शतरुद्र संहिता · अध्याय 20
हनुमदवतारचरित्रवर्णन
श्लोक 1 (shiva.shatarudra.20.1)
नन्दीश्वर उवाच । अतः परं शृणु प्रीत्या हनुमच्चरितं मुने । यथा चकाराशु हरो लीलास्तद्रूपतो वराः
nandīśvara uvāca ataḥ paraṁ śṛṇu prītyā hanumaccaritaṁ mune yathā cakārāśu haro līlāstadrūpato varāḥ
नन्दीश्वर ने कहा — हे मुने! अब आगे प्रेमपूर्वक हनुमान का चरित्र सुनो — जिस प्रकार हर ने शीघ्र ही उस रूप में उत्तम लीलाएँ कीं।
श्लोक 2 (shiva.shatarudra.20.2)
चकार सुहितं प्रीत्या रामस्य परमेश्वरः । तत्सर्वं चरितं विप्र शृणु सर्वसुखावहम्
cakāra suhitaṁ prītyā rāmasya parameśvaraḥ tatsarvaṁ caritaṁ vipra śṛṇu sarvasukhāvaham
परमेश्वर ने प्रेमपूर्वक राम का हित सम्पन्न किया; हे विप्र! वह सम्पूर्ण चरित्र सुनो, जो सर्वसुखदायक है।
श्लोक 3 (shiva.shatarudra.20.3)
एकस्मिन्समये शम्भुरद्भुतोतिकरः प्रभुः । ददर्श मोहिनीरूपं विष्णोः स हि वसेद्गुणः
ekasminsamaye śambhuradbhutotikaraḥ prabhuḥ dadarśa mohinīrūpaṁ viṣṇoḥ sa hi vasedguṇaḥ
एक बार शम्भु, अद्भुत कार्य करने वाले प्रभु, ने विष्णु के मोहिनी रूप को देखा, जिसमें वह गुण निवास करता है।
श्लोक 4 (shiva.shatarudra.20.4)
चक्रे स्वं क्षुभितं शम्भुः कामबाणहतो यथा । स्वं वीर्यं पातयामास रामकार्यार्थमीश्वरः
cakre svaṁ kṣubhitaṁ śambhuḥ kāmabāṇahato yathā svaṁ vīryaṁ pātayāmāsa rāmakāryārthamīśvaraḥ
शम्भु मानो कामबाण से आहत होकर स्वयं क्षुब्ध हो उठे; राम के कार्य के लिए ईश्वर ने अपना वीर्य गिरा दिया।
श्लोक 5 (shiva.shatarudra.20.5)
तद्वीर्यं स्थापयामासुः पत्रे सप्तर्षयश्च ते । प्रेरिता मनसा तेन रामकार्यार्थमादरात्
tadvīryaṁ sthāpayāmāsuḥ patre saptarṣayaśca te preritā manasā tena rāmakāryārthamādarāt
उस वीर्य को उन सप्तर्षियों ने, राम के कार्य हेतु उनके मन से प्रेरित होकर, आदरपूर्वक एक पत्ते पर स्थापित किया।
श्लोक 6 (shiva.shatarudra.20.6)
तैर्गौतमसुतायां तद्वीर्यं शम्भोर्महर्षिभिः । कर्णद्वारा तथाञ्जन्यां रामकार्यार्थमाहितम्
tairgautamasutāyāṁ tadvīryaṁ śambhormaharṣibhiḥ karṇadvārā tathāñjanyāṁ rāmakāryārthamāhitam
उन महर्षियों ने शम्भु के उस वीर्य को गौतम-पुत्री अंजनी के कान द्वारा राम के कार्य हेतु उनमें स्थापित कर दिया।
श्लोक 7 (shiva.shatarudra.20.7)
ततश्च समये तस्माद्धनूमानिति नामभाक् । शम्भुर्जज्ञे कपितनुर्महाबलपराक्रमः
tataśca samaye tasmāddhanūmāniti nāmabhāk śambhurjajñe kapitanurmahābalaparākramaḥ
तत्पश्चात् उचित समय पर शम्भु उस वीर्य से हनूमान नाम से वानर-शरीर धारण कर महान बल-पराक्रम वाले उत्पन्न हुए।
श्लोक 8 (shiva.shatarudra.20.8)
हनूमान्स कपीशानः शिशुरेव महाबलः । रविबिम्बं बभक्षाशु ज्ञात्वा लघुफलं प्रगे
hanūmānsa kapīśānaḥ śiśureva mahābalaḥ ravibimbaṁ babhakṣāśu jñātvā laghuphalaṁ prage
वे हनूमान, वानरों के स्वामी, बालक होते हुए भी महान बल वाले थे; उन्होंने प्रातःकाल सूर्यबिम्ब को छोटा फल समझकर शीघ्र निगल लिया।
श्लोक 9 (shiva.shatarudra.20.9)
देवप्रार्थनया तं सोऽत्यजज्ज्ञात्वा महाबलम् । शिवावतारं च प्राप वरान्दत्तान् सुरर्षभिः
devaprārthanayā taṁ so'tyajajjñātvā mahābalam śivāvatāraṁ ca prāpa varāndattān surarṣabhiḥ
देवताओं की प्रार्थना पर उन्हें महाबली जानकर उन्होंने सूर्य को छोड़ दिया, और देवश्रेष्ठों द्वारा दिए गए वरों को प्राप्त कर शिवावतार की पदवी पाई।
श्लोक 10 (shiva.shatarudra.20.10)
स्वजनन्यन्तिकं प्रागादथ सोऽतिप्रहर्षितः । हनूमान्सर्वमाचख्यौ तस्यै तद् वृत्तमादरात्
svajananyantikaṁ prāgādatha so'tipraharṣitaḥ hanūmānsarvamācakhyau tasyai tad vṛttamādarāt
तत्पश्चात् अत्यंत हर्षित होकर हनूमान अपनी माता के समीप गए और आदरपूर्वक उन्हें वह सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया।
श्लोक 11 (shiva.shatarudra.20.11)
तदाज्ञया ततो धीरः सर्वविद्यामयत्नतः । सूर्यात्पपाठ स कपिर्गत्वा नित्यं तदन्तिकम्
tadājñayā tato dhīraḥ sarvavidyāmayatnataḥ sūryātpapāṭha sa kapirgatvā nityaṁ tadantikam
तब उनकी आज्ञा से वह धीर वानर सूर्य के पास प्रतिदिन जाकर बिना किसी प्रयास के समस्त विद्याएँ पढ़ने लगा।
श्लोक 12 (shiva.shatarudra.20.12)
सूर्याज्ञया तदंशत्य सुग्रीवस्यान्तिकं ययौ । मातुराज्ञामनुप्राप्य रुद्रांशः कपिसत्तमः
sūryājñayā tadaṁśatya sugrīvasyāntikaṁ yayau māturājñāmanuprāpya rudrāṁśaḥ kapisattamaḥ
सूर्य की आज्ञा से और माता की अनुमति प्राप्त कर वह रुद्रांश, वानरों में श्रेष्ठ, सुग्रीव के समीप गया।
श्लोक 13 (shiva.shatarudra.20.13)
ज्येष्ठभ्रात्रा वालिना हि स्वस्त्रीभोक्त्रा तिरस्कृतः । ऋष्यमूकगिरौ तेन न्यवसत्स हनूमता
jyeṣṭhabhrātrā vālinā hi svastrībhoktrā tiraskṛtaḥ ṛṣyamūkagirau tena nyavasatsa hanūmatā
अपनी पत्नी के भोक्ता बड़े भाई से तिरस्कृत सुग्रीव, हनूमान के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहने लगा।
श्लोक 14 (shiva.shatarudra.20.14)
ततोऽभूत्स सुकण्ठस्य मन्त्री कपिवरः सुधीः । सर्वथा सुहितं चक्रे सुग्रीवस्य हरांशजः
tato'bhūtsa sukaṇṭhasya mantrī kapivaraḥ sudhīḥ sarvathā suhitaṁ cakre sugrīvasya harāṁśajaḥ
तब हर के अंश से उत्पन्न वह सुबुद्धि, श्रेष्ठ वानर सुग्रीव का मंत्री बना और सर्वथा उनका हित सम्पादन करने लगा।
श्लोक 15 (shiva.shatarudra.20.15)
तत्रागतेन सभ्रात्रा हृतभार्येण दुःखिना । कारयामास रामेण तस्य सख्यं सुखावहम्
tatrāgatena sabhrātrā hṛtabhāryeṇa duḥkhinā kārayāmāsa rāmeṇa tasya sakhyaṁ sukhāvaham
वहाँ आए हुए, पत्नी के हरे जाने से दुःखी, भाई सहित राम के साथ उसने सुग्रीव की सुखदायक मित्रता कराई।
श्लोक 16 (shiva.shatarudra.20.16)
घातयामास रामश्च वालिनं कपिकुञ्जरम् । भ्रातृपत्न्याश्च भोक्तारं पापिनं वीरमानिनम्
ghātayāmāsa rāmaśca vālinaṁ kapikuñjaram bhrātṛpatnyāśca bhoktāraṁ pāpinaṁ vīramāninam
और राम ने उस वानरश्रेष्ठ वालि का, जो अपने भाई की पत्नी का भोक्ता, पापी तथा स्वयं को वीर मानने वाला था, वध करा दिया।
श्लोक 17 (shiva.shatarudra.20.17)
ततो रामाज्ञया तात हनूमान्वानरेश्वरः । स सीतान्वेषणं चक्रे बहुभिर्वानरैः सुधीः
tato rāmājñayā tāta hanūmānvānareśvaraḥ sa sītānveṣaṇaṁ cakre bahubhirvānaraiḥ sudhīḥ
हे तात! तत्पश्चात् राम की आज्ञा से वानरेश्वर बुद्धिमान हनूमान ने अनेक वानरों सहित सीता की खोज की।
श्लोक 18 (shiva.shatarudra.20.18)
ज्ञात्वा लङ्कागतां सीतां गतस्तत्र कपीश्वरः । द्रुतमुल्लङ्घ्य सिन्धुं तमनिस्तीर्यं परैः स वै
jñātvā laṅkāgatāṁ sītāṁ gatastatra kapīśvaraḥ drutamullaṅghya sindhuṁ tamanistīryaṁ paraiḥ sa vai
सीता को लंका में जानकर वह कपीश्वर वहाँ गया, और दूसरों द्वारा जिसे पार न किया जा सके, उस समुद्र को शीघ्र लांघ गया।
श्लोक 19 (shiva.shatarudra.20.19)
चक्रेऽद्भुतचरित्रं स तत्र विक्रमसंयुतम् । अभिज्ञानं ददौ प्रीत्या सीतायै स्वप्रभोर्वरम्
cakre'dbhutacaritraṁ sa tatra vikramasaṁyutam abhijñānaṁ dadau prītyā sītāyai svaprabhorvaram
उन्होंने वहाँ पराक्रम से युक्त अद्भुत चरित्र किया, और प्रेमपूर्वक सीता को अपने स्वामी की पहचान का वर (अंगूठी) दिया।
श्लोक 20 (shiva.shatarudra.20.20)
सीताशोकं जहाराशु स वीरः कपिनायकः । श्रावयित्वा रामवृत्तं तत्प्राणावनकारकम्
sītāśokaṁ jahārāśu sa vīraḥ kapināyakaḥ śrāvayitvā rāmavṛttaṁ tatprāṇāvanakārakam
उस वीर वानरनायक ने राम का वृत्तान्त सुनाकर, जो सीता के प्राणों की रक्षा करने वाला था, उनके शोक को शीघ्र दूर कर दिया।
श्लोक 21 (shiva.shatarudra.20.21)
तदभिज्ञानमादाय निवृत्तो रामसन्निधिम् । रावणाराममाहत्य जघान बहुराक्षसान्
tadabhijñānamādāya nivṛtto rāmasannidhim rāvaṇārāmamāhatya jaghāna bahurākṣasān
उस पहचान-चिह्न को लेकर वह राम के समीप लौटा, और रावण के उद्यान को उजाड़कर अनेक राक्षसों का वध किया।
श्लोक 22 (shiva.shatarudra.20.22)
तदैव रावणसुतं हत्वा सबहुराक्षसम् । स महोपद्रवं चक्रे महोतिस्तत्र निर्भयः
tadaiva rāvaṇasutaṁ hatvā sabahurākṣasam sa mahopadravaṁ cakre mahotistatra nirbhayaḥ
उसी समय अनेक राक्षसों सहित रावण-पुत्र का वध कर वह महाबली, निर्भय होकर वहाँ महान उत्पात मचाने लगा।
श्लोक 23 (shiva.shatarudra.20.23)
यदा दग्धो रावणेनावगुण्ठ्य वसनानि च । तैलाभ्यक्तानि सुदृढं महाबलवता मुने
yadā dagdho rāvaṇenāvaguṇṭhya vasanāni ca tailābhyaktāni sudṛḍhaṁ mahābalavatā mune
हे मुने! जब महाबली रावण द्वारा उनकी पूंछ को तेल में भिगोए वस्त्रों से दृढ़तापूर्वक लपेटकर जलाया गया,
श्लोक 24 (shiva.shatarudra.20.24)
उत्प्लुत्योत्प्लुत्य च तदा महादेवांशजः कपिः । ददाह लङ्कां निखिलां कृत्वा व्याजं तमेव हि
utplutyotplutya ca tadā mahādevāṁśajaḥ kapiḥ dadāha laṅkāṁ nikhilāṁ kṛtvā vyājaṁ tameva hi
तब महादेव के अंश से उत्पन्न वह वानर बार-बार उछलते हुए, उन्हीं का वह छल उन्हीं पर प्रयोग करते हुए, समस्त लंका को जला डाला।
श्लोक 25 (shiva.shatarudra.20.25)
दग्ध्वा लङ्कां वञ्चयित्वा विभीषणगृहं ततः । अपतद्वारिधौ वीरस्ततः स कपिकुञ्जरः
dagdhvā laṅkāṁ vañcayitvā vibhīṣaṇagṛhaṁ tataḥ apatadvāridhau vīrastataḥ sa kapikuñjaraḥ
लंका को जलाकर तथा विभीषण के घर को बचाकर, वह वीर कपिश्रेष्ठ तत्पश्चात् समुद्र में कूद पड़ा।
श्लोक 26 (shiva.shatarudra.20.26)
स्वपुच्छं तत्र निर्वाप्य प्राप तस्य परन्तटम् । अखिन्नः स ययौ रामसन्निधिं गिरिशांशजः
svapucchaṁ tatra nirvāpya prāpa tasya parantaṭam akhinnaḥ sa yayau rāmasannidhiṁ giriśāṁśajaḥ
वहाँ अपनी पूंछ बुझाकर वह उस समुद्र के दूसरे तट पर पहुँचा; गिरीश के अंश से उत्पन्न वह बिना थके राम के समीप गया।
श्लोक 27 (shiva.shatarudra.20.27)
अविलम्बेन सुजवो हनूमान् कपिसत्तमः । रामोपकण्ठमागत्य ददौ सीताशिरोमणिम्
avilambena sujavo hanūmān kapisattamaḥ rāmopakaṇṭhamāgatya dadau sītāśiromaṇim
वानरों में श्रेष्ठ, अत्यंत वेगवान् हनूमान बिना विलम्ब किए राम के निकट पहुँचकर उन्हें सीता की शिरोमणि (चूड़ामणि) प्रदान की।
श्लोक 28 (shiva.shatarudra.20.28)
ततस्तदाज्ञया वीरः सिन्धौ सेतुमबन्धयत् । वानरैः स समानीय बहून् गिरिवरान् बली
tatastadājñayā vīraḥ sindhau setumabandhayat vānaraiḥ sa samānīya bahūn girivarān balī
तब उनकी आज्ञा से उस बलवान वीर ने वानरों सहित अनेक श्रेष्ठ पर्वतों को लाकर समुद्र पर सेतु बांधा।
श्लोक 29 (shiva.shatarudra.20.29)
गत्वा तत्र ततो रामस्तर्तुकामो यथा ततः । शिवलिङ्गं समानर्च प्रतिष्ठाप्य जयेप्सया
gatvā tatra tato rāmastartukāmo yathā tataḥ śivaliṅgaṁ samānarca pratiṣṭhāpya jayepsayā
वहाँ जाकर, समुद्र पार करने की इच्छा से राम ने विजय की कामना से शिवलिंग की स्थापना कर उसकी पूजा की।
श्लोक 30 (shiva.shatarudra.20.30)
तद्वरात्स जयं प्राप्य वरं तीर्त्वोदधिं ततः । लङ्कामावृत्य कपिभी रणं चक्रे स राक्षसैः
tadvarātsa jayaṁ prāpya varaṁ tīrtvodadhiṁ tataḥ laṅkāmāvṛtya kapibhī raṇaṁ cakre sa rākṣasaiḥ
उस वर से विजय प्राप्त कर, समुद्र पार करके, वानरों सहित लंका को घेरकर उन्होंने राक्षसों से युद्ध किया।
श्लोक 31 (shiva.shatarudra.20.31)
जघानाथासुरान्वीरो रामसैन्यं ररक्ष सः । शक्तिक्षतं लक्ष्मणं च सञ्जीविन्या ह्यजीवयत्
jaghānāthāsurānvīro rāmasainyaṁ rarakṣa saḥ śaktikṣataṁ lakṣmaṇaṁ ca sañjīvinyā hyajīvayat
उस वीर ने असुरों का वध कर राम की सेना की रक्षा की, तथा शक्ति से घायल लक्ष्मण को संजीवनी से जीवित कर दिया।
श्लोक 32 (shiva.shatarudra.20.32)
सर्वथा सुखिनं चक्रे सरामं लक्ष्मणं हि सः । सर्वसैन्यं ररक्षासौ महादेवात्मजः प्रभुः
sarvathā sukhinaṁ cakre sarāmaṁ lakṣmaṇaṁ hi saḥ sarvasainyaṁ rarakṣāsau mahādevātmajaḥ prabhuḥ
महादेव-पुत्र उस प्रभु ने राम-लक्ष्मण दोनों को सर्वथा सुखी किया तथा समस्त सेना की रक्षा की।
श्लोक 33 (shiva.shatarudra.20.33)
रावणं परिवाराढ्यं नाशयामास विश्रमः । सुखीचकार देवान्स महाबलग्रहः कपिः
rāvaṇaṁ parivārāḍhyaṁ nāśayāmāsa viśramaḥ sukhīcakāra devānsa mahābalagrahaḥ kapiḥ
अथक, महाबली उस वानर ने परिवार सहित रावण का नाश किया और देवताओं को सुखी किया।
श्लोक 34 (shiva.shatarudra.20.34)
महीरावणसंज्ञं स हत्वा रामं सलक्ष्मणम् । तत्स्थानादानयामास स्वस्थानं परिपाल्य च
mahīrāvaṇasaṁjñaṁ sa hatvā rāmaṁ salakṣmaṇam tatsthānādānayāmāsa svasthānaṁ paripālya ca
महीरावण नामक राक्षस का वध कर उसने राम-लक्ष्मण को उस स्थान से वापस लाया और अपने स्थान की रक्षा की।
श्लोक 35 (shiva.shatarudra.20.35)
रामकार्यं चकाराशु सर्वथा कपिपुङ्गवः । असुरान्नमयामास नानालीलां चकार च
rāmakāryaṁ cakārāśu sarvathā kapipuṅgavaḥ asurānnamayāmāsa nānālīlāṁ cakāra ca
उस कपिश्रेष्ठ ने सर्वथा शीघ्र राम का कार्य सम्पन्न किया, असुरों को नमाया तथा नाना लीलाएँ कीं।
श्लोक 36 (shiva.shatarudra.20.36)
स्थापयामास भूलोके रामभक्तिं कपीश्वरः । स्वयं भक्तवरो भूत्वा सीतारामसुखप्रदः
sthāpayāmāsa bhūloke rāmabhaktiṁ kapīśvaraḥ svayaṁ bhaktavaro bhūtvā sītārāmasukhapradaḥ
उस कपीश्वर ने पृथ्वी पर राम-भक्ति की स्थापना की, स्वयं श्रेष्ठ भक्त बनकर सीता-राम को सुख देने वाला हुआ।
श्लोक 37 (shiva.shatarudra.20.37)
लक्ष्मणप्राणदाता च सर्वदेवमदापहः । रुद्रावतारो भगवान्भक्तोद्धारकरः स वै
lakṣmaṇaprāṇadātā ca sarvadevamadāpahaḥ rudrāvatāro bhagavānbhaktoddhārakaraḥ sa vai
लक्ष्मण को प्राण देने वाला, समस्त देवताओं का मद हरने वाला, वह भगवान रुद्रावतार वस्तुतः भक्तों का उद्धार करने वाला था।
श्लोक 38 (shiva.shatarudra.20.38)
हनुमान्स महावीरो रामकार्यकरः सदा । रामदूताभिधो लोके दैत्यघ्नो भक्तवत्सलः
hanumānsa mahāvīro rāmakāryakaraḥ sadā rāmadūtābhidho loke daityaghno bhaktavatsalaḥ
वह महावीर हनूमान सदा राम का कार्य करने वाला, संसार में रामदूत नाम से प्रसिद्ध, दैत्यों का नाशक तथा भक्तवत्सल है।
श्लोक 39 (shiva.shatarudra.20.39)
इति ते कथितं तात हनुमच्चरितं वरम् । धन्यं यशस्यमायुष्यं सर्वकामफलप्रदम्
iti te kathitaṁ tāta hanumaccaritaṁ varam dhanyaṁ yaśasyamāyuṣyaṁ sarvakāmaphalapradam
हे तात! इस प्रकार तुम्हें हनूमान का यह उत्तम चरित्र बताया गया, जो धन्य, यशस्वी, आयु बढ़ाने वाला तथा समस्त कामनाओं का फल देने वाला है।
श्लोक 40 (shiva.shatarudra.20.40)
य इदं शृणुयाद्भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः । स भुक्त्वेहाखिलान्कामान् अन्ते मोक्षं लभेत्परम्
ya idaṁ śṛṇuyādbhaktyā śrāvayedvā samāhitaḥ sa bhuktvehākhilānkāmān ante mokṣaṁ labhetparam
जो भक्तिपूर्वक इसे सुनता है अथवा एकाग्रचित्त होकर सुनाता है, वह यहाँ समस्त कामनाओं को भोगकर अंत में परम मोक्ष प्राप्त करता है।