कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 18
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा
श्लोक 1 (shiva.kotirudra.18.1)
ऋषय ऊचुः । सूत सूत महाभाग श्राविता ह्यद्भुता कथा । महाकालाख्यलिङ्गस्य निजभक्तसुरक्षिणः ॥ 18.1 ॥
ṛṣaya ūcuḥ sūta sūta mahābhāga śrāvitā hyadbhutā kathā mahākālākhyaliṅgasya nijabhaktasurakṣiṇaḥ
ऋषियों ने कहा — हे सूत! हे महाभाग! आपने महाकाल नामक, अपने भक्तों की भलीभाँति रक्षा करने वाले लिंग की अद्भुत कथा सुनायी।
श्लोक 2 (shiva.kotirudra.18.2)
ज्योतिर्लिङ्गं चतुर्थं च कृपया वद वित्तम । ओंङ्कारे परमेशस्य सर्वपातकहारिणः ॥ 18.2 ॥
jyotirliṅgaṁ caturthaṁ ca kṛpayā vada vittama oṁṅkāre parameśasya sarvapātakahāriṇaḥ
हे विद्वत्तम! कृपया अब उस चौथे ज्योतिर्लिंग के विषय में कहिए, जो ओंकार में स्थित परमेश्वर का रूप है और समस्त पापों का नाशक है।
श्लोक 3 (shiva.kotirudra.18.3)
सूत उवाच । ओंङ्कारे परमेशाख्यं लिङ्गमासीद्यथा द्विजाः । तथा वक्ष्यामि वः प्रीत्या श्रूयतां परमर्षयः ॥ 18.3 ॥
sūta uvāca oṁṅkāre parameśākhyaṁ liṅgamāsīdyathā dvijāḥ tathā vakṣyāmi vaḥ prītyā śrūyatāṁ paramarṣayaḥ
सूत जी ने कहा — हे द्विजो! ओंकार में परमेश्वर नामक लिंग जिस प्रकार प्रकट हुआ, वह मैं प्रीतिपूर्वक कहूँगा; हे परम ऋषियो! सुनिए।
श्लोक 4 (shiva.kotirudra.18.4)
कस्मिंश्चित्समये चात्र नारदो भगवान्मुनिः । गोकर्णाख्यं शिवं गत्वा सिषेवे परभक्तिमान् ॥ 18.4 ॥
kasmiṁścitsamaye cātra nārado bhagavānmuniḥ gokarṇākhyaṁ śivaṁ gatvā siṣeve parabhaktimān
किसी समय भगवान् मुनि नारद, परम भक्तिमान् होकर, गोकर्ण नामक शिव-क्षेत्र में जाकर उनकी सेवा करने लगे।
श्लोक 5 (shiva.kotirudra.18.5)
ततः स आगतो विन्ध्यं नगेशं मुनिसत्तमः । तत्रैव पूजितस्तेन बहुमानपुरःसरम् ॥ 18.5 ॥
tataḥ sa āgato vindhyaṁ nageśaṁ munisattamaḥ tatraiva pūjitastena bahumānapuraḥsaram
तत्पश्चात् वे मुनिश्रेष्ठ पर्वतराज विन्ध्य के पास आये; वहाँ विन्ध्य ने अत्यन्त सम्मानपूर्वक उनकी पूजा की।
श्लोक 6 (shiva.kotirudra.18.6)
मयि सर्वं विद्यते च न न्यूनं हि कदाचन । इति भावं समास्थाय संस्थितो नारदाग्रतः ॥ 18.6 ॥
mayi sarvaṁ vidyate ca na nyūnaṁ hi kadācana iti bhāvaṁ samāsthāya saṁsthito nāradāgrataḥ
'मुझमें सब कुछ है, मुझमें कभी कोई कमी नहीं है' — ऐसा भाव मन में रखकर वह नारद जी के समक्ष खड़ा हुआ।
श्लोक 7 (shiva.kotirudra.18.7)
तन्मानं तत्तदा श्रुत्वा नारदो मानहा ततः । निःश्वस्य संस्थितस्तत्र श्रुत्वा विन्ध्योऽब्रवीदिदम् ॥ 18.7 ॥
tanmānaṁ tattadā śrutvā nārado mānahā tataḥ niḥśvasya saṁsthitastatra śrutvā vindhyo’bravīdidam
उसके उस अभिमान को जानकर, अभिमान का नाश करने वाले नारद जी उस समय एक दीर्घ श्वास लेकर वहीं खड़े हो गये; उस श्वास को सुनकर विन्ध्य ने यह कहा।
श्लोक 8 (shiva.kotirudra.18.8)
विन्ध्य उवाच । किं न्यूनं च त्वया दृष्टं मयि निः श्वासकारणम् । तच्छ्रुत्वा नारदो वाक्यमब्रवीत्स महामुनिः ॥ 18.8 ॥
vindhya uvāca kiṁ nyūnaṁ ca tvayā dṛṣṭaṁ mayi niḥ śvāsakāraṇam tacchrutvā nārado vākyamabravītsa mahāmuniḥ
विन्ध्य ने कहा — आपने मुझमें ऐसी कौन-सी कमी देखी, जो आपके इस दीर्घ श्वास का कारण बनी? यह सुनकर उन महामुनि नारद जी ने यह वचन कहा।
श्लोक 9 (shiva.kotirudra.18.9)
नारद उवाच । विद्यते त्वयि सर्वं हि मेरुरुच्चतरः पुनः । देवेष्वपि विभागोऽस्य न तवास्ति कदाचन ॥ 18.9 ॥
nārada uvāca vidyate tvayi sarvaṁ hi meruruccataraḥ punaḥ deveṣvapi vibhāgo’sya na tavāsti kadācana
नारद जी ने कहा — तुझमें सब कुछ तो है, किन्तु मेरु पर्वत तुझसे भी अधिक ऊँचा है; देवताओं में भी उसका जो सम्मान है, वह तुझे कभी प्राप्त नहीं है।
श्लोक 10 (shiva.kotirudra.18.10)
सूत उवाच । इत्युक्त्वा नारदस्तस्माज्जगाम च यथागतम् । विन्ध्यश्च परितप्तो वै धिग्वै मे जीवितादिकम् ॥ 18.10 ॥
sūta uvāca ityuktvā nāradastasmājjagāma ca yathāgatam vindhyaśca paritapto vai dhigvai me jīvitādikam
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर नारद जी वहाँ से जैसे आये थे वैसे ही चले गये; विन्ध्य अत्यन्त संतप्त हो गया — 'धिक्कार है मेरे इस जीवन आदि को!'
श्लोक 11 (shiva.kotirudra.18.11)
विश्वेश्वरं तथा शम्भुमाराध्य च तपाम्यहम् । इति निश्चित्य मनसा शङ्करं शरणं गतः ॥ 18.11 ॥
viśveśvaraṁ tathā śambhumārādhya ca tapāmyaham iti niścitya manasā śaṅkaraṁ śaraṇaṁ gataḥ
'मैं विश्वेश्वर शम्भु की आराधना करके तप करूँगा' — ऐसा मन में निश्चय करके वह शंकर की शरण में गया।
श्लोक 12 (shiva.kotirudra.18.12)
जगाम तत्र सुप्रीत्या ह्योङ्कारो यत्र वै स्वयम् । चकार च पुनस्तत्र शिवमूर्तिं च पार्थिवीम् ॥ 18.12 ॥
jagāma tatra suprītyā hyoṅkāro yatra vai svayam cakāra ca punastatra śivamūrtiṁ ca pārthivīm
वह अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उसी स्थान पर गया, जहाँ स्वयं ओंकार (शिव) विराजमान थे, और वहाँ पुनः मिट्टी की शिवमूर्ति बनायी।
श्लोक 13 (shiva.kotirudra.18.13)
आराध्य च तदा शम्भुं षण्मासं स निरन्तरम् । न चचाल तपःस्थानाच्छिवध्यानपरायणः ॥ 18.13 ॥
ārādhya ca tadā śambhuṁ ṣaṇmāsaṁ sa nirantaram na cacāla tapaḥsthānācchivadhyānaparāyaṇaḥ
तब वह शिव-ध्यान में तत्पर होकर, निरन्तर छः मास तक शम्भु की आराधना करता रहा, और अपने तपःस्थान से तनिक भी विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 14 (shiva.kotirudra.18.14)
एवं विन्ध्यतपो दृष्ट्वा प्रसन्नः पार्वतीपतिः । स्वरूपं दर्शयामास दुर्लभं योगिनामपि ॥ 18.14 ॥
evaṁ vindhyatapo dṛṣṭvā prasannaḥ pārvatīpatiḥ svarūpaṁ darśayāmāsa durlabhaṁ yogināmapi
विन्ध्य के इस तप को देखकर पार्वतीपति प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे अपना वह स्वरूप दिखाया, जो योगियों को भी दुर्लभ है।
श्लोक 15 (shiva.kotirudra.18.15)
प्रसन्नः स तदोवाच ब्रूहि त्वं मनसेप्सितम् । तपसा ते प्रसन्नोऽस्मि भक्तानामीप्सितप्रदः ॥ 18.15 ॥
prasannaḥ sa tadovāca brūhi tvaṁ manasepsitam tapasā te prasanno’smi bhaktānāmīpsitapradaḥ
तब प्रसन्न होकर उन्होंने कहा — तू अपने मन की इच्छा कह; तेरे तप से मैं प्रसन्न हूँ, और मैं भक्तों की इच्छित वस्तु प्रदान करने वाला हूँ।
श्लोक 16 (shiva.kotirudra.18.16)
विन्ध्य उवाच । यदि प्रसन्नो देवेश बुद्धिं देहि यथेप्सिताम् । स्वकार्यसाधिनीं शम्भो त्वं सदा भक्तवत्सलः ॥ 18.16 ॥
vindhya uvāca yadi prasanno deveśa buddhiṁ dehi yathepsitām svakāryasādhinīṁ śambho tvaṁ sadā bhaktavatsalaḥ
विन्ध्य ने कहा — हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे अपने अभीष्ट कार्य को सिद्ध करने वाली बुद्धि प्रदान कीजिए; हे शम्भो! आप सदा भक्तों पर वत्सल रहते हैं।
श्लोक 17 (shiva.kotirudra.18.17)
सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा भगवान् शम्भुश्चिचेत हृदये चिरम् । परोपतापदं विन्ध्यो वरमिच्छति मूढधीः ॥ 18.17 ॥
sūta uvāca tacchrutvā bhagavān śambhuściceta hṛdaye ciram paropatāpadaṁ vindhyo varamicchati mūḍhadhīḥ
सूत जी ने कहा — यह सुनकर भगवान् शम्भु ने अपने हृदय में देर तक विचार किया — 'यह मूढ़बुद्धि विन्ध्य दूसरों को कष्ट देने वाला वर माँग रहा है।'
श्लोक 18 (shiva.kotirudra.18.18)
किं करोमि यदेतस्मै वरदानं भवेच्छुभम् । मद्दत्तं परदुःखाय वरदानं यथा न हि ॥ 18.18 ॥
kiṁ karomi yadetasmai varadānaṁ bhavecchubham maddattaṁ paraduḥkhāya varadānaṁ yathā na hi
मैं क्या करूँ, जिससे इसे दिया गया वरदान शुभ हो — कि मेरे द्वारा दिया गया वर दूसरों के दुःख का कारण न बने।
श्लोक 19 (shiva.kotirudra.18.19)
सूत उवाच । तथापि दत्तवान् शम्भुस्तस्मै तद्वरमुत्तमम् । विन्ध्य पर्वतराज त्वं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ 18.19 ॥
sūta uvāca tathāpi dattavān śambhustasmai tadvaramuttamam vindhya parvatarāja tvaṁ yathecchasi tathā kuru
सूत जी ने कहा — फिर भी शम्भु ने उसे वह उत्तम वर दे दिया — 'हे पर्वतराज विन्ध्य! तू जैसा चाहे वैसा कर।'
श्लोक 20 (shiva.kotirudra.18.20)
एवं च समये देवा ऋषयश्चामलाशयाः । सम्पूज्य शङ्करं तत्र स्थातव्यमिति चाब्रुवन् ॥ 18.20 ॥
evaṁ ca samaye devā ṛṣayaścāmalāśayāḥ sampūjya śaṅkaraṁ tatra sthātavyamiti cābruvan
इसी समय शुद्ध हृदय वाले देवताओं और ऋषियों ने वहाँ शंकर की पूजा करके यह प्रार्थना की कि आप यहीं (इसी लिंग-रूप में) निवास करें।
श्लोक 21 (shiva.kotirudra.18.21)
तच्छ्रुत्वा देववचनं प्रसन्नः परमेश्वरः । तथैव कृतवान्प्रीत्या लोकानां सुखहेतवे ॥ 18.21 ॥
tacchrutvā devavacanaṁ prasannaḥ parameśvaraḥ tathaiva kṛtavānprītyā lokānāṁ sukhahetave
देवताओं के उस वचन को सुनकर प्रसन्न परमेश्वर ने लोगों के सुख के लिए प्रीतिपूर्वक वैसा ही किया।
श्लोक 22 (shiva.kotirudra.18.22)
ओङ्कारं चैव यल्लिङ्गमेकं तच्च द्विधा गतम् । प्रणवे चैव ओङ्कारनामासीत्स सदाशिवः ॥ 18.22 ॥
oṅkāraṁ caiva yalliṅgamekaṁ tacca dvidhā gatam praṇave caiva oṅkāranāmāsītsa sadāśivaḥ
जो एक ही लिंग था, वह ओंकार-रूप में दो भागों में विभाजित हो गया; प्रणव (ओंकार) में जो रूप था, वह 'ओंकारेश्वर' नाम से सदाशिव कहलाया।
श्लोक 23 (shiva.kotirudra.18.23)
पार्थिवे चैव यज्जातं तदासीत्परमेश्वरः । भक्ताभीष्टप्रदौ चोभौ भुक्तिमुक्तिप्रदौ द्विजाः ॥ 18.23 ॥
pārthive caiva yajjātaṁ tadāsītparameśvaraḥ bhaktābhīṣṭapradau cobhau bhuktimuktipradau dvijāḥ
और जो मिट्टी की मूर्ति में प्रकट हुआ, वह परमेश्वर (अमरेश्वर) कहलाया; हे द्विजो! दोनों ही रूप भक्तों की इच्छा पूर्ण करने वाले और भोग-मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।
श्लोक 24 (shiva.kotirudra.18.24)
तत्पूजां च तदा चक्रुर्देवाश्च ऋषयस्तथा । प्रापुर्वराननेकांश्च सन्तोष्य वृषभध्वजम् ॥ 18.24 ॥
tatpūjāṁ ca tadā cakrurdevāśca ṛṣayastathā prāpurvarānanekāṁśca santoṣya vṛṣabhadhvajam
तब देवताओं और ऋषियों ने उन दोनों की पूजा की, और वृषभध्वज (शिव) को संतुष्ट करके अनेक वर प्राप्त किये।
श्लोक 25 (shiva.kotirudra.18.25)
स्वस्वस्थानं ययुर्देवा विन्ध्योऽपि मुदितोऽधिकम् । कार्यं साधितवान्स्वीयं परितापं जहौ द्विजाः ॥ 18.25 ॥
svasvasthānaṁ yayurdevā vindhyo’pi mudito’dhikam kāryaṁ sādhitavānsvīyaṁ paritāpaṁ jahau dvijāḥ
देवता अपने-अपने स्थानों को चले गये; हे द्विजो! विन्ध्य भी अत्यन्त प्रसन्न होकर, अपना कार्य सिद्ध करके, अपने संताप को त्याग बैठा।
श्लोक 26 (shiva.kotirudra.18.26)
य एवं पूजयेच्छम्भुं मातृगर्भं वसेन्न हि । यदभीष्टं फलं तच्च प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥ 18.26 ॥
ya evaṁ pūjayecchambhuṁ mātṛgarbhaṁ vasenna hi yadabhīṣṭaṁ phalaṁ tacca prāpnuyānnātra saṁśayaḥ
जो कोई इस प्रकार शम्भु की पूजा करता है, वह पुनः माता के गर्भ में निवास नहीं करता; इसमें कोई संदेह नहीं कि उसे अपनी इच्छानुसार फल प्राप्त होता है।
श्लोक 27 (shiva.kotirudra.18.27)
सूत उवाच । एतत्ते सर्वमाख्यातमोङ्कारप्रभवे फलम् । अतः परं प्रवक्ष्यामि केदारं लिङ्गमुत्तमम् ॥ 18.27 ॥
sūta uvāca etatte sarvamākhyātamoṅkāraprabhave phalam ataḥ paraṁ pravakṣyāmi kedāraṁ liṅgamuttamam
सूत जी ने कहा — यह सब मैंने ओंकार की उत्पत्ति का फल आपको बता दिया; अब इसके आगे मैं उत्तम केदार लिंग का वर्णन करूँगा।