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शतरुद्र संहिता · अध्याय 17

शिवदशावतारवर्णन

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (shiva.shatarudra.17.1)

शृण्वथो गिरिशस्याद्यावतारान् दशसङ्ख्यकान् । महाकालमुखान् भक्त्योपासनाकाण्डसेवितान्

śṛṇvatho giriśasyādyāvatārān daśasaṅkhyakān mahākālamukhān bhaktyopāsanākāṇḍasevitān

अब गिरीश (शिव) के आरम्भिक दस अवतारों को सुनो, जो महाकाल-आदि नामों वाले हैं और भक्तिपूर्ण उपासना-विधि से सेवित हैं।

श्लोक 2 (shiva.shatarudra.17.2)

तत्राद्यो हि महाकालो भुक्तिमुक्तिप्रदः सताम् । शक्तिस्तत्र महाकाली भक्तेप्सितफलप्रदा

tatrādyo hi mahākālo bhuktimuktipradaḥ satām śaktistatra mahākālī bhaktepsitaphalapradā

उनमें प्रथम महाकाल हैं, जो सज्जनों को भोग और मोक्ष प्रदान करते हैं; वहाँ उनकी शक्ति महाकाली हैं, जो भक्तों को इच्छित फल देती हैं।

श्लोक 3 (shiva.shatarudra.17.3)

तारनामा द्वितीयश्च ताराशक्तिस्तथैव सा । भुक्तिमुक्तिप्रदौ चोभौ स्वसेवकसुखप्रदौ

tāranāmā dvitīyaśca tārāśaktistathaiva sā bhuktimuktipradau cobhau svasevakasukhapradau

दूसरे तारा नामक हैं, और उसी प्रकार उनकी शक्ति भी ताराशक्ति हैं; दोनों भोग-मोक्ष प्रदान करने वाले तथा अपने सेवकों को सुख देने वाले हैं।

श्लोक 4 (shiva.shatarudra.17.4)

भुवनेशो हि बालाह्वस्तृतीयः परिकीर्तितः । भुवनेशी शिवा तत्र बालाह्वा सुखदा सताम्

bhuvaneśo hi bālāhvastṛtīyaḥ parikīrtitaḥ bhuvaneśī śivā tatra bālāhvā sukhadā satām

भुवनेश, जिन्हें बाला भी कहा जाता है, तीसरे कहे गए हैं; वहाँ उनकी शक्ति भुवनेशी हैं, जो बाला नाम से सज्जनों को सुख देने वाली हैं।

श्लोक 5 (shiva.shatarudra.17.5)

श्रीविद्येशः षोडशाह्वः श्रीर्विद्या षोडशी शिवा । चतुर्थो भक्तसुखदो भुक्तिमुक्तिफलप्रदः

śrīvidyeśaḥ ṣoḍaśāhvaḥ śrīrvidyā ṣoḍaśī śivā caturtho bhaktasukhado bhuktimuktiphalapradaḥ

श्रीविद्येश, जिन्हें षोडश कहा जाता है, चौथे हैं, भक्तों को सुख तथा भोग-मोक्ष का फल देने वाले; उनकी मंगलमयी शक्ति षोडशी श्रीविद्या हैं।

श्लोक 6 (shiva.shatarudra.17.6)

पञ्चमो भैरवः ख्यातः सर्वदा भक्तकामदः । भैरवी गिरिजा तत्र सदुपासककामदा

pañcamo bhairavaḥ khyātaḥ sarvadā bhaktakāmadaḥ bhairavī girijā tatra sadupāsakakāmadā

पाँचवें भैरव नाम से विख्यात हैं, जो सदा भक्तों की कामना पूर्ण करते हैं; वहाँ गिरिजा भैरवी रूप में सच्चे उपासकों की कामना पूर्ण करती हैं।

श्लोक 7 (shiva.shatarudra.17.7)

छिन्नमस्तकनामासौ शिवः षष्ठः प्रकीर्तितः । भक्तकामप्रदा चैव गिरिजा छिन्नमस्तका

chinnamastakanāmāsau śivaḥ ṣaṣṭhaḥ prakīrtitaḥ bhaktakāmapradā caiva girijā chinnamastakā

छिन्नमस्तक नामक वह शिव छठे कहे गए हैं; और गिरिजा भी छिन्नमस्तका रूप में भक्तों की कामना पूर्ण करने वाली हैं।

श्लोक 8 (shiva.shatarudra.17.8)

धूमवान् सप्तमः शम्भुः सर्वकामफलप्रदः । धूमवती शिवा तत्र सदुपासककामदा

dhūmavān saptamaḥ śambhuḥ sarvakāmaphalapradaḥ dhūmavatī śivā tatra sadupāsakakāmadā

सातवें शम्भु धूमवान् हैं, जो समस्त कामनाओं का फल देते हैं; वहाँ उनकी मंगलमयी शक्ति धूमवती सच्चे उपासकों की कामना पूर्ण करती हैं।

श्लोक 9 (shiva.shatarudra.17.9)

शिवावतारः सुखदो ह्यष्टमो बगलामुखः । शक्तिस्तत्र महानन्दा विख्याता बगलामुखी

śivāvatāraḥ sukhado hyaṣṭamo bagalāmukhaḥ śaktistatra mahānandā vikhyātā bagalāmukhī

सुख देने वाला शिव का आठवाँ अवतार बगलामुख है; वहाँ उनकी शक्ति महाआनन्दमयी बगलामुखी नाम से विख्यात हैं।

श्लोक 10 (shiva.shatarudra.17.10)

शिवावतारो मातङ्गो नवमः परिकीर्तितः । मातङ्गी तत्र शर्वाणी सर्वकामफलप्रदा

śivāvatāro mātaṅgo navamaḥ parikīrtitaḥ mātaṅgī tatra śarvāṇī sarvakāmaphalapradā

शिव का मातंग अवतार नवां कहा गया है; वहाँ उनकी शक्ति शर्वाणी मातंगी समस्त कामनाओं का फल देने वाली हैं।

श्लोक 11 (shiva.shatarudra.17.11)

दशमः कमलः शम्भुर्भुक्तिमुक्तिफलप्रदः । कमला गिरिजा तत्र स्वभक्तपरिपालिनी

daśamaḥ kamalaḥ śambhurbhuktimuktiphalapradaḥ kamalā girijā tatra svabhaktaparipālinī

दसवें शम्भु कमल रूप में हैं, जो भोग-मोक्ष का फल देते हैं; वहाँ उनकी शक्ति गिरिजा कमला अपने भक्तों की सदा रक्षा करने वाली हैं।

श्लोक 12 (shiva.shatarudra.17.12)

एते दशमिताः शैवा अवताराः सुखप्रदाः । भुक्तिमुक्तिप्रदाश्चैव भक्तानां सर्वदा सताम्

ete daśamitāḥ śaivā avatārāḥ sukhapradāḥ bhuktimuktipradāścaiva bhaktānāṁ sarvadā satām

ये दस गिने जाने वाले शैव अवतार सुख देने वाले हैं, जो सदा सज्जन भक्तों को भोग और मोक्ष प्रदान करते हैं।

श्लोक 13 (shiva.shatarudra.17.13)

एते दशावतारा हि शङ्करस्य महात्मनः । नानासुखप्रदा नित्यं सेवतां निर्विकारतः

ete daśāvatārā hi śaṅkarasya mahātmanaḥ nānāsukhapradā nityaṁ sevatāṁ nirvikārataḥ

ये महात्मा शंकर के दस अवतार हैं, जो निर्विकार भाव से सेवा करने वालों को सदा नाना प्रकार का सुख देते हैं।

श्लोक 14 (shiva.shatarudra.17.14)

एतद्दशावताराणां माहात्म्यं वर्णितं मुने । सर्वकामप्रदं ज्ञेयं तन्त्रशास्त्रादिगर्भितम्

etaddaśāvatārāṇāṁ māhātmyaṁ varṇitaṁ mune sarvakāmapradaṁ jñeyaṁ tantraśāstrādigarbhitam

हे मुनि! इन दस अवतारों की यह महिमा वर्णित की गई है, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली तथा तंत्रशास्त्रादि के सार से युक्त जाननी चाहिए।

श्लोक 15 (shiva.shatarudra.17.15)

एतासामादिशक्तीनामद्भुतो महिमा मुने । सर्वकामप्रदो ज्ञेयस्तत्रंशास्त्रादिगर्भितः

etāsāmādiśaktīnāmadbhuto mahimā mune sarvakāmaprado jñeyastatraṁśāstrādigarbhitaḥ

हे मुनि! इन आदिशक्तियों की महिमा भी अद्भुत है, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली तथा उन्हीं शास्त्रों के सार से युक्त जाननी चाहिए।

श्लोक 16 (shiva.shatarudra.17.16)

शत्रुमारणकार्यादौ तत्तच्छक्तिः परा मता । खलदण्डकरी नित्यं ब्रह्मतेजोविवर्द्धिनी

śatrumāraṇakāryādau tattacchaktiḥ parā matā khaladaṇḍakarī nityaṁ brahmatejovivarddhinī

शत्रु-नाश आदि कार्यों में उन-उन शक्तियों को ही सर्वोत्तम माना गया है, जो सदा दुष्टों को दण्ड देने वाली तथा ब्रह्मतेज को बढ़ाने वाली हैं।

श्लोक 17 (shiva.shatarudra.17.17)

इत्युक्तास्ते मया ब्रह्मन्नवतारा महेशितुः । सशक्तिका दशमिता महाकालमुखाः शुभाः

ityuktāste mayā brahmannavatārā maheśituḥ saśaktikā daśamitā mahākālamukhāḥ śubhāḥ

हे ब्राह्मण! इस प्रकार मैंने महेश्वर के, महाकाल-आदि नाम वाले तथा अपनी-अपनी शक्तियों सहित, इन दस मंगलमय अवतारों को तुम्हें बताया।

श्लोक 18 (shiva.shatarudra.17.18)

शैवपर्वेसु सर्वेषु योऽधीते भक्तितत्परः । एतदाख्यानममलं सोऽतिशम्भुप्रियो भवेत्

śaivaparvesu sarveṣu yo'dhīte bhaktitatparaḥ etadākhyānamamalaṁ so'tiśambhupriyo bhavet

जो भक्तिपूर्वक समस्त शैव पर्वों में इस निर्मल आख्यान का अध्ययन करता है, वह शम्भु को अत्यंत प्रिय हो जाता है।

श्लोक 19 (shiva.shatarudra.17.19)

ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चस्वी क्षत्रियो विजयी भवेत् । धनाधिपो हि वैश्यः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात्

brāhmaṇo brahmavarcasvī kṣatriyo vijayī bhavet dhanādhipo hi vaiśyaḥ syācchūdraḥ sukhamavāpnuyāt

ब्राह्मण ब्रह्मतेज को प्राप्त करता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य धन का स्वामी बनता है, और शूद्र सुख प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (shiva.shatarudra.17.20)

शाङ्करा निजधर्मस्थाः शृण्वन्तश्चरितं त्विदम् । सुखिनः स्युर्विशेषेण शिवभक्ता भवन्तु च

śāṅkarā nijadharmasthāḥ śṛṇvantaścaritaṁ tvidam sukhinaḥ syurviśeṣeṇa śivabhaktā bhavantu ca

अपने-अपने धर्म में स्थित शंकर के भक्त इस चरित्र को सुनकर विशेष रूप से सुखी होते हैं और शिवभक्त बने रहते हैं।

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