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शतरुद्र संहिता · अध्याय 6

नन्दिकेश अवतार का वर्णन

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (shiva.shatarudra.6.1)

अथ नन्दीश्वरावतारमाह । सनत्कुमार उवाच । भवान्कथमनुप्राप्तो महादेवांशजः शिवम् । श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं वक्तुमर्हसि मे प्रभो

atha nandīśvarāvatāramāha sanatkumāra uvāca bhavānkathamanuprāpto mahādevāṁśajaḥ śivam śrotumicchāmi tatsarvaṁ vaktumarhasi me prabho

अब शिव नन्दीश्वर के अवतार का वर्णन करते हैं। सनत्कुमार ने कहा — आप महादेव के अंश से उत्पन्न होकर किस प्रकार शिव को प्राप्त हुए? हे प्रभो! मैं वह सब सुनना चाहता हूँ, आप मुझे बताने योग्य हैं।

श्लोक 2 (shiva.shatarudra.6.2)

नन्दीश्वर उवाच । सनत्कुमार सर्वज्ञ सावधानतया शृणु । यथाऽहं च शिवं प्राप्तो महादेवांशजो मुने

nandīśvara uvāca sanatkumāra sarvajña sāvadhānatayā śṛṇu yathā’haṁ ca śivaṁ prāpto mahādevāṁśajo mune

नन्दीश्वर ने कहा — हे सर्वज्ञ सनत्कुमार! सावधानी से सुनो, हे मुने! जैसे मैं महादेव के अंश से उत्पन्न होकर शिव को प्राप्त हुआ।

श्लोक 3 (shiva.shatarudra.6.3)

प्रजाकामः शिलादोऽभूदुक्तः पितृभिरादरात् । तदुद्धर्तुमना भक्त्या समुद्धारमभीप्सुभिः

prajākāmaḥ śilādo’bhūduktaḥ pitṛbhirādarāt taduddhartumanā bhaktyā samuddhāramabhīpsubhiḥ

संतान की कामना वाले शिलाद को, पितरों द्वारा आदरपूर्वक, भक्तिभाव से उसका उद्धार चाहते हुए, यह कहा गया।

श्लोक 4 (shiva.shatarudra.6.4)

अधोदृष्टिः सुधर्मात्मा शिलादो नाम वीर्यवान् । तस्यासीन्मुनिकैर्वृत्तिः शिवलोके च सोऽगमत्

adhodṛṣṭiḥ sudharmātmā śilādo nāma vīryavān tasyāsīnmunikairvṛttiḥ śivaloke ca so’gamat

नीचे दृष्टि रखने वाला, सुधर्मात्मा, वीर्यवान् शिलाद नामक मुनि था; उसकी वृत्ति मुनियों जैसी थी, और वह शिवलोक को प्राप्त हुआ।

श्लोक 5 (shiva.shatarudra.6.5)

शक्रमुद्दिश्य स मुनिस्तपस्तेपे सुदुःसहम् । निश्चलात्मा शिलादाख्यो बहुकालं दृढव्रतः

śakramuddiśya sa munistapastepe suduḥsaham niścalātmā śilādākhyo bahukālaṁ dṛḍhavrataḥ

उस शिलाद नामक मुनि ने इन्द्र को लक्ष्य कर, निश्चल चित्त और दृढ़व्रत होकर बहुत काल तक अत्यन्त दुःसह तप किया।

श्लोक 6 (shiva.shatarudra.6.6)

तपतस्तस्य तपसा सन्तुष्टोऽभूच्छतक्रतुः । जगाम च वरं दातुं सर्वदेवप्रभुस्तदा

tapatastasya tapasā santuṣṭo’bhūcchatakratuḥ jagāma ca varaṁ dātuṁ sarvadevaprabhustadā

उसके तप से प्रसन्न होकर शतक्रतु (इन्द्र), जो सम्पूर्ण देवताओं के स्वामी हैं, वर देने के लिए वहाँ गए।

श्लोक 7 (shiva.shatarudra.6.7)

शिलादमाह सुप्रीत्या शक्रस्तुष्टोऽस्मि तेऽनघ । तेन त्वं मुनिशार्दूल वरयस्व वरानिति

śilādamāha suprītyā śakrastuṣṭo’smi te’nagha tena tvaṁ muniśārdūla varayasva varāniti

इन्द्र ने प्रीतिपूर्वक शिलाद से कहा — हे निष्पाप! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; अतः हे मुनिश्रेष्ठ! वर माँगो।

श्लोक 8 (shiva.shatarudra.6.8)

ततः प्रणम्य देवेशं स्तुत्वा स्तुतिभिरादरात् । शिलादो मुनिशार्दूलस्तमाह सुकृताञ्जलिः

tataḥ praṇamya deveśaṁ stutvā stutibhirādarāt śilādo muniśārdūlastamāha sukṛtāñjaliḥ

तब देवेश को प्रणाम कर, आदरपूर्वक स्तुतियों से स्तवन कर, मुनिश्रेष्ठ शिलाद ने भली-भाँति हाथ जोड़कर उनसे कहा।

श्लोक 9 (shiva.shatarudra.6.9)

शिलाद उवाच । शतक्रतो सुरेशान सन्तुष्टो यदि मे प्रभो । अयोनिजं मुत्युहीनं पुत्रमिच्छामि सुव्रतम्

śilāda uvāca śatakrato sureśāna santuṣṭo yadi me prabho ayonijaṁ mutyuhīnaṁ putramicchāmi suvratam

शिलाद ने कहा — हे शतक्रतु, सुरेशान, हे प्रभो! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मैं अयोनिज, मृत्युरहित, सुव्रत पुत्र चाहता हूँ।

श्लोक 10 (shiva.shatarudra.6.10)

शक्र उवाच । पुत्रं दास्यामि पुत्रार्थिन्योनिजं मृत्युसंयुतम् । अन्यथा ते न दास्यामि मृत्युहीना न सन्ति वै

śakra uvāca putraṁ dāsyāmi putrārthinyonijaṁ mṛtyusaṁyutam anyathā te na dāsyāmi mṛtyuhīnā na santi vai

इन्द्र ने कहा — हे पुत्रार्थी! मैं तुम्हें योनिज और मृत्युसहित पुत्र दे सकता हूँ; इसके अतिरिक्त नहीं दे सकता, क्योंकि मृत्युरहित कोई नहीं होता।

श्लोक 11 (shiva.shatarudra.6.11)

न दास्यामि सुतं तेऽहं मृत्युहीनमयोनिजम् । हरिर्विधिश्च भगवान्किमुतान्यो महामुने

na dāsyāmi sutaṁ te’haṁ mṛtyuhīnamayonijam harirvidhiśca bhagavānkimutānyo mahāmune

मैं तुम्हें मृत्युरहित, अयोनिज पुत्र नहीं दे सकता; हरि और भगवान् विधाता भी नहीं दे सकते, फिर हे महामुने! अन्य की तो बात ही क्या।

श्लोक 12 (shiva.shatarudra.6.12)

तावपि त्रिपुरार्यङ्गसम्भवौ मरणान्वितौ । तयोरप्यायुषां मानं कथितं निगमे पृथक्

tāvapi tripurāryaṅgasambhavau maraṇānvitau tayorapyāyuṣāṁ mānaṁ kathitaṁ nigame pṛthak

वे दोनों (हरि और विधि) भी त्रिपुरारि (शिव) के अंग से उत्पन्न हुए हैं, और मरणधर्मी हैं; वेदों में उन दोनों की भी आयु का प्रमाण अलग-अलग कहा गया है।

श्लोक 13 (shiva.shatarudra.6.13)

तस्मादयोनिजे पुत्रे मृत्युहीने प्रयत्नतः । परित्यजाशां विप्रेन्द्र गृहाणात्मक्षमं सुतम्

tasmādayonije putre mṛtyuhīne prayatnataḥ parityajāśāṁ viprendra gṛhāṇātmakṣamaṁ sutam

अतः हे विप्रेन्द्र! अयोनिज और मृत्युरहित पुत्र की आशा पूर्णतः त्याग दो; अपने योग्य पुत्र ग्रहण करो।

श्लोक 14 (shiva.shatarudra.6.14)

किन्तु देवेश्वरो रुद्रः प्रसीदति महेश्वरः । सुदुर्लभो मृत्युहीनस्तव पुत्रो ह्ययोनिजः

kintu deveśvaro rudraḥ prasīdati maheśvaraḥ sudurlabho mṛtyuhīnastava putro hyayonijaḥ

किन्तु यदि देवेश्वर रुद्र महेश्वर प्रसन्न हो जाएँ, तो तुम्हें अत्यन्त दुर्लभ, मृत्युरहित, अयोनिज पुत्र मिल सकता है।

श्लोक 15 (shiva.shatarudra.6.15)

अहं च विष्णुर्भगवान् द्रुहिणश्च महामुने । अयोनिजं मृत्युहीनं पुत्रं दातुं न शक्नुमः

ahaṁ ca viṣṇurbhagavān druhiṇaśca mahāmune ayonijaṁ mṛtyuhīnaṁ putraṁ dātuṁ na śaknumaḥ

हे महामुने! मैं, भगवान् विष्णु और ब्रह्मा भी अयोनिज मृत्युरहित पुत्र देने में समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 16 (shiva.shatarudra.6.16)

आराधय महादेवं तत्पुत्रविनिकाम्यया । सर्वेश्वरो महाशक्तः स ते पुत्रं प्रदास्यति

ārādhaya mahādevaṁ tatputravinikāmyayā sarveśvaro mahāśaktaḥ sa te putraṁ pradāsyati

उस पुत्र की कामना से महादेव की आराधना करो; वे सर्वेश्वर महाशक्तिशाली तुम्हें पुत्र प्रदान करेंगे।

श्लोक 17 (shiva.shatarudra.6.17)

नन्दीश्वर उवाच । एवं व्याहृत्य विप्रेन्द्रमनुगृह्य च तं घृणी । देवैर्वृतः सुरेशानः स्वलोकं समगान्मुने

nandīśvara uvāca evaṁ vyāhṛtya viprendramanugṛhya ca taṁ ghṛṇī devairvṛtaḥ sureśānaḥ svalokaṁ samagānmune

नन्दीश्वर ने कहा — इस प्रकार कहकर, कृपालु सुरेशान इन्द्र उस विप्रेन्द्र पर अनुग्रह करके, देवताओं से घिरे हुए, अपने लोक को चले गए, हे मुने!

श्लोक 18 (shiva.shatarudra.6.18)

गते तस्मिंश्च वरदे सहस्राक्षे शिलाशनः । आराधयन्महादेवं तपसाऽतोषयद्भवम्

gate tasmiṁśca varade sahasrākṣe śilāśanaḥ ārādhayanmahādevaṁ tapasā’toṣayadbhavam

उस वरदाता सहस्राक्ष (इन्द्र) के जाने पर, शिलाशन (शिलाद) महादेव की आराधना करते हुए तप से भव को संतुष्ट करने लगे।

श्लोक 19 (shiva.shatarudra.6.19)

अथ तस्यैवमनिशं तत्परस्य द्विजस्त वै । दिव्यं वर्षसहस्रं तु गतं क्षणमिवाद्भुतम्

atha tasyaivamaniśaṁ tatparasya dvijasta vai divyaṁ varṣasahasraṁ tu gataṁ kṣaṇamivādbhutam

इस प्रकार निरन्तर तत्पर उस द्विज के लिए दिव्य सहस्र वर्ष क्षण के समान अद्भुत रूप से बीत गया।

श्लोक 20 (shiva.shatarudra.6.20)

वल्मीकेन वृताङ्गश्च लक्षकोटगणैर्मुनिः । वज्रसूचीमुखैश्चान्यै रक्तभुग्भिश्च सर्वतः

valmīkena vṛtāṅgaśca lakṣakoṭagaṇairmuniḥ vajrasūcīmukhaiścānyai raktabhugbhiśca sarvataḥ

वह मुनि दीमकों के टीले से आवृत हो गया, तथा लाखों-करोड़ों की संख्या में वज्रसूचीमुख रक्तभक्षी कीटों से चारों ओर से घिर गया।

श्लोक 21 (shiva.shatarudra.6.21)

निर्मांसरुधिरत्वग्वै बिले तस्मिन्नवस्थितः । अस्थिशेषोऽभवत्पश्चाच्छिलादो मुनिसत्तमः

nirmāṁsarudhiratvagvai bile tasminnavasthitaḥ asthiśeṣo’bhavatpaścācchilādo munisattamaḥ

उस बिल में स्थित मांस, रुधिर और त्वचा से रहित होकर, वह मुनिश्रेष्ठ शिलाद अन्ततः केवल अस्थिशेष रह गया।

श्लोक 22 (shiva.shatarudra.6.22)

तुष्टः प्रभुस्तदा तस्मै दर्शयामास स्वां तनुम् । दिव्यां दिव्यगुणैर्युक्तामलभ्यां वामबुद्धिभिः

tuṣṭaḥ prabhustadā tasmai darśayāmāsa svāṁ tanum divyāṁ divyaguṇairyuktāmalabhyāṁ vāmabuddhibhiḥ

तब प्रसन्न होकर प्रभु ने उसे अपना दिव्य, दिव्यगुणों से युक्त, वामबुद्धि वालों को अप्राप्य ऐसा रूप दिखाया।

श्लोक 23 (shiva.shatarudra.6.23)

दिव्यवर्षसहस्रेण तप्यमानाय शूलधृक् । सर्वदेवाधिपस्तस्मै वरदोऽस्मीत्यभाषत

divyavarṣasahasreṇa tapyamānāya śūladhṛk sarvadevādhipastasmai varado’smītyabhāṣata

दिव्य सहस्र वर्षों तक तप करने वाले उसके लिए त्रिशूलधारी, सर्वदेवाधिप ने कहा — मैं वरदाता हूँ।

श्लोक 24 (shiva.shatarudra.6.24)

महासमाधिसंलीनः स शिलादो महामुनिः । नाशृणोत्तद्गिरं शम्भोर्भक्त्यधीनतरस्य वै

mahāsamādhisaṁlīnaḥ sa śilādo mahāmuniḥ nāśṛṇottadgiraṁ śambhorbhaktyadhīnatarasya vai

महासमाधि में लीन वह महामुनि शिलाद भक्ति के अत्यन्त अधीन होने के कारण शम्भु की उस वाणी को सुन न सका।

श्लोक 25 (shiva.shatarudra.6.25)

यदा स्पृष्टो मुनिस्तेन करेण त्रिपुरारिणा । तदैव मुनिशार्दूल उत्ससर्ज तपःक्रमम्

yadā spṛṣṭo munistena kareṇa tripurāriṇā tadaiva muniśārdūla utsasarja tapaḥkramam

जब त्रिपुरारि ने उस मुनि को अपने हाथ से स्पर्श किया, तभी मुनिश्रेष्ठ ने तप का क्रम त्याग दिया।

श्लोक 26 (shiva.shatarudra.6.26)

अथोन्मील्य मुनिर्नेत्रे सोमं शम्भुं विलोकयन् । द्रुतं प्रणम्य समुदा पादयोर्न्यपतन्मुने

athonmīlya munirnetre somaṁ śambhuṁ vilokayan drutaṁ praṇamya samudā pādayornyapatanmune

तब उस मुनि ने अपनी आँखें खोलकर सोमशेखर शम्भु को देखा और हर्षपूर्वक शीघ्र प्रणाम कर उनके चरणों में गिर पड़े, हे मुने!

श्लोक 27 (shiva.shatarudra.6.27)

हर्षगद्गदया वाचा नतस्कन्धः कृताञ्जलिः । प्रसन्नात्मा शिलादः स तुष्टाव परमेश्वरम्

harṣagadgadayā vācā nataskandhaḥ kṛtāñjaliḥ prasannātmā śilādaḥ sa tuṣṭāva parameśvaram

हर्ष से गद्गद वाणी में, झुके हुए कंधों से, हाथ जोड़कर, प्रसन्नचित्त उस शिलाद ने परमेश्वर की स्तुति की।

श्लोक 28 (shiva.shatarudra.6.28)

ततः प्रसन्नो भगवान्देवदेवस्त्रिलोचनः । वरदोऽस्मीति तं प्राह शिलादं मुनिपुङ्गवम्

tataḥ prasanno bhagavāndevadevastrilocanaḥ varado’smīti taṁ prāha śilādaṁ munipuṅgavam

तब प्रसन्न होकर देवों के देव, त्रिलोचन भगवान् ने उस मुनिश्रेष्ठ शिलाद से कहा — मैं वरदाता हूँ।

श्लोक 29 (shiva.shatarudra.6.29)

तपसानेन किं कार्यं भवते हि महामते । ददामि पुत्रं सर्वज्ञं सर्वशास्त्रार्थपारगम्

tapasānena kiṁ kāryaṁ bhavate hi mahāmate dadāmi putraṁ sarvajñaṁ sarvaśāstrārthapāragam

हे महामते! इस तप से तुम्हारा क्या प्रयोजन है? मैं तुम्हें सर्वज्ञ, समस्त शास्त्रों के अर्थ में पारंगत पुत्र प्रदान करता हूँ।

श्लोक 30 (shiva.shatarudra.6.30)

ततः प्रणम्य देवेशं तच्छ्रुत्वा च शिलाशनः । हर्षगद्गदया वाचोवाच सोमविभूषणम्

tataḥ praṇamya deveśaṁ tacchrutvā ca śilāśanaḥ harṣagadgadayā vācovāca somavibhūṣaṇam

तब देवेश को प्रणाम कर और यह सुनकर, शिलाशन ने हर्ष से गद्गद वाणी में सोमविभूषण (शिव) से कहा।

श्लोक 31 (shiva.shatarudra.6.31)

शिलाद उवाच । महेश यदि तुष्टोऽसि यदि वा वरदश्च मे । इच्छामि त्वत्समं पुत्रं मृत्युहीनमयोनिजम्

śilāda uvāca maheśa yadi tuṣṭo’si yadi vā varadaśca me icchāmi tvatsamaṁ putraṁ mṛtyuhīnamayonijam

शिलाद ने कहा — हे महेश! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, अथवा मुझे वर देने वाले हैं, तो मैं आपके समान, मृत्युरहित, अयोनिज पुत्र चाहता हूँ।

श्लोक 32 (shiva.shatarudra.6.32)

नन्दीश्वर उवाच । एवमुक्तस्ततो देवस्त्र्यम्बकस्तेन शङ्करः । प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा शिलादं मुनिसत्तमम्

nandīśvara uvāca evamuktastato devastryambakastena śaṅkaraḥ pratyuvāca prasannātmā śilādaṁ munisattamam

नन्दीश्वर ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर, त्र्यम्बक देव शंकर ने प्रसन्नचित्त होकर उस मुनिश्रेष्ठ शिलाद को उत्तर दिया।

श्लोक 33 (shiva.shatarudra.6.33)

शिव उवाच । पूर्वमाराधितो विप्र ब्रह्मणाऽहं तपोधन । तपसा चावतारार्थं मुनिभिश्च सुरोत्तमैः

śiva uvāca pūrvamārādhito vipra brahmaṇā’haṁ tapodhana tapasā cāvatārārthaṁ munibhiśca surottamaiḥ

शिव ने कहा — हे तपोधन विप्र! पूर्वकाल में मैं ब्रह्मा द्वारा तप से आराधित हुआ था, अवतार के प्रयोजन से, मुनियों और श्रेष्ठ देवताओं द्वारा भी।

श्लोक 34 (shiva.shatarudra.6.34)

तव पुत्रो भविष्यामि नन्दी नाम्ना त्वयोनिजः । पिता भविष्यसि मम पितुर्वै जगतां मुने

tava putro bhaviṣyāmi nandī nāmnā tvayonijaḥ pitā bhaviṣyasi mama piturvai jagatāṁ mune

मैं नन्दी नाम से तुम्हारा अयोनिज पुत्र बनूँगा; हे मुने! तुम जगत् के पिता, अर्थात् मेरे पिता, बनोगे।

श्लोक 35 (shiva.shatarudra.6.35)

नन्दीश्वर उवाच । एवमुक्त्वा मुनिं प्रेक्ष्य प्रणिपत्यास्थितं घृणी । सोमस्तूर्णं तमादिश्य तत्रैवान्तर्दधे हरः

nandīśvara uvāca evamuktvā muniṁ prekṣya praṇipatyāsthitaṁ ghṛṇī somastūrṇaṁ tamādiśya tatraivāntardadhe haraḥ

नन्दीश्वर ने कहा — इस प्रकार कहकर, प्रणाम कर खड़े हुए उस मुनि को देखकर, दयालु सोम हर ने उसे शीघ्र आदेश देकर वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 36 (shiva.shatarudra.6.36)

गते तस्मिन्महादेवे स शिलादो महामुनिः । स्वमाश्रममुपागम्य ऋषिभ्योऽकथयत्ततः

gate tasminmahādeve sa śilādo mahāmuniḥ svamāśramamupāgamya ṛṣibhyo’kathayattataḥ

उस महादेव के चले जाने पर, वह महामुनि शिलाद अपने आश्रम में लौटकर ऋषियों को यह सब बताने लगा।

श्लोक 37 (shiva.shatarudra.6.37)

कियता चैव कालेन तदासौ जनकः स मे । यज्ञाङ्गणं चकर्षाशु यज्ञार्थं यज्ञवित्तमः

kiyatā caiva kālena tadāsau janakaḥ sa me yajñāṅgaṇaṁ cakarṣāśu yajñārthaṁ yajñavittamaḥ

कुछ काल के पश्चात् मेरे उस पिता ने, यज्ञ में अत्यन्त निपुण होकर, यज्ञ के लिए शीघ्र यज्ञभूमि जोती।

श्लोक 38 (shiva.shatarudra.6.38)

ततः क्षणादहं शम्भोस्तनुजस्तस्य चाज्ञया । स जातः पूर्वमेवाहं युगान्ताग्निसमप्रभः

tataḥ kṣaṇādahaṁ śambhostanujastasya cājñayā sa jātaḥ pūrvamevāhaṁ yugāntāgnisamaprabhaḥ

तब क्षणभर में शम्भु की आज्ञा से, उनके पुत्र रूप में, प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी होकर मैं वहीं उत्पन्न हुआ।

श्लोक 39 (shiva.shatarudra.6.39)

अवर्षंस्तदा पुष्करावर्तकाद्या जगुः खेचराः किन्नराः सिद्धसाध्याः । शिलादात्मजत्वं गते मय्यृषीन्द्राः समन्ताच्च वृष्टिं व्यधुः कौसुमीं ते

avarṣaṁstadā puṣkarāvartakādyā jaguḥ khecarāḥ kinnarāḥ siddhasādhyāḥ śilādātmajatvaṁ gate mayyṛṣīndrāḥ samantācca vṛṣṭiṁ vyadhuḥ kausumīṁ te

तब पुष्कर, आवर्तक आदि मेघों ने वर्षा की, आकाशचारी, किन्नर और सिद्ध-साध्यगण गाने लगे; मेरे शिलाद के पुत्र रूप में उत्पन्न होने पर ऋषिगणों ने चारों ओर पुष्पों की वर्षा की।

श्लोक 40 (shiva.shatarudra.6.40)

अथ ब्रह्मादयो देवा देवपत्न्यश्च सर्वशः । तत्राजग्मुश्च सुप्रीत्या हरिश्चैव शिवोऽम्बिका

atha brahmādayo devā devapatnyaśca sarvaśaḥ tatrājagmuśca suprītyā hariścaiva śivo’mbikā

तब ब्रह्मा आदि देवगण, देवपत्नियाँ, तथा हरि, शिव और अम्बिका सभी वहाँ अत्यन्त प्रेम से आए।

श्लोक 41 (shiva.shatarudra.6.41)

तदोत्सवो महानासीन्ननृतुश्चाप्सरोगणाः । आदृत्य मां तथालिङ्ग्य तुष्टुवुर्हर्षिताश्च ते

tadotsavo mahānāsīnnanṛtuścāpsarogaṇāḥ ādṛtya māṁ tathāliṅgya tuṣṭuvurharṣitāśca te

तब बड़ा उत्सव हुआ, अप्सराएँ नाचने लगीं; मेरा आदर करते हुए और आलिंगन करते हुए वे हर्षित होकर स्तुति करने लगे।

श्लोक 42 (shiva.shatarudra.6.42)

सुप्रशस्य शिलादं तं स्तुत्वा च सुस्तवैः शिवौ । सर्वे जग्मुश्च धामानि शिवावप्यखिलेश्वरौ

supraśasya śilādaṁ taṁ stutvā ca sustavaiḥ śivau sarve jagmuśca dhāmāni śivāvapyakhileśvarau

उस शिलाद की भली-भाँति प्रशंसा कर और शिव-पार्वती की सुन्दर स्तुतियों से स्तवन कर, वे सब अपने-अपने धामों को चले गए; और अखिलेश्वर शिव-पार्वती भी अपने धाम को गए।

श्लोक 43 (shiva.shatarudra.6.43)

शिलादोऽपि च मां दृष्ट्वा कालसूर्यानलप्रभम् । त्र्यक्षं चतुर्भुजं बालं जटामुकुटधारिणम्

śilādo’pi ca māṁ dṛṣṭvā kālasūryānalaprabham tryakṣaṁ caturbhujaṁ bālaṁ jaṭāmukuṭadhāriṇam

शिलाद ने भी मुझे देखा, जो प्रलयकालीन सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, तीन नेत्रों वाला, चार भुजाओं वाला, जटामुकुटधारी बालक था।

श्लोक 44 (shiva.shatarudra.6.44)

त्रिशूलाद्यायुधं दीप्तं सर्वथा रुद्ररूपिणम् । महानन्दभरः प्रीत्या प्रणम्यं प्रणनाम च

triśūlādyāyudhaṁ dīptaṁ sarvathā rudrarūpiṇam mahānandabharaḥ prītyā praṇamyaṁ praṇanāma ca

त्रिशूल आदि आयुधों से दीप्त, सर्वथा रुद्ररूप वाले मुझे, वह महाआनन्द से भरकर, प्रेमपूर्वक, प्रणाम के योग्य मुझे प्रणाम करने लगे।

श्लोक 45 (shiva.shatarudra.6.45)

शिलाद उवाच । त्वयाहं नन्दितो यस्मान्नन्दी नाम्ना सुरेश्वर । तस्मात्त्वां देवमानन्दं नमामि जगदीश्वरम्

śilāda uvāca tvayāhaṁ nandito yasmānnandī nāmnā sureśvara tasmāttvāṁ devamānandaṁ namāmi jagadīśvaram

शिलाद ने कहा — हे सुरेश्वर! चूँकि तुमने मुझे आनन्दित किया, इसलिए तुम नन्दी नाम से जाने जाओगे; उस आनन्दस्वरूप, जगदीश्वर देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 46 (shiva.shatarudra.6.46)

नन्दीश्वर उवाच । मया सह पिता हृष्टः सुप्रणम्य महेश्वरम् । उटजं स्वं जगामाशु निधिं लब्ध्वेव निर्धनः

nandīśvara uvāca mayā saha pitā hṛṣṭaḥ supraṇamya maheśvaram uṭajaṁ svaṁ jagāmāśu nidhiṁ labdhveva nirdhanaḥ

नन्दीश्वर ने कहा — मेरे साथ हर्षित पिता, महेश्वर को भली-भाँति प्रणाम कर, अपनी कुटिया की ओर शीघ्र चल पड़े, मानो निर्धन ने निधि पा ली हो।

श्लोक 47 (shiva.shatarudra.6.47)

यदा गतोऽहमुटजं शिलादस्य महामुने । तदाहं तादृशं रूपं त्यक्त्वा मानुष्यमास्थितः

yadā gato’hamuṭajaṁ śilādasya mahāmune tadāhaṁ tādṛśaṁ rūpaṁ tyaktvā mānuṣyamāsthitaḥ

हे महामुने! जब मैं शिलाद की कुटिया में गया, तब मैंने उस दिव्य रूप को त्यागकर मनुष्य रूप धारण कर लिया।

श्लोक 48 (shiva.shatarudra.6.48)

मानुष्यमास्थितं दृष्ट्वा पिता मे लोकपूजितः । विललापातिदुःखार्त्तः स्वजनैश्च समावृतः

mānuṣyamāsthitaṁ dṛṣṭvā pitā me lokapūjitaḥ vilalāpātiduḥkhārttaḥ svajanaiśca samāvṛtaḥ

मुझे मनुष्य रूप में देखकर, लोकपूजित मेरे पिता अत्यन्त दुःख से आर्त होकर, स्वजनों से घिरे हुए, विलाप करने लगे।

श्लोक 49 (shiva.shatarudra.6.49)

जातकर्मादिकान्येव सर्वाण्यपि चकार मे । शालङ्कायनपुत्रो वै शिलादः पुत्रवत्सलः

jātakarmādikānyeva sarvāṇyapi cakāra me śālaṅkāyanaputro vai śilādaḥ putravatsalaḥ

शालंकायन के पुत्र, पुत्रवत्सल शिलाद ने मेरे लिए जातकर्म आदि सभी संस्कार सम्पन्न किए।

श्लोक 50 (shiva.shatarudra.6.50)

वेदानध्यापयामास साङ्गोपाङ्गानशेषतः । शास्त्राण्यन्यान्यपि तथा पञ्चवर्षे पिता च माम्

vedānadhyāpayāmāsa sāṅgopāṅgānaśeṣataḥ śāstrāṇyanyānyapi tathā pañcavarṣe pitā ca mām

पाँच वर्ष की आयु में पिता ने मुझे अंगों और उपांगों सहित सम्पूर्ण वेदों तथा अन्य शास्त्रों का भी अध्ययन कराया।

श्लोक 51 (shiva.shatarudra.6.51)

सम्पूर्णे सप्तमे वर्षे मित्रावरुणसंज्ञकौ । मुनी तस्याश्रमं प्राप्तौ द्रष्टुं मां चाज्ञया विभोः

sampūrṇe saptame varṣe mitrāvaruṇasaṁjñakau munī tasyāśramaṁ prāptau draṣṭuṁ māṁ cājñayā vibhoḥ

सातवाँ वर्ष पूर्ण होने पर, मित्र और वरुण नामक दो मुनि, प्रभु की आज्ञा से मुझे देखने के लिए उनके आश्रम में पहुँचे।

श्लोक 52 (shiva.shatarudra.6.52)

सत्कृतौ मुनिना तेन सूपविष्टो महामुनी । ऊचतुश्च महात्मानौ मां निरीक्ष्य मुहुर्मुहुः

satkṛtau muninā tena sūpaviṣṭo mahāmunī ūcatuśca mahātmānau māṁ nirīkṣya muhurmuhuḥ

उन मुनि द्वारा सत्कृत होकर वे दोनों महामुनि भली-भाँति बैठे और मुझे बार-बार देखकर वे महात्मा बोले।

श्लोक 53 (shiva.shatarudra.6.53)

मित्रावरुणावूचतुः । तात नन्दी तवाल्पायुः सर्वशास्त्रार्थपारगः । न दृष्टमेव चापश्यं ह्यायुर्वर्षादतः परम्

mitrāvaruṇāvūcatuḥ tāta nandī tavālpāyuḥ sarvaśāstrārthapāragaḥ na dṛṣṭameva cāpaśyaṁ hyāyurvarṣādataḥ param

मित्र और वरुण ने कहा — हे तात! नन्दी सम्पूर्ण शास्त्रों के अर्थ में पारंगत है, किन्तु अल्पायु है; हमने इस वर्ष से आगे उसकी आयु देखी ही नहीं है।

श्लोक 54 (shiva.shatarudra.6.54)

विप्रयोरित्युक्तवतोः शिलादः पुत्रवत्सलः । तमालिङ्ग्य च दुःखार्तो रुरोदातीव विस्वरम्

viprayorityuktavatoḥ śilādaḥ putravatsalaḥ tamāliṅgya ca duḥkhārto rurodātīva visvaram

उन दोनों विप्रों के ऐसा कहने पर, पुत्रवत्सल शिलाद उसे आलिंगन कर, दुःख से आर्त होकर अत्यन्त कठोर स्वर में रोने लगे।

श्लोक 55 (shiva.shatarudra.6.55)

मृतवत्पतितं दृष्ट्वा पितरं च पितामहम् । प्रत्यवोचत्प्रसन्नात्मा स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम्

mṛtavatpatitaṁ dṛṣṭvā pitaraṁ ca pitāmaham pratyavocatprasannātmā smṛtvā śivapadāmbujam

मृतक के समान गिरे हुए पिता को, जो पितामह के समान थे, देखकर, प्रसन्नचित्त मैंने शिवजी के चरण-कमल का स्मरण करते हुए उत्तर दिया।

श्लोक 56 (shiva.shatarudra.6.56)

केन त्वं तात दुःखेन वेपमानश्च रोदिषि । दुःखं ते कुत उत्पन्नं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः

kena tvaṁ tāta duḥkhena vepamānaśca rodiṣi duḥkhaṁ te kuta utpannaṁ jñātumicchāmi tattvataḥ

हे तात! किस दुःख से आप कांपते हुए रो रहे हैं? आपका दुःख कहाँ से उत्पन्न हुआ, यह मैं यथार्थ रूप से जानना चाहता हूँ।

श्लोक 57 (shiva.shatarudra.6.57)

पितोवाच । तवाल्पमृत्युदुःखेन दुःखितोऽतीव पुत्रक । को मे दुःखं हरतु वै शरणं तं प्रयामि हि

pitovāca tavālpamṛtyuduḥkhena duḥkhito’tīva putraka ko me duḥkhaṁ haratu vai śaraṇaṁ taṁ prayāmi hi

पिता ने कहा — हे पुत्र! तुम्हारे अल्पमृत्यु के दुःख से मैं अत्यन्त दुःखी हूँ; कौन मेरे इस दुःख को हरेगा, मैं उसी की शरण जाऊँगा।

श्लोक 58 (shiva.shatarudra.6.58)

पुत्र उवाच । देवो वा दानवो वापि यमः कालोऽथवापि हि । ऋध्येयुर्यद्यपि ह्येते मामन्येऽपि जनास्तथा

putra uvāca devo vā dānavo vāpi yamaḥ kālo’thavāpi hi ṛdhyeyuryadyapi hyete māmanye’pi janāstathā

पुत्र ने कहा — चाहे देव हों या दानव, यम हों या काल, अथवा ये सब और अन्य भी लोग यदि मेरे विरुद्ध सफल होना चाहें, तो भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

श्लोक 59 (shiva.shatarudra.6.59)

अथापि चाल्पमृत्युर्मे न भविष्यति मा तुदः । सत्यं ब्रवीमि जनक शपथं ते करोम्यहम्

athāpi cālpamṛtyurme na bhaviṣyati mā tudaḥ satyaṁ bravīmi janaka śapathaṁ te karomyaham

फिर भी मेरी अल्पमृत्यु नहीं होगी; आप दुःखी न हों। हे जनक! मैं सत्य कहता हूँ, आपको इसकी शपथ करता हूँ।

श्लोक 60 (shiva.shatarudra.6.60)

पितोवाच । किं तपः किं परिज्ञानं को योगश्च प्रभुश्च ते । येन त्वं दारुणं दुःखं वञ्चयिष्यसि पुत्र मे

pitovāca kiṁ tapaḥ kiṁ parijñānaṁ ko yogaśca prabhuśca te yena tvaṁ dāruṇaṁ duḥkhaṁ vañcayiṣyasi putra me

पिता ने कहा — हे पुत्र! तुम्हारा वह कौन-सा तप, कौन-सा परिज्ञान, कौन-सा योग और कौन-सा स्वामी है, जिसके द्वारा तुम इस भयंकर दुःख को टाल दोगे?

श्लोक 61 (shiva.shatarudra.6.61)

पुत्र उवाच । न तात तपसा मृत्युं वञ्चयिष्ये न विद्यया । महादेवस्य भजनान्मृत्युं जेष्यामि नान्यथा

putra uvāca na tāta tapasā mṛtyuṁ vañcayiṣye na vidyayā mahādevasya bhajanānmṛtyuṁ jeṣyāmi nānyathā

पुत्र ने कहा — हे तात! न तप से और न विद्या से मैं मृत्यु को टालूँगा; केवल महादेव के भजन से ही मैं मृत्यु पर विजय पाऊँगा, अन्यथा नहीं।

श्लोक 62 (shiva.shatarudra.6.62)

नन्दीश्वर उवाच । इत्युक्त्वाहं पितुः पादौ प्रणम्य शिरसा मुने । प्रदक्षिणीकृत्य च तमगच्छं वनमुत्तमम्

nandīśvara uvāca ityuktvāhaṁ pituḥ pādau praṇamya śirasā mune pradakṣiṇīkṛtya ca tamagacchaṁ vanamuttamam

नन्दीश्वर ने कहा — हे मुने! इस प्रकार कहकर मैंने पिता के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया, उनकी प्रदक्षिणा की, और श्रेष्ठ वन की ओर चला गया।

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