कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 20
भीमासुर-कृत उपद्रव का वर्णन
श्लोक 1 (shiva.kotirudra.20.1)
सूत उवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं भैमशङ्करम् । यस्य श्रवणमात्रेण सर्वाभीष्टं लभेन्नरः ॥ 20.1 ॥
sūta uvāca ataḥ paraṁ pravakṣyāmi māhātmyaṁ bhaimaśaṅkaram yasya śravaṇamātreṇa sarvābhīṣṭaṁ labhennaraḥ
सूत जी ने कहा — अब इसके आगे मैं भीमशंकर की महिमा का वर्णन करूँगा, जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य समस्त अभीष्ट वस्तुओं को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 2 (shiva.kotirudra.20.2)
कामरूपाभिधे देशे शङ्करो लोककाम्यया । अवतीर्णः स्वयं साक्षात्कल्याणसुखभाजनम् ॥ 20.2 ॥
kāmarūpābhidhe deśe śaṅkaro lokakāmyayā avatīrṇaḥ svayaṁ sākṣātkalyāṇasukhabhājanam
कामरूप नामक देश में शंकर, लोगों के कल्याण की कामना से, कल्याण और सुख के आधार के रूप में स्वयं साक्षात् अवतीर्ण हुए।
श्लोक 3 (shiva.kotirudra.20.3)
यदर्थमवतीर्णोऽसौ शङ्करो लोकशङ्करः । शृणुतादरतस्तच्च कथयामि मुनीश्वराः ॥ 20.3 ॥
yadarthamavatīrṇo’sau śaṅkaro lokaśaṅkaraḥ śṛṇutādaratastacca kathayāmi munīśvarāḥ
जिस कारण से लोगों के कल्याणकारी शंकर वहाँ अवतीर्ण हुए, हे मुनीश्वरो! उसे मैं कहता हूँ, आदरपूर्वक सुनिए।
श्लोक 4 (shiva.kotirudra.20.4)
भीमो नाम महोवीर्यो राक्षसोऽभूत्पुरा द्विजाः । दुःखदः सर्वभूतानां धर्मध्वंसकरः सदा ॥ 20.4 ॥
bhīmo nāma mahovīryo rākṣaso’bhūtpurā dvijāḥ duḥkhadaḥ sarvabhūtānāṁ dharmadhvaṁsakaraḥ sadā
हे द्विजो! प्राचीन काल में भीम नामक अत्यन्त बलशाली एक राक्षस था, जो समस्त प्राणियों को दुःख देने वाला और सदा धर्म का नाश करने वाला था।
श्लोक 5 (shiva.kotirudra.20.5)
कुम्भकर्णात्समुत्पन्नः कर्कट्यां सुमहाबलः । सह्ये च पर्वते सोऽपि मात्रावासं चकार ह ॥ 20.5 ॥
kumbhakarṇātsamutpannaḥ karkaṭyāṁ sumahābalaḥ sahye ca parvate so’pi mātrāvāsaṁ cakāra ha
वह अत्यन्त बलशाली राक्षस कुम्भकर्ण से कर्कटी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था, और सह्य पर्वत पर वह अपनी माता के साथ निवास करता था।
श्लोक 6 (shiva.kotirudra.20.6)
कुम्भकर्णे च रामेण हते लोकभयङ्करे । राक्षसी पुत्रसंयुक्ता सह्येऽतिष्ठत्स्वयं तदा ॥ 20.6 ॥
kumbhakarṇe ca rāmeṇa hate lokabhayaṅkare rākṣasī putrasaṁyuktā sahye’tiṣṭhatsvayaṁ tadā
जब लोकों के लिए भयंकर वह कुम्भकर्ण राम द्वारा मारा गया, तब वह राक्षसी अपने पुत्र के साथ सह्य पर्वत पर ही रहने लगी।
श्लोक 7 (shiva.kotirudra.20.7)
स बाल एकदा भीमः कर्कटीं मातरं द्विजाः । पप्रच्छ च खलो लोकदुःखदो भीमविक्रमः ॥ 20.7 ॥
sa bāla ekadā bhīmaḥ karkaṭīṁ mātaraṁ dvijāḥ papraccha ca khalo lokaduḥkhado bhīmavikramaḥ
हे द्विजो! एक बार बालक भीम ने, जो दुष्ट स्वभाव का, लोगों को दुःख देने वाला और भीषण पराक्रमी था, अपनी माता कर्कटी से पूछा।
श्लोक 8 (shiva.kotirudra.20.8)
भीम उवाच । मातर्मे कः पिता कुत्र कथं वैकाकिनी स्थिता । ज्ञातुमिच्छामि तत्सर्वं यथार्थं त्वं वदाधुना ॥ 20.8 ॥
bhīma uvāca mātarme kaḥ pitā kutra kathaṁ vaikākinī sthitā jñātumicchāmi tatsarvaṁ yathārthaṁ tvaṁ vadādhunā
भीम ने कहा — हे माता! मेरे पिता कौन हैं, कहाँ हैं, और तुम अकेली क्यों रहती हो? यह सब मैं जानना चाहता हूँ; अब तुम इसे यथार्थ रूप से बताओ।
श्लोक 9 (shiva.kotirudra.20.9)
सूत उवाच । एवं पृष्टा तदा तेन पुत्रेण राक्षसी च सा । उवाच पुत्रं सा दुष्टा श्रूयतां कथयाम्यहम् ॥ 20.9 ॥
sūta uvāca evaṁ pṛṣṭā tadā tena putreṇa rākṣasī ca sā uvāca putraṁ sā duṣṭā śrūyatāṁ kathayāmyaham
सूत जी ने कहा — अपने पुत्र द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर उस दुष्टा राक्षसी ने अपने पुत्र से कहा — सुनो, मैं कहती हूँ।
श्लोक 10 (shiva.kotirudra.20.10)
कर्कट्युवाच । पिता ते कुम्भकर्णश्च रावणानुज एव च । रामेण मारितः सोऽयं भ्रात्रा सह महाबलः ॥ 20.10 ॥
karkaṭyuvāca pitā te kumbhakarṇaśca rāvaṇānuja eva ca rāmeṇa māritaḥ so’yaṁ bhrātrā saha mahābalaḥ
कर्कटी ने कहा — तेरे पिता कुम्भकर्ण, रावण के अनुज थे; वे महाबली अपने भाई के साथ राम द्वारा मारे गये।
श्लोक 11 (shiva.kotirudra.20.11)
अत्रागतः कदाचिद्वै कुम्भकर्णः स राक्षसः । मद्भोगं कृतवांस्तात प्रसह्य बलवान्पुरा ॥ 20.11 ॥
atrāgataḥ kadācidvai kumbhakarṇaḥ sa rākṣasaḥ madbhogaṁ kṛtavāṁstāta prasahya balavānpurā
हे पुत्र! एक बार वह राक्षस कुम्भकर्ण यहाँ आया था, और उस बलवान ने बलपूर्वक मुझे भोग्या बनाया था।
श्लोक 12 (shiva.kotirudra.20.12)
लङ्कां स गतवान् मां च त्यक्त्वात्रैव महाबलः । मया न दृष्टा सा लङ्का ह्यत्रैव निवसाम्यहम् ॥ 20.12 ॥
laṅkāṁ sa gatavān māṁ ca tyaktvātraiva mahābalaḥ mayā na dṛṣṭā sā laṅkā hyatraiva nivasāmyaham
वह महाबली मुझे यहीं छोड़कर लंका को चला गया; मैंने वह लंका कभी नहीं देखी, मैं तो यहीं निवास करती हूँ।
श्लोक 13 (shiva.kotirudra.20.13)
पिता मे कर्कटो नाम माता मे पुष्कसी मता । भर्ता मम विराधो हि रामेण निहतः पुरा ॥ 20.13 ॥
pitā me karkaṭo nāma mātā me puṣkasī matā bhartā mama virādho hi rāmeṇa nihataḥ purā
मेरे पिता का नाम कर्कट था, मेरी माता पुष्कसी कही जाती है; मेरे पति विराध थे, जो पहले राम द्वारा मारे गये।
श्लोक 14 (shiva.kotirudra.20.14)
पित्रोः पार्श्वे स्थिता चाहं निहते स्वामिनि प्रिये । पितरौ मे मृतौ चात्र ऋषिणा भस्मसात्कृतौ ॥ 20.14 ॥
pitroḥ pārśve sthitā cāhaṁ nihate svāmini priye pitarau me mṛtau cātra ṛṣiṇā bhasmasātkṛtau
प्रिय स्वामी के मारे जाने पर मैं अपने माता-पिता के पास रहने लगी; किन्तु यहीं मेरे माता-पिता भी एक ऋषि द्वारा भस्म कर दिये गये।
श्लोक 15 (shiva.kotirudra.20.15)
भक्षणार्थं गतौ तत्र क्रुद्धेन सुमहात्मना । सुतीक्ष्णेन सुतपसागस्त्यशिष्येण वै तदा ॥ 20.15 ॥
bhakṣaṇārthaṁ gatau tatra kruddhena sumahātmanā sutīkṣṇena sutapasāgastyaśiṣyeṇa vai tadā
वे दोनों किसी को भक्षण करने के लिए वहाँ गये थे, तब अगस्त्य के शिष्य, अत्यन्त तपस्वी और क्रुद्ध हुए महात्मा सुतीक्ष्ण ने उन्हें भस्म कर दिया।
श्लोक 16 (shiva.kotirudra.20.16)
साहमेकाकिनी जाता दुःखिता पर्वते पुरा । निवसामि स्म दुःखार्ता निरालम्बा निराश्रया ॥ 20.16 ॥
sāhamekākinī jātā duḥkhitā parvate purā nivasāmi sma duḥkhārtā nirālambā nirāśrayā
तब से मैं इस पर्वत पर अकेली, दुःखी, निराश्रय और निराधार होकर दुःखपीड़ित रहती आ रही हूँ।
श्लोक 17 (shiva.kotirudra.20.17)
एतस्मिन्समये ह्यत्र राक्षसो रावणानुजः । आगत्य कृतवान् सङ्गं मां विहाय गतो हि सः ॥ 20.17 ॥
etasminsamaye hyatra rākṣaso rāvaṇānujaḥ āgatya kṛtavān saṅgaṁ māṁ vihāya gato hi saḥ
इसी बीच रावण का वह अनुज राक्षस यहाँ आया, उसने मुझसे संग किया, और फिर मुझे छोड़कर चला गया।
श्लोक 18 (shiva.kotirudra.20.18)
ततस्त्वं च समुत्पन्नो महाबलपराक्रमः । अवलम्ब्य पुनस्त्वां च कालक्षेपं करोम्यहम् ॥ 20.18 ॥
tatastvaṁ ca samutpanno mahābalaparākramaḥ avalambya punastvāṁ ca kālakṣepaṁ karomyaham
उसी के बाद तू, महान बल-पराक्रम से युक्त, उत्पन्न हुआ; तब से तेरा ही सहारा लेकर मैं अपना समय बिता रही हूँ।
श्लोक 19 (shiva.kotirudra.20.19)
सूत उवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्या भीमो भीमपराक्रमः । क्रुद्धश्च चिन्तयामास किं करोमि हरिं प्रति ॥ 20.19 ॥
sūta uvāca iti śrutvā vacastasyā bhīmo bhīmaparākramaḥ kruddhaśca cintayāmāsa kiṁ karomi hariṁ prati
सूत जी ने कहा — उसके इस वचन को सुनकर भीषण पराक्रमी भीम क्रोधित होकर विचार करने लगा — मैं हरि के प्रति क्या करूँ?
श्लोक 20 (shiva.kotirudra.20.20)
पितानेन हतो मे हि तथा मातामहा अपि । विराधश्च हतोऽनेन दुःखं बहुतरं कृतम् ॥ 20.20 ॥
pitānena hato me hi tathā mātāmahā api virādhaśca hato’nena duḥkhaṁ bahutaraṁ kṛtam
इसी (राम) ने मेरे पिता को मारा, और मेरे नाना-नानी को भी; इसी ने विराध को मारकर मुझे अत्यन्त दुःख पहुँचाया है।
श्लोक 21 (shiva.kotirudra.20.21)
तत्पुत्रोऽहं भवेयं चेद्धरिं तं पीडयाम्यहम् । इति कृत्वा मतिं भीमस्तपस्तप्तुं महद्ययौ ॥ 20.21 ॥
tatputro’haṁ bhaveyaṁ ceddhariṁ taṁ pīḍayāmyaham iti kṛtvā matiṁ bhīmastapastaptuṁ mahadyayau
यदि मैं सचमुच उसी का पुत्र हूँ, तो मैं उस हरि को पीड़ित करूँगा — ऐसा निश्चय करके भीम महान तप करने के लिए चला गया।
श्लोक 22 (shiva.kotirudra.20.22)
ब्रह्माणं च समुद्दिश्य वर्षाणां च सहस्रकम् । मनसा ध्यानमाश्रित्य तपश्चक्रे महत्तदा ॥ 20.22 ॥
brahmāṇaṁ ca samuddiśya varṣāṇāṁ ca sahasrakam manasā dhyānamāśritya tapaścakre mahattadā
ब्रह्मा को लक्ष्य करके, एक सहस्र वर्षों तक, मन से ध्यान का आश्रय लेकर, उसने तब महान तप किया।
श्लोक 23 (shiva.kotirudra.20.23)
ऊर्ध्वबाहुश्चैकपादः सूर्ये दृष्टिं दधत्पुरा । संस्थितः स बभूवाथ भीमो राक्षसपुत्रकः ॥ 20.23 ॥
ūrdhvabāhuścaikapādaḥ sūrye dṛṣṭiṁ dadhatpurā saṁsthitaḥ sa babhūvātha bhīmo rākṣasaputrakaḥ
भुजाएँ ऊपर उठाये, एक पैर पर खड़ा होकर, सूर्य पर दृष्टि टिकाये हुए, वह राक्षस-पुत्र भीम पहले वैसे ही स्थिर रहा।
श्लोक 24 (shiva.kotirudra.20.24)
शिरसस्तस्य सञ्जातं तेजः परमदारुणम् । तेन दग्धास्तदा देवा ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ 20.24 ॥
śirasastasya sañjātaṁ tejaḥ paramadāruṇam tena dagdhāstadā devā brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ
उसके सिर से एक अत्यन्त भयंकर तेज उत्पन्न हुआ; उससे जलते हुए देवता तब ब्रह्मा की शरण में गये।
श्लोक 25 (shiva.kotirudra.20.25)
प्रणम्य वेधसं भक्त्या तुष्टुवुर्विविधैः स्तवैः । दुःखं निवेदयाञ्चक्रुर्ब्रह्मणे ते सवासवाः ॥ 20.25 ॥
praṇamya vedhasaṁ bhaktyā tuṣṭuvurvividhaiḥ stavaiḥ duḥkhaṁ nivedayāñcakrurbrahmaṇe te savāsavāḥ
विधाता को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके, नाना प्रकार की स्तुतियों से उनकी स्तुति करके, इन्द्र सहित उन देवताओं ने ब्रह्मा से अपना दुःख निवेदन किया।
श्लोक 26 (shiva.kotirudra.20.26)
देवा ऊचुः । ब्रह्मन्वै रक्षसस्तेजो लोकान्पीडितुमुद्यतम् । यत्प्रार्थ्यते च दुष्टेन तत्त्वं देहि वरं विधे ॥ 20.26 ॥
devā ūcuḥ brahmanvai rakṣasastejo lokānpīḍitumudyatam yatprārthyate ca duṣṭena tattvaṁ dehi varaṁ vidhe
देवताओं ने कहा — हे ब्रह्मन्! इस राक्षस का तेज संसार को पीड़ित करने के लिए उद्यत हो गया है; हे विधे! इस दुष्ट के द्वारा जो वर माँगा जा रहा है, वही आप उसे दे दीजिए।
श्लोक 27 (shiva.kotirudra.20.27)
नो चेदद्य वयं दग्धास्तीव्रतत्तेजसा पुनः । यास्यामः सङ्क्षयं सर्वे तस्मात्तं देहि प्रार्थितम् ॥ 20.27 ॥
no cedadya vayaṁ dagdhāstīvratattejasā punaḥ yāsyāmaḥ saṅkṣayaṁ sarve tasmāttaṁ dehi prārthitam
अन्यथा आज हम सब उसके उस तीव्र तेज से पुनः जलकर सम्पूर्ण विनाश को प्राप्त हो जायेंगे; इसलिए उसने जो माँगा है, वह उसे दे दीजिए।
श्लोक 28 (shiva.kotirudra.20.28)
सूत उवाच । इति तेषां वचः श्रुत्वा ब्रह्मा लोकपितामहः । जगाम च वरं दातुं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ 20.28 ॥
sūta uvāca iti teṣāṁ vacaḥ śrutvā brahmā lokapitāmahaḥ jagāma ca varaṁ dātuṁ vacanaṁ cedamabravīt
सूत जी ने कहा — उनके इस वचन को सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा वर देने के लिए वहाँ गये और यह वचन कहा।
श्लोक 29 (shiva.kotirudra.20.29)
ब्रह्मोवाच । प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूहि यत्ते मनसि वर्तते । इति श्रुत्वा विधेर्वाक्यमब्रवीद्राक्षसो हि सः ॥ 20.29 ॥
brahmovāca prasanno’smi varaṁ brūhi yatte manasi vartate iti śrutvā vidhervākyamabravīdrākṣaso hi saḥ
ब्रह्मा ने कहा — मैं प्रसन्न हूँ, जो कुछ तेरे मन में है, वह वर माँग। विधाता का यह वचन सुनकर उस राक्षस ने यह कहा।
श्लोक 30 (shiva.kotirudra.20.30)
भीम उवाच । यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरस्त्वया । अतुलं च बलं मेऽद्य देहि त्वं कमलासन ॥ 20.30 ॥
bhīma uvāca yadi prasanno deveśa yadi deyo varastvayā atulaṁ ca balaṁ me’dya dehi tvaṁ kamalāsana
भीम ने कहा — हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं, यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो हे कमलासन! आज मुझे अतुलनीय बल प्रदान कीजिए।
श्लोक 31 (shiva.kotirudra.20.31)
सूत उवाच । इत्युक्त्वा तु नमश्चक्रे ब्रह्मणे स हि राक्षसः । ब्रह्मा चापि तदा तस्मै वरं दत्त्वा गृहं ययौ ॥ 20.31 ॥
sūta uvāca ityuktvā tu namaścakre brahmaṇe sa hi rākṣasaḥ brahmā cāpi tadā tasmai varaṁ dattvā gṛhaṁ yayau
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर उस राक्षस ने ब्रह्मा को प्रणाम किया; ब्रह्मा ने भी उसे वह वर देकर अपने लोक को प्रस्थान किया।
श्लोक 32 (shiva.kotirudra.20.32)
राक्षसो गृहमागत्य ब्रह्माप्तातिबलस्तदा । मातरं प्रणिपत्याशु स भीमः प्राह गर्ववान् ॥ 20.32 ॥
rākṣaso gṛhamāgatya brahmāptātibalastadā mātaraṁ praṇipatyāśu sa bhīmaḥ prāha garvavān
ब्रह्मा से अतुल बल प्राप्त कर वह राक्षस भीम अपने घर आया, और अपनी माँ को तुरन्त प्रणाम करके गर्वित होकर यह बोला।
श्लोक 33 (shiva.kotirudra.20.33)
भीम उवाच । पश्य मातर्बलं मेऽद्य करोमि प्रलयं महत् । देवानां शक्रमुख्यानां हरेर्वै तत्सहायिनः ॥ 20.33 ॥
bhīma uvāca paśya mātarbalaṁ me’dya karomi pralayaṁ mahat devānāṁ śakramukhyānāṁ harervai tatsahāyinaḥ
भीम ने कहा — हे माता! मेरा बल देखो; आज मैं इन्द्र आदि देवताओं का और उनके सहायक हरि का भी महान प्रलय कर दूँगा।
श्लोक 34 (shiva.kotirudra.20.34)
सूत उवाच । इत्युक्त्वा प्रथमं भीमो जिग्ये देवान्सवासवान् । स्थानान्निःसारयामास स्वात्स्वात्तान्भीमविक्रमः ॥ 20.34 ॥
sūta uvāca ityuktvā prathamaṁ bhīmo jigye devānsavāsavān sthānānniḥsārayāmāsa svātsvāttānbhīmavikramaḥ
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर उस भीषण पराक्रमी भीम ने पहले इन्द्र सहित देवताओं को जीत लिया और उन सबको उनके-उनके अपने स्थानों से निकाल दिया।
श्लोक 35 (shiva.kotirudra.20.35)
ततो जिग्ये हरिं युद्धे प्रार्थितं निर्जरैरपि । ततो जेतुं रसां दैत्यः प्रारम्भं कृतवान्मुदा ॥ 20.35 ॥
tato jigye hariṁ yuddhe prārthitaṁ nirjarairapi tato jetuṁ rasāṁ daityaḥ prārambhaṁ kṛtavānmudā
तत्पश्चात् उसने युद्ध में हरि को भी जीत लिया, जिनकी सहायता देवताओं ने माँगी थी; उसके बाद उस दैत्य ने प्रसन्नतापूर्वक समस्त पृथ्वी को जीतने का आरम्भ किया।
श्लोक 36 (shiva.kotirudra.20.36)
पुरा सुदक्षिणं तत्र कामरूपेश्वरं प्रभुम् । जेतुं गतस्ततस्तेन युद्धमासीद्भयङ्करम् ॥ 20.36 ॥
purā sudakṣiṇaṁ tatra kāmarūpeśvaraṁ prabhum jetuṁ gatastatastena yuddhamāsīdbhayaṅkaram
पहले वह वहाँ कामरूप के स्वामी राजा सुदक्षिण को जीतने के लिए गया, और उसके साथ उसका भयंकर युद्ध हुआ।
श्लोक 37 (shiva.kotirudra.20.37)
भीमोऽथ तं महाराजं प्रभावाद् ब्रह्मणोऽसुरः । जिग्ये वरप्रभावेण महावीरं शिवाश्रयम् ॥ 20.37 ॥
bhīmo’tha taṁ mahārājaṁ prabhāvād brahmaṇo’suraḥ jigye varaprabhāveṇa mahāvīraṁ śivāśrayam
तब उस असुर भीम ने ब्रह्मा के प्रभाव से, वर के प्रभाव से, शिव के आश्रित उस महावीर महाराज को जीत लिया।
श्लोक 38 (shiva.kotirudra.20.38)
स हि जित्वा ततस्तं च कामरूपेश्वरं प्रभुम् । बबन्ध ताडयामास भीमो भीमपराक्रमः ॥ 20.38 ॥
sa hi jitvā tatastaṁ ca kāmarūpeśvaraṁ prabhum babandha tāḍayāmāsa bhīmo bhīmaparākramaḥ
उस कामरूप के स्वामी को जीतकर, उस भीषण पराक्रमी भीम ने उसे बाँध दिया और उसे प्रताड़ित किया।
श्लोक 39 (shiva.kotirudra.20.39)
गृहीतं तस्य सर्वस्वं राज्यं सोपस्करं द्विजाः । तेन भीमेन दुष्टेन शिवदासस्य भूपतेः ॥ 20.39 ॥
gṛhītaṁ tasya sarvasvaṁ rājyaṁ sopaskaraṁ dvijāḥ tena bhīmena duṣṭena śivadāsasya bhūpateḥ
हे द्विजो! उस दुष्ट भीम ने शिवदास (शिव के भक्त) उस राजा का समस्त धन-सम्पत्ति और साधन-सामग्री सहित राज्य छीन लिया।
श्लोक 40 (shiva.kotirudra.20.40)
राजा चापि सुधर्मिष्ठः प्रियधर्मो हरप्रियः । गृहीतो निगडैस्तेन ह्येकान्ते स्थापितश्च सः ॥ 20.40 ॥
rājā cāpi sudharmiṣṭhaḥ priyadharmo harapriyaḥ gṛhīto nigaḍaistena hyekānte sthāpitaśca saḥ
वह राजा भी, जो अत्यन्त धर्मपरायण, धर्म में प्रीति रखने वाला और हर का प्रिय भक्त था, उसके द्वारा बेड़ियों में बाँध दिया गया और एकान्त में डाल दिया गया।
श्लोक 41 (shiva.kotirudra.20.41)
तत्र तेन तदा कृत्वा पार्थिवीं मूर्तिमुत्तमाम् । भजनं च शिवस्यैव प्रारब्धं प्रियकाम्यया ॥ 20.41 ॥
tatra tena tadā kṛtvā pārthivīṁ mūrtimuttamām bhajanaṁ ca śivasyaiva prārabdhaṁ priyakāmyayā
वहाँ उसने एक उत्तम मिट्टी की मूर्ति बनाकर, प्रिय शिव को प्रसन्न करने की इच्छा से, उनकी भक्ति करना आरम्भ किया।
श्लोक 42 (shiva.kotirudra.20.42)
गङ्गायाः स्तवनं तेन बहुधा च तदा कृतम् । मानसं स्नानकर्मादि कृत्वा शङ्करपूजनम् ॥ 20.42 ॥
gaṅgāyāḥ stavanaṁ tena bahudhā ca tadā kṛtam mānasaṁ snānakarmādi kṛtvā śaṅkarapūjanam
उसने गंगा की भी अनेक प्रकार से स्तुति की; मानसिक स्नान आदि कर्म करके उसने शंकर की पूजा की।
श्लोक 43 (shiva.kotirudra.20.43)
पार्थिवेन विधानेन चकार नृपसत्तमः । तद्ध्यानं च यथा स्याद्वै कृत्वा च विधिपूर्वकम् ॥ 20.43 ॥
pārthivena vidhānena cakāra nṛpasattamaḥ taddhyānaṁ ca yathā syādvai kṛtvā ca vidhipūrvakam
उस श्रेष्ठ राजा ने पार्थिव विधि से पूजा की, और उनका ध्यान भी यथाविधि किया।
श्लोक 44 (shiva.kotirudra.20.44)
प्रणिपातैस्तथा स्तोत्रैर्मुद्रासनपुरःसरम् । कृत्वा हि सकलं तच्च स भेजे शङ्करं मुदा ॥ 20.44 ॥
praṇipātaistathā stotrairmudrāsanapuraḥsaram kṛtvā hi sakalaṁ tacca sa bheje śaṅkaraṁ mudā
प्रणाम, स्तोत्र, मुद्रा और आसन के साथ यह सब पूर्ण विधि करके वह प्रसन्नतापूर्वक शंकर की सेवा करने लगा।
श्लोक 45 (shiva.kotirudra.20.45)
पञ्चाक्षरमयीं विद्यां जजाप प्रणवान्विताम् । नान्यत्कार्यं स वै कर्तुं लब्धवानन्तरं तदा ॥ 20.45 ॥
pañcākṣaramayīṁ vidyāṁ jajāpa praṇavānvitām nānyatkāryaṁ sa vai kartuṁ labdhavānantaraṁ tadā
उसने प्रणव से युक्त पंचाक्षर मन्त्र का जप किया; उस समय उसे इसके अतिरिक्त और कुछ करने का अवसर भी नहीं मिलता था।
श्लोक 46 (shiva.kotirudra.20.46)
तत्पत्नी च तदा साध्वी दक्षिणानाम विश्रुता । विधानं पार्थिवं प्रीत्या चकार नृपवल्लभा ॥ 20.46 ॥
tatpatnī ca tadā sādhvī dakṣiṇānāma viśrutā vidhānaṁ pārthivaṁ prītyā cakāra nṛpavallabhā
उसकी पतिव्रता पत्नी, जो 'दक्षिणा' नाम से विख्यात थी, राजा की वह प्रिय पत्नी भी प्रीतिपूर्वक पार्थिव-पूजा-विधि करने लगी।
श्लोक 47 (shiva.kotirudra.20.47)
दम्पती त्वेकभावेन शङ्करं भक्तशङ्करम् । भेजाते तत्र तौ नित्यं शिवाराधनतत्परौ ॥ 20.47 ॥
dampatī tvekabhāvena śaṅkaraṁ bhaktaśaṅkaram bhejāte tatra tau nityaṁ śivārādhanatatparau
वे दोनों पति-पत्नी एक ही भाव से, भक्तों का कल्याण करने वाले शंकर की वहाँ नित्य सेवा करते रहे, सदा शिव-आराधना में तत्पर।
श्लोक 48 (shiva.kotirudra.20.48)
राक्षसो यज्ञकर्मादि वरदर्पविमोहितः । लोपयामास तत्सर्वं मह्यं वै दीयतामिति ॥ 20.48 ॥
rākṣaso yajñakarmādi varadarpavimohitaḥ lopayāmāsa tatsarvaṁ mahyaṁ vai dīyatāmiti
वर के मद से मोहित हुआ वह राक्षस यज्ञ-कर्म आदि समस्त धार्मिक कृत्यों को बन्द करवा देता था, यह कहते हुए कि 'यह सब मुझे ही अर्पित किया जाए'।
श्लोक 49 (shiva.kotirudra.20.49)
बहुसैन्यसमायुक्तो राक्षसानां दुरात्मनाम् । चकार वसुधां सर्वां स्ववशे चर्षिसत्तमाः ॥ 20.49 ॥
bahusainyasamāyukto rākṣasānāṁ durātmanām cakāra vasudhāṁ sarvāṁ svavaśe carṣisattamāḥ
हे ऋषिश्रेष्ठो! दुष्ट राक्षसों की विशाल सेना से युक्त होकर उसने सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया।
श्लोक 50 (shiva.kotirudra.20.50)
वेदधर्मं शास्त्रधर्मं स्मृतिधर्मं पुराणजम् । लोपयित्वा च तत्सर्वं बुभुजे स्वयमूर्जितः ॥ 20.50 ॥
vedadharmaṁ śāstradharmaṁ smṛtidharmaṁ purāṇajam lopayitvā ca tatsarvaṁ bubhuje svayamūrjitaḥ
वेद-धर्म, शास्त्र-धर्म, स्मृति-धर्म और पुराणों से उत्पन्न धर्म — इन सबको समाप्त करके वह बलवान स्वयं ही सबका भोग करने लगा।
श्लोक 51 (shiva.kotirudra.20.51)
देवाश्च पीडितास्तेन सशक्रा ऋषयस्तथा । अत्यन्तं दुःखमापन्ना लोकान्निःसारिता द्विजाः ॥ 20.51 ॥
devāśca pīḍitāstena saśakrā ṛṣayastathā atyantaṁ duḥkhamāpannā lokānniḥsāritā dvijāḥ
हे द्विजो! इन्द्र सहित देवता और ऋषि उससे पीड़ित होकर अत्यन्त दुःख को प्राप्त हुए और अपने-अपने लोकों से निकाल दिये गये।
श्लोक 52 (shiva.kotirudra.20.52)
ते ततो विकलाः सर्वे सवासवसुरर्षयः । ब्रह्मविष्णू पुरोधाय शङ्करं शरणं ययुः ॥ 20.52 ॥
te tato vikalāḥ sarve savāsavasurarṣayaḥ brahmaviṣṇū purodhāya śaṅkaraṁ śaraṇaṁ yayuḥ
तब वे सब व्याकुल हुए इन्द्र सहित देवता और ऋषि, ब्रह्मा और विष्णु को आगे करके शंकर की शरण में गये।
श्लोक 53 (shiva.kotirudra.20.53)
स्तुत्वा स्तोत्रैरनेकैश्च शङ्करं लोकशङ्करम् । प्रसन्नं कृतवन्तस्ते महाकोश्यास्तटे शुभे ॥ 20.53 ॥
stutvā stotrairanekaiśca śaṅkaraṁ lokaśaṅkaram prasannaṁ kṛtavantaste mahākośyāstaṭe śubhe
महाकोशी नदी के शुभ तट पर अनेक स्तोत्रों से लोक-कल्याणकारी शंकर की स्तुति करके उन्होंने उन्हें प्रसन्न किया।
श्लोक 54 (shiva.kotirudra.20.54)
कृत्वा च पार्थिवीं मूर्तिं पूजयित्वा विधानतः । तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैर्नमस्कारादिभिः क्रमात् ॥ 20.54 ॥
kṛtvā ca pārthivīṁ mūrtiṁ pūjayitvā vidhānataḥ tuṣṭuvurvividhaiḥ stotrairnamaskārādibhiḥ kramāt
एक मिट्टी की मूर्ति बनाकर, विधिपूर्वक उसकी पूजा करके, उन्होंने क्रमशः नाना प्रकार के स्तोत्रों और नमस्कारों से उनकी स्तुति की।
श्लोक 55 (shiva.kotirudra.20.55)
एवं स्तुतस्तदा शम्भुर्देवानां स्तवनादिभिः । सुप्रसन्नतरो भूत्वा तान्सुरानिदमब्रवीत् ॥ 20.55 ॥
evaṁ stutastadā śambhurdevānāṁ stavanādibhiḥ suprasannataro bhūtvā tānsurānidamabravīt
देवताओं की उस स्तुति आदि से इस प्रकार स्तुत हुए शम्भु अत्यन्त प्रसन्न होकर उन देवताओं से यह बोले।
श्लोक 56 (shiva.kotirudra.20.56)
शिव उवाच । हे हरे हे विधे देवा ऋषयश्चाखिला अहम् । प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूत किं कार्यं करवाणि वः ॥ 20.56 ॥
śiva uvāca he hare he vidhe devā ṛṣayaścākhilā aham prasanno’smi varaṁ brūta kiṁ kāryaṁ karavāṇi vaḥ
शिव ने कहा — हे हरि! हे विधाता! हे देवताओ और समस्त ऋषियो! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो — मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?
श्लोक 57 (shiva.kotirudra.20.57)
सूत उवाच । इत्युक्ते च तदा तेन शिवेन वचने द्विजाः । सुप्रणम्य करौ बध्वा देवा ऊचुः शिवं तदा ॥ 20.57 ॥
sūta uvāca ityukte ca tadā tena śivena vacane dvijāḥ supraṇamya karau badhvā devā ūcuḥ śivaṁ tadā
सूत जी ने कहा — हे द्विजो! शिव के ऐसा कहने पर देवताओं ने हाथ जोड़कर भलीभाँति प्रणाम करके शिव से यह कहा।
श्लोक 58 (shiva.kotirudra.20.58)
देवा ऊचुः । सर्वं जानासि देवेश सर्वेषां मनसि स्थितम् । अन्तर्यामी च सर्वस्य नाज्ञातं विद्यते तव ॥ 20.58 ॥
devā ūcuḥ sarvaṁ jānāsi deveśa sarveṣāṁ manasi sthitam antaryāmī ca sarvasya nājñātaṁ vidyate tava
देवताओं ने कहा — हे देवेश! आप सर्वज्ञ हैं, आप सबके मन में जो कुछ है, वह सब जानते हैं; आप सबके अन्तर्यामी हैं, आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है।
श्लोक 59 (shiva.kotirudra.20.59)
तथापि श्रूयतां नाथ स्वदुःखं ब्रूमहे वयम् । त्वदाज्ञया महादेव कृपादृष्ट्या विलोकय ॥ 20.59 ॥
tathāpi śrūyatāṁ nātha svaduḥkhaṁ brūmahe vayam tvadājñayā mahādeva kṛpādṛṣṭyā vilokaya
फिर भी, हे नाथ! सुनिए, हम अपना दुःख निवेदन करते हैं; हे महादेव! अपनी आज्ञा से हम पर कृपा-दृष्टि डालिए।
श्लोक 60 (shiva.kotirudra.20.60)
राक्षसः कर्कटीपुत्रः कुम्भकर्णोद्भवो बली । पीडयत्यनिशं देवान्ब्रह्मदत्तवरोर्जितः ॥ 20.60 ॥
rākṣasaḥ karkaṭīputraḥ kumbhakarṇodbhavo balī pīḍayatyaniśaṁ devānbrahmadattavarorjitaḥ
कर्कटी का पुत्र, कुम्भकर्ण से उत्पन्न, ब्रह्मा के दिये वर से बलशाली हुआ वह राक्षस देवताओं को निरन्तर पीड़ित करता है।
श्लोक 61 (shiva.kotirudra.20.61)
तमिमं जहि भीमाह्वं राक्षसं दुःखदायकम् । कृपां कुरु महेशान विलम्बं न कुरु प्रभो ॥ 20.61 ॥
tamimaṁ jahi bhīmāhvaṁ rākṣasaṁ duḥkhadāyakam kṛpāṁ kuru maheśāna vilambaṁ na kuru prabho
हे महेश्वर! उस दुःखदायी भीम नामक राक्षस का वध कीजिए; हे प्रभो! कृपा कीजिए, विलम्ब मत कीजिए।
श्लोक 62 (shiva.kotirudra.20.62)
सूत उवाच । इत्युक्तस्तु सुरैः सर्वैः शम्भुर्वै भक्तवत्सलः । वधं तस्य करिष्यामीत्युक्त्वा देवांस्ततोऽब्रवीत् ॥ 20.62 ॥
sūta uvāca ityuktastu suraiḥ sarvaiḥ śambhurvai bhaktavatsalaḥ vadhaṁ tasya kariṣyāmītyuktvā devāṁstato’bravīt
सूत जी ने कहा — समस्त देवताओं द्वारा ऐसा कहे जाने पर भक्तवत्सल शम्भु ने 'मैं उसका वध करूँगा' — ऐसा कहकर देवताओं से पुनः यह कहा।
श्लोक 63 (shiva.kotirudra.20.63)
शम्भुरुवाच । कामरूपेश्वरो राजा मदीयो भक्त उत्तमः । तस्मै ब्रूतेति वै देवाः कार्यं शीघ्रं भविष्यति ॥ 20.63 ॥
śambhuruvāca kāmarūpeśvaro rājā madīyo bhakta uttamaḥ tasmai brūteti vai devāḥ kāryaṁ śīghraṁ bhaviṣyati
शम्भु ने कहा — कामरूप का राजा मेरा उत्तम भक्त है; हे देवो! जाकर उससे यह कहो कि तुम्हारा कार्य शीघ्र ही सिद्ध होगा।
श्लोक 64 (shiva.kotirudra.20.64)
सुदक्षिण महाराज कामरूपेश्वर प्रभो । मद्भक्तस्त्वं विशेषेण कुरु मद्भजनं रतेः ॥ 20.64 ॥
sudakṣiṇa mahārāja kāmarūpeśvara prabho madbhaktastvaṁ viśeṣeṇa kuru madbhajanaṁ rateḥ
(कहना) — हे महाराज सुदक्षिण! हे कामरूप के स्वामी प्रभो! तुम विशेष रूप से मेरे भक्त हो; प्रेमपूर्वक मेरी भक्ति में लगे रहो।
श्लोक 65 (shiva.kotirudra.20.65)
दैत्यं भीमाह्वयं दुष्टं ब्रह्मप्राप्तवरोर्जितम् । हनिष्यामि न सन्देहस्त्वत्तिरस्कारकारिणम् ॥ 20.65 ॥
daityaṁ bhīmāhvayaṁ duṣṭaṁ brahmaprāptavarorjitam haniṣyāmi na sandehastvattiraskārakāriṇam
तुम्हारा अपमान करने वाले, ब्रह्मा से प्राप्त वर से बलशाली हुए उस दुष्ट दैत्य भीम को मैं अवश्य मारूँगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 66 (shiva.kotirudra.20.66)
सूत उवाच । अथ ते निर्जराः सर्वे तत्र गत्वा मुदान्विताः । तस्मै महानृपायोचुर्यदुक्तं शम्भुना च तत् ॥ 20.66 ॥
sūta uvāca atha te nirjarāḥ sarve tatra gatvā mudānvitāḥ tasmai mahānṛpāyocuryaduktaṁ śambhunā ca tat
सूत जी ने कहा — तत्पश्चात् वे सब देवता प्रसन्नतापूर्वक वहाँ जाकर उस महान राजा से वह सब कह सुनाया, जो शम्भु ने कहा था।
श्लोक 67 (shiva.kotirudra.20.67)
तमित्युक्त्वा च वै देवा आनन्दं परमं गताः । महर्षयश्च ते सर्वे ययुः शीघ्रं निजाश्रमान् ॥ 20.67 ॥
tamityuktvā ca vai devā ānandaṁ paramaṁ gatāḥ maharṣayaśca te sarve yayuḥ śīghraṁ nijāśramān
उससे यह कहकर देवता परम आनन्द को प्राप्त हुए, और वे सब महर्षि भी शीघ्र ही अपने-अपने आश्रमों को चले गये।