṣyo rurudussarvā itikartavyatākṣamāḥ mūrcchāmāpa mahārājñī kanyāmātā śucākulā

"सभी रानियाँ यह न समझ पाने से कि क्या करना उचित होगा, रोने लगीं; कन्या की माता, महारानी, शोक से व्याकुल होकर मूर्छित हो गईं।"

श्लोक 22 (shiva.rudra.97.22)

बभूवुस्तनयाः सर्वे शोकाकुलितमानसाः । सर्वं शोकाकुलं जातं नृपसम्बन्धि शैलप

babhūvustanayāḥ sarve śokākulitamānasāḥ sarvaṁ śokākulaṁ jātaṁ nṛpasambandhi śailapa

"सभी पुत्र शोक से व्याकुल-चित्त हो गए; हे शैलप! राजा से सम्बंधित सब कुछ शोकाकुल हो गया।"

श्लोक 23 (shiva.rudra.97.23)

एतस्मिन्नन्तरे प्राज्ञो द्विजो गुरुरनुत्तमः । पुरोहितश्च मतिमान् आगतो नृपसन्निधिम्

etasminnantare prājño dvijo gururanuttamaḥ purohitaśca matimān āgato nṛpasannidhim

"इसी बीच बुद्धिमान् द्विज, राजा के अनुपम गुरु, तथा मतिमान् पुरोहित राजा के पास आए।"

श्लोक 24 (shiva.rudra.97.24)

राजा प्रणम्य सम्पूज्य रुदोद च तयोः पुरः । सर्वं निवेदयाञ्चक्रे पप्रच्छोचितमाशु तत्

rājā praṇamya sampūjya rudoda ca tayoḥ puraḥ sarvaṁ nivedayāñcakre papracchocitamāśu tat

"राजा ने उन दोनों को प्रणाम कर, पूजा कर, उनके सामने रोते हुए सब कुछ निवेदन किया और शीघ्र ही उचित उपाय पूछा।"

श्लोक 25 (shiva.rudra.97.25)

अथ राज्ञो गुरुर्विप्रः पण्डितश्च पुरोहितः । अपि द्वौ शास्त्रनीतिज्ञौ बोधयामासतुर्नृपम्

atha rājño gururvipraḥ paṇḍitaśca purohitaḥ api dvau śāstranītijñau bodhayāmāsaturnṛpam

"तब राजा के गुरु, विद्वान् ब्राह्मण, और पण्डित पुरोहित -- ये दोनों शास्त्र-नीति के ज्ञाता -- राजा को समझाने लगे।"

श्लोक 26 (shiva.rudra.97.26)

शोकाकुलांश्च महिषीर्नृपबालांश्च कन्यकाम् । उत्तमां नीतिमादृत्य सर्वेषां हितकारिणीम्

śokākulāṁśca mahiṣīrnṛpabālāṁśca kanyakām uttamāṁ nītimādṛtya sarveṣāṁ hitakāriṇīm

"उन्होंने शोक-व्याकुल रानियों, राजकुमारों तथा उस कन्या को भी, सबके लिए हितकारी उत्तम नीति का आदर करते हुए, समझाया।"

श्लोक 27 (shiva.rudra.97.27)

गुरुपुरोधसावूचतुः शृणु राजन्महाप्राज्ञ वचो नौ सद्धितावहम् । मा शुचः सपरीवारः शास्त्रे कुरु मतिं सतीम्

gurupurodhasāvūcatuḥ śṛṇu rājanmahāprājña vaco nau saddhitāvaham mā śucaḥ saparīvāraḥ śāstre kuru matiṁ satīm

गुरु और पुरोहित दोनों ने कहा -- "हे महाप्राज्ञ राजन्! हमारा यह वचन सुनो, जो तुम्हारे लिए वास्तव में हितकर है। तुम अपने परिवार सहित शोक मत करो, और शास्त्र में सत्य बुद्धि लगाओ।"

श्लोक 28 (shiva.rudra.97.28)

अद्य वाब्ददिनान्ते वा दातव्या कन्यका नृप । पात्राय विप्रायान्यस्मै कस्मैचिद्वा विशेषतः

adya vābdadinānte vā dātavyā kanyakā nṛpa pātrāya viprāyānyasmai kasmaicidvā viśeṣataḥ

"हे राजन्! यह कन्या आज ही अथवा वर्ष के अंत में किसी योग्य पात्र ब्राह्मण को, चाहे यही हो या कोई अन्य विशेष रूप से, देनी ही होगी।"

श्लोक 29 (shiva.rudra.97.29)

सत्पात्रं ब्राह्मणादन्यं न पश्यावो जगत्त्रये । सुतां दत्त्वा च मुनये रक्ष स्वां सर्वसम्पदम्

satpātraṁ brāhmaṇādanyaṁ na paśyāvo jagattraye sutāṁ dattvā ca munaye rakṣa svāṁ sarvasampadam

"तीनों लोकों में हमें ब्राह्मण से बढ़कर कोई सत्पात्र दिखाई नहीं देता। अपनी पुत्री उस मुनि को देकर अपनी समस्त सम्पत्ति की रक्षा करो।"

श्लोक 30 (shiva.rudra.97.30)

राजन्नेकनिमित्तेन सर्वसम्पद्विनश्यति । सर्वं रक्षति तं त्यक्त्वा विना तं शरणागतम्

rājannekanimittena sarvasampadvinaśyati sarvaṁ rakṣati taṁ tyaktvā vinā taṁ śaraṇāgatam

"हे राजन्! एक ही कारण से सम्पूर्ण सम्पत्ति नष्ट हो सकती है; किन्तु उस एक को त्यागकर, शरणागत व्यक्ति शेष सब कुछ बचा लेता है।"

श्लोक 31 (shiva.rudra.97.31)

वसिष्ठ उवाच । राजा प्राज्ञवचः श्रुत्वा विलप्य च मुहुर्मुहुः । कन्यां सालङ्कृतां कृत्वा मुनीन्द्राय ददौ किल

vasiṣṭha uvāca rājā prājñavacaḥ śrutvā vilapya ca muhurmuhuḥ kanyāṁ sālaṅkṛtāṁ kṛtvā munīndrāya dadau kila

वसिष्ठ ने कहा -- "उन विद्वानों के वचन सुनकर तथा बार-बार विलाप करते हुए, राजा ने कन्या को आभूषणों से सजाकर उस मुनीन्द्र को दे दिया।"

श्लोक 32 (shiva.rudra.97.32)

कान्तां गृहीत्वा स मुनिर्विवाह्य विधिवद्गिरे । पद्मां पद्मोपमां तां वै मुदितःस्वालयं ययौ

kāntāṁ gṛhītvā sa munirvivāhya vidhivadgire padmāṁ padmopamāṁ tāṁ vai muditaḥsvālayaṁ yayau

"हे गिरे! वह मुनि अपनी प्रियतमा पद्मा को, जो पद्मा (लक्ष्मी) के समान थी, विधिवत् विवाह कर हर्षित होकर अपने आश्रम को चला गया।"

श्लोक 33 (shiva.rudra.97.33)

राजा सर्वान्परित्यज्य दत्त्वा वृद्धाय चात्मजाम् । ग्लानिं चित्ते समाधाय जगाम तपसे वनम्

rājā sarvānparityajya dattvā vṛddhāya cātmajām glāniṁ citte samādhāya jagāma tapase vanam

"राजा ने सब कुछ त्यागकर, अपनी पुत्री उस वृद्ध को देकर, हृदय में ग्लानि धारण करते हुए, तपस्या के लिए वन को प्रस्थान किया।"

श्लोक 34 (shiva.rudra.97.34)

तद्भार्यापि वनं याते प्राणनाथे तदा गिरे । भर्तुश्च दुहितुः शोकात्प्राणांस्तत्याज सुन्दरी

tadbhāryāpi vanaṁ yāte prāṇanāthe tadā gire bhartuśca duhituḥ śokātprāṇāṁstatyāja sundarī

"हे गिरे! जब उनके प्राणनाथ वन को चले गए, तब वह सुंदरी रानी अपने पति और पुत्री के शोक से अपने प्राण त्याग बैठी।"

श्लोक 35 (shiva.rudra.97.35)

पूज्याः पुत्राश्च भृत्याश्च मूर्च्छामापुर्नृपं विना । शुशुचुः श्वाससंयुक्ता ज्ञात्वा सर्वेऽपरे जनाः

pūjyāḥ putrāśca bhṛtyāśca mūrcchāmāpurnṛpaṁ vinā śuśucuḥ śvāsasaṁyuktā jñātvā sarve'pare janāḥ

"पूज्य पुत्रगण और सेवकगण राजा के बिना मूर्छित हो गए; अन्य सभी लोग यह जानकर लम्बी साँसें लेते हुए शोकाकुल हो गए।"

श्लोक 36 (shiva.rudra.97.36)

अनरण्यो वनं गत्वा तपस्तप्त्वाति शङ्करम् । समाराध्य ययौ भक्त्या शिवलोकमनामयम्

anaraṇyo vanaṁ gatvā tapastaptvāti śaṅkaram samārādhya yayau bhaktyā śivalokamanāmayam

"अनरण्य वन में जाकर अत्यंत कठोर तप करते हुए, भक्तिपूर्वक शंकर की आराधना करके, निर्दोष शिवलोक को प्राप्त हुए।"

श्लोक 37 (shiva.rudra.97.37)

नृपस्य कीर्तिमान्नाम्ना ज्येष्ठपुत्रोऽथ धार्मिकः । पुत्रवत्पालयामास प्रजा राज्यं चकार ह

nṛpasya kīrtimānnāmnā jyeṣṭhaputro'tha dhārmikaḥ putravatpālayāmāsa prajā rājyaṁ cakāra ha

"तत्पश्चात् राजा के ज्येष्ठ पुत्र, धार्मिक कीर्तिमान् नामक, ने राज्य किया और प्रजा का पुत्रवत् पालन किया।"

श्लोक 38 (shiva.rudra.97.38)

इति ते कथितं शैलानरण्यचरितं शुभम् । कन्यां दत्त्वा यथारक्षद्वंशं चाप्यखिलं धनम्

iti te kathitaṁ śailānaraṇyacaritaṁ śubham kanyāṁ dattvā yathārakṣadvaṁśaṁ cāpyakhilaṁ dhanam

"हे शैल! इस प्रकार तुम्हें अनरण्य का यह शुभ चरित्र सुनाया गया -- कि कैसे कन्या देकर उन्होंने अपने वंश तथा समस्त धन की रक्षा की।"

श्लोक 39 (shiva.rudra.97.39)

शैलराज त्वमप्येवं सुतां दत्त्वा शिवाय च । रक्ष सर्वकुलं सर्वान्वशान्कुरु सुरानपि

śailarāja tvamapyevaṁ sutāṁ dattvā śivāya ca rakṣa sarvakulaṁ sarvānvaśānkuru surānapi

"हे शैलराज! उसी प्रकार तुम भी अपनी कन्या शिव को देकर अपने सम्पूर्ण कुल की रक्षा करो और देवताओं को भी अपने वश में कर लो।"

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