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रुद्र संहिता · अध्याय 99

हिमालयस्य शिवाय कालीप्रदाननिश्चयवर्णनम्

अध्याय 98अध्याय-सूचीअध्याय 100

श्लोक 1 (shiva.rudra.99.1)

ब्रह्मोवाच । वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा सगणोऽपि हिमालयः । विस्मितो भार्यया शैलानुवाच स गिरीश्वरः

brahmovāca vasiṣṭhasya vacaḥ śrutvā sagaṇo'pi himālayaḥ vismito bhāryayā śailānuvāca sa girīśvaraḥ

ब्रह्मा ने कहा -- "वसिष्ठ के वचन सुनकर, अपने परिजनों सहित विस्मित हुए हिमालय ने अपनी पत्नी के साथ पर्वतों से यह कहा।"

श्लोक 2 (shiva.rudra.99.2)

हिमालय उवाच । हे मेरो गिरिराट् सह्य गन्धमादन मन्दर । मैनाक विन्ध्य शैलेन्द्राः सर्वे शृणुत मद्वचः

himālaya uvāca he mero girirāṭ sahya gandhamādana mandara maināka vindhya śailendrāḥ sarve śṛṇuta madvacaḥ

हिमालय ने कहा -- "हे मेरु! हे गिरिराज सह्य, गन्धमादन, मन्दर, मैनाक, विन्ध्य -- हे समस्त शैलेन्द्रो! मेरी बात सुनो।"

श्लोक 3 (shiva.rudra.99.3)

वसिष्ठो हि वदत्येवं किं मे कार्यं विचार्यते । यथा तथा च शंसध्वं निर्णीय मनसाखिलम्

vasiṣṭho hi vadatyevaṁ kiṁ me kāryaṁ vicāryate yathā tathā ca śaṁsadhvaṁ nirṇīya manasākhilam

"वसिष्ठ इस प्रकार कह रहे हैं -- मुझे क्या करना चाहिए? तुम सब अपने मन में पूर्ण रूप से विचार कर, जैसा उचित हो, वैसा मुझे बताओ।"

श्लोक 4 (shiva.rudra.99.4)

ब्रह्मोवाच । तच्छुत्वा वचनं तस्य सुमेरुप्रमुखाश्च ते । प्रोचुर्हिमालयं प्रीत्या सुनिर्णीय महीधराः

brahmovāca tacchutvā vacanaṁ tasya sumerupramukhāśca te procurhimālayaṁ prītyā sunirṇīya mahīdharāḥ

ब्रह्मा ने कहा -- "उनका यह वचन सुनकर सुमेरु आदि पर्वतों ने भलीभाँति विचार कर प्रेमपूर्वक हिमालय से कहा।"

श्लोक 5 (shiva.rudra.99.5)

शैला ऊचुः । अधुना किं विमर्शेन कृतं कार्यं तथैव हि । उत्पन्नेयं महाभाग देवकार्यार्थमेव हि

śailā ūcuḥ adhunā kiṁ vimarśena kṛtaṁ kāryaṁ tathaiva hi utpanneyaṁ mahābhāga devakāryārthameva hi

पर्वतों ने कहा -- "अब विचार करने की क्या आवश्यकता है? यह कार्य तो पहले से ही निश्चित है। हे महाभाग! यह कन्या देवकार्य के लिए ही उत्पन्न हुई है।"

श्लोक 6 (shiva.rudra.99.6)

प्रदातव्या शिवायेति शिवस्यार्थेऽवतारिणी । अनयाराधितो रुद्रो रुद्रेण यदि भाषिता

pradātavyā śivāyeti śivasyārthe'vatāriṇī anayārādhito rudro rudreṇa yadi bhāṣitā

"उसे शिव के लिए ही दिया जाना चाहिए, क्योंकि वह शिव के ही प्रयोजन से अवतरित हुई है। उसी के द्वारा रुद्र आराधित हुए हैं, और रुद्र ने भी उसे वचन दिया है।"

श्लोक 7 (shiva.rudra.99.7)

ब्रह्मोवाच । एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां मेर्वादीनां हिमाचलः । सुप्रसन्नतरोऽभूद् वै जहास गिरिजा हृदि

brahmovāca etacchrutvā vacasteṣāṁ mervādīnāṁ himācalaḥ suprasannataro'bhūd vai jahāsa girijā hṛdi

ब्रह्मा ने कहा -- "मेरु आदि पर्वतों के इन वचनों को सुनकर हिमाचल अत्यंत प्रसन्न हो गए; और गिरिजा हृदय में मुस्कुरा उठीं।"

श्लोक 8 (shiva.rudra.99.8)

अरुन्धती च तां मेनां बोधयामास कारणात् । नानावाक्यसमूहेनेतिहासैर्विविधैरपि

arundhatī ca tāṁ menāṁ bodhayāmāsa kāraṇāt nānāvākyasamūhenetihāsairvividhairapi

"और अरुन्धती ने इसी प्रयोजन से मेना को, विविध वचन-समूहों तथा नाना इतिहासों द्वारा भी समझाया।"

श्लोक 9 (shiva.rudra.99.9)

अथ सा मेनका शैलपत्नी बुद्ध्वा प्रसन्नधीः । मुनीनरुन्धतीं शैलं भोजयित्वा बुभोज च

atha sā menakā śailapatnī buddhvā prasannadhīḥ munīnarundhatīṁ śailaṁ bhojayitvā bubhoja ca

"तब वह मेनका, पर्वत की पत्नी, समझकर प्रसन्नचित्त हो गईं; उन्होंने मुनियों को, अरुन्धती को और पर्वत को भोजन कराकर स्वयं भी भोजन किया।"

श्लोक 10 (shiva.rudra.99.10)

अथ शैलवरो ज्ञानी सुसंसेव्य मुनींश्च तान् । उवाच साञ्जलिः प्रीत्या प्रसन्नात्मा गतभ्रमः

atha śailavaro jñānī susaṁsevya munīṁśca tān uvāca sāñjaliḥ prītyā prasannātmā gatabhramaḥ

"तब उस ज्ञानी शैलवर ने उन मुनियों की भलीभाँति सेवा करके, प्रसन्नचित्त और भ्रम-रहित होकर, हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक कहा।"

श्लोक 11 (shiva.rudra.99.11)

हिमाचल उवाच । सप्तर्षयो महाभागा वचः शृणुत मामकम् । विस्मयो मे गतः सर्वः शिवयोश्चरितं श्रुतम्

himācala uvāca saptarṣayo mahābhāgā vacaḥ śṛṇuta māmakam vismayo me gataḥ sarvaḥ śivayoścaritaṁ śrutam

हिमाचल ने कहा -- "हे महाभाग्यशाली सप्तर्षियो! मेरा वचन सुनिए। मेरा सम्पूर्ण विस्मय दूर हो गया; मैंने शिव और शिवा का चरित्र सुन लिया।"

श्लोक 12 (shiva.rudra.99.12)

मदीयं च शरीरं वै पत्नी मेना सुता सुताः । ऋद्धिः सिद्धिश्च चान्यद्वै शिवस्यैव न चान्यथा

madīyaṁ ca śarīraṁ vai patnī menā sutā sutāḥ ṛddhiḥ siddhiśca cānyadvai śivasyaiva na cānyathā

"मेरा यह शरीर, मेरी पत्नी मेना, मेरी पुत्री, मेरे पुत्र, मेरी ऋद्धि-सिद्धि तथा अन्य जो कुछ भी है -- यह सब शिव का ही है, और किसी और का नहीं।"

श्लोक 13 (shiva.rudra.99.13)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा स तदा पुत्रीं दृष्ट्वा तत्सादरं च ताम् । भूषयित्वा तदङ्गानि ऋष्युत्सङ्गे न्यवेशयत्

brahmovāca ityuktvā sa tadā putrīṁ dṛṣṭvā tatsādaraṁ ca tām bhūṣayitvā tadaṅgāni ṛṣyutsaṅge nyaveśayat

ब्रह्मा ने कहा -- "ऐसा कहकर, फिर अपनी पुत्री को आदरपूर्वक देखकर, उन्होंने उसके अंगों को आभूषणों से सजाकर, उसे मुनि की गोद में बिठा दिया।"

श्लोक 14 (shiva.rudra.99.14)

उवाच च पुनः प्रीत्या शैलराज ऋषींस्तदा । अयं भागो मया तस्मै दातव्य इति निश्चितम्

uvāca ca punaḥ prītyā śailarāja ṛṣīṁstadā ayaṁ bhāgo mayā tasmai dātavya iti niścitam

"और तब पर्वतराज ने पुनः प्रेमपूर्वक ऋषियों से कहा -- 'यह मेरा अंश उन्हीं (शिव) को अवश्य देना है, यह मैंने निश्चय कर लिया है।'"

श्लोक 15 (shiva.rudra.99.15)

ऋषय ऊचुः । शङ्करो भिक्षुकस्तेऽथ स्वयं दाता भवान् गिरे । भैक्ष्यञ्च पार्वती देवी किमतः परमुत्तमम्

ṛṣaya ūcuḥ śaṅkaro bhikṣukaste'tha svayaṁ dātā bhavān gire bhaikṣyañca pārvatī devī kimataḥ paramuttamam

ऋषियों ने कहा -- "हे गिरे! शंकर तुम्हारे भिक्षुक हैं, और तुम स्वयं दाता हो; और भिक्षा स्वरूप देवी पार्वती हैं -- इससे बढ़कर उत्तम और क्या हो सकता है?"

श्लोक 16 (shiva.rudra.99.16)

हिमवन् शिखराणान्ते यद्धेतोः सदृशी गतिः । धन्यस्त्वं सर्वशैलानामधिपः सर्वतो वरः

himavan śikharāṇānte yaddhetoḥ sadṛśī gatiḥ dhanyastvaṁ sarvaśailānāmadhipaḥ sarvato varaḥ

"हे हिमवन्! अपने शिखरों के बीच जिस कारण तुम्हारी यह गति सर्वथा उपयुक्त हुई है, तुम धन्य हो, समस्त पर्वतों के अधिपति और सर्वथा श्रेष्ठ हो।"

श्लोक 17 (shiva.rudra.99.17)

ब्रह्मोवाच । एवमुक्त्वा तु कन्यायै मुनयो विमलाशयाः । आशिषं दत्तवन्तस्ते शिवाय सुखदा भव

brahmovāca evamuktvā tu kanyāyai munayo vimalāśayāḥ āśiṣaṁ dattavantaste śivāya sukhadā bhava

ब्रह्मा ने कहा -- "ऐसा कहकर उन विमलचित्त मुनियों ने कन्या को आशीर्वाद दिया -- 'तुम शिव के लिए सुखदायिनी बनो।'"

श्लोक 18 (shiva.rudra.99.18)

स्पृष्ट्वा करेण तां तत्र कल्याणं ते भविष्यति । शुक्लपक्षे यथा चन्द्रो वर्धन्तां त्वद्गुणास्तथा

spṛṣṭvā kareṇa tāṁ tatra kalyāṇaṁ te bhaviṣyati śuklapakṣe yathā candro vardhantāṁ tvadguṇāstathā

"वहाँ उसे हाथ से स्पर्श कर वे बोले -- 'तुम्हारा कल्याण होगा; जैसे शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा बढ़ता है, वैसे ही तुम्हारे गुण बढ़ें।'"

श्लोक 19 (shiva.rudra.99.19)

इत्युक्त्वा मुनयः सर्वे दत्त्वा ते गिरये मुदा । पुष्पाणि फलयुक्तानि प्रत्ययं चक्रिरे तदा

ityuktvā munayaḥ sarve dattvā te giraye mudā puṣpāṇi phalayuktāni pratyayaṁ cakrire tadā

"ऐसा कहकर सभी मुनियों ने प्रसन्नतापूर्वक पर्वत को फलों सहित पुष्प देकर, तब इसे अपने वचन की प्रतिज्ञा बना दिया।"

श्लोक 20 (shiva.rudra.99.20)

अरुन्धती तदा तत्र मेनां सा सुमुखी मुदा । गुणैश्च लोभयामास शिवस्य परमा सती

arundhatī tadā tatra menāṁ sā sumukhī mudā guṇaiśca lobhayāmāsa śivasya paramā satī

"तब वहाँ अरुन्धती, वह सुमुखी परम सती, आनन्दपूर्वक शिव के गुणों से मेना को लुभाने लगीं।"

श्लोक 21 (shiva.rudra.99.21)

हरिद्राकुङ्कुमैः शैलश्मश्रूणि प्रत्यमार्जयत् । लौकिकाचारमाधाय मङ्गलायनमुत्तमम्

haridrākuṅkumaiḥ śailaśmaśrūṇi pratyamārjayat laukikācāramādhāya maṅgalāyanamuttamam

"उन्होंने हल्दी और कुंकुम से पर्वत की दाढ़ी-मूँछों का लेपन किया, लौकिक आचार का पालन करते हुए, यह उत्तम मंगल-कृत्य किया।"

श्लोक 22 (shiva.rudra.99.22)

ततश्च ते चतुर्थेऽह्नि सन्धार्य लग्नमुत्तमम् । परस्परं च सन्तुष्य सञ्जग्मुः शिवसन्निधिम्

tataśca te caturthe'hni sandhārya lagnamuttamam parasparaṁ ca santuṣya sañjagmuḥ śivasannidhim

"तत्पश्चात् चतुर्थ दिन उत्तम लग्न निश्चित कर, परस्पर संतुष्ट होकर, वे सब शिव के समीप गए।"

श्लोक 23 (shiva.rudra.99.23)

तत्र गत्वा शिवं नत्वा स्तुत्वा विविधसूक्तिभिः । ऊचुः सर्वे वसिष्ठाद्या मुनयः परमेश्वरम्

tatra gatvā śivaṁ natvā stutvā vividhasūktibhiḥ ūcuḥ sarve vasiṣṭhādyā munayaḥ parameśvaram

"वहाँ जाकर शिव को प्रणाम कर, विविध सूक्तियों से स्तुति कर, वसिष्ठ आदि सभी मुनियों ने परमेश्वर से कहा।"

श्लोक 24 (shiva.rudra.99.24)

ऋषय ऊचुः । देवदेव महादेव परमेश महाप्रभो । शृण्वस्मद्वचनं प्रीत्या यत्कृतं सेवकैस्तव

ṛṣaya ūcuḥ devadeva mahādeva parameśa mahāprabho śṛṇvasmadvacanaṁ prītyā yatkṛtaṁ sevakaistava

ऋषियों ने कहा -- "हे देवदेव! हे महादेव! हे परमेश! हे महाप्रभो! हमारा यह वचन प्रेमपूर्वक सुनिए -- जो आपके इन सेवकों ने किया है।"

श्लोक 25 (shiva.rudra.99.25)

बोधितो गिरिराजश्च मेना विविधसूक्तिभिः । सेतिहासं महेशान प्रबुद्धोऽसौ न संशयः

bodhito girirājaśca menā vividhasūktibhiḥ setihāsaṁ maheśāna prabuddho'sau na saṁśayaḥ

"गिरिराज तथा मेना को विविध सूक्तियों द्वारा समझाया गया है; हे महेशान! इतिहास सहित वे अब प्रबुद्ध हो चुके हैं, इसमें संशय नहीं है।"

श्लोक 26 (shiva.rudra.99.26)

वाक्यदत्ता गिरीन्द्रेण पार्वती ते हि नान्यथा । उद्वाहाय प्रगच्छ त्वं गणैर्देवैश्च संयुतः

vākyadattā girīndreṇa pārvatī te hi nānyathā udvāhāya pragaccha tvaṁ gaṇairdevaiśca saṁyutaḥ

"पर्वतराज ने पार्वती को वचन द्वारा तुम्हें ही दे दिया है, अन्य किसी को नहीं। अब तुम विवाह के लिए गणों और देवताओं सहित प्रस्थान करो।"

श्लोक 27 (shiva.rudra.99.27)

गच्छ शीघ्रं महादेव हिमाचलगृहं प्रभो । विवाहय यथा रीतिः पार्वतीमात्मजन्मने

gaccha śīghraṁ mahādeva himācalagṛhaṁ prabho vivāhaya yathā rītiḥ pārvatīmātmajanmane

"हे महादेव! हे प्रभो! शीघ्र हिमाचल के घर जाइए; रीति के अनुसार पार्वती से अपने ही प्रयोजन हेतु विवाह कीजिए।"

श्लोक 28 (shiva.rudra.99.28)

ब्रह्मोवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां लौकिकाचारतत्परः । प्रहृष्टात्मा महेशानः प्रहस्येदमुवाच सः

brahmovāca tacchrutvā vacanaṁ teṣāṁ laukikācāratatparaḥ prahṛṣṭātmā maheśānaḥ prahasyedamuvāca saḥ

ब्रह्मा ने कहा -- "उनका यह वचन सुनकर, लौकिक आचार का पालन करने में तत्पर, हृदय से प्रसन्न महेशान ने मुस्कुराते हुए यह कहा।"

श्लोक 29 (shiva.rudra.99.29)

महेश उवाच । विवाहो हि महाभागा न दृष्टो न श्रुतो मया । यथा पुरा भवद्भिस्तद्विधिः प्रोच्यो विशेषतः

maheśa uvāca vivāho hi mahābhāgā na dṛṣṭo na śruto mayā yathā purā bhavadbhistadvidhiḥ procyo viśeṣataḥ

महेश ने कहा -- "हे महाभाग्यशालियो! मैंने विवाह न तो कभी देखा है, न सुना है। जिस प्रकार पूर्वकाल में आप लोगों ने इसे किया है, वह विधि मुझे विशेष रूप से बताई जाए।"

श्लोक 30 (shiva.rudra.99.30)

ब्रह्मोवाच । तदाकर्ण्य महेशस्य लौकिकं वचनं शुभम् । प्रत्यूचुः प्रहसन्तस्ते देवदेवं सदाशिवम्

brahmovāca tadākarṇya maheśasya laukikaṁ vacanaṁ śubham pratyūcuḥ prahasantaste devadevaṁ sadāśivam

ब्रह्मा ने कहा -- "महेश के इस शुभ, लौकिक वचन को सुनकर, वे मुस्कुराते हुए देवदेव सदाशिव को उत्तर देने लगे।"

श्लोक 31 (shiva.rudra.99.31)

ऋषय ऊचुः । विष्णुमाहूय वै शीघ्रं ससमाजं विशेषतः । ब्रह्माणं ससुतं प्रीत्या तथा देवं शतक्रतुम्

ṛṣaya ūcuḥ viṣṇumāhūya vai śīghraṁ sasamājaṁ viśeṣataḥ brahmāṇaṁ sasutaṁ prītyā tathā devaṁ śatakratum

ऋषियों ने कहा -- "शीघ्र ही विष्णु को उनके समस्त परिवार सहित विशेष रूप से बुलाइए; तथा प्रेमपूर्वक ब्रह्मा को उनके पुत्रों सहित, और शतक्रतु इन्द्र को भी।"

श्लोक 32 (shiva.rudra.99.32)

तथा ऋषिगणान्सर्वान् यक्षगन्धर्वकिन्नरान् । सिद्धान् विद्याधरांश्चैव तथा चैवाप्सरोगणान्

tathā ṛṣigaṇānsarvān yakṣagandharvakinnarān siddhān vidyādharāṁścaiva tathā caivāpsarogaṇān

"इसी प्रकार समस्त ऋषिगणों को, यक्ष-गन्धर्व-किन्नरों को, सिद्धों और विद्याधरों को, तथा अप्सराओं के समूहों को भी बुलाइए।"

श्लोक 33 (shiva.rudra.99.33)

एतांश्चान्यान्प्रभो सर्वानानयस्वेह सादरम् । सर्वं संसाधयिष्यन्ति त्वत्कार्यं ते न संशयः

etāṁścānyānprabho sarvānānayasveha sādaram sarvaṁ saṁsādhayiṣyanti tvatkāryaṁ te na saṁśayaḥ

"हे प्रभो! इन सबको तथा अन्य सभी को यहाँ आदरपूर्वक लाइए। वे सब निःसंदेह आपका कार्य सम्पन्न करेंगे।"

श्लोक 34 (shiva.rudra.99.34)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा सप्त ऋषयस्तदाज्ञां प्राप्य ते मुदा । स्वधाम प्रययुः सर्वे शंसन्तः शङ्करीं गतिम्

brahmovāca ityuktvā sapta ṛṣayastadājñāṁ prāpya te mudā svadhāma prayayuḥ sarve śaṁsantaḥ śaṅkarīṁ gatim

ब्रह्मा ने कहा -- "ऐसा कहकर, सातों ऋषि उनकी आज्ञा पाकर, प्रसन्नतापूर्वक शंकरी की गति की प्रशंसा करते हुए, सभी अपने-अपने धाम को चले गए।"

अध्याय 98अध्याय-सूचीअध्याय 100