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रुद्र संहिता · अध्याय 98

पद्मापिप्पलादचरितवर्णनम्

अध्याय 97अध्याय-सूचीअध्याय 99

श्लोक 1 (shiva.rudra.98.1)

नारद उवाच । अनरण्यस्य चरितं सुतादानसमन्वितम् । श्रुत्वा गिरिवरस्तात किं चकार च तद्वद

nārada uvāca anaraṇyasya caritaṁ sutādānasamanvitam śrutvā girivarastāta kiṁ cakāra ca tadvada

नारद ने कहा -- "हे तात! कन्या-दान सहित अनरण्य का चरित्र सुनकर, पर्वतश्रेष्ठ ने फिर क्या किया, यह बताइए।"

श्लोक 2 (shiva.rudra.98.2)

ब्रह्मोवाच । अनरण्यस्य चरितं कन्यादानसमन्वितम् । श्रुत्वा पप्रच्छ शैलेशो वसिष्ठं साञ्जलिः पुनः

brahmovāca anaraṇyasya caritaṁ kanyādānasamanvitam śrutvā papraccha śaileśo vasiṣṭhaṁ sāñjaliḥ punaḥ

ब्रह्मा ने कहा -- "अनरण्य का कन्यादान सहित चरित्र सुनकर, शैलेश ने हाथ जोड़कर पुनः वसिष्ठ से पूछा।"

श्लोक 3 (shiva.rudra.98.3)

शैलेश उवाच । वसिष्ठ मुनिशार्दूल ब्रह्मपुत्र कृपानिधे । अनरण्यचरित्रन्ते कथितं परमाद्भुतम्

śaileśa uvāca vasiṣṭha muniśārdūla brahmaputra kṛpānidhe anaraṇyacaritrante kathitaṁ paramādbhutam

शैलेश ने कहा -- "हे वसिष्ठ मुनिश्रेष्ठ! हे ब्रह्मपुत्र! हे कृपानिधे! अनरण्य का यह परम अद्भुत चरित्र आपने मुझे सुनाया।"

श्लोक 4 (shiva.rudra.98.4)

अनरण्यसुता यस्मात् पिप्पलादं मुनिं पतिम् । सम्प्राप्य किमकार्षीत्सा तच्चरित्रं मुदावहम्

anaraṇyasutā yasmāt pippalādaṁ muniṁ patim samprāpya kimakārṣītsā taccaritraṁ mudāvaham

"अनरण्य की पुत्री ने मुनि पिप्पलाद को पति रूप में पाकर आगे क्या किया? वह आनन्ददायक चरित्र मुझे सुनाइए।"

श्लोक 5 (shiva.rudra.98.5)

वसिष्ठ उवाच । पिप्पलादो मुनिवरो वयसा जर्जरोऽधिकः । गत्वा निजाश्रमं नार्यानरण्यसुतया तया

vasiṣṭha uvāca pippalādo munivaro vayasā jarjaro'dhikaḥ gatvā nijāśramaṁ nāryānaraṇyasutayā tayā

वसिष्ठ ने कहा -- "अत्यंत वृद्धावस्था से जर्जर श्रेष्ठ मुनि पिप्पलाद, अनरण्य की उस पुत्री के साथ अपने आश्रम को गए।"

श्लोक 6 (shiva.rudra.98.6)

उवास तत्र सुप्रीत्या तपस्वी नातिलम्पटः । तत्रारण्ये गिरिवरे स नित्यं निजधर्मकृत्

uvāsa tatra suprītyā tapasvī nātilampaṭaḥ tatrāraṇye girivare sa nityaṁ nijadharmakṛt

"वहाँ वे तपस्वी, अधिक विषयासक्त न होकर, प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे; हे गिरिवर! उस वन में वे नित्य अपने धर्म का पालन करते रहे।"

श्लोक 7 (shiva.rudra.98.7)

अथानरण्यकन्या सा सिषेवे भक्तितो मुनिम् । कर्मणा मनसा वाचा लक्ष्मीर्नारायणं यथा

athānaraṇyakanyā sā siṣeve bhaktito munim karmaṇā manasā vācā lakṣmīrnārāyaṇaṁ yathā

"तब अनरण्य की उस पुत्री ने कर्म, मन और वाणी से भक्तिपूर्वक मुनि की सेवा की, जैसे लक्ष्मी नारायण की सेवा करती हैं।"

श्लोक 8 (shiva.rudra.98.8)

एकदा स्वर्णदीं स्नातुं गच्छन्तीं सुस्मितां च ताम् । ददर्श पथि धर्मश्च मायया नृपरूपधृक्

ekadā svarṇadīṁ snātuṁ gacchantīṁ susmitāṁ ca tām dadarśa pathi dharmaśca māyayā nṛparūpadhṛk

"एक दिन जब वह सुहासिनी स्वर्णनदी में स्नान करने जा रही थी, तब मार्ग में धर्म ने माया से राजा का रूप धारण कर उसे देखा।"

श्लोक 9 (shiva.rudra.98.9)

चारुरत्नरथस्थश्च नानालङ्कारभूषितः । नवीनयौवनश्श्रीमान्कामदेवसमप्रभः

cāruratnarathasthaśca nānālaṅkārabhūṣitaḥ navīnayauvanaśśrīmānkāmadevasamaprabhaḥ

"वह सुन्दर रत्नजड़ित रथ पर बैठा, विविध आभूषणों से सुशोभित, नवयौवन-सम्पन्न, श्रीमान् और कामदेव के समान तेजस्वी था।"

श्लोक 10 (shiva.rudra.98.10)

दृष्ट्वा तां सुन्दरीं पद्मामुवाच स वृषो विभुः । विज्ञातुं भावमन्तःस्थं तस्याश्च मुनियोषितः

dṛṣṭvā tāṁ sundarīṁ padmāmuvāca sa vṛṣo vibhuḥ vijñātuṁ bhāvamantaḥsthaṁ tasyāśca muniyoṣitaḥ

"उस सुंदरी पद्मा को देखकर उस वृषरूपधारी विभु ने, उस मुनि-पत्नी के अन्तःस्थ भाव को जानने के लिए, उससे कहा।"

श्लोक 11 (shiva.rudra.98.11)

धर्म उवाच । अयि सुन्दरि लक्ष्मीर्वै राजयोग्ये मनोहरे । अतीव यौवनस्थे च कामिनि स्थिरयौवने

dharma uvāca ayi sundari lakṣmīrvai rājayogye manohare atīva yauvanasthe ca kāmini sthirayauvane

धर्म ने कहा -- "हे सुंदरी! हे राजयोग्य लक्ष्मी के समान मनोहर! अत्यंत यौवनावस्था में स्थित, स्थिर यौवन वाली कामिनी! --"

श्लोक 12 (shiva.rudra.98.12)

जरातुरस्य वृद्धस्य पिप्पलादस्य वै मुनेः । सत्यं वदामि तन्वङ्गि समीपे नैव राजसे

jarāturasya vṛddhasya pippalādasya vai muneḥ satyaṁ vadāmi tanvaṅgi samīpe naiva rājase

"-- हे तन्वंगि! मैं सत्य कहता हूँ, वृद्धावस्था से पीड़ित उस वृद्ध मुनि पिप्पलाद के समीप तुम शोभा नहीं पातीं।"

श्लोक 13 (shiva.rudra.98.13)

विप्रं तपस्सु निरतं निर्घृणं मरणोन्मुखम् । त्यक्त्वा मां पश्य राजेन्द्रं रतिशूरं स्मरातुरम्

vipraṁ tapassu nirataṁ nirghṛṇaṁ maraṇonmukham tyaktvā māṁ paśya rājendraṁ ratiśūraṁ smarāturam

"तपस्या में लीन, स्नेहरहित, मृत्यु के निकट खड़े उस विप्र को छोड़कर, मुझ राजेन्द्र को देखो, जो रतिशूर और तुम्हारे प्रेम से व्याकुल हूँ।"

श्लोक 14 (shiva.rudra.98.14)

प्राप्नोति सुन्दरी पुण्यात्सौन्दर्यं पूर्वजन्मनः । सफलं तद्भवेत्सर्वं रसिकालिङ्गनेन च

prāpnoti sundarī puṇyātsaundaryaṁ pūrvajanmanaḥ saphalaṁ tadbhavetsarvaṁ rasikāliṅganena ca

"सुंदरी अपने पूर्वजन्म के पुण्य से सौंदर्य प्राप्त करती है; वह सब तभी सफल होता है जब कोई रसिक पुरुष उसका आलिंगन करे।"

श्लोक 15 (shiva.rudra.98.15)

सहस्रसुन्दरीकान्तं कामशास्त्रविशारदम् । किङ्करं कुरु मां कान्ते सम्परित्यज्य तं पतिम्

sahasrasundarīkāntaṁ kāmaśāstraviśāradam kiṅkaraṁ kuru māṁ kānte samparityajya taṁ patim

"हे कान्ते! सहस्र सुंदरियों के प्रियतम और कामशास्त्र में निपुण मुझ को अपना दास बना लो, उस पति को त्यागकर।"

श्लोक 16 (shiva.rudra.98.16)

निर्जने कानने रम्ये शैले शैले नदीतटे । विहरस्व मया सार्धं जन्मेदं सफलं कुरु

nirjane kānane ramye śaile śaile nadītaṭe viharasva mayā sārdhaṁ janmedaṁ saphalaṁ kuru

"निर्जन रमणीय वनों में, पर्वत-पर्वत पर, नदी-तटों पर, मेरे साथ विहार करो और अपने इस जन्म को सफल बनाओ।"

श्लोक 17 (shiva.rudra.98.17)

वसिष्ठ उवाच । इत्येवमुक्तवन्तं सा स्वरथादवरुह्य च । ग्रहीतुमुत्सुकं हस्ते तमुवाच पतिव्रता

vasiṣṭha uvāca ityevamuktavantaṁ sā svarathādavaruhya ca grahītumutsukaṁ haste tamuvāca pativratā

वसिष्ठ ने कहा -- "इस प्रकार कहते हुए, अपने रथ से उतरकर हाथ पकड़ने को उत्सुक उस पुरुष से, उस पतिव्रता स्त्री ने यह कहा।"

श्लोक 18 (shiva.rudra.98.18)

पद्मोवाच । गच्छ दूरं गच्छ दूरं पापिष्ठस्त्वं नराधिप । मां चेत्पश्यसि कामेन सद्यो नष्टो भविष्यसि

padmovāca gaccha dūraṁ gaccha dūraṁ pāpiṣṭhastvaṁ narādhipa māṁ cetpaśyasi kāmena sadyo naṣṭo bhaviṣyasi

पद्मा ने कहा -- "हे नराधिप! तुम पापी हो, दूर हट जाओ, दूर हट जाओ! यदि तुमने काम-दृष्टि से मुझे देखा, तो तत्काल नष्ट हो जाओगे।"

श्लोक 19 (shiva.rudra.98.19)

पिप्पलादं मुनिश्रेष्ठं तपसा पूतविग्रहम् । त्यक्त्वा कथं भजेयं त्वां स्त्रीजितं रतिलम्पटम्

pippalādaṁ muniśreṣṭhaṁ tapasā pūtavigraham tyaktvā kathaṁ bhajeyaṁ tvāṁ strījitaṁ ratilampaṭam

"तपस्या से पवित्र शरीर वाले मुनिश्रेष्ठ पिप्पलाद को त्यागकर, मैं स्त्रियों से जीते गए, विषयलम्पट तुझ जैसे को कैसे चाहूँ?"

श्लोक 20 (shiva.rudra.98.20)

स्त्रीजितस्पर्शमात्रेण सर्वं पुण्यं प्रणश्यति । स्त्रीजितः परपापी च तद्दर्शनमघावहम्

strījitasparśamātreṇa sarvaṁ puṇyaṁ praṇaśyati strījitaḥ parapāpī ca taddarśanamaghāvaham

"स्त्री से जीते गए पुरुष के स्पर्श मात्र से समस्त पुण्य नष्ट हो जाता है; स्त्री से जीता हुआ पुरुष महापापी है, और उसका दर्शन भी पापदायक है।"

श्लोक 21 (shiva.rudra.98.21)

सत्क्रियो ह्यशुचिर्नित्यं स पुमान् यः स्त्रिया जितः । निन्दन्ति पितरो देवा मानवाः सकलाश्च तम्

satkriyo hyaśucirnityaṁ sa pumān yaḥ striyā jitaḥ nindanti pitaro devā mānavāḥ sakalāśca tam

"जो पुरुष सत्कर्मी होते हुए भी स्त्री से जीता जाता है, वह सदा अशुद्ध रहता है; पितर, देवता और समस्त मनुष्य उसकी निंदा करते हैं।"

श्लोक 22 (shiva.rudra.98.22)

तस्य किं ज्ञान सुतपोजपहोमप्रपूजनैः । विद्यया दानतः किं वा स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम्

tasya kiṁ jñāna sutapojapahomaprapūjanaiḥ vidyayā dānataḥ kiṁ vā strībhiryasya mano hṛtam

"जिसका मन स्त्रियों द्वारा हर लिया गया हो, उसे ज्ञान, उत्तम तप, जप, हवन और पूजा से क्या लाभ? विद्या या दान से भी क्या लाभ?"

श्लोक 23 (shiva.rudra.98.23)

मातरं मां स्त्रियो भावं कृत्वा येन ब्रवीषि ह । भविष्यति क्षयस्तेन कालेन मम शापतः

mātaraṁ māṁ striyo bhāvaṁ kṛtvā yena bravīṣi ha bhaviṣyati kṣayastena kālena mama śāpataḥ

"मुझ माता के समान स्त्री का भाव करके भी जिस प्रकार तुमने मुझसे यह कहा, उसके कारण मेरे शाप से समय के साथ तुम्हारा क्षय होगा।"

श्लोक 24 (shiva.rudra.98.24)

वसिष्ठ उवाच । श्रुत्वा धर्मः सतीशापं नृपमूर्तिं विहाय च । धृत्वा स्वमूर्तिं देवेशः कम्पमान उवाच सः

vasiṣṭha uvāca śrutvā dharmaḥ satīśāpaṁ nṛpamūrtiṁ vihāya ca dhṛtvā svamūrtiṁ deveśaḥ kampamāna uvāca saḥ

वसिष्ठ ने कहा -- "उस सती के शाप को सुनकर, धर्म ने राजरूप त्यागकर अपना वास्तविक रूप धारण किया, और वे देवेश काँपते हुए बोले।"

श्लोक 25 (shiva.rudra.98.25)

धर्म उवाच । मातर्जानीहि मां धर्मं ज्ञानिनां च गुरोर्गुरुम् । परस्त्रीमातृबुद्धिं च कुर्वन्तं सततं सति

dharma uvāca mātarjānīhi māṁ dharmaṁ jñānināṁ ca gurorgurum parastrīmātṛbuddhiṁ ca kurvantaṁ satataṁ sati

धर्म ने कहा -- "हे माता! मुझे धर्म जानो, ज्ञानियों के गुरु का भी गुरु, जो पराई स्त्री के प्रति सदा माता की बुद्धि रखता हूँ, हे सति!"

श्लोक 26 (shiva.rudra.98.26)

अहं तवान्तरं ज्ञातुमागतस्तव सन्निधिम् । तवाहञ्च मनो जाने तथापि विधिनोदितः

ahaṁ tavāntaraṁ jñātumāgatastava sannidhim tavāhañca mano jāne tathāpi vidhinoditaḥ

"मैं तुम्हारा अन्तर्भाव जानने के लिए ही तुम्हारे समीप आया था; मैं तुम्हारे मन को पहले से ही जानता था, फिर भी विधि से प्रेरित होकर [ऐसा किया]।"

श्लोक 27 (shiva.rudra.98.27)

कृतं मे दमनं साध्वि न विरुद्धं यथोचितम् । शास्तिः समुत्पथस्थानामीश्वरेण विनिर्मिता

kṛtaṁ me damanaṁ sādhvi na viruddhaṁ yathocitam śāstiḥ samutpathasthānāmīśvareṇa vinirmitā

"हे साध्वि! तुमने जो मुझे दण्ड दिया है, वह अनुचित नहीं, अपितु यथोचित ही है; कुमार्गगामियों के लिए दण्ड स्वयं ईश्वर द्वारा विहित है।"

श्लोक 28 (shiva.rudra.98.28)

स्वयं प्रदाता सर्वेभ्यः सुखदुःखवरान्क्षमः । सम्पदं विपदं यो हि नमस्तस्मै शिवाय हि

svayaṁ pradātā sarvebhyaḥ sukhaduḥkhavarānkṣamaḥ sampadaṁ vipadaṁ yo hi namastasmai śivāya hi

"वे स्वयं सबको सुख-दुःख रूपी वर देने में समर्थ हैं; जो सम्पत्ति और विपत्ति दोनों देते हैं, उन शिव को नमस्कार है।"

श्लोक 29 (shiva.rudra.98.29)

शत्रुं मित्रं संविधातुं प्रीतिञ्च कलहं क्षमः । स्रष्टुं नष्टुं च यस्सृष्टिं नमस्तस्मै शिवाय हि

śatruṁ mitraṁ saṁvidhātuṁ prītiñca kalahaṁ kṣamaḥ sraṣṭuṁ naṣṭuṁ ca yassṛṣṭiṁ namastasmai śivāya hi

"जो शत्रु और मित्र दोनों बनाने में, प्रीति और कलह दोनों उत्पन्न करने में समर्थ हैं, जो सृष्टि की रचना और संहार दोनों करते हैं, उन शिव को नमस्कार है।"

श्लोक 30 (shiva.rudra.98.30)

येन शुक्लीकृतं क्षीरं जले शैत्यं कृतं पुरा । दाहीकृतो हुताशश्च नमस्तस्मै शिवाय हि

yena śuklīkṛtaṁ kṣīraṁ jale śaityaṁ kṛtaṁ purā dāhīkṛto hutāśaśca namastasmai śivāya hi

"जिसने प्राचीन काल में दूध को श्वेत बनाया, जल में शीतलता उत्पन्न की, और अग्नि को दाहक बनाया, उन शिव को नमस्कार है।"

श्लोक 31 (shiva.rudra.98.31)

प्रकृतिर्निर्मिता येन तत्त्वानि महदादितः । ब्रह्मविष्णुमहेशाद्या नमस्तस्मै शिवाय हि

prakṛtirnirmitā yena tattvāni mahadāditaḥ brahmaviṣṇumaheśādyā namastasmai śivāya hi

"जिसने प्रकृति की रचना की, महत् आदि तत्त्वों को बनाया, तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि को उत्पन्न किया, उन शिव को नमस्कार है।"

श्लोक 32 (shiva.rudra.98.32)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा पुरतस्तस्यास्तस्थौ धर्मो जगद्गुरुः । किञ्चिन्नोवाच चकितस्तत्पातिव्रत्यतोषितः

brahmovāca ityuktvā puratastasyāstasthau dharmo jagadguruḥ kiñcinnovāca cakitastatpātivratyatoṣitaḥ

ब्रह्मा ने कहा -- "ऐसा कहकर जगद्गुरु धर्म उसके सामने खड़े रहे; उसके पातिव्रत्य से संतुष्ट होकर, चकित होकर, कुछ भी नहीं कह सके।"

श्लोक 33 (shiva.rudra.98.33)

पद्मापि नृपकन्या सा पिप्पलादप्रिया तदा । साध्वी तं धर्ममाज्ञाय विस्मितोवाच पर्वत

padmāpi nṛpakanyā sā pippalādapriyā tadā sādhvī taṁ dharmamājñāya vismitovāca parvata

"हे पर्वत! तब वह राजकन्या पद्मा, पिप्पलाद की प्रिया, उस साध्वी ने धर्म को पहचानकर विस्मित होकर कहा।"

श्लोक 34 (shiva.rudra.98.34)

पद्मोवाच । त्वमेव धर्म सर्वेषां साक्षी निखिलकर्मणाम् । कथं मनो मे विज्ञातुं विडम्बयसि मां विभो

padmovāca tvameva dharma sarveṣāṁ sākṣī nikhilakarmaṇām kathaṁ mano me vijñātuṁ viḍambayasi māṁ vibho

पद्मा ने कहा -- "हे धर्म! आप ही समस्त प्राणियों के सभी कर्मों के साक्षी हैं। हे विभो! मेरा मन जानने के लिए आपने मेरा उपहास क्यों किया?"

श्लोक 35 (shiva.rudra.98.35)

यत्तत्सर्वं कृतं ब्रह्मन् नापराधो बभूव मे । त्वं च शप्तो मयाज्ञानात्स्त्रीस्वभावाद् वृथा वृष

yattatsarvaṁ kṛtaṁ brahman nāparādho babhūva me tvaṁ ca śapto mayājñānātstrīsvabhāvād vṛthā vṛṣa

"हे ब्रह्मन्! जो कुछ मैंने किया, वह मेरा अपराध नहीं था। हे वृष! अज्ञानवश और स्त्री-स्वभाव के कारण मैंने आपको व्यर्थ ही शाप दे दिया।"

श्लोक 36 (shiva.rudra.98.36)

का व्यवस्था भवेत्तस्य चिन्तयामीति साम्प्रतम् । चित्ते स्फुरतु सा बुद्धिर्यया शं संल्लभामि वै

kā vyavasthā bhavettasya cintayāmīti sāmpratam citte sphuratu sā buddhiryayā śaṁ saṁllabhāmi vai

"अब मैं यह विचार कर रही हूँ कि इसका क्या उपाय हो; मेरे चित्त में वह बुद्धि स्फुरित हो, जिससे मुझे शांति प्राप्त हो सके।"

श्लोक 37 (shiva.rudra.98.37)

आकाशोऽसौ दिशःसर्वा यदि नश्यन्तु वायवः । तथापि साध्वीशापस्तु न नश्यति कदाचन

ākāśo'sau diśaḥsarvā yadi naśyantu vāyavaḥ tathāpi sādhvīśāpastu na naśyati kadācana

"यदि आकाश, समस्त दिशाएँ और वायु भी नष्ट हो जाएँ, तो भी साध्वी का शाप कभी नष्ट नहीं होता।"

श्लोक 38 (shiva.rudra.98.38)

सत्ये पूर्णश्चतुष्पादः पौर्णमास्यां यथा शशी । विराजसे देवराज सर्वकालं दिवानिशम्

satye pūrṇaścatuṣpādaḥ paurṇamāsyāṁ yathā śaśī virājase devarāja sarvakālaṁ divāniśam

"सत्ययुग में आप, पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान, चतुष्पाद (चार पैरों वाले) पूर्ण रूप में, हे देवराज! सदा दिन-रात सुशोभित होते हैं।"

श्लोक 39 (shiva.rudra.98.39)

त्वं च नष्टो भवसि चेत्सृष्टिनाशो भवेत्तदा । इतिकर्तव्यतामूढा वृथापि च वदाम्यहम्

tvaṁ ca naṣṭo bhavasi cetsṛṣṭināśo bhavettadā itikartavyatāmūḍhā vṛthāpi ca vadāmyaham

"और यदि आप ही नष्ट हो जाएँ, तो सृष्टि का ही नाश हो जाएगा; क्या करना उचित है, यह न समझकर मैं व्यर्थ ही यह कह रही हूँ।"

श्लोक 40 (shiva.rudra.98.40)

पादक्षयश्च भविता त्रेतायां च सुरोत्तम । पादोऽपरे द्वापरे च तृतीयोऽपि कलौ विभो

pādakṣayaśca bhavitā tretāyāṁ ca surottama pādo'pare dvāpare ca tṛtīyo'pi kalau vibho

"हे सुरोत्तम! त्रेतायुग में आपके एक पैर का क्षय होगा, द्वापर में एक और, तथा हे विभो! कलियुग में तीसरे का भी।"

श्लोक 41 (shiva.rudra.98.41)

कलिशेषेऽखिलाश्छिन्ना भविष्यन्ति तवाङ्घ्रयः । पुनःसत्ये समायाते परिपूर्णो भविष्यसि

kaliśeṣe'khilāśchinnā bhaviṣyanti tavāṅghrayaḥ punaḥsatye samāyāte paripūrṇo bhaviṣyasi

"कलियुग के अंत तक आपके सभी पैर छिन्न हो जाएँगे; परन्तु पुनः सत्ययुग आने पर आप सम्पूर्ण हो जाएँगे।"

श्लोक 42 (shiva.rudra.98.42)

सत्ये सर्वव्यापकस्त्वं तदन्येषु च कुत्रचित् । युगव्यवस्थया स त्वं भविष्यसि यथा तथा

satye sarvavyāpakastvaṁ tadanyeṣu ca kutracit yugavyavasthayā sa tvaṁ bhaviṣyasi yathā tathā

"सत्ययुग में आप सर्वव्यापी हैं, अन्य युगों में कहीं आंशिक रूप में; इस प्रकार युग-व्यवस्था के अनुसार आप वैसे ही होते रहेंगे।"

श्लोक 43 (shiva.rudra.98.43)

इत्येवं वचनं सत्यं ममास्तु सुखदं तव । याम्यहं पतिसेवायै गच्छ त्वं स्वगृहं विभो

ityevaṁ vacanaṁ satyaṁ mamāstu sukhadaṁ tava yāmyahaṁ patisevāyai gaccha tvaṁ svagṛhaṁ vibho

"इस प्रकार मेरा यह वचन सत्य हो और तुम्हें सुखदायी हो। मैं अब अपने पति की सेवा के लिए जाती हूँ; हे विभो! तुम अपने धाम को जाओ।"

श्लोक 44 (shiva.rudra.98.44)

ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः सन्तुष्टोऽभूद् वृषः स वै । तदेवंवादिनीं साध्वीमुवाच विधिनन्दन

brahmovāca ityākarṇya vacastasyāḥ santuṣṭo'bhūd vṛṣaḥ sa vai tadevaṁvādinīṁ sādhvīmuvāca vidhinandana

ब्रह्मा ने कहा -- "हे विधिनन्दन! उसके वचन सुनकर वे वृषरूपधारी धर्म अत्यंत संतुष्ट हुए, और इस प्रकार कहने वाली उस साध्वी से बोले।"

श्लोक 45 (shiva.rudra.98.45)

धर्म उवाच । धन्यासि पतिभक्तासि स्वस्ति तेऽस्तु पतिव्रते । वरं गृहाण त्वत्स्वामी त्वत्परित्राणकारणात्

dharma uvāca dhanyāsi patibhaktāsi svasti te'stu pativrate varaṁ gṛhāṇa tvatsvāmī tvatparitrāṇakāraṇāt

धर्म ने कहा -- "तुम धन्य हो, पति-भक्ता हो; हे पतिव्रते! तुम्हारा कल्याण हो। यह वर ग्रहण करो -- तुम्हारी रक्षा के लिए तुम्हारे स्वामी --"

श्लोक 46 (shiva.rudra.98.46)

युवा भवतु ते भर्ता रतिशूरश्च धार्मिकः । रूपवान् गुणवान्वाग्मी सन्ततस्थिरयौवनः

yuvā bhavatu te bhartā ratiśūraśca dhārmikaḥ rūpavān guṇavānvāgmī santatasthirayauvanaḥ

"-- तुम्हारा पति युवा, रतिशूर तथा धार्मिक हो; रूपवान्, गुणवान्, वाक्पटु और सतत स्थिर यौवन वाला हो।"

श्लोक 47 (shiva.rudra.98.47)

चिरञ्जीवी स भवतु मार्कण्डेयात्परश्शुभे । कुबेराद्धनवांश्चैव शक्रादैश्वर्यवानपि

cirañjīvī sa bhavatu mārkaṇḍeyātparaśśubhe kuberāddhanavāṁścaiva śakrādaiśvaryavānapi

"हे शुभे! वे मार्कण्डेय से भी अधिक चिरंजीवी हों, कुबेर से भी अधिक धनवान्, तथा इन्द्र से भी अधिक ऐश्वर्यशाली हों।"

श्लोक 48 (shiva.rudra.98.48)

शिवभक्तो हरिसमस्सिद्धस्तु कपिलात्परः । बुद्ध्या बृहस्पतिसमः समत्वेन विधेः समः

śivabhakto harisamassiddhastu kapilātparaḥ buddhyā bṛhaspatisamaḥ samatvena vidheḥ samaḥ

"शिवभक्त, हरि के समान, कपिल से भी अधिक सिद्ध; बुद्धि में बृहस्पति के समान, समता में ब्रह्मा के समान हों।"

श्लोक 49 (shiva.rudra.98.49)

स्वामिसौभाग्यसंयुक्ता भव त्वं जीवनावधि । तथा च सुभगे देवि त्वं भव स्थिरयौवना

svāmisaubhāgyasaṁyuktā bhava tvaṁ jīvanāvadhi tathā ca subhage devi tvaṁ bhava sthirayauvanā

"जीवनपर्यन्त तुम अपने स्वामी के सौभाग्य से युक्त रहो; और हे सुभगे देवि! तुम भी स्थिर यौवन वाली बनो।"

श्लोक 50 (shiva.rudra.98.50)

माता त्वं दशपुत्राणां गुणिनां चिरजीविनाम् । स्वभर्तुरधिकानां च भविष्यसि न संशयः

mātā tvaṁ daśaputrāṇāṁ guṇināṁ cirajīvinām svabharturadhikānāṁ ca bhaviṣyasi na saṁśayaḥ

"तुम निःसंदेह दस गुणवान् चिरंजीवी पुत्रों की माता बनोगी, जो अपने पिता से भी बढ़कर होंगे।"

श्लोक 51 (shiva.rudra.98.51)

गृहा भवन्तु ते साध्वि सर्वसम्पत्समन्विताः । प्रकाशवन्तः सततं कुबेरभवनाधिकाः

gṛhā bhavantu te sādhvi sarvasampatsamanvitāḥ prakāśavantaḥ satataṁ kuberabhavanādhikāḥ

"हे साध्वि! तुम्हारे घर सम्पूर्ण सम्पत्ति से युक्त हों, सदा प्रकाशमान रहें, और कुबेर के भवन से भी बढ़कर हों।"

श्लोक 52 (shiva.rudra.98.52)

वसिष्ठ उवाच । इत्येवमुक्त्वा सन्तस्थौ धर्मः स गिरिसत्तम । सा तं प्रदक्षिणीकृत्य प्रणम्य स्वगृहं ययौ

vasiṣṭha uvāca ityevamuktvā santasthau dharmaḥ sa girisattama sā taṁ pradakṣiṇīkṛtya praṇamya svagṛhaṁ yayau

वसिष्ठ ने कहा -- "हे गिरिसत्तम! इस प्रकार कहकर धर्म मौन हो गए; उसने उनकी प्रदक्षिणा कर, प्रणाम कर, अपने घर को प्रस्थान किया।"

श्लोक 53 (shiva.rudra.98.53)

धर्मस्तथाशिषो दत्त्वा जगाम निजमन्दिरम् । प्रशशंस च तां प्रीत्या पद्मां संसदि संसदि

dharmastathāśiṣo dattvā jagāma nijamandiram praśaśaṁsa ca tāṁ prītyā padmāṁ saṁsadi saṁsadi

"धर्म भी आशीर्वाद देकर अपने धाम को चले गए; और वे प्रेमपूर्वक पद्मा की प्रशंसा सभा-सभा में करने लगे।"

श्लोक 54 (shiva.rudra.98.54)

सा रेमे स्वामिना सार्धं यूना रहसि सन्ततम् । पश्चाद्बभूवुः सत्पुत्रास्तद्भर्तुरधिका गुणैः

sā reme svāminā sārdhaṁ yūnā rahasi santatam paścādbabhūvuḥ satputrāstadbharturadhikā guṇaiḥ

"वह अपने अब युवा पति के साथ सतत एकान्त में रमण करने लगी; और बाद में उनके सत्पुत्र उत्पन्न हुए, जो गुणों में अपने पिता से भी बढ़कर थे।"

श्लोक 55 (shiva.rudra.98.55)

बभूव सकला सम्पद्दम्पत्योः सुखवर्धिनी । सर्वानन्दवृद्धिकरी परत्रेह च शर्मणे

babhūva sakalā sampaddampatyoḥ sukhavardhinī sarvānandavṛddhikarī paratreha ca śarmaṇe

"उस दम्पति को सुख बढ़ाने वाली समस्त सम्पत्ति प्राप्त हुई, जो इस लोक और परलोक दोनों में कल्याण के लिए सम्पूर्ण आनन्द की वृद्धि करने वाली थी।"

श्लोक 56 (shiva.rudra.98.56)

शैलेन्द्र कथितं सर्वमितिहासं पुरातनम् । दम्पत्योश्च तयोः प्रीत्या श्रुतं ते परमादरात्

śailendra kathitaṁ sarvamitihāsaṁ purātanam dampatyośca tayoḥ prītyā śrutaṁ te paramādarāt

"हे शैलेन्द्र! उस दम्पति का यह सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास प्रेमपूर्वक तुम्हें सुनाया गया, और तुमने भी उसे अत्यंत आदरपूर्वक सुना।"

श्लोक 57 (shiva.rudra.98.57)

बुद्ध्वा तत्त्वं सुतां देहि पार्वतीमीश्वराय च । कुरुषं त्यज शैलेन्द्र मेनया स्वस्त्रिया सह

buddhvā tattvaṁ sutāṁ dehi pārvatīmīśvarāya ca kuruṣaṁ tyaja śailendra menayā svastriyā saha

"अब यह सत्य समझकर अपनी पुत्री पार्वती को ईश्वर को दे दो। हे शैलेन्द्र! अपनी पत्नी मेना सहित हठ को त्याग दो।"

श्लोक 58 (shiva.rudra.98.58)

सप्ताहे समतीते तु दुर्लभेऽतिशुभे क्षणे । लग्नाधिपे च लग्नस्थे चन्द्रे स्वत्नयान्विते

saptāhe samatīte tu durlabhe'tiśubhe kṣaṇe lagnādhipe ca lagnasthe candre svatnayānvite

"एक सप्ताह बीत जाने पर, उस दुर्लभ अत्यंत शुभ क्षण में, जब लग्नेश लग्न में स्थित हो और चन्द्रमा अपने ही स्वामित्व से युक्त हो --"

श्लोक 59 (shiva.rudra.98.59)

मुदिते रोहिणीयुक्ते विशुद्धे चन्द्रतारके । मार्गमासे चन्द्रवारे सर्वदोषविवर्जिते

mudite rohiṇīyukte viśuddhe candratārake mārgamāse candravāre sarvadoṣavivarjite

"-- आनन्दमय, रोहिणी नक्षत्र से युक्त, चन्द्र-तारे विशुद्ध हों, मार्गशीर्ष मास में, सोमवार को, सभी दोषों से रहित --"

श्लोक 60 (shiva.rudra.98.60)

सर्वसद्ग्रहसंसृष्टेऽसद्ग्रहदृष्टिवर्जिते । सदपत्यप्रदे जीवे पतिसौभाग्यदायिनि

sarvasadgrahasaṁsṛṣṭe'sadgrahadṛṣṭivarjite sadapatyaprade jīve patisaubhāgyadāyini

"-- सभी शुभ ग्रहों से युक्त, अशुभ ग्रहों की दृष्टि से रहित, गुरु शुभ संतान देने वाला और पति को सौभाग्य प्रदान करने वाला हो --"

श्लोक 61 (shiva.rudra.98.61)

जगदम्बां जगत्पित्रे मूलप्रकृतिमीश्वरीम् । कन्यां प्रदाय गिरिजां कृती त्वं भव पर्वत

jagadambāṁ jagatpitre mūlaprakṛtimīśvarīm kanyāṁ pradāya girijāṁ kṛtī tvaṁ bhava parvata

"-- हे पर्वत! जगत्-माता, मूलप्रकृति, ईश्वरी, अपनी कन्या गिरिजा को जगत्-पिता को अर्पित कर तुम कृतार्थ बनो।"

श्लोक 62 (shiva.rudra.98.62)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलो वसिष्ठो ज्ञानिसत्तमः । विरराम शिवं स्मृत्वा नानालीलाकरं प्रभुम्

brahmovāca ityuktvā muniśārdūlo vasiṣṭho jñānisattamaḥ virarāma śivaṁ smṛtvā nānālīlākaraṁ prabhum

ब्रह्मा ने कहा -- "इस प्रकार कहकर मुनिश्रेष्ठ, ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठ, नाना लीलाएँ करने वाले प्रभु शिव का स्मरण कर मौन हो गए।"

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