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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 17

महाकाल ज्योतिर्लिंग की महिमा, भाग दो

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.17.1)

ऋषय ऊचुः । महाकालसमाह्वस्थज्योतिर्लिङ्गस्य रक्षिणः । भक्तानां महिमानं च पुनर्ब्रूहि महामते ॥ 17.1 ॥

ṛṣaya ūcuḥ mahākālasamāhvasthajyotirliṅgasya rakṣiṇaḥ bhaktānāṁ mahimānaṁ ca punarbrūhi mahāmate

ऋषियों ने कहा — हे महामते! महाकाल नामक स्थान में स्थित ज्योतिर्लिंग की रक्षा-शक्ति और उसके भक्तों की महिमा को पुनः कहिए।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.17.2)

सूत उवाच । शृणुतादरतो विप्रा भक्तरक्षाविधायिनः । महाकालस्य लिङ्गस्य माहात्म्यं भक्तिवर्धनम् ॥ 17.2 ॥

sūta uvāca śṛṇutādarato viprā bhaktarakṣāvidhāyinaḥ mahākālasya liṅgasya māhātmyaṁ bhaktivardhanam

सूत जी ने कहा — हे विप्रो! आदरपूर्वक सुनिए, भक्तों की रक्षा करने वाले महाकाल-लिंग की उस महिमा को, जो भक्ति को बढ़ाने वाली है।

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.17.3)

उज्जयिन्यामभूद्राजा चन्द्रसेनाह्वयो महान् । सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः शिवभक्तो जितेन्द्रियः ॥ 17.3 ॥

ujjayinyāmabhūdrājā candrasenāhvayo mahān sarvaśāstrārthatattvajñaḥ śivabhakto jitendriyaḥ

उज्जयिनी में चन्द्रसेन नामक एक महान राजा था, जो समस्त शास्त्रों के तत्त्व का ज्ञाता, शिवभक्त और जितेन्द्रिय था।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.17.4)

तस्याभवत्सखा राज्ञो मणिभद्रो गणो द्विजाः । गिरीशगणमुख्यश्च सर्वलोकनमस्कृतः ॥ 17.4 ॥

tasyābhavatsakhā rājño maṇibhadro gaṇo dvijāḥ girīśagaṇamukhyaśca sarvalokanamaskṛtaḥ

हे द्विजो! उस राजा का एक मित्र था — मणिभद्र नामक गण, जो गिरीश (शिव) के प्रमुख गणों में से एक और समस्त लोकों द्वारा नमस्कृत था।

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.17.5)

एकदा स गणेन्द्रो हि प्रसन्नास्यो महामणिम् । मणिभद्रो ददौ तस्मै चिन्तामणिमुदारधीः ॥ 17.5 ॥

ekadā sa gaṇendro hi prasannāsyo mahāmaṇim maṇibhadro dadau tasmai cintāmaṇimudāradhīḥ

एक बार उस गणेश्वर मणिभद्र ने प्रसन्न मुख से, उदार बुद्धि से, उसे एक महान चिन्तामणि प्रदान की।

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.17.6)

स वै मणिः कौस्तुभवद् द्योतमानोऽर्कसन्निभः । ध्यातो दृष्टः श्रुतो वापि मङ्गलं यच्छति ध्रुवम् ॥ 17.6 ॥

sa vai maṇiḥ kaustubhavad dyotamāno’rkasannibhaḥ dhyāto dṛṣṭaḥ śruto vāpi maṅgalaṁ yacchati dhruvam

वह मणि कौस्तुभमणि के समान चमकती हुई, सूर्य के तुल्य तेजस्वी थी — उसका ध्यान करने, देखने अथवा सुनने मात्र से निश्चय ही मंगल प्राप्त होता था।

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.17.7)

तस्य कान्तितलस्पृष्टं कांस्यं ताम्रमयस्त्रपु । पाषाणादिकमन्यद्वा द्रुतं भवति हाटकम् ॥ 17.7 ॥

tasya kāntitalaspṛṣṭaṁ kāṁsyaṁ tāmramayastrapu pāṣāṇādikamanyadvā drutaṁ bhavati hāṭakam

उसकी कान्ति (आभा) का स्पर्श पाकर बेल-धातु (कांसा), ताम्र, लोहा, टिन, पत्थर आदि कोई भी वस्तु तत्काल स्वर्ण बन जाती थी।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.17.8)

स तु चिन्तामणिं कण्ठे बिभ्रद् राजा शिवाश्रयः । चन्द्रसेनो रराजाति देवमध्येव भानुमान् ॥ 17.8 ॥

sa tu cintāmaṇiṁ kaṇṭhe bibhrad rājā śivāśrayaḥ candraseno rarājāti devamadhyeva bhānumān

शिव के आश्रित वह राजा चन्द्रसेन उस चिन्तामणि को गले में धारण करके देवताओं के मध्य सूर्य के समान अत्यन्त शोभायमान होता था।

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.17.9)

श्रुत्वा चिन्तामणिग्रीवं चन्द्रसेनं नृपोत्तमम् । निखिलाः क्षितिराजानस्तृष्णाक्षुब्धहृदोऽभवन् ॥ 17.9 ॥

śrutvā cintāmaṇigrīvaṁ candrasenaṁ nṛpottamam nikhilāḥ kṣitirājānastṛṣṇākṣubdhahṛdo’bhavan

चिन्तामणि को गले में धारण करने वाले श्रेष्ठ राजा चन्द्रसेन के विषय में सुनकर पृथ्वी के समस्त राजाओं के हृदय लोभ से क्षुब्ध हो उठे।

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.17.10)

नृपा मत्सरिणः सर्वे तं मणिं चन्द्रसेनतः । नानोपायैरयाचन्त देवलब्धमबुद्धयः ॥ 17.10 ॥

nṛpā matsariṇaḥ sarve taṁ maṇiṁ candrasenataḥ nānopāyairayācanta devalabdhamabuddhayaḥ

वे सब ईर्ष्यालु और अबुद्धिमान राजा चन्द्रसेन से देव-प्रदत्त उस मणि को नाना उपायों से माँगने लगे।

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.17.11)

सर्वेषां भूभृतां याञ्चा चन्द्रसेनेन तेन वै । व्यर्थीकृता महाकालदृढभक्तेन भूसुराः ॥ 17.11 ॥

sarveṣāṁ bhūbhṛtāṁ yāñcā candrasenena tena vai vyarthīkṛtā mahākāladṛḍhabhaktena bhūsurāḥ

हे भूसुरो (ब्राह्मणो)! किन्तु महाकाल के दृढ़ भक्त उस चन्द्रसेन ने उन सभी राजाओं की याचना को व्यर्थ कर दिया।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.17.12)

ते कदर्थीकृताः सर्वे चन्द्रसेनेन भूभृता । राजानः सर्वदेशानां संरम्भं चक्रिरे तदा ॥ 17.12 ॥

te kadarthīkṛtāḥ sarve candrasenena bhūbhṛtā rājānaḥ sarvadeśānāṁ saṁrambhaṁ cakrire tadā

चन्द्रसेन द्वारा अपमानित हुए वे सभी राजा तब सर्वदेशों से क्रोधित होकर युद्ध का संकल्प करने लगे।

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.17.13)

अथ ते सर्वराजानश्चतुरङ्गबलान्विताः । चन्द्रसेनं रणे जेतुं सम्बभूवुः किलोद्यताः ॥ 17.13 ॥

atha te sarvarājānaścaturaṅgabalānvitāḥ candrasenaṁ raṇe jetuṁ sambabhūvuḥ kilodyatāḥ

तत्पश्चात् चतुरंगिणी सेना से युक्त वे सभी राजा चन्द्रसेन को युद्ध में जीतने के लिए उद्यत हो गये।

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.17.14)

ते तु सर्वे समेता वै कृतसङ्केतसंविदः । उज्जयिन्याश्चतुर्द्वारं रुरुधुर्बहुसैनिकाः ॥ 17.14 ॥

te tu sarve sametā vai kṛtasaṅketasaṁvidaḥ ujjayinyāścaturdvāraṁ rurudhurbahusainikāḥ

वे सब एकत्र होकर, आपस में संकेत निश्चित करके, अपनी विशाल सेनाओं द्वारा उज्जयिनी के चारों द्वारों को घेर कर रोक दिया।

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.17.15)

संरुध्यमानां स्वपुरीं दृष्ट्वा निखिलराजभिः । तमेव शरणं राजा महाकालेश्वरं ययौ ॥ 17.15 ॥

saṁrudhyamānāṁ svapurīṁ dṛṣṭvā nikhilarājabhiḥ tameva śaraṇaṁ rājā mahākāleśvaraṁ yayau

समस्त राजाओं द्वारा घिरी हुई अपनी नगरी को देखकर राजा चन्द्रसेन उसी महाकालेश्वर की शरण में गये।

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.17.16)

निर्विकल्पो निराहारः स नृपो दृढनिश्चयः । समानर्च महाकालं दिवानक्तमनन्यधीः ॥ 17.16 ॥

nirvikalpo nirāhāraḥ sa nṛpo dṛḍhaniścayaḥ samānarca mahākālaṁ divānaktamananyadhīḥ

दृढ़ निश्चयी और अनन्यचित्त वह राजा भोजन त्याग कर, बिना किसी विकल्प के, दिन-रात महाकाल की आराधना करने लगा।

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.17.17)

ततः स भगवाञ्छम्भुर्महाकालः प्रसन्नधीः । तं रक्षितुमुपायं वै चक्रे तं शृणुतादरात् ॥ 17.17 ॥

tataḥ sa bhagavāñchambhurmahākālaḥ prasannadhīḥ taṁ rakṣitumupāyaṁ vai cakre taṁ śṛṇutādarāt

तब प्रसन्नचित्त भगवान् शम्भु महाकाल ने उसकी रक्षा का उपाय किया, जिसे आप आदरपूर्वक सुनिए।

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.17.18)

तदैव समये गोपी काचित्तत्र पुरोत्तमे । चरन्ती सशिशुर्विप्रा महाकालान्तिकं ययौ ॥ 17.18 ॥

tadaiva samaye gopī kācittatra purottame carantī saśiśurviprā mahākālāntikaṁ yayau

हे विप्रो! उसी समय उस श्रेष्ठ नगरी में विचरण करती हुई एक गोपी अपने शिशु के साथ महाकाल के समीप आयी।

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.17.19)

पञ्चाब्दवयसं बालं वहन्ती गतभर्तृका । राज्ञा कृतां महाकालपूजां सापश्यदादरात् ॥ 17.19 ॥

pañcābdavayasaṁ bālaṁ vahantī gatabhartṛkā rājñā kṛtāṁ mahākālapūjāṁ sāpaśyadādarāt

पतिविहीना वह पाँच वर्ष के बालक को गोद में लिये हुए, राजा के द्वारा की गयी महाकाल-पूजा को आदरपूर्वक देखने लगी।

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.17.20)

सा दृष्ट्वा सुमहाश्चर्यां शिवपूजां च तत्कृताम् । प्रणिपत्य स्वशिविरं पुनरेवाभ्यपद्यत ॥ 17.20 ॥

sā dṛṣṭvā sumahāścaryāṁ śivapūjāṁ ca tatkṛtām praṇipatya svaśiviraṁ punarevābhyapadyata

उस अत्यन्त अद्भुत शिव-पूजा को देखकर वह प्रणाम करके पुनः अपने डेरे को लौट गयी।

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.17.21)

एतत्सर्वमशेषेण स दृष्ट्वा वल्लवीसुतः । कुतूहलेन तां कर्तुं शिवपूजां मनो दधे ॥ 17.21 ॥

etatsarvamaśeṣeṇa sa dṛṣṭvā vallavīsutaḥ kutūhalena tāṁ kartuṁ śivapūjāṁ mano dadhe

उस गोपी के पुत्र ने यह सब पूर्ण रूप से देखकर, कुतूहलवश उसी प्रकार शिव-पूजा करने का मन में विचार किया।

श्लोक 22 (shiva.kotirudra.17.22)

आनीय हृद्यं पाषाणं शून्ये तु शिविरान्तरे । अविदूरे स्वशिविराच्छिवलिङ्गं स भक्तितः ॥ 17.22 ॥

ānīya hṛdyaṁ pāṣāṇaṁ śūnye tu śivirāntare avidūre svaśivirācchivaliṅgaṁ sa bhaktitaḥ

अपने डेरे से न अधिक दूर, एक सुनसान स्थान में, वह भक्तिपूर्वक एक सुन्दर पत्थर लाकर उसे शिवलिंग के रूप में स्थापित किया।

श्लोक 23 (shiva.kotirudra.17.23)

गन्धालङ्कारवासोभिर्धूपदीपाक्षतादिभिः । विधाय कृत्रिमैर्द्रव्यैर्नैवेद्यं चाप्यकल्पयत् ॥ 17.23 ॥

gandhālaṅkāravāsobhirdhūpadīpākṣatādibhiḥ vidhāya kṛtrimairdravyairnaivedyaṁ cāpyakalpayat

गन्ध, आभूषण, वस्त्र, धूप, दीप, अक्षत आदि कृत्रिम (मन-कल्पित) सामग्रियों से उसकी पूजा विधिपूर्वक करके उसने नैवेद्य भी अर्पित किया।

श्लोक 24 (shiva.kotirudra.17.24)

भूयो भूयः समभ्यर्च्य पत्रैः पुष्पैर्मनोरमैः । नृत्यं च विविधं कृत्वा प्रणनाम पुनः पुनः ॥ 17.24 ॥

bhūyo bhūyaḥ samabhyarcya patraiḥ puṣpairmanoramaiḥ nṛtyaṁ ca vividhaṁ kṛtvā praṇanāma punaḥ punaḥ

सुन्दर पत्तों और पुष्पों से बार-बार पूजा करके, अनेक प्रकार के नृत्य करके, उसने बार-बार प्रणाम किया।

श्लोक 25 (shiva.kotirudra.17.25)

एतस्मिन्समये पुत्रं शिवासक्तसुचेतसम् । प्रणयाद्गोपिका सा तं भोजनाय समाह्वयत् ॥ 17.25 ॥

etasminsamaye putraṁ śivāsaktasucetasam praṇayādgopikā sā taṁ bhojanāya samāhvayat

इसी समय उस गोपी ने शिव में तल्लीन-चित्त अपने पुत्र को स्नेहपूर्वक भोजन के लिए बुलाया।

श्लोक 26 (shiva.kotirudra.17.26)

यदाहूतोऽपि बहुशः शिवपूजाक्तमानसः । बालश्च भोजनं नैच्छत्तदा तत्र ययौ प्रसूः ॥ 17.26 ॥

yadāhūto’pi bahuśaḥ śivapūjāktamānasaḥ bālaśca bhojanaṁ naicchattadā tatra yayau prasūḥ

बार-बार बुलाये जाने पर भी शिव-पूजा में लीन उस बालक ने भोजन की इच्छा न की, तब उसकी माँ स्वयं वहाँ गयी।

श्लोक 27 (shiva.kotirudra.17.27)

तं विलोक्य शिवस्याग्रे निषण्णं मीलितेक्षणम् । चकर्ष पाणिं सङ्गृह्य कोपेन समताडयत् ॥ 17.27 ॥

taṁ vilokya śivasyāgre niṣaṇṇaṁ mīlitekṣaṇam cakarṣa pāṇiṁ saṅgṛhya kopena samatāḍayat

शिव के सम्मुख आँखें मूँदे बैठे उस बालक को देखकर उसने उसका हाथ पकड़ कर खींचा और क्रोधवश उसे मारा।

श्लोक 28 (shiva.kotirudra.17.28)

आकृष्टस्ताडितश्चापि नागच्छत् स्वसुतो यदा । तां पूजां नाशयामास क्षिप्त्वा लिङ्गं च दूरतः ॥ 17.28 ॥

ākṛṣṭastāḍitaścāpi nāgacchat svasuto yadā tāṁ pūjāṁ nāśayāmāsa kṣiptvā liṅgaṁ ca dūrataḥ

खींचे जाने और मारे जाने पर भी जब उसका पुत्र नहीं आया, तब उसने उस लिंग को दूर फेंककर उस पूजा को नष्ट कर दिया।

श्लोक 29 (shiva.kotirudra.17.29)

हाहेति दूयमानं तं निर्भर्त्स्य स्वसुतं च सा । पुनर्विवेश स्वगृहं गोपी क्रोधसमन्विता ॥ 17.29 ॥

hāheti dūyamānaṁ taṁ nirbhartsya svasutaṁ ca sā punarviveśa svagṛhaṁ gopī krodhasamanvitā

"हाय-हाय" करते हुए दुखी अपने पुत्र को डाँटकर वह क्रोधयुक्त गोपी पुनः अपने घर में चली गयी।

श्लोक 30 (shiva.kotirudra.17.30)

मात्रा विनाशितां पूजां दृष्ट्वा देवस्य शूलिनः । देवदेवेति चुक्रोश निपपात स बालकः ॥ 17.30 ॥

mātrā vināśitāṁ pūjāṁ dṛṣṭvā devasya śūlinaḥ devadeveti cukrośa nipapāta sa bālakaḥ

अपनी माँ द्वारा नष्ट की गयी त्रिशूलधारी देव की उस पूजा को देखकर वह बालक "हे देवदेव!" कहकर पुकार उठा और भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 31 (shiva.kotirudra.17.31)

प्रनष्टसंज्ञः सहसा स बभूव शुचाकुलः । लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन चक्षुषी उदमीलयत् ॥ 17.31 ॥

pranaṣṭasaṁjñaḥ sahasā sa babhūva śucākulaḥ labdhasaṁjño muhūrtena cakṣuṣī udamīlayat

शोकाकुल होकर वह अचानक बेसुध हो गया; फिर कुछ ही क्षणों में होश में आकर उसने अपनी आँखें खोलीं।

श्लोक 32 (shiva.kotirudra.17.32)

तदैव जातं शिविरं महाकालस्य सुन्दरम् । ददर्श स शिशुस्तत्र शिवानुग्रहतोऽचिरात् ॥ 17.32 ॥

tadaiva jātaṁ śiviraṁ mahākālasya sundaram dadarśa sa śiśustatra śivānugrahato’cirāt

उसी क्षण शिव की कृपा से उस स्थान पर उत्पन्न हुए महाकाल के सुन्दर मन्दिर को उस बालक ने वहाँ देखा।

श्लोक 33 (shiva.kotirudra.17.33)

हिरण्मयबृहद् द्वारं कपाटवरतोरणम् । महार्हनीलविमलवज्रवेदीविराजितम् ॥ 17.33 ॥

hiraṇmayabṛhad dvāraṁ kapāṭavaratoraṇam mahārhanīlavimalavajravedīvirājitam

वह विशाल स्वर्णमय द्वार, उत्तम कपाट और तोरण से युक्त था, तथा अमूल्य नीलमणियों और निर्मल हीरों से जड़ी वेदी से सुशोभित था।

श्लोक 34 (shiva.kotirudra.17.34)

सन्तप्तहेमकलशैर्विचित्रैर्बहुभिर्युतम् । प्रोद्भासितमणिस्तम्भैर्बद्धस्फटिकभूतलैः ॥ 17.34 ॥

santaptahemakalaśairvicitrairbahubhiryutam prodbhāsitamaṇistambhairbaddhasphaṭikabhūtalaiḥ

वह अनेक प्रकार के तपाये हुए स्वर्ण-कलशों से युक्त था, चमकते हुए मणि-स्तम्भों और स्फटिक से जड़े हुए फर्श से युक्त था।

श्लोक 35 (shiva.kotirudra.17.35)

तन्मध्ये रत्नलिङ्गं हि शङ्करस्य कृपानिधेः । स्वकृतार्चनसंयुक्तमपश्यद्गोपिकासुतः ॥ 17.35 ॥

tanmadhye ratnaliṅgaṁ hi śaṅkarasya kṛpānidheḥ svakṛtārcanasaṁyuktamapaśyadgopikāsutaḥ

उसके मध्य में कृपा-निधान शङ्कर के रत्नमय लिंग को, अपने ही द्वारा की गयी पूजा-सामग्री सहित, उस गोपी-पुत्र ने देखा।

श्लोक 36 (shiva.kotirudra.17.36)

स दृष्ट्वा सहसोत्थाय शिशुर्विस्मितमानसः । सन्निमग्न इवासीद्वै परमानन्दसागरे ॥ 17.36 ॥

sa dṛṣṭvā sahasotthāya śiśurvismitamānasaḥ sannimagna ivāsīdvai paramānandasāgare

यह देखकर विस्मित मन वाला वह बालक तुरन्त उठ खड़ा हुआ और मानो परमानन्द के सागर में डूब गया।

श्लोक 37 (shiva.kotirudra.17.37)

ततः स्तुत्वा स गिरिशं भूयो भूयः प्रणम्य च । सूर्ये चास्तङ्गते बालो निर्जगाम शिवालयात् ॥ 17.37 ॥

tataḥ stutvā sa giriśaṁ bhūyo bhūyaḥ praṇamya ca sūrye cāstaṅgate bālo nirjagāma śivālayāt

तत्पश्चात् गिरीश की स्तुति करके और बार-बार प्रणाम करके, सूर्यास्त होने पर वह बालक शिवालय से बाहर निकला।

श्लोक 38 (shiva.kotirudra.17.38)

अथापश्यत्स्वशिविरं पुरन्दरपुरोपमम् । सद्यो हिरण्मयीभूतं विचित्रं परमोज्ज्वलम् ॥ 17.38 ॥

athāpaśyatsvaśiviraṁ purandarapuropamam sadyo hiraṇmayībhūtaṁ vicitraṁ paramojjvalam

तब उसने अपने डेरे को इन्द्रपुरी के समान देखा, जो अकस्मात् स्वर्णमय, विचित्र और अत्यन्त उज्ज्वल हो गया था।

श्लोक 39 (shiva.kotirudra.17.39)

सोऽन्तर्विवेश भवनं सर्वशोभासमन्वितम् । मणिहेमगणाकीर्णं मोदमानो निशामुखे ॥ 17.39 ॥

so’ntarviveśa bhavanaṁ sarvaśobhāsamanvitam maṇihemagaṇākīrṇaṁ modamāno niśāmukhe

संध्या के समय आनन्दित होकर वह सर्व-सुषमा से युक्त, मणि-स्वर्ण-समूहों से भरे उस भवन में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 40 (shiva.kotirudra.17.40)

तत्रापश्यत्स्वजननीं स्वपन्तीं दिव्यलक्षणाम् । रत्नालङ्कारदीप्ताङ्गीं साक्षात्सुरवधूमिव ॥ 17.40 ॥

tatrāpaśyatsvajananīṁ svapantīṁ divyalakṣaṇām ratnālaṅkāradīptāṅgīṁ sākṣātsuravadhūmiva

वहाँ उसने अपनी माँ को सोयी हुई देखा, जो दिव्य लक्षणों से युक्त, रत्नाभूषणों से देदीप्यमान अंगों वाली, मानो साक्षात् देवाङ्गना ही थी।

श्लोक 41 (shiva.kotirudra.17.41)

अथो स तनयो विप्राः शिवानुग्रहभाजनम् । जवेनोत्थापयामास मातरं सुखविह्वलः ॥ 17.41 ॥

atho sa tanayo viprāḥ śivānugrahabhājanam javenotthāpayāmāsa mātaraṁ sukhavihvalaḥ

हे विप्रो! तब शिव के अनुग्रह का पात्र बना वह पुत्र, सुख से विह्वल होकर शीघ्रता से अपनी माता को जगाने लगा।

श्लोक 42 (shiva.kotirudra.17.42)

सोत्थिताद्भुतमालक्ष्यापूर्वं सर्वमिवाभवत् । महानन्दसुमग्ना हि सस्वजे स्वसुतं च तम् ॥ 17.42 ॥

sotthitādbhutamālakṣyāpūrvaṁ sarvamivābhavat mahānandasumagnā hi sasvaje svasutaṁ ca tam

उठते ही उस अद्भुत, अपूर्व दृश्य को देखकर मानो सब कुछ नया हो गया; महान आनन्द में डूबी वह माँ अपने पुत्र से लिपट गयी।

श्लोक 43 (shiva.kotirudra.17.43)

श्रुत्वा पुत्रमुखात्सर्वं प्रसादं गिरिजापतेः । प्रभुं विज्ञापयामास यो भजत्यनिशं शिवम् ॥ 17.43 ॥

śrutvā putramukhātsarvaṁ prasādaṁ girijāpateḥ prabhuṁ vijñāpayāmāsa yo bhajatyaniśaṁ śivam

पुत्र के मुख से गिरिजापति की उस समस्त कृपा-कथा को सुनकर, उस राजा को — जो निरन्तर शिव की भक्ति करता था — यह सूचना दी गयी।

श्लोक 44 (shiva.kotirudra.17.44)

स राजा सहसागत्य समाप्तनियमो निशि । ददर्श गोपिकासूनोः प्रभावं शिवतोषणम् ॥ 17.44 ॥

sa rājā sahasāgatya samāptaniyamo niśi dadarśa gopikāsūnoḥ prabhāvaṁ śivatoṣaṇam

अपना व्रत पूर्ण करके वह राजा तुरन्त वहाँ आया और उस गोपी-पुत्र के शिव को प्रसन्न करने वाले प्रभाव को उसने रात में देखा।

श्लोक 45 (shiva.kotirudra.17.45)

दृष्ट्वा महीपतिः सर्वं तत्सामात्यपुरोहितः । आसीन्निमग्नो विधृतिः परमानन्दसागरे ॥ 17.45 ॥

dṛṣṭvā mahīpatiḥ sarvaṁ tatsāmātyapurohitaḥ āsīnnimagno vidhṛtiḥ paramānandasāgare

यह सब देखकर, मंत्रियों और पुरोहित सहित वह राजा धैर्यहीन होकर परमानन्द के सागर में डूब गया।

श्लोक 46 (shiva.kotirudra.17.46)

प्रेम्णा बाष्पजलं मुञ्चन् चन्द्रसेनो नृपो हि सः । शिवनामोच्चरन्प्रीत्या परिरेभे तमर्भकम् ॥ 17.46 ॥

premṇā bāṣpajalaṁ muñcan candraseno nṛpo hi saḥ śivanāmoccaranprītyā parirebhe tamarbhakam

प्रेम के आँसू बहाते हुए राजा चन्द्रसेन ने प्रीतिपूर्वक शिव का नाम उच्चारण करते हुए उस बालक को गले से लगा लिया।

श्लोक 47 (shiva.kotirudra.17.47)

महामहोत्सवस्तत्र प्रबभूवाद्भुतो द्विजाः । महेशकीर्तनं चक्रुः सर्वे च सुखविह्वलाः ॥ 17.47 ॥

mahāmahotsavastatra prababhūvādbhuto dvijāḥ maheśakīrtanaṁ cakruḥ sarve ca sukhavihvalāḥ

हे द्विजो! वहाँ एक अद्भुत महोत्सव हुआ; सुख से विह्वल हुए सब लोगों ने महेश का कीर्तन किया।

श्लोक 48 (shiva.kotirudra.17.48)

एवमत्यद्भुताचाराच्छिवमाहात्म्यदर्शनात् । पौराणां सम्भ्रमाच्चैव सा रात्रिः क्षणतामगात् ॥ 17.48 ॥

evamatyadbhutācārācchivamāhātmyadarśanāt paurāṇāṁ sambhramāccaiva sā rātriḥ kṣaṇatāmagāt

इस प्रकार उस अत्यन्त अद्भुत घटना से, शिव-महिमा के दर्शन से, और नगरवासियों के हर्षोल्लास से वह रात्रि क्षण के समान बीत गयी।

श्लोक 49 (shiva.kotirudra.17.49)

अथ प्रभाते युद्धाय पुरं संरुध्य संस्थिताः । राजानश्चारवक्त्रेभ्यः शुश्रुवुश्चरितं च तत् ॥ 17.49 ॥

atha prabhāte yuddhāya puraṁ saṁrudhya saṁsthitāḥ rājānaścāravaktrebhyaḥ śuśruvuścaritaṁ ca tat

प्रातःकाल नगर को घेरे युद्ध के लिए खड़े हुए वे राजा अपने गुप्तचरों के मुख से उस सम्पूर्ण घटना को सुनने लगे।

श्लोक 50 (shiva.kotirudra.17.50)

ते समेताश्च राजानः सर्वे ये ये समागताः । परस्परमिति प्रोचुस्तच्छ्रुत्वा चकित अति ॥ 17.50 ॥

te sametāśca rājānaḥ sarve ye ye samāgatāḥ parasparamiti procustacchrutvā cakita ati

वहाँ एकत्र हुए वे सब राजा उस बात को सुनकर अत्यन्त चकित होकर आपस में यह कहने लगे।

श्लोक 51 (shiva.kotirudra.17.51)

राजान ऊचुः । अयं राजा चन्द्रसेनः शिवभक्तोऽतिदुर्जयः । उज्जयिन्या महाकालपुर्याः पतिरनाकुलः ॥ 17.51 ॥

rājāna ūcuḥ ayaṁ rājā candrasenaḥ śivabhakto’tidurjayaḥ ujjayinyā mahākālapuryāḥ patiranākulaḥ

राजाओं ने कहा — यह राजा चन्द्रसेन शिव का भक्त और अत्यन्त दुर्जय है; यह महाकाल की नगरी उज्जयिनी का निश्चल, अविचलित स्वामी है।

श्लोक 52 (shiva.kotirudra.17.52)

ईदृशाः शिशवो यस्य पुर्यां सन्ति शिवव्रताः । स राजा चन्द्रसेनस्तु महाशङ्करसेवकः ॥ 17.52 ॥

īdṛśāḥ śiśavo yasya puryāṁ santi śivavratāḥ sa rājā candrasenastu mahāśaṅkarasevakaḥ

जिसकी नगरी में ऐसे शिव-व्रती बालक रहते हैं, वह राजा चन्द्रसेन निश्चय ही महान् शंकर का सेवक है।

श्लोक 53 (shiva.kotirudra.17.53)

नूनमस्य विरोधेन शिवः क्रोधं करिष्यति । तत्क्रोधाद्धि वयं सर्वे भविष्यामो विनष्टकाः ॥ 17.53 ॥

nūnamasya virodhena śivaḥ krodhaṁ kariṣyati tatkrodhāddhi vayaṁ sarve bhaviṣyāmo vinaṣṭakāḥ

निश्चय ही इसका विरोध करने से शिव क्रुद्ध हो जायेंगे, और उनके उस क्रोध से हम सब नष्ट हो जायेंगे।

श्लोक 54 (shiva.kotirudra.17.54)

तस्मादनेन राज्ञा वै मिलापः कार्य एव हि । एवं सति महेशानः करिष्यति कृपां पराम् ॥ 17.54 ॥

tasmādanena rājñā vai milāpaḥ kārya eva hi evaṁ sati maheśānaḥ kariṣyati kṛpāṁ parām

इसलिए इस राजा के साथ मेल-मिलाप करना ही उचित है; ऐसा करने पर महेश्वर हम पर परम कृपा करेंगे।

श्लोक 55 (shiva.kotirudra.17.55)

सूत उवाच । इति निश्चित्य ते भूपास्त्यक्तवैराः सदाशयाः । सर्वे बभूवुः सुप्रीता न्यस्तशस्त्रास्त्रपाणयः ॥ 17.55 ॥

sūta uvāca iti niścitya te bhūpāstyaktavairāḥ sadāśayāḥ sarve babhūvuḥ suprītā nyastaśastrāstrapāṇayaḥ

सूत जी ने कहा — ऐसा निश्चय करके, सदाशय वे राजा वैर त्याग कर, शस्त्र-अस्त्र हाथ से रखकर, सब अत्यन्त प्रसन्न हो गये।

श्लोक 56 (shiva.kotirudra.17.56)

विविशुस्ते पुरीं रम्यां महाकालस्य भूभृतः । महाकालं समानर्चुश्चन्द्रसेनानुमोदिताः ॥ 17.56 ॥

viviśuste purīṁ ramyāṁ mahākālasya bhūbhṛtaḥ mahākālaṁ samānarcuścandrasenānumoditāḥ

वे राजा चन्द्रसेन की अनुमति पाकर महाकाल की उस रमणीय नगरी में प्रविष्ट हुए और महाकाल की पूजा की।

श्लोक 57 (shiva.kotirudra.17.57)

ततस्ते गोपवनितागेहं जग्मुर्महीभृतः । प्रशंसन्तश्च तद्भाग्यं सर्वे दिव्यमहोदयम् ॥ 17.57 ॥

tataste gopavanitāgehaṁ jagmurmahībhṛtaḥ praśaṁsantaśca tadbhāgyaṁ sarve divyamahodayam

तत्पश्चात् वे सब राजा उस गोप-पत्नी के घर गये और उसके उस दिव्य महान सौभाग्य की प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 58 (shiva.kotirudra.17.58)

ते तत्र चन्द्रसेनेन प्रत्युद्गम्याभिपूजिताः । महार्हविष्टरगताः प्रत्यनन्दन् सुविस्मिताः ॥ 17.58 ॥

te tatra candrasenena pratyudgamyābhipūjitāḥ mahārhaviṣṭaragatāḥ pratyanandan suvismitāḥ

वहाँ चन्द्रसेन ने आगे बढ़कर उनका सत्कार किया; बहुमूल्य आसनों पर बैठकर अत्यन्त विस्मित होकर उन्होंने भी उसका अभिनन्दन किया।

श्लोक 59 (shiva.kotirudra.17.59)

गोपसूनोः प्रसादात्तत्प्रादुर्भूतं शिवालयम् । संवीक्ष्य शिवलिङ्गं च शिवे चक्रुः परां मतिम् ॥ 17.59 ॥

gopasūnoḥ prasādāttatprādurbhūtaṁ śivālayam saṁvīkṣya śivaliṅgaṁ ca śive cakruḥ parāṁ matim

गोप-पुत्र के प्रसाद से प्रकट हुए उस शिवालय और शिवलिंग को देखकर उन सबने शिव में परम श्रद्धा स्थिर की।

श्लोक 60 (shiva.kotirudra.17.60)

ततस्ते गोपशिशवे प्रीता निखिलभूभुजः । ददुर्बहूनि वस्तूनि तस्मै शिवकृपार्थिनः ॥ 17.60 ॥

tataste gopaśiśave prītā nikhilabhūbhujaḥ dadurbahūni vastūni tasmai śivakṛpārthinaḥ

तब शिव की कृपा चाहने वाले वे सभी राजा प्रसन्न होकर उस गोप-बालक को बहुत सी वस्तुएँ भेंट करने लगे।

श्लोक 61 (shiva.kotirudra.17.61)

ये ये सर्वेषु देशेषु गोपास्तिष्ठन्ति भूरिशः । तेषां तमेव राजानं चक्रिरे सर्वपार्थिवाः ॥ 17.61 ॥

ye ye sarveṣu deśeṣu gopāstiṣṭhanti bhūriśaḥ teṣāṁ tameva rājānaṁ cakrire sarvapārthivāḥ

समस्त देशों में जितने भी अनगिनत गोप रहते थे, उन सब राजाओं ने उसी बालक को उनका राजा बना दिया।

श्लोक 62 (shiva.kotirudra.17.62)

अथास्मिन्नन्तरे सर्वैस्त्रिदशैरभिपूजितः । प्रादुर्बभूव तेजस्वी हनूमान् वानरेश्वरः ॥ 17.62 ॥

athāsminnantare sarvaistridaśairabhipūjitaḥ prādurbabhūva tejasvī hanūmān vānareśvaraḥ

इसी बीच समस्त देवताओं द्वारा पूजित तेजस्वी वानरेश्वर हनुमान् वहाँ प्रकट हुए।

श्लोक 63 (shiva.kotirudra.17.63)

ते तस्याभिगमादेव राजानो जातसम्भ्रमाः । प्रत्युत्थाय नमश्चकुर्भक्तिनम्रात्ममूर्तयः ॥ 17.63 ॥

te tasyābhigamādeva rājāno jātasambhramāḥ pratyutthāya namaścakurbhaktinamrātmamūrtayaḥ

उनके आगमन मात्र से चकित हुए वे सभी राजा खड़े होकर, भक्ति से नम्र होकर, उन्हें प्रणाम करने लगे।

श्लोक 64 (shiva.kotirudra.17.64)

तेषां मध्ये समासीनः पूजितः प्लवगेश्वरः । गोपात्मजं तमालिङ्ग्य राज्ञो वीक्ष्येदमब्रवीत् ॥ 17.64 ॥

teṣāṁ madhye samāsīnaḥ pūjitaḥ plavageśvaraḥ gopātmajaṁ tamāliṅgya rājño vīkṣyedamabravīt

उन सबके मध्य पूजित होकर विराजमान वानरेश्वर ने उस गोप-पुत्र को गले लगाकर, राजाओं की ओर देखते हुए यह कहा।

श्लोक 65 (shiva.kotirudra.17.65)

हनूमानुवाच । सर्वे शृण्वन्तु भद्रं वो राजानो ये च देहिनः । ऋते शिवं नान्यतमो गतिरस्ति शरीरिणाम् ॥ 17.65 ॥

hanūmānuvāca sarve śṛṇvantu bhadraṁ vo rājāno ye ca dehinaḥ ṛte śivaṁ nānyatamo gatirasti śarīriṇām

हनुमान् जी ने कहा — हे राजाओ और समस्त प्राणियो! सब लोग सुनें, आप सबका कल्याण हो; शिव को छोड़कर देहधारियों की कोई अन्य गति नहीं है।

श्लोक 66 (shiva.kotirudra.17.66)

एवं गोपसुतो दिष्ट्या शिवपूजां विलोक्य च । अमन्त्रेणापि सम्पूज्य शिवं शिवमवाप्तवान् ॥ 17.66 ॥

evaṁ gopasuto diṣṭyā śivapūjāṁ vilokya ca amantreṇāpi sampūjya śivaṁ śivamavāptavān

इस प्रकार सौभाग्य से शिव-पूजा को देखकर, बिना मन्त्र के भी शिव की पूजा करके, इस गोप-पुत्र ने शिव को ही प्राप्त कर लिया।

श्लोक 67 (shiva.kotirudra.17.67)

एष भक्तवरः शम्भोर्गोपानां कीर्तिवर्धनः । इह भुक्त्वाखिलान्भोगानन्ते मोक्षमवाप्स्यति ॥ 17.67 ॥

eṣa bhaktavaraḥ śambhorgopānāṁ kīrtivardhanaḥ iha bhuktvākhilānbhogānante mokṣamavāpsyati

यह शम्भु का श्रेष्ठ भक्त गोपों की कीर्ति बढ़ाने वाला है; यह यहाँ समस्त भोगों को भोगकर अन्त में मोक्ष प्राप्त करेगा।

श्लोक 68 (shiva.kotirudra.17.68)

अस्य वंशेऽष्टमो भावी नन्दो नाम महायशाः । प्राप्स्यते तस्य पुत्रत्वं कृष्णो नारायणः स्वयम् ॥ 17.68 ॥

asya vaṁśe’ṣṭamo bhāvī nando nāma mahāyaśāḥ prāpsyate tasya putratvaṁ kṛṣṇo nārāyaṇaḥ svayam

इसके वंश में आठवीं पीढ़ी में महायशस्वी नन्द नामक व्यक्ति होगा, जिसका पुत्रत्व स्वयं भगवान् नारायण कृष्ण के रूप में प्राप्त करेंगे।

श्लोक 69 (shiva.kotirudra.17.69)

अद्यप्रभृति लोकेऽस्मिन्नेष गोपकुमारकः । नाम्ना श्रीकर इत्युच्चैर्लोकख्यातिं गमिष्यति ॥ 17.69 ॥

adyaprabhṛti loke’sminneṣa gopakumārakaḥ nāmnā śrīkara ityuccairlokakhyātiṁ gamiṣyati

आज से इस लोक में यह गोप-कुमार "श्रीकर" नाम से महान् लोक-ख्याति को प्राप्त करेगा।

श्लोक 70 (shiva.kotirudra.17.70)

सूत उवाच । एवमुक्त्वाञ्जनीसूनुः शिवरूपो हरीश्वरः । सर्वान् राज्ञश्चन्द्रसेनं कृपादृष्ट्या ददर्श ह ॥ 17.70 ॥

sūta uvāca evamuktvāñjanīsūnuḥ śivarūpo harīśvaraḥ sarvān rājñaścandrasenaṁ kṛpādṛṣṭyā dadarśa ha

सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर, शिव-स्वरूप वानरश्रेष्ठ अंजनी-पुत्र हनुमान् ने समस्त राजाओं और चन्द्रसेन को कृपादृष्टि से देखा।

श्लोक 71 (shiva.kotirudra.17.71)

अथ तस्मै श्रीकराय गोपपुत्राय धीमते । उपादिदेश सुप्रीत्या शिवाचारं शिवप्रियम् ॥ 17.71 ॥

atha tasmai śrīkarāya gopaputrāya dhīmate upādideśa suprītyā śivācāraṁ śivapriyam

तत्पश्चात् उन्होंने बुद्धिमान गोप-पुत्र श्रीकर को अत्यन्त प्रीतिपूर्वक शिव को प्रिय लगने वाला शिवाचार (शिव-पूजा-विधि) सिखाया।

श्लोक 72 (shiva.kotirudra.17.72)

हनूमानथ सुप्रीतः सर्वेषां पश्यतां द्विजाः । चन्द्रसेनं श्रीकरं च तत्रैवान्तरधीयत ॥ 17.72 ॥

hanūmānatha suprītaḥ sarveṣāṁ paśyatāṁ dvijāḥ candrasenaṁ śrīkaraṁ ca tatraivāntaradhīyata

हे द्विजो! तत्पश्चात् अत्यन्त प्रसन्न हनुमान् जी सभी के देखते-देखते चन्द्रसेन और श्रीकर के वहीं से अन्तर्धान हो गये।

श्लोक 73 (shiva.kotirudra.17.73)

तं सर्वे च महीपालाः संहृष्टाः प्रतिपूजिताः । चन्द्रसेनं समामन्त्र्य प्रतिजग्मुर्यथागतम् ॥ 17.73 ॥

taṁ sarve ca mahīpālāḥ saṁhṛṣṭāḥ pratipūjitāḥ candrasenaṁ samāmantrya pratijagmuryathāgatam

सत्कार पाकर हर्षित हुए वे समस्त राजा चन्द्रसेन से विदा लेकर जैसे आये थे वैसे ही लौट गये।

श्लोक 74 (shiva.kotirudra.17.74)

श्रीकरोऽपि महातेजा उपदिष्टो हनूमता । ब्राह्मणैः सह धर्मज्ञैश्चक्रे शम्भोः समर्हणम् ॥ 17.74 ॥

śrīkaro’pi mahātejā upadiṣṭo hanūmatā brāhmaṇaiḥ saha dharmajñaiścakre śambhoḥ samarhaṇam

हनुमान् द्वारा उपदेश पाया हुआ महातेजस्वी श्रीकर भी धर्मज्ञ ब्राह्मणों के साथ शम्भु का सम्यक् पूजन करने लगा।

श्लोक 75 (shiva.kotirudra.17.75)

चन्द्रसेनो महाराजः श्रीकरो गोपबालकः । उभावपि परप्रीत्या महाकालं च भेजतुः ॥ 17.75 ॥

candraseno mahārājaḥ śrīkaro gopabālakaḥ ubhāvapi paraprītyā mahākālaṁ ca bhejatuḥ

महाराज चन्द्रसेन और गोप-बालक श्रीकर, दोनों ही अत्यन्त प्रीति से महाकाल की सेवा करते रहे।

श्लोक 76 (shiva.kotirudra.17.76)

कालेन श्रीकरः सोऽपि चन्द्रसेनश्च भूपतिः । समाराध्य महाकालं भेजतुः परमं पदम् ॥ 17.76 ॥

kālena śrīkaraḥ so’pi candrasenaśca bhūpatiḥ samārādhya mahākālaṁ bhejatuḥ paramaṁ padam

समय आने पर श्रीकर और राजा चन्द्रसेन दोनों ने महाकाल की भली-भाँति आराधना करके परम पद को प्राप्त किया।

श्लोक 77 (shiva.kotirudra.17.77)

एवंविधो महाकालः शिवलिङ्गः सतां गतिः । सर्वथा दुष्टहन्ता च शङ्करो भक्तवत्सलः ॥ 17.77 ॥

evaṁvidho mahākālaḥ śivaliṅgaḥ satāṁ gatiḥ sarvathā duṣṭahantā ca śaṅkaro bhaktavatsalaḥ

ऐसा है यह महाकाल शिवलिंग, सज्जनों की गति; यह शङ्कर सदा दुष्टों का नाशक और भक्तों पर वत्सल है।

श्लोक 78 (shiva.kotirudra.17.78)

इदं पवित्रं परमं रहस्यं सर्वसौख्यदम् । आख्यानं कथितं स्वर्ग्यं शिवभक्तिविवर्धनम् ॥ 17.78 ॥

idaṁ pavitraṁ paramaṁ rahasyaṁ sarvasaukhyadam ākhyānaṁ kathitaṁ svargyaṁ śivabhaktivivardhanam

यह पवित्र, परम रहस्यमय, सर्व सुख देने वाला, स्वर्ग प्रदान करने वाला और शिव-भक्ति को बढ़ाने वाला आख्यान कहा गया।

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