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शतरुद्र संहिता · अध्याय 19

दुर्वासाचरितवर्णन

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

श्लोक 1 (shiva.shatarudra.19.1)

नन्दीश्वर उवाच । अथान्यच्चरितं शम्भोः शृणु प्रीत्या महामुने । यथा बभूव दुर्वासाः शङ्करो धर्महेतवे

nandīśvara uvāca athānyaccaritaṁ śambhoḥ śṛṇu prītyā mahāmune yathā babhūva durvāsāḥ śaṅkaro dharmahetave

नन्दीश्वर ने कहा — हे महामुने! अब शम्भु का एक अन्य चरित्र प्रेमपूर्वक सुनो — किस प्रकार शंकर धर्म की रक्षा हेतु दुर्वासा के रूप में प्रकट हुए।

श्लोक 2 (shiva.shatarudra.19.2)

ब्रह्मपुत्रो बभूवातितपस्वी ब्रह्मवित्प्रभुः । अनसूयापतिर्धीमान्ब्रह्माज्ञाप्रतिपालकः

brahmaputro babhūvātitapasvī brahmavitprabhuḥ anasūyāpatirdhīmānbrahmājñāpratipālakaḥ

वे (अत्रि) ब्रह्मा के पुत्र, महान तपस्वी, ब्रह्मज्ञानी प्रभु, अनसूया के बुद्धिमान पति तथा ब्रह्मा की आज्ञा का पालन करने वाले हुए।

श्लोक 3 (shiva.shatarudra.19.3)

सुनिर्देशाद् ब्रह्मणो हि सस्त्रीकः पुत्रकाम्यया । स त्र्यक्षकुलनामानं ययौ च तपसे गिरिम्

sunirdeśād brahmaṇo hi sastrīkaḥ putrakāmyayā sa tryakṣakulanāmānaṁ yayau ca tapase girim

ब्रह्मा जी के स्पष्ट निर्देश से वे पुत्र-कामना से अपनी पत्नी सहित त्र्यक्ष नामक पर्वत पर तपस्या के लिए गए।

श्लोक 4 (shiva.shatarudra.19.4)

प्राणानायम्य विधिवन्निर्विन्ध्यातटिनीतटे । तपश्चचार सुमहद् अद्वन्द्वोऽब्दशतं मुनिः

prāṇānāyamya vidhivannirvindhyātaṭinītaṭe tapaścacāra sumahad advandvo'bdaśataṁ muniḥ

विधिपूर्वक प्राणों को नियंत्रित कर, निर्विन्ध्या नदी के तट पर, द्वन्द्वों से रहित होकर, उन मुनि ने सौ वर्षों तक महान तप किया।

श्लोक 5 (shiva.shatarudra.19.5)

य एक ईश्वरः कश्चिदविकारी महाप्रभुः । स मे पुत्रवरं दद्यादिति निश्चितमानसः

ya eka īśvaraḥ kaścidavikārī mahāprabhuḥ sa me putravaraṁ dadyāditi niścitamānasaḥ

उन्होंने मन में यह निश्चय किया — "जो भी एक निर्विकार महाप्रभु ईश्वर हैं, वे मुझे पुत्र का वरदान दें।"

श्लोक 6 (shiva.shatarudra.19.6)

बहुकालो व्यतीयाय तस्मिंस्तपति सत्तपः । आविर्बभूव तस्मात्तु शुचिर्ज्वाला महीयसी

bahukālo vyatīyāya tasmiṁstapati sattapaḥ āvirbabhūva tasmāttu śucirjvālā mahīyasī

उस सत्तप को करते हुए उन्हें बहुत काल बीत गया; तब उनसे एक पवित्र तथा अत्यंत विशाल ज्वाला प्रकट हुई।

श्लोक 7 (shiva.shatarudra.19.7)

तयासन्निखिला लोका दग्धप्राया मुनीश्वराः । तथा सुरर्षयः सर्वे पीडिता वासवादयः

tayāsannikhilā lokā dagdhaprāyā munīśvarāḥ tathā surarṣayaḥ sarve pīḍitā vāsavādayaḥ

उस ज्वाला से समस्त लोक तथा मुनीश्वर लगभग दग्ध हो गए, तथा उसी प्रकार शक्र-आदि समस्त देवता और ऋषि भी पीड़ित हो गए।

श्लोक 8 (shiva.shatarudra.19.8)

अथ सर्वे वासवाद्या सुराश्च मुनयो मुने । ब्रह्मस्थानं ययुः शीघ्रं तज्ज्वालातिप्रपीडिताः

atha sarve vāsavādyā surāśca munayo mune brahmasthānaṁ yayuḥ śīghraṁ tajjvālātiprapīḍitāḥ

तब हे मुने! शक्र-आदि समस्त देवगण और मुनिगण उस ज्वाला से अत्यंत पीड़ित होकर शीघ्र ब्रह्मलोक को गए।

श्लोक 9 (shiva.shatarudra.19.9)

नत्वा नुत्वा विधिं देवाः तत्स्वदुःखं न्यवेदयन् । ब्रह्मा सह सुरैस्तात विष्णुलोकं ययावरम्

natvā nutvā vidhiṁ devāḥ tatsvaduḥkhaṁ nyavedayan brahmā saha suraistāta viṣṇulokaṁ yayāvaram

देवताओं ने ब्रह्मा को प्रणाम एवं स्तुति कर अपना दुःख निवेदन किया; हे तात! तब ब्रह्मा देवताओं सहित उत्तम विष्णुलोक को गए।

श्लोक 10 (shiva.shatarudra.19.10)

तत्र गत्वा रमानाथं नत्वा नुत्वा विधिः सुरैः । स्वदुःखं तत्समाचख्यौ विष्णवेऽनन्तकं मुने

tatra gatvā ramānāthaṁ natvā nutvā vidhiḥ suraiḥ svaduḥkhaṁ tatsamācakhyau viṣṇave'nantakaṁ mune

हे मुने! वहाँ जाकर ब्रह्मा ने देवताओं सहित रमानाथ (विष्णु) को प्रणाम एवं स्तुति कर वह अनन्त दुःख विष्णु को कह सुनाया।

श्लोक 11 (shiva.shatarudra.19.11)

विष्णुश्च विधिना देवै रुद्रस्थानं ययौ द्रुतम् । हरं प्रणम्य तत्रैत्य तुष्टाव परमेश्वरम्

viṣṇuśca vidhinā devai rudrasthānaṁ yayau drutam haraṁ praṇamya tatraitya tuṣṭāva parameśvaram

तब विष्णु भी ब्रह्मा और देवताओं सहित शीघ्र रुद्र के स्थान को गए; वहाँ पहुँचकर हर को प्रणाम कर उन्होंने परमेश्वर की स्तुति की।

श्लोक 12 (shiva.shatarudra.19.12)

स्तुत्वा बहुतया विष्णुः स्वदुःखं च न्यवेदयत् । शर्वं ज्वालासमुद्भूतमत्रेश्च तपसः परम्

stutvā bahutayā viṣṇuḥ svaduḥkhaṁ ca nyavedayat śarvaṁ jvālāsamudbhūtamatreśca tapasaḥ param

विष्णु ने बहुत प्रकार से स्तुति करके शर्व को अपना दुःख — अत्रि के परम तप से उत्पन्न वह ज्वाला — निवेदन किया।

श्लोक 13 (shiva.shatarudra.19.13)

अथ तत्र समेतास्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । मुने सम्मन्त्रयाञ्चक्रुरन्योऽन्यं जगतां हितम्

atha tatra sametāstu brahmaviṣṇumaheśvarāḥ mune sammantrayāñcakruranyo'nyaṁ jagatāṁ hitam

हे मुने! तब वहाँ एकत्र हुए ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ने जगत के हित के लिए परस्पर विचार-विमर्श किया।

श्लोक 14 (shiva.shatarudra.19.14)

तदा ब्रह्मादयो देवास्त्रयस्ते वरदर्षभाः । जग्मुस्तदाश्रमं शीघ्रं वरं दातुं तदर्षये

tadā brahmādayo devāstrayaste varadarṣabhāḥ jagmustadāśramaṁ śīghraṁ varaṁ dātuṁ tadarṣaye

तब वर देने वालों में श्रेष्ठ वे तीनों देवता — ब्रह्मा आदि — उस मुनि को वर देने के लिए शीघ्र उनके आश्रम को गए।

श्लोक 15 (shiva.shatarudra.19.15)

स्वचिह्नचिह्नितांस्तान्स दृष्ट्वात्रिर्मुनिसत्तमः । प्रणनाम च तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिरादरात्

svacihnacihnitāṁstānsa dṛṣṭvātrirmunisattamaḥ praṇanāma ca tuṣṭāva vāgbhiriṣṭābhirādarāt

मुनिश्रेष्ठ अत्रि ने अपने-अपने चिह्नों से पहचाने जाने वाले उन्हें देखकर आदरपूर्वक प्रिय वचनों से प्रणाम और स्तुति की।

श्लोक 16 (shiva.shatarudra.19.16)

ततः स विस्मितो विप्रस्तानुवाच कृताञ्जलिः । ब्रह्मपुत्रो विनीतात्मा ब्रह्मविष्णुहराभिधान्

tataḥ sa vismito viprastānuvāca kṛtāñjaliḥ brahmaputro vinītātmā brahmaviṣṇuharābhidhān

तब वे विनम्र मन वाले, विस्मित हुए ब्राह्मण-पुत्र (अत्रि) हाथ जोड़कर ब्रह्मा, विष्णु और हर नाम वाले उन तीनों से बोले।

श्लोक 17 (shiva.shatarudra.19.17)

अत्रिरुवाच । हे ब्रह्मन् हे हरे रुद्र पूज्यास्त्रिजगतां मताः । प्रभवश्चेश्वराः सृष्टिरक्षासंहारकारकाः

atriruvāca he brahman he hare rudra pūjyāstrijagatāṁ matāḥ prabhavaśceśvarāḥ sṛṣṭirakṣāsaṁhārakārakāḥ

अत्रि ने कहा — हे ब्रह्मन्! हे हरे! हे रुद्र! त्रिलोक द्वारा पूजनीय और आदरणीय आप ही सृष्टि, रक्षा और संहार के कर्ता, स्वामी और उत्पत्तिकर्ता हैं।

श्लोक 18 (shiva.shatarudra.19.18)

एक एव मया ध्यात ईश्वरः पुत्रहेतवे । यः कश्चिदीश्वरः ख्यातो जगतां स्वस्त्रिया सह

eka eva mayā dhyāta īśvaraḥ putrahetave yaḥ kaścidīśvaraḥ khyāto jagatāṁ svastriyā saha

मैंने पुत्र की कामना से एक ही ईश्वर का ध्यान किया है — जो भी जगत का ईश्वर अपनी पत्नी सहित प्रसिद्ध हो।

श्लोक 19 (shiva.shatarudra.19.19)

यूयं त्रयस्सुराः कस्मादागता वरदर्षभाः । एतन्मे संशयं छित्त्वा ततो दत्तेप्सितं वरम्

yūyaṁ trayassurāḥ kasmādāgatā varadarṣabhāḥ etanme saṁśayaṁ chittvā tato dattepsitaṁ varam

वर देने वालों में श्रेष्ठ आप तीनों देवता यहाँ किस कारण पधारे हैं? मेरे इस संशय को दूर करके तब मुझे इच्छित वर दीजिए।

श्लोक 20 (shiva.shatarudra.19.20)

इति श्रुत्वा वचस्तस्य प्रत्यूचुस्ते सुरास्त्रयः । यादृक्कृतस्ते सङ्कल्पस्तथैवाभून्मुनीश्वर

iti śrutvā vacastasya pratyūcuste surāstrayaḥ yādṛkkṛtaste saṅkalpastathaivābhūnmunīśvara

उनके ये वचन सुनकर वे तीनों देवता बोले — हे मुनीश्वर! आपने जैसा संकल्प किया था, वैसा ही हुआ है।

श्लोक 21 (shiva.shatarudra.19.21)

वयं त्रयो भवेशानाः समाना वरदर्षभाः । अस्मदंशभवास्तस्माद्भविष्यन्ति सुतास्त्रयः

vayaṁ trayo bhaveśānāḥ samānā varadarṣabhāḥ asmadaṁśabhavāstasmādbhaviṣyanti sutāstrayaḥ

वर देने वालों में श्रेष्ठ, समान भावेश हम तीनों देवता, हमारे ही अंश से तीन पुत्र उत्पन्न होंगे।

श्लोक 22 (shiva.shatarudra.19.22)

विदिता भुवने सर्वे पित्रोः कीर्तिविवर्द्धनाः । इत्युक्त्वा त्रयो देवाः स्वधामानि ययुर्मुदा

viditā bhuvane sarve pitroḥ kīrtivivarddhanāḥ ityuktvā trayo devāḥ svadhāmāni yayurmudā

वे समस्त संसार में विख्यात होकर माता-पिता की कीर्ति को बढ़ाने वाले होंगे — यह कहकर वे तीनों देवता प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने धाम को लौट गए।

श्लोक 23 (shiva.shatarudra.19.23)

वरं लब्ध्वा मुनिः सोऽथ जगाम स्वाश्रमं मुदा । युतोऽनुसूयया प्रीतो ब्रह्मानन्दप्रदो मुने

varaṁ labdhvā muniḥ so'tha jagāma svāśramaṁ mudā yuto'nusūyayā prīto brahmānandaprado mune

वर प्राप्त कर वे मुनि प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रम को गए, तथा हे मुने! ब्रह्मानन्द देने वाली प्रिय अनसूया के साथ रहने लगे।

श्लोक 24 (shiva.shatarudra.19.24)

अथ ब्रह्मा हरिः शम्भुरवतेरुः स्त्रियां ततः । पुत्ररूपैः प्रसन्नास्ते नानालीलाप्रकाशकाः

atha brahmā hariḥ śambhuravateruḥ striyāṁ tataḥ putrarūpaiḥ prasannāste nānālīlāprakāśakāḥ

तब ब्रह्मा, हरि और शम्भु, प्रसन्न होकर, नाना लीलाओं को प्रकट करते हुए, पुत्र-रूप में उस स्त्री (अनसूया) में अवतरित हुए।

श्लोक 25 (shiva.shatarudra.19.25)

विधेरंशाद्विधुर्जज्ञेऽनसूयायां मुनीश्वरात् । आविर्बभूवोदधितः क्षिप्तो देवैः स एव हि

vidheraṁśādvidhurjajñe'nasūyāyāṁ munīśvarāt āvirbabhūvodadhitaḥ kṣipto devaiḥ sa eva hi

ब्रह्मा के अंश से महर्षि अत्रि द्वारा अनसूया में चन्द्रमा (विधु) उत्पन्न हुए; वे ही बाद में देवताओं द्वारा फेंके जाने पर समुद्र से प्रकट हुए।

श्लोक 26 (shiva.shatarudra.19.26)

विष्णोरंशात् स्त्रियां तस्यामत्रेर्दत्तो व्यजायत । संन्यासपद्धतिर्येन वर्द्धिता परमा मुने

viṣṇoraṁśāt striyāṁ tasyāmatrerdatto vyajāyata saṁnyāsapaddhatiryena varddhitā paramā mune

विष्णु के अंश से उसी अत्रि की पत्नी में दत्त (दत्तात्रेय) उत्पन्न हुए, जिनके द्वारा हे मुने! संन्यास की परम पद्धति बढ़ाई गई।

श्लोक 27 (shiva.shatarudra.19.27)

दुर्वासा मुनिशार्दूलः शिवांशान्मुनिसत्तम । जज्ञे तस्यां स्त्रियामत्रेर्वरधर्मप्रवर्तकः

durvāsā muniśārdūlaḥ śivāṁśānmunisattama jajñe tasyāṁ striyāmatrervaradharmapravartakaḥ

हे मुनिसत्तम! शिव के अंश से अत्रि की उसी पत्नी में मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा उत्पन्न हुए, जो उत्तम धर्म के प्रवर्तक थे।

श्लोक 28 (shiva.shatarudra.19.28)

भूत्वा रुद्रश्च दुर्वासा ब्रह्मतेजोविवर्द्धनः । चक्रे धर्मपरीक्षां च बहूनां स दयापरः

bhūtvā rudraśca durvāsā brahmatejovivarddhanaḥ cakre dharmaparīkṣāṁ ca bahūnāṁ sa dayāparaḥ

रुद्र-रूप वे दुर्वासा, ब्रह्मतेज को बढ़ाने वाले, दया से युक्त होते हुए भी बहुतों के धर्म की परीक्षा लेते थे।

श्लोक 29 (shiva.shatarudra.19.29)

सूर्यवंशे समुत्पन्नो योऽम्बरीषो नृपोऽभवत् । तत्परीक्षामकार्षीत्स तां शृणु त्वं मुनीश्वर

sūryavaṁśe samutpanno yo'mbarīṣo nṛpo'bhavat tatparīkṣāmakārṣītsa tāṁ śṛṇu tvaṁ munīśvara

सूर्यवंश में उत्पन्न हुए जो अम्बरीष नामक राजा थे, उनकी परीक्षा उन्होंने की — हे मुनीश्वर! वह कथा सुनो।

श्लोक 30 (shiva.shatarudra.19.30)

सोऽम्बरीषो नृपवरः सप्तद्वीपरसापतिः । नियमं हि चकारासावेकादश्यां व्रते दृढम्

so'mbarīṣo nṛpavaraḥ saptadvīparasāpatiḥ niyamaṁ hi cakārāsāvekādaśyāṁ vrate dṛḍham

सप्तद्वीपों की सम्पत्ति के स्वामी वे श्रेष्ठ राजा अम्बरीष एकादशी व्रत में दृढ़ नियम रखते थे।

श्लोक 31 (shiva.shatarudra.19.31)

एकादश्या व्रतं कृत्वा द्वादश्यां चैव पारणाम् । करिष्यामीति सुदृढसङ्कल्पस्तु नराधिपः

ekādaśyā vrataṁ kṛtvā dvādaśyāṁ caiva pāraṇām kariṣyāmīti sudṛḍhasaṅkalpastu narādhipaḥ

उस राजा का दृढ़ संकल्प था — "एकादशी का व्रत करके द्वादशी को पारण करूँगा।"

श्लोक 32 (shiva.shatarudra.19.32)

ज्ञात्वा तन्नियमं तस्य दुर्वासा मुनिसत्तमः । तदन्तिकं गतः शिष्यैर्बहुभिः शङ्करांशजः

jñātvā tanniyamaṁ tasya durvāsā munisattamaḥ tadantikaṁ gataḥ śiṣyairbahubhiḥ śaṅkarāṁśajaḥ

उनके इस नियम को जानकर शंकर के अंश से उत्पन्न मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा अनेक शिष्यों सहित उनके पास पहुँचे।

श्लोक 33 (shiva.shatarudra.19.33)

पारणे द्वादशीं स्वल्पां ज्ञात्वा यावत्स भोजनम् । कर्त्तुं व्यवसितस्तावदागतं स न्यमन्त्रयत्

pāraṇe dvādaśīṁ svalpāṁ jñātvā yāvatsa bhojanam karttuṁ vyavasitastāvadāgataṁ sa nyamantrayat

जब पारण के लिए द्वादशी का समय अल्प रह गया था, और राजा भोजन करने ही वाले थे, तभी उन्होंने आए हुए दुर्वासा को निमन्त्रित किया।

श्लोक 34 (shiva.shatarudra.19.34)

ततः स्नानार्थमगमद्दुर्वासाः शिष्यसंयुतः । विलम्बं कृतवांस्तत्र परीक्षार्थं मुनिर्बहु

tataḥ snānārthamagamaddurvāsāḥ śiṣyasaṁyutaḥ vilambaṁ kṛtavāṁstatra parīkṣārthaṁ munirbahu

तब दुर्वासा शिष्यों सहित स्नान के लिए चले गए, और परीक्षा के लिए उस मुनि ने वहाँ बहुत विलम्ब किया।

श्लोक 35 (shiva.shatarudra.19.35)

धर्मविघ्नं तदा ज्ञात्वा स नृपः शास्त्रशासनात् । जलं प्राश्यास्थितस्तत्र तदागमनकाङ्क्षया

dharmavighnaṁ tadā jñātvā sa nṛpaḥ śāstraśāsanāt jalaṁ prāśyāsthitastatra tadāgamanakāṅkṣayā

तब धर्म में विघ्न जानकर वह राजा शास्त्र की आज्ञा से केवल जल पीकर वहीं उनके आगमन की प्रतीक्षा करते रहे।

श्लोक 36 (shiva.shatarudra.19.36)

एतस्मिन्नन्तरे तत्र दुर्वासा मुनिरागतः । कृताशनं नृपं ज्ञात्वा परीक्षार्थं धृताकृतिः

etasminnantare tatra durvāsā munirāgataḥ kṛtāśanaṁ nṛpaṁ jñātvā parīkṣārthaṁ dhṛtākṛtiḥ

इसी बीच मुनि दुर्वासा वहाँ आ पहुँचे; राजा को भोजन किया हुआ जानकर, परीक्षा के लिए उन्होंने कठोर रूप धारण किया।

श्लोक 37 (shiva.shatarudra.19.37)

चुक्रोधाति नृपे तस्मिन्परीक्षार्थं वृषस्य सः । प्रोवाच वचनं तूग्रं स मुनिः शङ्करांशजः

cukrodhāti nṛpe tasminparīkṣārthaṁ vṛṣasya saḥ provāca vacanaṁ tūgraṁ sa muniḥ śaṅkarāṁśajaḥ

शंकर के अंश से उत्पन्न वे मुनि, धर्म की परीक्षा के लिए उस राजा पर अत्यंत क्रोधित हो उठे और उग्र वचन बोले।

श्लोक 38 (shiva.shatarudra.19.38)

दुर्वासा उवाच । मां निमन्त्र्य नृपाभोज्य जलं पीतं त्वयाधम । दर्शयामि फलं तस्य दुष्टदण्डधरो ह्यहम्

durvāsā uvāca māṁ nimantrya nṛpābhojya jalaṁ pītaṁ tvayādhama darśayāmi phalaṁ tasya duṣṭadaṇḍadharo hyaham

दुर्वासा ने कहा — हे अधम राजा! मुझे निमन्त्रित करके तूने बिना भोजन कराए ही जल पी लिया! मैं दुष्टों को दण्ड देने वाला हूँ, अब तुझे इसका फल दिखाता हूँ।

श्लोक 39 (shiva.shatarudra.19.39)

इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षो नृपं दग्धुं समुद्यतः । समुत्तस्थौ द्रुतं चक्रं तत्स्थं रक्षार्थमैश्वरम्

ityuktvā krodhatāmrākṣo nṛpaṁ dagdhuṁ samudyataḥ samuttasthau drutaṁ cakraṁ tatsthaṁ rakṣārthamaiśvaram

ऐसा कहकर क्रोध से लाल नेत्रों वाले वे राजा को भस्म करने को उद्यत हुए; तभी उनकी रक्षा के लिए वहाँ स्थित दिव्य चक्र शीघ्र उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 40 (shiva.shatarudra.19.40)

प्रजज्वालाति तं चक्रं मुनिं दग्धुं सुदर्शनम् । शिवरूपं तमज्ञात्वा शिवमायाविमोहितम्

prajajvālāti taṁ cakraṁ muniṁ dagdhuṁ sudarśanam śivarūpaṁ tamajñātvā śivamāyāvimohitam

वह सुदर्शन चक्र, उन्हें शिवस्वरूप न जानकर तथा शिव की माया से मोहित होकर, उस मुनि को भस्म करने के लिए अत्यंत प्रज्वलित हो उठा।

श्लोक 41 (shiva.shatarudra.19.41)

एतस्मिन्नन्तरे व्योमवाण्युवाचाशरीरिणी । अम्बरीषं महात्मानं ब्रह्मभक्तं च वैष्णवम्

etasminnantare vyomavāṇyuvācāśarīriṇī ambarīṣaṁ mahātmānaṁ brahmabhaktaṁ ca vaiṣṇavam

इसी बीच शरीररहित आकाशवाणी ने महात्मा, ब्रह्मभक्त तथा वैष्णव अम्बरीष से कहा —

श्लोक 42 (shiva.shatarudra.19.42)

व्योमवाण्युवाच । सुदर्शनमिदं चक्रं हरये शम्भुनार्पितम् । शान्तं कुरु प्रज्वलितमद्य दुर्वाससे नृप

vyomavāṇyuvāca sudarśanamidaṁ cakraṁ haraye śambhunārpitam śāntaṁ kuru prajvalitamadya durvāsase nṛpa

आकाशवाणी ने कहा — हे राजन्! यह सुदर्शन चक्र शम्भु द्वारा हरि को अर्पित किया गया है; आज दुर्वासा के प्रति प्रज्वलित हुए इसे शान्त करो।

श्लोक 43 (shiva.shatarudra.19.43)

दुर्वासायं शिवः साक्षात्स चक्रं हरयेऽर्पितम् । एवं साधारणमुनिं न जानीहि नृपोत्तम

durvāsāyaṁ śivaḥ sākṣātsa cakraṁ haraye'rpitam evaṁ sādhāraṇamuniṁ na jānīhi nṛpottama

यह दुर्वासा साक्षात् शिव हैं, और वही चक्र उन्होंने हरि को अर्पित किया था; हे राजश्रेष्ठ! इन्हें साधारण मुनि मत समझो।

श्लोक 44 (shiva.shatarudra.19.44)

तव धर्मपरीक्षार्थमागतोऽयं मुनीश्वरः । शरणं याहि तस्याशु भविष्यत्यन्यथा लयः

tava dharmaparīkṣārthamāgato'yaṁ munīśvaraḥ śaraṇaṁ yāhi tasyāśu bhaviṣyatyanyathā layaḥ

यह मुनीश्वर तुम्हारे धर्म की परीक्षा लेने के लिए आए हैं; शीघ्र उनकी शरण में जाओ, अन्यथा तुम्हारा विनाश हो जाएगा।

श्लोक 45 (shiva.shatarudra.19.45)

नन्दीश्वर उवाच । इत्युक्त्वा च नभोवाणी विरराम मुनीश्वर । अस्तावीत्स हरांशं तमम्बरीषोऽपि चादरात्

nandīśvara uvāca ityuktvā ca nabhovāṇī virarāma munīśvara astāvītsa harāṁśaṁ tamambarīṣo'pi cādarāt

नन्दीश्वर ने कहा — हे मुनीश्वर! ऐसा कहकर वह आकाशवाणी शान्त हो गई; और अम्बरीष ने भी आदरपूर्वक उस हर के अंश की स्तुति की।

श्लोक 46 (shiva.shatarudra.19.46)

अम्बरीष उवाच । यद्यस्ति दत्तमिष्टं च स्वधर्मो वा स्वनुष्ठितः । कुलं नो विप्रदैवं चेद्धरेरस्त्रं प्रशाम्यतु

ambarīṣa uvāca yadyasti dattamiṣṭaṁ ca svadharmo vā svanuṣṭhitaḥ kulaṁ no vipradaivaṁ ceddharerastraṁ praśāmyatu

अम्बरीष ने कहा — यदि मेरे द्वारा कोई दान, यज्ञ अथवा अपना स्वधर्म भलीभाँति किया गया हो, यदि मेरा कुल ब्राह्मणों और देवताओं को प्रिय हो, तो हरि का यह अस्त्र शान्त हो जाए।

श्लोक 47 (shiva.shatarudra.19.47)

यदि नो भगवान्प्रीतो मद्भक्तो भक्तवत्सलः । सुदर्शनमिदं चास्त्रं प्रशाम्यतु विशेषतः

yadi no bhagavānprīto madbhakto bhaktavatsalaḥ sudarśanamidaṁ cāstraṁ praśāmyatu viśeṣataḥ

यदि भक्तवत्सल भगवान् मुझ भक्त से प्रसन्न हैं, तो यह सुदर्शन अस्त्र विशेष रूप से शान्त हो जाए।

श्लोक 48 (shiva.shatarudra.19.48)

नन्दीश्वर उवाच । इति स्तुवति रुद्राग्रे शैवं चक्रं सुदर्शनम् । अशाम्यत्सर्वथा ज्ञात्वा तं शिवांशं सुलब्धधीः

nandīśvara uvāca iti stuvati rudrāgre śaivaṁ cakraṁ sudarśanam aśāmyatsarvathā jñātvā taṁ śivāṁśaṁ sulabdhadhīḥ

नन्दीश्वर ने कहा — इस प्रकार रुद्र के सम्मुख स्तुति करते हुए, उस शैव सुदर्शन चक्र ने उन्हें शिव का अंश जानकर सुबुद्धिपूर्वक सर्वथा शान्त हो जाना स्वीकार किया।

श्लोक 49 (shiva.shatarudra.19.49)

अथाम्बरीषः स नृपः प्रणनाम च तं मुनिम् । शिवावतारं संज्ञाय स्वपरीक्षार्थमागतम्

athāmbarīṣaḥ sa nṛpaḥ praṇanāma ca taṁ munim śivāvatāraṁ saṁjñāya svaparīkṣārthamāgatam

तब राजा अम्बरीष ने उस मुनि को, जो अपनी परीक्षा के लिए आए शिव के अवतार थे, यह जानकर प्रणाम किया।

श्लोक 50 (shiva.shatarudra.19.50)

सुप्रसन्नो बभूवाथ स मुनिः शङ्करांशजः । भुक्त्वा तस्मै वरं दत्त्वा स्वाभीष्टं स्वालयं ययौ

suprasanno babhūvātha sa muniḥ śaṅkarāṁśajaḥ bhuktvā tasmai varaṁ dattvā svābhīṣṭaṁ svālayaṁ yayau

शंकर के अंश से उत्पन्न वे मुनि अत्यंत प्रसन्न हो गए; भोजन करके उन्हें वर देकर वे अपने इच्छित स्थान को चले गए।

श्लोक 51 (shiva.shatarudra.19.51)

अम्बरीषपरीक्षायां दुर्वासश्चरितं मुने । प्रोक्तामन्यच्चरित्रं त्वं शृणु तस्य मुनीश्वर

ambarīṣaparīkṣāyāṁ durvāsaścaritaṁ mune proktāmanyaccaritraṁ tvaṁ śṛṇu tasya munīśvara

हे मुनीश्वर! अम्बरीष की परीक्षा में यह दुर्वासा का चरित्र कहा गया; अब उनका एक अन्य चरित्र सुनो, जो कहा जाता है।

श्लोक 52 (shiva.shatarudra.19.52)

पुनर्दाशरथेश्चक्रे परीक्षां नियमेन वै । मुनिरूपेण कालेन यः कृतो नियमो मुने

punardāśaratheścakre parīkṣāṁ niyamena vai munirūpeṇa kālena yaḥ kṛto niyamo mune

उन्होंने पुनः नियम के विषय में दशरथपुत्र (राम) की परीक्षा की — मुनि-रूप में काल के द्वारा किया गया वह नियम।

श्लोक 53 (shiva.shatarudra.19.53)

तदैव मुनिना तेन सौमित्रिः प्रेषितो हठात् । तं तत्याज द्रुतं रामो बन्धुं पणवशान्मुने

tadaiva muninā tena saumitriḥ preṣito haṭhāt taṁ tatyāja drutaṁ rāmo bandhuṁ paṇavaśānmune

हे मुने! उसी समय उस मुनि ने बलपूर्वक लक्ष्मण (सौमित्रि) को भेज दिया, और राम ने अपनी प्रतिज्ञा के वशीभूत होकर शीघ्र ही अपने उस बन्धु का त्याग कर दिया।

श्लोक 54 (shiva.shatarudra.19.54)

सा कथा विदिता लोके मुनिभिर्बहुधोदिता । नातो मे विस्तरात्प्रोक्ता ज्ञाता यत्सर्वथा बुधैः

sā kathā viditā loke munibhirbahudhoditā nāto me vistarātproktā jñātā yatsarvathā budhaiḥ

वह कथा संसार में सर्वविदित है और मुनियों द्वारा अनेक प्रकार से कही गई है; इसलिए मैंने उसे यहाँ विस्तार से नहीं कहा, क्योंकि विद्वान उसे सर्वथा जानते हैं।

श्लोक 55 (shiva.shatarudra.19.55)

नियमं सुदृढं दृष्ट्वा सुप्रसन्नोऽभवन्मुनिः । दुर्वासाः सप्रसन्नात्मा वरं तस्मै प्रदत्तवान्

niyamaṁ sudṛḍhaṁ dṛṣṭvā suprasanno'bhavanmuniḥ durvāsāḥ saprasannātmā varaṁ tasmai pradattavān

उस दृढ़ नियम को देखकर वे मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए; प्रसन्नचित्त दुर्वासा ने उन्हें वर प्रदान किया।

श्लोक 56 (shiva.shatarudra.19.56)

श्रीकृष्णनियमस्यापि परीक्षां स चकार ह । तां शृणु त्वं मुनिश्रेष्ठ कथयामि कथां च ताम्

śrīkṛṣṇaniyamasyāpi parīkṣāṁ sa cakāra ha tāṁ śṛṇu tvaṁ muniśreṣṭha kathayāmi kathāṁ ca tām

उन्होंने श्रीकृष्ण के नियम की भी परीक्षा की; हे मुनिश्रेष्ठ! वह कथा सुनो, मैं वह कथा कहता हूँ।

श्लोक 57 (shiva.shatarudra.19.57)

ब्रह्मप्रार्थनया विष्णुर्वसुदेवसुतोऽभवत् । धराभारावतारार्थं साधूनां रक्षणाय च

brahmaprārthanayā viṣṇurvasudevasuto'bhavat dharābhārāvatārārthaṁ sādhūnāṁ rakṣaṇāya ca

ब्रह्मा की प्रार्थना से विष्णु पृथ्वी का भार उतारने तथा साधुजनों की रक्षा के लिए वसुदेव के पुत्र हुए।

श्लोक 58 (shiva.shatarudra.19.58)

हत्वा दुष्टान्महापापान् ब्रह्मद्रोहकरान्खलान् । ररक्ष निखिलान्साधून्ब्राह्मणान्कृष्णनामभाक्

hatvā duṣṭānmahāpāpān brahmadrohakarānkhalān rarakṣa nikhilānsādhūnbrāhmaṇānkṛṣṇanāmabhāk

कृष्ण नाम धारण करने वाले उन्होंने ब्रह्मद्रोही, महापापी दुष्टों का वध कर समस्त साधुजनों और ब्राह्मणों की रक्षा की।

श्लोक 59 (shiva.shatarudra.19.59)

ब्रह्मभक्तिं चकाराति स कृष्णो वसुदेवजः । नित्यं हि भोजयामास सुरसान्ब्राह्मणान्बहून्

brahmabhaktiṁ cakārāti sa kṛṣṇo vasudevajaḥ nityaṁ hi bhojayāmāsa surasānbrāhmaṇānbahūn

वसुदेव-पुत्र उस कृष्ण ने ब्राह्मणों के प्रति अत्यंत भक्ति दिखाई और नित्य ही अनेक रसयुक्त भोजन से ब्राह्मणों को भोजन कराया।

श्लोक 60 (shiva.shatarudra.19.60)

ब्रह्मभक्तो विशेषेण कृष्णश्चेति प्रथामगात् । सन्द्रष्टुकामः स मुनिः कृष्णान्तिकमगान्मुने

brahmabhakto viśeṣeṇa kṛṣṇaśceti prathāmagāt sandraṣṭukāmaḥ sa muniḥ kṛṣṇāntikamagānmune

"कृष्ण विशेष रूप से ब्राह्मण-भक्त हैं" — यह ख्याति फैल गई; उन्हें देखने की इच्छा से वह मुनि, हे मुने! कृष्ण के समीप गए।

श्लोक 61 (shiva.shatarudra.19.61)

रुक्मिणीसहितं कृष्णं सन्नं कृत्वा रथे स्वयम् । संयोज्य संस्थितो वाहं सुप्रसन्न उवाह तम्

rukmiṇīsahitaṁ kṛṣṇaṁ sannaṁ kṛtvā rathe svayam saṁyojya saṁsthito vāhaṁ suprasanna uvāha tam

कृष्ण ने रुक्मिणी सहित स्वयं को रथ में जोड़कर, स्वयं वाहन बनकर, अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक उन्हें रथ पर बिठाकर खींचा।

श्लोक 62 (shiva.shatarudra.19.62)

मुनी रथात्समुत्तीर्य दृष्ट्वा तां दृढतां पराम् । तस्मै भूत्वा सुप्रसन्नो वज्राङ्गत्ववरं ददौ

munī rathātsamuttīrya dṛṣṭvā tāṁ dṛḍhatāṁ parām tasmai bhūtvā suprasanno vajrāṅgatvavaraṁ dadau

उस परम दृढ़ता को देखकर मुनि रथ से उतरे और अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें वज्र के समान अंग होने का वरदान दिया।

श्लोक 63 (shiva.shatarudra.19.63)

द्युनद्यामेकदा स्नानं कुर्वन्नग्नो बभूव ह । लज्जितोऽभून्मुनिश्रेष्ठो दुर्वासाः कौतुकी मुने

dyunadyāmekadā snānaṁ kurvannagno babhūva ha lajjito'bhūnmuniśreṣṭho durvāsāḥ kautukī mune

एक बार दिव्य नदी (गंगा) में स्नान करते समय क्रीड़ाशील मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा नग्न हो गए और हे मुने! लज्जित हो उठे।

श्लोक 64 (shiva.shatarudra.19.64)

तज्ज्ञात्वा द्रौपदी स्नानं कुर्वती तत्र चादरात् । तल्लज्जां छादयामास भिन्नस्वाञ्चलदानतः

tajjñātvā draupadī snānaṁ kurvatī tatra cādarāt tallajjāṁ chādayāmāsa bhinnasvāñcaladānataḥ

यह जानकर वहाँ स्नान करती हुई द्रौपदी ने आदरपूर्वक अपने वस्त्र के फटे हुए आँचल के टुकड़े से उनकी लज्जा को ढक दिया।

श्लोक 65 (shiva.shatarudra.19.65)

तदादाय प्रवाहेनागतं स्वनिकटं मुनिः । तेनाच्छाद्य स्वगुह्यं च तस्यै तुष्टो बभूव सः

tadādāya pravāhenāgataṁ svanikaṭaṁ muniḥ tenācchādya svaguhyaṁ ca tasyai tuṣṭo babhūva saḥ

उस बहते हुए टुकड़े को अपने समीप आते देख मुनि ने उससे अपने गुह्य अंग को ढक लिया और वे उस पर प्रसन्न हो गए।

श्लोक 66 (shiva.shatarudra.19.66)

द्रौपद्यै च वरं प्रादात्तदञ्चलविवर्द्धनम् । पाण्डवान्सुखिनश्चक्रे द्रौपदी तद्वरात्पुनः

draupadyai ca varaṁ prādāttadañcalavivarddhanam pāṇḍavānsukhinaścakre draupadī tadvarātpunaḥ

उन्होंने द्रौपदी को यह वरदान दिया कि उनके वस्त्र का आँचल सदा बढ़ता रहेगा; उसी वरदान से द्रौपदी ने पुनः पाण्डवों को सुखी किया।

श्लोक 67 (shiva.shatarudra.19.67)

हंसडिम्भौ नृपौ कौचित्स्वावमानकरौ खलौ । दत्त्वा निदेशं च हरेर्नाशयामास स प्रभुः

haṁsaḍimbhau nṛpau kaucitsvāvamānakarau khalau dattvā nideśaṁ ca harernāśayāmāsa sa prabhuḥ

हंस और डिम्भ नामक दो दुष्ट राजाओं ने कहीं उनका अपमान किया था; उन्होंने हरि को आदेश देकर उन दोनों का नाश करा दिया।

श्लोक 68 (shiva.shatarudra.19.68)

ब्रह्मतेजो विशेषेण स्थापयामास भूतले । संन्यासपद्धतिं चैव यथाशास्त्रविधिक्रमम्

brahmatejo viśeṣeṇa sthāpayāmāsa bhūtale saṁnyāsapaddhatiṁ caiva yathāśāstravidhikramam

उन्होंने पृथ्वी पर विशेष रूप से ब्रह्मतेज की तथा शास्त्रोक्त विधि-क्रम के अनुसार संन्यास-पद्धति की स्थापना की।

श्लोक 69 (shiva.shatarudra.19.69)

बहूनुद्धारयामास सूपदेशं विबोध्य च । ज्ञानं दत्त्वा विशेषेण बहून्मुक्तांश्चकार सः

bahūnuddhārayāmāsa sūpadeśaṁ vibodhya ca jñānaṁ dattvā viśeṣeṇa bahūnmuktāṁścakāra saḥ

सुन्दर उपदेश से जगाकर उन्होंने बहुतों का उद्धार किया; विशेष रूप से ज्ञान देकर उन्होंने बहुतों को मुक्त कर दिया।

श्लोक 70 (shiva.shatarudra.19.70)

इत्थं चक्रे स दुर्वासा विचित्रं चरितं बहु । धन्यं यशस्यमायुष्यं शृण्वतः सर्वकामदम्

itthaṁ cakre sa durvāsā vicitraṁ caritaṁ bahu dhanyaṁ yaśasyamāyuṣyaṁ śṛṇvataḥ sarvakāmadam

इस प्रकार उन दुर्वासा ने अनेक विचित्र चरित्र किए, जो धन्य, यशस्वी, आयु बढ़ाने वाले तथा सुनने वालों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।

श्लोक 71 (shiva.shatarudra.19.71)

य इदं शृणुयाद्भक्त्या दुर्वासश्चरितं मुदा । श्रावयेद्वा परान् यश्च स सुखीह परत्र च

ya idaṁ śṛṇuyādbhaktyā durvāsaścaritaṁ mudā śrāvayedvā parān yaśca sa sukhīha paratra ca

जो भक्तिपूर्वक और आनन्दपूर्वक इस दुर्वासा-चरित्र को सुनता है अथवा दूसरों को सुनाता है, वह यहाँ और परलोक में सुखी होता है।

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