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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 21

भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति और उसकी महिमा

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.21.1)

सूत उवाच । शिवोऽपि च गणैः सार्धं जगाम हितकाम्यया । स्वभक्तनिकटं गुप्तस्तस्थौ रक्षार्थमादरात् ॥ 21.1 ॥

sūta uvāca śivo’pi ca gaṇaiḥ sārdhaṁ jagāma hitakāmyayā svabhaktanikaṭaṁ guptastasthau rakṣārthamādarāt

सूत जी ने कहा — शिव भी अपने गणों के साथ लोगों के कल्याण की कामना से वहाँ गये, और अपने भक्त की रक्षा के लिए आदरपूर्वक गुप्त रूप से उसके समीप ठहर गये।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.21.2)

एतस्मिन्नन्तरे तत्र कामरूपेश्वरेण च । अत्यन्तं ध्यानमारब्धं पार्थिवस्य पुरस्तदा ॥ 21.2 ॥

etasminnantare tatra kāmarūpeśvareṇa ca atyantaṁ dhyānamārabdhaṁ pārthivasya purastadā

इसी बीच वहाँ कामरूप के स्वामी राजा ने पार्थिव लिंग के समक्ष अत्यन्त गहन ध्यान आरम्भ किया।

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.21.3)

केनचित्तत्र गत्वा च राक्षसाय निवेदितम् । राजा किञ्चित्करोत्येवं त्वदर्थं ह्याभिचारिकम् ॥ 21.3 ॥

kenacittatra gatvā ca rākṣasāya niveditam rājā kiñcitkarotyevaṁ tvadarthaṁ hyābhicārikam

किसी ने वहाँ जाकर राक्षस से निवेदन किया कि राजा तुम्हारे विरुद्ध कोई अभिचार (मारण-क्रिया) कर रहा है।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.21.4)

सूत उवाच । राक्षसः स च तच्छ्रुत्वा क्रुद्धस्तद् हननेच्छया । गृहीत्वा करवालं च जगाम नृपतिं प्रति ॥ 21.4 ॥

sūta uvāca rākṣasaḥ sa ca tacchrutvā kruddhastad hananecchayā gṛhītvā karavālaṁ ca jagāma nṛpatiṁ prati

सूत जी ने कहा — यह सुनकर वह राक्षस क्रोधित हुआ और उसे मार डालने की इच्छा से तलवार लेकर राजा की ओर चला।

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.21.5)

तद् दृष्ट्वा राक्षसस्तत्र पार्थिवादि स्थितं च यत् । तदर्थं तत्स्वरूपं च दृष्ट्वा किञ्चित्करोत्यसौ ॥ 21.5 ॥

tad dṛṣṭvā rākṣasastatra pārthivādi sthitaṁ ca yat tadarthaṁ tatsvarūpaṁ ca dṛṣṭvā kiñcitkarotyasau

वहाँ वह पार्थिव लिंग आदि जो स्थापित था, उसे और उसके उस स्वरूप को देखकर वह राक्षस सोचने लगा कि यह क्या कर रहा है।

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.21.6)

अत एनं बलादद्य हन्मि सोपस्करं नृपम् । विचार्येति महाक्रुद्धो राक्षसः प्राह तं नृपम् ॥ 21.6 ॥

ata enaṁ balādadya hanmi sopaskaraṁ nṛpam vicāryeti mahākruddho rākṣasaḥ prāha taṁ nṛpam

'अतः मैं आज इस राजा को उसके सारे साधनों सहित बलपूर्वक मार डालूँगा' — ऐसा विचारकर अत्यन्त क्रुद्ध हुआ राक्षस उस राजा से बोला।

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.21.7)

भीम उवाच । रे रे पार्थिव दुष्टात्मन् क्रियते किं त्वयाधुना । सत्यं वद न हन्यां त्वामन्यथा हन्मि निश्चितम् ॥ 21.7 ॥

bhīma uvāca re re pārthiva duṣṭātman kriyate kiṁ tvayādhunā satyaṁ vada na hanyāṁ tvāmanyathā hanmi niścitam

भीम ने कहा — अरे दुष्टात्मा राजा! तू अभी यह क्या कर रहा है? सत्य बता, अन्यथा मैं निश्चय ही तुझे मार डालूँगा; सत्य बताने पर मैं तुझे नहीं मारूँगा।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.21.8)

सूत उवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्य कामरूपेश्वरश्च सः । मनसीति चिचिन्ताशु शिवविश्वासपूरितः ॥ 21.8 ॥

sūta uvāca iti śrutvā vacastasya kāmarūpeśvaraśca saḥ manasīti cicintāśu śivaviśvāsapūritaḥ

सूत जी ने कहा — उसके इस वचन को सुनकर शिव में दृढ़ विश्वास से भरा हुआ वह कामरूप का राजा तुरन्त मन में इस प्रकार विचार करने लगा।

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.21.9)

भविष्यं यद्भवत्येव नास्ति तस्य निवर्तकः । प्रारब्धाधीनमेवात्र प्रारब्धः स शिवः स्मृतः ॥ 21.9 ॥

bhaviṣyaṁ yadbhavatyeva nāsti tasya nivartakaḥ prārabdhādhīnamevātra prārabdhaḥ sa śivaḥ smṛtaḥ

जो होनहार है, वह अवश्य होकर रहता है, उसे कोई रोक नहीं सकता; यहाँ सब कुछ प्रारब्ध के अधीन है, और वह प्रारब्ध ही साक्षात् शिव कहा गया है।

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.21.10)

कृपालुः शङ्करश्चात्र पार्थिवे वर्तते ध्रुवम् । मदर्थं न करोतीह कुतः कोऽयं च राक्षसः ॥ 21.10 ॥

kṛpāluḥ śaṅkaraścātra pārthive vartate dhruvam madarthaṁ na karotīha kutaḥ ko’yaṁ ca rākṣasaḥ

कृपालु शंकर निश्चय ही इस पार्थिव लिंग में विद्यमान हैं; यदि वे मेरे लिए कुछ नहीं करते, तो यह राक्षस भला कहाँ से आ गया है?

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.21.11)

स्वानुरूपां प्रतिज्ञां स सत्यं चैव करिष्यति । सत्यप्रतिज्ञो भगवान् शिवश्चेति श्रुतौ श्रुतः ॥ 21.11 ॥

svānurūpāṁ pratijñāṁ sa satyaṁ caiva kariṣyati satyapratijño bhagavān śivaśceti śrutau śrutaḥ

वे अपनी प्रतिज्ञा के अनुरूप ही उसे सत्य करेंगे; भगवान् शिव सत्य-प्रतिज्ञ हैं, ऐसा श्रुति में सुना गया है।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.21.12)

मम भक्तं यदा कश्चित्पीडयत्यतिदारुणः । तदाहं तस्य रक्षार्थं दुष्टं हन्मि न संशयः ॥ 21.12 ॥

mama bhaktaṁ yadā kaścitpīḍayatyatidāruṇaḥ tadāhaṁ tasya rakṣārthaṁ duṣṭaṁ hanmi na saṁśayaḥ

(शिव की प्रतिज्ञा है —) 'जब कोई अत्यन्त क्रूर व्यक्ति मेरे भक्त को पीड़ा देता है, तब मैं उसकी रक्षा के लिए उस दुष्ट का वध करता हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं।'

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.21.13)

एवं धैर्यं समालम्ब्य ध्यात्वा देवं च शङ्करम् । प्रार्थयामास सद्भक्त्या मनसैव रसेश्वरः ॥ 21.13 ॥

evaṁ dhairyaṁ samālambya dhyātvā devaṁ ca śaṅkaram prārthayāmāsa sadbhaktyā manasaiva raseśvaraḥ

राजा ने इस प्रकार धैर्य धारण करके, देव शंकर का ध्यान करके, मन ही मन सद्भावपूर्वक उनसे प्रार्थना की।

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.21.14)

त्वदीयोऽस्मि महाराज यथेच्छसि तथा कुरु । सत्यं च वचनं ह्यत्र ब्रवीमि कुरु मे हितम् ॥ 21.14 ॥

tvadīyo’smi mahārāja yathecchasi tathā kuru satyaṁ ca vacanaṁ hyatra bravīmi kuru me hitam

'हे महाराज! मैं आपका ही हूँ, आप जैसा चाहें वैसा कीजिए; मैं यहाँ सत्य वचन कहता हूँ, आप मेरा कल्याण कीजिए।'

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.21.15)

एवं मनसि स ध्यात्वा सत्यपाशेन यन्त्रितः । प्राह सत्यं वचो राजा राक्षसं चावमानयन् ॥ 21.15 ॥

evaṁ manasi sa dhyātvā satyapāśena yantritaḥ prāha satyaṁ vaco rājā rākṣasaṁ cāvamānayan

इस प्रकार मन में ध्यान करके, सत्य के बन्धन में बँधे हुए उस राजा ने राक्षस का अपमान करते हुए सत्य वचन कहा।

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.21.16)

नृप उवाच । भजामि शङ्करं देवं स्वभक्तपरिपालकम् । चराचराणां सर्वेषामीश्वरं निर्विकारकम् ॥ 21.16 ॥

nṛpa uvāca bhajāmi śaṅkaraṁ devaṁ svabhaktaparipālakam carācarāṇāṁ sarveṣāmīśvaraṁ nirvikārakam

राजा ने कहा — मैं देव शंकर की भक्ति करता हूँ, जो अपने भक्तों का पालन करने वाले, समस्त चराचर के ईश्वर, और विकाररहित हैं।

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.21.17)

सूत उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा कामरूपेश्वरस्य सः । क्रोधेन प्रचलद्गात्रो भीमो वचनमब्रवीत् ॥ 21.17 ॥

sūta uvāca iti tasya vacaḥ śrutvā kāmarūpeśvarasya saḥ krodhena pracaladgātro bhīmo vacanamabravīt

सूत जी ने कहा — कामरूप के राजा के इस वचन को सुनकर क्रोध से काँपते हुए शरीर वाला वह भीम यह बोला।

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.21.18)

भीम उवाच । शङ्करस्ते मया ज्ञातः किं करिष्यति वै मम । यो मे पितृव्यकेनैव स्थापितः किङ्करो यथा ॥ 21.18 ॥

bhīma uvāca śaṅkaraste mayā jñātaḥ kiṁ kariṣyati vai mama yo me pitṛvyakenaiva sthāpitaḥ kiṅkaro yathā

भीम ने कहा — मैं तेरे शंकर को जानता हूँ; वह मेरा क्या कर लेगा? वह तो मेरे चाचा (कुम्भकर्ण) द्वारा ही एक सेवक के समान स्थापित किया गया था।

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.21.19)

तद्बलं हि समाश्रित्य विजेतुं त्वं समीहसे । तर्हि त्वया जितं सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ 21.19 ॥

tadbalaṁ hi samāśritya vijetuṁ tvaṁ samīhase tarhi tvayā jitaṁ sarvaṁ nātra kāryā vicāraṇā

उसी के बल का आश्रय लेकर तू जीतना चाहता है; तो मानो तूने सब कुछ जीत ही लिया, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.21.20)

यावन्मया न दृष्टो हि शङ्करस्त्वत्प्रपालकः । तावत्त्वं स्वामिनं मत्वा सेवसे नान्यथा क्वचित् ॥ 21.20 ॥

yāvanmayā na dṛṣṭo hi śaṅkarastvatprapālakaḥ tāvattvaṁ svāminaṁ matvā sevase nānyathā kvacit

जब तक मैंने तेरे उस रक्षक शंकर को देखा नहीं है, तभी तक तू उसे स्वामी मानकर उसकी सेवा कर सकता है, अन्यथा कभी नहीं।

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.21.21)

मया दृष्टे च तत्सर्वं स्फुटं स्यात्सर्वथा नृप । तस्मात्त्वं वै शिवस्येदं रूपं दूरतरं कुरु ॥ 21.21 ॥

mayā dṛṣṭe ca tatsarvaṁ sphuṭaṁ syātsarvathā nṛpa tasmāttvaṁ vai śivasyedaṁ rūpaṁ dūrataraṁ kuru

हे राजन्! मेरे द्वारा देखे जाने पर वह सब स्पष्ट रूप से प्रकट हो जायेगा; इसलिए तू शिव के इस रूप को यहाँ से दूर हटा दे।

श्लोक 22 (shiva.kotirudra.21.22)

अन्यथा हि भयं तेऽद्य भविष्यति न संशयः । स्वामिनस्ते करं तीक्ष्णं दास्येऽहं भीमविक्रमः ॥ 21.22 ॥

anyathā hi bhayaṁ te’dya bhaviṣyati na saṁśayaḥ svāminaste karaṁ tīkṣṇaṁ dāsye’haṁ bhīmavikramaḥ

अन्यथा आज तुझे निश्चय ही भय होगा; मैं भीषण पराक्रमी अपने तीक्ष्ण हाथ से तेरे उस स्वामी को दण्ड दूँगा।

श्लोक 23 (shiva.kotirudra.21.23)

सूत उवाच । इति तद्वचनं श्रुत्वा कामरूपेश्वरो नृपः । दृढं शङ्करविश्वासो द्रुतं वाक्यमुवाच तम् ॥ 21.23 ॥

sūta uvāca iti tadvacanaṁ śrutvā kāmarūpeśvaro nṛpaḥ dṛḍhaṁ śaṅkaraviśvāso drutaṁ vākyamuvāca tam

सूत जी ने कहा — उसके इस वचन को सुनकर, शंकर में दृढ़ विश्वास रखने वाला वह कामरूप का राजा तुरन्त उससे यह वचन बोला।

श्लोक 24 (shiva.kotirudra.21.24)

राजोवाच । अहं च पामरो दुष्टो न मोक्ष्ये शङ्करं पुनः । सर्वोत्कृष्टश्च मे स्वामी न मां मुञ्चति कर्हिचित् ॥ 21.24 ॥

rājovāca ahaṁ ca pāmaro duṣṭo na mokṣye śaṅkaraṁ punaḥ sarvotkṛṣṭaśca me svāmī na māṁ muñcati karhicit

राजा ने कहा — मैं पामर और दुष्ट भले ही हूँ, किन्तु मैं शंकर को कभी नहीं छोड़ूँगा; मेरे सर्वोत्कृष्ट स्वामी भी मुझे कभी नहीं त्यागते।

श्लोक 25 (shiva.kotirudra.21.25)

सूत उवाच । एवं वचस्तदा श्रुत्वा तस्य राज्ञः शिवात्मनः । तं प्रहस्य द्रुतं भीमो भूपतिं राक्षसोऽब्रवीत् ॥ 21.25 ॥

sūta uvāca evaṁ vacastadā śrutvā tasya rājñaḥ śivātmanaḥ taṁ prahasya drutaṁ bhīmo bhūpatiṁ rākṣaso’bravīt

सूत जी ने कहा — शिव-भक्त उस राजा के इस वचन को सुनकर राक्षस भीम उस पर हँसकर तुरन्त यह बोला।

श्लोक 26 (shiva.kotirudra.21.26)

भीम उवाच । मत्तो भिक्षयते नित्यं स किं जानाति स्वाकृतिम् । योगिनां का च निष्ठा वै भक्तानां प्रतिपालने ॥ 21.26 ॥

bhīma uvāca matto bhikṣayate nityaṁ sa kiṁ jānāti svākṛtim yogināṁ kā ca niṣṭhā vai bhaktānāṁ pratipālane

भीम ने कहा — जो नित्य मुझसे ही भिक्षा माँगता है, वह अपनी सामर्थ्य क्या जानता होगा? योगियों की भक्तों के पालन में भला क्या निष्ठा हो सकती है?

श्लोक 27 (shiva.kotirudra.21.27)

इति कृत्वा मतिं त्वं च दूरतो भव सर्वथा । अहं च तव स स्वामी युद्धं वै करवावहे ॥ 21.27 ॥

iti kṛtvā matiṁ tvaṁ ca dūrato bhava sarvathā ahaṁ ca tava sa svāmī yuddhaṁ vai karavāvahe

ऐसा निश्चय करके तू पूरी तरह दूर हो जा; मैं और तेरा वह स्वामी — हम दोनों युद्ध करें।

श्लोक 28 (shiva.kotirudra.21.28)

सूत उवाच । इत्युक्तः स नृपश्रेष्ठः शम्भुभक्तो दृढव्रतः । प्रत्युवाचाभयो भीमं दुःखदं जगतां सदा ॥ 21.28 ॥

sūta uvāca ityuktaḥ sa nṛpaśreṣṭhaḥ śambhubhakto dṛḍhavrataḥ pratyuvācābhayo bhīmaṁ duḥkhadaṁ jagatāṁ sadā

सूत जी ने कहा — ऐसा कहे जाने पर शम्भु के दृढ़व्रती भक्त वह श्रेष्ठ राजा निर्भय होकर, संसार को सदा दुःख देने वाले भीम से इस प्रकार बोला।

श्लोक 29 (shiva.kotirudra.21.29)

राजोवाच । शृणु राक्षस दुष्टात्मन्मया कर्तुं न शक्यते । त्वया विक्रियते तर्हि कुतस्त्वं शक्तिमानसि ॥ 21.29 ॥

rājovāca śṛṇu rākṣasa duṣṭātmanmayā kartuṁ na śakyate tvayā vikriyate tarhi kutastvaṁ śaktimānasi

राजा ने कहा — सुन, हे दुष्टात्मा राक्षस! यह मुझसे तो नहीं हो सकता; यदि तू ही उन्हें दूर करना चाहता है, तो कर — तुझमें ही यह सामर्थ्य कहाँ है?

श्लोक 30 (shiva.kotirudra.21.30)

सूत उवाच । इत्युक्तः सैन्यमादाय राजानं परिभर्त्स्य तम् । करालं करवालं च पार्थिवे प्राक्षिपत्तदा ॥ 21.30 ॥

sūta uvāca ityuktaḥ sainyamādāya rājānaṁ paribhartsya tam karālaṁ karavālaṁ ca pārthive prākṣipattadā

सूत जी ने कहा — ऐसा कहे जाने पर वह अपनी सेना लेकर, राजा को धमकाते हुए, उस पार्थिव लिंग पर अपनी भयंकर तलवार से प्रहार करने लगा।

श्लोक 31 (shiva.kotirudra.21.31)

पश्य त्वं स्वामिनोऽद्यैव बलं भक्तसुखावहम् । इत्युवाच विहस्यैव राक्षसैः स महाबलः ॥ 21.31 ॥

paśya tvaṁ svāmino’dyaiva balaṁ bhaktasukhāvaham ityuvāca vihasyaiva rākṣasaiḥ sa mahābalaḥ

'आज ही अपने उस स्वामी का, भक्तों को सुख देने वाला बल देख ले' — ऐसा कहकर वह महाबली राक्षसों के साथ हँस पड़ा।

श्लोक 32 (shiva.kotirudra.21.32)

करवालः पार्थिवं च यावत्स्पृशति नो द्विजाः । तावच्च पार्थिवात्तस्मादाविरासीत्स्वयं हरः ॥ 21.32 ॥

karavālaḥ pārthivaṁ ca yāvatspṛśati no dvijāḥ tāvacca pārthivāttasmādāvirāsītsvayaṁ haraḥ

हे द्विजो! जैसे ही वह तलवार उस पार्थिव लिंग को छूने ही वाली थी, उसी क्षण उस पार्थिव लिंग से स्वयं हर प्रकट हो गये।

श्लोक 33 (shiva.kotirudra.21.33)

पश्य भीमेश्वरोऽहं च रक्षार्थं प्रकटोऽभवम् । मम पूर्वव्रतं ह्येतद्रक्ष्यो भक्तो मया सदा ॥ 21.33 ॥

paśya bhīmeśvaro’haṁ ca rakṣārthaṁ prakaṭo’bhavam mama pūrvavrataṁ hyetadrakṣyo bhakto mayā sadā

(शिव ने कहा —) देख, मैं भीमेश्वर हूँ, तेरी रक्षा के लिए ही मैं यहाँ प्रकट हुआ हूँ; यह मेरा पूर्व-व्रत है कि मैं सदा अपने भक्त की रक्षा करता हूँ।

श्लोक 34 (shiva.kotirudra.21.34)

एतस्मात्पश्य मे शीघ्रं बलं भक्तसुखावहम् । इत्युक्त्वा स पिनाकेन करवालो द्विधा कृतः ॥ 21.34 ॥

etasmātpaśya me śīghraṁ balaṁ bhaktasukhāvaham ityuktvā sa pinākena karavālo dvidhā kṛtaḥ

'अतः अब शीघ्र ही मेरा वह बल देख, जो भक्तों को सुख देने वाला है' — ऐसा कहकर उन्होंने अपने पिनाक (धनुष) से उस तलवार के दो टुकड़े कर दिये।

श्लोक 35 (shiva.kotirudra.21.35)

पुनश्चैव त्रिशूलं स्वं चिक्षिपे तेन रक्षसा । तच्छूलं शतधा नीतमपि दुष्टस्य शम्भुना ॥ 21.35 ॥

punaścaiva triśūlaṁ svaṁ cikṣipe tena rakṣasā tacchūlaṁ śatadhā nītamapi duṣṭasya śambhunā

फिर उस राक्षस ने अपना त्रिशूल फेंका, किन्तु शम्भु ने उस दुष्ट के उस त्रिशूल को भी सौ टुकड़ों में कर दिया।

श्लोक 36 (shiva.kotirudra.21.36)

पुनः शक्तिश्च निःक्षिप्ता तेन शम्भूपरि द्विजाः । शम्भुना सापि बाणैः स्वैर्लक्षधा च कृता द्रुतम् ॥ 21.36 ॥

punaḥ śaktiśca niḥkṣiptā tena śambhūpari dvijāḥ śambhunā sāpi bāṇaiḥ svairlakṣadhā ca kṛtā drutam

हे द्विजो! फिर उसने शम्भु पर अपनी शक्ति (भाला) फेंकी, किन्तु शम्भु ने अपने बाणों से उसे भी तुरन्त लाख टुकड़ों में कर डाला।

श्लोक 37 (shiva.kotirudra.21.37)

पट्टिशश्च ततस्तेन निःक्षिप्तो हि शिवोपरि । शिवेन स त्रिशूलेन तिलशश्च कृतं क्षणात् ॥ 21.37 ॥

paṭṭiśaśca tatastena niḥkṣipto hi śivopari śivena sa triśūlena tilaśaśca kṛtaṁ kṣaṇāt

तत्पश्चात् उसने शिव पर एक पट्टिश (कुल्हाड़ी-सदृश शस्त्र) फेंका, जिसे शिव ने अपने त्रिशूल से क्षणमात्र में तिल-तिल टुकड़े कर दिया।

श्लोक 38 (shiva.kotirudra.21.38)

ततः शिवगणानां च राक्षसानां परस्परम् । युद्धमासीत्तदा घोरं पश्यतां दुःखकावहम् ॥ 21.38 ॥

tataḥ śivagaṇānāṁ ca rākṣasānāṁ parasparam yuddhamāsīttadā ghoraṁ paśyatāṁ duḥkhakāvaham

तत्पश्चात् शिवगणों और राक्षसों के बीच वहाँ एक घोर युद्ध हुआ, जो देखने वालों को भी दुःख देने वाला था।

श्लोक 39 (shiva.kotirudra.21.39)

ततश्च पृथिवी सर्वा व्याकुला चाभवत्क्षणात् । समुद्राश्च तदा सर्वे चुक्षुभुः समहीधराः ॥ 21.39 ॥

tataśca pṛthivī sarvā vyākulā cābhavatkṣaṇāt samudrāśca tadā sarve cukṣubhuḥ samahīdharāḥ

उसी क्षण सम्पूर्ण पृथ्वी व्याकुल हो गयी, और पर्वतों सहित समस्त समुद्र भी क्षुब्ध हो उठे।

श्लोक 40 (shiva.kotirudra.21.40)

देवाश्च ऋषयः सर्वे बभूवुर्विकला अति । ऊचुः परस्परं चेति व्यर्थं वै प्रार्थितः शिवः ॥ 21.40 ॥

devāśca ṛṣayaḥ sarve babhūvurvikalā ati ūcuḥ parasparaṁ ceti vyarthaṁ vai prārthitaḥ śivaḥ

सभी देवता और ऋषि अत्यन्त व्याकुल हो उठे, और आपस में यह कहने लगे कि शिव से जो प्रार्थना की गयी थी, वह व्यर्थ ही सिद्ध हो रही है।

श्लोक 41 (shiva.kotirudra.21.41)

नारदश्च समागत्य शङ्करं दुःखदाहकम् । प्रार्थयामास तत्रैव साञ्जलिर्नतमस्तकः ॥ 21.41 ॥

nāradaśca samāgatya śaṅkaraṁ duḥkhadāhakam prārthayāmāsa tatraiva sāñjalirnatamastakaḥ

तब नारद जी वहाँ आये और दुःखों को जलाने वाले शंकर से हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर वहीं प्रार्थना करने लगे।

श्लोक 42 (shiva.kotirudra.21.42)

नारद उवाच । क्षम्यतां क्षम्यतां नाथ त्वया विभ्रमकारक । तृणे कश्च कुठारो वै हन्यतां शीघ्रमेव हि ॥ 21.42 ॥

nārada uvāca kṣamyatāṁ kṣamyatāṁ nātha tvayā vibhramakāraka tṛṇe kaśca kuṭhāro vai hanyatāṁ śīghrameva hi

नारद जी ने कहा — हे नाथ! भ्रम उत्पन्न करने वाले इस राक्षस को क्षमा कीजिए, क्षमा कीजिए; तिनके पर कुल्हाड़ी चलाने की क्या आवश्यकता है? इसे शीघ्र ही समाप्त कर दीजिए।

श्लोक 43 (shiva.kotirudra.21.43)

इति सम्प्रार्थितः शम्भुः सर्वान् रक्षोगणान्प्रभुः । हुङ्कारेणैव चास्त्रेण भस्मसात्कृतवांस्तदा ॥ 21.43 ॥

iti samprārthitaḥ śambhuḥ sarvān rakṣogaṇānprabhuḥ huṅkāreṇaiva cāstreṇa bhasmasātkṛtavāṁstadā

इस प्रकार प्रार्थना किये जाने पर प्रभु शम्भु ने अपने केवल हुंकार-रूपी अस्त्र से ही समस्त राक्षस-समूह को भस्म कर दिया।

श्लोक 44 (shiva.kotirudra.21.44)

सर्वे ते राक्षसा दग्धाः शङ्करेण क्षणं मुने । बभूवुस्तत्र सर्वेषां देवानां पश्यतां द्रुतम् ॥ 21.44 ॥

sarve te rākṣasā dagdhāḥ śaṅkareṇa kṣaṇaṁ mune babhūvustatra sarveṣāṁ devānāṁ paśyatāṁ drutam

हे मुने! शंकर द्वारा वे सभी राक्षस उसी क्षण जलकर भस्म हो गये, समस्त देवताओं के देखते-देखते तुरन्त।

श्लोक 45 (shiva.kotirudra.21.45)

दावानलगतो वह्निर्यथा च वनमादहेत् । तथा शिवेन क्रुद्धेन राक्षसानां बलं क्षणात् ॥ 21.45 ॥

dāvānalagato vahniryathā ca vanamādahet tathā śivena kruddhena rākṣasānāṁ balaṁ kṣaṇāt

जैसे दावानल की अग्नि वन को जला डालती है, वैसे ही क्रुद्ध शिव ने राक्षसों की उस सेना को क्षणभर में भस्म कर दिया।

श्लोक 46 (shiva.kotirudra.21.46)

भीमस्यैव च किं भस्म न ज्ञातं केनचित्तदा । परिवारयुतो दग्धो नाम न श्रूयते क्वचित् ॥ 21.46 ॥

bhīmasyaiva ca kiṁ bhasma na jñātaṁ kenacittadā parivārayuto dagdho nāma na śrūyate kvacit

भीम की भी भस्म हुई या नहीं, यह उस समय किसी को ज्ञात नहीं हुआ; अपने समस्त परिवार सहित जलकर भस्म हुए उसका नाम भी फिर कहीं सुनने में नहीं आया।

श्लोक 47 (shiva.kotirudra.21.47)

ततः शिवस्य कृपया शान्तिं प्राप्ता मुनीश्वराः । देवाः सर्वे च शक्राद्याः स्वास्थ्यं प्रापाखिलं जगत् ॥ 21.47 ॥

tataḥ śivasya kṛpayā śāntiṁ prāptā munīśvarāḥ devāḥ sarve ca śakrādyāḥ svāsthyaṁ prāpākhilaṁ jagat

तत्पश्चात् शिव की कृपा से मुनीश्वरों को शान्ति प्राप्त हुई, इन्द्र आदि समस्त देवताओं और सम्पूर्ण जगत् ने भी सुख-शान्ति प्राप्त की।

श्लोक 48 (shiva.kotirudra.21.48)

क्रोधज्वाला महेशस्य निःससार वनाद्वनम् । राक्षसानां च तद्भस्म सर्वं व्याप्तं वनेऽखिलम् ॥ 21.48 ॥

krodhajvālā maheśasya niḥsasāra vanādvanam rākṣasānāṁ ca tadbhasma sarvaṁ vyāptaṁ vane’khilam

महेश की वह क्रोध-ज्वाला वन से वन तक फैल गयी, और राक्षसों की वह समस्त भस्म सारे वन में व्याप्त हो गयी।

श्लोक 49 (shiva.kotirudra.21.49)

ततश्चौषधयो जाता नानाकार्यकरास्तथा । रूपान्तरं ततो नॄणां भवेद्वेषान्तरं तथा ॥ 21.49 ॥

tataścauṣadhayo jātā nānākāryakarāstathā rūpāntaraṁ tato nṝṇāṁ bhavedveṣāntaraṁ tathā

उससे नाना प्रकार के कार्य करने वाली औषधियाँ उत्पन्न हुईं, जिनसे मनुष्यों का रूप और वेष भी बदल जाता है।

श्लोक 50 (shiva.kotirudra.21.50)

भूतप्रेतपिशाचादि दूरतश्च ततो व्रजेत् । तन्न कार्यं च यच्चैव ततो न भवति द्विजाः ॥ 21.50 ॥

bhūtapretapiśācādi dūrataśca tato vrajet tanna kāryaṁ ca yaccaiva tato na bhavati dvijāḥ

हे द्विजो! उससे भूत, प्रेत, पिशाच आदि दूर भाग जाते हैं; ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो इससे सिद्ध न हो।

श्लोक 51 (shiva.kotirudra.21.51)

तैर्देवैः प्रार्थितः शम्भुर्मुनिभिश्च विशेषतः । स्थातव्यं स्वामिना ह्यत्र लोकानां सुखहेतवे ॥ 21.51 ॥

tairdevaiḥ prārthitaḥ śambhurmunibhiśca viśeṣataḥ sthātavyaṁ svāminā hyatra lokānāṁ sukhahetave

उन देवताओं और विशेष रूप से मुनियों ने शम्भु से प्रार्थना की कि हे स्वामिन्! लोगों के सुख के लिए आप यहीं निवास कीजिए।

श्लोक 52 (shiva.kotirudra.21.52)

अयं वै कुत्सितो देश अयोध्यालोकदुःखदः । भवन्तं च तदा दृष्ट्वा कल्याणं सम्भविष्यति ॥ 21.52 ॥

ayaṁ vai kutsito deśa ayodhyālokaduḥkhadaḥ bhavantaṁ ca tadā dṛṣṭvā kalyāṇaṁ sambhaviṣyati

यह देश अत्यन्त निकृष्ट और अपने लोगों को दुःख देने वाला रहा है; अब आपका दर्शन पाकर यहाँ कल्याण ही कल्याण होगा।

श्लोक 53 (shiva.kotirudra.21.53)

भीमशङ्करनामा त्वं भविता सर्वसाधकः । एतल्लिङ्गं सदा पूज्यं सर्वापद्विनिवारकम् ॥ 21.53 ॥

bhīmaśaṅkaranāmā tvaṁ bhavitā sarvasādhakaḥ etalliṅgaṁ sadā pūjyaṁ sarvāpadvinivārakam

आप 'भीमशंकर' नाम से समस्त कार्यों को सिद्ध करने वाले होंगे; यह लिंग सदा पूजनीय और समस्त विपत्तियों का निवारण करने वाला होगा।

श्लोक 54 (shiva.kotirudra.21.54)

सूत उवाच । इत्येवं प्रार्थितः शम्भुर्लोकानां हितकारकः । तत्रैवास्थितवान्प्रीत्या स्वतन्त्रो भक्तवत्सलः ॥ 21.54 ॥

sūta uvāca ityevaṁ prārthitaḥ śambhurlokānāṁ hitakārakaḥ tatraivāsthitavānprītyā svatantro bhaktavatsalaḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार प्रार्थना किये जाने पर लोकों का हित करने वाले, स्वतन्त्र और भक्तवत्सल शम्भु प्रीतिपूर्वक वहीं स्थिर हो गये।

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