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शतरुद्र संहिता · अध्याय 9

भैरव की लीला और ब्रह्महत्या का विमोचन

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (shiva.shatarudra.9.1)

नन्दीश्वर उवाच । सनत्कुमार सर्वज्ञ भैरवीमपरां कथाम् । शृणु प्रीत्या महादोषसंहर्त्रीं भक्तिवर्द्धिनीम्

nandīśvara uvāca sanatkumāra sarvajña bhairavīmaparāṁ kathām śṛṇu prītyā mahādoṣasaṁhartrīṁ bhaktivarddhinīm

नन्दीश्वर बोले - हे सर्वज्ञ सनत्कुमार, महान पापों का नाश करने वाली और भक्ति बढ़ाने वाली भैरव की एक और कथा प्रेमपूर्वक सुनो।

श्लोक 2 (shiva.shatarudra.9.2)

तत्सान्निध्यं भैरवोऽपि कालोऽभूत्कालकालनः । स देवदेववाक्येन बिभ्रत्कापालिकं व्रतम्

tatsānnidhyaṁ bhairavo’pi kālo’bhūtkālakālanaḥ sa devadevavākyena bibhratkāpālikaṁ vratam

उस ब्रह्महत्या के साथ रहते हुए भैरव, जो स्वयं काल के भी काल हैं, विचरण करते रहे; देवाधिदेव के अपने ही वचन से उन्होंने कापालिक व्रत धारण किया।

श्लोक 3 (shiva.shatarudra.9.3)

कपालपाणिर्विश्वात्मा चचार भुवनत्रयम् । नात्याक्षीच्चापि तं देवं ब्रह्महत्यापि दारुणा

kapālapāṇirviśvātmā cacāra bhuvanatrayam nātyākṣīccāpi taṁ devaṁ brahmahatyāpi dāruṇā

कपाल हाथ में लिए विश्वात्मा शिव तीनों लोकों में विचरण करते रहे; परन्तु वह भयंकर ब्रह्महत्या भी उस देव को नहीं छोड़ती थी।

श्लोक 4 (shiva.shatarudra.9.4)

प्रतितीर्थं भ्रमन् नापि विमुक्तो ब्रह्महत्यया । अतः कामारिमहिमा सर्वोऽपि ह्यवगम्यताम्

pratitīrthaṁ bhraman nāpi vimukto brahmahatyayā ataḥ kāmārimahimā sarvo’pi hyavagamyatām

तीर्थ-तीर्थ भटकते हुए भी वे ब्रह्महत्या से मुक्त नहीं हुए; इससे कामारि अर्थात् शिव की सम्पूर्ण महिमा समझी जानी चाहिए।

श्लोक 5 (shiva.shatarudra.9.5)

प्रमथैः सेव्यमानोऽपि ह्येकदा विहरन्हरः । कापालिको ययौ स्वैरी नारायणनिकेतनम्

pramathaiḥ sevyamāno’pi hyekadā viharanharaḥ kāpāliko yayau svairī nārāyaṇaniketanam

प्रमथगणों द्वारा सेवित होते हुए भी एक बार स्वतन्त्र विचरण करते हुए कापालिक हर, नारायण के धाम को गए।

श्लोक 6 (shiva.shatarudra.9.6)

अथायान्तं महाकालं त्रिनेत्रं सर्पकुण्डलम् । महादेवांशसम्भूतं पूर्णाकारं च भैरवम्

athāyāntaṁ mahākālaṁ trinetraṁ sarpakuṇḍalam mahādevāṁśasambhūtaṁ pūrṇākāraṁ ca bhairavam

तब आते हुए महाकाल को - त्रिनेत्र, सर्प-कुण्डल धारण किए, महादेव के अंश से उत्पन्न, पूर्ण स्वरूप वाले भैरव को विष्णु ने देखा।

श्लोक 7 (shiva.shatarudra.9.7)

पपात दण्डवद्भूमौ तं दृष्ट्वा गरुडध्वजः । देवाश्च मुनयश्चैव देवनार्य्यः समन्ततः

papāta daṇḍavadbhūmau taṁ dṛṣṭvā garuḍadhvajaḥ devāśca munayaścaiva devanāryyaḥ samantataḥ

उसे देखकर गरुड़ध्वज विष्णु दण्ड की भाँति भूमि पर गिर पड़े; और चारों ओर देवगण, मुनिगण तथा देवांगनाएँ भी प्रणत हुईं।

श्लोक 8 (shiva.shatarudra.9.8)

अथ विष्णुः प्रणम्यैनं प्रयातः कमलापतिः । शिरस्यञ्जलिमाधाय तुष्टाव विविधैः स्तवैः

atha viṣṇuḥ praṇamyainaṁ prayātaḥ kamalāpatiḥ śirasyañjalimādhāya tuṣṭāva vividhaiḥ stavaiḥ

तब कमलापति विष्णु उन्हें प्रणाम कर, समीप जाकर, सिर पर अंजलि बाँधकर विविध स्तुतियों से उनकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 9 (shiva.shatarudra.9.9)

सानन्दोऽथ हरिः प्राह प्रसन्नात्मा महामुने । क्षीरोदमथनोद्भूतां पद्मां पद्मालयां मुदा

sānando’tha hariḥ prāha prasannātmā mahāmune kṣīrodamathanodbhūtāṁ padmāṁ padmālayāṁ mudā

तब प्रसन्नचित्त हरि ने आनन्दपूर्वक, हे महामुने, क्षीरसागर के मन्थन से उत्पन्न पद्मालया लक्ष्मी से हर्षपूर्वक कहा।

श्लोक 10 (shiva.shatarudra.9.10)

विष्णुरुवाच । प्रिये पश्याब्जनयने धन्यासि सुभगेऽनघे । धन्योऽहं देवि सुश्रोणि यत्पश्यावो जगत्पतिम्

viṣṇuruvāca priye paśyābjanayane dhanyāsi subhage’naghe dhanyo’haṁ devi suśroṇi yatpaśyāvo jagatpatim

विष्णु बोले - हे प्रिये कमलनयनी, देखो! तुम धन्य हो, हे सौभाग्यशालिनी, निष्पाप देवी; और हे सुन्दरी देवी, मैं भी धन्य हूँ कि हम दोनों जगत्पति के दर्शन कर रहे हैं।

श्लोक 11 (shiva.shatarudra.9.11)

अयं धाता विधाता च लोकानां प्रभुरीश्वरः । अनादिः शरणः शान्तः पुरः षड्विंशसम्मितः

ayaṁ dhātā vidhātā ca lokānāṁ prabhurīśvaraḥ anādiḥ śaraṇaḥ śāntaḥ puraḥ ṣaḍviṁśasammitaḥ

यही धाता और विधाता हैं, लोकों के स्वामी और ईश्वर हैं; अनादि, शरणदाता, शान्त, पुरातन तथा छब्बीसवें तत्त्व के रूप में गिने जाने वाले।

श्लोक 12 (shiva.shatarudra.9.12)

सर्वज्ञः सर्वयोगीशः सर्वभूतैकनायकः । सर्वभूतान्तरात्माऽयं सर्वेषां सर्वदः सदा

sarvajñaḥ sarvayogīśaḥ sarvabhūtaikanāyakaḥ sarvabhūtāntarātmā’yaṁ sarveṣāṁ sarvadaḥ sadā

सर्वज्ञ, सभी योगियों के स्वामी, सम्पूर्ण प्राणियों के एकमात्र नायक; यह सबके अन्तरात्मा हैं और सदा सबको सब कुछ देने वाले हैं।

श्लोक 13 (shiva.shatarudra.9.13)

ये विनिद्रा विनिःश्वासाः शान्ताः ध्यानपरायणाः । धिया पश्यन्ति हृदये सोऽयं पद्मे समीक्षताम्

ye vinidrā viniḥśvāsāḥ śāntāḥ dhyānaparāyaṇāḥ dhiyā paśyanti hṛdaye so’yaṁ padme samīkṣatām

जो निद्रारहित, श्वासरहित, शान्त तथा ध्यानपरायण हैं, वे बुद्धि से हृदय में जिनका दर्शन करते हैं, हे पद्मे, उन्हीं को अब साक्षात् देखो!

श्लोक 14 (shiva.shatarudra.9.14)

यं विदुर्वेदतत्त्वज्ञा योगिनो यतमानसाः । अरूपो रूपवान्भूत्वा सोऽयमायाति सर्वगः

yaṁ vidurvedatattvajñā yogino yatamānasāḥ arūpo rūpavānbhūtvā so’yamāyāti sarvagaḥ

जिन्हें वेद के तत्त्वज्ञ तथा संयतचित्त योगी जानते हैं, वे अरूप होते हुए भी रूपवान् होकर आ रहे हैं, वे सर्वव्यापी हैं।

श्लोक 15 (shiva.shatarudra.9.15)

अहो विचित्रं देवस्य चेष्टितं परमेष्ठिनः । यस्याख्यां ब्रुवतो नित्यं न देहः सोऽपि देहभृत्

aho vicitraṁ devasya ceṣṭitaṁ parameṣṭhinaḥ yasyākhyāṁ bruvato nityaṁ na dehaḥ so’pi dehabhṛt

अहो! परमेष्ठी देव की लीला कितनी विचित्र है! जो नित्य उनका नाम उच्चारण करता है, वह देहधारी होते हुए भी देहरहित हो जाता है, अर्थात् जन्म-मृत्यु से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 16 (shiva.shatarudra.9.16)

तं दृष्ट्वा न पुनर्जन्म लभ्यते मानवैर्भुवि । सोऽयमायाति भगवांस्त्र्यम्बकः शशिभूषणः

taṁ dṛṣṭvā na punarjanma labhyate mānavairbhuvi so’yamāyāti bhagavāṁstryambakaḥ śaśibhūṣaṇaḥ

उन्हें देखकर मनुष्यों को इस पृथ्वी पर पुनर्जन्म प्राप्त नहीं होता; वे ही भगवान् त्र्यम्बक, चन्द्रभूषण, अब यहाँ आ रहे हैं।

श्लोक 17 (shiva.shatarudra.9.17)

पुण्डरीकदलायामे धन्ये मेऽद्य विलोचने । यद् दृश्यते महादेवो ह्याभ्यां लक्ष्मि महेश्वरः

puṇḍarīkadalāyāme dhanye me’dya vilocane yad dṛśyate mahādevo hyābhyāṁ lakṣmi maheśvaraḥ

हे लक्ष्मी! कमलदल के समान विशाल मेरे ये दोनों नेत्र आज धन्य हैं, क्योंकि इनके द्वारा महादेव महेश्वर का दर्शन हो रहा है।

श्लोक 18 (shiva.shatarudra.9.18)

धिग्धिक्पदं तु देवानां परं दृष्ट्वा न शङ्करम् । लभ्यते यत्र निर्वाणं सर्वदुःखान्तकृत्तु यत्

dhigdhikpadaṁ tu devānāṁ paraṁ dṛṣṭvā na śaṅkaram labhyate yatra nirvāṇaṁ sarvaduḥkhāntakṛttu yat

धिक्कार है, धिक्कार है उस देवपद को भी, यदि परम शंकर का दर्शन नहीं हो पाता - जिनके द्वारा वह निर्वाण प्राप्त होता है जो समस्त दुःखों का अन्त करने वाला है!

श्लोक 19 (shiva.shatarudra.9.19)

देवत्वादशुभं किञ्चिद्देवलोके न विद्यते । दृष्ट्वापि सर्वे देवेशं यन्मुक्तिं न लभामहे

devatvādaśubhaṁ kiñciddevaloke na vidyate dṛṣṭvāpi sarve deveśaṁ yanmuktiṁ na labhāmahe

देवलोक में देवत्व के समान अशुभ और कुछ भी नहीं है, क्योंकि देवेश का दर्शन करके भी हम मुक्ति को प्राप्त नहीं करते।

श्लोक 20 (shiva.shatarudra.9.20)

नन्दीश्वर उवाच । एवमुक्त्वा हृषीकेशः सम्प्रहृष्टतनूरुहः । प्रणिपत्य महादेवमिदमाह वृषध्वजम्

nandīśvara uvāca evamuktvā hṛṣīkeśaḥ samprahṛṣṭatanūruhaḥ praṇipatya mahādevamidamāha vṛṣadhvajam

नन्दीश्वर बोले - ऐसा कहकर हृषीकेश, रोमांचित शरीर वाले होकर, महादेव वृषध्वज को प्रणाम कर यह कहने लगे।

श्लोक 21 (shiva.shatarudra.9.21)

विष्णुरुवाच । किमिदं देवदेवेन सर्वज्ञेन त्वया विभो । क्रियते जगतां धात्रा सर्वपापहराव्यय

viṣṇuruvāca kimidaṁ devadevena sarvajñena tvayā vibho kriyate jagatāṁ dhātrā sarvapāpaharāvyaya

विष्णु बोले - हे विभो! सर्वज्ञ देवाधिदेव! जगत् के धाता, समस्त पापों के हरने वाले, अविनाशी! आप यह क्या कर रहे हैं?

श्लोक 22 (shiva.shatarudra.9.22)

क्रीडेयं तव देवेश त्रिलोचन महामते । किं कारणं विरूपाक्ष चेष्टितं ते स्मरार्दन

krīḍeyaṁ tava deveśa trilocana mahāmate kiṁ kāraṇaṁ virūpākṣa ceṣṭitaṁ te smarārdana

हे देवेश! हे त्रिलोचन! हे महामते! क्या यह आपकी लीला है? हे विरूपाक्ष! हे कामदेव के दमनकर्ता! आपकी इस चेष्टा का क्या कारण है?

श्लोक 23 (shiva.shatarudra.9.23)

किमर्थं भगवञ्छम्भो भिक्षां चरसि शक्तिप । संशयो मे जगन्नाथ एष त्रैलोक्यराज्यद

kimarthaṁ bhagavañchambho bhikṣāṁ carasi śaktipa saṁśayo me jagannātha eṣa trailokyarājyada

हे भगवन् शम्भो! हे शक्तिदाता! आप भिक्षा के लिए क्यों घूमते हैं? हे जगन्नाथ! हे त्रैलोक्य के राज्यदाता! मुझे यही संशय है।

श्लोक 24 (shiva.shatarudra.9.24)

नन्दीश्वर उवाच । एवमुक्तस्ततः शम्भुर्विष्णुना भैरवो हरः । प्रत्युवाचाद्भुतोतिः स विष्णुं हि विहसन्प्रभुः

nandīśvara uvāca evamuktastataḥ śambhurviṣṇunā bhairavo haraḥ pratyuvācādbhutotiḥ sa viṣṇuṁ hi vihasanprabhuḥ

नन्दीश्वर बोले - विष्णु द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर अद्भुत महिमा वाले शम्भु भैरव हर प्रभु, हँसते हुए विष्णु को उत्तर देने लगे।

श्लोक 25 (shiva.shatarudra.9.25)

भैरव उवाच । ब्रह्मणस्तु शिरश्छिन्नमङ्गुल्याग्रनखेन ह । तदघं प्रतिहन्तुं हि चराम्येतद् व्रतं शुभम्

bhairava uvāca brahmaṇastu śiraśchinnamaṅgulyāgranakhena ha tadaghaṁ pratihantuṁ hi carāmyetad vrataṁ śubham

भैरव बोले - मैंने अपनी अंगुली के अग्रभाग के नख से ब्रह्मा का सिर काट दिया था; उस पाप का प्रायश्चित करने के लिए ही मैं यह शुभ व्रत धारण करता हूँ।

श्लोक 26 (shiva.shatarudra.9.26)

नन्दीश्वर उवाच । एवमुक्तो महेशेन भैरवेण रमापतिः । स्मृत्वा किञ्चिन्नतशिराः पुनरेवमजिज्ञपत्

nandīśvara uvāca evamukto maheśena bhairaveṇa ramāpatiḥ smṛtvā kiñcinnataśirāḥ punarevamajijñapat

नन्दीश्वर बोले - महेश्वर भैरव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर रमापति विष्णु, कुछ स्मरण करते हुए, सिर कुछ झुकाकर पुनः इस प्रकार निवेदन करने लगे।

श्लोक 27 (shiva.shatarudra.9.27)

विष्णुरुवाच । यथेच्छसि तथा क्रीड सर्वविघ्नापनोदक । मायया मां महादेव नाच्छादयितुमर्हसि

viṣṇuruvāca yathecchasi tathā krīḍa sarvavighnāpanodaka māyayā māṁ mahādeva nācchādayitumarhasi

विष्णु बोले - हे समस्त विघ्नों के नाशक! आप जैसे चाहें वैसे लीला करें; परन्तु हे महादेव! आपको मुझे अपनी माया से आच्छादित नहीं करना चाहिए।

श्लोक 28 (shiva.shatarudra.9.28)

नाभीकमलकोशात्तु कोटिशः कमलासनाः । कल्पे कल्पे पुरा ह्यान्सस्त्वन्नियोगबलाद्विभो

nābhīkamalakośāttu koṭiśaḥ kamalāsanāḥ kalpe kalpe purā hyānsastvanniyogabalādvibho

हे विभो! पूर्वकाल में आपकी ही आज्ञा के बल से, प्रत्येक कल्प में, नाभिकमल की कोश से करोड़ों कमलासन ब्रह्मा उत्पन्न होते रहे हैं।

श्लोक 29 (shiva.shatarudra.9.29)

त्यज मायामिमां देव दुस्तरामकृतात्मभिः । ब्रह्मादयो महादेव मायया तव मोहिताः

tyaja māyāmimāṁ deva dustarāmakṛtātmabhiḥ brahmādayo mahādeva māyayā tava mohitāḥ

हे देव! इस माया को त्याग दीजिए, जो असंस्कृत आत्मा वालों के लिए दुस्तर है; हे महादेव! ब्रह्मा आदि देवता भी आपकी माया से मोहित हैं।

श्लोक 30 (shiva.shatarudra.9.30)

यथावदनुगच्छामि चेष्टितं ते शिवापते । तवैवानुग्रहाच्छम्भो सर्वेश्वर सताङ्गते

yathāvadanugacchāmi ceṣṭitaṁ te śivāpate tavaivānugrahācchambho sarveśvara satāṅgate

हे शिवा के स्वामी! मैं आपकी चेष्टा का यथोचित अनुसरण करता हूँ; हे सर्वेश्वर! हे सन्तों की गति शम्भो! यह सब आपकी ही कृपा से है।

श्लोक 31 (shiva.shatarudra.9.31)

संहारकाले सम्प्राप्ते सदेवान्निखिलान्मुनीन् । लोकान्वर्णाश्रमवतो हरिष्यसि यदा हर

saṁhārakāle samprāpte sadevānnikhilānmunīn lokānvarṇāśramavato hariṣyasi yadā hara

हे हर! जब प्रलयकाल आएगा, तब आप समस्त देवताओं सहित सभी मुनियों तथा वर्णाश्रमयुक्त लोकों का संहार करेंगे।

श्लोक 32 (shiva.shatarudra.9.32)

तदा कृते महादेव पापं ब्रह्मवधादिकम् । पारतन्त्र्यं न ते शम्भो स्वैरं क्रीडत्यतो भवान्

tadā kṛte mahādeva pāpaṁ brahmavadhādikam pāratantryaṁ na te śambho svairaṁ krīḍatyato bhavān

हे महादेव! उस समय ब्रह्महत्या आदि पाप करने पर भी हे शम्भो! आप किसी के अधीन नहीं हैं; इसीलिए आप स्वेच्छा से लीला करते हैं।

श्लोक 33 (shiva.shatarudra.9.33)

अतीत ब्रह्मणां ह्यस्थ्नां स्रक्कण्ठे तव भासते । तथाप्यनुगता शम्भो ब्रह्महत्या तवानघ

atīta brahmaṇāṁ hyasthnāṁ srakkaṇṭhe tava bhāsate tathāpyanugatā śambho brahmahatyā tavānagha

पूर्वकालीन ब्रह्माओं की अस्थियों की माला आपके कण्ठ में सुशोभित होती है; फिर भी, हे निष्पाप शम्भो! ब्रह्महत्या आपका पीछा करती है।

श्लोक 34 (shiva.shatarudra.9.34)

कृत्वापि सुमहत्पापं यस्त्वां स्मरति मानवः । आधारं जगतामीश तस्य पापं विलीयते

kṛtvāpi sumahatpāpaṁ yastvāṁ smarati mānavaḥ ādhāraṁ jagatāmīśa tasya pāpaṁ vilīyate

हे ईश! जगत् के आधार! अत्यन्त बड़ा पाप करके भी जो मनुष्य आपका स्मरण करता है, उसका पाप विलीन हो जाता है।

श्लोक 35 (shiva.shatarudra.9.35)

यथा तमो न तिष्ठेत सन्निधावंशुमालिनः । तथैव तव यो भक्तः पापं तस्य व्रजेत्क्षयम्

yathā tamo na tiṣṭheta sannidhāvaṁśumālinaḥ tathaiva tava yo bhaktaḥ pāpaṁ tasya vrajetkṣayam

जैसे सूर्य के समीप अन्धकार नहीं ठहर सकता, वैसे ही जो आपका भक्त है, उसका पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 36 (shiva.shatarudra.9.36)

यश्चिन्तयति पुण्यात्मा तव पादाम्बुजद्वयम् । ब्रह्महत्याकृतमपि पापं तस्य व्रजेत्क्षयम्

yaścintayati puṇyātmā tava pādāmbujadvayam brahmahatyākṛtamapi pāpaṁ tasya vrajetkṣayam

जो पुण्यात्मा आपके दोनों चरणकमलों का ध्यान करता है, उसका ब्रह्महत्या तक का किया हुआ पाप भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 37 (shiva.shatarudra.9.37)

तव नामानुरक्ता वाग्यस्य पुंसो जगत्पते । अप्यद्रिकूटतुलितं नैनस्तमनुबाधते

tava nāmānuraktā vāgyasya puṁso jagatpate apyadrikūṭatulitaṁ nainastamanubādhate

हे जगत्पते! जिस पुरुष की वाणी आपके नाम में अनुरक्त है, पर्वतशिखर के समान भारी पाप भी उसे पीड़ित नहीं करता।

श्लोक 38 (shiva.shatarudra.9.38)

परमात्मन्परं धाम स्वेच्छाभिधृतविग्रह । कुतूहलं तवेशेदं कृपणाधीनतेश्वर

paramātmanparaṁ dhāma svecchābhidhṛtavigraha kutūhalaṁ taveśedaṁ kṛpaṇādhīnateśvara

हे परमात्मन्! हे परमधाम! अपनी इच्छा से रूप धारण करने वाले! हे ईश्वर, दीनों के अधीन होने वाले प्रभु! यह आपका कौतूहल क्या है?

श्लोक 39 (shiva.shatarudra.9.39)

अद्य धन्योऽस्मि देवेश यन्न पश्यन्ति योगिनः । पश्यामि तं जगन्मूर्त्तिं परमेश्वरमव्ययम्

adya dhanyo’smi deveśa yanna paśyanti yoginaḥ paśyāmi taṁ jaganmūrttiṁ parameśvaramavyayam

हे देवेश! आज मैं धन्य हूँ, क्योंकि जिसे योगीजन भी नहीं देख पाते, उस जगन्मूर्ति अविनाशी परमेश्वर को मैं देख रहा हूँ।

श्लोक 40 (shiva.shatarudra.9.40)

अद्य मे परमो लाभस्त्वद्य मे मङ्गलं परम् । तं दृष्ट्वामृततृप्तस्य तृणं स्वर्गापवर्गकम्

adya me paramo lābhastvadya me maṅgalaṁ param taṁ dṛṣṭvāmṛtatṛptasya tṛṇaṁ svargāpavargakam

आज ही मेरा परम लाभ है, आज ही मेरा परम मंगल है; उन्हें देखकर अमृत से तृप्त हुए मेरे लिए स्वर्ग और मोक्ष भी तिनके के समान हैं।

श्लोक 41 (shiva.shatarudra.9.41)

इत्थं वदति गोविन्दे विमला पद्मया तया । मनोरथवती नाम भिक्षा पात्रे समर्पिता

itthaṁ vadati govinde vimalā padmayā tayā manorathavatī nāma bhikṣā pātre samarpitā

इस प्रकार गोविन्द के कहने पर उस निर्मल पद्मा लक्ष्मी ने मनोरथवती नामक भिक्षा उस पात्र में अर्पित की।

श्लोक 42 (shiva.shatarudra.9.42)

भिक्षाटनाय देवोऽपि निरगात्परया मुदा । अन्यत्रापि महादेवो भैरवश्चात्तविग्रहः

bhikṣāṭanāya devo’pi niragātparayā mudā anyatrāpi mahādevo bhairavaścāttavigrahaḥ

देव भी परम आनन्दपूर्वक भिक्षाटन के लिए निकल पड़े; महादेव भैरव उस रूप को धारण किए हुए अन्यत्र भी गए।

श्लोक 43 (shiva.shatarudra.9.43)

दृष्ट्वानुयायिनीं तां तु समाहूय जनार्दनः । सम्प्रार्थयद् ब्रह्महत्यां विमुञ्च त्वं त्रिशूलिनम्

dṛṣṭvānuyāyinīṁ tāṁ tu samāhūya janārdanaḥ samprārthayad brahmahatyāṁ vimuñca tvaṁ triśūlinam

उस अनुगामिनी ब्रह्महत्या को देखकर जनार्दन ने उसे बुलाकर प्रार्थना की - 'तुम त्रिशूलधारी को छोड़ दो।'

श्लोक 44 (shiva.shatarudra.9.44)

ब्रह्महत्योवाच । अनेनापि मिषेणाहं संसेव्यामुं वृषध्वजम् । आत्मानं पावयिष्यामि त्वपुनर्भवदर्शनम्

brahmahatyovāca anenāpi miṣeṇāhaṁ saṁsevyāmuṁ vṛṣadhvajam ātmānaṁ pāvayiṣyāmi tvapunarbhavadarśanam

ब्रह्महत्या बोली - इसी बहाने से मैं इस वृषध्वज की सेवा करती हुई अपने आपको पवित्र कर लूँगी, ताकि मुझे फिर पुनर्भव का दर्शन न करना पड़े।

श्लोक 45 (shiva.shatarudra.9.45)

नन्दीश्वर उवाच । सा तत्याज न तत्पार्श्वं व्याहृतापि मुरारिणा । तमूचेऽथ हरिं शम्भुः स्मेरास्यो भैरवो वचः

nandīśvara uvāca sā tatyāja na tatpārśvaṁ vyāhṛtāpi murāriṇā tamūce’tha hariṁ śambhuḥ smerāsyo bhairavo vacaḥ

नन्दीश्वर बोले - मुरारि द्वारा कहे जाने पर भी उसने उनका साथ नहीं छोड़ा; तब मुसकाते हुए मुख से भैरव शम्भु ने हरि से यह वचन कहा।

श्लोक 46 (shiva.shatarudra.9.46)

भैरव उवाच । त्वद्वाक्पीयूषपानेन तृप्तोऽस्मि बहुमानद । स्वभावोऽयं हि साधूनां यत्त्वं वदसि मापते

bhairava uvāca tvadvākpīyūṣapānena tṛpto’smi bahumānada svabhāvo’yaṁ hi sādhūnāṁ yattvaṁ vadasi māpate

भैरव बोले - हे बहुमानद! तुम्हारी वाणी रूपी अमृत का पान करके मैं तृप्त हूँ; हे मापते! तुम जो कह रहे हो, यह साधुजनों का ही स्वभाव है।

श्लोक 47 (shiva.shatarudra.9.47)

वरं वृणीष्व गोविन्द वरदोऽस्मि तवानघ । अग्रणीर्मम भक्तानां त्वं हरे निर्विकारवान्

varaṁ vṛṇīṣva govinda varado’smi tavānagha agraṇīrmama bhaktānāṁ tvaṁ hare nirvikāravān

हे गोविन्द! वर माँगो, हे निष्पाप! मैं तुम्हारे लिए वरदाता हूँ; हे हरे! हे निर्विकार! तुम मेरे भक्तों में अग्रणी हो।

श्लोक 48 (shiva.shatarudra.9.48)

नो माद्यन्ति तथा भैक्ष्यैर्भिक्षवोऽप्यतिसंस्कृतैः । यथा मानसुधापानैर्ननु भिक्षाटनज्वराः

no mādyanti tathā bhaikṣyairbhikṣavo’pyatisaṁskṛtaiḥ yathā mānasudhāpānairnanu bhikṣāṭanajvarāḥ

भिक्षुजन अत्यन्त संस्कारयुक्त भिक्षा से भी उतने तृप्त नहीं होते, जितने भिक्षाटन में तत्पर लोग सम्मानरूपी अमृत के पान से तृप्त होते हैं।

श्लोक 49 (shiva.shatarudra.9.49)

नन्दीश्वर उवाच । इत्याकर्ण्य वचः शम्भोर्भैरवस्य परात्मनः । सुप्रसन्नतरो भूत्वा समवोचन्महेश्वरम्

nandīśvara uvāca ityākarṇya vacaḥ śambhorbhairavasya parātmanaḥ suprasannataro bhūtvā samavocanmaheśvaram

नन्दीश्वर बोले - परमात्मा भैरव शम्भु का यह वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होकर विष्णु ने महेश्वर से यह कहा।

श्लोक 50 (shiva.shatarudra.9.50)

विष्णुरुवाच । एष एव वरः श्लाघ्यो यदहं देवताधिपम् । पश्यामि त्वान्देवदेव मनोवाणीपथातिगम्

viṣṇuruvāca eṣa eva varaḥ ślāghyo yadahaṁ devatādhipam paśyāmi tvāndevadeva manovāṇīpathātigam

विष्णु बोले - यही वर सबसे प्रशंसनीय है कि मैं देवताओं के अधिपति, हे देवदेव, मन और वाणी की पहुँच से परे आपका दर्शन कर रहा हूँ।

श्लोक 51 (shiva.shatarudra.9.51)

अदभ्रेयं सुधादृष्टिरनया मे महोत्सवः । अयत्त्ननिधिलाभोऽयं वीक्षणं हर ते सताम्

adabhreyaṁ sudhādṛṣṭiranayā me mahotsavaḥ ayattnanidhilābho’yaṁ vīkṣaṇaṁ hara te satām

यह अमृतमयी दृष्टि थोड़ी नहीं है, इसी से मेरे लिए यह महान् उत्सव है; हे हर! सन्तों के लिए आपका यह दर्शन बिना प्रयास प्राप्त निधि है।

श्लोक 52 (shiva.shatarudra.9.52)

अवियोगोऽस्तु मे देव त्वदङ्घ्रियुगलेन वै । एष एव वरः शम्भो नान्यं कश्चिद् वृणे वरम्

aviyogo’stu me deva tvadaṅghriyugalena vai eṣa eva varaḥ śambho nānyaṁ kaścid vṛṇe varam

हे देव! आपके दोनों चरणों से मेरा वियोग कभी न हो; हे शम्भो! यही मेरा वर है, मैं और कोई वर नहीं माँगता।

श्लोक 53 (shiva.shatarudra.9.53)

श्रीभैरव उवाच । एवं भवतु ते तात यत्त्वयोक्तं महामते । सर्वेषामपि देवानां वरदस्त्वं भविष्यसि

śrībhairava uvāca evaṁ bhavatu te tāta yattvayoktaṁ mahāmate sarveṣāmapi devānāṁ varadastvaṁ bhaviṣyasi

श्रीभैरव बोले - हे तात! हे महामते! जो तुमने कहा वैसा ही हो; तुम समस्त देवताओं के लिए भी वरदाता बनोगे।

श्लोक 54 (shiva.shatarudra.9.54)

नन्दीश्वर उवाच । अनुगृह्येति दैत्यारिं केन्द्राद्रिभुवने चरन् । भेजेऽविमुक्तनगरीं नाम्ना वाराणसीं पुरीम्

nandīśvara uvāca anugṛhyeti daityāriṁ kendrādribhuvane caran bheje’vimuktanagarīṁ nāmnā vārāṇasīṁ purīm

नन्दीश्वर बोले - दैत्यारि विष्णु को इस प्रकार अनुगृहीत कर, इन्द्र के पर्वत-लोक में विचरण करते हुए, वे अविमुक्त नगरी - वाराणसी पुरी को गए।

श्लोक 55 (shiva.shatarudra.9.55)

क्षेत्रे प्रविष्टमात्रेऽथ भैरवे भीषणाकृतौ । हाहेत्युक्त्वा ब्रह्महत्या पातालं चाविशत्तदा

kṣetre praviṣṭamātre’tha bhairave bhīṣaṇākṛtau hāhetyuktvā brahmahatyā pātālaṁ cāviśattadā

जैसे ही भयंकर आकृति वाले भैरव उस क्षेत्र में प्रविष्ट हुए, वैसे ही 'हाय!' कहकर ब्रह्महत्या उस समय पाताल में प्रवेश कर गई।

श्लोक 56 (shiva.shatarudra.9.56)

कपालं ब्राह्मणः सद्यो भैरवस्य कराम्बुजात् । पपात भुवि तत्तीर्थमभूत्कापालमोचनम्

kapālaṁ brāhmaṇaḥ sadyo bhairavasya karāmbujāt papāta bhuvi tattīrthamabhūtkāpālamocanam

उसी क्षण भैरव के कर-कमल से ब्राह्मण की खोपड़ी भूमि पर गिर पड़ी; वही स्थान 'कपालमोचन' नामक तीर्थ बन गया।

श्लोक 57 (shiva.shatarudra.9.57)

कपालं ब्रह्मणो रुद्रः सर्वेषामेव पश्यताम् । हस्तात्पतन्तमालोक्य ननर्त परया मुदा

kapālaṁ brahmaṇo rudraḥ sarveṣāmeva paśyatām hastātpatantamālokya nanarta parayā mudā

सबके देखते हुए ब्रह्मा की खोपड़ी को अपने हाथ से गिरते देखकर रुद्र परम आनन्द से नाच उठे।

श्लोक 58 (shiva.shatarudra.9.58)

विधेः कपालं नामुञ्चत्करमत्यन्तदुस्सहम् । परस्य भ्रमतः क्वापि तत्काश्यां क्षणतोऽपतत्

vidheḥ kapālaṁ nāmuñcatkaramatyantadussaham parasya bhramataḥ kvāpi tatkāśyāṁ kṣaṇato’patat

विधाता की वह अत्यन्त असह्य खोपड़ी, कहीं भी विचरण करते हुए परमेश्वर के हाथ से नहीं छूटी थी; काशी में पहुँचते ही वह क्षणभर में गिर पड़ी।

श्लोक 59 (shiva.shatarudra.9.59)

शूलिनो ब्रह्मणो हत्या नापैति स्म च या क्वचित् । सा काश्यां क्षणतो नष्टा तस्मात्सेव्या हि काशिका

śūlino brahmaṇo hatyā nāpaiti sma ca yā kvacit sā kāśyāṁ kṣaṇato naṣṭā tasmātsevyā hi kāśikā

त्रिशूलधारी शिव की वह ब्रह्महत्या, जो कहीं भी दूर नहीं हुई थी, काशी में क्षणभर में नष्ट हो गई; इसीलिए काशी अवश्य सेवनीय है।

श्लोक 60 (shiva.shatarudra.9.60)

कपालमोचनं काश्यां यः स्मरेत्तीर्थमुत्तमम् । इहान्यत्रापि यत्पापं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति

kapālamocanaṁ kāśyāṁ yaḥ smarettīrthamuttamam ihānyatrāpi yatpāpaṁ kṣipraṁ tasya praṇaśyati

जो काशी में कपालमोचन नामक उत्तम तीर्थ का स्मरण करता है, उसका यहाँ या अन्यत्र किया हुआ पाप शीघ्र नष्ट हो जाता है।

श्लोक 61 (shiva.shatarudra.9.61)

आगत्य तीर्थप्रवरे स्नानं कृत्वा विधानतः । तर्पयित्वा पितॄन्देवान्मुच्यते ब्रह्महत्यया

āgatya tīrthapravare snānaṁ kṛtvā vidhānataḥ tarpayitvā pitṝndevānmucyate brahmahatyayā

उस श्रेष्ठ तीर्थ में आकर विधिपूर्वक स्नान कर, पितरों और देवताओं को तर्पण देकर मनुष्य ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 62 (shiva.shatarudra.9.62)

कपालमोचनं तीर्थं पुरस्कृत्वा तु भैरवः । तत्रैव तस्थौ भक्तानां भक्षयन्नघसन्ततिम्

kapālamocanaṁ tīrthaṁ puraskṛtvā tu bhairavaḥ tatraiva tasthau bhaktānāṁ bhakṣayannaghasantatim

कपालमोचन तीर्थ को प्रतिष्ठित कर भैरव वहीं स्थित हो गए, भक्तों के संचित पापों को भक्षण करते हुए।

श्लोक 63 (shiva.shatarudra.9.63)

कृष्णाष्टम्यां तु मार्गस्य मासस्य परमेश्वरः । आविर्बभूव सल्लीलो भैरवात्मा सतां प्रियः

kṛṣṇāṣṭamyāṁ tu mārgasya māsasya parameśvaraḥ āvirbabhūva sallīlo bhairavātmā satāṁ priyaḥ

मार्गशीर्ष मास की कृष्ण अष्टमी को, सत्पुरुषों के प्रिय, सुन्दर लीला करने वाले परमेश्वर भैरव के रूप में प्रकट हुए।

श्लोक 64 (shiva.shatarudra.9.64)

मार्गशीर्षासिताष्टम्यां कालभैरवसन्निधौ । उपोष्य जागरं कुर्वन्महापापैः प्रमुच्यते

mārgaśīrṣāsitāṣṭamyāṁ kālabhairavasannidhau upoṣya jāgaraṁ kurvanmahāpāpaiḥ pramucyate

मार्गशीर्ष की कृष्ण अष्टमी को कालभैरव के समीप उपवास और जागरण करने वाला मनुष्य महापापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 65 (shiva.shatarudra.9.65)

अन्यत्रापि नरो भक्त्या तद् व्रतं यः करिष्यति । सजागरं महापापैर्मुक्तो यास्यति सद्गतिम्

anyatrāpi naro bhaktyā tad vrataṁ yaḥ kariṣyati sajāgaraṁ mahāpāpairmukto yāsyati sadgatim

अन्यत्र भी जो मनुष्य भक्तिपूर्वक जागरणसहित उस व्रत को करेगा, वह महापापों से मुक्त होकर सद्गति को प्राप्त करेगा।

श्लोक 66 (shiva.shatarudra.9.66)

अनेकजन्मनियुतैर्यत्कृतं जन्तुभिस्त्वघम् । तत्सर्वं विलयं याति कालभैरवदर्शनात्

anekajanmaniyutairyatkṛtaṁ jantubhistvagham tatsarvaṁ vilayaṁ yāti kālabhairavadarśanāt

अनेक करोड़ों जन्मों में प्राणियों द्वारा किया गया जो भी पाप है, वह सब कालभैरव के दर्शन से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 67 (shiva.shatarudra.9.67)

कालभैरवभक्तानां पातकानि करोति यः । स मूढो दुःखितो भूत्वा पुनर्दुर्गतिमाप्नुयात्

kālabhairavabhaktānāṁ pātakāni karoti yaḥ sa mūḍho duḥkhito bhūtvā punardurgatimāpnuyāt

जो कालभैरव के भक्तों के प्रति पाप करता है, वह मूर्ख दुःखी होकर पुनः दुर्गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 68 (shiva.shatarudra.9.68)

विश्वेश्वरेऽपि ये भक्ता नो भक्ताः कालभैरवे । ते लभन्ते महादुःखं काश्यां चैव विशेषतः

viśveśvare’pi ye bhaktā no bhaktāḥ kālabhairave te labhante mahāduḥkhaṁ kāśyāṁ caiva viśeṣataḥ

जो विश्वेश्वर के भक्त तो हैं परन्तु कालभैरव के भक्त नहीं हैं, वे विशेष रूप से काशी में महान् दुःख प्राप्त करते हैं।

श्लोक 69 (shiva.shatarudra.9.69)

वाराणस्यामुषित्वा यो भैरवं न भजेन्नरः । तस्य पापानि वर्द्धन्ते शुक्लपक्षे यथा शशी

vārāṇasyāmuṣitvā yo bhairavaṁ na bhajennaraḥ tasya pāpāni varddhante śuklapakṣe yathā śaśī

जो मनुष्य वाराणसी में निवास करके भी भैरव की भक्ति नहीं करता, उसके पाप शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की भाँति बढ़ते जाते हैं।

श्लोक 70 (shiva.shatarudra.9.70)

कालराजं न यः काश्यां प्रतिभूताष्टमीकुजम् । भजेत्तस्य क्षयं पुण्यं कृष्णपक्षे यथा शशी

kālarājaṁ na yaḥ kāśyāṁ pratibhūtāṣṭamīkujam bhajettasya kṣayaṁ puṇyaṁ kṛṣṇapakṣe yathā śaśī

जो काशी में मंगलवार को पड़ने वाली अष्टमी के दिन कालराज का भजन नहीं करता, उसका पुण्य कृष्णपक्ष के चन्द्रमा की भाँति क्षीण होता जाता है।

श्लोक 71 (shiva.shatarudra.9.71)

श्रुत्वाख्यानमिदं पुण्यं ब्रह्महत्यापनोदकम् । भैरवोत्पत्तिसंज्ञं च सर्वपापैः प्रमुच्यते

śrutvākhyānamidaṁ puṇyaṁ brahmahatyāpanodakam bhairavotpattisaṁjñaṁ ca sarvapāpaiḥ pramucyate

ब्रह्महत्या को दूर करने वाले तथा 'भैरवोत्पत्ति' नामक इस पुण्य आख्यान को सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 72 (shiva.shatarudra.9.72)

बन्धनागारसंस्थोऽपि प्राप्तोऽपि विपदं पराम् । प्रादुर्भावं भैरवस्य श्रुत्वा मुच्येत सङ्कटात्

bandhanāgārasaṁstho’pi prāpto’pi vipadaṁ parām prādurbhāvaṁ bhairavasya śrutvā mucyeta saṅkaṭāt

बन्दीगृह में बैठा हुआ अथवा घोर विपत्ति में पड़ा हुआ मनुष्य भी भैरव के प्रादुर्भाव की कथा सुनकर संकट से मुक्त हो जाता है।

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